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अध्याय तेईसवाँ: देवहुति का विलाप

3.23मैत्रेय उवाचपितृभ्यां प्रस्थिते साध्वी पतिमिड्ितिकोविदा ।

नित्य॑ पर्यचरत्प्रीत्या भवानीव भवं प्रभुम्‌ ॥

१॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; पितृभ्याम्‌--माता-पिता के द्वारा; प्रस्थिते--प्रस्थान करने पर; साध्वी--पतिक्रता;पतिम्‌--अपने पति की; इड़त-कोविदा--मनोभावों को जानने वाली; नित्यम्‌--निरन्तर; पर्यचरत्‌--सेवा की;प्रीत्या--प्रेमपूर्वक; भवानी--देवी पार्वती; इब--समान; भवम्‌--शिवजी की; प्रभुम्‌--अपने स्वामी |

मैत्रेय ने कहा--अपने माता-पिता के चले जाने पर अपने पति की इच्छाओं कोसमझनेवाली पतिक्रता देवहूति अपने पति की प्रतिदिन प्रेमपूर्वक सेवा करने लगी जिसप्रकार भवानी अपने पति शंकर जी की करती हैं।

विश्रम्भेणात्मशौचेन गौरवेण दमेन च ।

शुश्रूषया सौहदेन वाचा मधुरया च भो: ॥

२॥

विश्रम्भेण--आत्मीयता से; आत्म-शौचेन--मन तथा देह की शुद्धता से; गौरवेण--सम्मान से; दमेन--इन्द्रियों कोवश में करके; च--तथा; शुश्रूषया--सेवा से; सौहदेन--प्रेम से; वाचा--वाणी से; मधुरया--मीठी; च--तथा;भो:--हे विदुर!

हे विदुर, देवहूति ने अत्यन्त आत्मीयता और आदर के साथ, इन्द्रियों को वश मेंरखते हुए, प्रेम तथा मधुर वचनों से अपने पति की सेवा की।

विसृज्य काम दम्भं च द्वेष॑ लोभमघं मदम्‌ ।

अप्रमत्तोद्यता नित्यं तेजीयांसमतोषयत्‌ ॥

३॥

विसृज्य--त्याग कर; कामम्‌--काम-वासना; दम्भमू-गर्व; च--तथा; द्वेषम्‌-द्वेष; लोभमू--लोभ, लालच;अघम्‌--पापपूर्ण कृत्य; मदम्‌--मद, घमण्ड; अप्रमत्ता--समझदार; उद्यता--तत्पर रहकर; नित्यम्‌ू--सदैव;तेजीयांसम्‌--अपने अत्यन्त शक्तिशाली पति को; अतोषयत्‌--प्रसन्न कर लिया।

बुद्धिमानी तथा तत्परता के साथ कार्य करते हुए उसने समस्त काम, दम्भ, द्वेष,लोभ, पाप तथा मद को त्यागकर अपने शक्तिशाली पति को प्रसन्न कर लिया।

स वै देवर्षिवर्यस्तां मानवीं समनुव्रताम्‌ ।

दैवादगरीयसः पत्युराशासानां महाशिष: ॥

४॥

कालेन भूयसा क्षामां कर्शितां ब्रतचर्यया ।

प्रेमगदूगदया वाचा पीडित: कृपयात्रवीत्‌ ॥

५॥

सः--वह कर्दम ; बै--निश्चय ही; देव-ऋषि--दैवी साधुओं में; वर्य:--सर्वश्रेष्ठ; तामू--उस; मानवीम्‌--मनु कीपुत्री को; समनुव्रताम्‌-पूर्णतः अनुरक्त; दैवात्‌--विधाता की अपेक्षा; गरीयस:--महान्‌; पत्यु:--अपने पति से;आशासानाम्‌--आशावान्‌; महा-आशिष:--महान्‌ आशीर्वाद; कालेन भूयसा--दीर्घकाल तक; क्षामाम्‌-दुर्बल;कशिताम्‌--क्षीण; ब्रत-चर्यया-- धार्मिक चर्या से; प्रेम--प्रेम से; गद्गदया--विह्नल, रुद्ध; वाचा--वाणी से;पीडित:--विजित; कृपया--दया से; अब्नवीत्‌--कहा

पतिपरायणा मनु की पुत्री अपने पति को विधाता से भी बड़ा मानती थी।

इस प्रकारवह उनसे बड़ी-बड़ी आशाएँ किये रहती थी।

दीर्घकाल तक सेवा करते रहने से धार्मिकब्रतों को रखने के कारण वह अत्यन्त क्षीण हो गई।

उसकी दशा देखकर देवर्षिश्रेष्ठकर्दम को उस पर दया आ गई और वे अत्यन्त प्रेम से गदगद वाणी में बोले।

कर्दम उवाचतुष्टोडहमद्य तब मानवि मानदाया:शुश्रूषया परमया परया च भकक्‍त्या ।

यो देहिनामयमतीव सुहत्स देहोनावेक्षित: समुचित: क्षपितुं मदर्थे ॥

६॥

कर्दम: उबाच--परम साधु कर्दम ने कहा; तुष्ट:-- प्रसन्न हूँ; अहम्‌ू--मैं; अद्य--आज; तव--तुमसे; मानवि--हे मनुकी पुत्री; मान-दाया: --सम्माननीय; शुश्रूषया -- सेवा से; परमया--सर्व श्रेष्ठ; परया--उच्चतम; च--तथा; भक्त्या--भक्ति से; यः--जो; देहिनाम्‌--देहधारियों को; अयम्‌--यह; अतीव--अत्यन्त; सुहत्‌--प्रिय; सः--वह; देह:--देह;न--नहीं; अवेक्षित:--ध्यान दिया गया; समुचितः--ठीक से; क्षपितुमू--व्यय करना; मत्‌-अर्थ--मेरे लिए।

कर्दम मुनि ने कहा-हे स्वायंभुव मनु की मानिनी पुत्री, आज मैं तुम्हारी अत्यधिकअनुरक्ति तथा प्रेमपूर्ण सेवा से बहुत प्रसन्न हूँ।

चूँकि देहधारियों को शरीर अत्यन्त प्रिय है,अतः मुझे आश्चर्य हो रहा है कि तुमने मेरे लिये अपने शरीर को उपेक्षित कर रखा है।

ये मे स्वधर्मनिरतस्य तपःसमाधिविद्यात्मयोगविजिता भगवत्प्रसादा: ।

तानेव ते मदनुसेवनयावरुद्धान्‌दृष्टि प्रपश्य वितराम्यभयानशोकान्‌ ॥

७॥

ये--जो; मे--मेरे द्वारा; स्व-धर्म--अपना धार्मिक जीवन; निरतस्थ--पूर्णतया लगे रहकर; तप: --तपस्या में;समाधि--ध्यान में; विद्या--कृष्णभावनामृत में; आत्म-योग--मन को स्थिर करके ; विजिता:--प्राप्त किया गया;भगवत्‌-प्रसादा: -- भगवान्‌ के आशीर्वाद; तानू--उनको; एब--भी; ते--तुम्हारे द्वारा; मत्‌--मुझको; अनुसेवनया--भक्ति से; अवरुद्धानू--प्राप्त की गई; दृष्टिम्‌--दिव्य दृष्टि; प्रपश्य--देखो; वितरामि--मैं दे रहा हूँ; अभयान्‌-- भयसेरहित; अशोकान्‌--शोक से रहित।

कर्दम मुनि ने आगे कहा-मैंने तप, ध्यान तथा कृष्णभक्ति का अपना धार्मिकजीवन बिताते हुए भगवान्‌ का आशीर्वाद प्राप्त किया है।

यद्यपि तुम्हें भय तथा शोक सेरहित इन उपलब्धियों विभूतियों का अभी तक अनुभव नहीं है, किन्तु इन सबों को मैंतुम्हें प्रदान करूँगा, क्योंकि तुम मेरी सेवा में लगी हुई हो।

अब उन्हें देखो तो।

मैं तुम्हेंदिव्यद्ृष्टि प्रदान कर रहा हूँ जिससे तुम देख सको कि वे कितनी सुन्दर हैं।

अन्ये पुनर्भगवतो भ्रुव उद्विजृम्भ-विश्रंशितार्थरचना: किमुरुक्रमस्य ।

सिद्धासि भुड्छ्व विभवान्निजधर्मदोहान्‌दिव्यान्नरर्दुरधिगान्नूपविक्रियाभि: ॥

८ ॥

अन्ये--अन्य; पुनः--फिर; भगवतः-- भगवान्‌ की; भ्रुवः--भुकूटी के; उद्विजुम्भ--हिलने से; विभ्रेशित--नष्ट;अर्थ-रचना:-- भौतिक उपलब्धियों भोग के; किम्‌--क्या लाभ; उरुक्रमस्य-- भगवान्‌ विष्णु का; सिद्धा--सफल; असि--तुम हो; भुड्छझ्व--भोगो; विभवान्‌--भेंटें; निज-धर्म--अपनी भक्ति से; दोहान्‌--प्राप्त; दिव्यान्‌--दिव्य; नरैः --पुरुषों द्वारा; दुरधिगान्‌--दुर्लभ; नृप-विक्रियाभि: --राजमद से गर्वित

कर्दम मुनि ने कहा--भगवान्‌ की कृपा के अतिरिक्त अन्य भोगों से कौन सा लाभहै? सभी भौतिक उपलब्धियाँ श्रीभगवान्‌ विष्णु के भूकुटि-चालन से ही ध्वंस हो जानेवाली हैं।

तुमने अपने पति की भक्ति करके बे दिव्य भेंटें प्राप्त की हैं और उनका भोगकर रही हो जो राजमद तथा भौतिक सम्पत्ति से गर्वित मनुष्यों के लिए भी दुर्लभ हैं।

एवं ब्रुवाणमबलाखिलयोगमाया-विद्याविचक्षणमवेक्ष्य गताधिरासीतू ।

सम्प्रश्रयप्रणयविह्नलया गिरेषद्‌ -ब्रीडावलोकविलसद्धसिताननाह ॥

९॥

एवमू--इस प्रकार; ब्रुवाणम्‌--बोलते हुए; अबला--स्त्री; अखिल--सम्पूर्णफ; योग-माया--दिव्य ज्ञान का; विद्या-विचक्षणम्‌--ज्ञान में अद्वितीय; अवेक्ष्य--सुनकर; गत-आधि: --सन्तुष्ट; आसीत्‌--हो गई; सम्प्रश्रय--विनय केसाथ; प्रणय--तथा प्रेम से; विहलया--विह्ल होकर; गिरा--वाणी से; ईषत्‌--कुछ-कुछ; ब्रीडा--लज्जा, संकोच;अवलोक--चितवन से; विलसत्‌--चमकती; हसित--हँसती; आनना--मुख वाली; आह--बोली

समस्त प्रकार के दिव्य ज्ञान में अद्वितीय, अपने पति को बोलते हुए सुनकर निष्पापदेवहूति अत्यन्त प्रसन्न हुई, उसका मुख किंचित्‌ संकोच भरी चितवन और मधुर मुस्कानसे खिल उठा और वह अत्यन्त विनय एवं प्रेमवश गद्गद वाणी में रुद्ध कण्ठ से " बोली।

देवहूांतिरुवाचराद्धं बत द्विजवृषैतदमोघयोग-मायाधिपे त्वयि विभो तदवैमि भर्त: ।

यस्ते भ्यधायि समय: सकृदड्रसड़ोभूयादगरीयसि गुण: प्रसवः सतीनाम्‌ ॥

१०॥

देवहूति: उबाच--देवहूति ने कहा; राद्धम्‌--प्राप्त हुआ; बत--निस्सन्देह; द्विज-वृष--हे ब्राह्मण श्रेष्ठ; एतत्‌--यह;अमोघ--अचूक; योग-माया--योगशक्ति के; अधिपे--स्वामी; त्वयि--तुम में; विभो--हे महान्‌; तत्‌--वह;अवैमि--ैं जानती हूँ; भर्त: --हे पति; यः--जो; ते--तुम्हारे द्वारा; अभ्यधायि--दिया गया; समय:--वचन, प्रतिज्ञा;सकृत्‌--एक बार; अड्ड-सड्ृः--शारीरिक संयोग; भूयात्‌--होवे; गरीयसि--जब अत्यन्त यशस्वी; गुण:--सदगुण;प्रसवः--सन्तान; सतीनाम्‌--पतिक्रता स्त्रियों का

श्री देवहूति ने कहा-हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मेरे प्रिय पति, मैं जानती हूँ कि आपने सिद्धिप्राप्त कर ली है और समस्त अचूक योगशक्ति के स्वामी हैं, क्योंकि आप दिव्य प्रकृतियोगमाया के संरक्षण में हैं।

किन्तु आपने एक बार वचन दिया था कि अब हमाराशारीरिक संसर्ग होना चाहिए, क्योंकि तेजस्वी पति वाली साध्वी पत्नी के लिए सन्तानबहुत बड़ा गुण है।

तत्रेतिकृत्यमुपशिक्ष यथोपदेशंयेनैष मे कर्शितोतिरिरंसयात्मा ।

सिद्धब्रेत ते कृतमनो भवधर्षितायादीनस्तदीश भवन सहशं विचक्ष्व ॥

११॥

तत्र--उसमें; इति-कृत्यमू--जो करणीय था; उपशिक्ष--सम्पन्न करो; यथा--के अनुसार; उपदेशम्‌--शास्त्रों केउपदेश; येन--जिससे; एष:--यह; मे--मेरा; कर्शित:--क्षीण; अतिरिरं-सया--तीक्र कामेच्छा के तुष्ट न होने से;आत्मा--शरीर; सिद्धब्ेत--उपयुक्त बन सकता है; ते--तुम्हारे लिए; कृत--उत्तेजित; मन:-भव--कामेच्छा से;धर्षिताया:--पीड़ित; दीन:--दीन; तत्‌--अतः ; ईश--हे भगवान्‌; भवनम्‌--घर; सहृशम्‌--उपयुक्त; विचक्ष्व--केविषय में सोचो

देवहूति ने आगे कहा-हे प्रभु, मैं कामवेदना से पीड़ित हो रही हूँ।

अतः आप शास्त्रोंके अनुसार जो भी व्यवस्था की जानी हो, करें जिससे कामेच्छा सन्तुष्ट न हो पाने से यहमेरा दुर्बल शरीर आपके योग्य हो जाय।

हाँ, स्वामी, इस कार्य के लिए उपयुक्त घर केविषय में भी विचार करें।

मैत्रेय उवाचप्रियाया: प्रियमन्विच्छन्कर्दमो योगमास्थित: ।

विमान काम क्षत्तस्तहोंवाविरचीकरत्‌ ॥

१२॥

मैत्रेय:--मैत्रेय मुनि ने; उवाच--कहा; प्रियाया:--अपनी प्रिय पत्नी की; प्रियम्‌--इच्छा, चाह; अन्विच्छन्‌--खोजतेहुए; कर्दम:--कर्दम मुनि ने; योगम्‌--योगशक्ति; आस्थित:-- प्रयोग किया; विमानम्‌--विमान; काम-गम्‌--इच्छानुसार चलने वाला; क्षत्त:--हे विदुर; तहिं--तुरन्त; एब--ही; आविरचीकरत्‌--उत्पन्न किया |

मैत्रेय ने आगे कहा--हे विदुर, अपनी प्रिया की इच्छा को पूरा करने के लिए कर्दममुनि ने अपनी योगशक्ति का प्रयोग किया और तुरन्त ही एक हवाई महल विमान उत्पन्न कर दिया जो उनकी इच्छानुसार यात्रा कर सकता था।

सर्वकामदुघं दिव्यं सर्वरत्ससमन्वितम्‌ ।

सर्वद्धर्युपचयोदर्क मणिस्तम्भेरुपस्कृतम्‌ ॥

१३॥

सर्व--समस्त; काम--इच्छाएँ; दुघम्‌--प्रदायक; दिव्यमू--आश्चर्यमय; सर्व-रत्न--सभी प्रकार की मणियों;समन्वितम्‌--से जटित; सर्व--समस्त; ऋद्द्धि--सम्पत्ति की; उपचय--वृद्ध्धि; उदर्कम्‌--क्रमिक; मणि--बहुमूल्यरत्नों के; स्तम्भैः--ख भों से; उपस्कृतम्‌--सुशोभित |

यह सभी प्रकार के रत्नों से जटित, बहुमूल्य मणियों के ख भों से सुशोभित तथा इच्छित फल प्रदान करने वाली विस्मयजनक संरचना महल थी।

यह सभी प्रकार केसाज-सामान तथा सम्पदा से सुसज्जित था, जो दिन-प्रति-दिन बढ़ने वाले थे।

दिव्योपकरणोपेतं सर्वकालसुखावहम्‌ ।

पट्टिकाभि: पताकाभिर्विचित्राभिरलड्डू तम्‌ ॥

१४॥

स्त्रश्भिविचित्रमाल्याभिर्मझुशिज्ञत्वडड्प्रिभि: ।

दुकूलक्षौमकौशेयैर्नानावस्त्रैविराजितम्‌ ॥

१५॥

दिव्य--विचित्र; उपकरण--सामग्री से; उपेतम्‌ू--युक्त; सर्व-काल--सभी ऋतुओं में; सुख-आवहम्‌--सुखदायक;पट्टिकाभि:--बंदनवारों से; पताकाभि:--पताकाओं से; विचित्राभि:--विभिन्न रंगों तथा धागों से; अलड्डू तम्‌--सज्जित; स््रग्भिः--हारों से; विचित्र-माल्याभि:--आकर्षक पुष्पों से; मज्जु--मधुर; शिक्ञत्‌--गुंजार करता; षटू-अद्प्रिभि:--भौरों से; दुकूल--महीन वस्त्र; क्षौम--लिनेन; कौशेयै: --रेशमी वस्त्र से; नाना--विविध; बस्त्रैः--पर्दोंसे; विराजितमू--शोभायमान

यह प्रासाद दुर्ग सभी प्रकार की सामग्री से सुसज्जित था और यह सभी ऋतुओं मेंसुखदायक था।

यह चारों ओर से पताकाओं, बन्दनवारों तथा नाना-विधिक रंगों कीकला-कृतियों से सजाया गया था।

यह आकर्षक पुष्पों के हारों से, जिससे मधुर गुंजार करते भौरे आकृष्ट हो रहे थे तथा लिनेन, रेशमी तथा अन्य तन्‍्तुओं से बने पर्दों सेशोभायमान था।

उपर्युपरि विन्यस्तनिलयेषु पृथक्पृथक्‌ ।

क्षिप्तै: कशिपुभि: कान्तं पर्यड्रव्यजनासने: ॥

१६॥

उपरि उपरि--एक के ऊपर एक; विन्यस्त--रखे हुए; निलयेषु--मंजिलों में; पृथक्‌ पृथक्‌ू--अलग अलग; क्षिप्तै:--व्यवस्थित; कशिपुभि:--बिस्तरे शय्या से; कान्तम्‌--कमनीय; पर्यड्रू--पलंग; व्यजन--पंखे; आसनै: --आसनों बैठने के स्थान, सीट सहित।

यह प्रासाद शय्याओं, पलंगों, पंखों तथा आसनों से युक्त सात पृथक्‌-पृथक्‌ मंजिलों तल्‍्लों वाला होने से अत्यन्त मनोहर लग रहा था।

तत्र तत्र विनिक्षिप्तनानाशिल्पोपशोभितम्‌ ।

महामरकतस्थल्या जुष्टे विद्यमवेदिभि: ॥

१७॥

तत्र तत्र--जहाँ तहाँ; विनिक्षिप्त--रखे हुए; नाना--विविध; शिल्प--कला-कृतियों से; उपशोभितम्‌-- अत्यधिकसुन्दर; महा-मरकत--विशाल मरकत पन्ना के; स्थल्या--फर्श से; जुष्टमू--सुसज्जित; विद्रुम--मूँगे के;वेदिभि: --उठे हुए

ऊँचे चबूतरों सेदीवालों में जहाँ तहाँ कलापूर्ण संरचना होने से उनकी सुन्दरता बढ़ गई थी।

उसकी फर्श मरकत मणि की थी और चबूतरे मूँगे के बने थे।

द्वाःसु विद्रुमदेहल्या भातं वज़कपाटवत्‌ ।

शिखरेष्विन्द्रनीलेषु हेमकुम्भेरधिश्रितम्‌ ॥

१८ ॥

द्वाःसु--द्वारों पर; विद्युय--मूँगे की; देहल्या--देहली से युक्त; भातम्‌--सुन्दर; वज़--हीरों से जटित; कपाट-वत्‌--दरवाजों से युक्त; शिखरेषु--गुम्बदों पर; इन्द्र-नीलेषु--इन्द्र नीलमणि के; हेम-कुम्भेः--सोने के कलशों से युक्त;अधिश्रितमू--रखे हुए

वह महल अतीव सुन्दर था, उसके द्वारों की देहलियाँ मूँगे की थीं और दरवाजे हीरोंसे जटित थे।

इन्द्र नीलमणि के बने गुम्बदों पर सोने के कलश रखे हुए थे।

चहश्षुष्मत्पद्यरागाछयैर्वज़भित्तिषु निर्मित: ।

जुष्ट विचित्रवैतानैर्महाहैंहमतोरणै: ॥

१९॥

चक्षु:-मत्‌--मानो आँखों से युक्त हो; पद्य-राग--लालमणि, माणिक; अछयै:--चुने हुए; वज्ञ--हीरे की; भित्तिषु--दीवालों पर; निर्मिति:-- जड़े हुए; जुष्टम्‌--सुसज्जित; विचित्र--तरह तरह के; वैतानैः--वितानों चँदोवों से; महा-अहैं: --अत्यन्त बहुमूल्य; हेम-तोरणैः --सोने के तोरणों द्वारों से

वह हीरों की दीवालों में जड़े हुए मनभावने माणिक से ऐसा प्रतीत होता था मानोनेत्रों से युक्त हो।

वह विचित्र चँदोवों और अत्यधिक मूल्यवान सोने के तोरणों सेसुसज्जित था।

हंसपारावतत्रातैस्तत्र तत्र निकूजितम्‌ ।

कृत्रिमान्मन्यमानैः स्वानधिरु्मधिरुह्या च ॥

२०॥

हंस--हंसों के; पारावत--कबूतरों के ; ब्रातैः--झुंड के झुंड से; तत्र तत्र--इधर उधर; निकूजितम्‌--शोर करते;कृत्रिमान्‌ू--कृत्रिम; मन्यमानै:-- सोचते हुए; स्वानू--अपनी तरह के; अधिरुह्म अधिरुह्म --बार-बार उड़कर; च--तथा।

उस प्रासाद में जहाँ तहाँ जीवित हंसों तथा कबूतरों के साथ ही कृत्रिम हंस तथाकबूतर इतने सजीव थे कि असली हंस उन्हें अपने ही तुल्य सजीव पक्षी समझ कर अपनीगर्दनें ऊपर उठा रहे थे।

इस प्रकार वह प्रासाद इन पक्षियों के ध्वनियों से गूँज रहा था।

विहारस्थानविश्रामसंवेशप्राड्रणाजिरै: ।

यथोपजोष॑ं रचितैर्विस्मापनमिवात्मन: ॥

२१॥

विहार-स्थान--क्रीड़ा-स्थल; विश्राम--आराम करने के कक्ष; संवेश--शयनगृह; प्राड्रण-- आँगन; अजिरै:--बाहरीखुला स्थान, चौक; यथा-उपजोषम्‌--सुविधानुसार; रचितैः--निर्मित; विस्मापनम्‌--विस्मय उत्पन्न करने वाले;इब--निस्सन्देह; आत्मन:--स्वयं कर्दम द्वारा |

उस प्रासाद में क्रीड़ास्थल, विश्रामघर, शयनगृह, आँगन तथा चौकें थीं जो नेत्रों कोसुख देने वाली थीं।

इन सबसे स्वयं मुनि को विस्मय हो रहा था।

ईहग्गृहं तत्पश्यन्तीं नातिप्रीतेन चेतसा ।

सर्वभूताशयाभिज्ञः प्रावोचत्कर्दम: स्वयम्‌ ॥

२२॥

ईहक्‌--ऐसे; गृहम्‌--घर को; तत्‌--वह; पश्यन्तीम्‌--देखती हुई; न अतिप्रीतेन--अधिक प्रसन्न नहीं हुई; चेतसा--हृदय से; सर्वब-भूत--प्रत्येक प्राणी के; आशय-अभिज्ञ:--हृदय को जानते हुए; प्रावोचत्‌--सम्बोधित किया;कर्दम:--कर्दम ने; स्वयम्‌--स्वयं

जब उन्होंने देखा कि देवहूति इतने विशाल, ऐश्वर्ययुक्त प्रासाद भवन को अप्रसन्नहृदय से देख रही है, तो कर्दम मुनि को उसकी भावनाओं का पता चला, क्‍योंकि वेकिसी के हृदय की बात जान सकते थे।

अतः उन्होंने अपनी पत्नी को स्वयं ही इस प्रकारसम्बोधित किया।

निमज्यास्मिन्हदे भीरु विमानमिदमारुह ।

इदं शुक्लकृतं तीर्थमाशिषां यापकं नृणाम्‌ ॥

२३॥

निमज्य--स्नान करके; अस्मिन्‌--इसमें; हृदे--सरोवर में; भीरू--अरे डरपोक; विमानमू--विमान में; इृदम्‌ू--इस;आरुह--चढ़ जाओ; इदम्‌--यह; शुक्ल-कृतम्‌-- भगवान्‌ विष्णु द्वारा निर्मित; तीर्थम्‌--पवित्र सरोवर; आशिषाम्‌--इच्छाओं को; यापकम्‌--देते हुए; नृणाम्‌--मनुष्यों की ।

प्रिये देवहूति, तुम इतनी भयभीत क्‍यों हो? पहले स्वयं भगवान्‌ विष्णु द्वारा निर्मितबिन्दु-सरोवर में स्नान करो, जो मनुष्य की समस्त इच्छाओं को पूरा करने वाला है औरतब इस विमान पर चढ़ो।

सा तद्धर्तु: समादाय बच: कुवलयेक्षणा ।

सरजं बिश्रती वासो वेणीभूतांश्व मूर्धजान्‌ ॥

२४॥

सा--वह; तत्‌--तब; भर्तु:--अपने पति का; समादाय--स्वीकार करके; वच:--शब्द; कुवलय-ईक्षणा--कमलके समान नेत्र वाली; स-रजम्‌--मैली-कुचैली; बिभ्रती--पहने हुए; वास:--वस्त्र; वेणी-भूतान्‌ू--जटा तुल्य लटें;च--तथा; मूर्थ-जानू--बाल।

कमललोचना देवहूति ने अपने पति की आज्ञा मान ली।

मैले-कुचैले वस्त्रों तथा सिरपर बालों के जटों के कारण वह आकर्षक नहीं दिख रही थी।

अड़् च मलपड्लेन सज्छन्नं शबलस्तनम्‌ ।

आविवेश सरस्वत्या: सर: शिवजलाशयम्‌ ॥

२५॥

अड्डमू--शरीर; च--तथा; मल-पड्लेन--धूल से; सज्छन्नम्‌ू--ढकी; शबल--विवर्ण, कान्तिहीन; स्तनमू--वक्षस्थल;आविवेश-- प्रवेश किया; सरस्वत्या:--सरस्वती नदी के; सर:--सरोवर झील; शिव--पवित्र; जल--जल;आशयमू--युक्त |

उसके शरीर पर धूल की मोटी पर्त चढ़ी थी और उसके स्तन कान्तिहीन हो गये थे।

किन्तु उसने सरस्वती नदी के पवित्र जल से भरे सरोवर में डुबकी लगाई।

सान्तः सरसि वेश्मस्था: शतानि दश कन्यकाः ।

सर्वा: किशोरवयसो ददशॉत्पलगन्धय: ॥

२६॥

सा--उसने; अन्त:ः-- भीतर; सरसि--सरोवर में; वेश्म-स्था: --घर में स्थित; शतानि दश--एक हजार; कन्यका:--कन्याएँ; सर्वा:--समस्त; किशोर-वयस:--किशोर अवस्था की; दरदर्श--देखा; उत्पल--कमलों के समान;गन्धयः--सुगन्धित |

उसने सरोवर के भीतर एक घर में एक हजार कन्याएँ देखीं जो सब की सब अपनीकिशोरावस्था में थीं और कमलों के समान सुगन्धित थीं।

तां दृष्ठा सहसोत्थाय प्रोचु: प्राज्ञलयः स्त्रियः ।

वबयं कर्मकरीस्तुभ्यं शाधि न: करवाम किम्‌ ॥

२७॥

तामू--उसको; दृष्टा--देखकर; सहसा--एकाएक; उत्थाय--उठकर; प्रोचु:--उन्होंने कहा; प्राज्ललयः--हाथ जोड़े;स्त्रियः:--स्त्रियाँ; वयम्‌--हम; कर्म-करी:ः--दासियाँ; तुभ्यम्‌--तुम्हारे लिए; शाधि--कृपा करके कहो; नः--हमको;'करवाम--हम कर सकती हैं; किमू--क्या।

उसे देखकर वे तरुणियाँ सहसा उठ खड़ी हुईं और हाथ जोड़कर कहा, ‘हमआपकी दासी हैं।

कृपा करके बताएँ कि हम आपके लिए क्या करें?!" स्नानेन तां महाहेण स्नापयित्वा मनस्विनीम्‌ ।

दुकूले निर्मले नूत्ने ददुरस्थै च मानदा: ॥

२८॥

स्नानेन--नहाने के तेल से; तामू--उसको; महा-अर्हेण --बहूमूल्य; स्नापयित्वा--स्नान कराकर; मनस्विनीम्‌--सच्चरित्र पत्नी को; दुकूले--सुन्दर वस्त्र में; निर्मले--स्वच्छ; नूत्ते--नवीन; ददुः--दिया; अस्यै--उसको; च--तथा;मान-दाः--सम्मान करने वाली |

देवहूति के प्रति अत्यन्त सम्मान प्रदर्शित करने वाली कन्याएँ उसे बाहर लाई औरबहुमूल्य तेलों तथा उबटनों को लगाकर नहलाया और उसे महीन, निर्मल, नये वस्त्रपहनने को दिये।

भूषणानि परार्ध्यानि वरीयांसि द्युमन्ति च ।

अन्नं सर्वगुणोपेतं पानं चैवामृतासवम्‌ ॥

२९॥

भूषणानि-- आभूषण; पर-अर्ध्यानि--अत्यन्त मूल्यवान; वरीयांसि-- श्रेष्ठ; द्युमन्ति--चमकीले; च--तथा; अन्नम्‌--भोजन; सर्व-गुण--समस्त सदगुण; उपेतम्‌--से युक्त; पानम्‌--पेय पदार्थ; च--तथा; एब-- भी; अमृत--मधुर;आसवमू--मादक

तब उन्होंने उसे उत्तम तथा बहुमूल्य आभूषणों से सजाया जो चमचमा रहे थे।

फिर उन्होंने सर्वगुण सम्पन्न भोजन तथा मधुर मादक पेय पदार्थ आसवम्‌ प्रदान किया।

अथादर्शे स्वमात्मानं स्त्रग्विणं विरजाम्बरम्‌ ।

विरजं कृतस्वस्त्ययनं कन्याभिर्बहुमानितम्‌ ॥

३०॥

अथ--तब; आदर्शे--दर्पण में; स्वम्‌ आत्मानम्‌-- अपने प्रतिबिम्ब को; सत्रकू-विणम्‌--माला से सजी; विरज--निर्मल; अम्बरम्‌--वस्त्र; विरजम््‌--मलरहित; कृत-स्वस्ति-अयनम्‌--शुभ-चिह्नों से अलंकृत; कन्याभि:--दासियोंद्वारा; बहु-मानितम्‌-- अत्यन्त आदरपूर्वक सेवित।

तब उसने दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब देखा।

उसका शरीर समस्त प्रकार के मल सेरहित हो गया था और वह माला से सज्जित की गई थी।

वह निर्मल वस्त्र पहने थी औरशुभ तिलक से विभूषित थी।

दासियाँ उसकी अत्यन्त आदरपूर्वक सेवा कर रही थीं।

स्नातं कृतशिरःस्नानं सर्वाभरणभूषितम्‌ ।

निष्कग्रीवं बलयिन॑ कूजत्काझ्नननूपुरम्‌ ॥

३१॥

स्नातम्‌ू--स्नान किये; कृत-शिर:--सिर सहित; स्नानम्‌--नहाते हुए; सर्व--सर्वत्र; आभरण--आशभूषणों से;भूषितम्‌--अलंकृत; निष्क--लटकन से युक्त सोने का गले का हार; ग्रीवम्‌-गर्दन में; बलयिनम्‌--चूड़ियों से;कूजत्‌-ध्वनि करते; काझ्नन--सोने के बने; नूपुरमू--पायल।

सिर सहित उसका सारा शरीर नहलाया गया और उसके अंग-प्रत्यंग को आभूषणोंसे सजाया गया।

उसने लटकन से युक्त हार हार-हुमेल पहना था।

उसकी कलाइयों मेंचूड़ियाँ थीं और उसकी एड़ियों में सोने के खनकते पायल थे।

श्रोण्योरध्यस्तया काउ्च्या काझ्जन्या बहुरलया ।

हारेण च महाहँण रूचकेन च भूषितम्‌ ॥

३२॥

श्रोण्यो: --कटि-भाग पर; अध्यस्तया--पहने हुए; काउ्च्या--करधनी से; काञझ्नन्या--सोने की; बहु-रलया-- अनेकरत्नों से भूषित; हरेण--मोती के हार से; च--तथा; महा-अ्हेण--बहुमूल्य; रुचकेन--शुभ समाग्रियों से; च--तथा; भूषितम्‌--सज्जित

उसने कमर में अनेक रत्नों से जटित सोने की करधनी पहन रखी थी; वह बहुमूल्यमोतियों के हार तथा मंगल-द्र॒व्यों से सुसज्जित थी।

सुदता सुभ्रुवा एलक्ष्णस्निग्धापाड्रेन चक्षुषा ।

पद्मयकोशस्पृधा नीलैरलकैश्व लसन्मुखम्‌ ॥

३३॥

सुदता--सुन्दर दाँतों वाली; सु-भ्रुवा--मनोहर भौहों वाली; श्लक्ष्ण--सुन्दर; स्निग्ध--गीली; अपाड्रेन--तिरछीचितवन से; चक्षुषा--आँखों से; पद्य-कोश--कमल की कलियाँ; स्पृधा--परास्त करने वाली; नीलैः--नीली-नीली;अलकै:--घुँघराले बाल से; च--तथा; लसत्‌--चमकती हुई; मुखम्‌--मुख।

उसका मुखमण्डल सुन्दर दाँतों तथा मनोहर भौहों से चमक रहा था।

उसके नेत्रसुन्दर स्निग्ध कोरों से स्पष्ट दिखाई पड़ने के कारण कमल कली की शोभा को मातकरते थे।

उसका मुख काले घुँघराले बालों से घिरा हुआ था।

यदा सस्मार ऋषभमृषीणां दयितं पतिम्‌ ।

तत्र चास्ते सह स्त्रीभिर्यत्रास्ते स प्रजापति: ॥

३४॥

यदा--जब; सस्मार-- स्मरण किया; ऋषभम्‌--अग्रगण्य; ऋषीणाम्‌--ऋषियों में; दयितम्‌--प्रिय; पतिम्‌--पति;तत्र--वहाँ; च--तथा; आस्ते--उपस्थित थी; सह--साथ; स्त्रीभि:--दासियों के; यत्र--जहाँ; आस्ते--उपस्थित था;सः--वह; प्रजापति:--प्रजापति कर्दम

जब उसने ऋषियों में अग्रगण्य अपने परम प्रिय पति कर्दम मुनि का स्मरण किया,तो वह अपनी समस्त दासियों सहित वहाँ प्रकट हो गई जहाँ मुनि थे।

भर्तुः पुरस्तादात्मानं स्त्रीसहस्त्रवृतं तदा ।

निशाम्य तद्योगगतिं संशयं प्रत्यपद्मयत ॥

३५॥

भर्तुः--अपने पति की; पुरस्तात्‌ू--उपस्थिति में, समक्ष; आत्मानम्‌--स्वयं को; स्त्री-सहस्त्र--एक हजार दासियों से;वृतम्‌ू--घिरी; तदा--तब; निशाम्य--देखकर; तत्‌-- उसका; योग-गतिम्‌--योगशक्ति; संशयम्‌ प्रत्यपद्मत-- वहचकित हुई।

अपने पति की उपस्थिति में अपने चारों ओर एक हजार दासियाँ और पति कीयोगशक्ति देखकर वह अत्यन्त चकित थी।

सतां कृतमलस्नानां विभ्राजन्तीमपूर्ववत्‌ ।

आत्मनो बिश्षतीं रूपं संवीतरुचिरस्तनीम्‌ ॥

३६॥

विद्याधरीसहस्त्रेण सेव्यमानां सुवाससम्‌ ।

जातभावो विमान तदारोहयदमित्रहन्‌ ॥

३७॥

सः--मुनि; ताम्‌--उसको देवहूति को ; कृत-मल-स्नानाम्‌--स्वच्छ स्नान किये हुए; विश्राजन्तीमू--चमकती हुई;अपूर्व-वबत्‌--अतुलनीय; आत्मन:--उसका निजी; बिभ्रतीमू--से युक्त; रूपम्‌--सौंदर्य; संवीत--कसे हुए; रुचिर--मोहक; स्तनीम्‌--वक्षस्थलों वाली; विद्याधरी --गंधर्वकुमारियों से; सहस्त्रेण--एक हजार; सेव्यमानाम्‌--सेवित; सु-वाससमू-- श्रेष्ठ वस्त्रों से युक्त; जात-भाव: -- भाव से विभोर; विमानम्‌--प्रासाद जैसा विमान; तत्‌--उस;आरोहयत्‌--उसे चढ़ा लिया; अमित्र-हन्‌ू--हे शत्रुओं के नाशकर्ता |

मुनि ने देखा कि देवहूति ने स्नान कर लिया है और चमक रही है मानो वह उनकीपहले वाली पत्नी नहीं है।

उसने राजकुमारी जैसा अपना पूर्व सौन्दर्य पुन: प्राप्त कर लियाथा।

वह श्रेष्ठ वस्त्रों से आच्छादित सुन्दर वक्षस्थलों वाली थी।

उसकी आज्ञा के लिए एकहजार गंधर्व कन्याएँ खड़ी थीं।

हे शत्रुजित, मुनि को उसकी चाह उत्पन्न हुई और उन्होंनेउसे हवाई-प्रासाद में चढ़ा लिया।

तस्मिन्नलुप्तमहिमा प्रिययानुरक्तोविद्याधरीभिरुपचीर्णवपुर्विमाने ।

बश्राज उत्कचकुमुद्गणवानपीच्य-स्ताराभिरावृत इवोडुपतिर्नभःस्थ: ॥

३८ ॥

तस्मिन्‌ू--उसमें; अलुप्त--बिना खोये हुए; महिमा--यश; प्रियया--अपनी प्रियतमा के साथ; अनुरक्त:--लुब्ध;विद्याधरीभि:--गंधर्व कनन्‍्याओं से; उपचीर्ण --सेवित; वपु:--शरीर; विमाने--विमान में; बच्राज--चमकता था;उत्कच--खुला; कुमुत्‌-गणवान्‌--चन्द्रमा जिससे कुमुदिनियाँ खिलती हैं; अपीच्य:--अत्यन्त आकर्षक; ताराभि: --तारागणों से; आवृतः--घिरा हुआ; इब--जिस प्रकार; उडु-पतिः--चन्द्रमा नक्षत्रों में मुख्य ; नभः-स्थ:--आकाशमें

अपनी प्रिया पर अत्यधिक अनुरक्त रहने तथा गंधर्व-कन्याओं द्वारा सेवित होने परभी मुनि की महिमा कम नहीं हुई, क्योंकि उनको अपने पर नियंत्रण प्राप्त था।

उसहवाई-प्रासाद में कर्दम मुनि अपनी प्रिया के साथ इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे मानोआकाश में नक्षत्रों के बीच चन्द्रमा हो, जिससे रात्रि में जलाशयों में कुमुदिनियाँ खिलतीहैं।

तेनाष्टलोकपविहारकुलाचलेन्द्र -द्रोणीष्वनड्सखमारुतसौभगासु ।

सिद्धैर्नुतो द्युधुनिषातशिवस्वनासुरेमे चिरें धनदवलललनावरूथी ॥

३९॥

तेन--उस विमान से; अष्ट-लोक-प--आठों स्वर्गलोकों के मुख्य देवताओं का; विहार-- भ्रमणस्थली; कुल-अचल-इन्द्र--पर्वतों के राजा मेरु की; द्रोणीषु--घाटियों में; अनड़---कामदेव का; सख--साथी; मारुत--वायु से;सौभगासु--सुन्दर; सिद्धैः--सिद्धों के द्वारा; नुतः--प्रशंसित; द्यु-धुनि--गंगा की; पात--गिरने की; शिव-स्वनासु--मंगलध्वनि से हिलती; रेमे--सुख भोगा; चिरम्‌--दीर्घकाल तक; धनद-वत्‌--कुबेर के समान; ललना--कन्याओं से; बरूथी --घिरे हुए

उस हवाई-प्रासाद में आरूढ़ हो वे मेरु पर्वत की सुखद घाटियों में भ्रमण करते रहेजो शीतल, मन्द तथा सुगन्ध वायु से अधिक सुन्दर होकर कामवासना को उत्तेजित करनेवाली थी।

इन घाटियों में देवताओं का धनपति कुबेर सुन्दरियों से घिरा रहकर औरसिद्धों द्वारा प्रशंसति होकर आनन्द लाभ उठाता है।

कर्दम मुनि भी अपनी पत्नी तथा उनसुन्दर कन्याओं से घिरे हुए वहाँ गये और अनेक वर्षो तक सुख-भोग किया।

वैश्रम्भके सुरसने नन्दने पुष्पभद्रके ।

मानसे चेत्ररथ्ये च स रेमे रामया रत: ॥

४०॥

वैश्रम्भके --वै श्रम्भक उद्यान में; सुरसने--सुरसन में; नन्दने--नन्दन में; पुष्पभद्रके -- पुष्पभद्रक में; मानसे--मानसरोवर के तट पर; चैत्ररथ्ये--चैत्रपथ में; च--तथा; सः--वह; रेमे-- भोग करता रहा; रामया--अपनी पत्नी से;रतः-तुष्ट |

अपनी पतली से संतुष्ट होकर वे उस विमान में न केवल मेरु पर्वत पर ही वरन्‌वैश्रम्भक, सुरसन, नन्दन, पुष्पभद्रक तथा चेत्ररथ्या में और मानसरोवर के तट पर भीविहार करते रहे।

भ्राजिष्णुना विमानेन कामगेन महीयसा ।

वैमानिकानत्यशेत चरेल्लोकान्यथानिल: ॥

४१॥

भ्राजिष्णुना--कान्तिमान; विमानेन--विमान से; काम-गेन--इच्छानुसार उड़ने वाला; महीयसा--अत्यधिक;वैमानिकान्‌--अपने विमान में स्थित देवतागण; अत्यशेत--आगे बढ़ गया; चरन्‌--यात्रा करते हुए; लोकान्‌ू--लोकोंसे होकर; यथा--जिस प्रकार; अनिल:--वायु |

वे रास्ते में विभिन्न लोकों से होकर उसी तरह यात्रा करते रहे जिस प्रकार वायुप्रत्येक दिशा में अबाध रूप से चलती रहती है।

उसी महान्‌ तथा कान्तिमान हवाई-प्रासादमें, जो उनकी इच्छानुसार उड़ सकता था, बैठकर वे देवताओं से बाजी मार ले गये।

कि दुरापादन तेषां पुंसामुद्यामचेतसाम्‌ ।

यैराभश्रितस्तीर्थपदश्चरणो व्यसनात्यय: ॥

४२॥

किमू्‌--क्या; दुरापादनम्‌--प्राप्त करना कठिन, दुर्लभ; तेषाम्‌--उनके लिए; पुंसाम्‌--मनुष्यों को; उद्दाम-चेतसाम्‌--जो हृढ़ संकल्प हैं; यै:--जिनके द्वारा; आश्रित:--शरण ली गई है; तीर्थ-पदः-- श्रीभगवान्‌ के; चरण: --पाँव;व्यसन-अत्यय:-- भव-भय को हरने वाले

जिन्होंने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के चरण-कमलों की शरण प्राप्त कर ली है उनहढ़प्रतिज्ञ मनुष्यों के लिए कौन सी वस्तु दुर्लभ है? उनके चरण तो गंगा जैसी पवित्र नदीके उद्गम हैं, जिनसे सांसारिक जीवन के समस्त अनिष्ट दूर हो जाते हैं।

प्रेक्षयित्वा भुवो गोलं पल्ये यावान्स्वसंस्थया ।

बह्लाश्चर्य महायोगी स्वाश्रमाय न्यवर्तत ॥

४३॥

प्रेक्षयित्वा-- दिखलाकर; भुव:--ब्रह्माण्ड का; गोलमू--गोलक; पल्यै-- अपनी पत्नी को; यावान्‌ू--जितना भी;स्व-संस्थया--अपनी रचना सहित; बहु-आश्चर्यम्‌ू--अनेक आश्चर्यो से पूर्ण; महा-योगी--परमयोगी कर्दम ; स्व-आश्रमाय--अपने आश्रम को; न्यवर्तत--लौट आया।

अपनी पत्नी को अनेक आश्चर्यों से पूर्ण ब्रह्माण्ड गोलक तथा इसकी रचना दिखलाकर परमयोगी कर्दम मुनि अपने आश्रम को लौट आये।

विभज्य नवधात्मानं मानवीं सुरतोत्सुकाम्‌ ।

रामां निरमयच्नेमे वर्षपूगान्मुहूर्ततत्‌ ॥

४४॥

विभज्य--विभक्त करके; नव-धा--नौ रूपों में; आत्मानम्‌--स्वयं को; मानवीम्‌--मनु की पुत्री देवहूति ; सुरत--संभोग के लिए; उत्सुकाम्‌--अत्यन्त इच्छुक; रामामू--अपनी पत्नी को; निरमयन्‌--आनन्द प्रदान करते हुए; रेमे --सुख भोगा; वर्ष-पूगान्‌ू--अनेक वर्षो तक; मुहूर्तवत्‌--एक क्षण के सृदश |

अपने आश्रम लौटने पर उन्होंने मनु की पुत्री देवहूति के सुख लिए, जो रति सुख केलिए अत्यधिक उत्सुक थी, अपने आपको नौ रूपों में विभक्त कर लिया।

इस प्रकार उन्होंने उसके साथ अनेक वर्षों तक विहार किया, जो एक क्षण के समान व्यतीत होगये।

तस्मिन्विमान उत्कृष्टां शय्यां रतिकरीं थ्रिता ।

न चाबुध्यत तं काल पत्यापीच्येन सड़ता ॥

४५॥

तस्मिनू--उस; विमाने--विमान में; उत्कृष्टाम्‌-सर्व श्रेष्ठ; शय्याम्‌ू--सेज; रति-करीम्‌--कामेच्छा को बढ़ाने वाली;भ्रिता--स्थित; न--नहीं; च--तथा; अबुध्यत--उसने ध्यान दिया; तमू--उस; कालम्‌--समय; पत्या--अपने पतिके साथ; अपीच्येन--अत्यन्त मनोहर; सड्भगता--संगति में, साथ में ।

उस विमान में, देवहूति अपने पति के साथ उत्कृष्ट एवं कामेच्छा बढ़ाने वाली सेज मेंस्थित रह कर जान भी न पाई कि कितना समय कैसे बीत गया।

एवं योगानुभावेन दम्पत्यो रममाणयो: ।

शतं व्यतीयु: शरद: कामलालसयोर्मनाक्‌ ॥

४६॥

एवम्‌--इस प्रकार; योग-अनु भावेन--योगशक्ति से; दम्‌-पत्यो: --पति-पत्नी; रममाणयो: --स्वयं आनन्द भोगते हुए;शतम्‌--एक सौ; व्यतीयु:--बीते; शरद: --शरद ऋतुएँ; काम--रतिसुख; लालसयो:--जो लालायित थे; मनाक्‌--अल्प समय के समान।

रति सुख के उत्कट इच्छुक पति-पत्नी योग शक्तियों के बल पर विहार करते रहेऔर एक सौ वर्ष अल्प काल के समान व्यतीत हो गये।

तस्यामाधत्त रेतस्तां भावयन्नात्मनात्मवित्‌ ।

नोधा विधाय रूप॑ स्व॑ सर्वसट्डल्पविद्विभु: ॥

४७॥

तस्याम्‌--उसमें; आधत्त--स्थापित किया; रेत:--वीर्य; तामू--उसको; भावयन्‌--मानते हुए; आत्मना--अपनीअर्धाड्रिनी के रूप में; आत्म-वित्‌-- आत्मा का ज्ञाता; नोधा--नौ में; विधाय--विभक्त करके; रूपमू--शरीर;स्वम्‌--अपने; सर्व-सड्डूल्प-वित्‌ू--समस्त इच्छाओं के ज्ञाता; विभु:--अत्यन्त शक्तिमान कर्दम।

शक्तिमान कर्दम मुनि सबों के मन की बात जानने वाले थे और जो कुछ माँगे उसेवही प्रदान कर सकते थे।

आत्मा के ज्ञाता होने के कारण वे देवहूति को अपनीअर्धाड्रिनी मानते थे।

अपने आपको नौ रूपों में विभक्त करके उन्होंने देवहूति के गर्भ मेंनौ बार वीर्यपात किया।

अतः सा सुषुवे सद्यो देवहूतिः स्त्रिय: प्रजा: ।

सर्वास्ताश्चारुसर्वाड्ग्यो लोहितोत्पलगन्धयः ॥

४८ ॥

अतः--तब; सा--उसने; सुषुवे--जन्म दिया; सद्यः--एक ही दिन; देवहूति:--देवहूति ने; स्त्रियः--स्त्रियाँ; प्रजा: --सन्‍्तान; सर्वा:--सभी; ता:--वे; चारु-सर्व-अड्ग्य: --सर्वाग सुन्दर; लोहित--लाल; उत्पल--कमल के समान;गन्धयः--सुगन्धित |

उसके तुरन्त बाद उसी दिन देवहूति ने नौ कन्‍्याओं को जन्म दिया जिनके अंग अंगसुन्दर थे और उनसे लाल कमल की सी सुगन्धि निकल रही थी।

पतिं सा प्रव्नजिष्यन्तं तदालक्ष्योशती बहिः ।

स्मयमाना विक्लवेन हृदयेन विदूयता ॥

४९॥

पतिम्‌--उसका पति; सा--वह; प्रत्नजिष्यन्तम्‌-घर छोड़ने को तत्पर; तदा--तब; आलक्ष्य--देखकर; उशती--सुन्दर; बहिः--बाहर से; स्मयमाना--हँसती हुई; विक्लवेन--विचलित, विकल; हृदयेन--हृदय से; विदूयता--संतप्त |

जब उसने देखा कि उसके पति गृह-त्याग करने ही वाले हैं, तो वह बाहर से हँसी,किन्तु हृदय में अत्यन्त विकल और सन्तप्त थी।

लिखन्त्यधोमुखी भूमिं पदा नखमणिश्रिया ।

उवाच ललितां वाचं निरुध्याश्रुकलां शनैः ॥

५०॥

लिखन्ती--कुरेदती हुई; अध:-मुखी--अपना मुँह नीचे किये; भूमिम्‌--पृथ्वी को; पदा--अपने पाँव से; नख--नाखूनों; मणि--मणि के तुल्य; भ्रिया--दमक से; उबाच--वह बोली; ललिताम्‌--मोहक; वाचम्‌--वाणी;निरुध्य--रोक कर; अश्रु-कलाम्‌--आँसू; शनैः-- धीरे-धीरे वह खड़ी थी और मणितुल्य नाखूनों से मण्डित अपने पैर से पृथ्वी को कुरेद रहीथी।

उसका सिर झुका था और वह अपने आँसुओं को रोककर धीरे-धीरे मोहक वाणी सेबोली।

देवहूतिरुवाचसर्व तद्धभगवान्मह्ममुपोवाह प्रतिश्रुतम्‌ ।

अथापि मे प्रपन्नाया अभयं दातुमहसि ॥

५१॥

देवहूति:--देवहूति ने; उबाच--कहा; सर्वम्‌--सभी; तत्‌--वह; भगवानू्‌--हे भगवान्‌; महाम्‌--मेंरे लिए;उपोवाह--पूर्ण हुईं; प्रतिश्रुतम्‌--वचन दिया; अथ अपि--फिर भी; मे--मुझको; प्रपन्नायै--शरणागत को;अभयम्‌--निर्भीकता; दातुमू-देने के लिए; अहसि--योग्य हो |

देवहूति ने कहा-हे स्वामी, आपने जितने वचन दिये थे वे सब पूर्ण हुए, किन्तु मैंआपकी शरणागत हूँ इसलिए मुझे अभयदान भी दें।

ब्रह्मन्दुहितृभिस्तु भ्यं विमृग्या: पतय: समा: ।

कश्रित्स्यान्मे विशोकाय त्वयि प्रव्नजिते वनम्‌ ॥

५२॥

ब्रह्मनू-हे ब्राह्मण; दुहितृभि:--कन्याओं के द्वारा; तुभ्यम्‌--तुम्हारे लिए; विमृग्या:--ढूँढे जाने के हुए; पतय:--पति;समा:--उपयुक्त; कश्चित्‌--कोई; स्थात्‌ू--होना चाहिए; मे--मेरा; विशोकाय--सान्त्वना के लिए; त्वयि--तुम्हारे;प्रत्रजिते--जा चुकने पर; वनम्‌--जंगल को

हे ब्राह्मण, जहाँ तक आपकी पुत्रियों का प्रश्न है, वे स्वयं ही अपने योग्य वर ढूँढलेंगी और अपने अपने घर चली जाएँगी।

किन्तु आपके संन्यासी होकर चले जाने पर मुझेकौन सान्त्वना देगा?

एतावतालं कालेन व्यतिक्रान्तेन मे प्रभो ।

इन्द्रियार्थप्रसड्रेन परित्यक्तपरात्मन: ॥

५३॥

एतावता--इतना; अलमू--व्यर्थ ही; कालेन--समय; व्यतिक्रान्तेन--बीतने पर; मे--मेरा; प्रभो--हे स्वामी; इन्द्रिय-अर्थ--इन्द्रिय-तृप्ति; प्रसड़ेन--रतिक्रीड़ा में; परित्यक्त--परवाह न करके, उपेक्षा करके; पर-आत्मन:--परमेश्वर काज्ञान

अभी तक हमने अपना सारा समय परमेश्वर के ज्ञान के अनुशीलन की उपेक्षा करकेइन्द्रियतृप्ति में ही व्यर्थ गँवाया है।

इन्द्रियार्थेषु सज्नन्त्या प्रसड़स्त्वयि मे कृतः ।

अजानन्त्या पर भावं तथाप्यस्त्वभयाय मे ॥

५४॥

इन्द्रिय-अर्थषु--इन्द्रियतृप्ति हेतु; सज्जन्त्या--अनुरक्त रह कर; प्रसड्र:-- आकर्षण; त्वयि--तुम्हारे लिए; मे--मेरेद्वारा; कृत:--किया गया था; अजानन्त्या--न जानते हुए; परम्‌ भावम्‌--आपकी दिव्य स्थिति; तथा अपि--तो भी;अस्तु--होवे; अभयाय-- भय दूर करने के लिए; मे--मेरा

आपकी दिव्य स्थिति पद से परिचित न होने के कारण ही मैं इन्द्रियों के विषयोंमें लिप्त रह कर आपको प्यार करती रही।

तो भी मैंने आपके लिए जो आकर्षण अनुराग उत्पन्न कर लिया है, वह मेरे समस्त भय को दूर करे।

सझ्े यः संसूतेहँतुरसत्सु विहितोधिया ।

स एव साधुषु कृतो निःसड्भत्वाय कल्पते ॥

५५॥

सड्ड--संगति; यः--जो; संसूते:--जन्म-मृत्यु के चक्र का; हेतु:--कारण; असत्सु--इन्द्रिय-तृप्ति में लगे रहने वालोंके साथ; विहित:--किया गया; अधिया--अविद्या से; सः--वही वस्तु; एव--निश्चय ही; साधुषु--साधु पुरुषों केसाथ; कृत:--किया गया; निःसड््त्वाय--मुक्ति के लिए; कल्पते--ले जाता है

इन्द्रियतृप्ति हेतु संगति निश्चय ही बन्धन का मार्ग है।

किन्तु जब वही संगति किसीसाधु पुरुष से की जाती है, तो भले ही वह अनजाने में की जाय, मुक्ति के मार्ग पर लेजाने वाली है।

नेह यत्कर्म धर्माय न विरागाय कल्पते ।

न तीर्थपदसेवाय जीवन्नपि मृतो हि सः ॥

५६॥

न--नहीं; इह--यहाँ; यत्‌--जो; कर्म--कार्य; धर्माय--धार्मिक जीवन की सिद्धि के लिए; न--नहीं; विरागाय--विरक्ति के लिए; कल्पते--ले जाता है; न--नहीं; तीर्थ-पद-- भगवान्‌ के चरणकमलों का; सेवायै-- भक्ति के लिए;जीवनू--जीवित रह कर; अपि--यद्यपि; मृतः--मरा हुआ; हि--निश्चय ही; सः--वह

जिस पुरुष के कर्म से न तो धार्मिक जीवन का उत्कर्ष होता है, न जिसके धार्मिकविधि-विधानों से उसे वैराग्य प्राप्त हो पाता है और वैराग्य प्राप्त पुरुष यदि श्रीभगवान्‌की भक्ति को प्राप्त नहीं होता, तो उसे जीवित होते हुए भी मृत मानना चाहिए।

साहं भगवतो नूनं वद्धिता मायया हढम्‌ ।

यच्त्वां विमुक्तिदं प्राप्य न मुमुक्षेय बन्धनात्‌ ॥

५७॥

सा--वही व्यक्ति; अहम्‌--मैं; भगवत:-- भगवान्‌ की; नूनम्‌-- अवश्य ही; वश्चिता--ठगी गई; मायया--माया केद्वारा; हढम्‌--हढ़तापूर्वक; यत्‌-- क्योंकि; त्वामू--तुमको; विमुक्ति-दम्‌--मुक्तिदाता; प्राप्प--प्राप्त करके; नमुमुक्षेय--मैंने मुक्ति की याचना नहीं की; बन्धनात्‌ू-- भवबन्धन से |

हे स्वामी, मैं निश्चित रूप से श्रीभगवान्‌ की अलंघ्य माया द्वारा बुरी तरह से ठगी हुईहूँ, क्योंकि भवबन्धन से मुक्ति दिलाने वाली आपकी संगति में रह कर भी मैंने मुक्ति कीचाहत नहीं की।

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