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अध्याय पाँच: विदुर की मैत्रेय से बातचीत

3.5श्रीशुक उवाचद्वारि द्युनद्या ऋषभः कुरूणांमैत्रेयमासीनमगाधबोधम्‌।

क्षत्तोपसृत्याच्युतभावसिद्ध:ःपप्रच्छ सौशील्यगुणाभितृप्त: ॥

१॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; द्वारि--उदगम पर; द्यु-नद्या:--स्वर्गलोक की गंगा नदी; ऋषभः -- श्रेष्ठ;कुरूणाम्‌ू-कुरुओं के; मैत्रेयमू--मैत्रेय से; आसीनम्‌--बैठे हुए; अगाध-बोधम्‌--अगाध ज्ञान का; क्षत्ता--विदुर ने;उपसृत्य--पास आकर; अच्युत--अच्युत भगवान्‌; भाव--चरित्र; सिद्धः--पूर्ण; पप्रच्छ--पूछा; सौशील्य--सुशीलता; गुण-अभितृप्त:--दिव्य गुणों से तृप्त।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह कुरुवंशियों में सर्व श्रेष्ठ विदुर, जो कि भगवद्भक्ति मेंपरिपूर्ण थे, स्वर्ग लोक की नदी गंगा के उदगम (हरद्वार ) पहुँचे जहाँ विश्व के अगाध विद्वानमहामुनि मैत्रेय आसीन थे।

मद्गरता से ओत-प्रोत में पूर्ण तथा अध्यात्म में तुष्ट विदुर ने उनसे पूछा।

विदुर उवाचसुखाय कर्माणि करोति लोकोन तैः सुखं वान्यदुपारमं वा ।

विन्देत भूयस्तत एव दु:खंयदत्र युक्त भगवान्वदेन्न: ॥

२॥

विदुर: उवाच--विदुर ने कहा; सुखाय--सुख प्राप्त करने के लिए; कर्माणि--सकाम कर्म; करोति--हर कोई करता है;लोक:--इस जगत में; न--कभी नहीं; तैः--उन कर्मों के द्वारा; सुखम्‌ू--कोई सुख; वा--अथवा; अन्यत्‌--भिन्न रीति से;उपारमम्‌--तृप्ति; वा--अथवा; विन्देत--प्राप्त करता है; भूयः--इसके विपरीत; ततः--ऐसे कार्यों के द्वारा; एब--निश्चय ही;दुःखम्‌--कष्ट; यत्‌--जो; अत्र--परिस्थितिवश; युक्तम्‌--सही मार्ग; भगवान्‌--हे महात्मन्‌; वदेतू--कृपया प्रकाशित करें;नः--हमको।

विदुर ने कहा : हे महर्षि, इस संसार का हर व्यक्ति सुख प्राप्त करने के लिए सकाम कर्मों मेंप्रवृत्त होता है, किन्तु उसे न तो तृप्ति मिलती है न ही उसके दुख में कोई कमी आती है।

विपरीतइसके ऐसे कार्यों से उसके दुख में वृद्धि होती है।

इसलिए कृपा करके हमें इसके विषय में हमारामार्गदर्शन करें कि असली सुख के लिए कोई कैसे रहे ?

जनस्य कृष्णाद्विमुखस्य दैवा-दधर्मशीलस्य सुदुःखितस्य ।

अनुग्रहायेह चरन्ति नूनंभूतानि भव्यानि जनार्दनस्य ॥

३॥

जनस्य--सामान्य व्यक्ति की; कृष्णात्‌-- भगवान्‌ कृष्ण से; विमुखस्य--विमुख, मुँह फेरने वाले का; दैवात्‌-माया के प्रभावसे; अधर्म-शीलस्य--अधर्म में लगे हुए का; सु-दुःखितस्य--सदैव दुखी रहने वाले का; अनुग्रहाय--उनके प्रति दयालु होने केकारण; इह--इस जगत में; चरन्ति--विचरण करते हैं; नूनम्‌--निश्चय ही; भूतानि--लोग; भव्यानि--अत्यन्त परोपकारीआत्माएँ; जनार्दनस्य-- भगवान्‌ की ।

हे प्रभु, महान्‌ परोपकारी आत्माएँ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ की ओर से पृथ्वी पर उन पतितआत्माओं पर अनुकंपा दिखाने के लिए विचरण करती है, जो भगवान्‌ की अधीनता के विचारमात्र से ही विमुख रहते हैं।

तत्साधुवर्यादिश वर्त्म शं नःसंराधितो भगवान्येन पुंसाम्‌ ।

हृदि स्थितो यच्छति भक्तिपूतेज्ञानं सतत्त्वाधिगमं पुराणम्‌ ॥

४॥

तत्‌--इसलिए; साधु-वर्य --हे सन्तों में सर्व श्रेष्ठ आदिश--आदेश दें; वर्त्म--मार्ग; शम्‌--शुभ; न:--हमारे लिए; संराधित:--पूरी तरह सेवित; भगवानू-- भगवान्‌; येन--जिससे; पुंसामू-- जीव का; हृदि स्थित:--हृदय में स्थित; यच्छति--प्रदान करताहै; भक्ति-पूते--शुद्ध भक्त को; ज्ञानमू--ज्ञान; स--वह; तत्त्व--सत्य; अधिगमम्‌--जिससे कोई सीखता है; पुराणम्‌--प्रामाणिक, प्राचीन।

इसलिए, हे महर्षि, आप मुझे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ की दिव्य भक्ति के विषय में उपदेश देंजिससे हर एक के हृदय में स्थित भगवान्‌ भीतर से परम सत्य विषयक वह ज्ञान प्रदान करने केलिए प्रसन्न हों जो कि प्राचीन वैदिक सिद्धान्तों के रूप में उन लोगों को ही प्रदान किया जाता है,जो भक्तियोग द्वारा शुद्ध हो चुके है।

करोति कर्माणि कृतावतारोयान्यात्मतन्त्रो भगवांस्त्यधीश: ।

यथा ससर्जाग्र इृदं निरीहःसंस्थाप्य वृत्ति जगतो विधत्ते ॥

५॥

करोति--करता है; कर्माणि--दिव्य कर्म; कृत--स्वीकार करके; अवतार:--अवतार; यानि--वे सब; आत्म-तन्त्र:--स्वतंत्र;भगवान्‌-- भगवान्‌; त्रि-अधीश: --तीनों लोकों के स्वामी; यथा--जिस तरह; ससर्ज--उत्पन्न किया; अग्रे--सर्वप्रथम; इृदम्‌--इस विराट जगत को; निरीह:--यद्यपि इच्छारहित; संस्थाप्य--स्थापित करके; वृत्तिमू--जीविकोपार्जन का साधन; जगत: --ब्रह्माण्डों का; विधत्ते--जिस तरह वह नियमन करता है।

हे महर्षि, कृपा करके बतलाएँ कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ जो तीनों लोकों के इच्छारहितस्वतंत्र स्वामी तथा समस्त शक्तियों के नियन्ता हैं, किस तरह अवतारों को स्वीकार करते हैं औरकिस तरह विराट जगत को उत्पन्न करते हैं, जिसके परिपालन के लिए नियामक सिद्धान्त पूर्णरुप से व्यवस्थित हैं।

यथा पुनः स्वे ख इदं निवेश्यशेते गुहायां स निवृत्तवृत्ति: ।

योगेश्वराधी श्वर एक एत-दनुप्रविष्टो बहुधा यथासीत्‌ ॥

६॥

यथा--जिस तरह; पुनः --फिर; स्वे--अपने में; खे--आकाश के रूप ( विराट रूप ) में; इदम्‌--यह; निवेश्य-- प्रविष्ट होकर;शेते--शयन करता है; गुहायाम्‌ू-ब्रह्माण्ड के भीतर; सः--वह ( भगवान्‌ ); निवृत्त--बिना प्रयास के; वृत्तिः--आजीविका कासाधन; योग-ई श्वरर-- समस्त योगशक्तियों के स्वामी; अधीश्वर:ः--सभी वस्तुओं के स्वामी; एक:--अद्वितीय; एतत्‌--यह;अनुप्रविष्ट:--बाद में प्रविष्ट होकर; बहुधा--असंख्य प्रकारों से; यथा--जिस तरह; आसीतू--विद्यमान रहता है।

वे आकाश के रूप में फैले अपने ही हृदय में लेट जाते हैं और उस आकाश में सम्पूर्ण सृष्टिको रखकर वे अपना विस्तार अनेक जीवों में करते हैं, जो विभिन्न योनियों के रूप में प्रकट होतेहैं।

उन्हें अपने निर्वाह के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता क्योंकि वे समस्त यौगिक शक्तियोंके स्वामी और प्रत्येक वस्तु के मालिक है।

इस प्रकार वे जीवों से भिन्न है।

क्रीडन्विधत्ते द्विजगोसुराणांक्षेमाय कर्माण्यवतारभेदैः ।

मनो न तृप्यत्यपि श्रण्वतां नःसुश्लोकमौले श्वरितामृतानि ॥

७॥

क्रीडन्‌ू-- लीलाएँ करते हुए; विधत्ते--सम्पन्न करता है; द्विज--द्विजन्मा; गो--गौवें; सुराणाम्‌ू--देवताओं के; क्षेमाय--कल्याण के लिए; कर्माणि--दिव्य कर्म; अवतार--अवतार; भेदै:--पृथक्‌-पृथक्‌; मन:--मन; न--कभी नहीं; तृप्यति--तुष्टहोता है; अपि--के बावजूद; श्रुण्वताम्‌--निरन्तर सुनते हुए; न:ः--हमारा; सु-श्लोक--शुभ, मंगलमय; मौले:-- भगवान्‌ की;चरित--विशेषताएँ; अमृतानि--- अमरआप द्विजों, गौवों तथा देवताओं के कल्याण हेतु

भगवान्‌ के विभिन्न अवतारों के शुभलक्षणों के विषय में भी वर्णन करें।

यद्यपि हम निरन्तर उनके दिव्य कार्यकलापों के विषय मेंसुनते हैं, किन्तु हमारे मन कभी भी पूर्णतया तुष्ट नहीं हो पाते।

यैस्तत्त्वभेदेधधिलोकनाथोलोकानलोकान्सह लोकपालानू ।

अचीक्िपद्यत्र हि सर्वसत्त्व-निकायभेदोधिकृतः प्रतीत: ॥

८॥

यैः--जिसके द्वारा; तत्त्व--सत्य; भेदैः --अन्तर द्वारा; अधिलोक-नाथ:--राजाओं के राजा; लोकान्‌--लोकों को;अलोकान्‌--अधोभागों के लोकों; सह--के सहित; लोक-पालान्‌--उनके राजाओं को; अचीक़िपत्‌--आयोजना की; यत्र--जिसमें; हि--निश्चय ही; सर्व--समस्त; सत्त्व-- अस्तित्व; निकाय--जीव; भेद: --अन्तर; अधिकृत:-- अधिकार जमाये;प्रतीत:ः--ऐसा लगता है।

समस्त राजाओं के परम राजा ने विभिन्न लोकों की तथा आवास स्थलों की सृष्टि की जहाँप्रकृति के गुणों और कर्म के अनुसार सारे जीव स्थित है और उन्होंने उनके विभिन्न राजाओं तथाशासकों का भी सृजन किया।

येन प्रजानामुत आत्मकर्म-रूपाभिधानां च भिदां व्यधत्त ।

नारायणो विश्वसृगात्मयोनि-रेतच्च नो वर्णय विप्रवर्य ॥

९॥

येन-- जिससे; प्रजानाम्‌--उत्पन्न लोगों के; उत--जैसा भी; आत्म-कर्म--नियत व्यस्तता; रूप--स्वरूप तथा गुण;अभिधानाम्‌--प्रयास; च-- भी; भिदाम्‌ू-- अन्तर; व्यधत्त--बिखरे हुए; नारायण:--नारायण; विश्वसृक्‌ --ब्रह्माण्ड के स््रष्टा;आत्म-योनि:--आत्मनिर्भर; एतत्‌--ये सभी; च-- भी; न:--हमसे; वर्णय--वर्णन कीजिये ; विप्र-वर्य --हे ब्राह्मण श्रेष्ठ |

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ आप यह भी बतलाएँ कि ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा तथा आत्मनिर्भर प्रभु नारायण नेकिस तरह विभिन्न जीवों के स्वभावों, कार्यो, रूपों, लक्षणों तथा नामों की पृथक्‌-पृथक्‌ रचनाकी है।

परावरेषां भगवन्द्रतानिश्रुतानि मे व्यासमुखादभी क्षणम्‌ ।

अतृष्ुम क्षुल्लसुखावहानांतेषामृते कृष्णकथामृतौघात्‌ ॥

१०॥

'पर--उच्चतर; अवरेषाम्‌ू--इन निम्नतरों का; भगवनू--हे प्रभु, हे महात्मन्‌; ब्रतानि--वृत्तियाँ, पेशे; श्रुतानि--सुना हुआ; मे--मेरे द्वारा; व्यास--व्यास के; मुखात्‌--मुँह से; अभीक्षणम्‌--बारम्बार; अतृप्नुम--मैं तुष्ट हूँ; क्षुलल--अल्प; सुख-आवहानाम्‌--सुख लाने वाला; तेषाम्‌--उनमें से; ऋते--बिना; कृष्ण-कथा-- भगवान्‌ कृष्ण विषयक बातें; अमृत-ओघात्‌ -- अमृत से |

हे प्रभु, मैं व्यासदेव के मुख से मानव समाज के इन उच्चतर तथा निम्नतर पदों के विषय मेंबारम्बार सुन चुका हूँ और मैं इन कम महत्व वाले विषयों तथा उनके सुखों से पूर्णतया तृप्त हूँ।

पर वे विषय बिना कृष्ण विषयक कथाओं के अमृत से मुझे तुष्ट नहीं कर सके ।

कस्तृष्नुयात्तीर्थपदो भिधानात्‌सत्रेषु व: सूरिभिरीड्यमानात्‌ ।

यः कर्णनाडीं पुरुषस्य यातोभवप्रदां गेहरतिं छिनत्ति ॥

११॥

कः--वह कौन मनुष्य है; तृप्नुयात्‌--जो तुष्ट किया जा सके; तीर्थ-पदः--जिसके चरणकमल तीर्थस्थल हैं; अभिधानातू--कीबातों से; सत्रेषु--मानव समाज में; व: --जो है; सूरिभिः:--महान्‌ भक्तों द्वारा; ईंडयमानातू--इस तरह पूजित होने वाला; यः--जो; कर्ण-नाडीम्‌-कानों के छेदों में; पुरुषस्थ--मनुष्य के; यात:ः--प्रवेश करते हुए; भव-प्रदाम्‌--जन्म-मृत्यु प्रदान करनेवाला; गेह-रतिम्‌--पारिवारिक स्नेह; छिनत्ति--काट देता है।

जिनके चरणकमल समस्त तीर्थों के सार रूप हैं तथा जिनकी आराधना महर्षियों तथा भक्तोंद्वारा की जाती है, ऐसे भगवान्‌ के विषय में पर्याप्त श्रवण किये बिना मानव समाज में ऐसाकौन होगा जो तुष्ट होता हो? मनुष्य के कानों के छेदों में ऐसी कथाएँ प्रविष्ट होकर उसकेपारिवारिक मोह के बन्धन को काट देती हैं।

मुनिर्विवक्षुर्भगवद्गुणानांसखापि ते भारतमाह कृष्ण: ।

यस्मिन्रृणां ग्राम्यसुखानुवादै-म॑तिर्गृहीता नु हरेः कथायाम्‌ ॥

१२॥

मुनिः--मुनि ने; विवक्षु:--वर्णन किया; भगवत्‌-- भगवान्‌ के; गुणानाम्‌--दिव्य गुणों का; सखा--मित्र; अपि-- भी; ते--तुम्हारा; भारतम्‌--महाभारत; आह--वर्णन किया है; कृष्ण: --कृष्ण-द्वैपायन व्यास; यस्मिनू--जिसमें; नृणाम्‌--मनुष्यों के;ग्राम्य--सांसारिक; सुख-अनुवादैः --लौकिक कथाओं से प्राप्प आनन्द; मति:--ध्यान; गृहीता नु--अपनी ओर खींचने केलिए; हरेः-- भगवान्‌ की; कथायाम्‌-- भाषणों का ( भगवदगीता ) |

आपके मित्र महर्षि कृष्णद्वैषायन व्यास पहले ही अपने महान ग्रन्थ महाभारत में भगवान्‌ केदिव्य गुणों का वर्णन कर चुके हैं।

किन्तु इसका सारा उद्देश्य सामान्य जन का ध्यान लौकिककथाओं को सुनने के प्रति उनके प्रबल आकर्षण के माध्यम से कृष्णकथा ( भगवदगीता ) कीओर आकृष्ट करना है।

सा श्रदधानस्य विवर्धमानाविरक्तिमन्यत्र करोति पुंसः ।

हरेः पदानुस्मृतिनिर्वृतस्यसमस्तदुःखाप्ययमाशु धत्ते ॥

१३॥

सा--कृष्णकथा; श्रहधानस्य-- श्रद्धापूर्वक सुनने के इच्छुक लोगों के ; विवर्धभाना--क्रमश: बढ़ती हुईं; विरक्तिम्‌--अन्यमनस्कता; अन्यत्र--अन्य बातों ( ऐसी कथाओं के अतिरिक्त ) में; करोति--करता है; पुंसः--ऐसे व्यस्त व्यक्ति का; हरेः--भगवान्‌ का; पद-अनुस्मृति-- भगवान्‌ के चरणकमलों का निरन्तर स्मरण; निर्वृतस्थ--ऐसा दिव्य आनन्द प्राप्त करने वाले का;समस्त-दुःख--सारे कष्ट; अप्ययम्‌-दूर हुए; आशु--तुरन्त; धत्ते--सम्पन्न करता है

जो व्यक्ति ऐसी कथाओं का निरन्तर श्रवण करते रहने के लिए आतुर रहता है, उसके लिए कृष्णकथा क्रमशः अन्य सभी बातों के प्रति उसकी उदासीनता को बढ़ा देती है।

वह भक्तजिसने दिव्य आनन्द प्राप्त कर लिया हो उसके द्वारा भगवान्‌ के चरणकमलों का ऐसा निरन्तरस्मरण तुरन्त ही उसके सारे कष्टों को दूर कर देता है।

ताञ्छोच्यशोच्यानविदोनुशोचेहरे: कथायां विमुखानघेन ।

क्षिणोति देवोनिमिषस्तु येषा-मायुर्वथावादगतिस्मृतीनाम्‌ ॥

१४॥

तानू--उन सब; शोच्य--दयनीय; शोच्यान्‌--दयनीयों का; अविदः--अज्ञ; अनुशोचे--मुझे तरस आती है; हरेः-- भगवान्‌ की;कथायाम्‌ू--कथाओं के ; विमुखान्‌ू--विमुखों पर; अधेन--पापपूर्ण कार्यो के कारण; क्षिणोति--क्षीण पड़ते; देव:ः--भगवान्‌;अनिमिष:--नित्यकाल; तु--लेकिन; येषाम्‌--जिसकी; आयु:--आयु; वृथा--व्यर्थ; वाद--दार्शनिक चिन्तन; गति--चरमलक्ष्य; स्मृतीनामू--विभिन्न अनुष्ठानों का पालन करने वालों के ॥

हे मुनि, जो व्यक्ति अपने पाप कर्मों के कारण दिव्य कथा-प्रसंगों से विमुख रहते हैं औरफलस्वरूप महाभारत ( भगवदगीता ) के उद्देश्य से वंचित रह जाते हैं, वे दयनीय द्वारा भी दयाके पात्र होते हैं।

मुझे भी उन पर तरस आती है, क्योंकि मैं देख रहा हूँ कि किस तरह नित्यकालद्वारा उनकी आयु नष्ट की जा रही है।

वे दार्शनिक चिन्तन, जीवन के सैद्धान्तिक चरम लक्ष्योंतथा विभिन्न कर्मकाण्डों की विधियों को प्रस्तुत करने में स्वयं को लगाये रहते हैं।

तदस्य कौषारव शर्मदातु-हरे: कथामेव कथासु सारम्‌ ।

उद्धृत्य पुष्पे भ्य इवार्तबन्धोशिवाय नः कीर्त॑य तीर्थकीर्ते: ॥

१५॥

तत्‌--इसलिए; अस्य--उसका; कौषारव--हे मैत्रेय; शर्म-दातु:--सौभाग्य प्रदान करने वाले; हरेः-- भगवान्‌ की; कथाम्‌--कथाएँ; एव--एकमात्र; कथासु--सभी कथाओं में; सारम्‌--सार; उद्धृत्य--उद्धरण देकर; पुष्पेभ्य:-- फूलों से; इब--सहश;आर्त-बन्धो--हे दुखियों के बन्धु; शिवाय--कल्याण के लिए; नः--हमारे; कीर्तय--कृपया वर्णन कीजिये; तीर्थ--तीर्थयात्रा;कीर्ते:--कीर्तिवान को

हे मैत्रेय, हे दुखियारों के मित्र, एकमात्र भगवान्‌ की महिमा सारे जगत के लोगों काकल्याण करने वाली है।

अतएव जिस तरह मधुमक्खियाँ फूलों से मधु एकत्र करती हैं, उसी तरहकृपया समस्त कथाओं के सार--कृष्णकथा-का वर्णन कीजिये।

स विश्वजन्मस्थितिसंयमार्थकृतावतारः प्रगृहीतशक्ति: ।

चकार कर्माण्यतिपूरुषाणियानीश्वरः कीर्तय तानि महाम्‌ ॥

१६॥

सः--भगवान्‌; विश्व--ब्रह्माण्ड; जन्म --सृष्टि; स्थिति-- भरण-पोषण; संयम-अर्थ--पूर्ण नियंत्रण की दृष्टि से; कृत--स्वीकृत;अवतार:--अवतार; प्रगृहीत--सम्पन्न किया हुआ; शक्ति:--शक्ति; चकार--किया; कर्माणि--दिव्यकर्म; अति-पूरुषाणि--अतिमानवीय; यानि--वे सभी; ईश्वर: -- भगवान्‌; कीर्तवय--कृपया कीर्तन करें; तानि--उन सबों का; महाम्‌--मुझसे |

कृपया उन परम नियन्ता भगवान्‌ के समस्त अतिमानवीय दिव्य कर्मों का कीर्तन करेंजिन्होंने विराट सृष्टि के प्राकट्य तथा पालन के लिए समस्त शक्ति से समन्वित होकर अवतारलेना स्वीकार किया।

श्रीशुक उवाचस एवं भगवा-न्पृष्ट: क्षत्रा कौषारवो मुनि: ।

पुंसां नि: श्रेयसार्थन तमाह बहुमानयन्‌ ॥

१७॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; सः--वह; एवम्‌--इस प्रकार; भगवान्‌--महर्षि; पृष्ट:--पूछे जाने पर;क्षत्रा--विदुर द्वारा; कौषारव: --मैत्रेय; मुनि: --महर्षि; पुंसामू--सारे लोगों के लिए; नि: श्रेयस--महानतम कल्याण; अर्थेन--के लिए; तम्‌--उसको; आह--वर्णन किया; बहु--अत्यधिक; मानयन्‌--सम्मान करते हुए।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : विदुर का अत्यधिक सम्मान करने के बाद विदुर के अनुरोध परसमस्त लोगों के महानतम कल्याण हेतु महर्षि मैत्रेय मुनि बोले।

मैत्रेय उवाचसाधु पृष्टे त्वया साधो लोकान्साध्वनुगृह्कता ।

कीर्ति वितन्व॒ता लोके आत्मनोधोक्षजात्मन: ॥

१८ ॥

मैत्रेय: उवाच-- श्री मैत्रेय ने कहा; साधु--सर्वमंगलमय; पृष्टमू-- पूछा गया; त्वया--तुम्हारे द्वारा; साधो--हे भद्रे; लोकानू--सारे लोग; साधु अनुगृह्ता-- अच्छाई में दया का प्रदर्शन; कीर्तिम्‌ू--कीर्ति; वितन्वता-- प्रसार करते हुए; लोके --संसार में;आत्मन:--आत्मा का; अधोक्षज--ब्रह्म; आत्मन:--मन |

श्रीमैत्रेय ने कहा : हे विदुर, तुम्हारी जय हो।

तुमने मुझसे सबसे अच्छी बात पूछी है।

इसतरह तुमने संसार पर तथा मुझ पर अपनी कृपा प्रदर्शित की है, क्योंकि तुम्हारा मन सदैव ब्रह्म केविचारों में लीन रहता है।

नैतच्चित्र॑ त्वयि क्षत्तर्बादरायणवीर्यजे ।

गृहीतोनन्यभावेन यच्त्वया हरिरीश्वर: ॥

१९॥

न--कभी नहीं; एतत्‌--ऐसे प्रश्न; चित्रमू--अत्यन्त आश्चर्यजनक; त्वयि--तुममें; क्षत्त:--हे विदुर; बादरायण--व्यासदेव के;वीर्य-जे--वीर्य से उत्पन्न; गृहीत:--स्वीकृत; अनन्य-भावेन--विचार से हटे बिना; यत्‌--क्योंकि; त्वया--तुम्हारे द्वारा; हरि: --भगवान्‌; ईश्वर: -- भगवान्‌

हे विदुर, यह तनिक भी आश्चर्यप्रद नहीं है कि तुमने अनन्य भाव से भगवान्‌ को इस तरहस्वीकार कर लिया है, क्योंकि तुम व्यासदेव के वीर्य से उत्पन्न हो।

माण्डव्यशापाद्धगवान्प्रजासंयमनो यम: ।

रातुः क्षेत्रे भुजिष्यायां जात: सत्यवतीसुतात्‌ ॥

२०॥

माण्डव्य--माण्डव्य नामक महर्षि; शापात्‌--उसके शाप से; भगवान्‌-- अत्यन्त शक्तिशाली; प्रजा--जन्म लेने वाला;संयमन:--मृत्यु का नियंत्रक; यम:--यमराज नाम से विख्यात; भ्रातु:-- भाई की क्षेत्रे--पत्ली में; भुजिष्यायामू--रखैल;जातः--उत्पन्न; सत्यवती--सत्यवती ( विचित्रवीर्य तथा व्यासदेव की माता ); सुतात्‌--पुत्र ( व्यासदेव ) से |

मैं जानता हूँ कि तुम माण्डव्य मुनि के शाप के कारण विदुर बने हो और इसके पूर्व तुमजीवों की मृत्यु के पश्चात उनके महान्‌ नियंत्रक राजा यमराज थे।

तुम सत्यवती के पुत्र व्यासदेवद्वारा उसके भाई की रखैल पतली से उत्पन्न हुए थे।

भवान्भगवतो नित्य॑ं सम्मतः सानुगस्य ह ।

यस्य ज्ञानोपदेशाय मादिशद्धगवान्त्रजन्‌ ॥

२१॥

भवान्‌--आप ही; भगवतः-- भगवान्‌ के; नित्यम्‌ू--नित्य; सम्मतः--मान्य; स-अनुगस्य--संगियों में से एक; ह--रहे हैं;यस्य--जिसका; ज्ञान--ज्ञान; उपदेशाय--उपदेश के लिए; मा--मुझको; आदिशत्‌--इस तरह आदिष्ट; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने;ब्रजन्‌ू--अपने धाम जाते हुए।

आप भगवान्‌ के नित्यसंगियों में से एक हैं जिनके लिए भगवान्‌ अपने धाम वापस जातेसमय मेरे पास उपदेश छोड़ गये हैं।

हः त त त न" अथ ते भगवल्लीला योगमायोरुबृंहिता: ।

विश्वस्थित्युद्धवान्तार्था वर्णयाम्यनुपूर्वश: ॥

२२॥

अथ--इसलिए; ते--आपसे; भगवत्‌-- भगवान्‌ विषयक; लीला:--लीलाएँ; योग-माया-- भगवान्‌ की शक्ति; उरू--अत्यधिक; बुंहिता:--विस्तारित; विश्व--विराट जगत के; स्थिति--पालन; उद्धव--सृजन; अन्त--संहार; अर्था: -- प्रयोजन;वर्णयामि--वर्णन करूँगा; अनुपूर्वशः--क्रमबद्ध रीति से

अतएव मैं आपसे उन लीलाओं का वर्णन करूँगा जिनके द्वारा भगवान्‌ विराट जगत केक्रमबद्ध सृजन, भरण-पोषण तथा संहार के लिए अपनी दिव्य शक्ति का विस्तार करते हैं।

भगवानेक आसेदमग्र आत्मात्मनां विभु: ।

आत्मेच्छानुगतावात्मा नानामत्युपलक्षण: ॥

२३॥

भगवानू्‌-- भगवान्‌; एक:--अद्दय; आस-- था; इृदम्‌--यह सृष्टि; अग्रे--सृष्टि के पूर्व; आत्मा--अपने स्वरूप में; आत्मनाम्‌--जीवों के; विभुः--स्वामी; आत्मा--आत्मा; इच्छा--इच्छा; अनुगतौ--लीन होकर; आत्मा--आत्मा; नाना-मति--विभिन्नइृष्टियाँ; उपलक्षण:--लक्षण

समस्त जीवों के स्वामी, भगवान्‌ सृष्टि के पूर्व अद्दय रूप में विद्यमान थे।

केवल उनकीइच्छा से ही यह सृष्टि सम्भव होती है और सारी वस्तुएँ पुनः उनमें लीन हो जाती हैं।

इस परमपुरुष को विभिन्न नामों से उपलक्षित किया जाता है।

सवा एष तदा द्रष्टा नापश्यदृश्यमेकराट्‌ ।

मेनेसन्तमिवात्मानं सुप्तशक्तिरसुप्तटक्‌ ॥

२४॥

सः--भगवान्‌; वा--अथवा; एष: --ये सभी; तदा--उस समय; द्रष्टा--देखने वाला; न--नहीं; अपश्यत्‌--देखा; दृश्यम्‌ू--विराट सृष्टि; एक-राट्‌--निर्विवाद स्वामी; मेने--इस तरह सोचा; असन्तम्‌--अविद्यमान; इब--सहृश; आत्मानम्‌--स्वांश रूप;सुप्त--अव्यक्त; शक्ति:--भौतिक शक्ति; असुप्त--व्यक्त; हक्‌--अन्तरंगा शक्ति

हर वस्तु के निर्विवाद स्वामी भगवान्‌ ही एकमात्र द्रष्टा थे।

उस समय विराट जगत काअस्तित्व न था, अतः अपने स्वांशों तथा भिन्नांशों के बिना वे अपने को अपूर्ण अनुभव कर रहे थे।

तब भौतिक शक्ति सुसुप्त थी जबकि अन्तरंगा शक्ति व्यक्त थी।

सा वा एतस्य संद्रष्ट: शक्ति: सदसदात्मिका ।

माया नाम महाभाग ययेदं निर्ममे विभु: ॥

२५॥

सा--वह बहिरंगा शक्ति; वा--अथवा है; एतस्य-- भगवान्‌ की; संद्रष्ट: --पूर्ण द्रष्टा की; शक्ति:--शक्ति; सत्‌-असत्‌-आत्मिका--कार्य तथा कारण दोनों रूप में; माया नाम--माया नामक; महा-भाग--हे भाग्यवान; यया--जिससे; इृदम्‌--यहभौतिक जगत; निर्ममे--निर्मित किया; विभुः--सर्वशक्तिमान ने |

भगवान्‌ द्रष्टा हैं और बहिरंगा शक्ति, जो दृष्टिगोचर है, विराट जगत में कार्य तथा कारणदोनों रूप में कार्य करती है।

हे महाभाग विदुर, यह बहिरंगा शक्ति माया कहलाती है और केवल इसी के माध्यम से सम्पूर्ण भौतिक जगत सम्भव होता है।

कालवृत्त्या तु मायायां गुणमय्यामधोक्षज: ।

पुरुषेणात्मभूतेन वीर्यमाधत्त वीर्यवान्‌ ॥

२६॥

काल--शाश्वत काल के; वृत्त्या--प्रभाव से; तु--लेकिन; मायायामू--बहिरंगा शक्ति में; गुण-मय्याम्‌-- प्रकृति के गुणात्मकरूप में; अधोक्षज:--ब्रह्म; पुरुषेण--पुरुष के अवतार द्वारा; आत्म-भूतेन--जो भगवान्‌ का स्वांश है; वीर्यमू--जीवों का बीज;आधत्त--संस्थापित किया; वीर्यवान्‌--

परम पुरुष ने अपने स्वांश दिव्य पुरुष अवतार के रूप में परम पुरुष प्रकृति के तीन गुणों में बीजसंस्थापित करता है और इस तरह नित्य काल के प्रभाव से सारे जीव प्रकट होते हैं।

ततोभवन्महत्तत्त्वमव्यक्तात्कालचोदितातू ।

विज्ञानात्मात्मदेहस्थं विश्व व्यद्जस्तमोनुदः ॥

२७॥

ततः--तत्पश्चात्‌; अभवत्‌ --जन्म हुआ; महत्‌--परम; तत्त्वमू--सार; अव्यक्तात्‌--अव्यक्त से; काल-चोदितात्‌ू--काल कीअन्तःक्रिया से; विज्ञान-आत्मा--शुद्ध सत्त्व; आत्म-देह-स्थम्‌--शारीरिक आत्मा में स्थित; विश्वम्‌--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड;व्यञ्ञनू--प्रकट करते हुए; तम:-नुदः--परम प्रकाश |

तत्पश्चात्‌ नित्यकाल की अन्तःक्रियाओं से प्रभावित पदार्थ का परम सार, जो कि महत्‌ तत्त्वकहलाता है, प्रकट हुआ और इस महत्‌ तत्त्व में शुद्ध सत्त्व अर्थात्‌ भगवान्‌ ने अपने शरीर सेब्रह्माण्ड अभिव्यक्ति के बीज बोये।

सोप्यंशगुणकालात्मा भगवद्गृष्टिगोचर: ।

आत्मानं व्यकरोदात्मा विश्वस्यास्य सिसृक्षया ॥

२८॥

सः--महत्‌ तत्त्व; अपि-- भी; अंश--पुरुष स्वांश; गुण--मुख्यतया तमोगुण; काल--काल की अवधि; आत्मा--पूर्णचेतना;भगवत्‌-- भगवान्‌ की; दृष्टि-गोचर:--दृष्टि की सीमा; आत्मानम्‌--अनेक भिन्न-भिन्न रूपों को; व्यकरोत्‌--विभेदित; आत्मा--आगार; विश्वस्थ-होने वाले जीवों का; अस्य--इस; सिसृक्षया--मिथ्या अहंकार को उत्पन्न करता है।

तत्पश्चात्‌ महत्‌ तत्त्व अनेक भिन्न-भिन्न भावी जीवों के आगार रूपों में विभेदित हो गया।

यह महत्‌ तत्त्व मुख्यतया तमोगुणी होता है और यह मिथ्या अहंकार को जन्म देता है।

यहभगवान्‌ का स्वांश है, जो सर्जनात्मक सिद्धान्तों की पूर्ण चेतना तथा फलनकाल से युक्त होता है।

महत्तत्त्वाद्विकुर्वाणादहंतत्त्वं व्यजायत ।

कार्यकारणकर्त्रात्मा भूतेन्द्रियमनोमय: ।

वैकारिकस्तैजसश्न तामसश्चैत्यहं त्रिधा ॥

२९॥

महत्‌--महान्‌; तत्त्वात्‌ू--कारणस्वरूप सत्य से; विकुर्वाणात्‌ू--रूपान्तरित होने से; अहम्‌--मिथ्या अहंकार; तत्त्वम्‌--भौतिकसत्य; व्यजायत--प्रकट हुआ; कार्य--प्रभाव; कारण--कारण; कर्त्‌--कर्ता; आत्मा--आत्मा या स्त्रोत; भूत-- भौतिकअवयव; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; मनः-मय:--मानसिक धरातल पर मँडराता; वैकारिक: --सतोगुण; तैजस:ः--रजोगुण; च--तथा;तामस:--तमोगुण; च--तथा; इति--इस प्रकार; अहमू--मिथ्या अहंकार; त्रिधा--तीन प्रकार।

महत्‌ तत्त्व या महान्‌ कारण रूप सत्य मिथ्या अहंकार में परिणत होता है, जो तीनअवस्थाओं में--कारण, कार्य तथा कर्ता के रूप में-प्रकट होता है।

ऐसे सारे कार्य मानसिकधरातल पर होते हैं और वे भौतिक तत्त्वों, स्थूल इन्द्रियों तथा मानसिक चिन्तन पर आधारित होतेहैं।

मिथ्या अहंकार तीन विभिन्न गुणों--सतो, रजो तथा तमो-में प्रदर्शित होता है।

अहंतत्त्वाद्विकुर्वाणान्मनो वैकारिकादभूत्‌ ।

वैकारिकाश्च ये देवा अर्थाभिव्यज्जनं यतः ॥

३०॥

अहमू-तत्त्वातू-मिथ्या अहंकार के तत्त्व से; विकुर्वाणात्‌--रूपान्तर द्वारा; मन:--मन; बैकारिकात्‌--सतोगुण के साथअन्तःक्रिया द्वारा; अभूत्‌--उत्पन्न हुआ; वैकारिका:--अच्छाई से अन्तःक्रिया द्वारा; च-- भी; ये--ये सारे; देवा:--देवता;अर्थ--घटना सम्बन्धी; अभिव्यज्नम्‌-- भौतिक ज्ञान; यत:ः--स्रोत

मिथ्या अहंकार सतोगुण से अन्तःक्रिया करके मन में रूपान्तरित हो जाता है।

सारे देवता भीजो घटनाप्रधान जगत को नियंत्रित करते हैं, उसी सिद्धान्त ( तत्त्व ), अर्थात्‌ मिथ्या अहंकार तथासतोगुण की अन्तःक्रिया के परिणाम हैं।

तैजसानीन्द्रियाण्येव ज्ञानकर्ममयानि च ॥

३१॥

तैजसानि--रजोगुण; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; एब--निश्चय ही; ज्ञान--ज्ञान, दार्शनिक चिन्तन; कर्म--सकाम कर्म; मयानि--प्रधान रूप से; च-- भी ।

इन्द्रियाँ निश्चय ही मिथ्या अहंकारजन्य रजोगुण की परिणाम हैं, अतएवं दार्शनिकचिन्तनपरक ज्ञान तथा सकाम कर्म रजोगुण के प्रधान उत्पाद हैं।

तामसो भूतसूक्ष्मादिर्यतः खं लिड्डमात्मनः ॥

३२॥

तामस:--तमोगुण से; भूत-सूक्ष्म-आदि: --सूक्ष्म इन्द्रिय विषय; यतः--जिससे; खम्‌--आकाश; लिड्रमू--प्रतीकात्मक स्वरूप;आत्मन:--परमात्मा का।

आकाश ध्वनि का परिणाम है और ध्वनि अहंकारात्मक काम का रूपान्तर ( विकार ) है।

दूसरे शब्दों में आकाश परमात्मा का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व है।

'कालमायांशयोगेन भगदद्वीक्षितं नभः ।

नभसो नुसूतं स्पर्श विकुर्वन्निर्ममेडनिलम्‌ ॥

३३॥

काल--काल; माया--बहिरंगा शक्ति; अंश-योगेन--अंशतःमिश्रित; भगवत्‌-- भगवान्‌ वीक्षितम्‌--दृष्टिपात किया हुआ;नभः--आकाश; नभसः--आकाश से; अनुसृतम्‌--इस तरह स्प्शित होकर; स्पर्शम्‌--स्पर्श; विकुर्बत्‌--रूपान्तरित होकर;निर्ममे--निर्मित हुआ; अनिलम्‌--वायु।

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ ने आकाश पर नित्यकाल तथा बहिरंगा शक्ति से अंशतः मिश्रित दृष्टिपातकिया और इस तरह स्पर्श की अनुभूति विकसित हुई जिससे आकाश में वायु उत्पन्न हुई।

अनिलोपि विकुर्वाणो नभसोरूबलान्वित: ।

ससर्ज रूपतन्मात्रं ज्योतिलोकस्य लोचनम्‌ ॥

३४॥

अनिलः--वायु; अपि-- भी; विकुर्वाण: --रूपान्तरित होकर; नभसा--आकाश; उरू-बल-अन्वित: -- अत्यन्त शक्तिशाली;ससर्ज--उत्पन्न किया; रूप--रूप; ततू-मात्रम्‌--इन्द्रिय अनुभूति, तन्मात्रा; ज्योतिः--बिजली; लोकस्य--संसार के;लोचनम्‌--देखने के लिए प्रकाश।

तत्पश्चात्‌ अतीव शक्तिशाली वायु ने आकाश से अन्तःक्रिया करके इन्द्रिय अनुभूति( तन्मात्रा ) का रूप उत्पन्न किया और रूप की अनुभूति बिजली में रूपान्तरित हो गई जो संसारको देखने के लिए प्रकाश है।

अनिलेनान्वितं ज्योतिर्विकुर्वत्परवीक्षितम्‌ ।

आध्षत्ताम्भो रसमयं कालमायांशयोगतः ॥

३५॥

अनिलेन--वायु द्वारा; अन्वितम्‌--अन्तःक्रिया करते हुए; ज्योतिः--बिजली; विकुर्वत्‌--रूपान्तरित होकर; परवीक्षितम्‌--ब्रह्मद्वारा दष्टिपात किया जाकर; आधत्त--उत्पन्न किया; अम्भ: रस-मयम्‌--स्वाद से युक्त जल; काल--नित्य काल का; माया-अंश--तथा बहिरंगा शक्ति; योगत:ः--मिश्रण द्वारा |

जब वायु में बिजली की क्रिया हुई और उस पर ब्रह्म ने दृष्टिपात किया उस समय नित्यकालतथा बहिरंगा शक्ति के मिश्रण से जल तथा स्वाद की उत्पत्ति हुई।

ज्योतिषाम्भो नुसंसूष्टे विकुर्वद्गह्मवीक्षितम्‌ ।

महीं गन्धगुणामाधात्कालमायांशयोगतः ॥

३६॥

ज्योतिषा--बिजली; अम्भ:--जल; अनुसंसृष्टम्‌--इस प्रकार उत्पन्न हुआ; विकुर्वत्‌--रूपान्तर के कारण; ब्रह्म--ब्रह्म द्वारा;वीक्षितम्‌--दृष्टिपात किया गया; महीम्‌--पृथ्वी; गन्ध--गन्ध; गुणाम्‌--गुण; आधात्‌--उत्पन्न किया गया; काल--नित्य काल;माया--बहिरंगा शक्ति; अंश-- अंशतः ; योगत:ः-- अन्तःमिश्रण से

तत्पश्चात्‌ बिजली से उत्पन्न जल पर भगवान्‌ ने इृष्टिपात किया और फिर उसमें नित्यकालतथा बहिरंगा शक्ति का मिश्रण हुआ।

इस तरह वह पृथ्वी में रूपान्तरित हुआ जो मुख्यतः गन्धके गुण से युक्त है।

भूतानां नभआदीनां यद्यद्धव्यावरावरम्‌ ।

तेषां परानुसंसर्गाद्यथा सड्ख्यं गुणान्विदु: ॥

३७॥

भूतानाम्‌--सारे भौतिक तत्त्वों का; नभ:--आकाश; आदीनामू--इत्यादि; यत्‌--जिस तरह; यत्‌--तथा जिस तरह; भव्य--हेसौम्य; अवर--निकृष्ट; वरम्‌-- श्रेष्ठ; तेषामू--उन सबों का; पर--परम, ब्रह्म; अनुसंसर्गात्‌-- अन्तिम स्पर्श; यथा--जितने;सड्ख्यमू--गिनती; गुणान्‌--गुण; विदु:ः--आप समझ सकें |

हे भद्र पुरुष, आकाश से लेकर पृथ्वी तक के सारे भौतिक तत्त्वों में जितने सारे निम्न तथाश्रेष्ठ गुण पाये जाते हैं, वे भगवान्‌ के दृष्टिपात के अन्तिम स्पर्श के कारण होते हैं।

एते देवा: कला विष्णो: कालमायांशलिड्विन: ।

नानात्वात्स्वक्रियानीशा: प्रोचु: प्राज्ञलयो विभुम्‌ ॥

३८ ॥

एते--इन सारे भौतिक तत्त्वों में; देवा:--नियंत्रक देवता; कला: --अंश; विष्णो:-- भगवान्‌ के; काल--काल; माया--बहिरंगा शक्ति; अंश-- अंश; लिड्रिनः:--इस तरह देहधारी; नानात्वात्‌--विभिन्नता के कारण; स्व-क्रिया--निजी कार्य;अनीशा:--न कर पाने के कारण; प्रोचु:--कहा; प्राज्ललय:--मनोहारी; विभुम्‌-- भगवान्‌ को |

उपर्युक्त समस्त भौतिक तत्त्वों के नियंत्रक देव भगवान्‌ विष्णु के शक्त्याविष्ट अंश हैं।

वेबहिरंगा शक्ति के अन्तर्गत नित्यकाल द्वारा देह धारण करते हैं और वे भगवान्‌ के अंश हैं।

चूँकिउन्हें ब्रह्माण्डीय दायित्वों के विभिन्न कार्य सौंपे गये थे और चूँकि वे उन्हें सम्पन्न करने में असमर्थथे, अतएव उन्होंने भगवान्‌ की मनोहारी स्तुतियाँ निम्नलिखित प्रकार से कीं।

देवा ऊचुःनमाम ते देव पदारविन्दंप्रपन्नतापोपशमातपत्रम्‌ ।

यन्मूलकेता यतयोझ्जसोरू -संसारदु:खं बहिरुत्क्षिपन्ति ॥

३९॥

देवा: ऊचु:--देवताओं ने कहा; नमाम--हम सादर नमस्कार करते हैं; ते--तुम्हें; देव--हे प्रभु; पद-अरविन्दमू--चरणकमल;प्रपन्न--शरणागत; ताप--कष्ट; उपशम--शमन करता है; आतपत्रम्‌--छाता; यत्‌-मूल-केता:--चरणकमलों की शरण;यतय: --महर्षिगण; अद्धसा--पूर्णतया; उरु--महान्‌; संसार-दुःखम्‌--संसार के दुख; बहि:--बाहर; उत्क्षिपन्ति--बलपूर्वकफेंक देते हैं

देवताओं ने कहा : हे प्रभु, आपके चरणकमल शरणागतों के लिए छाते के समान हैं, जोसंसार के समस्त कष्टों से उनकी रक्षा करते हैं।

सारे मुनिगण उस आश्रय के अन्तर्गत समस्तभौतिक कष्टों को निकाल फेंकते हैं।

अतएव हम आपके चरणकमलों को सादर नमस्कार करतेहै।

धातर्यदस्मिन्भव ईश जीवा-स्तापत्रयेणाभिहता न शर्म ।

आत्मनलभन्ते भगवंस्तवाडूप्रिच्छायां सविद्यामत आश्रयेम ॥

४०॥

धात:--हे पिता; यत्‌--क्योंकि; अस्मिन्‌--इस; भवे--संसार में; ईश--हे ईश्वर; जीवा:--जीव; ताप--कष्ट; त्रयेण--तीन;अभिहताः --सदैव; न--कभी नहीं; शर्म--सुख में; आत्मन्‌-- आत्मा; लभन्‍्ते--प्राप्त करते हैं; भगवन्‌--हे भगवान्‌; तव--तुम्हारे; अड्घ्रि-छायाम्‌--चरणों की छाया; स-विद्याम्‌--ज्ञान से पूर्ण; अत:--प्राप्त करते हैं; आश्रयेम--शरण।

हे पिता, हे प्रभु, हे भगवान्‌, इस भौतिक संसार में जीवों को कभी कोई सुख प्राप्त नहीं होसकता, क्योंकि वे तीन प्रकार के कष्टों से अभिभूत रहते हैं।

अतएव वे आपके उन चरणकमलोंकी छाया की शरण ग्रहण करते हैं, जो ज्ञान से पूर्ण है और इस लिए हम भी उन्हीं की शरण लेतेहैं।

मार्गन्ति यत्ते मुखपद्नीडै-इछन्दःसुपर्णैरृषयो विविक्ते ।

यस्याधमर्षोदसरिद्वराया:पदं पदं तीर्थपद: प्रपन्ना: ॥

४१॥

मार्गन्ति--खोज करते हैं; यत्‌--जिस तरह; ते--तुम्हारा; मुख-पद्य--कमल जैसा मुख; नीडै:--ऐसे कमलपुष्प की शरण मेंआये हुओं के द्वारा; छन्‍्दः--वैदिक-स्तोत्र; सुपर्ण:--पंखों से; ऋषय:--ऋषिगण; विविक्ते--निर्मल मन में; यस्य--जिसका;अघ-मर्ष-उद--जो पाप के सारे फलों से मुक्ति दिलाता है; सरित्‌ू--नदियाँ; वराया: --सर्वोत्तम; पदम्‌ पदम्‌-- प्रत्येक कदम पर;तीर्थ-पदः--जिसके चरणकमल तीर्थस्थान के तुल्य हैं; प्रपन्ना:--शरण में आये हुए।

भगवान्‌ के चरणकमल स्वयं ही समस्त तीर्थस्थलों के आश्रय हैं।

निर्मल मनवाले महर्षिगणवेदों रूपी पंखों के सहारे उड़कर सदैव आपके कमल सहश मुख रूपी घोंसले की खोज करतेहैं।

उनमें से कुछ सर्वश्रेष्ठ नदी (गंगा ) में शरण लेकर पद-पद पर आपके चरणकमलों कीशरण ग्रहण करते हैं, जो सारे पापफलों से मनुष्य का उद्धार कर सकते हैं।

यच्छुद्धया श्रुतवत्या च्‌ भक्त्यासम्मृज्यमाने हृदयेउवधाय ।

ज्ञानेन वैराग्यबलेन धीराब्रजेम तत्तेडड्घ्रिसरोजपीठम्‌ ॥

४२॥

यत्‌--वह जो; श्रद्धया--उत्सुकता से; श्रुतवत्या--केवल सुनने से; च-- भी; भक्त्या--भक्ति से; सम्मृज्यमाने-- धुलकर;हृदये--हृदय में; अवधाय--ध्यान; ज्ञानेन--ज्ञान से; वैराग्य--विरक्ति के; बलेन--बल से; धीरा:--शान्त; ब्रजेम--जानाचाहिए; तत्‌--उस; ते--तुम्हारे; अड्ध्रि--पाँव; सरोज-पीठम्‌--कमल पुण्यालय |

आपके चरणकमलों के विषय में केवल उत्सुकता तथा भक्ति पूर्वक श्रवण करने से तथाउनके विषय में हृदय में ध्यान करने से मनुष्य तुरन्त ही ज्ञान से प्रकाशित और वैराग्य के बल परशानन्‍्त हो जाता है।

अतएवं हमें आपके चरणकमल रूपी पुण्यालय की शरण ग्रहण करनी चाहिए।

विश्वस्य जन्मस्थितिसंयमार्थेकृतावतारस्य पदाम्बुजं ते ।

ब्रजेम सर्वे शरणं यदीशस्मृतं प्रयच्छत्यभयं स्वपुंसाम्‌ ॥

४३ ॥

विश्वस्य--विराट ब्रह्माण्ड के; जन्म--सृजन; स्थिति--पालन; संयम-अर्थे--प्रलय के लिए भी; कृत--धारण किया हुआ यास्वीकृत; अवतारस्य--अवतार का; पद-अम्बुजम्‌ू--चरणकमल; ते--आपके; ब्रजेम--शरण में जाते है; सर्वे--हम सभी;शरणम्‌--शरण; यत्‌--जो; ईश--हे भगवान्‌; स्मृतम्‌ू--स्मृति; प्रयच्छति--प्रदान करके ; अभयम्‌--साहस; स्व-पुंसाम्‌ू--भक्तों का

हे प्रभु, आप विराट जगत के सृजन, पालन तथा संहार के लिए अवतरित होते हैं इसलिएहम सभी आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण करते हैं, क्योंकि ये चरण आपके भक्तों कोसदैव स्मृति तथा साहस प्रदान करने वाले हैं।

यत्सानुबन्धेसति देहगेहेममाहमित्यूढदुराग्रहाणाम्‌ ।

पुंसां सुदूरं बसतोपि पुर्याभजेम तत्ते भगवन्पदाब्जम्‌ ॥

४४॥

यत्‌--चूँकि; स-अनुबन्धे--पाश में बँधने से; असति--इस तरह होकर; देह--स्थूल शरीर; गेहे--घर में; मम--मेरा; अहम्‌--मैं; इति--इस प्रकार; ऊढ--महान्‌, गम्भीर; दुराग्रहाणाम्‌-- अवांछित उत्सुकता; पुंसाम्‌--मनुष्यों की; सु-दूरम्‌--काफी दूर;वबसतः--रहते हुए; अपि--यद्यपि; पुर्यामू--शरीर में; भजेम--पूजा करें; तत्‌--इसलिए; ते--तुम्हारे; भगवन्‌--हे भगवान्‌;'पद-अब्जमू--चरणकमल।

हे प्रभु, जो लोग नश्वर शरीर तथा बन्धु-बाँधवों के प्रति अवांछित उत्सुकता के द्वारापाशबद्ध हैं और जो लोग 'मेरा ' तथा 'मैं' के विचारों से बँधे हुए हैं, वे आपके चरणकमलोंका दर्शन नहीं कर पाते यद्यपि आपके चरणकमल उनके अपने ही शरीरों में स्थित होते हैं।

किन्तुहम आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण करें।

तान्वै हासद्गुत्तिभिरक्षिभियेंपराहतान्तर्मनसः परेश ।

अथो न पश््यन्त्युरुगाय नूनंये ते पदन्‍्यासविलासलक्ष्या: ॥

४५॥

तानू-- भगवान्‌ के चरणकमल; बै--निश्चय ही; हि--क्योंकि; असत्‌-- भौतिकतावादी; वृत्तिभि:--बहिरंगा शक्ति से प्रभावितहोने वालों के द्वारा; अश्लिभि:--इन्द्रियों द्वारा; ये--जो; पराहृत--दूरी पर खोये हुए; अन्तः-मनस:--आन्तरिक मन को;परेश--हे परम; अथो--इसलिए; न--कभी नहीं; पश्यन्ति--देख सकते है; उरुगाय--हे महान्‌; नूनम्‌--लेकिन; ये--जो;ते--तुम्हारे; पदन्‍्यास--कार्यकलाप; विलास--दिव्य भोग; लक्ष्या:--देखने वाले

हे महान्‌ परमेश्वर, वे अपराधी व्यक्ति, जिनकी अन्तःदृष्टि बाह्य भौतिकतावादी कार्यकलापोंसे अत्यधिक प्रभावित हो चुकी होती है वे आपके चरणकमलों का दर्शन नहीं कर सकते, किन्तुआपके शुद्ध भक्त दर्शन कर पाते हैं, क्योंकि उनका एकमात्र उद्देश्य आपके कार्यकलापों कादिव्य भाव से आस्वादन करना है।

पानेन ते देव कथासुधाया:प्रवृद्धभक्त्या विशदाशया ये ।

वैराग्यसारं प्रतिलभ्य बोध॑ यथाञझ्जसान्वीयुरकुण्ठधिष्ण्यम्‌ ॥

४६॥

पानेन--पीने से; ते-- आपके; देव--हे प्रभु; कथा-- कथाएँ; सुधाया:-- अमृत की; प्रवृद्ध--अत्यन्त प्रब॒ुद्ध; भक्त्या-- भक्तिद्वारा; विशद-आशयाः --अत्यधिक गम्भीर विचार से युक्त; ये--जो; वैराग्य-सारम्‌--वैराग्य का सारा तात्पर्य; प्रतिलभ्य--प्राप्तकरके; बोधम्‌--बुद्धि; यथा--जिस तरह; अज्ञसा--तुरन्त; अन्वीयु:--प्राप्त करते हैं; अकुण्ठ-धिष्ण्यम्‌-- आध्यात्मिकआकाश में बैकुण्ठलोक |

हे प्रभु, जो लोग अपनी गम्भीर मनोवृत्ति के कारण प्रबुद्ध भक्ति-मय सेवा की अवस्थाप्राप्त करते हैं, वे वैराग्य तथा ज्ञान के संपूर्ण अर्थ को समझ लेते हैं और आपकी कथाओं केअमृत को पीकर ही आध्यात्मिक आकाश में वैकुण्ठलोक को प्राप्त करते हैं।

तथापरे चात्मसमाधियोग-बलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम्‌ ।

त्वामेव धीरा: पुरुषं विशन्तितेषां श्रमः स्यान्न तु सेवया ते ॥

४७॥

तथा--जहाँ तक; अपरे-- अन्य; च-- भी; आत्म-समाधि--दिव्य आत्म-साक्षात्कार; योग--साधन; बलेन--के बल पर;जित्वा--जीतकर; प्रकृतिम्‌ू--अर्जित स्वभाव या गुण; बलिष्ठाम्‌--अत्यन्त बलवान; त्वामू--तुमको; एब--एकमात्र; धीरा: --शान्त; पुरुषम्‌--व्यक्ति को; विशन्ति--प्रवेश करते हैं; तेषामू--उनके लिए; श्रम:--अत्यधिक परिश्रम; स्थात्‌ू--करना होता है;न--कभी नहीं; तु--लेकिन; सेवया--सेवा द्वारा; ते--तुम्हारी ।

अन्य लोग भी जो कि दिव्य आत्म-साक्षात्कार द्वारा शान्त हो जाते हैं तथा जिन्होंने प्रबलशक्ति एवं ज्ञान के द्वारा प्रकृति के गुणों पर विजय पा ली है, आप में प्रवेश करते हैं, किन्तु उन्हेंकाफी कष्ट उठाना पड़ता है, जबकि भक्त केवल भक्ति-मय सेवा सम्पन्न करता है और उसे ऐसाकोई कष्ट नहीं होता।

तत्ते वयं लोकसिसृक्षयाद्यत्वयानुसृष्टास्त्रिभिरात्मभि: सम ।

सर्वे वियुक्ता: स्वविहारतन्त्रंन शब्नुमस्तत्प्रतिहर्तवे ते ॥

४८ ॥

तत्‌--इसलिए; ते--तुम्हारा; वयम्‌--हम सभी; लोक--संसार; सिसृक्षया--सृष्टि के लिए; आद्य--हे आदि पुरुष; त्वया--तुम्हारे द्वारा; अनुसूष्टा:--एक के बाद एक उत्पन्न किया जाकर; त्रिभि: --तीन गुणों द्वारा; आत्मभि:--अपने आपसे; स्म--भूतकाल में; सर्वे--सभी; वियुक्ता:--पृथक्‌ किये हुए; स्व-विहार-तन्त्रमू--अपने आनन्द के लिए कार्यो का जाल; न--नहीं;शकक्‍्नुमः--कर सके; तत्‌--वह; प्रतिहर्तवे-- प्रदान करने के लिए; ते--तुम्हें

हे आदि पुरुष, इसलिए हम एकमात्र आपके हैं।

यद्यपि हम आपके द्वारा उत्पन्न प्राणी हैं,किन्तु हम प्रकृति के तीन गुणों के प्रभाव के अन्तर्गत एक के बाद एक जन्म लेते हैं, इसीलिएहम अपने कर्म में पृथक्‌-पृथक्‌ होते हैं।

अतएवं सृष्टि के बाद हम आपके दिव्य आनन्द के हेतुसम्मिलित रूप में कार्य नहीं कर सके ।

यावद्वलिं तेडज हराम कालेयथा वयं चान्नमदाम यत्र ।

यथोभयेषां त इमे हि लोकाबलि हरन्तोन्नमदन्त्यनूहा: ॥

४९॥

यावत्‌--जैसा सम्भव हो; बलिम्‌-- भेंट; ते--तुम्हारी; अज--हे अजन्मा; हराम--अर्पित करेंगे; काले--उचित समय पर;यथा--जिस तरह; वयम्‌--हम; च--भी; अन्नमू--अन्न, अनाज; अदाम--खाएँगे; यत्र--जहाँ; यथा--जिस तरह;उभयेषाम्‌--तुम्हारे तथा अपने दोनों के लिए; ते--सारे; इमे--ये; हि--निश्चय ही; लोकाः--जीव; बलिम्‌-- भेंट; हरन्तः --अर्पित करते हुए; अन्नम्‌--अन्न; अदन्ति--खाते हैं; अनूहा:--बिना किसी प्रकार के उत्पात के |

है अजन्मा, आप हमें वे मार्ग तथा साधन बतायें जिनके द्वारा हम आपको समस्त भोग्य अन्नतथा वस्तुएँ अर्पित कर सकें जिससे हम तथा इस जगत के अन्य समस्त जीव बिना किसी उत्पातके अपना पालन-पोषण कर सकें तथा आपके लिए और अपने लिए आवश्यक वस्तुओं कासंग्रह कर सकें ।

त्वं न: सुराणामसि सान्वयानांकूटस्थ आद्य: पुरुष: पुराण: ।

त्वं देव शक्त्यां गुणकर्मयोनौरेतस्त्वजायां कविमादधेडज: ॥

५०॥

त्वमू--आप; नः--हम; सुराणाम्‌--देवताओं के; असि--हो; स-अन्वयानाम्‌--विभिन्न कोटियों समेत; कूट-स्थ:--अपरिवर्तित; आद्य:--बिना किसी श्रेष्ठ के अद्वितीय; पुरुष:--संस्थापक व्यक्ति; पुराण: --सबसे प्राचीन, जिस का कोई औरसंस्थापक न हो; त्वम्‌ू--आप; देव--हे भगवान्‌; शक्त्याम्‌-अशक्ति के प्रति; गुण-कर्म-योनौ-- भौतिक गुणों तथा कर्मों केकारण के प्रति; रेत:--जन्म का वीर्य; तु--निस्सन्देह; अजायाम्‌--उत्पन्न करने के लिए; कविम्‌--सारे जीव; आदधे-- आरम्भकिया; अज:--अजन्मा।

आप समस्त देवताओं तथा उनकी विभिन्न कोटियों के आदि साकार संस्थापक हैं फिर भीआप सबसे प्राचीन हैं और अपरिवर्तित रहते हैं।

हे प्रभु, आपका न तो कोई उद्गम है, न ही कोईआपसे श्रेष्ठ है।

आपने समस्त जीव रूपी वीर्य द्वारा बहिरंगा शक्ति को गर्भित किया है, फिर भी आप स्वयं अजन्मा हैं।

ततो वयं मत्प्रमुखा यदर्थबभूविमात्मन्करवाम किं ते ।

त्वं नः स्वच॒क्षु: परिदेहि शक्‍्त्या देव क्रियार्थे यदनुग्रहाणाम्‌ ॥

५१॥

ततः--अतः ; वयम्‌--हम सभी; मत्-प्रमुखा: --महतत्त्व से उत्पन्न; यत्‌-अर्थ--जिस कार्य के लिए; बभूविम--उत्पन्न किया;आत्मनू्‌--हे परम आत्मा; करवाम--करेंगे; किमू--क्या; ते--आपकी सेवा; त्वम्‌ू--आप स्वयं; न:ः--हम को; स्व-चक्षु:--निजी योजना; परिदेहि--विशेष रूप से प्रदान करें; शक्त्या--कार्य करने की शक्ति से; देव--हे प्रभु; क्रिया-अर्थ--कार्य करनेके लिए; यत्‌--जिससे; अनुग्रहाणाम्‌-विशेष रूप से कृपा प्राप्त लोगों का।

हे परम प्रभु, महत्‌-तत्त्व से प्रारम्भ में उत्पन्न हुए हम सबों को अपना कृपापूर्ण निर्देश दें किहम किस तरह से कर्म करें।

कृपया हमें अपना पूर्ण ज्ञान तथा शक्ति प्रदान करें जिससे हमपरवर्ती सृष्टि के विभिन्न विभागों में आपकी सेवा कर सकें।

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