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अध्याय बाईसवाँ: कर्दम मुनि और देवहुति का विवाह
3.22मैत्रेय उवाचएवमाविष्कृताशेषगुणकर्मोदयो मुनिम् ।
सत्रीड इव त॑सप्राडुपारतमुवाच ह ॥
१॥
मैत्रेय:--महान् साधु मैत्रेय ने; उबाच--कहा; एवम्--इस प्रकार; आविष्कृत--वर्णन कर लेने के पश्चात्; अशेष--समस्त; गुण--विशेषताओं की; कर्म--कार्यो की; उदय: --महानता; मुनिम्--महर्षि; स-ब्रीड:--संकोचवश; इब--मानो; तम्--वह कर्दम ; सम्राट्ू--राजा मनु; उपारतमू--मौन; उवाच ह--बोला |
श्रीमैत्रेय ने कहा--सम्राट के अनेक गुणों तथा तथा कार्यों की महानता का वर्णनकरने के पश्चात् मुनि शान्त हो गये और राजा ने संकोचवश उन्हें इस प्रकार से सम्बोधितकिया।
मनुरुवाचब्रह्मासृजत्स्वमुखतो युष्मानात्मपरीप्सया ।
छन््दोमयस्तपोविद्यायोगयुक्तानलम्पटान् ॥
२॥
मनु:--मनु ने; उवाच--कहा; ब्रह्मा--ब्रह्माजी ने; असृजत्--उत्पन्न किया; स्व-मुखतः--अपने मुख से; युष्मान्--आपको ब्राह्मणों को ; आत्म-परीप्सबा--अपनी रक्षा के लिए विस्तार करके ; छन्दः-मय:--वेदरूप; तपः-विद्या-योग-युक्तानू--तप, ज्ञान तथा योग से युक्त; अलम्पटानू--इन्द्रिय-तृप्ति से विमुख |
मनु ने कहा--वेदस्वरूप ब्रह्मा ने वैदिक ज्ञान के विस्तार हेतु अपने मुख से आप जैसेब्राह्मणों को उत्पन्न किया है, जो तप, ज्ञान तथा योग से युक्त और इन्द्रियतृप्ति से विमुखहैं।
तत्ताणायासूजच्चास्मान्दो:सहस्त्रात्सहसत्रपात् ॥
हृदयं तस्य हि ब्रहा क्षत्रमड़ूं प्रचक्षते ॥
३॥
ततू-त्राणाय--ब्राह्मणों की रक्षा के लिए; असृजत्--उत्पन्न किया; च--तथा; अस्मान्--हमको क्षत्रिय ; दोः-सहस्रात्ू--उनका हजार भुजाओं से; सहस्त्र-पात्--हजार पाँव वाले परम पुरुष विराट रूप ; हदयम्--हृदय;तस्य--उसका; हि--अतः; ब्रह्म--ब्राह्मण; क्षत्रम्--क्षत्रिय; अड्रम्ू-- भुजाएँ; प्रचक्षते--कहे जाते हैं।
ब्राह्मणों की रक्षा के लिए सहस्त्र-पाद विराट पुरुष ने हम क्षत्रियों को अपनी सहस्त्रभुजाओं से उत्पन्न किया।
अतः ब्राह्मणों को उनका हृदय और क्षत्रियों को उनकी भुजाएँकहते हैं।
अतो हान्योन्यमात्मान ब्रह्म क्षत्रं च रक्षतः ।
रक्षति स्माव्ययो देव: स यः सदसदात्मक: ॥
४॥
अतः--अतएव; हि--निश्चय ही; अन्योन्यम्--परस्पर; आत्मानम्--स्वयं; ब्रह्म--ब्राह्मण; क्षत्रम्ू--क्षत्रिय; च--तथा;रक्षतः--रक्षा करते हैं; रक्षति स्म--रक्षा करता है; अव्यय:--निर्विकार; देव: -- भगवान्; सः--वह; य:--जो; सत्ू-असतू-आत्मकः--कार्य-कारण रूप
इसीलिए ब्राह्मण तथा क्षत्रिय एक दूसरे की और साथ ही स्वयं की रक्षा करते हैं।
कार्य-कारण रूप तथा निर्विकार होकर भगवान् स्वयं एक दूसरे के माध्यम से उनकीरक्षा करते हैं।
तब सन्दर्शनादेव चि्छन्ना मे सर्वसंशया: ।
यत्स्वयं भगवान्प्रीत्या धर्ममाह रिरक्षिषो: ॥
५॥
तव--आपके; सन्दर्शनात्ू--दर्शन से; एब--केवल; छिलन्ना:--दूर हो गये; मे--मेरे; सर्व-संशया:--सारे सन्देह;यत्--यहाँ तक कि; स्वयम्--स्वतः; भगवान्--आपने; प्रीत्या--प्रीतीपूर्वक; धर्मम्--कर्तव्य; आह--बतलाया;रिरक्षिषो:--अपनी प्रजा की रक्षा के लिए उत्सुक राजा का।
अब आपके दर्शन मात्र से मेरे सारे सन्देह दूर हो चुके हैं, क्योंकि आपने कृपापूर्वकअपनी प्रजा की रक्षा के लिए उत्सुक राजा के कर्तव्य की सुस्पष्ट व्याख्या की है।
दिष्टय्ा मे भगवान्हष्टो दुर्दशों योकृतात्मनाम् ।
दिष्टयया पादरज: स्पृष्टे शीर्ष्णा मे भवत: शिवम् ॥
६॥
दिछ्या--सौभाग्य से; मे--मेरा; भगवान्--सर्व शक्तिमान; दृष्ट:--देखा जाता है; दुर्दर्शः--सरलता से न दिखनेवाला; यः--जो; अकृत-आत्मनाम्--जिन्होंने अपने मन तथा इन्द्रियों को वश में नहीं किया; दिछ्यया--अपने भाग्य से;'पाद-रज:--पैरों की धूलि; स्पृष्टम्ू--स्पर्श करने पर; शीर्ष्णा--शिर से; मे--मेरा; भवत:--आपका; शिवम्--कल्याणकारी
यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे आपके दर्शन हो सके क्योंकि जिन लोगों ने अपने मन तथा इन्द्रियों को वश में नहीं किया उन्हें आपके दर्शन दुर्लभ हैं।
मैं आपके चरणों कीधूलि को शिर से स्पर्श करके और भी कृतकृत्य हुआ हूँ।
दिष्टया त्वयानुशिष्टो हं कृतश्चानुग्रहो महान् ।
अपावृतै: कर्णरन्श्रेर्जुष्टा दिष्ठयोशतीर्गिर: ॥
७॥
दिष्टयया--सौभाग्यवश; त्वया--तुम्हारे द्वारा; अनुशिष्ट: --उपदेशित; अहम्--मैं; कृत:-- प्रदान किया हुआ; च--और;अनुग्रह:--कृपा; महान्ू--महान; अपावृतैः--खुले; कर्ण-रन्श्रै:--कानों के छिद्रों से; जुष्टा:--ग्रहण किया गया;दिछ्वा-- भाग्य से; उशती:--शुद्ध; गिर: --शब्द |
सौभाग्य से मुझे आपके द्वारा उपदेश प्राप्त हुआ है और इस प्रकार आपने मेरे ऊपरमहती कृपा की है।
मैं भगवान् को धन्यवाद देता हूँ कि मैं अपने कान खोलकर आपकेविमल शब्दों को सुन रहा हूँ।
स भवान्दुहितृस्नेहपरिक्लिष्टात्मनो मम ।
श्रोतुमहसि दीनस्य श्रावितं कृपया मुने ॥
८॥
सः--आप; भवान्--आप; दुहितृ-स्नेह--अपनी पुत्री के स्नेहवश; परिक्लिष्ट-आत्मन:--क्षुब्ध मन वाला; मम--मेरा; श्रोतुमू--सुनने के लिए; अर्हसि--प्रसन्न हों; दीनस्य--मुझ दीन की; श्रावितम्--प्रार्थना को; कृपया--कृपापूर्वक; मुने--हे मुनिहे मुनि, कृपापूर्वक मुझ दीन की प्रार्थना सुनें, क्योंकि मेरा मन अपनी पुत्री के स्नेहसे अत्यन्त उद्दिग्न है।
प्रियव्रतोत्तानपदो: स्वसेयं दुहिता मम ।
अन्विच्छति पतिं युक्त वव:शीलगुणादिभि: ॥
९॥
प्रियत्रत-उत्तानपदो:--प्रियव्रत तथा उत्तानपद की; स्वसा--बहन; इयम्--यह; दुहिता--पुत्री; मम--मेरी;अन्विच्छति--खोज रही है; पतिम्ू--पति या वर; युक्तम्--अनुकूल; वयः-शील-गुण-आदिभि:-- आयु, चरित्र, गुणआदि से।
मेरी पुत्री प्रियत्रत तथा उत्तानपाद की बहन है।
वह आयु, शील, गुण आदि में अपने अनुकूल पति की तलाश में है।
यदा तु भवतः शीलश्रुतरूपवयोगुणान् ।
अश्रुणोन्नारदादेषा त्वय्यासीत्कृतनिश्चया ॥
१०॥
यदा--जब; तु-- लेकिन; भवतः--तुम्हारा; शील--उत्तम चरित्र; श्रुत--विद्या; रूप--सुन्दर आकार, सूरत; वय:--युवावस्था; गुणान्--गुण; अश्रणोत्--सुना; नारदात्--नारद मुनि से; एघा--देवहूति ने; त्वयि--तुममें; आसीत्--होगयी; कृत-निश्चया-- हृढ़ संकल्प |
जब से इसने नारद मुनि से आपके उत्तम चरित्र, विद्या, रूप, वय आयु तथा अन्यगुणों के विषय में सुना है तब से यह अपना मन आपमें स्थिर कर चुकी है।
तत्प्रतीच्छ द्विजाछयेमां श्रद्धयोपहतां मया ।
सर्वात्मनानुरूपां ते गृहमेधिषु कर्मसु ॥
११॥
तत्--अतः; प्रतीच्छ--कृपया स्वीकार करें; द्विज-अछय--हे ब्राह्मण श्रेष्ठ; इमामू--इसको; श्रद्धया-- श्रद्धा से;उपहताम्--भेंट स्वरूप प्रदत्त; मया--मेरे द्वारा; सर्व-आत्मना--सब प्रकार से; अनुरूपाम्--उपयुक्त; ते--तुम्हारेलिए; गृह-मेधिषु --गृहस्थी में; कर्मसु--कर्म, कर्तव्य |
अतः हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, आप इसे स्वीकार करें, क्योंकि मैं इसे श्रद्धापूर्वक अर्पित कररहा हूँ।
यह सभी प्रकार से आपकी पत्नी होने और आपकी गृहस्थी के कार्यों को चलानेमें सर्वथा योग्य है।
उद्यतस्य हि कामस्य प्रतिवादो न शस्यते ।
अपि निर्मुक्तसड्स्स्थ कामरक्तस्य कि पुनः ॥
१२॥
उद्यतस्य--स्वयं प्राप्त; हि--निस्सन्देह; कामस्य-- भौतिक इच्छा का; प्रतिवाद:--निरादर; न--नहीं; शस्यते--प्रशंसनीय; अपि--यद्यपि; निर्मुक्त--स्वतन्त्र; सड्रस्य--आसक्ति का; काम--इन्द्रिय-सुख के प्रति; रक्तस्य--आसक्तका; किम् पुनः--क्या कहना है।
स्वतः प्राप्त होने वाली भेंट का निरादर नितान्त विरक्त पुरुष के लिए भी प्रशंसनीयनहीं है, फिर विषयासक्त के लिए तो कहना ही क्या है।
य उद्यतमनाहत्य कीनाशमभियाचते ।
क्षीयते तद्यशः स्फीतं मानश्वावज्ञया हतः ॥
१३॥
यः--जो; उद्यतम्-भेंट; अनाहत्य-- अनादर करके; कीनाशम्--कंजूस से; अभियाचते--याचना करता है;क्षीयते--नष्ट होता है; तत्ू--उसका; यशः--कीर्ति; स्फीतम्ू--विस्तीर्ण; मान: --सम्मान; च--तथा; अवज्ञया--अवमानना से; हतः--नष्ट।
जो स्वतः प्राप्त भेंट का पहले अनादर करता है और बाद में कंजूस से वर माँगता है,वह अपने विस्तीर्ण यश को खो देता है और अन्यों द्वारा अवमानना से उसका मान भंगहोता है।
अहं त्वाश्रुणवं विद्वन्विवाहार्थ समुद्यतम् ।
अतत्त्वमुपकुर्वाण: प्रत्तां प्रतिगृहाण मे ॥
१४॥
अहमू--ैंने; त्वा--तुमको; अश्रृणवम्--सुना; विद्वन्ू--हे बुद्धिमान पुरुष; विवाह-अर्थम्--विवाह हेतु; समुद्यतम्--तैयार; अत:--अतएव; त्वमू--तुम; उपकुर्वाण:--आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत न लेने के कारण; प्रत्तामू-- भेंट कियागया; प्रतिगृहाण-- कृपया स्वीकार कीजिये; मे--मेरा |
स्वायंभुव मनु ने कहा-हे विद्वान, मैंने सुना है कि आप ब्याह के इच्छुक हैं।
कृपयामेरे द्वारा दान में दी जाने वाली अर्पित कन्या को स्वीकार करें, क्योंकि आपनेआजीवन ब्रह्माचर्य का व्रत नहीं ले रखा है।
ऋषिरुवाचबाढसमुद्बोढुकामोहमप्रत्ता च तवात्मजा ।
आवयोरनुरूपो सावाद्यो वैवाहिको विधि: ॥
१५॥
ऋषि: --परम साधु कर्दम ने; उवाच--कहा; बाढम्--एवमस्तु; उद्बेढु-काम: --विवाह का इच्छुक; अहम्-ैं;अप्रत्ता--अन्य किसी से वचनबद्ध न होना; च--तथा; तब--तुम्हारी; आत्म-जा--पुत्री; आवयो:--हम दोनों का;अनुरूप:--उपयुक्त; असौ--यह; आद्य:-- प्रथम; वैवाहिक:--विवाह का; विधि:--अनुष्ठान ।
महामुनि ने उत्तर दिया--निस्सन्देह मैं विवाह का इच्छुक हूँ और आपकी कन्या ने नकिसी से विवाह किया है और न ही किसी दूसरे को वचन दिया है।
अतः वैदिक पद्धतिके अनुसार हम दोनों का विवाह हो सकता है।
कामः स भूयात्ररदेव तेउस्याःपुत्रया: समाम्नायविधौ प्रतीत: ।
क एव ते तनयां नाद्रवियेतस्वयैव कान्त्या क्षिपतीमिव अियम् ॥
१६॥
काम:ः--इच्छा; सः--वह; भूयात्--पूरी हो; नर-देव--हे राजा; ते--तुम्हारी; अस्या:--इस; पुत्र्या:--पुत्री का;समाम्नाय-विधौ--वेदोक्त विधि से; प्रतीत:--मान्य; क:ः--कौन; एव--निस्सन्देह; ते--तुम्हारी; तनयाम्--पुत्री को;न आद्रियेत--आदर पूजा नहीं करेगा; स्वया--अपने से; एब--अकेले; कान्त्या--देह की कान्ति आभा ;क्षिपतीम्--तिरस्कृत करती; इब--मानो; थ्रियम्ू--आभूषण |
आप अपनी पुत्री की, वेदों द्वारा स्वीकृत विवाह-इच्छा की पूर्ति करें।
उसको कौननहीं ग्रहण करना चाहेगा? वह इतनी सुन्दर है कि उसकी शारीरिक कान्ति ही उसकेआभूषणों की सुन्दरता को मात कर रही है।
यां हर्म्यपृष्ठे क्वणदड्प्रिशोभांविक्रीडतीं कन्दुकविहलाक्षीम् ।
विश्वावसुन्यपतत्स्वाद्विमाना-द्विलोक्य सम्मोहविमूढचेता: ॥
१७॥
याम्--जिसको; हर्म्य-पूष्ठे--राज प्रासाद की छत पर; क्वणत्-अड्प्रि-शो भाम्--उसके चरणों के नूपरों की ध्वनि सेजिसकी सुन्दरता बढ़ी हुई हैं; विक्रीडतीम्--खेलती हुईं; कन्दुक-विह्ल-अक्षीम्--मोहित नेत्रों से अपनी गेंद का पीछाकरती; विश्वावसु:--विश्वावसु; न्यपतत्--गिर पड़ा; स्वात्-- स्वतः; विमानातू--विमान से; विलोक्य--देखकर;सम्मोह-विमूढ-चेता:--जिसका मन सम्मोहित था
मैंने सुना है कि आपकी कन्या को महल की छत पर गेंद खेलते हुए देखकर महान्गन्धर्व विश्वावसु मोहवश अपने विमान से गिर पड़ा, क्योंकि वह अपने नूपुरों की ध्वनितथा चञ्जल नेत्रों के कारण अत्यन्त सुन्दरी लग रही थी।
तां प्रार्थयन्तीं ललनाललाम-मसेवितश्रीचरणैरदृष्टाम् ।
वत्सां मनोरुच्यपद: स्वसारंको नानुमन्येत बुधोडभियाताम् ॥
१८॥
ताम्--उसको; प्रार्थथन्तीम्--खोजती हुई; ललना-ललामम्--स्त्रियों के आभूषण; असेवित-श्री-चरणै: --जिन्होंनेलक्ष्मी के चरणों की पूजा नहीं की, उनके द्वारा; अद्ृष्टामू-न देखी गई; बत्साम्ू--लाड़ली पुत्री को; मनो: --स्वायं भुवमनु की; उच्चपद:--उत्तानपाद की; स्वसारम्--बहन; कः--क्या; न अनुमन्येत-- आदर नहीं करेगा; बुध: --बुद्धिमान; अभियाताम्--स्वेच्छा से आई हुईं
ऐसा कौन है, जो स्त्रियों में शिरोमणि, स्वायंभुव मनु की पुत्री और उत्तानपाद कीबहन का समादर नहीं करेगा ? जिन लोगों ने कभी श्रीलक्ष्मी जी के चरणों की पूजा नहीं की है, उन्हें तो इसका दर्शन तक नहीं हो सकता, फिर भी यह स्वेच्छा से मेरी अर्द्धांगिनीबनने आई है।
अतो भजिष्ये समयेन साध्वींयावत्तेजो बिभूयादात्मनो मे ।
अतो धर्मान्पारमहंस्यमुख्यान्शुक्लप्रोक्तान्बहु मन्येउविहिंस्त्रानू ॥
१९॥
अतः--अतएव; भजिष्ये--मैं स्वीकार करूँगा; समयेन--शर्त के साथ; साध्वीम्--कुमारी को; यावत्--जब तक;तेज:--वीर्य; बिभूयात्-- धारण करे; आत्मन:--मेरे शरीर से; मे--मेरे; अत:--तत्पश्चात्; धर्मानू--कर्तव्य;पारमहंस्य-मुख्यान्-- श्रेष्ठ परम हंसों का; शुक्ल-प्रोक्तानू-- भगवान् विष्णु द्वारा बताये; बहु--अधिक; मन्ये--मैंविचार करूँगा; अविहिंस्रानू-द्वेष से रहित होकर |
अतः इस कुँवारी को मैं अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करूँगा, किन्तु इस शर्त केसाथ कि जब यह मेरा वीर्य धारण कर चुकेगी तो मैं परम सिद्ध पुरुषों के समान भक्ति-योग को स्वीकार करूँगा।
इस विधि को भगवान् विष्णु ने बताया है और यह द्वेष रहितहै।
यतोभवद्विश्वमिदं विचित्रसंस्थास्यते यत्र च वावतिष्ठते ।
प्रजापतीनां पतिरेष महांपरं प्रमाणं भगवाननन्तः ॥
२०॥
यतः--जिससे; अभवत्-- प्रकट हुआ; विश्वम्--सृष्टि; इदम्--यह; विचित्रम्ू-- आश्चर्यजनक; संस्थास्यते--विलीनहो जावेगा; यत्र--जिसमें; च--यथा; वा--या; अवतिष्ठते--इस समय उपस्थित है; प्रजा-पतीनाम्ू--प्रजापतियों का;'पतिः--भगवान्; एक: --यह; महामम्--मुझको; परम्--सर्वोच्च; प्रमाणम्-- प्रमाण; भगवानू--परमे श्वर; अनन्त: --असीम
मेरे लिए तो सर्वोच्च अधिकारी अनन्त श्रीभगवान् हैं जिनसे यह विचित्र सृष्टि उद्भूतहोती है और जिन पर इसका भरण तथा विलय आश्रित है।
वे उन समस्त प्रजापतियों केमूल हैं, जो इस संसार में जीवात्माओं को उत्पन्न करने वाले महापुरुष हैं।
मैत्रेय उबाच स उग्रधन्वन्नियदेवाबभाषे आसीच्च तृष्णीमरविन्दनाभम् ।
धियोपगृह्नन्स्मितशोभितेन मुखेन चेतो लुलुभे देवहूत्या: ॥
२१॥
मैत्रेय:--ऋषि मैत्रेय ने; उवाच--कहा; सः--वह कर्दम ; उग्र-धन्वन्--हे योद्धा विदुर; इयत्--इतना; एव--ही;आबभाषे--बोला; आसीत्--हो गया; च--यथा; तृष्णीम्--मौन; अरविन्द-नाभम्-- भगवान् विष्णु जिनकी नाभिकमल से भूषित है ; धिया--विचार से; उपगृहन्--पकड़ते हुए; स्मित-शोभितेन--अपनी मुस्कान से सुशोभित;मुखेन--अपने मुखमण्डल से; चेत:--मन; लुलुभे--मोहित हो गया; देवहूत्या: --देवहूति के |
श्री मैत्रेय ने कहा-हे योद्धा विदुर, कर्दम मुनि ने केवल इतना ही कहा औरकमलनाभ पूज्य भगवान् विष्णु का चिन्तन करते हुए वह मौन हो गये।
वे उसी मौन मेंहँस पड़े जिससे उनके मुखमण्डल पर देवहूति आकृष्ट हो गई और वह मुनि का ध्यानकरने लगी।
सोनु ज्ञात्वा व्यवसितं महिष्या दुहितुः स्फुटम् ।
तस्मै गुणगणाढ्याय ददौ तुल्यां प्रहर्षित: ॥
२२॥
सः--वह सप्राट मनु ; अनु--तदनन्तर; ज्ञात्वा--जानकर; व्यवसितम्--हृढ़ संकल्प; महिष्या:--रानी का;दुहितुः:--अपनी पुत्री का; स्फुटम्-स्पष्ट रूप से; तस्मै--उसको; गुण-गण-आढ्याय--अनेक गुणों से सम्पन्न;ददौ--अर्पित कर दिया; तुल्यामू--समान, सम गुणों में ; प्रहर्षित:--अत्यधिक प्रसन्न |
रानी शतरूपा तथा देवहूति दोनों के दृढ़ संकल्प को स्पष्ट रुप से जानलेने परसम्राट मनु ने अपनी पुत्री को समान गुणों से युक्त मुनि कर्दम को अर्पित करदिया।
शतरूपा महाराज्ञी पारिबर्हन्महाधनान् ।
दम्पत्यो: पर्यदात्प्रीत्या भूषावास: परिच्छदान् ॥
२३॥
शतरूपा--शतरूपा; महा-राज्ञी--महारानी; पारिबर्हानू-- दहेज; महा-धनान्-- बहुमूल्य भेंट; दम्-पत्यो: --वर-वधूको; पर्यदात्--दिया; प्रीत्या--प्रेमपूर्वक; भूषा-- आभूषण; वास:--वस्त्र; परिच्छदान्--गृहस्थी की वस्तुएँ।
महारानी शतरूपा ने बर-वधू बेटी-दामाद को प्रेमपूर्वक्क अवसर के अनुकूलअनेक बहुमूल्य भेंटें, यथा आभूषण, वस्त्र तथा गृहस्थी की वस्तुएँ प्रदान कीं।
प्रत्तां दुहितरं सम्राट्सदक्षाय गतव्यथः ।
उपगुह्ा च बाहुभ्यामौत्कण्ठ्योन्मधिताशय: ॥
२४॥
प्रत्तामू--दान दी गई; दुहितरम्--कन्या को; सप्राटू--राजा मनु ; सहक्षाय--उपयुक्त व्यक्ति को; गत-व्यथ:-- भारसे मुक्त; उपगुहा--चूमकर; च--तथा; बाहुभ्याम्-- अपने दोनों हाथों से; औत्कण्ठ्य-उन्मधित-आशय: --अत्यन्तउत्सुक एवं क्षुब्ध मन |
इस प्रकार अपनी पुत्री को योग्य वर को प्रदान करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्तहोकर स्वायंभुव मनु का मन वियोग के कारण विचलित हो उठा और उन्होंने अपनीप्यारी पुत्री को दोनों बाहों में भर लिया।
अशबनुवंस्तद्विरहं मुझ्नन्बाष्पकलां मुहुः ।
आसिज्ञदम्ब वत्सेति नेत्रोदैर्दुहिितु: शिखा: ॥
२५॥
अशक्नुवन्--न सह सकने के कारण; ततू-विरहम्ू--उसका वियोग; मुझ्नन्ू--गिराते हुए; बाष्प-कलाम्-- आँसू;मुहुः--पुनः पुनः; आसिश्ञत्ू-- भीग गया; अम्ब--मेरी माता; वत्स--मेरी प्रिय पुत्री; इति--इस प्रकार; नेत्र-उदैः--नेत्रों के जल से; दुहितु:ः--अपनी पुत्री का; शिखा:--बालों का गुच्छा।
सप्राट अपनी पुत्री के वियोग को न सह सके, अतः उनके नेत्रों से बारम्बार अश्रुझरने लगे और उनकी पुत्री का सिर भीग गया।
वे विलख पड़े 'मेरी माता, मेरी प्यारी बेटी।
'" आमन्त्रय तं मुनिवरमनुज्ञात: सहानुगः ।
प्रतस््थे रथमारुह्य सभार्य: स्वपुरं नृप: ॥
२६॥
उभयोरृषिकुल्याया: सरस्वत्या: सुरोधसो: ।
ऋषीणामुपशान्तानां पश्यन्ना भ्रमसम्पद: ॥
२७॥
आमन््य--जाने की अनुमति लेकर; तम्--उससे; मुनि-वरम्--मुनियों में श्रेष्ठ, कर्दम से; अनुज्ञात:--जाने कीअनुमति पाकर; सह-अनुग: -- अपने सेवकों सहित; प्रतस्थे--प्रस्थान किया; रथम् आरुह्म --रथ में चढ़कर; स-भार्य:--अपनी पत्नी के साथ; स्व-पुरम्--अपनी राजधानी को; नृप:--राजा; उभयो: --दोनों पर; ऋषि-कुल्याया:--ऋषियों को स्वीकार्य; सरस्वत्या:--सरस्वती नदी का; सु-रोधसो: --सुहावने किनारे; ऋषीणाम्--ऋषियों का; उपशान्तानामू--शान्त; पश्यनू--देखते हुए; आश्रम-सम्पद:--सुन्दर आश्रम की समृद्धि
तब महर्षि से आज्ञा लेते हुए और उनकी अनुमति पाकर राजा अपनी पत्नी के साथरथ में सवार हुआ और अपने सेवकों सहित अपनी राजधानी के लिए चल पड़ा।
रास्तेभर वे साधु पुरुषों के लिए अनुकूल सरस्वती नदी के दोनों ओर सुहावने तटों पर उनकेशान्त एवं सुन्दर आश्रमों की समृद्धि को देखते रहे।
तमायान्तमभिप्रेत्य ब्रह्मावर्तात्प्रजा: पतिम् ।
गीतसंस्तुतिवादित्रैः प्रत्युदीयु: प्रहर्षिता: ॥
२८ ॥
तम्--उसको; आयान्तम्--आया हुआ; अभिप्रेत्य--समझ कर; ब्रह्मावर्तातू--ब्रह्मावर्त से; प्रजा:--उसकी प्रजा;पतिम्--अपने स्वामी को; गीत-संस्तुति-वादित्रै:--गीत, स्तुति तथा वाच्यसंगीत से; प्रत्युदीयु:--स्वागत के लिए आगेआये; प्रहर्षिता: -- अत्यधिक प्रसन्न |
राजा का आगमन जानकर उसकी प्रजा अपार प्रसन्नता से ब्रह्मावर्त से बाहर निकलआईं और वापस आते हुए अपने राजा का गीतों, स्तुतियों तथा वाद्य संगीत से सम्मानकिया।
बर्हिष्मती नाम पुरी सर्वसम्पत्समन्विता ।
न्यपतन्यत्र रोमाणि यज्ञस्याडुं विधुन्वतः ॥
२९॥
कुशाः काशास्त एवासन्शश्वद्धरितवर्चस: ।
ऋषयो ये: पराभाव्य यज्ञघ्नान्यज्ञमीजिरे ॥
३०॥
बर्हिष्मती--बर्हिष्मती; नाम--नामक; पुरी--नगरी; सर्व-सम्पत्--सभी प्रकार की सम्पदा; समन्विता--से पूर्ण;न्यपतनू--गिर पड़े; यत्र--जहाँ; रोमाणि--बाल रोएँ ; यज्ञस्थ-- भगवान् शूकर के; अड्रम्--शरीर; विधुन्बत: --हिलाने पर; कुशा:--कुश एक घास ; काशा:--काँस एक घास ; ते--वे; एब--निश्चय ही; आसनू--हो गया;शश्वत्-हरित--सदाबहार का; वर्चस:ः--रंग का; ऋषय: --ऋषिगण; यै:--जिससे; पराभाव्य--हराकर; यज्ञ-घ्नानू--यज्ञ में बाधक; यज्ञम्ू-- भगवान् विष्णु; ईजिरे--उन्होंने पूजा की
सभी प्रकार की सम्पदा में धनी बर्दहिष्मती नगरी का यह नाम इसलिए पड़ा, क्योंकि जब भगवान् ने अपने आपको वराह रूप में प्रकट किया, तो भगवान् विष्णु का बाल रोम उनके शरीर से नीचे गिर पड़ा।
जब उन्होंने अपना शरीर हिलाया तो जो बाल नीचे गिरा वह सदैव हरे भरे रहने वाले उन कुश तथा काँस में बदल गया जिनके द्वारा ऋषियोंने भगवान् विष्णु की तब पूजा की थी जब उन्होंने यज्ञों को सम्पन्न करने में बाधा डालनेवाले असुरों को हराया था।
कुशकाशमयं बर्हिरास्तीर्य भगवान्मनु: ।
अयजद्यज्ञपुरुषं लब्धा स्थानं यतो भुवम् ॥
३१॥
कुश--कुश की; काश--तथा काँस की; मयम्--निर्मित; बर्हि:-- आसनी; आस्तीर्य--फैलाकर; भगवान्-- अत्यन्तभाग्यशाली; मनु:--स्वायंभुव मनु ने; अयजत्--पूजा की; यज्ञ-पुरुषम्-- भगवान् विष्णु; लब्धा--प्राप्त किया;स्थानम्--वास, धाम; यत:--जिससे; भुवम्--पृथ्वी |
मनु ने कुश तथा काँस की बनी आसनी बिछाई और श्रीभगवान् की अर्चना कीजिनकी कृपा से उन्हें पृथ्वी मंडल का राज्य प्राप्त हुआ था।
बर्ष्मतीं नाम विभुर्या निर्विश्य समावसत् ।
तसयां प्रविष्टो भवनं तापत्रयविनाशनम् ॥
३२॥
बर्हिष्मतीम्--बर्हिष्मती नगरी में; नाम--नामक; विभु:--परम शक्तिमान स्वायंभुव मनु; याम्ू--जिस; निर्विश्य--प्रवेश करके; समावसत्--पहले रहता था; तस्याम्--उस नगरी में; प्रविष्ट: --प्रवेश किया; भवनम्--महल; ताप-त्रय--तीन प्रकार के ताप; विनाशनम्--नष्ट करते हुए
जिस बर्हिष्मती नगरी में मनु पहले से रहते थे उसमें प्रवेश करने के पश्चात् वे अपनेमहल में गये जो सांसारिक त्रय-तापों को नष्ट करने वाले वातावरण से परिव्याप्त था।
सभार्य: सप्रज: कामान्बुभुजेन्याविरो धतःसड्जीयमानसत्कीर्ति: सस्त्रीभि: सुरगायकै: ।
प्रत्यूषेष्वनुबद्धेन हृदा श्रृण्वन्हे: कथा: ॥
३३॥
स-भार्य:--अपनी पत्नी के सहित; स-प्रज:--अपनी प्रजा के साथ; कामान्ू--जीवन की आवश्यकताएँ; बुभुजे--भोग किया; अन्य--दूसरों से; अविरोधत:--बिना अड़चन के; सड्डरीयमान--प्रशंसित होकर; सत्-कीर्ति: --पुण्यकार्यों के लिए प्रसिद्धि; स-स्त्रीभिः--अपनी-अपनी पत्नियों समेत; सुर-गायकै :--स्वर्गिक गायकों गंधर्वों केद्वारा; प्रति-ऊषेषु-- प्रत्येक उषा प्रात: समय; अनुबद्धेन--बँधा हुआ; हृदा--हृदय से; श्रृण्वन्--सुनते हुए; हरेः--भगवान् की; कथाः:--कथाएँ।
स्वायंभुव मनु अपनी पत्नी तथा प्रजा सहित जीवन का आनन्द उठाते रहे और उन्होंनेधर्म के विरुद्ध अवांछित नियमों से विचलित हुए बिना अपनी इच्छाओं की पूर्ति की।
गन्धर्वगण अपनी भार्याओं सहित सम्राट की कीर्ति का गान करते और सम्राट प्रतिदिनउषाकाल में अत्यन्त प्रेमभाव से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की लीलाओं का श्रवण करतेथे।
निष्णातं योगमायासु मुनि स्वायम्भुवं मनुम् ।
यदाभ्रृंशयितुं भोगा न शेकुर्भगवत्परम् ॥
३४॥
निष्णातम्--लिप्त; योग-मायासु-- क्षणिक सुख में; मुनिम्--मुनि तुल्य; स्वायम्भुवम्-स्वायं भुव; मनुम्--मनु को;यत्--जिससे; आश्रंशयितुमू--विचलित होकर; भोगा: --सांसारिक सुख; न--नहीं; शेकु:--सक्षम थे; भगवत्ू-परम्--भगवान् का परम भक्त
इस प्रकार स्वयंभुव मनु साधु-सदृश राजा थे।
भौतिक सुख में लिप्त रहकर भी वेनिम्नकोटि के जीवन की ओर आकृष्ट नहीं थे, क्योंकि वे निरन्तर कृष्णभावनामृत केवातावरण में भौतिक सुख का भोग कर रहे थे।
अयातयामास्तस्यासन्यामा: स्वान्तरयापना: ।
श्रण्वतो ध्यायतो विष्णो: कुर्वतो ब्रुवबतः कथा: ॥
३५॥
अयात-यामा:--समय व्यर्थ नहीं गया; तस्य--मनु का; आसनू-- थे; यामा: --घंटे; स्व-अन्तर--जीवनकाल;यापना:--व्यतीत करके; श्रुण्वतः --सुनते हुए; ध्यायत:--ध्यान करते; विष्णो: -- भगवान् विष्णु का; कुर्वतः--करतेहुए; ब्रुवतः--बोलते हुए; कथा:--कथाएँ |
फलत: धीरे-धीरे उनके जीवन का अन्त-समय आ पहुँचा आया; किन्तु उनका दीर्घजीवन, जो मन्वन्तर कल्प से युक्त है, व्यर्थ नहीं गया क्योंकि वे सदैव भगवान् कीलीलाओं के श्रवण, चिन्तन, लेखन तथा कीर्तन में व्यस्त रहे।
स एवं स्वान्तरं निन्ये युगानामेकसप्ततिम् ।
वासुदेवप्रसड़ेन परिभूतगतित्रय: ॥
३६॥
सः--उसने स्वायंभुव मनु ने ; एवम्ू--इस प्रकार; स्व-अन्तरमू--अपना काल जीवन ; निनन््ये--बिताया;युगानाम्--चार युगों के चक्रों का; एक-सप्ततिम्--एकहत्तर; वासुदेव--वासुदेव से; प्रसड़ेन--सम्बद्ध कथाओं से;'परिभूत--पार कर गया; गति-त्रयः--तीनों लक्ष्य अवस्थाएँ ।
उन्होंने निरन्तर वासुदेव का ध्यान करते और उन्हीं का गुणानुवाद करते इकहत्तरचतुर्युग ४३,२०,००० वर्ष पूरे किये।
इस प्रकार उन्होंने तीनों लक्ष्यों को पारकर लिया।
शारीरा मानसा दिव्या वैयासे ये च मानुषा: ।
भौतिकाश्च कथ॑ं क्लेशा बाधन्ते हरिसंश्रयम् ॥
३७॥
शारीरा:--शरीर सम्बधी; मानसा: --मन सम्बन्धी; दिव्या:--दैवी शक्ति सम्बन्धी देवताओं का ; वैयासे--हे विदुर;ये--जो; च--यथा; मानुषा: -- अन्य मनुष्यों से सम्बन्धित; भौतिका: --अन्य जीवों से सम्बन्धित; च--तथा;कथम्-कैसे; क्लेशा:--दुख; बाधन्ते--कष्ट पहुँचा सकते हैं; हरि-संभ्रयम्--जिसने भगवान् कृष्ण की शरण लीहुई है
अतः हे विदुर, जो व्यक्ति भगवान् कृष्ण के शरणागत हैं, भला वे किस प्रकारशरीर, मन, प्रकृति, अन्य मनुष्यों तथा जीवित प्राणियों से सम्बन्धित कष्टों में पड़ सकतेहैं।
यः पृष्टो मुनिभिः प्राह धर्मान्नानाविधाज्छुभान् ।
नृणां वर्णाश्रमाणां च सर्वभूतहितः सदा ॥
३८॥
यः--जो; पृष्ट:--पूछे जाने पर; मुनिभि:--मुनियों के द्वारा; प्राह--बोला; धर्मान्--कर्तव्य; नाना-विधान्ू---अनेकप्रकार के; शुभान्ू--शुभ; नृणाम्--मनुष्य समाज का; वर्ण-आश्रमाणाम्--वर्णो तथा आश्रमों का; च--यथा; सर्व-भूत--सभी जीवों के लिए; हित:ः--कल्याणकर; सदा--सदैव |
कुछ मुनियों के पूछे जाने पर उन्होंने स्वायंभुव मनु ने समस्त जीवों पर दया करकेमनुष्य के सामान्य पवित्र कर्तव्यों तथा वर्णो और आश्रमों का उपदेश दिया।
एतत्त आदिराजस्य मनो श्वरितमद्भुतम् ।
वर्णितं वर्णनीयस्य तदपत्योदयं श्रुणु ॥
३९॥
एतत्--यह; ते--तुम; आदि-राजस्य--प्रथम सम्राट के; मनो:--स्वायंभुव मनु के ; चरितम्--चरित्र; अद्भुतम्--आश्चर्यजनक; वर्णितमू--वर्णन किया गया; वर्णनीयस्य--जिनका यश वर्णन करने के योग्य है; तत्-अपत्य--उनकीपुत्री का; उदयम्--अभ्युदय; श्रुणु--सुनो |
मैंने तुमसे आदि सम्राट स्वायंभुव मनु के अद्भुत चरित्र का वर्णन किया।
उनकी ख्याति वर्णन के योग्य है।
अब ध्यान से उनकी पुत्री देवहूति के अभ्युदय का वर्णनसुनो।
