← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची

अध्याय एक: मनु की पुत्रियों की वंशावली तालिका

4.1मैत्रेय उवाचमनोस्तु शतरूपायां तिस्त्र: कन्याश्व जज्ञिरे।आकूतिर्देवहूतिश्व प्रसूतिरिति विश्रुता: ॥ १॥

मैत्रेय: उबाच--मैत्रेय मुनि ने कहा; मनो: तु--स्वायंभुव मनु का; शतरूपायाम्‌--उसकी पत्नी शतरूपा से; तिस्त्र:--तीन;कन्या: च--कन्याएँ भी; जज्ञिरि--जन्म लिया; आकूृतिः:--आकूति नामक; देवहूति:--देवहूति नामक; च--तथा:; प्रसूति:--प्रसूति नामक; इति--इस प्रकार; विश्रुता:--विख्यात |

श्रीमैत्रेय ने कहा : स्वायंभुव मनु की पत्नी शतरूपा से तीन कन्याएँ उत्पन्न हुईं जिनके नामआकृति, देवहूति तथा प्रसूति थे।"

आकृतिं रुचये प्रादादपि भ्रातृमतीं नृप: ।पुत्रिकाधर्ममाश्रित्य शतरूपानुमोदित: ॥

२॥

आकृतिम्‌--आकूति; रुचये--परम साधु रुचि को; प्रादात्‌--प्रदान किया; अपि--यद्यपि; भ्रातृ-मतीम्‌-- भाई वाली कन्या;नृप:--राजा; पुत्रिका--पुत्री से प्राप्त पुत्र को ग्रहण करना; धर्मम्‌--धार्मिक कृत्य; आश्रित्य--शरण में जाकर; शतरूपा--स्वायंभुव मनु की पत्नी के द्वारा; अनुमोदित:--स्वीकृत

आकृति के दो भाई थे तो भी राजा स्वायंभुव मनु ने इसे प्रजापति रुचि को इस शर्त परब्याहा था कि उससे, जो पुत्र उत्पन्न होगा वह मनु को पुत्र रूप में लौटा दिया जाएगा। उसनेअपनी पत्नी शतरूपा के परामर्श से ऐसा किया था।"

प्रजापति: स भगवान्रुचिस्तस्यथामजीजनत्‌ ।मिथुनं ब्रह्मवर्चस्वी परमेण समाधिना ॥

३॥

प्रजापति:--जिसे संतान उत्पन्न करने का भार सौंपा गया हो; सः--वह; भगवान्‌--परम ऐश्वर्यशाली; रुचि: --परम साधु रुचि;तस्याम्‌--उससे; अजीजनतू--उत्पन्न हुआ; मिथुनम्‌--जोड़ी, युग्म; ब्रह्म-वर्चस्वी --आध्यात्मिक रूप से अत्यन्त शक्तिमान;'परमेण--परम बलशाली; समाधिना--समाधि में

अपने ब्रह्मज्ञान में परम शक्तिशाली एवं जीवात्माओं के जनक के रूप में नियुक्त( प्रजापति ) रुचि को उनकी पत्नी आकूति के गर्भ से एक पुत्र और एक पुत्री उत्पन्न हुए।"

यस्तयो: पुरुष: साक्षाद्विष्णुर्यज्ञस्वरूपधृक्‌ ।या स्त्री सा दक्षिणा भूतेरेश भूतानपायिनी ॥

४॥

यः--जो; तयो:--उन दोनों में से; पुरुष: --नर; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; विष्णु; --परमे श्वर; यज्ञ--यज्ञ; स्वरूप-धृक्‌ू -- स्वरूप धारणकिये हुए; या--दूसरी; स्त्री--स्त्री; सा--वह; दक्षिणा--दक्षिणा; भूतेः--सम्पत्ति की देवी का; अंश-भूता--भिन्नांश होने से;अनपायिनी--कभी न पृथक्‌ होने वाली |

आकृति से उत्पन्न दोनों सन्‍्तानों में से एक अर्थात्‌ बालक तो प्रत्यक्ष पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌का अवतार था और उसका नाम था यज्ञ, जो भगवान्‌ विष्णु का ही दूसरा नाम है। बालिकासम्पत्ति की देवी भगवान्‌ विष्णु की प्रिया शाश्वत लक्ष्मी की अंश अवतार थी।"

आनिन्‍ये स्वगृहं पुत्र्या: पुत्रं विततरोचिषम्‌ ।स्वायम्भुवो मुदा युक्तो रुचिर्जग्राह दक्षिणाम्‌ ॥

५॥

आनिन्ये--ले आये; स्व-गृहम्‌-- अपने घर; पुत्रया:--पुत्री से उत्पन्न; पुत्रम्‌--पुत्र; वितत-रोचिषम्‌-- अत्यन्त शक्तिमान;स्वायम्भुव:--स्वायंभुव मनु; मुदा--अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक; युक्त:--साथ; रुचि:--परम साधु रुचि; जग्राह--रखा;दक्षिणाम्‌-दक्षिणा नामक पुत्री को |

स्वायंभुव मनु परम प्रसन्नतापूर्वक यज्ञ नामक सुन्दर बालक को अपने घर ले आये औरउनके जामाता रुचि ने पुत्री दक्षिणा को अपने पास रखा।"

तां कामयानां भगवानुवाह यजुषां पति: ।तुष्टायां तोषमापन्नोजनयद्दवादशात्मजान्‌ ॥

६॥

तामू--उसको; कामयानाम्‌-इच्छुक; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; उबाह--विवाह कर लिया; यजुषाम्‌-- समस्त यज्ञों के; पति:--स्वामी; तुष्टायाम्‌-- अपनी पत्ली में अत्यन्त प्रसन्न; तोषम्‌--अत्यधिक प्रसन्नता; आपन्न: --प्राप्त करके; अजनयतू--जन्म दिया;द्वादश--बारह; आत्मजान्‌--पुत्रों को |

यज्ञों के स्वामी भगवान्‌ ने बाद में दक्षिणा के साथ विवाह कर लिया, जो पूर्ण पुरुषोत्तमभगवान्‌, को अपने पति रूप में प्राप्त करने के लिए परम इच्छुक थी। उनकी इस पत्नी से उन्हेंबारह पुत्र प्राप्त हुए।"

तोष:ः प्रतोष: सन्तोषो भद्ग: शान्तिरिडस्पति: ।इध्मः कविर्विभु: स्वह्नः सुदेवो रोचनो द्विषट्‌ ॥

७॥

तोष:--तोष; प्रतोष:--प्रतोष; सन्‍्तोष:--संतोष; भद्ग:-- भद्ग; शान्तिः--शान्ति; इडस्पति:--इडस्पति; इध्म:--इध्म; कवि:--कवि; विभु:--विभु; स्वह्ृतः--स्वह्त; सुदेव:--सुदेव; रोचन: --रोचन; द्वि-घट्‌ू--बारह।यज्ञ तथा दक्षिणा के बारह पुत्रों के नाम थे--तोष, प्रतोष, संतोष, भद्र, शान्ति, इडस्पति,इध्म, कवि, विभु, स्वह्न, सुदेव तथा रोचन।"

तुषिता नाम ते देवा आसन्स्वायम्भुवान्तरे ।मरीचिमिश्रा ऋषयो यज्ञ: सुरगणे श्वर: ॥

८॥

तुषिता:--तुषितों की कोटि; नाम--नाम वाले; ते--सभी; देवा:--देवता; आसन्‌--हुए; स्वायम्भुव--मनु का नाम; अन्तरे--उस काल में; मरीचि-मिश्रा:--मरीचि इत्यादि; ऋषय:--ऋषिगण, साधुगण; यज्ञ:--भगवान्‌ विष्णु का अवतार; सुर-गण-ईंश्वरः--देवताओं के राजा।

स्वायंभुव मनु के काल में ही ये सभी पुत्र देवता हो गये जिन्हें संयुक्त रूप में तुषित कहाजाता है।

मरीचि सप्तर्षियों के प्रधान बन गये और यज्ञ देवताओं के राजा इन्द्र बन गये।

"

प्रियव्रतोत्तानपादौ मनुपुत्रो महौजसौ ।

तत्पुत्रपौत्रनप्तृणामनुवृत्तं तदन्तरम्‌ ॥

९॥

प्रियत्रत--प्रियव्रत; उत्तानपादौ--उत्तानपाद; मनु-पुत्रौ--मनु के दो पुत्र; महा-ओजसौ--महान्‌ ओजस्वी, शक्तिशाली; ततू--उनके; पुत्र--पुत्र; पौत्र--पोता; नप्तृणाम्‌--नाती; अनुवृत्तम्‌ू-- अनुगमन करते हुए; तत्‌-अन्तरम्‌--उस मनु-काल ( मन्व॒तर )में

स्वायंभुव मनु के दोनों पुत्र, प्रियत्रत तथा उत्तानपाद अत्यन्त शक्तिशाली राजा हुए औरउनके पुत्र तथा पौत्र उस काल में तीनों लोकों में फैल गये।

"

देवहूतिमदात्तात कर्दमायात्मजां मनु: ।

तत्सम्बन्धि श्रुतप्रायं भवता गदतो मम ॥

१०॥

देवहूतिम्‌-देवहूति; अदात्‌--प्रदान की गई; तात-हे प्रिय पुत्र; कर्दमाय--कर्दम मुनि को; आत्मजाम्‌--कन्या; मनु:--स्वायंभुव मनु; तत्‌-सम्बन्धि--उस सम्बन्ध में; श्रुत-प्रायम्‌--प्रायः पूरी तरह सुना गया; भवता--तुम्हारे द्वारा; गदत:ः--कहागया; मम--मेरे द्वारा

हे पुत्र स्वायंभुव मनु ने अपनी परम प्रिय कन्या देवहूति को कर्दम मुनि को प्रदान किया।

मैंइनके सम्बन्ध में तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ और तुम उनके विषय में प्रायः पूरी तरह सुन चुकेहो।

"

दक्षाय ब्रह्मपुत्राय प्रसूति भगवान्मनु: ।

प्रायच्छद्यत्कृत: सर्गस्त्रिलोक्यां विततो महान्‌ ॥

११॥

दक्षाय--प्रजापति दक्ष को; ब्रह्म-पुत्राय--ब्रह्मा के पुत्र; प्रसूतिम्‌ू--प्रसूति को; भगवान्‌--महापुरुष; मनु:--स्वायंभुव मनु;प्रायच्छत्‌-- प्रदान किया; यत्‌-कृत:ः--जिनके द्वारा रचित; सर्ग:--सृष्टि; त्रि-लोक्याम्‌--तीनो लोकों में; विततः--विस्तारकिया हुआ; महान्‌--अत्यधिक ।

स्वायंभुव मनु ने प्रसूति नामक अपनी कन्या ब्रह्मा के पुत्र दक्ष को दे दी, जो प्रजापतियों मेंसे एक थे।

दक्ष के वंशज तीनों लोकों में फैले हुए हैं।

"

या: कर्दमसुताः प्रोक्ता नव ब्रह्मर्षिपलय: ।

तासां प्रसूतिप्रसवं प्रोच्यमानं निबोध मे ॥

१२॥

या:--जो; कर्दम-सुता:--कर्दम की कन्याएँ; प्रोक्ताः:--उल्लेख किया गया; नव--नौ; ब्रह्मय-ऋषि-- आध्यात्मिक ज्ञान वालेऋषियों की; पत्तय:--पत्नियाँ; तासामू--उनकी; प्रसूति-प्रसवम्‌--पुत्रों तथा पौत्रों की पीढ़ियाँ; प्रोच्यमानम्‌--वर्णित होकर;निबोध--समझने का प्रयत्न करो; मे--मुझसे |

मैं तुम्हें कर्दम मुनि की नवों कन्याओं के विषय में पहले ही बतला चुका हूँ कि वे नौविभिन्न ऋषियों को सौंप दी गई थीं।

अब मैं इन नवों कन्याओं की सनन्‍तानों का वर्णन करूँगा।

तुम मुझसे उनके विषय में सुनो।

"

पत्नी मरीचेस्तु कला सुषुवे कर्दमात्मजा ।

कश्यपं पूर्णिमानं च ययोरापूरितं जगत्‌ ॥

१३॥

पतली--पत्ली; मरीचे:--मरीचि नामक साधु से की; तु-- भी; कला--कला नाम की; सुषुबे--जन्म दिया; कर्दम-आत्मजा--कर्दम मुनि की कन्या; कश्यपम्‌--कश्यप नाम का; पूर्णिमानम्‌ च--तथा पूर्णिमा नाम की; ययो:--जिनसे; आपूरितम्‌-- भरगये, सर्वत्र फैल गये; जगत्‌--संसार।

कर्दम मुनि की पुत्री कला का ब्याह मरीचि से हुआ जिससे दो सन्‍्तानें हुईं जिनके नाम थेकश्यप तथा पूर्णिमा।

इनकी सनन्‍्तानें सारे विश्व में फैल गईं।

"

पूर्णिमासूत विरजं विश्वगं च परन्तप ।

देवकुल्यां हरे: पादशौचाद्याभूत्सरिद्दिव: ॥

१४॥

पूर्णिमा--पूर्णिमा ने; असूत--उत्पन्न किया; विरजम्‌--विरज नामक पुत्र; विश्वगम्‌ च--तथा विश्वग नामक; परम्‌-तप--शत्रुओंका संहार करने वाले; देवकुल्याम्‌ू-देवकुल्या नामक पुत्री; हरेः-- श्री भगवान्‌ के; पाद-शौचात्‌--चरणकमल को धोने वालेजल से; या--वह; अभूत्‌--हुईं; सरित्‌ दिव:ः--गंगा के तटों के अन्तर्गत दिव्य जल।

हे विदुर, कश्यप तथा पूर्णिमा नामक दो सन्तानों में से पूर्णिमा के तीन सन्‍्तानें उत्पन्न हुईंजिनके नाम विरज, विश्वग तथा देवकुल्या थे।

इन तीनों में से देवकुल्या श्रीभगवान्‌ केचरणकमल को धोने वाला जल थी, जो बाद में स्वर्गलोक की गंगा में बदल गई।

"

अत्रे: पत्यनसूया त्रीज्ञज्ञे सुयशसः सुतान्‌ ।

दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मसम्भवान्‌ ॥

१५॥

अत्रे:--अत्रि मुनि की; पत्ती--पत्ली; अनसूया--अनुसूया ने; त्रीन्‌ू-- तीन; जज्ञे--उत्पन्न किया; सु-यशसः--अत्यन्त प्रसिद्ध;सुतान्‌--पुत्रों को; दत्तम्‌-दत्तात्रेय; दुर्वाससम्‌-दुर्वासा; सोमम्‌--सोम ( चन्द्रदेव ); आत्म--परमात्मा; ईश--शिवजी;ब्रह्म--ब्रह्माजी; सम्भवान्‌ू--के अवतार।

अत्रि मुनि की पत्नी अनसूया ने तीन सुप्रसिद्ध पुत्र उत्पन्न किये।

ये हैं--सोम, दत्तात्रेय तथादुर्वासा, जो भगवान्‌ ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव के अंशावतार थे।

सोम ब्रह्मा के, दत्तात्रेय भगवान्‌विष्णु के तथा दुर्वासा शिवजी के अंश प्रतिनिधिस्वरूप थे।

"

विदुर उवाचअत्रेर्गृहे सुरश्रेष्ठा: स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः ।

किश्ञिच्चिकीर्षवो जाता एतदाख्याहि मे गुरो ॥

१६॥

विदुरः उवाच-- श्रीविदुर ने कहा; अत्रे: गृहे--अत्रि के घर में; सुर-श्रेष्ठा:--प्रमुख देवता; स्थिति--पालन; उत्पत्ति--सृष्टि;अन्त--संहार; हेतव:ः --कारण; किश्ञित्‌--कुछ; चिकीर्षव:--करने के इच्छुक; जाता:--प्रकट हुए; एतत्‌--यह; आख्याहि--कहो, बताओ; मे--मुझको; गुरो--मेरे गुरु !

यह सुनकर विदुर ने मैत्रेय से पूछा : हे गुरु, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव जो सम्पूर्ण सृष्टि केस्त्रष्टा, पालक तथा संहारक हैं, अत्रि मुनि की पत्नी से किस प्रकार उत्पन्न हुए ?"

मैत्रेय उवाचब्रह्मणा चोदित: सृष्टावत्रिब्रह्मविदां वर: ।

सह पत्या ययावृक्ष॑ं कुलादिं तपसि स्थित: ॥

१७॥

मैत्रेय:ः उवाच-- श्रीमैत्रेय ऋषि ने कहा; ब्रह्मणा-- भगवान्‌ ब्रह्मा द्वारा; चोदित:--प्रेरित होकर; सृष्टौ--सृष्टि हेतु; अत्रिः:--अत्रि;ब्रह्म-विदाम्‌--आध्यात्मिक ज्ञान में पारंगत पुरुषों के; वर:-- श्रेष्ठ, मुख्य; सह--साथ; पत्या--पत्नी के; ययौ--गया;ऋक्षम्‌--ऋक्ष पर्वत; कुल-अद्विम्‌ू--विशाल पर्वत; तपसि--तपस्या हेतु; स्थित:--रहा

मैत्रेय ने कहा : अनसूया से विवाह कर लेने के बाद जब अत्रि मुनि को ब्रह्मा ने वंश चलानेके लिए आदेश दिया तो वे अपनी पत्नी के साथ कठोर तपस्या करने के लिए ऋक्ष नामक पर्वतकी घाटी में गये।

"

तस्मिन्प्रसूस्तबकपलाशाशोककानने ।

वार्भि: स्त्रवद्धिरुद्धुष्टे निर्विन्ध्याया: समन्‍्ततः ॥

१८॥

तस्मिन्‌--उसमें; प्रसून-स्तबक --पुष्प गुच्छ; पलाश--पलाश के वृक्ष ( छिउल ); अशोक--अशोक के पेड़; कानने--वनोद्यानमें; वार्भि:--जल से; स्त्रवद्धि: --बहते हुए; उद्दूष्टे--ध्वनि में; निर्विन्ध्याया: --निर्विश्ध्या नदी की; समन्ततः --सर्वत्र |

उस पर्वत घाटी में निर्विन्ध्या नामक नदी बहती है।

इस नदी के तट पर अनेक अशोक केवृक्ष तथा पलाश पुष्पों से लदे अन्य पौधे हैं।

वहाँ झरने से बहते हुए जल की मधुर ध्वनि सुनाईपड़ती रहती है।

वे पति तथा पतली ऐसे सुरम्य स्थान में पहुँचे।

"

प्राणायामेन संयम्य मनो वर्षशतं मुनि: ।

अतिष्ठदेकपादेन निर्द्न्द्दोनिलभोजन: ॥

१९॥

प्राणायामेन-- प्राणायाम ( श्वास रोकने का अभ्यास ) के द्वारा; संयम्य--वश में करके; मन:ः--मन; वर्ष-शतम्‌--एक सौ वर्ष;मुनिः--मुनि; अतिष्ठत्‌-वहाँ रहते हुए; एक-पादेन--एक पाँव पर खड़े होकर; निरद्द्न्द्रः--बिना द्वैत के; अनिल--वायु;भोजन:--खाकर।

वहाँ पर मुनि ने योगिक प्राणायाम के द्वारा अपने मन को स्थिर किया और फिर समस्तआसक्ति पर संयम करते हुए बिना भोजन खाए केवल वायु का सेवन करते रहे और सौ वर्षोतक एक पाँव पर खड़े रहे।

"

शरणं तं प्रपद्येईहहँ य एव जगदीश्वरः ।

प्रजामात्मसमां मह्मं प्रयच्छत्विति चिन्तयन्‌ ॥

२०॥

शरणम्‌--शरण ग्रहण करके ; तम्‌ू--उसकी; प्रपद्ये-- समर्पण करता हूँ; अहम्‌--मैं; यः--जो; एव--निश्चय ही; जगत्‌-ईश्वरः--ब्रह्माण्ड के स्वामी; प्रजाम्‌--पुत्र; आत्म-समाम्‌--अपनी तरह का; मह्म्‌--मुझको; प्रयच्छतु-- प्रदान करें; इति--इसप्रकार; चिन्तयन्‌--सोचते हुए

वे मन ही मन सोच रहे थे कि जो सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं और मैं जिनकी शरण में आयाहूँ, वे प्रसन्न होकर मुझे अपने ही समान पुत्र प्रदान करें।

"

तप्यमानं त्रिभुवनं प्राणायामैधसाग्निना ।

निर्गतेन मुनेर्मूर्ध्न: समीक्ष्य प्रभवस्त्रय: ॥

२१॥

तप्यमानम्‌--तप करते हुए; त्रि-भुवनम्‌--तीनों लोक; प्राणायाम-- श्वास वायु रोकने का अभ्यास; एधसा--ईंधन; अग्निना--अग्नि से; निर्गतन--निकलता हुआ; मुने: --मुनि का; मूर्ध्न:--शिरो भाग; समीक्ष्य--देखकर; प्रभव: त्रय:--तीनों बड़े देव( ब्रह्मा, विष्णु तथा महे श्वर )।

जब अत्रि मुनि गहन तप-साधना कर रहे थे तो उनके प्राणायाम के कारण उनके शिर सेएक प्रज्वलित अग्नि उत्पन्न हुईं जिसे तीनों लोकों के तीन प्रमुख देवों ने देखा।

"

अप्सरोमुनिगन्धर्वसिद्धविद्याधरोरगैः ।

वितायमानयशसस्तदा श्रमपदं ययु; ॥

२२॥

अप्सर:--अप्सराएँ; मुनि--परम साधु; गन्धर्व--गंधर्व लोक के वासी; सिद्ध--सिद्धलोक के वासी; विद्याधर--अन्य देवता;उरगै:--नागलोक के वासी; वितायमान--फैला हुआ; यशस:--यश, ख्याति; तत्‌--उसके; आश्रम-पदम्‌-- आश्रम; ययु:--गये।

उस समय ये तीनों देव स्वर्गलोक के वासियों, यथा अप्सराओं, गन्धर्वों, सिद्धों, विद्याधरोंतथा नागों समेत अत्रि के आश्रम पहुँचे।

इस प्रकार वे उस मुनि के आश्रम में प्रविष्ट हुए, जोउनकी तपस्या के कारण विख्यात हो चुका था।

"

तत्पादुर्भावसंयोगविद्योतितमना मुनि: ।

उत्तिष्ठन्नेकपादेन ददर्श विबुधर्षभान्‌ ॥

२३॥

तत्‌--उनका; प्रादुर्भाव--प्राकट्य; संयोग--एकसाथ; विद्योतित-- प्रकाशित; मना: --मन में; मुनि: --मुनि ने; उत्तिष्ठन्‌--जगाये जाने पर; एक-पादेन--एक ही पाँव से; ददर्श--देखा; विबुध--देवता; ऋषभान्‌--महापुरुष ।

मुनि एक पैर पर खड़े थे, किन्तु उन्होंने ज्योंही देखा कि तीनों देव उनके समक्ष प्रकट हुए हैं,तो वे उन्हें देखकर इतने हर्षित हुए कि अत्यन्त कष्ट होते हुए भी वे एक ही पाँव से उनके निकटपहुँचे।

"

प्रणम्य दण्डवद्धूमावुपतस्थेहणाझ्जलि: ।

वृषहंससुपर्णस्थान्स्वै: स्वैश्विद्नैश्न चिह्नितानू ॥

२४॥

प्रणम्य--नमस्कार करके; दण्ड-वत्‌--दण्ड के समान; भूमौ--पृथ्वी पर; उपतस्थे--गिर पड़े; अहण--पूजा की सारी सामग्री;अज्जलि:--हाथ जोड़ कर; वृष--बैल; हंस--हंस पक्षी; सुपर्ण--गरुड़ पक्षी; स्थानू--स्थित; स्वै:--अपने; स्वैः-- अपने;चिह्नेः--चिह्नों; च--तथा; चिह्नितानू--पहचाने जाकर।

तत्पश्चात्‌ उन्होंने उन तीनों देवों की स्तुति की जो अपने-अपने वाहनों--बैल, हंस तथागरुड़--पर सवार थे, और अपने हाथों में डमरू, कुश तथा चक्र धारण किये थे।

मुनि ने भूमिपर गिरकर उन्हें दण्डवत्‌ प्रणाम किया।

"

कृपावलोकेन हसद्वदनेनोपलम्भितान्‌ ।

तद्रोचिषा प्रतिहते निमील्य मुनिरक्षिणी ॥

२५॥

कृपा-अवलोकेन--कृपा से देखते हुए; हसत्‌--हँसते हुए; वबदनेन--मुखों वाले; उपलम्भितान्‌--अत्यन्त प्रसन्न दिखते हुए;तत्‌--उनके; रोचिषा--तेज से; प्रतिहते--चकाचौंध होकर; निमील्य--मूँदकर; मुनि:--मुनि; अक्षिणी-- अपने नेत्र |

अत्रि मुनि यह देखकर अत्यधिक प्रमुदित हुए कि तीनों देव उन पर कृपालु हैं।

उनके नेत्र उनदेवों के शरीर के तेज से चकाचौंध हो गये, अतः उन्होंने कुछ समय के लिए अपनी आँखें मूँदलीं।

"

चेतस्तत्प्रवर्णं युञ्जन्नस्तावीत्संहताञझजलिः इलक्ष्णया सूक्तया वाचा ।

सर्वलोकगरीयस:अत्रिरुवाचविश्वोद्धवस्थितिलयेषु विभज्यमानै-मायागुणैरनुयुगं विगृहीतदेहाः।

ते ब्रह्मविष्णुगिरिशा: प्रणतोस्म्यहं व-स्तेभ्यः क एवं भवतां म इहोपहूतः॥

२६-२७॥

चेत:--हृदय; तत्‌-प्रवणम्‌--उनपर टिका कर; युद्धनू--बनाकर; अस्तावीत्‌--स्तुति की; संहत-अज्धलि:--हाथ जोड़ कर;इएलक्षणया-- भावपूर्ण; सूक्तया-- प्रार्थनाएँ; वाचा--शब्द; सर्व-लोक--सारा संसार; गरीयस:--सम्माननीय; अत्रि: उवाच--अत्रि ने कहा; विश्व--ब्रह्माण्ड; उद्धव--सृष्टि; स्थिति--पालन; लयेषु--संहार में; विभज्यमानै:--विभक्त; माया-गुणै: --प्रकृति के बाह्य गुणों से; अनुयुगम्‌--विभिन्न कल्पों के अनुसार; विगृहीत--धारण करके; देहा: --शरीर; ते--वे; ब्रह्म--ब्रह्माजी; विष्णु-- भगवान्‌ विष्णु; गिरिशा:--शिवजी; प्रणत:--झुका, नमित; अस्मि--हूँ; अहम्‌--मैं; व:--तुम सबको;तेभ्य:--उनसे; कः --कौन; एव--निश्चय ही; भवतामू--आपका; मे-- मुझसे; इह--यहाँ; उपहूत: -- बुलाया जाकर |

किन्तु पहले से उनका हृदय इन देवों के प्रति आकृष्ट था, अतः जिस-तिस प्रकार उन्होंने होशसँभाला और वे हाथ जोड़ कर ब्रह्माण्ड के प्रमुख अधिष्ठाता देवों की मधुर शब्दों से स्तुति करनेलगे।

अत्रि मुनि ने कहा : हे ब्रह्मा, हे विष्णु तथा हे शिव, आपने भौतिक प्रकृति के तीनों गुणोंको अंगीकार करके अपने को तीन शरीरों में विभक्त कर लिया है, जैसा कि आप प्रत्येक कल्पमें हृश्य जगत की उत्पत्ति, पालन तथा संहार के लिए करते आये हैं।

मैं आप तीनों को सादरनमस्कार करता हूँ और मैं जानना चाहता हूँ कि मैने अपनी प्रार्थना में आपमें से किसको बुलायाथा?"

एको मयेह भगवान्विविधप्रधानै-श्वित्तीकृतः प्रजननाय कथ॑ नु यूयम्‌ ।

अत्रागतास्तनुभूतां मनसोपि दूराद्‌ब्रूत प्रसीदत महानिह विस्मयो मे ॥

२८॥

एकः--एक; मया--मेरे द्वारा; हह--यहाँ; भगवान्‌--परम पुरुष; विविध--अनेक; प्रधानै:--साज-सामग्री द्वारा; चित्ती-कृतः--मन में स्थिर किया हुआ; प्रजननाय--सन्तान उत्पत्ति के लिए; कथम्‌--क्यों; नु--किन्तु; यूयम्‌--तुम सभी; अत्र--यहाँ; आगता:--प्रकट हुए; तनु-भूताम्‌-देहधारियों का; मनस:--मन; अपि--यद्मपि; दूरातू--दूर से; ब्रूत--कृपा करकेबताएँ; प्रसीदत--मुझ पर कृपालु होकर; महान्‌--अत्यधिक; इह--यह; विस्मय:--सन्देह; मे--मेरा ।

मैंने तो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के ही समान पुत्र की इच्छा से उन्हीं का आवाहन किया थाऔर मैंने उन्हीं का चिन्तन किया था।

यद्यपि वे मनुष्य की मानसिक कल्पना से परे हैं, किन्तुआप तीनों यहाँ पर उपस्थित हुए हैं।

कृपया मुझे बताएँ कि आप यहाँ कैसे आए हैं, क्योंकि मैंइसके विषय में अत्यधिक मोहग्रस्त हूँ।

"

मैत्रेय उवाचइति तस्य बच: श्रुत्वा त्रयस्ते विबुधर्षभा: ।

प्रत्याहु: एलक्ष्णया बाचा प्रहस्य तमृषिं प्रभो ॥

२९॥

मैत्रेय: उवाच--ऋषि मैत्रेय ने कहा; इति--इस प्रकार; तस्य--उसके; वच:--शब्द; श्रुत्वा--सुनकर; त्रयः ते--वे तीनों;विबुध--देवता; ऋषभा:-- प्रमुख; प्रत्याहु:--उत्तर दिया; एलक्ष्णया--विनीत; वाचा--वाणी; प्रहस्य--मुस्कराकर; तम्‌--उसको; ऋषिम्‌ू--ऋषि; प्रभो--हे शक्तिमान |

मैत्रेय महा-मुनि ने कहा : अत्रि मुनि को इस प्रकार बोलते हुए सुनकर तीनों महान्‌ देवमुस्कराए और उन्होंने मृदु वाणी में इस प्रकार उत्तर दिया।

"

देवा ऊचु:यथा कृतस्ते सड्डूल्पो भाव्यं तेनेव नान्यथा ।

सत्सड्डल्पस्य ते ब्रह्मन्यद्वै ध्यायति ते वयम्‌ ॥

३०॥

देवा: ऊचु:--देवताओं ने उत्तर दिया; यथा--जैसा; कृत:--किया हुआ; ते--तुम्हारे द्वारा; सड्डूल्प:--निश्चय, संकल्प;भाव्यम्‌ू--होना चाहिए; तेन एब--उससे; न अन्यथा--और कुछ नहीं, विपरीत नहीं; सत्‌-सट्डूल्पस्थ--जिसका निश्चय डिगतानहीं; ते--तुम्हारा; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; यत्‌--जो; बै--निश्चय ही; ध्यायति-- ध्यान धरते हुए; ते--वे सभी; वयम्‌--हम हैं ।

तीनों देवताओं ने अत्रि मुनि से कहा : हे ब्राह्मण, तुम अपने संकल्प में पूर्ण हो, अतः तुमनेजो कुछ निश्चित कर रखा है, वही होगा, उससे विपरीत नहीं होगा।

हम सब वे ही पुरूष हैंजिनका तुमने ध्यान किया है और इसीलिए हम सब तुम्हारे पास आये हैं।

"

अथास्मदंशभूतास्ते आत्मजा लोकविश्रुता: ।

भवितारोड़् भद्रं ते विस्त्रप्स्न्ति च ते यशः ॥

३१॥

अथ--अतः; अस्मत्‌--हमारे; अंश-भूता: --विभिन्नांश; ते--तुम्हारा; आत्मजा: --पुत्र; लोक-विश्रुता: --संसार प्रसिद्ध;भवितार:--भविष्य में उत्पन्न होंगे; अड्र--हे मुनि; भद्रमू--कल्याण हो; ते--तुम्हारा; विस््रप्स्यन्ति--फैलाएँगे; च-- भी; ते--तुम्हारी; यशः--यश।

हे मुनिवर, हमारी शक्ति के अंशस्वरूप तुम्हारे पुत्र उत्पन्न होंगे और हम तुम्हारे कल्याण केकामी हैं, अतः बे पुत्र तुम्हारे यश का संसार-भर में विस्तार करेंगे।

एवं कामवरं दच्त्वा प्रतिजग्मु: सुरेश्वरा: ।

सभाजितास्तयो: सम्यग्दम्पत्योर्मिषतोस्तत: ॥

३२॥

एवम्‌--इस प्रकार; काम-वरम्‌--इच्छित वर; दत्त्वा--प्रदान करके ; प्रतिजग्मु;--वापस चले गये; सुर-ईश्वरा: -- प्रमुख देवता;सभाजिता: --पूजित होकर; तयो:--दोनों के; सम्यक्‌ --पूरी तरह; दम्पत्यो:--पति तथा पत्नी; मिषतो: --देखते ही देखते;ततः--वहाँ से

इस प्रकार उस युगल के देखते ही देखते तीनों देवता ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर अत्रि मुनिको वर देकर उस स्थान से ओझल हो गये।

"

सोमोभूद्॒ह्मणो $शेन दत्तो विष्णोस्तु योगवित्‌ ।

दुर्वासा: शट्डूरस्यांशो निबोधाड़्रिरस: प्रजा: ॥

३३॥

सोम:--चन्द्रलोक का स्वामी; अभूत्‌--प्रकट हुआ; ब्रह्मण: --ब्राह्मण के; अंशेन--आंशिक विस्तार से; दत्त: --दत्तात्रेय;विष्णो: --विष्णु का; तु--लेकिन; योग-वित्‌--अत्यन्त शक्तिमान योगी; दुर्वासा:--दुर्वासा; शट्भरस्य अंश: --शिव काआंशिक विस्तार; निबोध--समझने का प्रयत्न करो; अड्विस्‍सः--अंगिरा ऋषि की; प्रजा: --सन्ततियों का।

तत्पश्चात्‌ ब्रह्म के आंशिक विस्तार से सोमदेव उत्पन्न हुए, विष्णु से परम योगी दत्तात्रेय तथाशंकर ( शिवजी ) से दुर्वासा उत्पन्न हुए।

अब तुम मुझसे अंगिरा के अनेक पुत्रों के सम्बन्ध में" सुनो।

श्रद्धा त्वड्रिरिसः पत्नी चतस्त्रोउसूत कन्यका: ।

सिनीवाली कुहू राका चतुर्थ्यनुमतिस्तथा ॥

३४॥

श्रद्धा-- श्रद्धा; तु--लेकिन; अड्डभिरसः-- अंगिरा ऋषि की; पत्नी--पत्ली; चतस्त्र:--चार; असूत--जन्म दिया; कन्यका:--कन्याएँ; सिनीवाली--सिनीवाली; कुहू: --कुहू; राका--राका; चतुर्थी--चौथी; अनुमति:--अनुमति; तथा-- भी अंगिरा की पली श्रद्धा ने चार कनन्‍्याओं को जन्म दिया जिनके नाम सिनीवाली, कुहू, राकातथा अनुमति थे।

"

तत्पुत्रावपरावास्तां ख्यातौ स्वारोचिषेउन्तरे ।

उतथ्यो भगवान्साक्षाद्रहिष्ठ श्च बृहस्पति: ॥

३५॥

तत्‌--उसके ; पुत्रौ--दो पुत्र; अपरौ--अन्य; आस्ताम्‌--उत्पन्न हुए; ख्यातौ--प्रसिद्ध; स्वारोचिषे--स्वारोचिष युग में; अन्तरे--मनु के; उतथ्य: --उतथ्य; भगवान्‌--अत्यन्त शक्तिमान; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; ब्रहिष्ठ: च--आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत; बृहस्पति: --बृहस्पति।

इन चार पुत्रियों के अतिरिक्त उसके दो पुत्र भी थे।

उनमें से एक उतथ्य कहलाया और दूसरामहान्‌ विद्वान बृहस्पति था।

"

पुलस्त्योडजनयत्पत्न्यामगस्त्यं च हविर्भुवि ।

सोन्यजन्मनि दह्वाग्निर्विश्रवाश्चन महातपा: ॥

३६॥

पुलस्त्य:--पुलस्त्य मुनि ने; अजनयत्‌--जन्म दिया; पल्याम्‌--अपनी पत्नी से; अगस्त्यम्‌--अगस्त्य मुनि को; च--भी;हविर्भुवि--हविर्भुवि से; सः--वह ( अगस्त्य ); अन्य-जन्मनि--अगले जन्म में; दह-अग्नि:--जठराग्नि; विश्रवा: --विश्रवा;च--तथा; महा-तपाः --तपस्या के कारण अत्यन्त बलशाली |

पुलस्त्य के उनकी पत्नी हविर्भू से अगस्त्य नाम का एक पुत्र हुआ, जो अपने अगले जन्म मेंदह्लाग्नि बना।

इसके अतिरिक्त पुलस्त्य के एक अन्य महान्‌ तथा साधु पुत्र हुआ जिसका नामविश्रवा था।

"

तस्य यक्षपतिर्देव: कुबेरस्त्विडविडासुत: ।

रावण: कुम्भकर्णश्र तथान्यस्यां विभीषण: ॥

३७॥

तस्य--उसके; यक्ष-पति:--यक्षों का राजा; देव:--देवता; कुबेर: --कुबेर; तु--और; इडविडा--इडविडा का; सुतः --पुत्र;रावण:--रावण; कुम्भकर्ण:--कुम्भकर्ण; च-- भी; तथा--इस प्रकार; अन्यस्याम्‌ू-- अन्य से; विभीषण:--विभीषणविश्रवा के दो पत्लियाँ थीं।

प्रथम पत्नी इडविडा थी जिससे समस्त यक्षों का स्वामी कुबेरउत्पन्न हुआ।

दूसरी पत्ती का नाम केशिनी था जिससे तीन पुत्र उत्पन्न हुए।

ये थे--रावण,कुम्भकर्ण तथा विभीषण।

"

पुलहस्य गतिर्भार्या त्रीनसूत सती सुतान्‌ ।

कर्मश्रेष्ठं वरीयांसं सहिष्णुं च महामते ॥

३८ ॥

पुलहस्य--पुलह की; गति: --गति; भार्या--पती; त्रीन्‌ू--तीन; असूत--जन्म दिया; सती--साध्वी; सुतान्‌--पुत्रों को; कर्म-श्रेष्टमू--सकाम कर्म में अत्यन्त दक्ष; वरीयांसम्‌--अत्यन्त सम्माननीय; सहिष्णुम्‌-- अत्यन्त सहनशील; च-- भी; महा-मते--हेविदुर।

पुलह ऋषि की पत्नी गति ने तीन पुत्रों को जन्म दिया, जिनके नाम थे--कर्म श्रेष्ठ, वरीयानतथा सहिष्णु।

ये सभी महान्‌ साधु थे।

"

क्रतोरपि क्रिया भार्या वालखिल्यानसूयत ।

ऋषीन्षष्टिसहस्त्राणि ज्वलतो ब्रह्मतेजसा ॥

३९॥

क्रतो:--क्रतु मुनि का; अपि-- भी; क्रिया--क्रिया; भार्या--पत्नी; वालखिल्यान्‌ू--वालखिल्य के ही समान; असूयत--उत्पन्नकिया; ऋषीन्‌--साधु, ऋषि; षष्टि--साठ; सहस्त्रािणि--हजार; ज्वलत:ः--अत त्यन्त देदीप्यमान; ब्रह्म-तेजसा--ब्रह्मतेज के प्रभावसे

क्रतु की पत्नी क्रिया ने वालखिल्यादि नामक साठ हजार ऋषियों को जन्म दिया।

ये ऋषिब्रह्म ( आध्यात्मिक ) ज्ञान में बढ़े-चढ़े थे और उनका शरीर ऐसे ज्ञान से देदीप्यमान था।

"

ऊर्जायां जज्षिरे पुत्रा वसिष्ठस्थ परन्तप ।

चित्रकेतुप्रधानास्ते सप्त ब्रह्मर्षयोमला: ॥

४०॥

ऊर्जायाम्‌--ऊर्जा से; जज्ञिरि--जन्म लिया; पुत्रा:--पुत्र; वसिष्ठस्थ--वसिष्ठ मुनि की; परन्तप--हे महान; चित्रकेतु--चित्रकेतु;प्रधाना:-- आदि; ते--सब पुत्र; सप्त--सात; ब्रह्य-ऋषय: --ब्रह्मज्ञानी ऋषि; अमला:--निर्मल |

वसिष्ठ मुनि की पत्नी ऊर्जा से, जिसे कभी-कभी अरुन्धती भी कहा जाता है, चित्रकेतुइत्यादि सात विशुद्ध ऋषि उत्पन्न हुए।

"

चित्रकेतु: सुरोचिश्च विरजा मित्र एव च ।

उल्बणो वसुभूृद्यानो द्युमान्शक्त्यादयोपरे ॥

४१॥

चित्रकेतु:--चित्रकेतु; सुरोचि: च--तथा सुरोचि; विरजा:--विरजा; मित्र: --मित्र; एव-- भी; च--तथा; उल्बण: --उल्बण;बसुभूद्यान: --वसुभृद्यान; द्युमान्‌--द्युमान; शक्ति-आदय: --शक्ति इत्यादि पुत्र; अपरे--उसकी अन्य पत्नी से।

इन सातों ऋषियों के नाम इस प्रकार हैं--चित्रकेतु, सुरोचि, विरजा, मित्र, उल्बण,वसुभूद्यान तथा द्युमान।

वसिष्ठ की दूसरी पत्नी से कुछ अन्य अत्यन्त सुयोग्य पुत्र हुए।

"

चित्तिस्त्वथर्वण: पत्नी लेभे पुत्र धृतब्रतम्‌ ।

दध्यञ्ञम श्रशिरसं भृगोर्वशं निबोध मे ॥

४२॥

चित्ति:--चित्ति; तु-- भी; अथर्वण: --अथर्वा की; पल्ली--पली; लेभे--प्राप्त हुआ; पुत्रमू--पुत्र; धृत-ब्रतम्‌--ब्रतधारी;दध्यक्षमू--दध्यज्ञ; अश्वशिरसम्‌--अश्वसिरा; भूगो: वंशम्‌-- भूगु का वंश; निबोध--समझने का प्रयत्न करो; मे--मुझसे ।

अथर्वा मुनि की पत्नी चित्ति ने अश्वशिरा नामक पुत्र को जन्म दिया, जो ब्रतधारी होने केकारण दध्यज्ञ कहलाया।

अब तुम मुझसे भृगुमुनि के वंश के विषय में सुनो ।

"

भृगु: ख्यात्यां महाभाग: पल्यां पुत्रानजीजनत्‌ ।

धातारं च विधातारं अियं च भगवत्पराम्‌ ॥

४३॥

भृगु:- भूगुः; ख्यात्यामू--अपनी ख्याति नामक पत्नी से; महा-भाग: --अत्यन्त भाग्यशाली; पत्यामू-पत्नी को; पुत्रान्‌-पुत्र;अजीजनतू--जन्म दिया; धातारम्‌ू--धाता; च--तथा; विधातारम्‌--विधाता; थ्रियम्‌ू-- श्री नामक एक कन्या; च भगवत्‌ू-'पराम्‌ू--तथा भगवान्‌ की परम भक्त, भगवत्परायणा |

भूगु मुनि अत्यधिक भाग्यशाली थे।

उन्हें अपनी पत्नी ख्याति से दो पुत्र, धाता तथा विधाताऔर एक पुत्री, श्री, प्राप्त हुई; वह श्रीभगवान्‌ के प्रति अत्यधिक परायण थी।

"

आयतिं नियतिं चैव सुते मेरुस्तयोरदात्‌ ।

ताभ्यां तयोरभवतां मृकण्डः प्राण एवं च ॥

४४॥

आयतिम्‌--आयति; नियतिमू--नियति; च एव-- भी; सुते--कन्याएँ; मेरुः--मेरु मुनि; तयोः --उन दोनों को; अदात्‌ू--देदिया; ताभ्याम्‌--उनमें से; तयो:--दोनों; अभवताम्‌-- प्रकट हुए; मृकण्ड:--मृकण्ड; प्राण:--प्राण; एब--निश्चय ही; च--तथा

मेरु ऋषि के दो पुत्रियाँ थीं जिनके नाम आयति तथा नियति थे जिन्हें उन्होंने धाता तथाविधाता को दान दे दिया।

आयति तथा नियति से मृकण्ड तथा प्राण नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए।

"

मार्कण्डेयो मृकण्डस्य प्राणाद्वेदशिरा मुनि: ।

कविश्च भार्गवो यस्य भगवानुशना सुतः ॥

४५॥

मार्कण्डेय:--मार्कण्डेय; मृकण्डस्थ--मृकण्ड का; प्राणात्‌--प्राण से; वेदशिरा:--वेदशिरा; मुनि:--परम साधु; कवि: च--कवि नाम का; भार्गव:--भार्गव नाम का; यस्य--जिसका; भगवान्‌--अत्यन्त शक्तिशाली; उशना--शुक्राचार्य ; सुत:--पुत्रम

ृकण्ड से मार्कण्डेय मुनि और प्राण से वेदशिरा ऋषि उत्पन्न हुए।

वेदशिरा का पुत्र उशना( शुक्राचार्य ) था, जो कवि भी कहलाता है।

इस प्रकार कवि भी भृगुवंशी था।

"

त एते मुनयः क्षत्तलेकान्सगैरभावयन्‌ ।

एप कर्दमदौहित्रसन्तान: कथितस्तव ॥

४६॥

श्रुण्वतः श्रद्दधानस्य सद्यः: पापहर: पर: ।

प्रसूतिं मानवीं दक्ष उपयेमे ह्मजात्मज: ॥

४७॥

ते--वे; एते--समस्त; मुनय:--मुनिगण; क्षत्त:--हे विदुर; लोकान्‌ू--तीनों लोक; सर्गैं;--अपनी सनन्‍्तानों सहित; अभावयन्‌ू--परिपूरित किया; एष:--यह; कर्दम--कर्दम मुनि का; दौहित्र--नाती; सन्तान:--सन्तान; कथित:--पहले कहा जा चुका;तब--तुमको; श्रृण्वतः--सुनते हुए; श्रद्धानस्य-- श्रद्धालु का; सद्यः--शीघ्र; पाप-हर:--समस्त पापकर्मो को कम करके;परः--महान; प्रसूतिमू--प्रसूति; मानवीम्‌--मनु की पुत्री ने; दक्ष:ः--राजा दक्ष से; उपयेमे--विवाह किया; हि--निश्चय ही;अज-आत्मज:--ब्रह्मा का पुत्रहे विदुर, इस प्रकार इन मुनियों तथा कर्दम की पुत्रियों की सन्‍्तानों से विश्व की जनसंख्या बढ़ी।

जो कोई श्रद्धापूर्वक इस वंश के आख्यान को सुनता है, वह समस्त पाप-बन्धनों से छूटजाता है।

मनु की अन्य कन्याओं में से प्रसूति ने ब्रह्मा के पुत्र दक्ष से विवाह किया।

"

तस्यां ससर्ज दुहितृः षोडशामललोचना: ।

त्रयोदशादाद्धर्माय तथेकामग्नये विभु: ॥

४८ ॥

तस्यामू--उसको; ससर्ज--उत्पन्न किया; दुहितृः--कन्याएँ; षोडश--सोलह; अमल-लोचना:--कमल जैसे नेत्रों वाली;त्रयोदश--तेरह; अदात्‌-दिया; धर्माय--धर्म को; तथा--उसी तरह; एकाम्‌--एक पुत्री; अग्नये--अग्नि को; विभु:--दक्षनेदक्ष ने अपनी पत्नी प्रसूति से सोलह कमलनयनी सुन्दरी कन्याएँ उत्पन्न कीं।

इन सोलहकन्याओं में से तेरह धर्म को और एक अग्नि को पत्नी रूप में प्रदान की गईं।

"

पितृभ्य एकां युक्ते भ्यो भवायैकां भवच्छिदे ।

श्रद्धा मैत्री दया शान्तिस्तुष्टि: पुष्टि: क्रियोन्नति: ॥

४९॥

बुद्धिमेंधा तितिक्षा हीमूर्तिर्धर्मस्य पत्नय: ।

श्रद्धासूत शुभ मैत्री प्रसादमभयं दया ॥

५०॥

शान्ति: सुखं मुद तुष्टि: स्मयं पुष्टिरसूयत ।

योगं क्रियोन्नतिर्दर्पमर्थ बुद्धिरसूयत ॥

५१॥

मेधा स्मृति तितिक्षा तु क्षेमं ही: प्रश्रयं सुतम्‌ ।

मूर्ति: सर्वगुणोत्पत्तिनरनारायणावृषी ॥

५२॥

पितृभ्यः:--पितृगण को; एकाम्‌--एक पुत्री; युक्ते भ्य: --समस्त, संयुक्त; भवाय--शिवजी को; एकाम्‌--एक पुत्री; भव-छिदे-- भौतिक बन्धन से छुड़ाने वाले; श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्तिः, तुष्टि:, पुष्टिः, क्रिया, उन्नति:, बुद्ध्धिः, मेधा, तितिक्षा, हीः,मूर्तिः:--ये दक्ष की तेरह कन्याओं के नाम हैं; धर्मस्थ-- धर्म की; पत्नयः--पत्लियाँ; श्रद्धा-- श्रद्धा ने; असूत--जन्म दिया;शुभम्‌--शुभ; मैत्री--मैत्री; प्रसादमू-- प्रसाद; अभयम्‌-- अभय; दया--दया; शान्तिः--शान्ति; सुखम्‌--सुख; मुदम्‌--मुद;तुष्टिः--तुष्टि; स्मथम्‌--स्मय; पुष्टि: --पुष्टि; असूयत--जन्म दिया; योगम्‌--योग; क्रिया--क्रिया; उन्नति: --उन्नति; दर्पम्‌--दर्प;अर्थम्‌--अर्थ; बुद्धिः:--बुद्धि; असूयत--उत्पन्न किया; मेधा--मेधा; स्मृतिम्‌ू--स्मृति; तितिक्षा--तितिक्षा; तु-- भी; क्षेमम्‌--क्षेम; ही:--ही; प्रश्रयम्‌-प्रश्रय; सुतम्‌--पुत्र; मूर्ति:--मूर्ति; सर्व-गुण --समस्त अच्छे गुणों का; उत्पत्ति:-- आगार; नर-नारायणौ--नर तथा नारायण; ऋषी--दो ऋषि।

शेष दो कन्याओं में से एक पितृलोक को दान दे दी गई, जहाँ वह प्रेमपूर्वक रह रही है औरदूसरी कन्या भवबंधन से समस्त पापियों के उद्धारक शिवजी को दी गई।

दक्ष ने धर्म को जिनतेरह कन्याओं को दिया उनके नाम थे : श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति,बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ही तथा मूर्ति।

इन तेरहों ने पुत्रों को जन्म दिया, जो इस प्रकार हैं-- श्रद्धाने शुभ, मैत्री ने प्रसाद, दया ने अभय, शान्ति ने सुख, तुष्टि ने मुद, पुष्टि ने समय, क्रिया ने योग,उन्नति ने दर्प, बुद्धि ने अर्थ, मेधा ने स्मृति, तितिक्षा ने क्षेम तथा ह्वी ने प्रश्रय को जन्म दिया।

समस्त गुणों की खान मूर्ति ने नर-नारायण को जन्म दिया, जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ हैं।

"

ययोर्जन्मन्यदो विश्वमभ्यनन्दत्सुनिर्वृतम्‌ ।

मनांसि ककुभो वाताः प्रसेदु: सरितोद्रय: ॥

५३॥

ययो:--जिनमें से दोनों ( नर तथा नारायण ); जन्मनि--जन्म लेने पर; अदः--वह; विश्वम्‌ू--ब्रह्माण्ड; अभ्यनन्दत्‌--आनन्दितहुआ; सु-निर्वृतम्‌--खुशी से पूर्ण; मनांसि--प्रत्येक का मन; ककुभः--दिशाएँ; वाता:--वायु; प्रसेदु:--प्रसन्न हुए; सरित:--नदियाँ; अद्गयः--पर्वतनर-नारायण के जन्म के अवसर पर समस्त विश्व आनन्दित था।

प्रत्येक का मन शान्त थाऔर इस प्रकार समस्त दिशाओं में वायु, नदियाँ तथा पर्वत मनोहर लगने लगे।

"

दिव्यवाद्यन्त तूर्याणि पेतु: कुसुमवृष्टयः ।

मुनयस्तुष्ठवुस्तुष्टा जगुर्गन्धर्वकिन्नरा: ॥

५४॥

नृत्यन्ति सम स्त्रियो देव्य आसीत्परममड्लम्‌ ।

देवा ब्रह्मादय: सर्वे उपतस्थुरभिष्टवै: ॥

५५॥

दिवि--स्वर्गलोक में; अवाद्यन्त--बज उठे; तूर्याणि--तुरही; पेतु:--वर्षा की; कुसुम--फूलों की; वृष्टय:--वर्षा; मुनयः --मुनिगण ने; तुष्ठब॒ु:--वैदिक स्तुतियाँ पढ़ीं; तुष्टा:--प्रसन्न; जगुः--गाने लगे; गन्धर्व--गन्धर्वगण; किन्नरा:--किन्नरगण; नृत्यन्तिस्म--नाचने लगे; स्त्रियः--अप्सराएँ; देव्य: --स्वर्गलोक की; आसीतू--दृष्टिगोचर हो रह थे; परम-मड्गलम्‌ू--परम मंगल;देवा:--देवतागण; ब्रह्म -आदय:--ब्रह्मा तथा अन्य; सर्वे--सबों ने; उपतस्थु:--पूजा की; अभिष्टवै:--प्रार्थनाओं से, स्तोत्रों से |

स्वर्गलोक में बाजे बजने लगे और आकाश से पुष्प बरसने लगे।

प्रसन्न मुनि वैदिक स्तुतियोंका उच्चारण करने लगे।

गंधर्व तथा किन्नर लोक के वासी गाने लगे और स्वर्ग की अप्सराएँनाचने लगीं।

इस प्रकार नर-नारायण के जन्म के समय सभी मंगलसूचक चिह्न दिखाई पड़नेलगे।

उसी समय ब्रह्मादि महान्‌ देवों ने भी सादर स्तुतियाँ अर्पित कीं।

"

देवा ऊचु:यो मायया विरचितं निजयात्मनीदंखे रूपभेदमिव तत्प्रतिचक्षणाय ।

एतेन धर्मसदने ऋषिमूर्तिनाद्य प्रादुक्षकार पुरुषाय नमः 'परस्मै ॥

५६॥

देवा:--देवताओं ने; ऊचु:--कहा; यः--जो; मायया--बहिरंगा शक्ति द्वारा; विरचचितम्‌--उत्पन्न; निजया--स्वत:; आत्मनि--भगवान्‌ में स्थित; इदम्‌ू--यह; खे--आकाश में; रूप-भेदम्‌ू--बादल-समूह; इब--सहश, मानो; तत्‌--उसका;प्रतिचक्षणाय--प्रकट होने के लिए; एतेन--इसके साथ; धर्म-सदने-- धर्म के घर में; ऋषि-मूर्तिना--ऋषि के रूप द्वारा;अद्य--आज; प्रादुश्चकार-- प्रकट हुआ; पुरुषाय-- श्रीभगवान्‌ को; नमः--नमस्कार है; परस्मै-- परम |

देवताओं ने कहा : हम उस दिव्य रूप भगवान्‌ को नमस्कार करते हैं जिन्होंने इस हश्य जगतकी सृष्टि अपनी बहिरंगा शक्ति के रूप में की है, जो उनमें उसी प्रकार स्थित है, जिस प्रकार वायुतथा बादल आकाश्न में रहते हैं और जो अब धर्म के घर में नर-नारायण ऋषि के रूप में प्रकटहुए हैं।

"

सोयं स्थितिव्यतिकरोपशमाय सृष्टान्‌सत्त्वेन न: सुरगणाननुमेयतत्त्व: ।

हृश्याददभ्रकरुणेन विलोकनेन यच्छीनिकेतममलं क्षिपतारविन्दम्‌ ॥

५७॥

सः--वह; अयम्‌--यह ( भगवान्‌ ); स्थिति--उत्पन्न जगत का; व्यतिकर--आपत्तियाँ; उपशमाय--शमन हेतु; सृष्टान्‌ू--सर्जित;सत्त्वेन--सत्तोगुण से; न:--हम; सुर-गणान्‌--देवताओं को; अनुमेय-तत्त्व:--वेदों द्वारा ज्ञेय; दृश्यातू--दृष्टिपात से; अद्न-करुणेन--दयालु, करुणा से युक्त; विलोकनेन--चितवन से; यत्‌--जो; श्री-निकेतम्‌-- धन की देवी का घर; अमलम्‌--निर्मल; क्षिपत--से बढ़कर; अरविन्दम्‌--कमल।

वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌, जो वास्तविक रूप से प्रामाणिक वैदिक साहित्य द्वारा जाने जातेहैं और जिन्होंने सृष्टठ जगत की समस्त विपत्तियों को विनष्ट करने के लिए शान्ति तथा समृद्धि कासृजन किया है, हम देवताओं पर कृपापूर्ण दृष्टिपात करें।

उनकी कृपापूर्ण चितवन लक्ष्मी केआसन निर्मल कमल की शोभा को मात करने वाली है।

"

एवं सुरगणैस्तात भगवन्तावभिष्ठृतौ ।

लब्धावलोकैर्ययतुरर्चितौ गन्धमादनम्‌ ॥

५८ ॥

एवम्‌--इस प्रकार; सुर-गणै:--देवताओं द्वारा; तात--हे विदुर!; भगवन्तौ-- श्री भगवान्‌; अभिष्ठृतौ-- प्रशंसित होकर; लब्ध--प्राप्त कर; अवलोकै:--चितवन ( कृपा की ); ययतु:--चले गये; अर्चितौ--पूजित होकर; गन्ध-मादनम्‌--गन्धमादन पर्वतको[ मैत्रेय ने कहा : हे विदुर, इस प्रकार देवताओं ने नर-नारायण मुनि के रूप में प्रकटश्रीभगवान्‌ की पूजा की।

भगवान्‌ ने उन पर कृपा-दृष्टि डाली और फिर गन्धमादन पर्वत की ओरचले गये।

"

ताविमौ वै भगवतो हरेरंशाविहागतौ ।

भारव्ययाय च भुव: कृष्णौ यदुकुरूद्वहौ ॥

५९॥

तौ--दोनों; इमौ--ये; वै--निश्चय ही; भगवत:-- श्रीभगवान्‌ का; हरेः--हरि का; अंशौ--अंश रूप विस्तार; इह--यहाँ ( इसब्रह्माण्ड में )) आगतौ--प्रकट हुआ है; भार-व्ययाय--भार हल्का करने के लिए; च--तथा; भुव:ः--जगत का; कृष्णौ--दोकृष्ण ( कृष्ण तथा अर्जुन ); यदु-कुरु-उद्दहौ--जो क्रमशः यदु तथा कुरु वंशों में सर्वश्रेष्ठ हैं |

नर-नारायण ऋषि कृष्ण के अंश विस्तार हैं और अब जगत का भार उतारने के लिए यदुतथा कुरु वंशों में क्रमशः कृष्ण तथा अर्जुन के रूप में प्रकट हुए हैं।

"

स्वाहाभिमानिनश्चाग्नेरात्मजांस्त्रीनजीजनत्‌ ।

पावकं पवमानं च शुचिं च हुत१भोजनम्‌ ॥

६०॥

स्वाहा--अग्नि की पत्नी, स्वाहा; अभिमानिन: --अग्नि का मुख्य विग्रह; च--तथा; अग्ने: --अग्नि से; आत्मजानू---पुत्रों को;त्रीनू--तीन; अजीजनत्‌--उत्पन्न किया; पावकमू--पावक; पवमानम्‌ च--तथा पवमान; शुचिम्‌ च--तथा शुचि; हुत-भोजनम्‌--यज्ञ की आहुति खाकर।

अग्निदेव की पतली स्वाहा से तीन संताने उत्पन्न हुई जिनके नाम पावक, पवमान तथा शुचिहैं, जो यज्ञ की अग्नि में डाली गई आहुतियों को खाने वाले हैं।

"

तेभ्योग्नय: समभवन्चत्वारिंशच्च पञ्ञ च ।

त एवैकोनपशञ्ञाशत्साकं पितृपितामहै: ॥

६१॥

तेभ्य:--उनसे; अग्नय:--अग्निदेव; समभवनू--उत्पन्न हुए; चत्वारिंशत्‌--चालीस; च--तथा; पशञ्च--पाँच; च--तथा; ते--वे;एव--निश्चय ही; एकोन-पश्चञाशत्‌--उजच्चास; साकम्‌--साथ में; पितृ-पितामहैः--पिता तथा पितामह के साथ |

इन तीनों पुत्रों से अन्य पैंतालीस सन्तानें उत्पन्न हुई और वे भी अग्निदेव हैं।

अतः अग्निदेवोंकी कुल संख्या उनके पिताओं तथा पितामह को मिलाकर उज्ञास है।

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बैतानिके कर्मणि यन्नामभिव्रहावादिभि: ।

आम्नेय्य इष्टयो यज्ञे निरूप्यन्तेग्नयस्तु ते ॥

६२॥

वैतानिके--आहुति डालना; कर्मणि--कर्म; यत्‌-- अग्निदेवों का; नामभि:--नामों से; ब्रह्म-वादिभि:--निर्विशेषवादी ब्राह्मणोंद्वारा; आग्नेय्य:--अग्नि के लिए; इष्टय:--यज्ञ; यज्ञे--यज्ञ में; निरूप्यन्ते--लक्ष्य हैं; अग्नयः--उज्जलास अग्निदेव; तु--लेकिन;ते--वेब्रह्मवादी ब्राह्मणों द्वारा वैदिक यज्ञों में दी गई आहुतियों के भोक्ता ये ही उज्ञास अग्निदेव हैं।

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अग्निष्वात्ता बर्हिषद: सौम्या: पितर आज्यपा: ।

साग्नयोनग्नयस्तेषां पत्नी दाक्षायणी स्वधा ॥

६३॥

अग्निष्वात्ता:--अग्निष्वात्त; ब्हिषद:--बर्हिषद; सौम्या: --सौम्य; पितर:ः --पूर्वज, पितृगण; आज्यपा:--आज्यप; स-अग्नयः--जिनका साधन अग्नि सहित है; अनग्नयः--जिनका साधन अग्निरहित हैं; तेषामू--उनकी; पली--पत्नी;दाक्षायणी--दक्ष की कन्या; स्वधा--स्वधा।

अग्निष्वात्त, बर्हिषदू, सौम्य तथा आज्यप--ये पितर हैं।

वे या तो साग्निक हैं अथवानिरग्निक।

इन समस्त पितरों की पत्नी स्वधा है, जो राजा दक्ष की पुत्री है।

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तेभ्यो दधार कन्ये द्वे बयुनां धारिणीं स्वधा ।

उभे ते ब्रह्मवादिन्यौ ज्ञानविज्ञानपारगे ॥

६४॥

तेभ्य:--उनसे; दधार--उत्पन्न; कन्ये--कन्याएँ; द्वे--दो; वयुनाम्‌ू--वयुना; धारिणीम्‌-- धारिणी; स्वधा--स्वधा; उभे--दोनोंही; ते--वे; ब्रह्म-वादिन्यौ -- ब्रह्मवादिनी अथवा निर्गुणवादिनी; ज्ञान-विज्ञान-पार-गे--दिव्य तथा वैदिक ज्ञान में पारंगत |

पितरों को प्रदत्त स्वधा ने बयुना तथा धारिणी नामक दो पुत्रियों को जन्म दिया।

वे दोनों हीब्रह्मवादिनी थीं तथा दिव्य एवं वैदिक ज्ञान में पारंगत थीं।

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भवस्य पत्नी तु सती भवं देवमनुव्रता ।

आत्मन: सहझं पुत्र न लेभे गुणशीलतः ॥

६५॥

भवस्य--भव की ( शिव की ); पत्ती--पत्नी; तु--लेकिन; सती--सती नामक; भवम्‌-- भव को; देवम्‌--देवता; अनुव्रता--सेवा में श्रद्धापूर्वक संलग्न; आत्मन:--अपने ही; सहशम्‌--समान; पुत्रमू-पुत्र; न लेभे--प्राप्त नहीं हुआ; गुण-शीलत:--अच्छे गुणों तथा चरित्र से।

सती नामक सोलहवीं कन्या भगवान्‌ शिव की पत्नी थीं, किन्तु उनके कोई सन्‍्तान उत्पन्ननहीं हुई, यद्यपि वे सदैव अपने पति की अत्यन्त श्रद्धापूर्वक सेवा में संलग्न रहने वाली थीं।

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पितर्यप्रतिरूपे स्वे भवायानागसे रुषा ।

अप्रौढेवात्मनात्मानमजहाद्योगसंयुता ॥

६६॥

पितरि--पिता के समान; अप्रतिरूपे--अनुपयुक्त; स्वे-- अपने; भवाय--शिव को; अनागसे--निर्दोष; रुषा--क्रो ध से;अप्रौढा--प्रौढ़ होने के पूर्व; एब--ही; आत्मना--अपने से; आत्मानमू--शरीर; अजहातू--त्याग दिया; योग-संयुता--योग से |

इसका कारण यह है कि सती के पिता दक्ष शिवजी के दोषरहित होने पर भी उनकी भर्त्सनाकरते रहते थे।

फलतः परिपक्व आयु के पूर्व ही सती ने अपने शरीर को योगशक्ति से त्याग दियाथा।

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