← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 3 की सूची

अध्याय इक्कीसवाँ: मनु और कर्दम के बीच बातचीत

3.21विदुर उवाचस्वायम्भुवस्य च मनोर्वश: परमसम्मतः ।

कथ्यतां भगवन्यत्रमैथुनेनेधिरे प्रजा: ॥

१॥

विदुरः उवाच--विदुर ने कहा; स्वायम्भुवस्य--स्वायम्भुव का; च--तथा; मनो: --मनु का; वंश: --वंश; परम--सर्वाधिक; सम्मत:ः--आदरणीय; कथ्यताम्‌--कृपया कहिये; भगवन्‌--हे पूज्य ऋषि; यत्र--जिसमें; मैथुनेन--संभोग से; एधिरे--वृद्धि की; प्रजा:--सन्तति ने |

विदुर ने कहा-स्वायम्भुव मनु की वंश परम्परा अत्यन्त आदरणीय थी।

हे पूज्यऋषि, मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप इस वंश का वर्णन करें जिसकी सन्तति-वृद्ध्धिसंभोग के द्वारा हुई।

प्रियब्रतोत्तानपादौ सुतौ स्वायम्भुवस्य वै ।

यथाधर्म जुगुपतुः सप्तद्वीपवर्ती महीम्‌ ॥

२॥

प्रियत्रत--महाराज प्रियब्रत; उत्तानपादौ--तथा महाराज उत्तानपाद; सुतौ--दो पुत्र; स्वायम्भुवस्य--स्वायंभुव मनु के;बै--निस्सन्देह; यथा--के अनुसार; धर्मम्‌--धार्मिक नियम; जुगुपतु:--शासन किया; सप्त-द्वीप-वतीम्‌--सात द्वीपोंवाली; महीम्‌--पृथ्वी, संसार पर।

स्वायम्भुव मनु के दो पुत्रों-प्रियत्रत तथा उत्तानपाद--ने धार्मिक नियमानुसार सप्तद्वीपों वाले इस संसार पर राज्य किया।

तस्य बै दुहिता ब्रह्मन्देवहूतीति विश्रुता ।

पती प्रजापतेरुक्ता कर्दमस्य त्ववानघ ॥

३॥

तस्य--उस मनु की; वै--निस्सन्देह; दुहिता--पुत्री; ब्रह्मनू--हे पवित्र ब्राह्मण; देवहूति--देवहूति नामक; इति--इसप्रकार; विश्रुता--प्रसिद्ध थी; पत्ती--सहधर्मिणी; प्रजापते: --उत्पन्न जीवों के स्वामी की; उक्ता--कहा गया;कर्दमस्य--कर्दम मुनि का; त्वया--तुम्हारे द्वारा; अनघ--हे पापविहीन पुरुष |

हे पवित्र ब्राह्मण, हे पापविहीन पुरुष, आपने उनकी पुत्री के विषय में कहा है कि वेप्रजापति ऋषि कर्दम की पत्नी देवहूति थीं।

तस्यां स वै महायोगी युक्तायां योगलक्षणै: ।

ससर्ज कतिधा वीर्य तन्मे शुश्रूषवे वद ॥

४॥

तस्याम्‌--उसमें; सः--कर्दम मुनि; बै--निस्सन्देह; महा-योगी--परम योगी; युक्तायामू--युक्त; योग-लक्षणै:--योगिक सिद्धि के आठ लक्षणों से; ससर्ज--आगे बढ़ाया; कतिधा--कितनी बार; वीर्यम्‌--सन्तान; तत्‌--वहआख्पान; मे--मुझको; शुश्रूषवे--सुनने का इच्छुक; बद--कहिये।

उस महायोगी ने, जिसे अष्टांग योग के सिद्धान्तों में सिद्धि प्राप्त थी, इस राजकुमारीसे कितनी सन्तानें उत्पन्न कीं? कृपा करके आप मुझे यह बताएँ, क्योंकि मैं इसे सुनने काइच्छुक हूँ।

रुचिर्यों भगवान्ब्रह्मन्दक्षो वा ब्रह्मण: सुतः ।

यथा ससर्ज भूतानि लब्ध्वा भार्या च मानवीम्‌ ॥

५॥

रूचि:--रूचि; य:--जो; भगवानू--पूज्य; ब्रह्मनू-हे साधु; दक्ष:--दक्ष; वा--तथा; ब्रह्मण:-- भगवान्‌ ब्रह्मा का;सुतः--पुत्र; यथा--जिस प्रकार; ससर्ज--उत्पन्न किया; भूतानि--सन्तान; लब्ध्वा--पा करके; भार्याम्‌-- अपनीपत्नियों के रूप में; च--तथा; मानवीम्‌--स्वायम्भुव मनु की कन्याएँ।

हे ऋषि, कृपा करके मुझे बताएँ कि ब्रह्मा के पुत्र दक्ष तथा रुचि ने स्वायंभुव मनुकी अन्य दो कन्याओं को पत्नी रूप में प्राप्त करके किस प्रकार सनन्‍्तानें उत्पन्न कीं ?

मैत्रेय उवाचप्रजा: सृजेति भगवान्कर्दमो ब्रह्मणोदितः ।

सरस्वत्यां तपस्तेपे सहस्त्राणां समा दश ॥

६॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय मुनि ने कहा; प्रजा:--सनन्‍्तानें; सृज--उत्पन्न करो; इति--इस प्रकार; भगवान्‌--पूज्य;कर्दमः--कर्दम मुनि; ब्रह्मणा-- भगवान्‌ ब्रह्मा द्वारा; उदित:ः--आदेशित; सरस्वत्याम्‌--सरस्वती नदी के तट पर;तपः--तपस्या; तेपे--अभ्यास किया; सहस्त्राणाम्‌ू--हजारों; समा:--वर्षो की; दश--दस महान्‌

ऋषि मैत्रेय ने उत्तर दिया-भगवान्‌ ब्रह्मा से लोकों में सन्तान उत्पन्न करने काआदेश पाकर पूज्य कर्दम मुनि ने सरस्वती नदी के तट पर दस हजार वर्षों तक तपस्याकी।

ततः समाधियुक्तेन क्रियायोगेन कर्दम: ।

सम्प्रपेदे हरिं भक्त्या प्रपन्नवरदाशुषम्‌ ॥

७॥

ततः--तब, उस तप में; समाधि-युक्तेन--समाधि अवस्था में; क्रिया-योगेन-- भक्तियोग अथवा पूजा से; कर्दम:--कर्दम मुनि ने; सम्प्रपेदे--सेवा की; हरिम्‌-- श्री भगवान्‌ की; भक्त्या--भक्तिपूर्वक; प्रपन्न--शरणागत जीवों को;वरदाशुषम्‌--समस्त वरों के प्रदाता |

समाधिकाल में कर्दम मुनि ने समाधि में अपनी भक्ति द्वारा शरणागतों को तुरंतसमस्त वर देने वाले श्रीभगवान्‌ की आराधना की।

तावद््रसन्नो भगवान्पुष्कराक्ष: कृते युगे ।

दर्शयामास त॑ क्षत्तः शाब्दं ब्रह्म दधद्वपु: ॥

८ ॥

तावत्‌--तब; प्रसन्न: --प्रसन्न होकर; भगवान्‌-- श्रीभगवान्‌ ने; पुष्कर-अक्ष:--कमल के समान नेत्र वाले; कृतेयुगे--सत्ययुग में; दर्शयाम्‌ आस--दिखलाया; तम्‌--कर्दम मुनि को; क्षत्त:--हे विदुर; शाब्दम्‌--जिसे वेदों केमाध्यम से ही जाना जा सकता है; ब्रह्मय--परम सत्य; दधत्‌--प्रकट करते हुए; वपु:--अपना दिव्य शरीर

तब सत्ययुग में कमल-नयन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ ने प्रसन्न होकर कर्दम मुनि कोअपने दिव्य रूप का दर्शन कराया, जिसे वेदों के माध्यम से ही जाना जा सकता है।

सतं विरजमर्काभं सितपद्मोत्पलस्त्रजम्‌ ।

स्निग्धनीलालककब्रातवक्त्राब्ज॑ विरजोम्बरम्‌ ॥

९॥

सः--वह कर्दम मुनि; तम्‌--उसको; विरजमू--कल्मषहीन; अर्क-आभम्‌ू--सूर्य का सा तेज; सित-- श्वेत; पद्य--कमल; उत्पल--कुमुदिनी की; स्त्रजमू--माला; स्निग्ध--चिकना; नील--श्याममिश्रित नीला; अलक--बालों केसमूह की; ब्रात--अधिकता; वकक्‍्त्र--मुख; अब्जम्‌ू--कमल-सहृश; विरज: --निर्मल; अम्बरम्‌--वस्त्र |

कर्दम मुनि ने भौतिक कल्मष से रहित, सूर्य के समान तेजमय, श्वेत कमलों तथाकुमुदिनियों की माला पहने श्रीभगवान्‌ के नित्य रूप का दर्शन किया।

भगवान्‌ ने निर्मलपीला रेशमी वस्त्र धारण कर रखा था और उनका मुख-कमल घुँघराले नीले चिकने बालों के गुच्छों से सुशोभित था।

किरीटिनं कुण्डलिनं शद्भुच्क्रगदाधरम्‌ ।

श्रेतोत्पलक्रीडनकं मनःस्पर्शस्मितेक्षणम्‌ ॥

१०॥

किरीटिनमू--मुकुट धारण किये हुए; कुण्डलिनम्‌-कुण्डल पहने हुए; शट्डु--शंख; चक्र-- चक्र; गदा--गदा;धरम्‌-- धारण किये; श्वेत--उज्वल; उत्पल--कुमुदिनी; क्रीडनकम्‌--खिलौना; मन:--हृदय; स्पर्श--स्पर्श;स्मित--हँसी; ईक्षणम्‌--तथा चितवन।

मुकुट तथा कुण्डलों से आभूषित श्रीभगवान्‌ अपने तीन हाथों में अपने विशिष्टशंख, चक्र तथा गदा और चौथे में श्वेत कुमुदिनी धारण किये हुए थे।

उन्होंने प्रसन्न तथाहासयुक्त मुद्रा में समस्त भक्तों के चित्त को चुराने वाली चितवन से देखा।

विन्यस्तचरणाम्भोजमंसदेशे गरुत्मतः ।

इृष्टा खेउवस्थितं वक्ष:अ्रियं कौस्तुभकन्धरम्‌ ॥

११॥

विन्यस्त--रखे हुए; चरण-अम्भोजम्‌--चरणकमल; अंस-देशे--कं धों पर; गरुत्मतः--गरुड़ के; दृष्ठा--देखकर;खे--आकाश में; अवस्थितम्‌--खड़े हुए; वक्ष:--अपनी छाती पर; थ्रियम्‌--शुभ चिह्न श्रीवत्स ; कौस्तुभ--'कौस्तुभमणि; कन्धरम्‌--गले में |

अपने वक्षस्थल पर सुनहरी रेखा धारण किये तथा अपने गले में प्रसिद्ध कौस्तुभमणिलटकाये हुए वे गरुड़ के कन्धों पर अपने चरण-कमल रखे हुए आकाश वायु मेंखड़े थे।

जातहर्षो पतन्मूर्ध्या क्षितो लब्धमनोरथः ।

गीर्भिस्त्वभ्यगृणात्प्रीतिस्वभावात्मा कृताझ्ञलि: ॥

१२॥

जात-हर्ष:--स्वाभाविक रूप से प्रमुदित; अपतत्‌--गिर पड़ा; मूर्धश्न--अपने सिर के बल; क्षितौ--पृथ्वी पर;लब्ध--प्राप्त हुआ; मनः-रथ:--अपनी इच्छा; गीर्मि:--स्तुतियों से; तु--तथा; अभ्यगृणात्‌-- प्रसन्न किया; प्रीति-स्वभाव-आत्मा--जिनका हृदय स्वभाव से प्रेम पूर्ण है; कृत-अद्जलि:--हाथ जोड़कर ।

जब कर्दम मुनि ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ का साक्षात्‌ दर्शन किया, तो वे अत्यधिकतुष्ट हुए, क्योंकि उनकी दिव्य इच्छा पूर्ण हुई थी।

वे भगवान्‌ के चरण-कमलों कोनमस्कार करने के लिए नतमस्तक होकर पृथ्वी पर लेट गये।

उनका हृदय स्वभाविकरूप में भगवत्प्रेम से पूरित था।

उन्होंने हाथ जोड़कर स्तुतियों द्वारा भगवान्‌ को तुष्टकिया।

ऋषिरुवाचजुष्ट बताद्याखिलसत्त्वराशे:सांसिद्धयमक्ष्णोस्तव दर्शनान्न: ।

यहर्शनं जन्मभिरीड्य सद्धि-राशासते योगिनो रूढयोगा: ॥

१३॥

ऋषि: उवाच--ऋषि ने कहा; जुष्टम्‌--प्राप्त किया जाता है; बत--आह; अद्य--अब; अखिल--सभी; सत्त्व--सद्‌गुण का; राशे: --जो आगार है; सांसिद्धबम्‌-पूर्ण सफलता; अक्ष्णो:--दोनों नेत्रों का; तब--तुम्हारे; दर्शनात्‌ू--दर्शन से; न:ः--हमारे द्वारा; यत्‌ू--जिसका; दर्शनम्‌--दर्शन; जन्मभि: --जन्म के द्वारा; ईड्य--हे पूज्य स्वामी;सद्धिः--क्रमशः पद को प्राप्त; आशासते--महत्त्वाकांक्षा रखते हैं; योगिन:ः --योगी; रूढ-योगा: --योग मेंसिद्ध््िप्राप्त।

कर्दम मुनि ने कहा-हे परम पूज्य भगवान्‌, समस्त अस्तित्वों के आगार आपकादर्शन प्राप्त करके मेरी दर्शन की साध पूरी हो गई।

महान्‌ योगीजन बारम्बार जन्म लेकरगहन ध्यान में आपके दिव्य रूप का दर्शन करने की आकांक्षा करते रहते हैं।

ये मायया ते हतमेधसस्त्वतू-पादारविन्दं भवसिन्धुपोतम्‌ ।

उपासते कामलवाय तेषांरासीश कामान्निरयेडपि ये स्यु: ॥

१४॥

ये--जो व्यक्ति; मायया--छलने वाली शक्ति से; ते--तुम्हारा; हत-- भ्रष्ट; मेधस: --जिनकी बुद्धि; त्वत्‌--तुम्हारा;पाद-अरविन्दमू--चरणकमल; भव--संसार का; सिन्धु--सागर; पोतम्‌--पार करने की नाव; उपासते--पूजा करतेहैं; काम-लवाय--क्षुद्र सुखों के लिए; तेषामू--उनकी; रासि--देते हो; ईश--हे ईश्वर; कामान्‌--इच्छाएँ; निरये--नरक में; अपि-- भी; ये--जो इच्छा करते हैं; स्यु:--प्राप्त हो सकती हैं।

आपके चरण-कमल सांसारिक अज्ञान के सागर को पार करने के लिए सच्चे पोतनाव के तुल्य हैं।

माया के वशीभूत केवल अज्ञानी पुरुष ही इन चरणों की पूजाइन्द्रियों के क्षुद्र तथा क्षणिक सुख की प्राप्ति हेतु करते हैं जिनकी प्राप्ति नरक में सड़नेवाले व्यक्ति भी कर सकते हैं।

तो भी, हे भगवान्‌, आप इतने दयालु हैं कि उन पर भीआप अनुग्रह करते हैं।

तथा स चाहं परिवोदुकाम:समानशीलां गृहमेधधेनुम्‌ ।

उपेयिवान्मूलमशेषमूलंदुराशयः कामदुघाडूप्रिपस्थ ॥

१५॥

तथा--उसी प्रकार से; सः--मैं स्वयं; च-- भी; अहम्‌--मैं; परिवोढु-काम:--ब्याह करने की इच्छा से; समान-शीलाम्‌-- अनुरूप चरित्र वाली कन्या; गृह-मेध--विवाहित जीवन में; धेनुम्‌ू--कामधेनु; उपेयिवान्‌ू--पास आयाहुआ; मूलम्‌--जड़ चरणकमल ; अशेष- प्रत्येक वस्तु का; मूलमू--स्त्रोत; दुराशयः --कामेच्छा से; काम-दुघ--समस्त इच्छाओं को प्रदान करने वाला; अड्प्रिपस्थ--वृक्ष सहश आपका।

अतः मैं भी ऐसी समान स्वभाव वाली कन्या से विवाह करने की इच्छा लेकरआपके चरणकमलों की शरण में आया हूँ, जो मेरे विवाहित जीवन में मेरी कामेच्छाओंको पूरा करने में कामधेनु के समान सिद्ध हो सके।

आपके चरण प्रत्येक वस्तु के देनेवाले हैं, क्योंकि आप कल्पवृक्ष के समान हैं।

प्रजापतेस्ते वचसाधीश तन्त्यालोक: किलाय॑ कामहतोनुबद्ध: ।

अहं च लोकानुगतो वहामिबलिं च शुक्लानिमिषाय तुभ्यम्‌ ॥

१६॥

प्रजापते:--जो समस्त जीवात्माओं के स्वामी हैं; ते--तुम्हारे; वचसा--निर्देश से; अधीश--हे भगवान्‌; तन्त्या--डोरीसे; लोक:--बद्धजीव; किल--निस्सन्देह; अयम्‌--ये; काम-हतः--काम वासनाओं से विजित; अनुबद्धः --बँधेहुए; अहम्‌-मैं; च--तथा; लोक-अनुगत:--बद्धजीवों का अनुसरण करता; वहामि--प्रदान करता हूँ; बलिम्‌ू--बलि, भेंट; च--तथा; शुक्ल--हे धर्मरूप; अनिमिषाय--शाश्रत समय के रूप में रहकर; तुभ्यम्‌--तुम्हें |

हे भगवान्‌, आप समस्त जीवात्माओं के स्वामी तथा नायक हैं।

आपके आदेश सेसभी बद्धजीव मानो डोरी से बँधकर अपनी-अपनी इच्छाओं की तुष्टि में निरन्तर लगेरहते हैं।

उन्हीं का अनुसरण करते हुए, हे धर्ममूर्ते, शाश्वत काल रूप आपको मैं भीअपनी आहुति बलि अर्पण करता हूँ।

लोकां श्व लोकानुगतान्पशूंश्चहित्वा थ्रितास्‍्ते चरणातपत्रम्‌ ।

परस्पर त्वद्गुणवादसी धु-पीयूषनिर्यापितदेहधर्मा: ॥

१७॥

लोकान्‌--सांसारिक कार्यकलाप; च--तथा; लोक-अनुगतान्‌--सांसारिकता का अनुसरण करने वाले; पशून्‌--पशुवत्‌; च--तथा; हित्वा--त्याग कर; थ्रिता:--शरणागत; ते--तुम्हारे;: चरण--चरणकमलों का; आतपत्रम्‌--छत्र; परस्परमू--एक दूसरे से; त्वत्‌-तुम्हारा; गुण--गुणों का; वाद--तर्क-वितर्क द्वारा; सीधु--मादक; पीयूष--अमृत से; निर्यापित--बुझाया गया; देह-धर्मा:--शरीर की मूल आवश्यकताएँ।

फिर भी जिन पुरुषों ने रूढ़ सांसारिकता तथा इनके पशुतुल्य अनुयायियों कापरित्याग कर दिया है और जिन्होंने परस्पर विचार-विनिमय के द्वारा आपके गुणों तथाकार्यकलापों के मादक अमृत सुधा का पान करके आपके चरण-कमलों की छत्र-छाया ग्रहण की है वे भौतिक देह की मूल आवश्यकताओं से मुक्त हो सकते हैं।

न तेउजराक्षभ्रमिरायुरेषांअयोदशारं त्रिशतं षष्टिपर्व ।

घण्नेम्यनन्तच्छदि यत्त्रिणाभिकरालस्त्रोतो जगदाच्छिद्य धावत्‌ ॥

१८॥

न--नहीं; ते--तुम्हारे; अजर--अमर ब्रह्म का; अक्ष--धुरी; भ्रमिः--घूमती हुई; आयु:--जीवन काल, उम्र; एषाम्‌--भक्तों का; त्रयोदश-- तेरह; अरम्‌ू--तीलियाँ, अरा; त्रि-शतम्‌--तीन सौ; षष्टि--साठ; पर्ब--जोड़, गांठे; घट्‌ू--छह;नेमि--परिधियाँ, रिम; अनन्त--असंख्य; छदि--पत्तियाँ, पत्तर; यत्‌ू-- जो; त्रि--तीन; नाभि--नाभियाँ; कराल-स््रोत:--प्रचण्ड वेग से; जगत्‌--ब्रह्माण्ड; आच्छिद्य --छेदन करता हुआ; धावत्‌--दौड़ता हुआ

आपका तीन नाभिवाला काल चक्र अमर ब्रह्म की धुरी के चारों ओर घूम रहा है।

इसमें तेरह तीलियाँ अरे ३६० जोड़, छह परिधियाँ तथा उस पर अनन्त पत्तियाँ पत्तर पिरोयी हुई हैं।

यद्यपि इसके घूमने से सम्पूर्ण सृष्टि की जीवन-अवधि घट जातीहै, किन्तु यह प्रचण्ड वेगवान्‌ चक्र भगवान्‌ के भक्तों की आयु का स्पर्श नहीं करसकता।

एक: स्वयं सझ्जगतः सिसृक्षया-द्वितीययात्मन्नधियोगमायया ।

सृजस्यद: पासि पुनर्ग्रसिष्यसेयथोर्णनाभिर्भगवन्स्वशक्तिभि; ॥

१९॥

एकः--एक; स्वयम्‌-- अपने से; सन्‌--होकर; जगत:--ब्रह्माण्ड; सिसृक्षया--सृष्टि करने की अभिलाषा से;अद्वितीयया--अद्वितीय; आत्मन्‌--अपने में; अधि--वश में करते हुए; योग-मायया--योगमाया से; सृजसि--उत्पन्नकरते हो; अदः--वे ब्रह्माण्ड; पासि--भरण करते हो; पुन:--फिर; ग्रसिष्यसे-- अन्त कर देते हो; यथा--जिसप्रकार; ऊर्ण-नाभि:--मकड़ी; भगवन्‌--हे भगवान्‌; स्व-शक्तिभि:--अपनी शक्ति से

हे भगवान्‌, आप अकेले ही ब्रह्माण्डों की सृष्टि करते हैं।

हे श्रीभगवान्‌, इनब्रह्माण्डों की सृष्टि करने की इच्छा से, आप उनकी सृष्टि करते, उन्हें पालते और फिरअपनी शक्तियों से उनका अन्त कर देते हैं।

ये शक्तियाँ आपकी दूसरी शक्ति योगमाया केअधीन हैं, जिस प्रकार एक मकड़ी अपनी शक्ति से जाला बुनती है और पुन: उसे निगलजाती है।

नैतद्वताधीश पद तवेप्सितंअन्मायया नस्तनुषे भूतसूक्ष्मम्‌ ।

अनुग्रहायास्त्वपि यहिं माययालसत्तुलस्या भगवान्विलक्षित: ॥

२०॥

न--नहीं; एतत्‌--यह; बत--निस्सन्देह; अधीश--हे भगवान्‌; पदम्‌-- भौतिक संसार; तव--तुम्हारी; ईप्सितम्‌--इच्छा; यत्‌ू--जो; मायया--आपकी बहिरंगा शक्ति से; न:ः--हमारे लिए; तनुषे-- प्रकट होते हो; भूत-सूक्ष्मम्‌--स्थूलतथा सूक्ष्म तत्त्व; अनुग्रहाय--अनुग्रह करने के लिए; अस्तु--हो; अपि-- भी; यहिं---जब; मायया--आपकीअहैतुकी कृपा से; लसत्‌--भव्य; तुलस्या--तुलसी दल की माला से; भगवान्‌-- श्रीभगवान्‌; विलक्षित:--देखाजाता है।

हे भगवान्‌, इच्छा के न होते हुए भी आप स्थूल तथा सूक्ष्म तत्त्वों की इस सृष्टि कोहमारी ऐन्द्रिय तुष्टि के लिए प्रकट करते हैं।

आपकी अहैतुकी कृपा हमें प्राप्त हो, क्योंकिआप अपने नित्य रूप में तुलसीदल की माला से विभूषित होकर हमारे समक्ष प्रकट हुएहैं।

त॑ त्वानुभूत्योपरतक्रियार्थस्वमायया वर्तितलोकतन्त्रम्‌ ।

नमाम्यभीक्ष्णं नमनीयपाद-सरोजमल्पीयसि कामवर्षम्‌ ॥

२१॥

तम्‌--उस; त्वा--तुमको; अनुभूत्या-- अनुभूति द्वारा; उपरत--उपेक्षित; क्रिया--सकाम कर्मो का सुख; अर्थम्‌--जिससे कि; स्व-मायया--अपनी शक्ति से; वर्तित--लाया गया; लोक-तन्त्रमू-- भौतिक लोक; नमामि--नमस्कारकरता हूँ; अभीक्षणम्‌--निरन्तर; नमनीय--पूज्य; पाद-सरोजम्‌--चरणकमल; अल्पीयसि-- अकिंचन; काम--आकांक्षाएँ; वर्षम्‌-वर्षा करते हुए।

मैं आपके चरण-कमलों में निरन्तर सादर नमस्कार करता हूँ, जिनकी शरण ग्रहणकरना श्रेयस्कर है, क्योंकि आप अकिंचनों पर समस्त आशीर्वादों की वृष्टि करने वालेहैं।

आपने इन भौतिक लोकों को अपनी ही शक्ति से विस्तार दिया है, जिससे समस्तजीवात्माएँ आपकी अनुभूति के द्वारा सकाम कर्मों से विरक्ति प्राप्त कर सकें ।

ऋषिरुवाचइत्यव्यलीकं प्रणुतोबजनाभ-स्तमाबभाषे वचसामृतेन ।

सुपर्णपक्षोपरि रोचमानःप्रेमस्मितोद्वीक्षणविभ्रमद्भ्रू: ॥

२२॥

ऋषि: उवाच--मैत्रेय ऋषि ने कहा; इति--इस प्रकार; अव्यलीकम्‌--निष्ठापूर्वक; प्रणुत:ः--प्रशंसित होकर; अब्ज-नाभः--भगवान्‌ विष्णु ने; तम्‌ू--कर्दम मुनि को; आबभाषे--उत्तर दिया; वचसा--शब्दों से; अमृतेन-- अमृत केसमान मधुर; सुपर्ण--गरुड़; पक्ष--कंधे के; उपरि--ऊपर; रोचमान:--चमकते हुए; प्रेम--स्नेह का; स्मित--हँसीसे; उद्दीक्षण--देखते हुए; विभ्रमत्‌--चलायमान; भ्रू:--भौंहें |

मैत्रेय ने कहा--इन शब्दों से प्रशंसित होने पर गरुड़ के कंधों पर अत्यन्त मनोहारीरूप से दैदीप्यमान भगवान्‌ विष्णु ने अमृत के समान मधुर शब्दों में उत्तर दिया।

उनकीभौहें ऋषि की ओर स्नेहपूर्ण हँसी से देखने के कारण चञ्जल हो रही थीं।

श्रीभगवानुवाचविदित्वा तव चैत्यं मे पुरव समयोजि तत्‌ ।

यदर्थमात्मनियमैस्त्वयैवाहं समर्चित: ॥

२३॥

श्री-भगवान्‌ उवाच--परमे श्वर से कहा; विदित्वा--जानकर; तव--तुम्हारी; चैत्यम्‌ू--मानसिक स्थिति; मे--मेरे द्वारा;पुरा--इसके पूर्व ही; एब--निश्चय ही; समयोजि--योजना की गईं; तत्‌ू--वह; यत्‌-अर्थम्‌--जिसके लिए; आत्म--मन तथा इन्द्रियों का; नियमैः--संयम या अनुशासन से; त्वया--तुम्हारे द्वारा; एब--केवल; अहम्‌--मैं; समर्चित:--पूजित हुआ

भगवान्‌ ने कहा-जिसके लिए तुमने आत्मा संयमादि के द्वारा मेरी आराधना की है,तुम्हारे मन के उस भाव को पहले ही जानकर मैंने उसकी व्यवस्था कर दी है।

न वे जातु मृषैव स्यात्प्रजाध्यक्ष मदर्हणम्‌ ।

भवद्ठिधेष्वतितरां मयि सड्भभितात्मनाम्‌ ॥

२४॥

न--नहीं; वै--निस्सन्देह; जातु--क भी; मृषा--झूठा, वृथा; एबव--केवल; स्यात्‌ू--होए; प्रजा--जीवात्माओं के;अध्यक्ष--हे प्रमुख; मत्‌-अर्हणम्‌--मेरी पूजा; भवत्‌-विधेषु--तुम जैसे लोगों को; अतितराम्‌--पूर्णतया; मयि--मुझमें; सड्डभित--स्थिर हैं; आत्मनाम्‌--उनका जिनके मन।

भगवान्‌ ने आगे कहा--हे ऋषि, हे जीवात्माओं के अध्यक्ष, जो लोग मेरी पूजा द्वाराभक्तिपूर्वक मेरी सेवा करते हैं, विशेष रूप से तुम जैसे पुरुष जिन्होंने अपना सर्वस्व मुझेअर्पित कर रखा है, उन्हें निराश होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।

प्रजापतिसुतः सप्राण्मनुर्विख्यातमड्रल: ।

ब्रह्मावर्त योडधिवसन्शास्ति सप्तार्णवां महीम्‌ ॥

२५॥

प्रजापति-सुत:-- भगवान्‌ ब्रह्मा का पुत्र; सम्राट्‌--महान्‌ राजा; मनु:--स्वायंभुव मनु; विख्यात--सुप्रसिद्ध; मड्गल:--जिसके शुभ कार्य ; ब्रह्मावर्तम्‌-ब्रह्मावर्त; यः--जो; अधिवसन्‌--रहते हुए; शास्ति--शासन करता है; सप्त--सात;अर्णवाम्‌--समुद्र; महीम्‌--पृथ्वी |

भगवान्‌ ब्रह्मा के पुत्र सम्राट स्वायंभुव मनु जो अपने सुकृत्यों के लिए विख्यात हैं,ब्रह्मावर्त में स्थित होकर सात समुद्रों वाली पृथ्वी पर शासन करते हैं।

स चेह विप्र राजर्षिमहिष्या शतरूपया ।

आयास्यति दिदृश्लुस्त्वां परश्नो धर्मकोविद: ॥

२६॥

सः--स्वायंभुव मनु; च--तथा; इह--यहाँ; विप्र--हे पवित्र ब्राह्मण; राज-ऋषि:--साधु राजा; महिष्या-- अपनी रानी महिषी सहित; शतरूपया--शतरूपा नामक; आयास्यति--आएंगे; दिहक्षुः--देखने की इच्छा से; त्वाम्‌--तुमको;परश्च:--परसों; धर्म--धार्मिक कृत्यों में; कोविद:ः--दक्ष |

हे ब्राह्मण, धार्मिक कृत्यों में दक्ष सुप्रसिद्ध सम्राट अपनी पत्नी शतरूपा सहित तुम्हेंदेखने के लिए परसों यहाँ आएँगे।

आत्मजामसितापाड़ीं वयःशीलगुणान्विताम्‌ ।

मृगयन्तीं पतिं दास्यत्यनुरूपाय ते प्रभो ॥

२७॥

आत्म-जाम्‌--अपनी पुत्री; असित--श्याम; अपाड्रीमू--आँखें; वयः--तरुण आयु; शील--आचरण से; गुण--अच्छे गुणों से; अन्विताम्‌--युक्त; मृगयन्तीम्‌--खोजती हुई; पतिम्‌--पति को; दास्यति--दे देंगे; अनुरूपाय--अनुरूप, उपयुक्त; ते--तुमको; प्रभो--महोदय !

उनके एक श्याम नेत्रों वाली तरुणी कन्या है।

वह विवाह के योग्य है, वह उत्तमआचरण वाली तथा सर्व गुणसम्पन्न है।

वह भी अच्छे पति की तलाश में है।

महाशय,उसके माता-पिता तुम्हें देखने आएँगे।

तुम उसके सर्वथा अनुरूप हो जिससे वे अपनीकन्या को तुम्हारी पत्नी के रूप में अर्पित कर देंगे।

समाहित ते हृदयं यत्रेमान्परिवत्सरान्‌ ।

सात्वां ब्रह्मन्रपवधू: काममाशु भजिष्यति ॥

२८॥

समाहितम्‌--स्थिर; ते--तुम्हारे; हदयम्‌--हृदय; यत्र--जिस पर; इमान्‌--इतने; परिवत्सरानू-- वर्षो तक; सा--वह;त्वामू--तुमको; ब्रह्मनू-हे ब्राह्मण; नृप-वधू: --राजकुमारी; कामम्‌--इच्छानुरूप; आशु--शीघ्र ही; भजिष्यति--सेवा करेगी।

हे ऋषि, वह राजकुमारी उसी प्रकार की होगी जिस प्रकार की तुम इतने वर्षों सेअपने मन में सोचते रहे हो।

वह शीघ्र ही तुम्हारी हो जाएगी और वह जी भर तुम्हारी सेवाकरेगी।

या त आत्मभृतं वीर्य नवधा प्रसविष्यति ।

वबीर्ये त्वदीये ऋषय आधास्यन्त्यञ्जसात्मन: ॥

२९॥

या--वह; ते--तुम्हारे द्वारा; आत्म-भृतम्‌ू--उसमें बोये गये; वीर्यमू--बीज से; नव-धा--नौ कन्याएँ; प्रसविष्यति--जन्म देगी; वीर्ये त्वदीये--तुम्हारे द्वारा उत्पन्न कन्याओं में; ऋषय:--ऋषिगण; आधास्यन्ति--उत्पन्न करेंगे; अज्ससा--कुल मिलाकर; आत्मन:ः--सन्तानें |

वह तुम्हारा वीर्य धारण करके नौ पुत्रियाँ उत्पन्न करेगी और यथासमय इन कन्याओंसे ऋषि स्तानें उत्पन्न करेंगे।

त्वं च सम्यगनुष्ठाय निदेशं म उशत्तम: ।

मयि तीर्थीकृताशेषक्रियार्थों मां प्रपत्स्यसे ॥

३०॥

त्वमू--तुम; च--तथा; सम्यक्‌ू--उचित रीति से; अनुष्ठाय--अनुष्ठान करके; निदेशम्‌-- आदेश; मे--मेरा;उशत्तम:--पूर्णतया पवित्र किया; मयि--मुझको; तीर्थी-कृत--अर्पित करके; अशेष--समस्त; क्रिया--कार्यो का;अर्थ:--फल; माम्‌--मुझको; प्रपत्स्यसे --प्राप्त करोगे |

मेरी आज्ञा का अच्छी तरह से पालन करने के कारण स्वच्छ हृदय होकर तुम अपनेसब कर्मों का फल मुझे अर्पित करके अन्त में मुझे ही प्राप्त करोगे।

कृत्वा दयां च जीवेषु दत्त्वा चाभयमात्मवान्‌ ।

मय्यात्मानं सह जगद्द्रक्ष्यस्यात्मनि चापि माम्‌ ॥

३१॥

कृत्वा--प्रदर्शित करके; दयाम्‌--दया; च--तथा; जीवेषु--जीवों के प्रति; दत्त्ता--दे करके; च--तथा; अभयम्‌--सुरक्षा का आश्वासन; आत्म-वान्‌--आत्म-साक्षात्कार; मयि--मुझमें; आत्मानम्‌--अपने आप को; सह जगत्‌--ब्रह्माण्ड सहित; द्रकष्यसि--देखोगे; आत्मनि--अपने में; च--तथा; अपि-- भी; माम्‌--मुझको |

समस्त जीवों पर दया करते हुए तुम आत्म-साक्षात्कार प्राप्त कर सकोगे; फिरसबको अभयदान देकर अपने सहित सम्पूर्ण जगत को मुझमें और मुझको अपने में स्थितदेखोगे।

सहाहं स्वांशकलया त्वद्ठीयेण महामुने ।

तव क्षेत्रे देवहूत्यां प्रणेष्ये तत्त्वसंहिताम्‌ ॥

३२॥

सह--साथ; अहम्‌--मैं; स्व-अंश-कलया--अपने स्वांश से; त्वत्‌-वीर्येण -- तुम्हारे वीर्य से; महा-मुने--हे ऋषि; तवक्षेत्रे-- तुम्हारी पतली; देवहूत्याम्‌--देवहूति में; प्रणेष्ये--उपदेश दूँगा; तत्त्व--परम तत्त्वों का; संहिताम्‌--संहिता,शास्त्र

हे ऋषि, मैं तुम्हारी नवों कन्याओं सहित तुम्हारी पत्नी देवहूति के माध्यम से अपने स्वांश को प्रकट करूँगा और उसे उस दर्शनशास्त्र सांख्य दर्शन का उपदेश दूँगा जोपरम तत्त्वों या श्रेणियों से सम्बद्ध है।

मैत्रेय उवाचएवं तमनुभाष्याथ भगवान्धप्रत्यगक्षज: ।

जगाम बिन्दुसरस: सरस्वत्या परिश्रितात्‌ ॥

३३॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय मुनि ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; तम्‌ू--उसको; अनुभाष्य--सम्भाषण करके; अथ--तब;भगवान्‌-- भगवान; प्रत्यक्‌- प्रत्यक्ष; अक्ष--इन्द्रियों से; ज:--जो देखा जाता है; जगाम--चला गया; बिन्दु-सरसः--बिन्दु सरोवर से; सरस्वत्या--सरस्वती नदी से; परिश्रितात्‌ू-घिरा हुआ

मैत्रेय ने आगे कहा इस प्रकार कर्दम मुनि से बातें करने के बाद, इन्द्रियों के कृष्ण-भावनामृत में लीन रहने पर प्रकट होने वाले भगवान्‌ उस बिन्दु नामक सरोवर से, जोसरस्वती नदी के द्वारा चारों ओर से घिरा हुआ था, अपने लोक को चले गये।

निरीक्षतस्तस्य ययावशेष-सिद्धेश्वराभिष्ठृतसिद्धमार्ग: ।

आकर्णयन्पत्ररथेन्द्रपक्षे -रुच्चारितं स्तोममुदीर्णसाम ॥

३४॥

निरीक्षतः तस्थ--उसके देखते देखते; ययौ--वे चले गये; अशेष--समस्त; सिद्ध-ईश्वर--मुक्त जीवों से; अभिष्ठत--प्रशंसित; सिद्ध-मार्ग:--वैकुण्ठ लोक का रास्ता; आकर्णयन्‌--सुनते हुए; पत्र-रथ-इन्द्र--गरुड़ पक्षिराज के;पक्षै:--पंखों से; उच्चारितम्‌ू--निकलने वाले; स्तोमम्‌--स्तुति; उदीर्ण-साम--सामवेद की आधारस्वरूप |

खड़े हुए कर्दम मुनि के देखते-देखते भगवान्‌, बैकुण्ठ जानेवाले मार्ग से प्रस्थानकर गये, जिस मार्ग की प्रशंसा सभी महान्‌ मुक्त आत्माएँ करती हैं।

मुनि खड़े-खड़े,भगवान्‌ के वाहन गरुड़ के फड़फड़ाते पंखों से गुंजादित, सामवेद के मंगलाचरण जैसेलगने वाली ध्वनि को सुनते रह गये।

अथ सप्प्रस्थिते शुक्ले कर्दमो भगवानृषि: ।

आस्ते सम बिन्दुसरसि तं काल॑ प्रतिपालयन्‌ ॥

३५॥

अथ--तब; सम्प्रस्थिते शुक्ले-- भगवान्‌ के चले जाने पर; कर्दम:--कर्दम मुनि ने; भगवान्‌ू--परम शक्तिमान;ऋषि: --ऋषि; आस्ते स्म--रहते रहे; बिन्दु-सरसि--बिन्दु सरोवर के तट पर; तम्‌--उस; कालम्‌--समय;प्रतिपालयन्‌--प्रतीक्षा करते हुए।

तब भगवान्‌ के चले जाने पर पूज्य साधु कर्दम भगवान्‌ द्वारा बताये उस समय कीप्रतीक्षा करते हुए बिन्दु सरोवर के तट पर ही ठहरे रहे।

मनु: स्यन्दनमास्थाय शातकौम्भपरिच्छदम्‌ ।

आरोप्य स्वां दुहितरं सभार्य: पर्यटन्महीम्‌ ॥

३६॥

मनुः--स्वायंभुव मनु; स्यन्दनमम्‌--रथ; आस्थाय--चढ़कर; शातकौम्भ--स्वर्ण रचित; परिच्छदम्‌--बाहरी खोल;आरोप्य--बिठाकर; स्वाम्‌ू--अपनी; दुहितरम्‌--पुत्री; स-भार्य:--अपनी पत्नी के साथ-साथ; पर्यटन्‌--सर्वत्र घूमतेहुए; महीम्‌--पृथ्वी मण्डल में |

स्वायंभुव मनु अपनी पत्नी सहित स्वर्णाभूषणों से सुसज्जित अपने रथ पर आरूढ़ हुए।

अपनी पुत्री को भी उस पर चढ़ाकर वे समस्त भूमण्डल का भ्रमण करने लगे।

तस्मिन्सुधन्वन्नहनि भगवान्यत्समादिशत्‌ ।

उपायादाश्रमपदं मुने शान्तब्रतस्यथ ततू ॥

३७॥

तस्मिनू--उस पर; सु-धन्वन्‌--हे परम धनुर्धर विदुर; अहनि--दिन में; भगवान्‌-- श्रीभगवान्‌; यत्‌--जो;समादिशत्‌-- भविष्यवाणी की; उपायात्‌--पहुँच गया; आश्रम-पदम्‌--पतवित्र कुटी में; मुनेः--मुनि की; शान्त--पूर्ण; ब्रतस्य--जिसका तपस्या का ब्रत; तत्‌--वह |

हे विदुर, वे मुनि की कुटी में पहुँचे, जिसने अपनी तपस्या का ब्रत भगवान्‌ द्वारापहले से बताये गये दिन ही समाप्त किया था।

यस्मिन्भगवतो नेत्राज््यपतन्नश्रुबिन्दवः ।

कृपया सम्परीतस्य प्रपन्नेडर्पितया भूशम्‌ ॥

३८ ॥

तद्दै बिन्दुसरो नाम सरस्वत्या परिप्लुतम्‌ ।

पुण्यं शिवामृतजलं महर्षिगणसेवितम्‌ ॥

३९॥

यस्मिनू--जिसमें; भगवत:-- भगवान्‌ के; नेत्रातू--नेत्र से; न्‍्यपतन्‌--गिरे हुए; अश्रु-बिन्दवः--ऑआँसू की बूँदें;कृपया--दया से; सम्परीतस्थ--अभिभूत होने वाला; प्रपन्ने--शरणागत कर्दम ; अर्पितया--चढ़ाया गया;भृूशम्‌--अत्यधिक; तत्‌ू--वह; बै--निस्सन्देह; बिन्दु-सर:--अश्रुओं का सरोवर; नाम--नामक ; सरस्वत्या--सरस्वती नदी से; परिप्लुतम्‌--उमड़ कर बहता हुआ; पुण्यम्‌--पवित्र; शिव--मंगलदायक; अमृत-- अमृत; जलम्‌--जल; महा-ऋषि--परम साधु के; गण--समूह द्वारा; सेवितम्‌--सेवित

सरस्वती नदी के बाढ़-जल से भरने वाले पवित्र बिन्दु सरोवर का सेवन ऋषियों का समूह करता था।

इसका पवित्र जल न केवल कल्याणकारी था वरन्‌ अमृत के समानमीठा भी था।

यह बिन्दु सरोवर कहलाता था, क्योंकि यहीं पर, जब भगवान्‌ शरणागतऋषि पर दयाद्दर हो उठे थे, उनके नेत्रों से आँसुओं की बूँदें गिरी थीं।

पुण्यद्रुमलताजालै: कूजत्पुण्यमृगद्विजै: ।

सर्वर्तुफलपुष्पाढ्य वनराजिश्रियान्वितम्‌ ॥

४०॥

पुण्य--पवित्र; द्रुम--वृक्षों का; लता--बेलों के; जालैः:--समूहों से; कूजत्‌--बोलते हुए; पुण्य--पवित्र; मृग--पशु; द्विजै:--पक्षियों के द्वारा; सर्व--समस्त; ऋतु--ऋतुओं में; फल--फलों से; पुष्प--फूलों से; आढ्यम्‌--सम्पन्न;बन-राजि--वृक्षों के कुंजों की; ्रिया--सुन्दरता से; अन्वितम्‌ू--सुशोभित |

सरोवर के तट पवित्र वृक्षों तथा लताओं के समूहों से घिरे थे, जो सभी ऋतुओं मेंफलों तथा फूलों से लदे रहते थे और जिनमें पवित्र पशु तथा पक्षी अपना-अपना बसेराबनाते थे और विविध प्रकार से कूजन करते थे।

यह स्थान वृक्षों के कुंजों की शोभा सेविभूषित था।

मत्तद्विजगणैर्घु्ट मत्तभ्रमरविश्रमम्‌ ।

मत्तबर्हिनटाटोपमाहयन्मत्तकोकिलम्‌ ॥

४१॥

मत्त-प्रसन्नता से मतवाले; द्विज--पक्षियों के; गणैः--समूहों से; घुष्टम्‌--प्रतिध्वनित; मत्त--मतवाले; भ्रमर--भौरोंका; विधभ्रमम्‌--मँडराते हुए; मत्त--मतवाले; ब्हि--मोरों का; नट--नर्तकों का; आटोपमू-गर्व; आहृयत्‌--एकदूसरे को बुलाते हुए; मत्त--प्रसन्न; कोकिलम्‌--कोयलें |

यह प्रदेश मतवाले पक्षियों के स्वर से प्रतिध्वनित था।

मतवाले भौरे मँडरा रहे थे,प्रमत्त मोर गर्व से नाच रहे थे और प्रमुदित कोयलें एक दूसरे को पुकार रही थीं।

'कदम्बचम्पकाशोककरझ्जबकुलासने: ।

कुन्दमन्दारकुटजैश्वूतपोतैरलड्डू तम्‌ ॥

४२॥

कारण्डवै: प्लवैहसै: कुरैर्जलकुक्ुटै: ।

साससैश्चक्रवाकै श्व चकोरैर्वल्गु कूजितम्‌ ॥

४३॥

कदम्ब--कदम्ब के फूल; चम्पक--चम्पा के फूल; अशोक--अशोक के फूल; करज्ल--करज्ञ पुष्प; बकुल--बकुल पुष्पा; आसनै: --आसन वृक्षों से; कुन्द--कुन्द; मन्दार--मन्दार; कुटजैः --तथा कुटज वृक्षों से; चूत-पोतैः--नव आम्र वृक्षों से; अलड्डू तम्‌--सुशोभित; कारण्डवै:--कारण्डव, बत्तख पक्षी से; प्लवैः--प्लवों से; हंसै:--हंसोंसे; कुरैः--कुररी पक्षी से; जल-कुक्कुटै:--जल कुक्कुट से; सारसै:--सारसों से; चक्रवाकै:--चक्रवाक चकई-चकवा पक्षियों से; च--तथा; चकोरैः--चकोर नामक पक्षियों से; वल्गु--मनोहर; कूजितम्‌--पक्षियों काकलरव।

बिन्दु-सरोवर कदम्ब, चम्पक, अशोक, करंज, बकुल, आसन, कुन्द, मन्दार,कुटज तथा नव-आम्र के पुष्पित वृक्षों से सुशोभित था।

वायु कारण्डव, प्लव, हंस,कुररी, जलपक्षी, सारस, चक्रवाक तथा चकोर के कलरव से गुँजायमान थे।

तथेव हरिणै: क्रोडै: श्राविदगवयकुझ्जरैः ।

गोपुच्छैहरिभिर्मकैर्नकुलै्नाभिभि्वृतम्‌ ॥

४४॥

तथा एव--उसी प्रकार; हरिणैः--हिरनों से; क्रोडैः--सुअरों से; श्रावित्‌ू--साही; गवय--नील गाय; कुझरैः--हाथियों से; गोपुच्छै: --लंगूरों से; हरिभि:--सिंहों से; मर्के:--बन्दरों से; नकुलैः--नेवलों से; नाभिभि:--कस्तूरी मृगसे; वृतम्‌ू-घिरा हुआ।

इसके तटों पर हिरन, सूकर, साही, नीलगाय, हाथी, लंगूर, शेर, बन्दर, नेवला तथाकस्तूरी मृगों की बहुलता थी।

प्रविश्य तत्तीर्थवरमादिराज: सहात्मजःददर्श मुनिमासीनं तस्मिन्हुतहुताशनम्‌ ।

विद्योतमानं वपुषा तपस्युग्रयुजा चिरम्‌ ॥

४५॥

नातिक्षामं भगवतः स्निग्धापाड्रावलोकनात्‌ ।

तद्व्याहतामृतकलापीयूषश्रवणेन च ॥

४६॥

प्रांशुं पदयापलाशाक्ष॑ जटिलं चीरवाससम्‌ ।

उपसंश्रित्य मलिनं यथाईणमसंस्कृतम्‌ ॥

४७॥

प्रविश्य-- प्रवेश करने पर; तत्‌--उस; तीर्थ-वरम्‌--पवित्र स्थलों में श्रेष्ठ आदि-राज:--प्रथम राजा स्वायंभुवमनु ; सह-आत्मज: --अपनी पुत्री के समेत; ददर्श--देखा; मुनिमू--मुनि को; आसीनम्‌--बैठे हुए; तस्मिनू--उसआश्रम में; हुत--आहुति करते हुए; हुत-अशनम्‌--पवित्र अग्नि; विद्योतमानम्‌--परम ज्योतिमान; वपुषा-- अपनेशरीर से; तपसि--तपस्या में; उग्र--कठिन; युजा--योग में लगे; चिरम्‌--दीर्घकाल से; न--नहीं; अतिक्षामम्‌ --अत्यन्त दुर्बल; भगवतः -- भगवान्‌ की; स्निग्ध--स्नेहिल; अपाड़--तिरछी; अवलोकनातू्‌--चितवन से; तत्‌--उसका; व्याहत--शब्दों से; अमृत-कला--चन्द्रमा के समान; पीयूष--अमृत; श्रवणेन--सुनकर; च--तथा;प्रांशुम्‌-- लम्बा; पद्य--कमल-पुष्प; पलाश--पंखुड़ी; अक्षम्‌--आँखें; जटिलम्‌-- जुड़ा; चीर-वाससम्‌--चिथड़ेवस्त्र धारण किये; उपसंभ्रित्य--निकट जाकर; मलिनम्‌--मलिन, गंदा; यथा--जिस प्रकार; अर्हणम्‌--मणि;असंस्कृतम्‌ू--बिना तराशा हुआ

उस पवित्र स्थान में आदि राजा स्वयांभुव मनु अपनी पुत्री सहित प्रविष्ट हुए औरउन्होंने जाकर देखा कि अभी-अभी पवित्र अग्नि में आहुति देकर वे मुनि अपने आश्रम मेंआसन लगाए थे।

उनका शरीर अत्यन्त आभावान था।

यद्यपि वे दीर्घ काल तक कठोरतपस्या में लगे हुए थे, किन्तु वे तनिक भी क्षीण नहीं थे, क्योंकि भगवान्‌ ने उन परकृपा-कटाक्ष किया था और उन्होंने भगवान्‌ के चन्द्रमा के समान स्निग्ध अमृतमय शब्दोंका पान किया था।

मुनि लम्बे थे, उनकी आँखें बड़ी-बड़ी थीं मानो कमल-दल हों औरउनके सिर पर जटा-जूट था।

वे चिथड़े पहने थे।

स्वायंभुव मनु उनके पास गये औरउन्होंने देखा कि वे धूलधूसरित हैं मानो बिना तराशा हुआ कोई मणि हो।

अथोटजमुपायातं नृदेवं प्रणतं पुर: ।

सपर्यया पर्यगृह्लात्प्रतिनन्द्यानुरूपया ॥

४८॥

अथ--तब; उटजम्‌--कुटी, आश्रम; उपायातम्‌--पहुँचकर; नृदेवम्‌--राजा; प्रणतम्‌--नतमस्तक; पुर:--सामने;सपर्यया--आदर से; पर्यगृह्मात्‌--उसका स्वागत किया; प्रतिनन्द्य--सत्कार करके; अनुरूपया--राजा के योग्य

राजा को अपने आश्रम में आकर प्रणाम करते देखकर उस मुनि ने आशीर्वाद देकरसत्कार किया और यथोचित सम्मान सहित उसका स्वागत किया।

गृहीताईणमासीनं संयतं प्रीणयन्मुनि: ।

स्मरन्भगवदादेशमित्याह इलक्ष्णया गिरा ॥

४९॥

गृहीत--प्राप्त करके; अर्हणम्‌ू--सम्मान; आसीनम्‌--बैठा हुआ; संयतम्‌--शान्त; प्रीणयन्‌-- प्रमुदित करता;मुनिः--मुनि; स्मरन्‌--स्मरण करते हुए; भगवत्‌-- भगवान्‌ की; आदेशम्‌-- आज्ञा; इति--इस प्रकार; आह--बोला;एलक्ष्णया--मीठी; गिरा-- वाणी से |

मुनि से सम्मान पाकर राजा स्वयांभुव मनु बैठ गये और शान्त बने रहे।

तब भगवान्‌की आदेशों का स्मरण करते हुए कर्दम मुनि अपनी मधुर वाणी से राजा को प्रमुदितकरते हुए इस प्रकार बोले।

नूनं चड्क्रमणं देव सतां संरक्षणाय ते ।

वधाय चासतां यस्त्वं हरे: शक्तिहिं पालिनी ॥

५०॥

नूनमू--निश्चय ही; चड्क्रमणम्‌--यात्रा; देव--हे भगवान्‌; सतामू--सज्जनों की; संरक्षणाय--रक्षा के लिए; ते--तुम्हारा; वधाय--मारने के लिए; च--तथा; असताम्‌--असुरों को; यः--जो पुरुष; त्वम्‌--तुम; हरे: -- श्री भगवान्‌की; शक्ति:--शक्ति; हि-- चूँकि; पालिनी--रक्षा करते हुए।

हे भगवान्‌, आपका यह भ्रमण यात्रा निश्चित रूप से सज्जनों की रक्षा तथा असुरोंके वध के उद्देश्य से सम्पन्न हुआ है, क्योंकि आप श्री हरि की रक्षक-शक्ति से समन्वितहैं।

योऊर्केन्द्रग्नीन्द्रवायूनां यमधर्मप्रचेतसाम्‌ ।

रूपाणि स्थान आधत्से तस्मै शुक्लाय ते नम: ॥

५१॥

यः--जो; अर्क--सूर्य का; इन्दु--चन्द्रमा का; अग्नि--अग्नि, अग्निदेव का; इन्द्र--स्वर्ग के स्वामी, इन्द्र का;वायूनामू--वायु का; यम--यम का; धर्म--धर्म; प्रचेतसामू--तथा वरुण का; रूपाणि--रूप; स्थाने--आवश्यकतानुसार; आधत्से-- धारण करते हो; तस्मै-- उसे; शुक्लाय-- भगवान्‌ विष्णु को; ते--तुमको; नम:--नमस्कार

जब भी आवश्यक होता है, आप सूर्य, चन्द्र, अग्नि, इन्द्र, वायु, यम, धर्म, वरुणका अंश धारण करते हैं।

आप भगवान्‌ विष्णु के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं हैं, अतःआपको सभी प्रकार से नमस्कार है।

न यदा रथमास्थाय जैत्र॑ं मणिगणार्पितम्‌ ।

विस्फूर्जच्चण्डकोदण्डो रथेन त्रासयन्नघान्‌ ॥

५२॥

स्वसैन्यचरणक्षुण्णं वेपयन्मण्डलं भुव: ।

विकर्षन्बृहतीं सेनां पर्यटस्यंशुमानिव ॥

५३॥

तदैव सेतवः सर्वे वर्णाअ्रमनिबन्धना: ।

भगवद्रचिता राजन्भिद्येरन्बत दस्युभि: ॥

५४॥

न--नहीं; यदा--जब; रथम्‌ू--रथ; आस्थाय--चढ़कर; जैत्रमू--विजयी; मणि--मणियों के; गण--समूह सहित;अर्पितम्‌--सज्जित; विस्फूर्जत्‌ू--टंकार करते; चण्ड--घोर शब्द; कोदण्ड: -- धनुष; रथेन--ऐसा रथ होने से;त्रासबन्‌--डराते हुए; अधान्‌ू--समस्त अपराधियों को; स्व-सैन्य--अपने सैनिकों के; चरण--पाँव से; क्षुणणम्‌--मर्दित, कुचला; वेपयन्‌--हिलाते हुए; मण्डलम्‌ू--गोलक; भुवः--पृथ्वी का; विकर्षन्‌ू--पथ प्रदर्शन करते;बृहतीम्‌--विशाल; सेनामू--सेना; पर्यटसि--घूम रहा हो; अंशुमान्‌ू--चमकीले सूर्य; इब--सहृश; तदा--तब;एव--निश्चय ही; सेतव:--धार्मिक आचार संहिता; सर्वे--सभी; वर्ण--वर्णो जातियों की; आश्रम--आ श्रमों की;निबन्धना: --मर्यादा, बन्धन; भगवत्‌-- भगवान्‌ के द्वारा; रचिता:--उत्पन्न; राजन्‌ू--हे राजा; भिद्येरन्‌ू--तोड़ डालेजाऐंगे; बत--हाय; दस्युभि:--बदमाशों के द्वारा।

यदि आप अपने विजयी रत्नजटित रथ पर जिसकी उपस्थिति मात्र से अपराधीभयभीत हो उठते हैं सवार न हों, यदि आप अपने धनुष की प्रचंड टंकार न करें और यदिआप तेजवान सूर्य की भाँति संसार भर में एक विशाल सेना लेकर विचरण न करेंजिसके पदाघात से पृथ्वी मंडल हिलने लगती है, तो स्वंय भगवान्‌ द्वारा बनाई गई समस्तवर्णो तथा आश्रमों की व्यवस्था चोरों तथा डाकुओं द्वारा छिन्न-भिन्न हो जाय।

अधर्मश्न समेधेत लोलुपैर्व्यड्डु शैननभि: ।

शयाने त्वयि लोकोयं दस्युग्रस्तो विनड्क्ष्यति ॥

५५॥

अधर्म:--अधर्म, अनाचार; च--तथा; समेधेत--उन्नति करेगा; लोलुपैः--धन के लालची; व्यह्ठु शै:-- अनियन्त्रित;नृभि:--मनुष्यों द्वारा; शयाने त्वयि--तुम्हारे लेट जाने पर; लोक:--संसार; अयम्‌--यह; दस्यु--दुराचारियों के द्वारा;ग्रस्त:--आक्रमण किये जाने पर; विनड्छ््यति--विनष्ट हो जाएगा।

यदि आप संसार की स्थिति के विषय में सोचना छोड़ दें निश्चिन्त हो जायेँ तोअधर्म बढ़ेगा, क्योंकि धनलोलुप व्यक्ति निद्द्न्द् हो जाएँगे।

ऐसे दुराचारियों के आक्रमणोंसे यह संसार विनष्ट हो जाएगा।

अथापि पृच्छे त्वां वीर यदर्थ त्वमिहागत: ।

तद्गयं निर्व्यलीकेन प्रतिपद्यामहे हृदा ॥

५६॥

अथ अपि--इतने पर भी; पृच्छे--मैं पूछता हूँ; त्वाम्‌ू--तुमसे; वीर--हे पराक्रमी राजा; यत्‌-अर्थम्‌--प्रयोजन;त्वमू--तुम; इहह--यहाँ; आगत:ः--आये हो; तत्‌--वह; वयम्‌--हम सब; निर्व्यलीकेन--बिना हिचक के;प्रतिपद्यामहे -- पूरा करेंगे; हृदा--हृदय से |

तो भी, हे पराक्रमी राजा, मैं आपसे यहाँ आने का कारण पूछ रहा हूँ।

वह चाहे जोभी हो, हम बिना हिचक के उसको पूरा करेंगे।

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