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अध्याय छब्बीसवाँ: भौतिक प्रकृति के मौलिक सिद्धांत

3.26श्रीभगवानुवाचअथ ते सपम्प्रवक्ष्यामि तत्त्वानां लक्षणं पृथक्‌ ।

यद्विदित्वा विमुच्येत पुरुष: प्राकृतैर्गुणै: ॥

१॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; अथ---अब ; ते--तुमसे; सम्प्रवक्ष्यामि--कहूँगा; तत्त्वानामू--परम सत्य कीकोटियों के; लक्षणम्‌--लक्षण; पृथक्‌-- अलग-अलग; यत्‌--जिसे; विदित्वा-- जानकर; विमुच्येत--मुक्त होसकता है; पुरुष:--कोई व्यक्ति; प्राकृतैः--प्रकृति के; गुणैः--गुणों से

भगवान्‌ कपिल ने आगे कहा : हे माता, अब मैं तुमसे परम सत्य की विभिन्नकोटियों का वर्णन करूँगा जिनके जान लेने से कोई भी पुरुष प्रकृति के गुणों के प्रभावसे मुक्त हो सकता है।

ज्ञानं निःश्रेयसार्थाय पुरुषस्यात्मदर्शनम्‌ ।

यदाहुर्वर्णये तत्ते हृदयग्रन्थिभेदनम्‌ ॥

२॥

ज्ञानम्‌--ज्ञान; नि: श्रेयस-अर्थाय--चरम सिद्धि के लिए; पुरुषस्य--मनुष्य का; आत्म-दर्शनम्‌--आत्म-साक्षात्कार;यत्‌--जो; आहु: --कहा है; वर्णये--वर्णन करूँगा; तत्‌ू--वह; ते-- तुमसे; हृदय--हृदय में; ग्रन्थि-- ग्रन्थियाँ;भेदनम्‌--काटती हैं।

आत्म-साक्षात्कार की चरम सिद्धि ज्ञान है।

मैं तुमको वह ज्ञान बतलाऊँगा जिससेभौतिक संसार के प्रति आसक्ति की ग्रन्थियाँ कट जाती हैं।

अनादिरात्मा पुरुषो निर्गुण: प्रकृतेः पर: ।

प्रत्यग्धामा स्वयंज्योतिर्विश्चं येन समन्वितम्‌ ॥

३॥

अनादिः--जिसका आदि न हो; आत्मा--परमात्मा; पुरुष: -- भगवान्‌; निर्गुण:-- प्रकृति के गुणों से परे; प्रकृतेः'परः--इस भौतिक संसार से परे; प्रत्यक्‌-धामा--सर्वत्र दर्शनीय; स्वयम्‌-ज्योति:--स्वयं प्रकाशवान; विश्वम्‌--सम्पूर्णसृष्टि; येन--जिससे; समन्वितम्‌--पालित है।

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ परमात्मा हैं और उनका आदि नहीं है।

वे प्रकृति के गुणों सेपरे और इस भौतिक जगत के अस्तित्व के परे हैं।

वे सर्वत्र दिखाई पड़ने वाले हैं, क्योंकिवे स्वयं प्रकाशवान हैं और उनकी स्वयं प्रकाशवान कान्ति से सम्पूर्ण सृष्टि का पालनहोता है।

सषष प्रकृतिं सूक्ष्मां दैवीं गुणमर्यीं विभु: ।

यहच्छयैवोपगताम भ्यपद्यत लीलया ॥

४॥

सः एष:--वही भगवान; प्रकृतिमू-- भौतिक शक्ति को; सूक्ष्माम्‌--सूक्ष्म; दैवीम्‌--विष्णु से सम्बन्धित, वैष्णवी;गुणमयीम्‌--तीन गुणों से युक्त; विभुः--महान्‌ से महानतम्‌; यहच्छया--स्वेच्छा से; इब--पर्याप्त; उपगताम्‌--प्राप्त;अभ्यपद्यत--स्वीकार किया; लीलया-- अपनी लीला के रूप में |

उस महान्‌ से महानतम्‌ श्रीभगवान्‌ ने सूक्ष्म भौतिक शक्ति को अपनी लीला के रूपमें स्वीकार किया जो त्रिगुणमयी है और विष्णु से सम्बन्धित है।

गुणैर्विचित्रा: सृजतीं सरूपा: प्रकृतिं प्रजा: ।

विलोक्य मुमुहे सद्यः स इह ज्ञानगूहया ॥

५॥

गुणैः--तीनों गुणों से; विचित्रा:--विविध प्रकार का; सृजतीम्‌--उत्पन्न करती हुईं; स-रूपा:--रूपों सहित;प्रकृतिम्‌--प्रकृति; प्रजा:--जीवात्माएँ; विलोक्य--देखकर; मुमुहे--मोह ग्रस्त था; सद्य: --तुरन्‍्त; सः--जीवात्मा;इह--इस संसार में; ज्ञान-गूहया--ज्ञान-आवरण के गुण से।

अपने तीन गुणों से अनेक प्रकारों में विभक्त यह भौतिक प्रकृति जीवों के स्वरूपोंको उत्पन्न करती है और इसे देखकर सारे जीव माया के ज्ञान-आच्छादक गुण सेमोहग्रस्त हो जाते हैं।

एवं पराभिध्यानेन कर्तृत्व॑ प्रकृते: पुमान्‌ ।

कर्मसु क्रियमाणेषु गुणैरात्मनि मन्‍्यते ॥

६॥

एवम्‌--इस प्रकार; पर-- अन्य; अभिध्यानेन--पहचान से; कर्तृत्वम्‌ू--कर्म का सम्पादन; प्रकृतेः--प्रकृति का;पुमान्‌--जीवात्मा; कर्मसु क्रियमाणेषु--कर्म करते समय; गुणैः--तीन गुणों के द्वारा; आत्मनि--अपने आपको;मन्यते--मानता है।

अपनी विस्मृति के कारण दिव्य जीवात्मा प्रकृति के प्रभाव को अपना कर्मक्षेत्र मानबैठता है और इस प्रकार प्रेरित होकर त्रुटिवश अपने को कर्मों का कर्ता मानता है।

तदस्य संसृतिर्बन्ध: पारतन्र्यं च तत्कृतम्‌ ।

भवत्यकर्तुरीशस्य साक्षिणो निर्वृतात्मनः ॥

७॥

ततू-- भ्रान्त धारणा से; अस्य--जीव का; संसृति:--बद्ध जीवन; बन्ध:--बन्धन: ; पार-तन्त्रयम्‌--पराधीन, निर्भरता;च--तथा; तत्‌-कृतम्‌--उससे निर्मित; भवति--है; अकर्तुः--अकर्ता का; ईशस्य--स्वतन्त्र; साक्षिण: --साक्षी,गवाह; निर्वृत-आत्मन:--प्रकृति से प्रसन्न |

भौतिक चेतना ही मनुष्य के बद्धजीवन का कारण है, जिसमें परिस्थितियाँ जीव परहाबी हो जाती हैं।

यद्यपि आत्मा कुछ भी नहीं करता और ऐसे कर्मों से परे रहता है,किन्तु इस प्रकार वह बद्धजीवन से प्रभावित होता है।

कार्यकारणकर्तत्वे कारणं प्रकृतिं विदुः ।

भोक्तृत्वे सुखदुःखानां पुरुष प्रकृतेः परम्‌ ॥

८॥

कार्य--शरीर; कारण--इन्द्रियाँ; कर्तृत्वे--देवताओं के विषय में; कारणम्‌--कारण; प्रकृतिम्‌-- प्रकृति; विदुः--विद्वान समझते हैं; भोक्तृत्वे--अनुभव के विषय में; सुख--सुख का; दुःखानाम्‌--तथा दुख का; पुरुषमू--आत्मा;प्रकृते:--प्रकृति का; परम्‌--दिव्य

बद्धजीव के शरीर, इन्द्रियों तथा इन्द्रियों के अधिष्ठता देवों का कारण भौतिकप्रकृति है।

इसे विद्वान मनुष्य जानते हैं।

स्वभाव से दिव्य, ऐसे आत्मा के सुख तथा दुखजैसे अनुभव स्वयं आत्मा द्वारा उत्पन्न होते हैं।

देवहूतिरुवाचप्रकृते: पुरुषस्यापि लक्षणं पुरुषोत्तम ।

ब्रूहि कारणयोरस्य सदसच्च यदात्मकम्‌ ॥

९॥

देवहूति: उबाच--देवहूति ने कहा; प्रकृते:--शक्तियों का; पुरुषस्य--परम पुरुष की; अपि--भी; लक्षणमू्‌-- लक्षण;पुरुष-उत्तम--हे भगवान्‌; बूहि--कहें; कारणयो:-- कारण; अस्य--इस सृष्टि का; सत्‌-असत्‌--प्रकट तथाअप्रकट; च--तथा; यत्‌-आत्मकम्‌--जिससे युक्त |

देवहूति ने कहा : हे भगवान्‌, आप परम पुरुष तथा उनकी शक्तियों के लक्षण कहें,क्योंकि ये दोनों इस प्रकट तथा अप्रकट सृष्टि के कारण हैं।

श्रीभगवानुवाचयत्तत्त्रिगुणमव्यक्त नित्यं सदसदात्मकम्‌ ।

प्रधान प्रकृतिं प्राहुरविशेषं विशेषवत्‌ ॥

१०॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- श्रीभगवान्‌ ने कहा; यत्‌--अब आगे; तत्‌--वह; त्रि-गुणम्‌--तीन गुणों का संयोग;अव्यक्तम्‌--अप्रकट; नित्यम्‌-शाश्वत; सत्‌-असतू-आत्मकम्‌-कार्य तथा कारण से युक्त; प्रधानम्‌-प्रधान;प्रकृतिम्‌--प्रकृति; प्राहु:--कहते हैं; अविशेषम्‌--जिसमें अन्तर न किया जा सके ; विशेष-बत्‌--अन्तर से युक्त

भगवान्‌ ने कहा : तीनों गुणों का अप्रकट शाश्वत संयोग ही प्रकट अवस्था काकारण है और प्रधान कहलाता है।

जब यह प्रकट अवस्था में होता है, तो इसे प्रकृति कहते हैं।

पदञ्ञभिः पञ्ञभि्रहा चतुर्भिरदेशभिस्तथा ।

एतच्चतुर्विशतिकं गणं प्राधानिकं विदुः ॥

११॥

पश्चभि:ः--पाँच सहित स्थूल तत्त्व ; पञ्ञभिः--पाँच सूक्ष्म तत्त्व ; ब्रह्म--ब्रह्म; चतुर्भि:--चार अन्तःकरण ;दश्भि:--दस पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ ; तथा--उस प्रकार से; एतत्‌--यह; चतु:-विंशतिकम्‌--चौबीस तत्त्वों वाला; गणम्‌--समूह; प्राधानिकम्‌--प्रधान से युक्त; विदु:--जानते हैं |

पाँच स्थूल तत्त्व, पाँच सूक्ष्म तत्त्व, चार अन्तःकरण, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पाँचकर्मेन्द्रियाँ इन चौबीस तत्त्वों का यह समूह प्रधान कहलाता है।

महाभूतानि पञ्जैव भूरापोउग्निर्मरुन्नभः ।

तन्मात्राणि च तावन्ति गन्धादीनि मतानि मे ॥

१२॥

महा-भूतानि--स्थूल तत्त्व; पञ्ञ--पाँच; एब--ठीक-ठीक; भूः--पृथ्वी; आप:--जल; अग्नि:-- अग्नि; मरुतू--वायु; नभ:--आकाश; ततू-मात्राणि--सूक्ष्म तत्त्त; च--तथा; तावन्ति--इतने सारे; गन्ध-आदीनि--गंध इत्यादि स्वाद, रंग, स्पर्श तथा ध्वनि ; मतानि--माने जाते हैं; मे--मेरे द्वारा

पाँच स्थूल तत्त्वों के नाम हैं पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश शून्य ।

सूक्ष्मतत्त्व भी पाँच हैं-गंध, स्वाद, रंग, स्पर्श तथा शब्द ध्वनि ।

इन्द्रियाणि दश श्रोत्रं त्वग्हग्रसननासिका: ।

वाक्करौ चरणौ मेढ़ं पायुर्दशम उच्यते ॥

१३॥

इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; दश--दस; श्रोत्रम्‌ू-- श्रवणेन्द्रिय; त्वक्‌--स्पर्शेन्द्रिय; हक्‌ --दृष्टि की इन्द्रिय; रसन--स्वाद कीइन्द्रिय; नासिका:--गन्ध की इन्द्रिय; वाक्‌ु--वाणी की इन्द्रिय; करौ--दो हाथ; चरणौ--चलने की इन्द्रियाँ पाँव ;मेढ्मू--जननेन्द्रिय; पायु;:--मलत्याग की इन्द्रिय; दशम:--दसवीं; उच्यते--कहलाती है|

ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रयों को मिलाकर इनकी संख्या दस है।

ये हैं-- श्रवणेन्द्रिय,स्वादेन्द्रिय, स्पर्शेन्द्रिय दृश्येन्द्रिय, प्राणेन्द्रिय, वागेन्द्रिय, कार्य करने की इन्द्रियाँ, चलनेकी इन्द्रियाँ, जननेन्द्रियाँ तथा मलत्याग इन्द्रियाँ।

मनो बुद्धिरहड्डारश्नित्तमित्यन्तरात्मकम्‌ ।

चतुर्धा लक्ष्यते भेदो वृत्त्या लक्षणरूपया ॥

१४॥

मनः--मन; बुद्धि:--बुद्धि; अहड्लार: --अहंकार; चित्तम्‌--चेतना; इति--इस प्रकार; अन्त:ः-आत्मकम्‌--आन्तरिकसूक्ष्म इन्द्रियाँ; चतु:-धा--चार प्रकार की; लक्ष्यते--देखी जाती हैं; भेद: --अन्तर; वृत्त्या--अपने कार्यो से; लक्षण-रूपया--विभिन्न लक्षणों द्वारा।

आन्तरिक सूक्ष्म इन्द्रियाँ मन, बुद्धि, अहंकार तथा कलुषित चेतना के रूप में चारप्रकार की जानी जाती हैं।

उनके विभिन्न कार्यों के अनुसार ही इनमें भेद किया जासकता है क्योंकि ये विभिन्न लक्षणों को बताने वाली हैं।

एतावानेव सड्ख्यातो ब्रह्मण: सगुणस्य ह ।

सन्निवेशो मया प्रोक्तो य: काल: पञ्ञविंशकः ॥

१५॥

एतावान्‌--इतना; एव--ही; सड्ख्यात:--गिनाया गया; ब्रह्मण: --ब्रह्म का; स-गुणस्य-- भौतिक गुणों से युक्त;ह--निस्सन्देह; सन्निवेश: -- प्रबन्ध; मया-- मेरे द्वारा; प्रोक्त:--कहा गया; यः--जो; काल:--समय; पशञ्ञ-विंशकः--पच्चीसवाँ |

इन सबको सुयोग्य ब्रह्म माना जाता है।

इन सबको मिलाने वाला तत्त्व काल है,जिसे पच्चीसवें तत्त्व के रूप में गिना जाता है।

प्रभाव पौरुषं प्राहु: कालमेके यतो भयम्‌ ।

अहड्डारविमूढस्य कर्तु: प्रकृतिमीयुष: ॥

१६॥

प्रभावम्‌--प्रभाव; पौरुषम्‌-- भगवान्‌ का; प्राहुः--कहा गया है; कालमू--काल; एके--कुछ; यत:--जिससे;भयम्‌-- भय; अहड्ढार-विमूढस्य--अहंकार से विमूढ़; कर्तु:--आत्मा का; प्रकृतिम्‌--प्रकृति को; ईयुष:--स्पर्शकरके ।

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ का प्रभाव काल में अनुभव किया जाता है, क्योंकि यहभौतिक प्रकृति के सम्पर्क में आने वाले मोहित आत्मा के अहंकार के कारण मृत्यु काभय उत्पन्न करता है।

प्रकृतेर्गुणसाम्यस्य निर्विशेषस्य मानवि ।

चेष्टा यतः स भगवान्काल इत्युपलक्षितः ॥

१७॥

प्रकृते:--प्रकृति का; गुण-साम्यस्य--तीनों गुणों की क्रिया के बिना; निर्विशेषस्य--विशिष्ट गुणों से रहित;मानवि--हे मनु पुत्री; चेष्टा--गति; यत:ः--जिससे; सः--वह; भगवानू-- श्री भगवान्‌; काल: --समय, काल; इति--इस प्रकार; उपलक्षित:--नाम रखा जाता है।

हे स्वायंभुव-पुत्री, हे माता, जैसा कि मैने बतलाया काल ही श्रीभगवान्‌ है, जिससेउदासीन समभाव एवं अप्रकट प्रकृति के गतिमान होने से सृष्टि प्रारम्भ होती है।

अन्त: पुरुषरूपेण कालरूपेण यो बहिः ।

समन्वेत्येष सत्त्वानां भगवानात्ममायया ॥

१८॥

अन्तः-- भीतर; पुरुष-रूपेण--परमात्मा के रूप में; काल-रूपेण--काल के रूप में; य:--वह जो; बहि:--बाहा;समन्वेति--विद्यमान है; एष:--वह; सत्त्वानामू--समस्त जीवों का; भगवान्‌-- श्रीभगवान्‌; आत्म-मायया--अपनीशक्तियों द्वारा

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हुए अपने आपको भीतरसे परमात्मा रूप में और बाहर काल-रूप में रखकर विभिन्न तत्त्वों का समन्वयन करतेहैं।

दैवात्क्षुभितधर्मिण्यां स्वस्यां योनौ पर: पुमान्‌ ।

आश्षत्त वीर्य सासूत महत्तत्त्वं हिरण्मयम्‌ ॥

१९॥

दैवात्‌-जीवों के भाग्य से; क्षुभित--श्षुब्ध; धर्मिण्यामू--जिसका गुण साम्य; स्वस्थामू--निजी, अपना; योनौ--गर्भ प्रकृति में; पर: पुमान्‌--परमात्मा; आधत्त-- धारण किया हुआ; वीर्यम्‌--वीर्य अन्तरंगा शक्ति ; सा--उस प्रकृति ने; असूत--उत्पन्न किया; महत्‌-तत्त्वमू--समग्र विराट बुर्द्धि; हिरण्मयम्‌--हिरण्मय नामक |

जब भगवान्‌ अपनी अन्तरंगा शक्ति से प्रकृति में व्याप्त होते हैं, तो प्रकृति समग्रविराट बुद्धि को उत्पन्न करती है, जिसे हिरण्मय कहते हैं।

यह तब घटित होता है जबप्रकृति बद्धजीवों के गन्तव्यों द्वारा श्षुब्ध की जाती है।

विश्वमात्मगतं व्यञ्ञन्कूटस्थो जगदड्ढु रः ।

स्वतेजसापिबत्तीव्रमात्मप्रस्वापनं तम: ॥

२०॥

विश्वम्‌-ब्रह्माण्ड; आत्म-गतम्‌ू--अपने में सन्निहित; व्यज्ञन्‌ू--प्रकट करते हुए; कूट-स्थ:--अपरिवर्तनीय; जगतू-अह्'ु रः:--समस्त दृश्य जगत का मूल; स्व-तेजसा--अपने ही तेज से; अपिबत्‌--पी लिया; तीव्रमू-घना; आत्म-प्रस्वापनम्‌--जिसने महत्‌ तत्त्व को आवृत कर रखा था; तम:ः--अंधकार |

इस प्रकार तेजस्वी महत्‌ तत्त्व, जिसके भीतर सारे ब्रह्माण्ड समाये हुए हैं, जो समस्तहृश्य जगत का मूल है और जो प्रलय के समय भी नष्ट नहीं होता, अपनी विविधता प्रकटकरके उस अंधकार को निगल जाता है, जिसने प्रलय के समय तेज को ढक लिया था।

यत्तत्सत्त्वगुणं स्वच्छ शान्तं भगवतः पदम्‌ ।

यदाहुर्वासुदेवाख्यं चित्तं तन्महदात्मकम्‌ ॥

२१॥

यत्‌--जो; तत्‌--वह; सत्त्व-गुणम्‌--सतोगुण; स्वच्छम्‌--साफ; शान्तम्‌--शान्त; भगवतः-- भगवान्‌ का; पदम्‌--ज्ञान का पद; यत्‌ू--जो; आहु: --कहलाता है; वासुदेव-आख्यम्‌--वासुदेव के नाम से; चित्तमू--चेतना; तत्‌--वह;महत्‌-आत्मकम्‌--महत्‌ तत्त्व में प्रकट |

सतोगुण, जो भगवान्‌ के ज्ञान की स्वच्छ, सौम्य अवस्था है और जो सामान्यतःवासुदेव या चेतना कहलाता है, महत्‌ तत्त्व में प्रकट होता है।

स्वच्छत्वमविकारित्वं शान्तत्वमिति चेतस: ।

वृत्तिभिल॑क्षणं प्रोक्ते यथापां प्रकृति: परा ॥

२२॥

स्वच्छत्वमू--स्वच्छत्व; अविकारित्वम्‌-विकारों से मुक्ति; शान्तत्वम्‌-शान्तत्व; इति--इस प्रकार; चेतस:--चेतनाका; वृत्तिभि:--गुणों के द्वारा; लक्षणम्‌--लक्षण; प्रोक्तम्‌ू--कहा जाता है; यथा--जिस तरह; अपामू--जल की;प्रकृतिः--स्वाभाविक अवस्था; परा-शुद्धमहत्‌-

तत्त्व के प्रकट होने के बाद ये वृत्तियाँ एकसाथ प्रकट होती हैं।

जिस प्रकारजल पृथ्वी के संसर्ग में आने के पूर्व अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्वच्छ, मीठा तथाशान्त रहता है उसी तरह विशुद्ध चेतना के विशिष्ट लक्षण शान्तत्व, स्वच्छत्व तथाअविकारित्व हैं।

महत्तत्त्वाद्विकुर्वाणाद्धगवद्ठीर्यसम्भवात्‌ ।

क्रियाशक्तिरहड्डारस्त्रिविध: समपद्यत ॥

२३॥

वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्च यतो भव: ।

मनसश्रैन्द्रियाणां च भूतानां महतामपि ॥

२४॥

महत्‌-तत्त्वात्‌ू-महत्‌ तत्त्व से; विकुर्वाणात्‌--विकृत होने से; भगवत्‌-वीर्य-सम्भवात्‌-- भगवान्‌ की निजी शक्ति सेउत्पन्न; क्रिया-शक्ति:--सक्रिय शक्ति से युत; अहड्लार:--अहंकार; त्रि-विध:--तीन प्रकार का; समपद्यत--उत्पन्नहुआ; वैकारिक:--रूपान्तरित सतोगुण में अहंकार; तैजस:ः--रजोगुण में अहंकार; च--तथा; तामस:--तमोगुण में अहंकार; च-- भी; यत:--जिससे; भव: --उत्पत्ति; मनस:--मन का; च--तथा; इन्द्रियाणाम्‌--ज्ञान तथा कर्म कीइन्द्रियों का; च--तथा; भूतानाम्‌ महताम्‌--पाँच स्थूल तत्त्वों का; अपि--भी

महत्‌ तत्त्व से अहंकार उत्पन्न होता है, जो भगवान्‌ की निजी शक्ति से उद्भूत है।

अहंकार में मुख्य रूप से तीन प्रकार की क्रियाशक्तियाँ होती हैं--सत्त्व, रज तथा तम।

इन्हीं तीन प्रकार के अहंकार से मन, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ तथा स्थूल तत्त्व उत्पन्न हुए।

सहस्त्रशिरसं साक्षाद्यममनन्तं प्रचक्षते ।

सड्डूर्षणाख्यं पुरुषं भूतेन्द्रियमनोमयम्‌ ॥

२५॥

सहस्त्र-शिरसम्‌--एक हजार शिरों वाला; साक्षात्‌-- प्रकट रूप में; यमू--जिसको; अनन्तम्‌ू-- अनन्त; प्रचक्षते --कहते हैं; सड्डर्षण-आख्यम्‌--संकर्षण नाम से; पुरुषम्‌-- श्रीभगवान्‌; भूत--स्थूल तत्त्व; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; मन:-मयम्‌--मन से युक्त

स्थूल तत्त्वों का स्त्रोत, इन्द्रियाँ तथा मन--ये ही तीन प्रकार के अहंकार उनसे अमिन्तहैं, क्योंकि अहंकार ही उनका कारण है।

यह संकर्षण के नाम से जाना जाता है, जो किएक हजार शिरों वाले साक्षात्‌ भगवान्‌ अनन्त हैं।

कर्तृत्वं करणत्वं च कार्यत्वं चेति लक्षणम्‌ ।

शान्तघोरविमूढत्वमिति वा स्यादहड्डू ते: ॥

२६॥

कर्तृत्वमू--कर्ता होने; करणत्वम्‌--कारण होना; च--तथा; कार्यत्वम्‌--प्रभाव होना; च-- भी; इति--इस प्रकार;लक्षणम्‌--लक्षण; शान्त--शान्त; घोर--सक्रिय; विमूढत्वम्‌--मन्द या बुद्धू होना; इति--इस प्रकार; वा--अथवा;स्थात्‌-होवे; अहड्डू ते: --अहंकार।

यह अहंकार कर्ता, करण साधन तथा कार्य प्रभाव के लक्षणों वाला होता है।

सतो, रजो तथा तमो गुणों के द्वारा यह जिस प्रकार प्रभावित होता है उसी के अनुसार यहशान्त, क्रियावान या मन्द लक्षण वाला माना जाता है।

वैकारिकाद्विकुर्वाणान्मनस्तत्त्वमजायत ।

यत्सट्डूल्पविकल्पाभ्यां वर्तते कामसम्भव: ॥

२७॥

वैकारिकात्‌--सत्व के अहंकार से; विकुर्वाणात्‌ू--विकृत होने से; मनः--मन; तत्त्वमू--नियम; अजायत--उत्पन्नहुआ; यत्‌--जिसके ; सड्डूल्प--विचार; विकल्पाभ्याम्‌--तथा विकल्पों से; वर्तते--घटित होता है; काम-सम्भव: --इच्छा का उदय ।

सत्त्व के अहंकार से दूसरा विकार आता है।

इससे मन उत्पन्न होता है, जिसकेसंकल्पों तथा विकल्पों से इच्छा का उदय होता है।

यद्विदुर्हनिरुद्धाख्यं हषीकाणामधी श्वरम्‌ ।

शारदेन्दीवरश्यामं संराध्यं योगिभि: शनै: ॥

२८॥

यत्‌--जो मन; विदुः--जाना जाता है; हि--निस्सन्देह; अनिरुद्ध-आख्यम्‌-- अनिरुद्ध के नाम से; हषीकाणाम्‌--इन्द्रियों का; अधी श्वरम्‌--परम शासक; शारद--शरदकालीन; इन्दीवर--नील, कमल के समान; श्याममू--नीला;संराध्यम्‌ू--जो पाया जाता है; योगिभि:--योगियों के द्वारा; शनैः -- धीरे-धीरे |

जीवात्मा का मन इन्द्रियों के परम अधिष्ठाता अनिरुद्ध के नाम से प्रसिद्ध है।

उसकानील-श्याम शरीर शरद्कालीन कमल के समान है।

योगीजन उसे शनै-शने प्राप्त करतेहैं।

तैजसात्तु विकुर्वाणाद्वुद्धितत्त्वमभूत्सति ।

द्रव्यस्फुरणविज्ञानमिन्द्रियाणामनुग्रह: ॥

२९॥

तैजसात्‌--रजोगुणी अहंकार से; तु--तब; विकुर्वाणात्‌ू--विकार होने से; बुद्धि--बुद्धि; तत्त्वम्‌-तत्त्व; अभूत्‌--जन्म लिया; सति--हे सती; द्रव्य--पदार्थ; स्फुरण--दिखाई पड़ने पर; विज्ञानम्‌--निश्चित करते हुए; इन्द्रियाणाम्‌--इन्द्रियों की; अनुग्रह:ः--सहायता करना |

हे सती, रजोगुणी अहंकार में विकार होने से बुद्धि का जन्म होता है।

बुद्धि के कार्यहैं दिखाई पड़ने पर पदार्थों की प्रकृति के निर्धारण में सहायता करना और इन्द्रियों कीसहायता करना।

संशयोथ विपर्यासो निश्चय: स्मृतिरिव च ।

स्वाप इत्युच्यते बुद्धेर्लक्षणं वृत्तित: पृथक्‌ ॥

३०॥

संशय:--सन्देह; अथ--तब; विपर्यास:--विपरीत ज्ञान; निश्चय:ः--सही ज्ञान; स्मृतिः--स्मरण शक्ति; एव-- भी;च--तथा; स्वाप:--निद्रा; इति--इस प्रकार; उच्यते--कहे जाते हैं; बुद्धेः--बुद्धि के; लक्षणम्‌--लक्षण; वृत्तित:--अपने कार्यों से

पृथक्‌ू-भिन्न सन्देह, विपरीत ज्ञान, सही ज्ञान, स्मृति तथा निद्रा, ये अपने भिन्न-भिन्न कार्यों सेनिश्चित किये जाते हैं और ये ही बुद्धि के स्पष्ट लक्षण हैं।

तैजसानीन्द्रियाण्येव क्रियाज्ञानविभागश: ।

प्राणस्य हि क्रियाशक्तिर्बुद्धेर्विज्ञानशशक्तिता ॥

३१॥

तैजसानि--रजोगुणी अहंकार से उत्पन्न; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; एबव--निश्चय ही; क्रिया--कर्म; ज्ञान--ज्ञान;विभागश:--के अनुसार; प्राणस्थ--प्राण की; हि--निश्चय ही; क्रिया-शक्ति:--कर्मेनिद्रियाँ; बुद्धेः--बुद्धि की;विज्ञान-शक्तिता-ज्ञानेन्द्रियाँ ॥

रजोगुणी अहंकार से दो प्रकार की इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं-ज्ञानेन्द्रियाँ तथाकर्मेन्द्रियाँ।

कर्मेन्द्रियाँ प्राणशक्ति पर और ज्ञानेन्द्रियाँ बुद्धि पर आश्रित होती हैं।

तामसाच्च विकुर्वाणाद्धगवद्ठीर्यचोदितात्‌ ।

शब्दमात्रमभूत्तस्मान्नभः श्रोत्रं तु शब्दगम्‌ ॥

३२॥

तामसात्‌--तामसी अहंकार से; च--तथा; विकुर्वाणात्‌--विकार से; भगवत्‌-बीर्य-- भगवान्‌ की शक्ति से;चोदितात्‌-प्रेरित; शब्द-मात्रमू-शब्द का सूक्ष्म तत्त्व; अभूत्‌-- प्रकट हुआ; तस्मात्‌--उससे; नभ:ः--आकाश;श्रोत्रमू--कर्णेन्द्रिय; तु--तब; शब्द-गम्‌--जो शब्द को ग्रहण करता है।

जब तामसी अहंकार भगवान्‌ की वीर्य काम शक्ति से प्रेरित होता है, तो सूक्ष्मशब्द तत्त्व प्रकट होता है और शब्द से आकाश तथा और उससे श्रवणेन्द्रिय उत्पन्न होतीहैं।

अर्थाश्रयत्वं शब्दस्य द्रष्टलिड्रत्वमेव च ।

तन्मात्रत्वं च नभसो लक्षणं कवयो विदु: ॥

३३॥

अर्थ-आश्रयत्वमू--जो किसी पदार्थ का अर्थ वहन करे; शब्दस्य--शब्द का; द्रष्ट:--वक्ता का; लिड्डत्वमू--उपस्थितिका सूचक; एव-- भी; च--यथा; ततू-मात्रत्वम्‌--सूक्ष्म तत्त; च--तथा; नभस:ः--आकाश की; लक्षणम्‌--परिभाषा; कवयः--विद्वान पुरुष; विदुः--जानते हैं

जो लोग विद्वान हैं और वास्तविक ज्ञान से युक्त हैं, वे शब्द की परिभाषा इस प्रकारकरते हैं अर्थात्‌ वह जो किसी पदार्थ के विचार अर्थ को वहन करता है, ओट में खड़ेवक्ता की उपस्थिति को सूचित करता है और आकाश का सूक्ष्म रूप होता है।

भूतानां छिद्रदातृत्वं बहिरन्तरमेव च ।

प्राणेन्द्रियात्मधिष्ण्यत्वं नभसो वृत्तिलक्षणम्‌ ॥

३४॥

भूतानामू--समस्त जीवों का; छिद्र-दातृत्वम्‌-स्थान देना; बहि:--बाह्य; अन्तरमू--आन्तरिक; एब-- भी; च--तथा;प्राण-- प्राणवायु का; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; आत्म--तथा मन; धिष्ण्यत्वम्‌--कर्म क्षेत्र होने से; नभसः--आकाश तत्त्व;वृत्ति--कार्य; लक्षणम्‌ू--लक्षण |

समस्त जीवों को उनके बाह्य तथा आन्तरिक अस्तित्व के लिए अवकाश स्थान प्रदान करना, जैसे कि प्राणवायु, इन्द्रिय एवं मन का कार्यक्षेत्र-ये आकाश तत्त्व केकार्य तथा लक्षण हैं।

नभस: शब्दतन्मात्रात्कालगत्या विकुर्व॒तः ।

स्पर्शोभवत्ततो वायुस्त्वक्स्पर्शस्य च सड्ग्रह: ॥

३५॥

नभसः--आकाश से; शब्द-तन्मात्रात्‌--सूक्ष्म शब्द तत्त्व से प्रकट होता है; काल-गत्या--काल की गति से;विकुर्वतः--विकार आने से; स्पर्श:--स्पर्श सूक्ष्म तत्तत; अभवत्‌--उत्पन्न हुआ; ततः--उससे; वायु: --वायु; त्वक्‌ --स्पर्शेन्द्रिय, त्वचा; स्पर्शस्य--स्पर्श की; च--यथा; सड्ग्रहः--अनुभव |

ध्वनि उत्पन्न करने वाले आकाश में काल की गति से विकार उत्पन्न होता है और इसतरह स्पर्श तन्मात्र प्रकट होता है।

इससे फिर वायु तथा स्पर्श इन्द्रिय उत्पन्न होती है।

मृदुत्वं कठिनत्वं च शैत्यमुष्णत्वमेव च ।

एतत्स्पर्शस्य स्पर्शत्वं तन्मात्रत्वं नभस्वतः ॥

३६॥

मृदुत्वम्‌--कोमलता; कठिनत्वम्‌--कठोरता; च--तथा; शैत्यम्‌ू--शीतलता; उष्णत्वमू--उष्णता; एव-- भी; च--यथा; एतत्‌--यह; स्पर्शस्य--स्पर्श तन्मात्र का; स्पर्शत्वमू-भिन्नता बताने वाले लक्षण; ततू-मात्रत्वम्‌--सूक्ष्म रूप;नभस्वतः--वायु का।

कोमलता तथा कठोरता एवं शीतलता तथा उष्णता--ये स्पर्श को बताने वाले लक्षणहैं, जिन्हें वायु के सूक्ष्म रूप में लक्षित किया जाता है।

चालन॑ व्यूहन॑ प्राप्तिनेतृत्वं द्रव्यशब्दयो: ।

सर्वेन्द्रियाणामात्मत्वं वायो: कर्माभिलक्षणम्‌ ॥

३७॥

चालनम्‌--हिलाना; व्यूहनम्‌--मिला देना; प्राप्ति:--पहुँचना; नेतृत्वम्‌--ले जाना; द्रव्य-शब्दयो:--पदार्थों के कणतथा शब्द; सर्व-इन्द्रियाणाम्‌ू--समस्त इन्द्रियों के; आत्मत्वमू--ठीक-ठीक कार्य करने के लिए; वायो:--वायु का;कर्म--क्रियाओं से; अभिलक्षणम्‌--स्पष्ट लक्षण |

गतियों, मिश्रण, शब्द को पदार्थों तथा अन्य इन्द्रिय बोधों तक पहुँचाने एवं अन्यसमस्त इन्द्रियों के समुचित कार्य करते रहने के लिए सुविधाएँ प्रदान कराने में वायु कीक्रिया लक्षित होती है।

वायोश्र स्पर्शतन्मात्रादूपं दैवेरितादभूत्‌ ।

समुत्यितं ततस्तेजश्चक्नू रूपोपलम्भनम्‌ ॥

३८॥

वायोः--वायु से; च--तथा; स्पर्श-तन्मात्रात्‌-स्पर्श तन्मात्र से उत्पन्न; रूपम्‌--रूप; दैव-ईरितात्‌ू-- भाग्य केअनुसार; अभूत्‌--उत्पन्न हुआ; समुत्थितम्‌--ऊपर उठा; ततः--उससे; तेज:-- अग्नि; चक्षु:--नेत्र, हृश्येन्द्रिय; रूप--रंग तथा रूप; उपलम्भनम्‌--देखने के लिए॥

वायु तथा स्पर्श तन्मात्राओं की अन्तःक्रियाओं से मनुष्य को भाग्य के अनुसारविभिन्न रूप दिखते हैं।

ऐसे रूपों के विकास के फलस्वरूप अग्नि उत्पन्न हुई और आँखेंविविध रंगीन रूपों को देखती हैं।

द्रव्याकृतित्वं गुणता व्यक्तिसंस्थात्वमेव च ।

तेजस्त्वं तेजस: साध्वि रूपमात्रस्य वृत्तय: ॥

३९॥

द्र॒व्य--द्रव्य का; आकृतित्वम्‌-- आकार- प्रकार; गुणता--गुण; व्यक्ति-संस्थात्वम्‌--व्यक्तित्व; एव-- भी; च--यथा;तेजस्त्वमू--तेज; तेजस:--अग्नि का; साध्वि--हे सती; रूप-मात्रस्य--सूक्ष्म तत्त्व रूप के; वृत्तय:--लक्षण |

हे माता, रूप के लक्षण आकार-प्रकार, गुण तथा व्यष्टि से जाने जाते हैं।

अग्नि कारूप उसके तेज से जाना जाता है।

झलोतनं पचनं पानमदन हिममर्दनम्‌ ।

तेजसो वृत्तयस्त्वेता: शोषणं क्षुत्तडेव च ॥

४०॥

झोतनम्‌-- प्रकाश; पचनमू--पकाना, पचाना; पानम्‌--पीना; अदनम्‌--खाना; हिम-मर्दनम्‌--शीत को विनष्ट करनेवाला; तेजस: --अग्नि के; वृत्तय:--कार्य; तु--निस्सन्देह; एता:--ये; शोषणम्‌--वाष्पीकरण; क्षुत्‌-- भूख; तृट्‌--प्यास; एव-- भी; च--तथा |

अग्नि अपने प्रकाश के कारण पकाने, पचाने, शीत नष्ट करने, भाप बनाने कीक्षमता के कारण एवं भूख, प्यास, खाने तथा पीने की इच्छा उत्पन्न करने के कारणअनुभव की जाती है।

रूपमात्राद्विकुर्वाणात्तेजसो दैवचोदितातू ।

रसमात्रमभूत्तस्मादम्भो जिह्ना रसग्रह: ॥

४१॥

रूप-मात्रात्‌--सूक्ष्म तत्त्व रूप से उत्पन्न; विकुर्वाणात्‌ू--विकार से; तेजस:--अग्नि से; दैव-चोदितात्‌ू--दैवी व्यवस्थासे; रस-मात्रम्‌--सूक्ष्म तत्त्व स्वाद; अभूत्‌--प्रकट हुआ; तस्मात्‌--उससे; अम्भ:--जल; जिह्ला--स्वादेन्द्रिय; रस-ग्रहः--स्वाद ग्रहण करने वाली |

अग्नि तथा दृष्टि की अन्तःक्रिया से दैवी व्यवस्था के अन्तर्गत स्वाद तन्मात्र उत्पन्नहोता है।

इस स्वाद से जल उत्पन्न होता है और स्वाद ग्रहण करने वाली जीभ भी प्रकटहोती है।

कषायो मधुरस्तिक्त: कट्वम्ल इति नैकधा ।

भौतिकानां विकारेण रस एको विभिद्यते ॥

४२॥

कषाय:--कषैला; मधुर: --मीठा; तिक्त:--तीता; कटु--कड़वा; अम्ल: --खट्ठा; इति--इस प्रकार; न-एकधा--अनेक प्रकार का; भौतिकानाम्‌-- अन्य वस्तुओं के; विकारेण--विकार से; रसः--सूक्ष्म तत्त्व स्वाद; एक:--मूलतःएक; विभिद्यते--विभाजित होता है

यद्यपि मूल रूप से स्वाद एक ही है, किन्तु अन्य पदार्थों के संसर्ग से यह कषैलामधुर, तीखा, कड़वा, खट्टा तथा नमकीन--कई प्रकार का हो जाता है।

क्लेदनं पिण्डनं तृप्ति: प्राणनाप्यायनोन्दनम्‌ ।

तापापनोदो भूयस्त्वमम्भसो वृत्तयस्त्विमा: ॥

४३॥

क्लेदनम्‌--गीला करना; पिण्डनमू--पिंड बना देना, थक्के जमा देना; तृप्तिः--तृप्त करना; प्राणन--जीवित रखना;आप्यायन--तरोताजा रखना; उन्दनम्‌--मुलायम बनाना; ताप--उष्मा, गर्मी; अपनोद:--भगाना; भूयस्त्वम्‌--प्रचुरतासे; अम्भस:--जल के; वृत्तय:--विशिष्ट कार्य; तु--वास्तव में; इमा:--ये |

जल की विशेषताएँ उसके द्वारा अन्य पदार्थों को गीला करने, विभिन्न मिश्रणों केपिण्ड बनाने, तृप्ति लाने, जीवन पालन करने, वस्तुओं को मुलायम बनाने, गर्मी भगाने,जलागारों की निरन्तर पूर्ति करते रहने तथा प्यास बुझाकर तरोताजा बनाने में हैं।

रसमात्राद्विकुर्वाणादम्भसो दैवचोदितात्‌ ।

गन्धमात्रमभूत्तस्मात्पृथ्वी पघ्राणस्तु गन्धग: ॥

४४॥

रस-मात्रात्‌--सूक्ष्म तत्त्व स्वाद से उत्पन्न; विकुर्वाणात्‌-विकार से; अम्भसः --जल से; दैव-चोदितात्‌--दैवीव्यवस्था से; गन्ध-मात्रम्‌--सूक्ष्म तत्त्व गंध; अभूत्‌--प्रकट हुआ; तस्मात्‌--उससे; पृथ्वी --पृथ्वी; घ्राण:--घ्राणेन्द्रिय; तु--वास्तव में; गन्ध-ग:--सुगन्धि ग्रहण करने वाली |

स्वाद अनुभूति और जल की अन्तःक्रिया के फलस्वरूप देवी विधान से गन्ध तन्मात्राउत्पन्न होती है।

उससे पृथ्वी तथा प्राणेन्द्रिय उत्पन्न होते हैं जिससे हम पृथ्वी की सुगन्धिका बहुविध अनुभव कर सकते हैं।

'करम्भपूतिसौरभ्यशान्तोग्राम्लादिभि: पृथक्‌ ।

द्रव्यावयववैषम्यादगन्ध एको विभिद्यते ॥

४५॥

करम्भ--मिश्रित; पूति--दुर्गन्‍्ध; सौरभ्य--सुगन्धित; शान्त--मृदु; उग्र--ती क्षण, तीव्र; अम्ल--खड्टी; आदिभि: --इत्यादि; पृथक्‌--भिन्न; द्रव्य--पदार्थ के; अवयव- भागों के; वैषम्यात्‌--विविधता के अनुसार; गन्ध:--गन्ध;एकः--एक; विभिद्यते--विभाजित होती है।

यद्यपि गन्ध एक है, किन्तु सम्बद्ध पदार्थों के अनुपातों के अनुसार अनेक प्रकार कीहो जाती है, यथा-मिश्रित, दुर्गध, सुगन्धित, मृदु, तीव्र, अम्लीय इत्यादि।

भावनं ब्रह्मण: स्थानं धारणं सद्विशेषणम्‌ ।

सर्वसत्त्वगुणोद्धेदः पृथिवीवृत्तिलक्षणम्‌ ॥

४६॥

भावनम्‌--मूर्ति जैसे रूप; ब्रह्मण:--परब्रह्म के; स्थानम्‌-- आवास स्थान बनाने; धारणम्‌--वस्तुओं को धारण करने;सत्‌-विशेषणम्‌--खुले आकाश को अलग करना; सर्व--समस्त; सत्त्व--अस्तित्व के; गुण--गुण; उद्धेदः --प्राकट्य का स्थान; पृथिवी--पृथ्वी के; वृत्ति--कार्यो के; लक्षणम्‌--लक्षण |

परब्रह्म के स्वरूपों को आकार प्रदान करके, आवास स्थान बनाकर, जल रखने केपात्र बनाकर पृथ्वी के कार्यों के लक्षणों को देखा जा सकता है।

दूसरे शब्दों में, पृथ्वीसमस्त तत्त्वों का आश्रय स्थल है।

नभोगुणविशेषोरथो यस्य तच्छोत्रमुच्यते ।

वायोर्गुणविशेषो<र्थो यस्य तत्स्पर्शनं विदु: ॥

४७॥

नभः-गुण-विशेष:--आकाश का विशिष्ट गुण शब्द ; अर्थ:--विषय; यस्य--जिसका; तत्‌--वह; श्रोत्रमू--श्रवणेन्द्रिय; उच्चते--कहलाता है; वायो: गुण-विशेष:--वायु का विशिष्ट गुण स्पर्श ; अर्थ:--विषय; यस्य--जिसका; तत्‌--वह; स्पर्शनम्‌--स्पर्शेन्द्रिय त्वचा ; विदुः--जानते हैं |

वह इन्द्रिय जिसका विषय शब्द है श्रवणेन्द्रिय और जिसका विषय स्पर्श है, वहत्वगिन्द्रिय कहलाती है।

तेजोगुणविशेषो थो यस्य तच्चक्षुरुच्यतेअम्भोगुणविशेषोथों यस्य तद्गसनं विदु: ।

भूमेर्गुणविशेषो थों यस्य स प्राण उच्यते ॥

४८ ॥

तेज:-गुण-विशेष: -- अग्नि का विशेष गुण रूप ; अर्थ:--विषय ; यस्य--जिसका; तत्‌--वह; चक्षु:-- आँख,नेत्रेन्द्रिय; उच्चते--कहलाती है; अम्भ:-गुण-विशेष:--जल का विशेष गुण स्वाद ; अर्थ:--विषय; यस्य--जिसका; तत्‌--वह; रसनम्‌--स्वाद की इन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, रसना; विदु:--जानी जाती है; भूमेः गुण-विशेष: -- भूमिका विशेष गुण गंध ; अर्थ:--विषय; यस्य--जिसका; सः--वह; घ्राण:--प्राणेन्द्रिय; उच्चते-- कहलाती है |

वह इन्द्रिय जिसका विषय अग्नि का विशेष गुण रूप है, वह नेत्रेन्द्रिय है।

जिसइन्द्रिय का विषय जल का विशेष स्वाद है, वह रसनेन्द्रिय कहलाती है।

जिस इन्द्रिय काविषय पृथ्वी का विशिष्ट गुण गंध है, वह प्राणेन्द्रिय कही जाती है।

'परस्य दृश्यते धर्मो ह्मपरस्मिन्समन्वयात्‌ ।

अतो विशेषो भावानां भूमावेवोपलक्ष्यते ॥

४९॥

'परस्य--कारण का; दृश्यते--देखा जाता है; धर्म:--गुण; हि--निस्सन्देह; अपरस्मिनू--कार्य में; समनन्‍्वयात्‌--समन्वय या व्यवस्था से; अत:ः--अतएव; विशेष:--विशेष गुण; भावानाम्‌--समस्त तत्त्वों से; भूमौ --पृथ्वी में;एव--अकेले; उपलक्ष्यते--देखा जाता है।

चूँकि कारण अपने कार्य में भी विद्यमान रहता है, अतः पहले के लक्षण गुण दूसरे में भी देखे जाते हैं।

इसीलिए केवल पृथ्वी में ही सारे तत्त्वों की विशिष्टताएँ पाईजाती हैं।

एतान्यसंहत्य यदा महदादीनि सप्त वै ।

कालकर्मगुणोपेतो जगदादिरुपाविशत्‌ ॥

५०॥

एतानि--ये; असंहत्य--न मिलकर; यदा--जब; महत्‌-आदीनि--महत्‌_ तत्त्व, अहंकार तथा पाँच स्थूलतत्त्व; सप्त--कुल मिलाकर सात; बै--वास्तव में; काल--समय; कर्म--कार्य; गुण--तथा तीनों गुणों के; उपेत:--साथ होकर;जगत्‌-आदि: --सृष्टि की उत्पत्ति; उपाविशत्‌--प्रविष्ट किया |

जब ये सारे तत्त्व मिले नहीं थे, तो सृष्टि के आदि कारण श्रीभगवान्‌ ने काल, कर्मतथा गुणों के सहित सात विभागों वाली अपनी समग्र भौतिक शक्ति महत्‌ तत्त्व केसाथ ब्रह्माण्ड में प्रवेश किया।

ततस्तेनानुविद्धेभ्यो युक्तेभ्योण्डमचेतनम्‌ ।

उत्थितं पुरुषो यस्मादुदतिष्ठदसौ विराट्‌ ॥

५१॥

ततः--तब; तेन--भगवान्‌ के द्वारा; अनुविद्धेभ्य:--उन सात तत्त्वों से सक्रिय हो उठे; युक्तेभ्य: --मिले हुए;अण्डम्‌--अंडा; अचेतनमू-- अज्ञानी; उत्थितम्‌-- उठा; पुरुष: --विराट प्राणी; यस्मात्‌--जिससे; उदतिष्ठत्‌-प्रकटहुआ; असौ--वह; विराट्‌--सुप्रसिद्ध

भगवान्‌ की उपस्थिति के कारण उत्प्रेरित होने तथा परस्पर मिलने से इन सात तत्त्वोंसे एक जड़ अण्डा उत्पन्न हुआ जिससे विख्यात विराट-पुरुष प्रकट हुआ।

एतदण्डं विशेषाख्यं क्रमवृद्धैर्दशोत्तरैःतोयादिभि: परिवृतं प्रधानेनावृतैर्बहि: ।

यत्र लोकवितानोयं रूपं भगवतो हरे: ॥

५२॥

एतत्‌--यह; अण्डम्‌--अण्डा; विशेष-आख्यम्‌-- विशेष ' कहलाने वाला; क्रम--एक के पश्चात्‌ एक, क्रमशः;वृद्धै:--बढ़ा; दश--दसगुना; उत्तरै:--अधिक बड़ा; तोय-आदिभि:--जल इत्यादि के द्वारा; परिवृतम्‌ू--घिरा हुआ;प्रधानेन--प्रधान के द्वारा; आवृतैः--ढका हुआ; बहि:--बाहर से; यत्र--यहाँ; लोक-वितान:--लोकों का विस्तार;अयमू--यह; रूपम्‌ू--रूप; भगवतः -- श्रीभगवान्‌ का; हरेः-- भगवान्‌ हरि का।

यह अण्डाकार ब्रह्माण्ड भौतिक शक्ति का प्राकट्य कहलाता है।

जल, वायु, अग्नि,आकाश, अहंकार तथा महत्ू-तत्त्व की इसकी परतें स्तर क्रमशः मोटी होती जाती हैं।

प्रत्येक परत अपने से पूर्ववाली से दसगुनी मोटी होती है और अन्तिम बाह्य परत 'प्रधान' से घिरी हुई है।

इस अण्डे के भीतर भगवान्‌ हरि का विराट रूप रहता है, जिनके शरीर के अंग चौदहों लोक हैं।

प्रत्येक परत अपने से पूर्ववाली से दसगुनी मोटी होती है और अन्तिम बाह्य परत ‘प्रधान 'से घिरी हुई है।

इस अण्डे के भीतर भगवान्‌ हरि का विराट रूप रहता है, जिनके शरीरके अंग चौदहों लोक हैं।

हिरण्मयादण्डकोशादुत्थाय सलिले शयात्‌ ।

'तमाविश्य महादेवो बहुधा निर्बिभेद खम्‌ ॥

५३॥

हिरण्मयात्‌--सुनहले; अण्ड-कोशात्‌-- अण्डे से; उत्थाय--निकल कर; सलिले--जल में; शयात्‌--लेटे हुए;'तम्‌ू--उस; आविश्य--घुसकर; महा-देव:-- श्री भगवान्‌; बहुधा--कई प्रकार से; निर्विभेद--बाँट दिया; खम्‌--छिद्र विराट-पुरुष

श्रीभगवान्‌ उस सुनहले अंडे में स्थित हो गये जो जल में पड़ा हुआ था और उन्होंने उसे कई विभागों में बाँट दिया।

निरभिद्यतास्य प्रथमं मुखं वाणी ततोभवत्‌ ।

वाण्या वह्विरथो नासे प्राणोतो प्राण एतयो; ॥

५४॥

निरभिद्यत--प्रकट हुआ; अस्य--उसका; प्रथमम्‌--सर्वप्रथम; मुखम्‌--मुँह; वाणी--वागेन्द्रिय; ततः--तब;अभवत्‌--बाहर आया; वाण्या--वागेन्द्रिय से; वहिः--अग्नि का देवता; अथ: --तब; नासे--दो नथुने; प्राण --प्राणवायु; उतः--जुड़ गये; प्राण:--घ्राणेन्द्रिय; एतयो: --उनमें ।

सर्वप्रथम उनके मुख प्रकट हुआ और फिर वागेन्द्रिय और इसी के साथ अग्नि देवप्रकट हुए जो इस इन्द्रिय के अधिष्ठाता देव हैं।

तब दो नथुने प्रकट हुए और उनमेंघ्राणेन्द्रिय तथा प्राण प्रकट हुए।

घ्राणाद्वायुरभिद्येतामक्षिणी चश्लुरेतयो: ।

तस्मात्सूर्यो न्‍्यभिद्येतां कर्णों श्रोत्रं ततो दिशः ॥

५५॥

घ्राणात्‌ू--घ्राणेन्द्रिय से; वायु:--वायुदेव; अभिद्येतामू--प्रकट हुआ; अक्षिणी--दो नेत्र; चक्षु:--चश्षु इन्द्रिय;एतयो:--इनमें; तस्मात्‌--उससे; सूर्य:--सूर्यदेव; न्यभिद्येतामू--प्रकट हुए; कर्णौं--दो कान; श्रोत्रम्‌-- श्रवणेन्द्रिय;ततः--उससे; दिश:--दिशाओं के अधिष्ठाता।

घ्राणेन्द्रिय के बाद उसका अधिष्ठाता वायुदेव प्रकट हुआ।

तत्पश्चात्‌ विराट रूप में दोचक्षु और उनमें चश्लु-इन्द्रिय प्रकट हुई।

इसके अनन्तर चश्लुओं का अधिष्ठाता सूर्यदेवप्रकट हुआ।

फिर उनके दो कान और उनमें कर्णेन्द्रिय तथा दिशाओं के अधिष्ठातादिग्देवता प्रकट हुए।

निर्विभेद विराजस्त्वग्रोमएम श्रवादयस्ततः ।

तत ओषधयश्चासन्शिश्नं निर्विभिदे ततः ॥

५६॥

निर्विभेद-- प्रकट हुआ; विराज:--विराट रूप का; त्वक्‌--त्वचा, चमड़ी; रोम--बाल; श्मश्रु-- दाढ़ी, मूँछ;आदयः--इत्यादि; ततः--तब; ततः--उस पर; ओषधय: --जड़ी-बूटियाँ; च--यथा; आसनू-- प्रकट हुईं;शिश्नम्‌--लिंग; निर्विभिदे--प्रकट हुआ; ततः--इसके बाद।

तब भगवान्‌ के विराट रूप, विराट पुरुष ने अपनी त्वचा प्रकट की और उस परबाल रोम , मूँछ तथा दाढ़ी निकल आये।

तत्पश्चात्‌ सारी जड़ी-बूटियाँ प्रकट हुईं औरतब जननेन्द्रियाँ भी प्रकट हुई।

रेतस्तस्मादाप आसतन्निरभिद्यत बै गुदम्‌ ।

गुदादपानोपानाच्च मृत्युलोेक भयड्भर: ॥

५७॥

रेतः--वीर्य; तस्मात्‌ू--उससे; आपः--जल का अधिष्ठाता देव; आसन्‌--प्रकट हुआ; निरभिद्यत--प्रकट हुआ; बै--निस्सन्देह; गुदम्‌--गुदा; गुदात्‌ू--गुदा से; अपान:--अपान वायु निकालने की इन्द्रिय; अपानात्‌ू--अपान से; च--यथा; मृत्यु:--मृत्यु; लोक-भयम्‌-करः--ब्रह्माण्ड भर में भय उत्पन्न करने वाला।

तत्पश्चात्‌ वीर्य प्रजनन क्षमता और जल का अधिष्ठाता देव प्रकट हुआ।

फिर गुदा और उसकी इन्द्रिय और उसके भी बाद मृत्यु का देवता प्रकट हुआ जिससे सारा ब्रह्माण्डभयभीत रहता है।

हस्तौ च निरभिद्येतां बल॑ ताभ्यां ततः स्वराट्‌ ।

पादौ च निरभिद्येतां गतिस्ताभ्यां ततो हरि ॥

५८ ॥

हस्तौ--दो हाथ; च--यथा; निरभिद्येतामू- प्रकट हुए; बलम्‌--शक्ति; ताभ्याम्‌--उनसे; तत:--तत्पश्चात्‌; स्वराट्‌--इन्द्र; पादौ--दो पाँव; च--यथा; निरभिद्येतामू--प्रकट हुए; गति:--चलने की क्रिया; ताभ्यामू--उनसे; तत:ः--तब;हरिः-- भगवान्‌ विष्णु।

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ के विराट रूप के दो हाथ प्रकट हुए और उन्हीं के साथ वस्तुओंको पकड़ने तथा गिराने की शक्ति आईं।

फिर इन्द्र देव प्रकट हुए।

तदनन्तर दो पाँवप्रकट हुए, उन्हीं के साथ चलने-फिरने की क्रिया आईं और इसके बाद भगवान्‌ विष्णुप्रकट हुए।

नाड्योउस्य निरभिद्यन्त ताभ्यो लोहितमाभूृतम्‌ ।

नद्यस्ततः समभवच्नुदरं निरभिद्यत ॥

५९॥

नाड्य:--नसें, नाड़ियाँ; अस्य--विराट पुरुष की; निरभिद्यन्त--प्रकट हुईं; ताभ्य:--उनसे; लोहितम्‌--रक्त;आशभूृतम्‌--उत्पन्न हुआ; नद्य:ः--नदियाँ; तत:--उससे; समभवनू--प्रकट हुए; उदरम्‌--पेट; निरभिद्यत--प्रकटहुआ।

विराट शरीर की नाड़ियाँ प्रकट हुईं और तब लाल रक्त-कणिकाएँ या रक्त प्रकट हुआ।

इसके पीछे नदियाँ नाड़ियों की अधिष्ठात्री और तब उस शरीर में पेट प्रकट हुआ।

क्षुत्पिपासे ततः स्यातां समुद्रस्त्वेतयोरभूत्‌ ।

अथास्य हृदयं भिन्न हृदयान्मन उत्थितम्‌ ॥

६०॥

क्षुत्‌ू-पिपासे-- भूख तथा प्यास; तत:ः--तब; स्याताम्‌-- प्रकट हुए; समुद्र: --समुद्र; तु--तब; एतयो:--इनसे;अभूत्‌--उत्पन्न हुआ; अथ--तब; अस्य--विराट रूप का; हृदयम्‌ू--हृदय; भिन्नमू--प्रकट हुआ; हृदयात्‌--हृदय से;मनः--मन; उत्थितम्‌ू-- प्रकट हुआ

तत्पश्चात भूख तथा प्यास की अनुभूतियाँ उत्पन्न हुईं और इनके साथ ही समुद्र काप्राकट्य हुआ।

फिर हृदय प्रकट हुआ और हृदय के साथ-साथ मन प्रकट हुआ।

मनसश्चन्द्रमा जातो बुद्धिर्बुद्धेर्गिरां पति: ।

अहड्ढारस्ततो रुद्रश्चित्तं चैत्यस्ततोभवत्‌ ॥

६१॥

मनसः--मन से; चन्द्रमा: -- चन्द्रमा; जात:--उत्पन्न हुआ; बुद्धि:--बुद्धि; बुद्धेः--बुद्धि से; गिराम्‌ पतिः--वाणी केस्वामी ब्रह्मा ; अहड्डार:--अहंकार; तत:--तब; रुद्र:--शिव जी; चित्तम्‌--चेतना; चैत्य: --चेतना का अधिष्ठातादेव; ततः--तब; अभवत्‌--प्रकट हुआ।

मन के बाद चन्द्रमा प्रकट हुआ।

फिर बुद्धि और बुद्धि के बाद ब्रह्मा जी प्रकट हुए।

तब अहंकार, फिर शिव जी और शिव जी के बाद चेतना तथा चेतना का अधिष्ठाता देव प्रकट हुए।

एते ह्भ्युत्थिता देवा नैवास्योत्थापनेएशकन्‌ ।

पुनराविविशु: खानि तमुत्थापयितुं क्रमात्‌ ॥

६२॥

एते--ये; हि--निस्सन्देह; अभ्युत्थिता:--उत्पन्न; देवा:--देवता; न--नहीं; एब--रंचमात्र; अस्य--विराट-पुरुष का;उत्थापने--जगाने में; अशकन्‌--समर्थ; पुन:--फिर; आविविशु: --प्रविष्ट कर गये; खानि--शरीर के छिठ्दों में;तम्‌--उसको; उत्थापयितुम्‌--जगाने में; क्रमात्‌ू--क्रमशः

इस तरह जब देवता तथा विभिन्न इन्द्रियों के अधिष्ठाता देव प्रकट हो चुके, तो उनसबों ने अपने-अपने उत्पत्ति स्थान को जगाना चाहा।

किन्तु ऐसा न कर सकने के कारणवे विराट-पुरुष को जगाने के उद्देश्य से उनके शरीर में एक-एक करके पुनः प्रविष्ट होगये।

बह्निर्वाचा मुखं भेजे नोदतिष्ठत्तदा विराट्‌ ।

घ्राणेन नासिके वायुर्नोदतिष्ठत्तदा विराट्‌ ॥

६३॥

वह्िः--अग्निदेव; वाचा--वागेन्द्रिय से; मुखम्‌--मुँह; भेजे--प्रविष्ट किया; न--नहीं; उदतिष्ठत्‌--उठा; तदा--तब;विराटू--विराट-पुरुष; प्राणेन--पघ्राणेन्द्रिय से; नासिके --दोनों नथुनों में; वायु:--वायुदेव; न--नहीं ; उदतिष्ठत्‌ --उठा; तदा--तब; विराट्‌--विराट-पुरुष।

अग्निदेव ने वागेन्द्रिय से उनके मुख में प्रवेश किया, किन्तु विराट-पुरुष उठा नहीं।

तब वायुदेव ने पघ्राणेन्द्रिय से होकर उनके नथुनों में प्रवेश किया, तो भी विराट-पुरुष नहींजागा।

अक्षिणी चश्नुषादित्यो नोदतिष्ठत्तदा विराट्‌ ।

श्रोत्रेण कर्णों च दिशो नोदतिष्ठत्तदा विराटू ॥

६४॥

अक्षिणी--दो आँखें; चक्षुषा--चक्षु इन्द्रिय से; आदित्य:--सूर्यदेव; न--नहीं; उदतिष्ठत्‌--उठा; तदा--तब;विराटू--विराट-पुरुष; श्रोत्रेण-- श्रवणेन्द्रिय से; कर्णौ--दो कानों; च--तथा; दिश:--दिशाओं के अधिष्ठाता देव;न--नहीं; उदतिष्ठत्‌--जागा; तदा--तब; विराट्‌ू--विराट-पुरुष |

तब सूर्यदेव ने चक्षुरिन्द्रिय से विराट-पुरुष की आँखों में प्रवेश किया, तो भी वहउठा नहीं।

इसी तरह दिशाओं के अधिष्ठाता देवों ने श्रवणेन्द्रिय से होकर उनके कानों मेंप्रवेश किया, किन्तु तो भी वह नहीं उठा।

त्वचं रोमभिरोषध्यो नोदतिष्ठत्तदा विराट ।

रेतसा शिश्नमापस्तु नोदतिष्ठत्तदा विराट्‌ ॥

६५॥

त्वचम्‌--विराट-पुरुष की चमड़ी; रोमभि:--शरीर के ऊपर के रोओं से; ओषध्य: --जड़ी-बूटियों के अधिष्ठाता देव;न--नहीं; उदतिष्ठत्‌--उठा; तदा--तब; विराट्‌--विराट-पुरुष; रेतसा--वीर्य से; शिश्नमू--लिंग; आप:--जल-देव;तु--तब; न--नहीं; उदतिष्ठत्‌--उठा; तदा--तब; विराट्‌--विराट-पुरुष |

त्वचा तथा जड़ी-बूटियों के अधिष्ठाता देवों ने शरीर के रोमों से त्वचा में प्रवेशकिया, किन्तु तो भी विराट-पुरुष नहीं उठा।

तब जल के अधिष्ठाता देव ने वीर्य केमाध्यम से जननांग में प्रवेश किया, किन्तु विराट-पुरुष नहीं जागा।

गुदं मृत्युरपानेन नोदतिष्ठत्तदा विराट ।

हस्ताविन्द्रो बलेनैव नोदतिष्ठत्तदा विराट्‌ ॥

६६॥

गुदम्‌-गुदा; मृत्यु:--मृत्यु का देवता; अपानेन--अपान वायु की इन्द्रिय से; न--नहीं; उदतिष्ठत्‌--उठा; तदा--तोभी; विराट्‌ू--विराट-पुरुष; हस्तौ--दोनों हाथ; इन्द्र:--इन्द्रदेव; बलेन--वस्तुओं को पकड़ने तथा गिराने की शक्तिसे; एब--निस्सन्देह; न--नहीं; उदतिष्ठत्‌--उठा; तदा--इतने पर भी; विराट्‌ू--विराट-पुरुष

मृत्यु-देव ने अपान-इन्द्रिय से उनकी गुदा में प्रवेश किया, किन्तु विराट-पुरुष मेंकोई गति नहीं आई।

तब इन्द्रदेव ने हाथों में पकड़कर गिराने की शक्ति के हाथों मेंप्रवेश किया, किन्तु इतने पर भी विराट-पुरुष उठा नहीं।

विष्णुर्गत्यैव चरणौ नोदतिष्ठत्तदा विराट्‌ ।

नार्डीर्नद्यो लोहितेन नोदतिष्ठत्तदा विराट्‌ ॥

६७॥

विष्णु:-- भगवान्‌ विष्णु; गत्या--गति से; एब--निस्सन्देह; चरणौ--दो पाँव; न--नहीं; उदतिष्ठत्‌--उठा; तदा--तबभी; विराट्‌ू--विराट-पुरुष; नाडी:--नाड़ियाँ; नद्यः--नदियाँ नदी के देवता; लोहितेन--रक्त के द्वारा, संचरण कीशक्ति से; न--नहीं; उदतिष्ठत्‌--हिला डुला; तदा--तो भी; विराट्‌--विराट-पुरुष

भगवान्‌ विष्णु ने गति की क्षमता के साथ उनके पाँवों में प्रवेश किया, किन्तु तबभी विराट-पुरुष ने खड़े होने से इनकार कर दिया।

तब नदियों ने रक्त-नाड़ियों तथासंचरण शक्ति के माध्यम से रक्त में प्रवेश किया, किन्तु तो भी विराट-पुरुष हिला डुलानहीं।

क्षुत्तड्भ्यामुदरं सिन्धुर्नोंदतिष्ठत्तदा विराट्‌ ।

हृदयं मनसा चन्द्रो नोदतिष्ठत्तदा विराटू ॥

६८ ॥

क्षुत्‌-तृड्भ्याम्‌-- भूख तथा प्यास से; उदरम्‌--पेट में; सिन्धु:--समुद्र या समुद्रदेवता; न--नहीं; उदतिष्ठत्‌--उठा;तदा--तब भी; विराटू--विराट-पुरुष; हृदयम्‌ू--हृदय; मनसा--मन से; चन्द्र:--चन्द्रदेव; न--नहीं; उदतिष्ठत्‌--उठा;तदा--तब; विराट्‌ू--विराट्-पुरुष |

सागर ने भूख तथा प्यास के सहित उसके पेट में प्रवेश किया, किन्तु तो भी विराट-पुरुष ने उठने से इनकार कर दिया।

चन्द्रदेव ने मन के साथ उसके हृदय में प्रवेश किया,किन्तु विराट-पुरुष को जगाया न जा सका।

बुद्धया ब्रह्मापि हृदयं नोदतिष्ठत्तदा विराट्‌ ।

रुद्रोउभिमत्या हृदयं नोदतिष्ठत्तदा विराट्‌ ॥

६९॥

बुद्धया--बुद्धि से; ब्रह्मा --ब्रह्मा जी ने; अपि-- भी; हृदयम्‌--हृदय में; न--नहीं; उदतिष्ठत्‌--उठा; तदा--तो भी;विराट्‌ू--विराट-पुरुष; रुद्र:--शिवजी; अभिमत्या--अहंकार से; हृदयम्‌--हृदय को; न--नहीं; उदतिष्ठत्‌--उठा;तदा--तब भी; विराट्‌ू--विराट-पुरुष |

ब्रह्मा भी बुद्धि के साथ उसके हृदय में प्रविष्ट हुए, किन्तु तब भी विराट-पुरुष उठनेके लिए राजी न हुआ।

रुद्र ने भी अहंकार समेत उसके हृदय में प्रवेश किया, किन्तु तोभी वह टस से मस न हुआ।

चित्तेन हृदयं चैत्य: क्षेत्रज्ञ: प्राविशद्यदा ।

विराट्तदैव पुरुष: सलिलादुदतिष्ठत ॥

७०॥

चित्तेन--चेतना या तर्क से; हृदयम्‌--हृदय में; चैत्य:--चेतना का अधिष्ठाता देव; क्षेत्र-ज्ञ:--क्षेत्र को जानने वाला;प्राविशत्‌--घुसा; यदा--जब; विराट्‌--विराट-पुरुष; तदा--तब; एव--ही; पुरुष:--विराट्‌्-पुरुष; सलिलातू--जल से; उदतिष्ठत--उठ गया।

किन्तु जब चेतना का अधिष्ठाता, अन्तःकरण का नियामक, तर्क के साथ हृदय मेंप्रविष्ठ हुआ तो उसी क्षण विराट-पुरुष कारणार्णव से उठ खड़ा हुआ।

यथा प्रसुप्तं पुरुष प्राणेन्द्रयमनोधिय: ।

प्रभवन्ति बिना येन नोत्थापयितुमोजसा ॥

७१॥

यथा--जिस तरह; प्रसुप्तम्‌--सोया हुआ; पुरुषम्‌--मनुष्य; प्राण--प्राणवायु; इन्द्रिय--कर्म तथा ज्ञान की इन्द्रियाँ;मन:ः--मन; धियः --बुद्धि; प्रभवन्ति--समर्थ हैं; विना--के बिना; येन--जिसको परमात्मा ; न--नहीं;उत्थापयितुम्‌--उठाने में; ओजसा--अपनी शक्ति से |

जब मनुष्य सोता रहता है, तो उसकी सारी भौतिक सम्पदा-यथा प्राणशक्ति,ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, मन तथा बुद्धि-उसे उत्प्रेरित नहीं कर सकतीं।

वह तभी जागृतहो पाता है जब परमात्मा उसकी सहायता करता है।

तमस्मिन्प्रत्यगात्मानं धिया योगप्रवृत्तया ।

भक्‍त्या विरकत्या ज्ञानेन विविच्यात्मनि चिन्तयेत्‌ ॥

७२॥

तम्‌--उस पर; अस्मिन्‌--इसमें; प्रत्यक्‌ू-आत्मानमू--परमात्मा; धिया--मन से; योग-प्रवृत्तया--भक्ति में संलग्न;भक्त्या--भक्ति के माध्यम से; विरक्त्या--विरक्ति से; ज्ञानेन--ज्ञान से; विविच्य--सावधानी से विचार करते हुए;आत्मनि--शरीर में; चिन्तयेतू--सोचना चाहिए।

अतः मनुष्य को समर्पण, वैराग्य तथा एकाग्र भक्ति के माध्यम से प्राप्त आध्यत्मिक ज्ञान में प्रगति के द्वारा इसी शरीर में परमात्मा को विद्यमान समझ कर उसका चिन्तनकरना चाहिए यद्यपि वे इससे अलग रहते हैं।

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