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अध्याय सत्ताईसवां: भौतिक प्रकृति को समझना

3.27श्रीभगवानुवाचप्रकृतिस्थोपि पुरुषो नाज्यते प्राकृतैर्गुणैः ।

अविकारादकर्तृत्वान्निर्गुणत्वाजलार्कवत्‌ ॥

१॥

श्री-भगवान्‌ उबाच-- श्रीभगवान्‌ ने कहा; प्रकृति-स्थ:-- भौतिक शरीर में वास करते; अपि--यद्यपि; पुरुष: --जीवात्मा; न--नहीं; अज्यते--प्रभावित होता है; प्राकृतै:ः--प्रकृति के; गुणैः--गुणों से; अविकारात्‌--बिना परिवर्तनआये, निर्विकार; अकर्तृत्वातू-कर्तृत्व से स्वतन्त्र; निर्गुणत्वातू-प्रकृति के गुणों से अप्रभावित रहने से; जल--जलपर; अर्कवत्‌--सूर्य के समान।

भगवान्‌ कपिल ने आगे कहा : जिस प्रकार सूर्य जल पर पड़ने वाले प्रतिबिम्ब सेभिन्न रहा आता है उसी तरह जीवात्मा शरीर में स्थित होकर भी प्रकृति के गुणों सेअप्रभावित रहता है, क्योंकि वह अपरिवर्तित रहता है और किसी प्रकार का इन्द्रियतुष्टिका कर्म नहीं करता।

श़सएष यदि प्रकृतेर्गुणेष्वभिविषज्जते ।

अहड्क्रियाविमूढात्मा कर्तास्मीत्यभिमन्यते ॥

२॥

सः--वही जीवात्मा; एष:--यह; यहिं--जब; प्रकृतेः--प्रकृति के; गुणेषु--गुणों में; अभिविषज्जते--लीन रहता है;अहड्डक्रिया--अहंकार से; विमूढड--मोहग्रस्त; आत्मा--जीवात्मा; कर्ता--करने वाला; अस्मि--मैं हूँ; इति--इसप्रकार; अभिमन्यते--सोचता है |

जब आत्मा प्रकृति के जादू तथा अहंकार के वशीभूत होता है और शरीर को स्वआत्मा मान लेता है, तो वह भौतिक कार्यकलापों में लीन रहने लगता है औरअहंकारवश सोचता है कि मैं ही प्रत्येक वस्तु का कर्ता हूँ।

श़तेन संसारपदवीमवशो भ्येत्यनिर्वृतः ।

प्रासड्रिकैः कर्मदोषै: सदसन्मिश्रयोनिषु ॥

३॥

तेन--उससे; संसार--बारम्बार जन्म-मृत्यु का; पदवीम्‌--मार्ग, पथ; अवशः--निरुपाय होकर; अभ्येति-- भोगता है;अनिर्वृत:ः--असंतुष्ट; प्रासड्रिकि:--प्रकृति की संगति से उत्पन्न; कर्म-दोषै:--गलत कर्मों से; सत्‌--अच्छा; असत्‌--बुरा; मिश्र--मिला-जुला; योनिषु--विविध योनियों में |

अतः बद्धजीव भौतिक प्रकृति के गुणों के साथ अपनी संगति के कारण उच्चतरतथा निम्नतर विभिन्न योनियों में देहान्तर करता रहता है।

जब तक वह भौतिक कार्यो सेमुक्त नहीं हो लेता उसे अपने दोषपूर्ण कार्य के फलस्वरूप यह स्थिति स्वीकार करतेरहनी पड़ती है।

श़अर्थ हाविद्यमानेपि संसृतिर्न निवर्तते ।

ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेडनर्थागमो यथा ॥

४॥

अर्थ--असली कारण; हि--निश्चय ही; अविद्यमाने--उपस्थित न होने पर; अपि--यद्यपि; संसृतिः--सांसारिक दशा;न--नहीं; निवर्तते--रुकती है; ध्यायत:--ध्यान करने से; विषयान्‌-- भोग; अस्य--जीवात्मा का; स्वप्ने--स्वण में;अनर्थ--हानियों का; आगम:--आना; यथा--जिस तरह ।

वास्तव में जीवात्मा इस संसार से परे है, किन्तु प्रकृति पर अधिकार जताने कीअपनी मनोवृत्ति के कारण उसके संसार-चक्र की स्थिति कभी रूकती नहीं और वहसभी प्रकार की अलाभकर स्थितियों से प्रभावित होता है, जिस प्रकार कि स्वप्न में होता" श़अत एव शनैश्ञित्तं प्रसक्तमसतां पथि ।

भक्तियोगेन तीब्रेण विरक्त्या च नयेद्वशम्‌ ॥

५॥

अतः एव--अतः, इसलिए; शनै:--धीरे-धीरे; चित्तम्‌ू--मन, चेतना को; प्रसक्तम्‌--आसक्त; असताम्‌ू-- भौतिकभोगों के; पथि--पथ पर; भक्ति-योगेन-- भक्ति से; तीब्रेण-- अत्यन्त गभ्भीर; विरक्त्या--विरक्ति से, बिना आसक्तिके; च--तथा; नयेत्‌--वह लावे; वशम्‌--वश में

प्रत्येक बद्धजीव का कर्तव्य है कि वह भौतिक सुखोपभोग के प्रति आसक्त अपनीदूषित चेतना को विरक्तिपूर्वक अत्यन्त गभ्भीर भक्ति में लगावे।

इस प्रकार उसका मनतथा चेतना पूरी तरह वश में हो जाएँगे।

श़यमादिभिरय्योंगपथेरभ्यसउश्रद्धयान्वितः ।

मयि भावेन सत्येन मत्कथाश्रवणेन च ॥

६॥

यम-आदिभि:--यम इत्यादि; योग-पथैः --योगपद्धति के द्वारा; अभ्यसन्‌--अभ्यास करते हुए; श्रद्धवा अन्वित:--परम श्रद्धा समेत; मयि--मुझमें; भावेन-- भक्ति से; सत्येन--अमिश्रित; मत्‌-कथा--मेरे विषय की कथाएँ;श्रवणेन--सुनने से; च--तथा ।

मनुष्य को योग पद्धति की संयम आदि विधियों के अभ्यास द्वारा श्रद्धालु बनना चाहिए और मेरे कीर्तन तथा श्रवण द्वारा अपने आपको शुद्ध भक्ति के पद तक ऊपरउठाना चाहिए।

श़सर्वभूतसमत्वेन निर्वरेणाप्रसड्गरतः ।

ब्रह्मचर्येण मौनेन स्वधर्मेण बलीयसा ॥

७॥

सर्व--सभी; भूत--जीव; समत्वेन--समान रूप से देखने से; निर्वरेण--बिना शत्रुता के; अप्रसड़त:ः--बिना घनिष्टसम्बन्ध के; ब्रह्म-चर्येण--ब्रह्मचर्य के द्वारा; मौनेन--मौन व्रत से; स्व-धर्मेण-- अपनी वृत्ति से; बलीयसा--फल कोअर्पित करने से |

भक्तिमय सेवा सम्पन्न करने में मनुष्य को प्रत्येक जीव को समभाव से एवं किसी केप्रति शत्रुतारहित होते हुए घनिष्ठता से रहित होकर देखना होता है।

उसे ब्रह्मचर्य व्रतधारण करना होता है, गभ्भीर होना होता है और कर्म फलों को भगवान्‌ को अर्पित करतेहुए अपने नित्य कर्म करने होते हैं।

श़यहच्छयोपलब्धेन सन्तुष्टो मितभुड्सुनि: ।

विविक्तशरण: शान्तो मैत्र: करुण आत्मवान्‌ ॥

८॥

यहच्छया--बिना कठिनाई के; उपलब्धेन--जो कुछ उपलब्ध है उसी से; सन्तुष्ट:--सन्तुष्ट; मित--कम; भुक्‌--खाकर; मुनि:--विचारवान; विविक्त-शरण: --एकान्त स्थान में रहकर; शान्तः--शान्त स्वभाव; मैत्र:--मैत्रीपूर्ण ;करुण:--दयालु; आत्म-वान्‌--स्वरूपसिद्ध |

भक्त को चाहिए कि बहुत कठिनाई के बिना जो कुछ वह कमा सके उसी से सन्तुष्टरहे।

जितना आवश्यक हो उससे अधिक उसे नहीं खाना चाहिए।

उसे एकान्त स्थान मेंरहना चाहिए और सदैव विचारवान, शान्त, मैत्रीपूर्ण, उदार तथा स्वरूपसिद्ध होनाचाहिए।

श़सानुबन्धे च देहेउस्मिन्नकुर्वन्नसदाग्रहम्‌ ।

ज्ञानेन दृष्ठतत्त्वेन प्रकृतेः पुरुषस्थ च ॥

९॥

स-अनुबन्धे--शारीरिक सम्बन्धों से; च--तथा; देहे--शरीर के प्रति; अस्मिन्‌ू--इस; अकुर्वन्‌--न करते हुए; असत्‌ू-आग्रहम्‌--जीवन का देह-बोध; ज्ञानेन--ज्ञान के द्वारा; दृष्ट--देखकर; तत्त्वेन--वास्तविकता; प्रकृतेः--पदार्थ की;पुरुषस्य--आत्मा की; च--तथा

मनुष्य को आत्मा तथा पदार्थ के ज्ञान के द्वारा देखने की शक्ति बढ़ानी चाहिए औरउसे व्यर्थ ही शरीर के रूप में अपनी पहचान नहीं करनी चाहिए, अन्यथा वह शारीरिक सम्बन्धों खिंचा चला जाएगा।

vनिवृत्तबुद्धयवस्थानो दूरीभूतान्यदर्शन: ।

उपलक्यात्मनात्मानं चश्नुषेवार्कमात्महक्‌ ॥

१०॥

निवृत्त--अलग; बुद्धि-अवस्थान: -- भौतिक चेतना की अवस्थाएँ; दूरी-भूत--सुदूर; अन्य--दूसरा; दर्शन:--जीवनबोध; उपलभ्य--प्राप्त करके; आत्मना--अपने विशुद्ध विवेक से; आत्मानम्‌--अपने आपको; चश्लुषा--अपनीआँखों से; इब--सहश; अर्कम्‌--सूर्य; आत्म-हक्‌--स्वरूपसिद्ध |

मनुष्य को भौतिक चेतना की अवस्थाओं से परे दिव्य स्थिति में रहना चाहिए औरअन्य समस्त जीवन-बोधों से विलग रहना चाहिए।

इस प्रकार अहंकार से मुक्त होकर उसेअपने आपको उसी तरह देखना चाहिए जिस प्रकार वह आकाश में सूर्य को देखता है।

श़मुक्तलिड्रं सदाभासमसति प्रतिपद्यते ।

सतो बन्धुमसच्चक्षु: सर्वानुस्यूतमद्दयम्‌ ॥

११॥

मुक्त-लिड्डमू--दिव्य; सत्‌-आभासम्‌--प्रतिबिम्ब रूप में प्रकट; असति--अहंकार में; प्रतिपद्यते--उसे बोध होता है;सतः बन्धुमू-- भौतिक कारण का आधार; असत्-चक्षु:--माया के नेत्र; सर्व-अनुस्यूतम्‌--हर वस्तु में प्रविष्ट;अद्वयम्‌-- अद्वितीय |

मुक्त जीव को उस परमेश्वर का साक्षात्कार होता है, जो दिव्य है और अहंकार में भीप्रतिबिम्बि के रूप में प्रकट होता है।

वे भौतिक कारण के आधार हैं तथा प्रत्येक वस्तु मेंप्रवेश करने वाले हैं।

वे अद्वितीय हैं और माया के नेत्र हैं।

श़यथा जलस्थ आभास: स्थलस्थेनावदृश्यते ।

स्वाभासेन तथा सूर्यो जलस्थेन दिवि स्थित: ॥

१२॥

यथा--जिस तरह; जल-स्थ: --जल में स्थित; आभास: --प्रतिबिम्ब; स्थल-स्थेन--दीवाल में स्थित; अवदृश्यते--देखा जाता है; स्व-आभासेन--अपने प्रतिबिम्ब से; तथा--उसी तरह; सूर्य:--सूर्य; जल-स्थेन--जल में स्थित;दिवि--आकाश में; स्थित:--स्थित |

जिस प्रकार आकाश में स्थित सूर्य को सर्वप्रथम जल में पड़े प्रतिबिम्ब से और फिरकमरे की दीवाल पर पड़े दूसरे प्रतिबिम्ब से देखा जाता है, उसी तरह परमेश्वर कीउपस्थिति महसूस की जाती है।

श़एवं त्रिवृदहड्डारो भूतेन्द्रियमनोमयै: ।

स्वाभासैल॑क्षितोनेन सदाभासेन सत्यहक्‌ ॥

१३॥

एवम्‌--इस तरह; त्रि-वृतू-त्रिविध, तीन प्रकार का; अहड्ढडारः--अहंकार; भूत-इन्द्रिय-मनः -मयैः --शरीर, इन्द्रियाँतथा मन से युक्त; स्व-आभासै:--अपने ही प्रतिबिम्बों से; लक्षित:--देखा जाता है; अनेन--इसके द्वारा; सतू-आभासेन--ब्रह्म के प्रतिबिम्ब से; सत्य-हक्‌-- आत्मवान्स्वरूपसिद्ध आत्मा

इस प्रकार स्वरूपसिद्ध आत्मा सर्वप्रथम त्रिविध अहंकार में और तब शरीर, इन्द्रियोंएवं मन में प्रतिबिम्बित होता है।

श़भूतसूक्ष्मेन्द्रियमनोबुद्धयादिष्विह निद्रया ।

लीनेष्वसति यस्तत्र विनिद्रो निरहड्क्रियः ॥

१४॥

भूत-- भौतिक तत्त्व; सूक्ष्म-- भोग की वस्तुएँ; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; मनः--मन; बुद्धि--बुद्धि; आदिषु--इत्यादि;इह--यहाँ; निद्रया--नींद से; लीनेषु-- लीन; असति--अप्रकट में; यः--जो; तत्र--वहाँ; विनिद्र:--जगा हुआ;निरहडूक्रिय:--अहंकार से रहित।

यद्यपि ऐसा लगता है भक्त पाँचों तत्त्वों, भोग की वस्तुओं, इन्द्रियों तथा मन औरबुद्धि में लीन है, किन्तु वह जागृत रहता है और अंधकार से रहित होता है।

श़मन्यमानस्तदात्मानमनष्टो नष्टवन्मूषा ।

नष्टे'हड्डरणे द्रष्टा नष्टवित्त इवातुर: ॥

१५॥

मन्यमान:--सोचते हुए; तदा--तब; आत्मानम्‌-- स्वयं; अनष्ट: --यद्यपि नष्ट नहीं; नष्ट-वत्‌--नष्ट के समान; मृषा--झूठे ही; नष्टे अहड्डरणे--अहंकार के नष्ट होने से; द्रष्टा--देखने वाला; नष्ट-वित्त:--जिसकी सम्पत्ति नष्ट हो गई है;इब--सहश; आतुरः--दुखी |

जीवात्मा स्पष्ट रूप से द्रष्टा के रूप में अपने अस्तित्व का अनुभव कर सकता है,किन्तु प्रगाढ़ निद्रा के समय अहंकार के दूर हो जाने के कारण वह अपने को उस तरह विनष्ट हुआ मान लेता है, जिस प्रकार सम्पत्ति के नष्ट होने पर मनुष्य अपने को विनष्टहुआ समझता है।

एवं प्रत्यवमृश्यासावात्मानं प्रतिपद्यते ।

साहड्डारस्य द्रव्यस्य योवस्थानमनुग्रह: ॥

१६॥

एवम्‌--इस प्रकार; प्रत्यवमृश्य--विचार करके; असौ--वह व्यक्ति; आत्मानम्‌--अपने आपको; प्रतिपद्यते--अनुभवकरता है; स-अहड्डारस्य--अहंकार के वश में माना हुआ; द्रव्यस्थ--स्थिति का; य:--जो; अवस्थानम्‌--आश्रय,अधिष्ठान; अनुग्रह:-- प्रकाशक |

जब मनुष्य परिपक्व ज्ञान के द्वारा अपने व्यक्तित्व का अनुभव करता है, तोअहंकारवश वह जिस स्थिति को स्वीकार करता है, वह उसे प्रकट हो जाती है।

श़देवहूतिरुवाचपुरुषं प्रकृतिर्रह्मन्न विमुज्ञति कर्हिचित्‌ ।

अन्योन्यापाश्रयत्वाच्च नित्यत्वादनयो: प्रभो ॥

१७॥

देवहूति: उबाच--देवहूति ने कहा; पुरुषम्‌ू--आत्मा; प्रकृति:--प्रकृति; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; न--नहीं; विमुज्ञति --छोड़ती है; कह्िंचित्‌ू--किसी भी समय, कभी; अन्योन्य-- परस्पर; अपाश्रयत्वातू--आकर्षण से; च--तथा;नित्यत्वात्‌ू--नित्यता से; अनयो: --उन दोनों का; प्रभो--हे भगवान्‌

श्री देवहूति ने पूछा : हे ब्राह्मण, क्या कभी प्रकृति आत्मा का परित्याग करती है?चूँकि इनमें से कोई एक दूसरे के प्रति शाश्वत रूप से आकर्षित रहता है, तो उनकापृथकत्व वियोग कैसे सम्भव है ?

श़यथा गन्धस्य भूमेश्व न भावो व्यतिरिकतः ।

अपां रसस्य च यथा तथा बुद्धे परस्य च ॥

१८ ॥

यथा--जिस तरह; गन्धस्य--गन्ध का; भूमे:--पृथ्वी की; च--तथा; न--नहीं; भाव: --अस्तित्व; व्यतिरिकतः --पृथक्‌; अपामू--जल का; रसस्य-- स्वाद का; च--तथा; यथा--जिस तरह; तथा--उसी तरह; बुद्धेः--बुद्धि का;परस्य--चेतना या आत्मा का; च--तथा

जिस प्रकार पृथ्वी तथा इसकी गन्ध या जल तथा इसके स्वाद का कोई पृथक्‌अस्तित्व नहीं होता उसी तरह बुद्ध्धि तथा चेतना का कोई पृथक्‌ अस्तित्व नहीं हो सकता।

अकर्तु: कर्मबन्धोयं पुरुषस्य यदाश्रय: ।

गुणेषु सत्सु प्रकृते: कैवल्यं तेष्वत: कथम्‌ ॥

१९॥

अकर्तुः--न करने वाले का; कर्म-बन्ध:--कर्मों का बन्धन; अयमू--यह; पुरुषस्थ--आत्मा का; यतू-आश्रय: --गुणों की संगति से उत्पन्न; गुणेषु--जबकि गुणों में; सत्सु--उपस्थित हैं; प्रकृते:--प्रकृति के; कैवल्यम्‌--स्वतन्त्रता;तेषु--उन; अत:--अतः; कथम्‌--कैसे

अतः समस्त कर्मो का कर्ता न होते हुए भी जीव तब तक कैसे स्वतन्त्र हो सकता हैजब तक प्रकृति उस पर अपना प्रभाव डालती रहती है और उसे बाँधे रहती है।

श़क्वचित्तत्त्वावम्ेन निवृत्तं भयमुल्बणम्‌ ।

अनिवृत्तनिमित्तत्वात्पुन: प्रत्यवतिष्ठते ॥

२०॥

क्वचित्‌--यदि कभी; तत्त्व--मूल सिद्धान्त; अवमर्शेन--विचार करने से; निवृत्तम्‌ू--बचा जा सके; भयम्‌-- भय;उल्बणम्‌--महान्‌; अनिवृत्त--छुटकारा न पाने वाला; निमित्तत्वात्‌ू--चूँकि कारण से; पुनः--फिर; प्रत्यवतिष्ठते--प्रकट होता है।

यदि चिन्तन तथा मूल सिद्धान्तों की जाँच-परख से बन्धन के महान्‌ भय से बच भीलिया जाय तो भी यह पुनः प्रकट हो सकता है, क्योंकि इसके कारण का अन्त नहींहुआ होता है।

श़श्रीभगवानुवाचअनिमित्तनिमित्तेन स्वधर्मेणामलात्मना ।

तीव्रया मयि भक्त्या च श्रुतसम्भूतया चिरम्‌ ॥

२१॥

श्री-भगवान्‌ उबाच-- श्रीभगवान्‌ ने कहा; अनिमित्त-निमित्तेन--कर्म-फल की इच्छा के बिना; स्व-धर्मेण -- अपने-अपने निर्धारित कार्यो के करने से; अमल-आत्मना--शुद्ध मन से; तीव्रया--उत्कट, गभ्भीर; मयि--मुझको;भक्त्या-- भक्ति से; च--तथा; श्रुत-- श्रवण; सम्भृतया--से युक्त; चिरम्‌--दीर्घकाल तक |

भगवान्‌ ने कहा : यदि कोई गम्भीरतापूर्वक मेरी सेवा करता है और दीर्घकाल तकमेरे विषय में या मुझसे सुनता है, तो वह मुक्ति पा सकता है।

इस प्रकार अपने-अपनेनियत कार्यों के करने से कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी और मनुष्य पदार्थ के कल्मष से मुक्तहो जाएगा।

श़ज्ञानेन दृष्टतत्त्वेन वैराग्येण बलीयसा ।

तपोयुक्तेन योगेन तीव्रेणात्मसमाधिना ॥

२२॥

ज्ञानेन--ज्ञान से; दृष्ट-तत्त्वेन--परम सत्य की दृष्टि से; वैराग्येण--विरक्ति से; बलीयसा-- अत्यन्त हृढ़तापूर्वक; तपः-युक्तेन--तप में लगाने से; योगेन--योग से; तीब्रेण--हढ़तापूर्वक स्थिर; आत्म-समाधिना--आत्म-लीन होने से |

यह भक्ति हढ़तापूर्वक पूर्ण ज्ञान से तथा दिव्य दृष्टि से सम्पन्न करनी चाहिए।

मनुष्य को प्रबल रूप से विरक्त होना चाहिए, तपस्या में लगना चाहिए और आत्मलीन होने केलिए योग करना चाहिए।

प्रकृति: पुरुषस्येह दह्ममाना त्वहर्निशम्‌ ।

तिरोभवित्री शनकैरग्नेयोनिरिवारणि: ॥

२३॥

प्रकृति:--प्रकृति का प्रभाव; पुरुषस्थ--जीवात्मा का; इह--यहाँ; दह्ममाना--जलकर; तु--लेकिन; अहः-निशम्‌--दिन-रात; तिरः-भवित्री --विलीन होकर; शनकै: -- धीर-धीरे; अग्ने: -- अग्नि का; योनि:--उदय का कारण; इब--सहश; अरणि:--काष्ठ, जिससे अग्नि उत्पन्न की जाती है।

प्रकृति के प्रभाव ने जीवात्मा को ढक कर रखा है मानो जीवात्मा सदैव प्रज्वलितअग्नि में रह रहा हो।

किन्तु भक्ति करने से यह प्रभाव उसी प्रकार दूर किया जाता सकताहै, जिस प्रकार अग्नि उत्पन्न करने वाले काष्ठट-खण्ड स्वयं भी अग्नि द्वारा भस्म हो जाते" श़भुक्तभोगा परित्यक्ता दृष्टदोषा च नित्यश: ।

नेश्वरस्याशुभं धत्ते स्वे महिम्नि स्थितस्थ च ॥

२४॥

भुक्त-- भोगा हुआ; भोगा-- भोग; परित्यक्ता--छोड़ा हुआ; दृष्ट--खोजा हुआ; दोषा--त्रुटि; च--तथा; नित्यश: --सदैव; न--नहीं; ई श्वरस्थ--स्वतन्त्र का; अशुभम्‌--हानि; धत्ते--नुकसान पहुँचाती है; स्वे महिम्नि--अपनी कीर्ति में;स्थितस्य--स्थित; च--तथा

प्रकृति पर अधिकार जताने की इच्छा के दोषों को ज्ञात करके और फलस्वरूप उसइच्छा को त्याग करके जीवात्मा स्वतन्त्र हो जाता है और अपनी कीर्ति में स्थित हो जाताहै।

श़यथा ह्प्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बहनर्थभूत्‌ ।

स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते ॥

२५॥

यथा--जिस प्रकार; हि--निस्सन्देह; अप्रतिबुद्धस्य--सोने वाले का; प्रस्वाप: --स्वप्न; बहु-अनर्थ-भृत्‌-- अनेकअशुभ बातें उत्पन्न करने वाला; सः एव--वही स्वण्न; प्रतिबुद्धस्थ--जगने वाले का; न--नहीं; बै--निश्चय ही;मोहाय--मोहग्रस्त करने के लिए; कल्पते--समर्थ है।

स्वप्नावस्था में मनुष्य की चेतना प्रायः ढकी रहती है और उसे अनेक अशुभ वस्तुएँदिखती हैं, किन्तु उसके जगने पर तथा पूर्ण चेतन होने पर ऐसी अशुभ वस्तुएँ उसेविभ्रमित नहीं कर सकतीं।

श़एवं विदिततत्त्वस्य प्रकृतिमयि मानसम्‌ ।

युज्जतो नापकुरुत आत्मारामस्य कर्हिचित्‌ ॥

२६॥

एवम्‌--इस प्रकार; विदित-तत्त्वस्य--परम सत्य के जानने वाले की; प्रकृति:--प्रकृति; मयि--मुझ पर; मानसम्‌--मन को; युज्ञतः--स्थिर करते हुए; न--नहीं; अपकुरुते--हानि पहुँचा सकता है; आत्म-आरामस्य--आत्म में आनन्दउठाने वाले को; कर्हिचित्‌ू--कभी भी |

प्रकृति का प्रभाव किसी प्रबुद्ध मनुष्य को हानि नहीं पहुँचा सकता, भले ही वहभौतिक कार्यकलापों में ही व्यस्त क्यों न रहता हो, क्योंकि वह परम सत्य की सच्चाईको जानता है और उसका मन भगवान्‌ में ही स्थिर रहता है।

श़यदैवमध्यात्मरत: कालेन बहुजन्मना ।

सर्वत्र जातवैराग्य आब्रह्मभुवनान्मुनि: ॥

२७॥

यदा--जब; एवम्‌--इस प्रकार; अध्यात्म-रत:--आत्म-साक्षात्कार में लगा हुआ; कालेन--अनेक वर्षो तक; बहु-जन्मना--अनके जन्मों तक; सर्वत्र--सभी जगह; जात-वबैराग्य:--विरक्ति उत्पन्न होती है; आ-ब्रह्म-भुवनात्‌--ब्रहालोक तक; मुनि:ः--विचारवान व्यक्ति

मनुष्य जब इस तरह अनेकानेक वर्षों तथा अनेक जन्मों तक भक्ति एवं आत्म-साक्षात्कार में लगा रहता है, तो उसे किसी भी लोक में, यहाँ तक कि सर्वोच्च लोकब्रह्मलोक में भी भोग से पूर्ण विरक्ति हो जाती है और उसमें चेतना पूर्णतया विकसित होजाती है।

श़मद्धक्तः प्रतिबुद्धार्थो मत्प्रसादेन भूयसा ।

निःश्रेयसं स्वसंस्थानं कैवल्याख्यं मदाश्रयम्‌ ॥

२८ ॥

प्राप्नोतीहाज्जसा धीरः स्वदृशा चिछन्नसंशय: ।

यद्गत्वा न निवर्तेत योगी लिड्भाद्विनिर्गमे ॥

२९॥

मत्‌-भक्त:--मेरा भक्त; प्रतिबुद्ध-अर्थ:--स्वरूपसिद्ध; मत्‌-प्रसादेन--मेरी अहैतुकी कृपा से; भूयसा-- अनन्त;नि: श्रेयसमू-- चरम परिणति; स्व-संस्थानम्‌--अपने धाम को; कैवल्य-आख्यम्‌--कैवल्य नामक; मत्‌-आश्रयम्‌--मेरी शरण को; प्राप्पोति--प्राप्त करता है; इह--इस जीवन में; अज्ञ़सा-- सचमुच; धीरः -- धीर; स्व-हशा--आतम्ञान में; छिन्न-संशय:--संशयों से मुक्त; यत्‌--उस धाम तक; गत्वा--जाकर; न--कभी नहीं; निवर्तेत--लौटता है; योगी--योगी भक्त; लिझ्त्‌--सूक्ष्म तथा स्थूल भौतिक शरीरों से; विनिर्गमे--प्रस्थान के बाद।

मेरा भक्त मेरी असीम अहैतुकी कृपा से वस्तुतः स्वरूपसिद्ध हो जाता है और इस तरह समस्त संशयों से मुक्त होकर वह अपने गन्तव्य धाम की ओर अग्रसर होता है, जोमेरी शुद्ध आनन्द की आध्यात्मिक शक्ति के अधीन है।

जीव का यही चरम सिद्धि-गन्तव्य स्व-संस्थान है।

इस शरीर को त्यागने के बाद योगी भक्त उस दिव्य धाम कोजाता है जहाँ से वह फिर कभी नहीं लौटता।

यदा न योगोपचितासु चेतोमायासु सिद्धस्य विषज्ञतेठड़ ।

अनन्यहेतुष्वथ मे गतिः स्याद्‌आत्यन्तिकी यत्र न मृत्युहास: ॥

३०॥

श़यदा--जब; न--नहीं; योग-उपचितासु--योग द्वारा प्राप्त शक्तियों तक; चेत:-- ध्यान; मायासु--माया के प्राकट्य;सिद्धस्य--सिद्ध योगी का; विषज्ञते--आकर्षित होता है; अड्र--हे माता; अनन्य-हेतुषु--जिसका कोई अन्य कारणन हो; अथ--तब; मे-- मुझको; गति:-- उसकी प्रगति; स्थात्‌--होती है; आत्यन्तिकी-- असीम; यत्र--जहाँ; न--नहीं; मृत्यु-हास:--मृत्यु की शक्ति

जब सिद्ध योगी का ध्यान योगशक्ति की गौण वस्तुओं की ओर, जो बहिरंगा शक्तिके प्राकट्य हैं, आकृष्ट नहीं होता तब मेरी ओर उसकी प्रगति असीमित होती है और इसतरह उसे मृत्यु कभी भी परास्त नहीं कर सकती।

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