← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 3 की सूची
अध्याय चौबीस: कर्दम मुनि का त्याग
3.24मैत्रेय उवाचनिर्वेदवादिनीमेवं मनोर्दुहितरं मुनि: ।
दयालु: शालिनीमाहशुक्लाभिव्याहतं स्मरन् ॥
१॥
मैत्रेय:--परम साधु मैत्रेय ने; उवाच--कहा; निर्वेद-वादिनीम्ू--वैराग्य से युक्त बातें करने वाली; एवम्--इस प्रकार;मनो:--स्वायंभुव मनु की; दुहितरम्--पुत्री को; मुनिः--कर्दम मुनि ने; दयालु:--दयालु; शालिनीम्ू-- प्रशंसा कीपात्र; आह--कहा; शुक्ल-- भगवान् विष्णु द्वारा; अभिव्याहतम्--कथित; स्मरन्--स्मरण करते हुए।
भगवान् विष्णु के वचनों का स्मरण करते हुए कर्दम मुनि ने वैराग्यपूर्ण बातें करनेवाली, स्वायंभुव मनु की प्रशंसनीय पुत्री देवहूति से इस प्रकार कहा।
ऋषिरुवाचमा खिदो राजपुत्रीत्थमात्मानं प्रत्यनिन्दिते ।
भगवांस्तेक्षरों गर्भमदूरात्सम्प्रपत्स्यते ॥
२॥
ऋषि: उवाच--ऋषि ने कहा; मा खिदः--निराश मत हो; राज-पुत्रि--हे राजकुमारी; इत्थम्--इस प्रकार;आत्मानम्--अपने; प्रति--प्रति; अनिन्दिते--हे प्रशंसनीय देवहूति; भगवान्-- श्रीभगवान्; ते--तुम्हारे; अक्षर: --अविनाशी; गर्भम्--गर्भ में; अदूरात्ू--देर किये बिना, शीघ्र; सम्प्रपत्स्यते--प्रवेश करेंगे।
मुनि ने कहा-हे राजकुमारी, तुम अपने आपसे निराश न हो।
तुम निस्सन्देहप्रशंसनीय हो।
अविनाशी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् शीघ्र ही पुत्र रूप में तुम्हारे गर्भ मेंप्रवेश करेंगे।
धृतव्रतासि भद्गं ते दमेन नियमेन च ।
तपोद्गविणदानैश्व श्रद्धया चेश्वरं भज ॥
३॥
धृत-ब्रता असि--तुमने पवित्र व्रत ले रखा है; भद्रम् ते--ई श्वर तुम्हारा कल्याण करे; दमेन--इन्द्रियों को वश मेंकरके; नियमेन--धर्म के पालन से; च--तथा; तपः--तपस्या; द्रविण-- धन का; दानै:--दान करने से; च--तथा;श्रद्धया-- श्रद्धा से; च--तथा; ई श्वरम्--परमे ध्वर को; भज-- पूजा करोतुमने पवित्र व्रत धारण किये हैं।
ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे।
अब तुम ईश्वर की पूजाअत्यन्त श्रद्धा, संयम, नियम, तप तथा अपने धन के दान द्वारा करो।
स त्वयाराधित: शुक्लो वितन्वन्मामकं यश: ।
छेत्ता ते हृदयग्रन्थिमौदर्यों ब्रह्मभावन: ॥
४॥
सः--वह; त्वया--तुम्हारे द्वारा; आराधित: --पूजित होकर; शुक्ल:-- श्रीभगवान्; वितन्वन्--विस्तार करते हुए;मामकमू--मेरा; यशः--यश ; छेत्ता--वे काट देंगे; ते--तुम्हारे; हदय--हृदय की; ग्रन्थिम्--गाँठ; औदर्य:--तुम्हारापुत्र; ब्रह्य--ब्रह्मज्ञान; भावन: --शिक्षा देते हुए।
तुम्हारे द्वारा पूजित होकर श्रीभगवान् मेरे नाम तथा यश का विस्तार करेंगे।
वे तुम्हारेपुत्र बनकर तथा तुम्हें ब्रह्मज्षान की शिक्षा देकर तुम्हारे हृदय में पड़ी गाँठ को छिन्न करदेंगे।
मैत्रेय उवाचदेवहूत्यपि सन्देशं गौरवेण प्रजापते: ।
सम्यक्श्रद्धाय पुरुष कूटस्थमभजद्गुरुम् ॥
५॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; देवहूती--देवहूति; अपि-- भी; सन्देशम्-- आदेश; गौरवेण--- आदरपूर्वक ;प्रजापतेः:--कर्दम का; सम्यक् --पूर्ण; श्रद्धाय-- श्रद्धापूर्वक; पुरुषम्--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्; कूट-स्थम्-- प्रत्येकके हृदय में स्थित; अभजत्--पूजा की; गुरुम्--अत्यन्त पूज्य |
श्री मैत्रेय ने कहा-देवहूति में अपने पति कर्दम के आदेश के प्रति अत्यन्त श्रद्धातथा सम्मान था, क्योंकि वे ब्रह्माण्ड में मनुष्यों के उत्पन्न करने वाले प्रजापतियों में सेएक थे।
हे मुनि, इस प्रकार वह ब्रह्माण्ड के स्वामी घट-घट के वासी श्रीभगवान् कीपूजा करने लगी।
तस्यां बहुतिथे काले भगवान्मधुसूदन: ।
कार्दमं वीर्यमापन्नो जज्ञेउग्निरिव दारुणि ॥
६॥
तस्याम्ू--देवहूति में; बहु-तिथे काले--अनेक वर्षों बाद; भगवान्--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्; मधु-सूदन:--मधु असुरके संहारक; कार्दमम्--कर्दम; वीर्यम्--वीर्य में; आपन्न:--प्रविष्ट किया; जज्ञे-- प्रकट हुआ; अग्नि:--आग; इब--समान; दारुणि-काष्ट में
अनेक वर्षो बाद मधुसूदन अर्थात् मधु नामक असुर के संहारकर्ता, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कर्दम मुनि के वीर्य में प्रविष्ठ होकर देवहूति के गर्भ में उसी प्रकार प्रकट हुएजिस प्रकार किसी यज्ञ के काष्टठ में से अग्नि उत्पन्न होती है।
अवादयंस्तदा व्योम्नि वादित्राणि घनाघना: ।
गायन्ति तं सम गन्धर्वा नृत्यन्त्यप्सससो मुदा ॥
७॥
अवादयनू--बजाते हुए; तदा--उस समय; व्योम्नि--आकाश में; वादित्राणि--वाद्ययंत्र, बाजे; घनाघना:--बादल;गायन्ति--गाने लगे; तमू--उसको; स्म--निश्चय ही; गन्धर्वा:--गंधर्वगण; नृत्यन्ति--नाचने लगे; अप्सरस: --अप्सराएँ; मुदा--आनन्दित होकर
पृथ्वी पर उनके अवतरित होते समय, आकाश में देवताओं ने वाद्ययंत्रों के रूप मेंजल बरसाने वाले मेघों से वाद्यसंगीत की सी ध्वनियाँ बजायी।
स्वर्गिक गवैये गंधर्वगण भगवान् की महिमा का गान करने लगे और अप्सराओं के नाम से प्रसिद्ध स्वर्गिकनर्तकियाँ आनन्द विभोर होकर नाचने लगीं।
पेतु: सुमनसो दिव्या: खेचरैरपवर्जिता: ।
प्रसेदुश्न॒ दिश: सर्वा अम्भांसि च मनांसिच ॥
८॥
पेतु:--गिरे, बरसे; सुमनस:--फूल; दिव्या:--सुन्दर; खे-चरैः --आकाशचारी देवताओं द्वारा; अपवर्जिता:--गिरायेगये; प्रसेदु:--संतुष्ट हुआ; च--तथा; दिश:--दिशाएँ; सर्वा:ः--सभी; अम्भांसि--जल; च--तथा; मनांसि--मन;च-यथा।
भगवान् के प्राकट्य के समय आकाश में मुक्त रुप से विचरण करनेवाले देवताओंने फूल बरसाये।
सभी दिशाएँ, सभी सागर तथा सबों के मन परम प्रसन्न हुए।
तत्कर्दमाश्रमपदं सरस्वत्या परिश्रितम् ।
स्वयम्भू: साकमृषिभिर्मरीच्यादिभिरभ्ययात् ॥
९॥
तत्--वह; कर्दम--कर्दम के; आश्रम-पदम्--आश्रम के स्थान पर; सरस्वत्या--सरस्वती नदी के द्वारा; परिश्रितम्--घिरा हुआ; स्वयम्भू:--ब्रह्मा आत्म-जन्मा ; साकम्--साथ; ऋषिभि:--ऋषियों के; मरीचि--मरीचि मुनि;आदिभि:--तथा अन्य; अभ्ययात्--वहाँ आये
सर्वप्रथम सृजित जीव ब्रह्मा मरीचि तथा अन्य मुनियों के साथ कर्दम के आश्रम गये,जो सरस्वती नदी से चारों ओर से घिरा था।
भगवत्तं परं ब्रह्म सत्त्वेनांशेन शत्रुहन् ।
तत्त्वसड्ख्यानविज्ञप्त्यै जातं विद्वानज: स्वराट् ॥
१०॥
भगवन्तम्-- भगवान्; परमू-- परम; ब्रह्म --ब्रह्म; सत्त्वेन--कल्मषरहित अस्तित्व वाला; अंशेन--अंश से; शत्रु-हन्--हे शत्रुओं के संहारक, विदुर; तत्त्व-सड्ख्यान--चौबीस भौतिक तत्त्वों का दर्शन; विज्ञप्त्य--व्याख्या के लिए;जातम्- उत्पन्न; विद्वानू--ज्ञाता; अजः--अजन्मा ब्रह्मा ; स्व-राट्ू-स्वच्छन्द |
मैत्रेय ने आगे कहा-हे शत्रुओं के संहारक, ज्ञान प्राप्त करने में प्राय: स्वच्छन्द,अजन्मा ब्रह्मजी समझ गये कि श्रीभगवान् का एक अंश अपने कल्मषरहि अस्तित्व में,सांख्ययोग रूप में समस्त ज्ञान की व्याख्या के लिए देवहूति के गर्भ से प्रकट हुआ है।
सभाजयन्विशुद्धेन चेतसा तच्चिकीर्षितम् ।
प्रहष्यमाणैरसुभि: कर्दमं चेदमभ्यधात् ॥
११॥
सभाजयन्ू--पूजा करते हुए; विशुद्धेन--विशुद्ध; चेतसा--हृदय से; तत्-- श्री भगवान् का; चिकीर्षितम्--वांछितकार्यकलाप; प्रहृष्यमाणै:--प्रमुदित; असुभि:--इन्द्रियों से; कर्दमम्--कर्दम मुनि; च--तथा देवहूति से; इदम्--यह;अभ्यधात्--कहा |
अवतार रुप में भगवान के अभिप्रेत कार्यकलापों के लिए प्रमुदित इन्द्रियों तथाविशुद्ध हृदय से परमेश्वर की पूजा करके, ब्रह्माजी ने कर्दम तथा देवहूति से इस प्रकारकहा।
ब्रह्मोवाचत्वया मेपचितिस्तात कल्पिता निर्व्यलीकतः ।
यन्मे सझ्जगृहे वाक्यं भवान्मानद मानयन् ॥
१२॥
ब्रह्मा--ब्रह्माजी ने; उबाच--कहा; त्वया--तुम्हारे द्वारा; मे--मेरा; अपचिति: --पूजा; तात-हे पुत्र; कल्पिता--सम्पन्न; निर्व्यलीकत:--बिना द्वैत के; यत्--चूँकि; मे--मेरा; सझ्जगृहे-- पूर्णतया स्वीकार किया है; वाक्यम्--उपदेश; भवान्ू--आप; मान-द-हे कर्दम अन्यों का सम्मान करने वाले ; मानयन्ू--आदर करते हुए।
ब्रह्माजी ने कहा : प्रिय पुत्र कर्दम, चूँकि तुमने मेरे उपदेशों का आदर करते हुए उन्हेंबिना किसी द्वैत के स्वीकार किया है, अतः तुमने मेरी समुचित तरह से पूजा की है।
तुमनेमेरे सारे उपदेशों का पालन किया है, ऐसा करके तुमने मेरा सम्मान किया है।
एतावत्येव शुश्रूषा कार्या पितरि पुत्रकै: ।
बाढमित्यनुमन्येत गौरवेण गुरोर्वच: ॥
१३॥
एतावती--इस हद तक; एव--ठीक ठीक; शुश्रूषा--सेवा; कार्या--करनी चाहिए; पितरि--पिता की; पुत्रकै:--पुत्रों के द्वारा; बाढम् इति--स्वीकार करते हुए, 'जो आज्ञा'; अनुमन्येत--आज्ञा पालन करना चाहिए; गौरवेण--आदरपूर्वक; गुरो:ः--गुरु के; बच:--आदेश |
पुत्रों को अपने पिता की ऐसी ही सेवा करनी चाहिए पुत्र को चाहिए कि अपनेपिता या गुरु के आदेश का पालन सम्मानपूर्वक ‘जो आज्ञा'' कहते हुए करे, ।
इमा दुहितरः सत्यस्तव वत्स सुमध्यमा: ।
सर्गमेतं प्रभाव: स्वैर्बृहयिष्यन्त्यनेकधा ॥
१४॥
इमा:--ये; दुहितरः --पुत्रियाँ; सत्य:--साध्वी; तव--तुम्हारी; वत्स--हे पुत्र; सु-मध्यमा:--तन्वंगी, पतली कमरवाली; सर्गम्--सृष्टि; एतम्--यह; प्रभावै: --वंशों द्वारा; स्वै:--स्वतः ; बूंहयिष्यन्ति--वे बढ़ावेंगी; अनेक-धा--नानाप्रकार से।
तब ब्रह्माजी ने कर्दम मुनि की नवों कन्याओं की प्रशंसा यह कह कर की-तुम्हारीसभी तन््वंगी कन्याएँ निस्संदेह साध्वी हैं।
मुझे विश्वास है कि वे अनेक प्रकार से अपनेवंशों द्वारा इस सृष्टि का वर्धन करेंगी।
अतत्त्वमृषिमुख्येभ्यो यथाशीलं यथारूचि ।
आत्मजा: परिदेह्मद्य विस्तृणीहि यशो भुवि ॥
१५॥
अतः--इसलिए; त्वम्-तुम; ऋषि-मुख्येभ्य: -- प्रमुख ऋषियों को; यथा-शीलम्--स्वभावों के अनुसार; यथा-रुचि--रुचि के अनुसार; आत्म-जा:--अपनी पुत्रियाँ; परिदेहि-- प्रदान करो; अद्य--आज; विस्तृणीहि-- प्रसारकरो; यशः--यश; भुवि--ब्रह्माण्ड भर में |
अतः आज तुम इन पुत्रियों को उनके स्वभाव तथा उनकी रुचियों के अनुसार श्रेष्ठमुनियों को प्रदान कर दो और इस प्रकार सारे ब्रह्माण्ड में अपना सुयश फैलाओ।
वेदाहमाद्यं पुरुषमवर्तीर्ण स्वमायया ।
भूतानां शेवधि देहं बिभ्राणं कपिल मुने ॥
१६॥
बेद--जानता हूँ; अहम्ू--मैं; आद्यम्ू--आदि; पुरुषम्--भोक्ता; अवतीर्णम्--अवतरित होकर; स्व-मायया--अपनीअन्तरंगा शक्ति से; भूतानाम्ू--समस्त जीवात्माओं का; शेवधिम्ू--सभी इच्छाओं का प्रदाता, जो विशाल कोष केतुल्य है; देहमू--शरीर; बिश्राणम्--मानते हुए; कपिलम्--कपिल मुनि को; मुने--हे कर्दम मुनि!
हे कर्दम मुनि, मुझे ज्ञात है कि अब आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अपनी अन्तरंगाशक्ति से अवतार रूप में प्रकट हुए हैं।
वे जीवात्माओं के सभी मनोरथों को पूरा करनेवाले हैं और उन्होंने अब कपिल मुनि का शरीर धारण किया है।
ज्ञानविज्ञानयोगेन कर्मणामुद्धरन्जटा: ।
हिरण्यकेशः पद्याक्ष: पद्ममुद्रापदाम्बुज: ॥
१७॥
ज्ञान--शास्त्रीय ज्ञान का; विज्ञान--तथा व्यवहार; योगेन--योग के द्वारा; कर्मणाम्-कार्यो का; उद्धरन्--समूलविच्छेद करने के लिए; जटा:--जड़ें; हिरण्य-केश:--सुनहले बाल; पद्मय-अक्ष:--कमल से समान नेत्र वाला; पदा-मुद्रा--कमल चिह्न से युक्त; पद-अम्बुज:--कमल सदूश चरणों वाले
सुनहले बालकमल की पंखड़ियों जैसे नेत्र तथा कमल के पुष्प से अंकित कमलके समान चरणोवाले कपिल मुनि अपने योग तथा शास्त्रीय ज्ञान के व्यवहार से इसभौतिक जगत में कर्म की इच्छा को समूल नष्ट कर देंगे।
एष मानवि ते गर्भ प्रविष्ट: कैटभार्दनः ।
अविद्यासंशयग्रन्थि छित्त्वा गां विचरिष्यति ॥
१८॥
एष:--वही श्रीभगवान्; मानवि--हे मनु की पुत्री; ते--तुम्हारे; गर्भभू--गर्भ में; प्रविष्ट:-- प्रविष्ट हुआ है; कैटभ-अर्दन:--कैटभ असुर को मारने वाला; अविद्या--अज्ञान का; संशय--तथा सन्देह का; ग्रन्थिमू--गाँठ; छित्त्वा--काटकर; गाम्--संसार में; विचरिष्यति--विचरण करेगा।
तब ब्रह्माजी ने देवहूति से कहा : हे मनुपुत्री, जिन श्रीभगवान् ने कैटभ असुर काबध किया है, वे ही अब तुम्हारे गर्भ में आये हैं।
वे तुम्हारे समस्त संशय तथा अज्ञान कीगाँठ को नष्ट कर देंगे।
तब वे सारे विश्व का भ्रमण करेंगे।
अयं सिद्धगणाधीश: साड्ख्याचार्य: सुसम्मतः ।
लोके कपिल हइत्याख्यां गन्ता ते कीर्तिवर्धन: ॥
१९॥
अयमू--यह भगवान्; सिद्ध-गण--सिद्धमुनियों का; अधीश:--प्रमुख; साइड्ख्य-आचार्य: --सांख्य दर्शन में दक्षआचार्योो द्वारा; सु-सम्मतः--वैदिक नियमों के अनुसार मान्य; लोके --संसार में; कपिल: इति--कपिल रूप में;आख्याम्--विख्यात; गन्ता--वह घूमेगा; ते--तुम्हारा; कीर्ति--यश; वर्धन:--बढ़ाते हुएतुम्हारा पुत्र समस्त सिद्धगणों का अग्रणी होगा।
वह वास्तविक ज्ञान का प्रसार करनेमें दक्ष आचार्यो द्वारा मान्य होगा और मनुष्यों में वह कपिल नाम से विख्यात होगा।
देवहूति के पुत्र-रूप में वह तुम्हारे यश को बढ़ाएगा।
मैत्रेय उवाचतावाश्वास्य जगत्स््रष्टा कुमारैः सहनारदः ।
हंसो हंसेन यानेन त्रिधामपरमं ययौ ॥
२०॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; तौ--दम्पति; आश्वास्य-- आश्वस्त करके; जगत्ू-स्त्रष्टा--ब्रह्माण्ड का निर्माता;कुमारैः--कुमारों के साथ साथ; सह-नारद:--नारद सहित; हंसः--ब्रह्माजी; हंसेन यानेन-- अपने हंस वाहन द्वारा;त्रि-धाम-परमम्--सर्वोच्च लोक को; ययौ--चले गये।
श्रीमैत्रेय ने कहा-कर्दम मुनि तथा उनकी पत्नी देवहूति से इस प्रकार कह करब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा ब्रह्माजी, जिन्हें हंस भी कहा जाता है, अपने वाहन हंस पर चढ़करचारों कुमारों तथा नारद सहित तीनों लोकों में से सर्वोच्च लोक को वापस चले गये।
गते शतधृतौ क्षत्त: कर्दमस्तेन चोदित: ।
यथोदितं स्वदुहितृः प्रादाद्विश्वसृजां ततः ॥
२१॥
गते--चले जाने के बाद; शत-धृतौ-- भगवान् ब्रह्मा; क्षत्त:--हे विदुर; कर्दम:--कर्दम मुनि; तेन--उसके द्वारा;चोदित:--आदेशित होकर; यथा-उदितम्--कहे जाने के अनुसार; स्व-दुहितृ:--अपनी कन्याएँ; प्रादात्ू--प्रदान करदिया; विश्व-सृजाम्-- प्राणियों के स्त्रष्टा; ततः--तदनन्तर।
हे विदुर ब्रह्माजी, कर्दम मनि ने अपनी नवों पुत्रियों को ब्रह्मा द्वारा दिये गये आदेशोंके अनुसार नौ ऋषियों को प्रदान कर दिया, जिन्होंने इस संसार के मनुष्यों का सृजनकिया।
मरीचये कलां प्रादादनसूयामथात्रये ।
श्रद्धामड्रिरसे उयच्छत्पुलस्त्याय हविर्भुवम् ॥
२२॥
पुलहाय गतिं युक्तां क्रतवे च क्रियां सतीम् ।
ख्यातिं च भूगवेयच्छद्ठसिष्ठायाप्यरुन्धतीम् ॥
२३॥
मरीचये--मरीचि को; कलाम्--कला; प्रादात्-- प्रदान किया; अनसूयाम्-- अनुसूया; अथ--तब ; अन्नये--अत्रिको; श्रद्धाम्- श्रद्धा; अड्विसे--अंगिरा को; अयच्छतू--दे दिया; पुलस्त्याय--पुलस्त्य को; हविर्भुवम्-हविर्भू;पुलहाय--पुलह को; गतिम्--गति; युक्ताम्--उपयुक्त; क्रतवे--क्रतु को; च--यथा; क्रियाम्--क्रिया; सतीम्--सती; ख्यातिम्-ख्याति; च--यथा; भूगवे-- भूगु को; अयच्छत्--दे दिया; वसिष्ठाय--वसिष्ठ मुनि को; अपि-- भी;अरुन्धतीम्--अरुन्धती |
कर्दम मुनि ने अपने पुत्री कला को मारीचि को और दूसरी कन्या अनुसूया को अत्रिको समर्पित कर दिया।
श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति तथा अरुन्धती नामककन्याएँ क्रमशः अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भूगु और वसिष्ठ को प्रदान की गईं।
अथर्वणेददाच्छान्ति यया यज्ञो वितन्यते ।
विप्रर्षभान्कृतोद्वाहान्सदारान्स्समलालयत् ॥
२४॥
अथर्वणे--अथर्वा को; अददात्--प्रदान किया; शान्तिमू--शान्ति; यया--जिसके द्वारा; यज्ञ:--यज्ञ; वितन्यते--किया जाता है; विप्र-ऋषभानू्--ब्राह्मणों में अग्रगण्य ; कृत-उद्दाहान्ू--विवाह कर दिया; स-दारानू--उनकी पत्नियोंसहित; समलालयतू--पालन किया।
उन्होंने शान्ति अथर्वा को प्रदान की।
शान्ति के कारण यज्ञ अच्छी तरह सम्पन्न होनेलगे।
इस प्रकार उन्होंने अग्रणी ब्राह्मणों से उन सबका विवाह कर दिया और पतियोंसहित उन सबका पालन करने लगे।
ततस्त ऋषय: क्षत्त: कृतदारा निमन्त्रय तम् ।
प्रातिष्ठन्नन्दिमापन्ना: स्वं स्वमाश्रममण्डलम् ॥
२५॥
ततः--तब; ते--वे; ऋषय: --ऋषिगण; क्षत्त:--हे विदुर; कृत-दारा:--इस प्रकार विवाहित; निमन्त्रय--विदा लेकर;तम्--कर्दम से; प्रातिष्ठन्ू--चले गये; नन्दिम्--प्रसन्नता को; आपतन्ना:--प्राप्त; स्वम् स्वमू-- अपने अपने; आश्रम-मण्डलमू--आश्रम।
हे विदुर, इस प्रकार विवाहित होकर ऋषियों ने कर्दम से विदा ली और वेप्रसन्नतापूर्वक अपने अपने आश्रम को चले गये।
सचावतीर्ण त्रियुगमाज्ञाय विबुधर्षभम् ।
विविक्त उपसड्डम्य प्रणम्य समभाषत ॥
२६॥
सः-कर्दम मुनि ने; च--तथा; अवतीर्णम्--अवतार लिया; त्रि-युगम्--विष्णु को; आज्ञाय--समझ कर; विबुध-ऋषभम्--देवताओं का मुखिया; विविक्ते--एकान्त स्थान में; उपसड्रम्य--पास जाकर; प्रणम्य--प्रणाम करके ;समभाषत--बोला।
जब कर्दम मुनि ने समझ लिया कि सब देवताओं के प्रधान पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्विष्णु ने अवतार लिया है, तो वे एकान्त स्थान में जाकर उन्हें नमस्कार करते हुए इसप्रकार बोले।
अहो पापच्यमानानां निरये स्वैरमड्रलै: ।
कालेन भूयसा नूनं प्रसीदन््तीह देवता: ॥
२७॥
अहो--ओह; पापच्यमानानाम्--सताये हुओं के साथ; निरये--नारकीय बंधन में; स्वैः--अपना, निजी; अमड्रनलै:--कुकृत्यों पापों से; कालेन भूयसा--दीर्घकाल बाद; नूनम्--निस्सन्देह; प्रसीदन्ति--प्रसन्न होते हैं; हह--इस संसारमें; देवता:--देवतागण ।
कर्दम मुनि ने कहा--ओह! इस ब्रह्माण्ड के देवता लम्बी अवधि के बाद कष्ट मेंपड़ी हुई उन आत्माओं पर प्रसन्न हुए हैं, जो अपने कुकृत्यों के कारण भौतिक बन्धन मेंपड़े हुए हैं।
बहुजन्मविपक्वेन सम्यग्योगसमाधिना ।
द्रह्लूं यतन्ते यतयः शून्यागारेषु यत्पदम् ॥
२८॥
बहु--अनेक; जन्म--जन्मों के बाद; विपक्वेन--पका हुआ, प्रौढ़; सम्यक्--पूर्णतः; योग-समाधिना--योग मेंसमाधि द्वारा; द्रष्टमू--देखने के लिए; यतन्ते--प्रयत्त करते हैं; यतय:--योगीजन; शून्य-अगारेषु--एकान्त स्थानों में;यत्--जिसके; पदम्--पाँवपरिपक्व
योगीजन योग समाधि में अनेक जन्म लेकर एकान्त स्थानों में रह करश्रीभगवान् के चरणकमलों को देखने का प्रयत्ल करते रहते हैं।
करते हैं।
" स एव भगवानद्य हेलनं न गणय्य नः ।
ग्हेषु जातो ग्राम्याणां यः स्वानां पक्षपोषण: ॥
२९॥
सः एव--वही; भगवानू-- श्रीभगवान्; अद्य--आज; हेलनम्---उपेक्षा; न--नहीं; गणय्य--ऊँचा तथा नीचा मानकर;नः--हमारे; गृहेषु--घरों में; जात:--प्रकट हुआ; ग्राम्याणाम्--सामान्य गृहस्थों का; यः--जो; स्वानाम्-- अपनेभक्तों का; पक्ष-पोषण:--पक्षधर |
हम जैसे सामान्य गृहस्थों की उपेक्षा का ध्यान न करते हुए वही श्रीभगवान् अपनेभक्तों की सहायता के लिए ही हमारे घरों में प्रकट होते हैं।
स्वीयं वाक्यमृतं कर्तुमवतीों उसि मे गृहे ।
चिकीर्षुर्भगवान्ज्ञानं भक्तानां मानवर्धन: ॥
३०॥
स्वीयम्ू--निज के; वाक्यम्--शब्द; ऋतम्--सत्य; कर्तुमू--बनाने के लिए; अवतीर्ण:--अवतरित; असि--हुए हो;मे गृहे --मेरे घर में; चिकीर्षु:--विस्तार करने के लिए इच्छुक; भगवान् -- श्री भगवान्; ज्ञानमू--ज्ञान; भक्तानाम्--भक्तों का; मान--सम्मान, आदर; वर्धन:--बढ़ाने वाला।
कर्दम मुनि ने कहा--सदैव अपने भक्तों का मानवर्धन करने वाले मेरे प्रिय भगवान्,आप अपने बचनों को पूरा करने तथा वास्तविक ज्ञान का प्रसार करने के लिए ही मेरे घरमें अवतरित हुए हैं।
तान्येव तेडभिरूपाणि रूपाणि भगवंस्तव ।
यानि यानि च रोचन्ते स्वजनानामरूपिण: ॥
३१॥
तानि--वे; एब--सचमुच; ते--तुम्हारे; अभिरूपाणि-- अनुकूल; रूपाणि--रूप; भगवनू--हे भगवान्; तब--तुम्हारा; यानि यानि--जो जो; च--तथा; रोचन्ते-- अच्छे लगते हैं; स्व-जनानामू-- अपने भक्तों को; अरूपिण:--बिना भौतिक रूप वाले का।
हे भगवन्, यद्यपि आपका कोई भौतिक रूप नहीं है, किन्तु आपके अपने ही अनन्तरूप हैं।
वे सचमुच ही आपके दिव्य रूप हैं और आपके भक्तों को आनन्दित करनेवालेहैं।
त्वां सूरिभिस्तत्त्वबुभुत्सयाद्धासदाभिवादाईणपादपीठम् ।
ऐश्वर्यवैराग्ययशो वबोध-वीर्यश्रिया पूर्तमहं प्रपय्ये ॥
३२॥
त्वामू--तुमको; सूरिभि:--परम साधुओं द्वारा; तत्त्त--परम सत्य; बुभुत्सया--जानने की इच्छा से; अद्धा--निश्चयही; सदा--सदैव; अभिवाद--अभिवादनों का; अर्हण--योग्य; पाद--आपके पैरों के; पीठम्--आसन को;ऐश्वर्य--ऐश्वर्य; वैराग्य--विराग; यश:--कीर्ति; अवबोध--ज्ञान; वीर्य--पौरूष; भ्रिया--सौन्दर्य से; पूर्तम्--पूर्ण;अहम्--ैं; प्रपद्ले--शरण में हूँ, समर्पण करता हूँ।
हे भगवान्, आपके चरणकमल ऐसे कोष के समान हैं, जो परम सत्य को जानने केइच्छुक बड़े-बड़े ऋषियों-मुनियों का सदैव आदर प्राप्त करने वाला है।
आप ऐश्वर्य,वैराग्य, दिव्य यश, ज्ञान, वीर्य और सौन्दर्य से ओत-प्रोत हैं अत: मैं आपके चरणकमलोंकी शरण में हूं।
परं प्रधान पुरुष महान्तंकालं कविं त्रिवृतं लोकपालम् ।
आत्मानुभूत्यानुगतप्रपन्ञंस्वच्छन्दशक्ति कपिल प्रपद्ये ॥
३३॥
परम्--दिव्य; प्रधानम्--परम; पुरुषम्--व्यक्ति, पुरुष; महान्तम्ू--जो इस भौतिक जगत का मूल है; कालम्ू--जोकाल समय है; कविम्--पूर्णतया ज्ञात; त्रि-वृतम्ू--तीन गुण; लोक-पालम्--समस्त लोकों का पालनकर्ता;आत्म--अपने आप में; अनुभूत्य-- अनुभूति शक्ति से; अनुगत--मग्न; प्रपञ्मम्ू--जिनका भौतिक प्राकट्य; स्व-छन्द--स्वतन्त्र रीति से; शक्तिमू--जो शक्तिमान है; कपिलम्-- भगवान् कपिल की; प्रपद्ये--शरण लेता हूँ।
मैं कपिल के रूप में अवतरित होने वाले पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरण लेता हूँ,जो स्वतन्त्र रूप से शक्तिमान तथा दिव्य हैं, जो परम पुरुष हैं तथा पदार्थ और काल कोमिलाकर सबों के भगवान् हैं, जो त्रिगुणमय सभी ब्रह्माण्डों के पालनकर्ता हैं और प्रलयके पश्चात् भौतिक प्रपञ्ञों को अपने में लीन कर लेते हैं।
आ स्माभिपृच्छेद्द्य पतिं प्रजानांत्वयावतीर्णर्ण उताप्तकाम: ।
परिब्रजत्पदवीमास्थितो हंचरिष्ये त्वां हदि युझ्नन्विशोक: ॥
३४॥
आ सम अभिपृच्छे--मैं पूछ रहा या आज्ञा माँग रहा हूँ; अद्य--अब; पतिम्ू-- भगवान्; प्रजानाम्ू--समस्त प्राणियों का;त्वया--तुम्हारे द्वारा; अवतीर्ण-ऋण:--ऋणमुक्त; उत--तथा; आप्त-- पूर्ण; काम:--इच्छाएँ; परिव्रजत्--परिव्राजककी; पदवीम्--पथ; आस्थित:--स्वीकार करते हुए; अहम्--मैं; चरिष्ये-- भ्रमण करूँगा; त्वाम्--तुम; हृदि--मेरेहृदय में ; युज्नन्ू--रखते हुए; विशोक:--शोक से मुक्त |
समस्त जीवात्माओं के स्वामी मुझे आप से आज कुछ पूछना है।
चूँकि आपने मुझेअब पितृ-ऋण से मुक्त कर दिया है और मेरे सभी मनोरथ पूरे हो चुके हैं, अतः मैंसंन्यास-मार्ग ग्रहण करना चाहता हूँ।
इस गृहस्थ जीवन को त्याग कर मैं शोकरहितहोकर अपने हृदय में सदैव आपको धारण करते हुए सर्वत्र भ्रणण करना चाहता हूँ।
श्रीभगवानुवाचमया प्रोक्ते हि लोकस्य प्रमाणं सत्यलौकिके ।
अथाजनि मया तुभ्यं यदवोचमृतं मुने ॥
३५॥
श्री-भगवान् उबाच-- श्री भगवान् ने कहा; मया--मेरे द्वारा; प्रोक्तम्ू--कहा गया; हि--वास्तव में; लोकस्य--मनुष्योंके लिए; प्रमाणम्--प्रमाण, मानदण्ड; सत्य--शास्त्रोक्त वैदिक ; लौकिके--तथा सामान्य बोली में; अथ--अतः;अजनि--जन्म लिया; मया--मेरे द्वारा; तुभ्यम्ू--तुमको; यत्--जो; अवोचम्--मैंने कहा; ऋतम्--सत्य; मुने--हेमुनि!
भगवान् कपिल ने कहा-मैं जो भी प्रत्यक्ष रूप से या शास्त्रों में कहता हूँ वह संसारके लोगों के लिए सभी प्रकार से प्रामाणिक है।
हे मुने, चूँकि मैं तुमसे पहले ही कहचुका हूँ कि मैं तुम्हारा पुत्र बनूँगा, अतः उसी को सत्य करने हेतु मैंने अवतार लिया है।
एतन्मे जन्म लोकेस्मिन्मुमुक्षूणां दुराशयात् ।
प्रसड्ख्यानाय तत्त्वानां सम्मतायात्मदर्शने ॥
३६॥
एतत्--यह; मे--मेरा; जन्म--जन्म; लोके --संसार में; अस्मिन्ू--इस; मुमुक्षूणाम्--मुक्ति के इच्छुक परम साधुओंद्वारा; दुराशयात्--अनावश्यक भौतिक इच्छाओं से; प्रसड्ख्यानाय--विवेचन करने के लिए; तत्त्वानामू--सत्यों का;सम्मताय--अत्यन्त समाहत; आत्म-दर्शने-- आत्म-साक्षात्कार में |
इस संसार में मेरा प्राकट्य विशेष रूप से सांख्य दर्शन का प्रतिपादन करने के लिएहुआ है।
यह दर्शन उन व्यक्तियों के द्वारा आत्म-साक्षात्कार हेतु परम समाहत है, जोअनावश्यक भौतिक कामनाओं के बन्धन से मुक्ति चाहते हैं।
एष आत्मपथोव्यक्तो नष्ट: कालेन भूयसा ।
त॑ प्रवर्तयितुं देहमिमं विद्धि मया भूतम् ॥
३७॥
एष:--यह; आत्म-पथ: --आत्म-साक्षात्कार का मार्ग; अव्यक्त: --समझने में दुरूह; नष्ट:--खोया हुआ; कालेनभूयसा--बहुत समय से, कालक्रम से; तमू--इसको; प्रवर्तयितुमू--पुन: चालू करने के लिए; देहम्--देह को;इमम्--इस; विद्धि--जानो; मया--मेरे द्वारा; भूतम्--स्वीकार किया गया।
आत्म-साक्षात्कार का यह मार्ग, जिसको समझ पाना दुष्कर है, अब कालक्रम सेलुप्त हो गया है।
इस दर्शन को पुन: मानव समाज में प्रवर्तित करने और व्याख्या करने केलिए ही मैंने कपिल का यह शरीर धारण किया है--ऐसा जानो।
गच्छ काम मयापृष्टो मयि सन्न्यस्तकर्मणा ।
जित्वा सुदुर्जयं मृत्युममृतत्वाय मां भज ॥
३८ ॥
गच्छ--जाओ; कामम्-- जैसी तुम्हारी इच्छा है; मया--मेरे द्वारा; आपृष्ट: --आदिष्ट; मयि--मुझमें; सन्न्यस्त--पूरीतरह शरणागत; कर्मणा--अपने कार्य से; जित्वा--जीतकर; सुदुर्जयम्-- अजेय ; मृत्युम्--मृत्यु को; अमृतत्वाय--अमर जीवन के लिए; माम्--मुझको; भज--भजो, मेरी भक्ति में तत्पर हो |
अब मेरे द्वारा आदिष्ट तुम मुझे अपने समस्त कार्यों को अर्पित करके जहाँ भी चाहोजाओ।
दुर्जेय मृत्यु को जीतते हुए शाश्वत जीवन के लिए मेरी पूजा करो।
मामात्मानं स्वयंज्योतिः सर्वभूतगुहाशयम् ।
आत्मन्येवात्मना वीक्ष्य विशोकोभयमृच्छसि ॥
३९॥
माम्--मुझे; आत्मानम्-परमात्मा को; स्वयम्-ज्योति:ः--आत्म-प्रकाश; सर्व-भूत--सभी जीवों को; गुहा--हृदयोंमें; आशयम्--निवास; आत्मनि--अपने हृदय में; एव--निस्सन्देह; आत्मना--अपनी बुद्धि से; वीक्ष्य--सदैव देखकर, सदैव सोच कर; विशोक:ः --शोक से रहित; अभयम्--निर्भीकता; ऋच्छसि--तुम प्राप्त करोगे।
तुम अपनी बुद्धि के द्वारा अपने हृदय में निरन्तर मेरा दर्शन करोगे, जो समस्तजीवात्माओं के हृदयों के भीतर वास करने वाला परम स्वतः प्रकाशमान आत्मा है।
इसप्रकार तुम समस्त शोक व भय से रहित शाश्वत जीवन प्राप्त करोगे।
मात्र आध्यात्मिकीं विद्यां शमनीं सर्वकर्मणाम् ।
वितरिष्ये यया चासौ भयं चातितरिष्यति ॥
४०॥
मात्रे--अपनी माँ को; आध्यात्मिकीम्--आत्मजीवन का द्वार खोलने वाली; विद्याम्ू--ज्ञान, विद्या को; शमनीम्--समाप्त करने वाली; सर्व-कर्मणाम्--समस्त सकाम कर्मों को; वितरिष्ये--मैं प्रदान करूँगा; यया--जिससे; च--भी; असौ--वह; भयम्--डर; च-- भी; अतितरिष्यति--पार कर लेगी।
मैं इस परम ज्ञान को, जो आत्म जीवन का द्वार खोलने वाला है, अपनी माता को भी बतलाऊँगा, जिससे वह भी समस्त सकाम कर्मों के बन्धनों को तोड़कर सिद्धि तथाआत्म दर्शन प्राप्त कर सके ।
इस प्रकार वह भी समस्त भौतिक भय से मुक्त हो जाएगी।
मैत्रेय उवाचएवं समुदितस्तेन कपिलेन प्रजापति: ।
दक्षिणीकृत्य तं॑ प्रीतो वनममेव जगाम ह ॥
४१॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय मुनि ने कहा; एवम्--इस प्रकार; समुदित:--सम्बोधित होकर; तेन--उनके द्वारा; कपिलेन--कपिल द्वारा; प्रजापति:--मानव-समाज का जनक; दक्षिणी-कृत्य--परिक्रमा करके; तम्--उसको ; प्रीत:--शान्तिपूर्वक; वनम्ू--जंगल को; एव--निस्सन्देह; जगाम--प्रस्थान किया; ह--तब
श्रीमैत्रेय ने कहा--इस प्रकार अपने पुत्र कपिल द्वारा सम्बोधित किये जाने पर मानवसमाज के जनक श्रीकर्दमुनि ने उसकी परिक्रमा की और अच्छे तथा शान्त मन से उन्होंनेतुरन्त जंगल के लिए प्रस्थान कर दिया।
ब्रतं स आस्थितो मौनमात्मैकशरणो मुनि: ।
निःसड़ो व्यचरत्क्षोणीमनग्निरनिकेतन: ॥
४२॥
ब्रतम्ू-ब्रत; सः--वह कर्दम ; आस्थित: --स्वीकृत; मौनम्--मौन; आत्म-- श्रीभगवान् द्वारा; एक--नितान्त;शरण: --शरण में आया; मुनि:--मुनि; नि:सड्ढ:--बिना संगति के ; व्यचरत्-- भ्रमण करने लगा; क्षोणीम्--पृथ्वीपर; अनग्नि:--अग्निरहित; अनिकेतन: --आश्रमविहीन
कर्दममुनि ने मौन व्रत धारण करना स्वीकार किया जिससे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्का चिन्तन कर सकें और एकमात्र उन्हीं की शरण में जा सकें।
बिना किसी संगी के वेसंन्यासी रूप में पृथ्वी भर में भ्रमण करने लगे, अग्नि अथवा आश्रय से उनका कोईसम्बन्ध न रहा।
मनो ब्रह्मणि युज्ञानो यत्तत्सदसतः परम् ।
गुणावभासे विगुण एकभकक््त्यानुभाविते ॥
४३॥
मनः--मन; ब्रह्मणि--परब्रह्म में; युज्ञान:--स्थिर करते हुए; यत्--जो; तत्--उस; सत् -असतः--कार्य तथा कारण;परम्--अतीत, परे; गुण-अवभासे--तीनों गुणों को प्रकट करने वाला; विगुणे-- भौतिक गुणों से परे; एक-भक्त्या--एकान्तभक्ति से; अनुभाविते--देखा जाता है
उन्होंने अपना मन परब्रह्म पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् में स्थिर कर दिया जो कार्य-कारण से परे हैं, जो तीनों गुणों को प्रकट करने वाले हैं किन्तु उन तीनों गुणों से अतीतहैं और जो केवल अटूट भक्तियोग के द्वारा देखे जा सकते हैं।
निरहड्ड तिर्निर्ममश्न निईन्द्र: समहक्स्वहक् ।
प्रत्यक्प्रशान्तधीर्धीर: प्रशान्तोर्मिरिवोदधि: ॥
४४॥
निरहड्ड तिः--अहंकार से रहित; निर्मम:--ममतारहित; च--यथा; निर्दन्द्दः --द्वैत भाव से रहित; सम-हक् --समदर्शी;स्व-हक्--आत्मदर्शी ; प्रत्यक्--अन्तर्मुखी; प्रशान्त--पूर्णतया संयमित; धी:--मन; धीर:--अविचलित; प्रशान्त--शान्त; ऊर्मि:--जिसकी लहरें; इब--सहश; उदधि: --समुद्र |
इस प्रकार वे अंहकार से रहित और भौतिक ममता से मुक्त हो गये।
अविचलित,समदर्शी तथा अद्वैतभाव से वे अपने को भी देख सके आत्मदर्शी ।
वे अन्तर्मुखी होगये और उसी तरह परम शान्त बन गये जिस प्रकार लहरों से अविचलित समुद्र ।
वबासुदेवे भगवति सर्वन्ञे प्रत्यगात्मनि ।
परेण भक्तिभावेन लब्धात्मा मुक्तबन्धन: ॥
४५॥
वबासुदेवे--वासुदेव को; भगवति-- श्रीभगवान्; सर्व-ज्ञे--सर्वज्ञाता; प्रत्यक्-आत्मनि-- प्रत्येक प्राणी के भीतर स्थिरपरमात्मा; परेण--दिव्य; भक्ति- भावेन-- भक्ति से; लब्ध-आत्मा--आत्मलीन होकर; मुक्त-बन्धन:-- भवबन्धन सेछूटा हुआ।
इस प्रकार वे बद्ध जीवन से मुक्त हो गये और प्रत्येक व्यक्ति के भीतर स्थित सर्वज्ञपरमात्मा श्रीभगवान् वासुदेव की दिव्य सेवा में तल्लीन हो गये।
आत्मानं सर्वभूतेषु भगवन्तमवस्थितम् ।
अपएयत्सर्वभूतानि भगवत्यपि चात्मनि ॥
४६॥
आत्मानम्-परमात्मा; सर्व-भूतेषु--समस्त प्राणियों में; भगवन्तम्-- श्रीभगवान् को; अवस्थितम्--स्थित;अपश्यत्--देखा; सर्व-भूतानि--सब जीवों को; भगवति-- श्री भगवान् में; अपि---और; च--तथा; आत्मनि--परमात्मा में |
उन्हें दिखाई पड़ने लगा कि सबों के हृदय में श्रीभगवान् स्थित हैं और प्रत्येक जीवउनमें स्थित है, क्योंकि वे प्रत्येक के परमात्मा हैं।
इच्छाद्वेषविहीनेन सर्वत्र समचेतसा ।
भगवद्धक्तियुक्तेन प्राप्त भागवती गति: ॥
४७॥
इच्छा--आकाक्षा; द्वेष--तथा ईर्ष्या; विहीनेन-- से रहित; सर्वत्र--सभी जगह; सम--समान; चेतसा--मन से;भगवत्-- श्रीभगवान् को; भक्ति-युक्तेन-- भक्ति- भाव से; प्राप्ता--प्राप्त किया गया; भागवती गतिः--भक्त के धाम परम धाम को वापस जाना
वे समस्त द्वेष तथा इच्छा से रहित, अकल्मष भक्ति करने के कारण समदर्शा होने सेअन्त में भगवान् के धाम को प्राप्त हुए।
