← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची
अध्याय दो: दक्ष ने भगवान शिव को श्राप दिया
4.2विदुर उबाचभवे शीलववतां श्रेष्ठे दक्षो दुहितृबत्सल:।
विद्वेषमकरोत्कस्मादनाहत्यात्मजां सतीम् ॥
१॥
विदुरः उबाच--विदुर ने कहा; भवे--शिव के प्रति; शीलवताम्--शीलवानों में; श्रेष्ठे-- सर्वोत्तम; दक्ष:--दक्ष ने; दुहितृ-बत्सल:--अपनी पुत्री के प्रति स्नेहिल; विद्वेषम्--शत्रुता; अकरोत्--प्रदर्शित किया; कस्मात्--किस हेतु; अनाहत्य--अनादरकरके; आत्मजाम्ू--अपनी पुत्री; सतीम्--सती को |
विदुर ने पूछा : जो दक्ष अपनी पुत्री के प्रति इतना स्नेहवान् था वह शीलवानों में श्रेष्ठतमभगवान् शिव के प्रति इतना ईर्ष्यालु क्यों था? उसने अपनी पुत्री सती का अनादर क्यों किया ?"
कस्तं चराचरगुरुं निर्वरं शान्तविग्रहम् ।
आत्मारामं कथं द्वेष्टि जगतो दैवतं महत् ॥
२॥
कः--कौन ( दक्ष ); तमू--उस ( शिव ) को; चर-अचर--जड़ जंगम ( सारा संसार ); गुरुम्-गुरु; निर्वरम्--शत्रुतारहित;शान्त-विग्रहम्--शान्त व्यक्तित्व वाला; आत्म-आरामम्--अपने आप में संतुष्ट रहने वाला; कथम्--कैसे; द्वेष्टि--घृणा करता है;जगतः--ब्रह्माण्ड का; दैवतम्--देवता; महत्--महान |
भगवान् शिव समग्र संसार के गुरु, शत्रुतारहित, शान्त और आत्पतुष्ट व्यक्ति हैं।
वे देवताओं में सबसे महान् हैं।
यह कैसे सम्भव हो सकता है कि ऐसे मंगलमय व्यक्ति के प्रति दक्ष वैरभावरखता ?"
एतदाख्याहि मे ब्रह्मन्जामातु: श्वशुरस्यथ च ।
विद्वेषस्तु यतः प्राणांस्तत्यजे दुस्त्यजान्सती ॥
३॥
एतत्--इस प्रकार; आख्याहि--कृपया कहो; मे--मुझसे; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; जामातु:--दामाद ( शिव ); श्वशुरस्थय--ससुर( दक्ष ) का; च--तथा; विद्वेष: --झगड़ा; तु--लेकिन; यत:--जिसके कारण; प्राणान्--अपना प्राण; तत्यजे--त्याग दिया;दुस्त्यजानू--जिसको त्यागना दुष्कर होता है; सती--सती ने
हे मैत्रेय, मनुष्य के लिए अपने प्राण त्याग पाना अत्यन्त कठिन है।
क्या आप मुझे बतासकेंगे कि ऐसे दामाद तथा श्वसुर में इतना कदटु विद्वेष क्यों हुआ जिससे महान् देवी सती कोअपने प्राण त्यागने पड़े ?"
मैत्रेय उवाचपुरा विश्वसूजां सत्रे समेता: परमर्षय: ।
तथामरगणा: सर्वे सानुगा मुनयोग्नयः ॥
४ ॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय मुनि ने कहा; पुरा--पहले ( स्वायंभुव मनु के काल में ); विश्व-सृजाम्--ब्रह्माण्ड की सृष्टि करने वालोंके; सत्रे--यज्ञ में; समेता:--एकत्र हुए; परम-ऋषय:--बड़े-बड़े ऋषि; तथा-- और भी; अमर-गणा:--देवता; सर्वे--सभी;स-अनुगाः:--अपने-अपने अनुयायियों सहित; मुनयः --विचारक, चिन्तक; अग्नय:--अग्निदेव |
मैत्रेय ने कहा : प्राचीन समय में एक बार ब्रह्माण्ड की सृष्टि करने वाले प्रमुख नायकों नेएक महान् यज्ञ सम्पन्न किया जिसमें सभी ऋषि, चिन्तक ( मुनि ), देवता तथा अग्निदेव अपने-अपने अनुयायियों सहित एकत्र हुए थे।
"
तत्र प्रविष्टमृषयो हृष्ठार्कमिव रोचिषा ।
भ्राजमानं वितिमिरं कुर्वन्तं तन्महत्सद: ॥
५॥
तत्र--वहाँ; प्रविष्टमू--प्रविष्ट हुआ; ऋषय:--ऋषिगण; हृष्टा--देखकर; अर्कम्--सूर्य; इब--सहृश्य; रोचिषा--कान्ति से;भ्राजमानम्--चमकते हुए, देदीप्यमान; वितिमिरम्--अंधकार से रहित; कुर्वन्तम्--करते हुए; तत्ू--वह; महत्--महान;सदः--सभा
जब प्रजापतियों के नायक दक्ष ने सभा में प्रवेश किया, तो सूर्य के तेज के समान चमकीलीकान्ति से युक्त उसके शरीर से सारी सभा प्रकाशित हो उठी और उसके समक्ष सभी समागतमहापुरुष तुच्छ लगने लगे।
"
उदतिष्ठन्सदस्यास्ते स्वधिष्ण्येभ्य: सहाग्नय: ।
ऋते विरिज्ञां शर्व च तद्धासाक्षिप्तचेतस: ॥
६॥
उदतिष्ठन्ू--खड़े हुए; सदस्या:--सभा के लोग; ते--वे; स्व-धिष्णयेभ्य: --अपने-अपने स्थानों पर; सह-अग्नय: --अग्नि देवोंसमेत; ऋते--के अतिरिक्त; विरिज्ञाम्ू-ब्रह्मा; शर्वमू--शिव; च--तथा; तत्--उसका ( दक्ष का ); भास--कान्ति से;आशक्षिप्त--प्रभावित; चेतस:ः--जिनके मनब
्रह्मा तथा शिवजी के अतिरिक्त, दक्ष की शारीरिक कान्ति ( तेज ) से प्रभावित होकर उससभा के सभी सदस्य तथा सभी अग्निदेव, उसके सम्मान में अपने आसनों से उठकर खड़े होगये।
"
सदसस्पतिभिर्दक्षो भगवान्साधु सत्कृतः ।
अजं लोकगुरुं नत्वा निषसाद तदाज्ञया ॥
७॥
सदसः--सभा के; पतिभि:--नायकों द्वारा; दक्ष:-- दक्ष; भगवान्--समस्त ऐ श्वर्यों के स्वामी; साधु--ढंग से; सत्-कृतः--सम्मानित हुआ; अजम्--अजन्मा ( ब्रह्मा ) को; लोक-गुरुमू--जगदगुरु; नत्वा-- प्रणाम करके; निषसाद--बैठ गया; तत्ू-आज्ञया--उनकी ( ब्रह्म की ) आज्ञा से
उस महती सभा के अध्यक्ष ब्रह्मा ने दक्ष का समुचित रीति से स्वागत किया।
ब्रह्माजी कोप्रणाम करने के पश्चात् उनकी आज्ञा पाकर दक्ष ने अपना आसन ग्रहण किया।
"
प्राइनिषण्णं मृड्ड इृष्टा नामृष्यत्तदनाहत: ।
उवबाच वाम॑ चश्नुर्भ्यामभिवीक्ष्य दहन्निव ॥
८ ॥
प्राकु--पहले से; निषण्णम्--बैठा; मृडम्ू--शिवजी को; हृष्टा--देखकर; न अमृष्यत्--सहन न कर सका; तत्--उनके( शिव ) द्वारा; अनाहतः--आदर न किया जाकर; उवाच--कहा; वामम्-- बेईमान; चश्चुर्भ्याम्--दोनों नेत्रों से; अभिवीक्ष्य--देखते हुए; दहन्-- ज्वलित; इब--मानो |
किन्तु आसन ग्रहण करने के पूर्व शिवजी को बैठा हुआ और उन्हें सम्मान न प्रदर्शित करतेहुए देखकर दक्ष ने इसे अपना अपमान समझा।
उस समय दक्ष अत्यन्त क्रुद्ध हुआ।
उसकी आँखेंतप रही थीं।
उसने शिव के विरुद्ध अत्यन्त कटु शब्द बोलना प्रारम्भ किया।
"
श्रूयतां ब्रह्मर्षयो मे सहदेवा: सहाग्नय: ।
साधूनां ब्रुवतो वृत्तं नाज्ञानान्न च मत्सरात्ू ॥
९॥
श्रूयताम्--सुनो; ब्रह्म-ऋषय: -हे ब्रह्मर्षियों; मे--मुझको; सह-देवा: --हे देवताओ; सह-अग्नय: --हे अग्नि देवो; साधूनाम्--सज्जनो के; ब्रुवतः--बोलते हुए; वृत्तम्ू--व्यवहार, आचार; न--नहीं; अज्ञानातू--अज्ञान से; न च--तथा नहीं; मत्सरात्-द्वेषसे
हे समस्त उपस्थित ऋषियो, ब्राह्मणो तथा अग्निदेवो, ध्यानपूर्वक सुनो क्योंकि मैं शिष्टाचारके विषय में बोल रहा हूँ।
मैं किसी अज्ञानता या ईर्ष्या से नहीं कह रहा।
"
अयं तु लोकपालानां यशोघ्नो निरपत्रप: ।
सद्धिराचरितः पन्था येन स्तब्धेन दूषित: ॥
१०॥
अयमू--यह ( शिव ); तु--लेकिन; लोक-पालानाम्--ब्रह्मण्ड के पालक; यशः-घ्न:--यश को नष्ट करने वाला; निरपत्रपः --निर्लज; सद्धिः--सदाचारी पुरुषों द्वारा; आचरित:--पालन किया गया; पन्था:--पथ; येन--जिसके ( शिव ) द्वारा; स्तब्धेन--आचरणविहीन द्वारा; दूषित: --लाडिछत |
शिव ने लोकपालकों के नाम तथा यश को धूल में मिला दिया है और सदाचार के पथ कोदूषित किया है।
निर्लज्ज होने के कारण उसे इसका पता नहीं है कि किस प्रकार से आचरणकरना चाहिए।
"
एष मे शिष्यतां प्राप्तो यन्मे दुहितुरग्रहीत् ।
पाणिं विप्राग्निमुखतः सावित्र्या इव साधुवत् ॥
११॥
एषः--यह ( शिव ); मे--मेरी; शिष्यताम्-- अधीनता; प्राप्त:--स्वीकार करके ; यत्-- क्योंकि; मे दुहितु:--मेरी पुत्री का;अग्रहीतू--ग्रहण किया; पाणिम्--हाथ; विप्र-अग्नि--ब्राह्मणों तथा अग्नि के; मुखतः--समक्ष; सावित्र्या: --गायत्री; इब--सहश; साधुवत्--साथु ( ईमानदार ) पुरुष के समान।
इसने अग्नि तथा ब्राह्मणों के समक्ष मेरी पुत्री का पाणिग्रहण करके पहले ही मेरी अधीनतास्वीकार कर ली है।
इसने गायत्री के समान मेरी पुत्री के साथ विवाह किया है और अपने कोसत्यपुरुष बताया था।
"
गृहीत्वा मृगशावाक्ष्या: पाणिं मर्कटलोचन: ।
प्रत्युत्थानाभिवादाहँ वाचाप्यकृत नोचितम् ॥
१२॥
गृहीत्वा--ग्रहण करके; मृग-शाव--मृग के बच्चे के तुल्य; अक्ष्या:--नेत्र वाली; पाणिमू--हाथ; मर्कट--बन्दर के;लोचन:--नेत्रों वाला; प्रत्युत्थान--अपने आसन से उठने का; अभिवाद--सम्मान, अभिवादन; अहैँ --मुझ जैसे पात्र को;वाचा--मृदु वाणी से; अपि-- भी; अकृत न--नहीं किया; उचितम्--सम्मान |
इसके नेत्र बन्दर के समान हैं तो भी इसने मृगी जैसी नेत्रों वाली मेरी कन्या के साथ विवाहकिया है।
तो भी इसने उठकर न तो मेरा स्वागत किया और न मीठी वाणी से मेरा सत्कार करनाउचित समझा।
"
लुप्तक्रियायाशुचये मानिने भिन्नसेतवे ।
अनिच्छन्नप्यदां बालां शूद्रायेबोशती गिरम् ॥
१३॥
लुप्त-क्रियाय--शिष्टाचार का पालन न करते हुए; अशुचये--अपवित्र; मानिने--घमंडी; भिन्न-सेतवे--सभी मर्यादाओं को भंगकरके; अनिच्छन्--न चाहते हुए; अपि--यद्यपि; अदाम्-- प्रदान किया; बालाम्--अपनी पुत्री; शूद्राय--शूद्र को; इब--सहश; उशतीम् गिरमू--वेदों का सन्देश |
शिष्टाचार के सभी नियमों को भंग करने वाले इस व्यक्ति को अपनी कन्या प्रदान करने कीमेरी तनिक भी इच्छा नहीं थी।
वांछित विधि-विधानों का पालन न करने के कारण यह अपवित्रहै, किन्तु इसे अपनी कन्या प्रदान करने के लिए मैं उसी प्रकार बाध्य हो गया जिस प्रकार किसीशूद्र को वेदों का पाठ पढ़ाना पड़े।
"
प्रेतावासेषु घोरेषु प्रेते भूतगणैर्वृतःअटत्युन्मत्तवन्नग्नो व्युप्तकेशो हसन्रुदन् ।
चिताभस्मकृतस्नानः प्रेतस्त्रडन्नस्थिभूषण: ॥
१४॥
शिवापदेशो ह्शिवो मत्तो मत्तजनप्रियः ।
पतिः प्रमथनाथानां तमोमात्रात्मकात्मनाम् ॥
१५॥
प्रेत-आवासेषु--श्मशान में; घोरेषु-- भयंकर; प्रेतेः--प्रेतों द्वारा; भूत-गणै: -- भूतों द्वारा; वृतः:--घिरा हुआ, संग में; अटति--घूमता है; उन्मत्त-वत्--पागल के समान; नग्न:--नंगा; व्युप्त-केश:--बिखरे बालों वाला; हसन्--हँसता हुआ; रुदन्--चिल्लाता है; चिता--चिता की; भस्म--राख से; कृत-स्नान:--नहाकर ( लगाकर ); प्रेत--शवों के मुंडों की; सत्रकू--माला;नृ-अस्थि- भूषण:--मृत पुरुषों की अस्थियों को आभूषण बनाये हुए; शिव-अपदेश:--जो नाम का शिव ( शुभ ) है; हि--क्योंकि; अशिव:--अमंगल; मत्त:--विक्षिप्त; मत्त-जन-प्रिय: --विक्षिप्तों को प्रिय लगने वाला; पति:--नायक, स्वामी;प्रमथ-नाथानाम्--प्रमथों के स्वामियों का; तमः-मात्र-आत्मक-आत्मनाम्--तमोगुणी इन सबों का
वह श्मशान जैसे गंदे स्थानों में रहता है और उसके साथ भूत तथा प्रेत रहते हैं।
वह पागलोंके समान नंगा रहता है, कभी हँसता है, तो कभी चिल्लाता है और सारे शरीर में एमशान कीराख लपेटे रहता है।
वह ठीक से नहाता भी नहीं।
वह खोपड़ियों तथा अस्थियों की माला सेअपने शरीर को विभूषित करता है।
अतः वह केवल नाम से ही शिव है, अन्यथा वह अत्यन्तप्रमत्त तथा अशुभ प्राणी है।
वह केवल तामसी प्रमत्त लोगों का प्रिय है और उन्हीं का अगुवा है।
"
तस्मा उन्मादनाथाय नष्टशौचाय दुर्दे ।
दत्ता बत मया साध्वी चोदिते परमेष्ठलिना ॥
१६॥
तस्मै--उस; उन्माद-नाथाय-प्रेतों के स्वामी को; नष्टटशौचाय--समस्त स्वच्छता से रहित व्यक्ति को; दुईदे--विकारों से पूर्णहृदय; दत्ता-- प्रदान की गयी थी; बत--अहो; मया--मेरे द्वारा; साध्वी--सती; चोदिते--विनती किये जाने पर; परमेष्ठिना--परम गुरु ( ब्रह्मा ) द्वारा
ब्रह्माजी के अनुरोध पर मैंने अपनी साध्वी पुत्री उसे प्रदान की थी, यद्यपि वह समस्त प्रकारकी स्वच्छता से रहित है और उसका हृदय विकारों से पूरित है।
"
मैत्रेय उवाचविनिन्धैवं स गिरिशमप्रतीपमवस्थितम् ।
दक्षोथाप उपस्पृश्य क्रुद्धः शप्तुं प्रचक्रमे ॥
१७॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; विनिन्द्य--गाली देकर; एवम्--इस प्रकार; सः--वह ( दक्ष ); गिरिशम्--शिव; अप्रतीपम्--शत्रुतारहित; अवस्थितम्--स्थित रहकर; दक्ष:--दक्ष; अथ--अब; अप:--जल; उपस्पृश्य--हाथ तथा मुँह धोकर; क्रुद्धः--क्रुद्ध, नाराज; शप्तुम्-शाप देना; प्रचक्रमे--प्रारम्भ किया
मैत्रेय मुनि ने आगे कहा : इस प्रकार शिव को अपने विपक्ष में स्थित देखकर दक्ष ने जल सेआचमन किया और निम्नलिखित शब्दों से शाप देना प्रारम्भ किया।
"
अयं तु देवयजन इन्द्रोपेन्द्रादिभिर्भव: ।
सह भागं न लभतां देवैर्देवगणाधम: ॥
१८ ॥
अयमू--यह; तु--लेकिन; देव-यजने--देवताओं के यज्ञ में; इन्द्र-उपेन्द्र-आदिभि: --इन्द्र, उपेन्द्र तथा अन्यों सहित; भव:--शिव; सह--के साथ; भागम्--एक अंश; न--नहीं; लभताम्--प्राप्त करना चाहिए; देवै:--देवताओं से; देव-गण-अधम: --
समस्त देवताओं में सबसे निम्नदेवता तो यज्ञ की आहुति में भागीदार हो सकते हैं, किन्तु समस्त देवों में अधम शिव कोयज्ञ-भाग नहीं मिलना चाहिए।
"
निषिध्यमान: स सदस्यमुख्यै-दक्षो गिरित्राय विसृज्य शापम् ।
तस्माद्विनिष्क्रम्य विवृद्धमन्यु-ज॑गाम कौरव्य निजं निकेतनम् ॥
१९॥
निषिध्यमान:--मना किये जाने पर; सः--वह ( दक्ष ); सदस्य-मुख्यैः--यज्ञ के सदस्यों द्वारा; दक्ष:--दक्ष; गिरित्राय--शिवको; विसृज्य--त्याग कर; शापम्--शाप; तस्मात्--उस स्थान से; विनिष्क्रम्य--बाहर जाकर; विवृद्ध-मन्यु: --अत्यन्त क्रुद्धहोकर; जगाम--चला गया; कौरव्य--हे विदुर; निजमू--अपने; निकेतनम्--घर |
मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, उस यज्ञ के सभासदों द्वारा मना किये जाने पर भी दक्ष क्रोधमें आकर शिवजी को शाप देता रहा और फिर सभा त्याग कर अपने घर चला गया।
"
विज्ञाय शापं गिरिशानुगाग्रणी-न॑न्दी श्वरो रोषकषायदूषित: ।
दक्षाय शापं विससर्ज दारुणंये चान्वमोदंस्तदवाच्यतां द्विजा: ॥
२०॥
विज्ञाय--जानकर; शापम्--शाप; गिरिश--शिव का; अनुग-अग्रणी:-- प्रमुख पार्षदों में से एक; नन्दीश्वर:--नन्दी ध्वर; रोष--क्रोध; कषाय--लाल; दूषित:--अंध; दक्षाय--दक्ष को; शापम्--शाप; विससर्ज--दिया; दारुणम्--कठोर; ये--जिल्होंने;च--तथा; अन्वमोदन्--सहन किया; तत्-अवाच्यताम्--शिव को शाप देना; द्विजा:--ब्राह्मणजन
यह जानकर कि भगवान् शिव को शाप दिया गया है, शिव का प्रमुख पार्षद नन्दीश्वरअत्यधिक क्रुद्ध हुआ।
उसकी आँखें लाल हो गईं और उसने दक्ष तथा वहाँ उपस्थित सभीब्राह्मणों को, जिन्होंने दक्ष द्वारा कटु बचनों में शिवजी को शापित किए जाने को सहन कियाथा, शाप देने की तैयारी की।
"
य एतमन््मर्त्यमुद्दिश्य भगवत्यप्रतिद्रुहि ।
ब्रह्मत्यज्ञः पृथग्दृष्टिस्तत्तततो विमुखो भवेत् ॥
२१॥
यः--जो ( दक्ष ); एतत् मर्त्यमू--इस नश्वर शरीर के; उद्दिश्य-- प्रसंग में; भगवति--शिव को; अप्रतिद्गुहि--जो ईर्ष्यालु नहीं हैं;ब्ुह्मति--द्वेष करता है; अज्ञ:--कम बुद्ध्रिमान व्यक्ति; पृथक्-दृष्टि:--द्वैत भाव; तत्त्वतः--दिव्य ज्ञान से; विमुख: --रहित;भवेत्--हो जाए।
जिस किसी ने दक्ष को सर्वश्रेष्ठ पुरुष मान कर ईर्ष्यावश भगवान् शिव का निरादर किया है,वह अल्प बुद्धिवाला है और अपने द्वैतभाव के कारण वह दिव्यज्ञान से विहीन हो जाएगा।
"
गृहेषु कूटधर्मेषु सक्तो ग्राम्यसुखेच्छया ।
कर्मतन्त्रं वितनुते वेदबादविपन्नधी: ॥
२२॥
गृहेषु--गृहस्थ जीवन में; कूट-धर्मेषु--कपट धार्मिकता में; सक्त:--आसक्त होने से; ग्राम्य-सुख-इच्छया-- भौतिक सुख कीकामना से; कर्म-तन्त्रमू--सकाम कर्म; वितनुते--करता है; वेद-वाद--वेद की व्याख्या से; विपन्न-धी:--नष्टबुद्धि |
जिस कपटपूर्ण धार्मिक गृहस्थ-जीवन में कोई मनुष्य भौतिक सुख के प्रति आसक्त रहता हैऔर साथ ही वेदों की व्यर्थ व्याख्या के प्रति आकृष्ट होता है, इसमें उसकी सारी बुद्धि हर लीजाती है और वह पूर्ण रूप से सकाम कर्म में लिप्त हो जाता है।
"
बुद्धया पराभिध्यायिन्या विस्मृतात्मगतिः पशु: ।
स्त्रीकामः सोस्त्वतितरां दक्षो बस्तमुखोचिरात् ॥
२३॥
बुद्धया--बुद्धि से; पर-अभिध्यायिन्या--शरीर को आत्म समझ कर; विस्मृत-आत्म-गति: --विष्णु ज्ञान को भूलकर; पशु: --पशु; स्त्री-काम:--विषयी जीवन में लिप्त रहकर; सः--वह; अस्तु--हो; अतितराम्ू--अतिशय; दक्ष: --दक्ष; बस्त-मुख: --बकरे का मुँह; अचिरातू-शीघ्र ही |
दक्ष ने देह को ही सब कुछ समझ रखा है।
इसने विष्णुपाद अथवा विष्णु-गति को भुलादिया है और केवल स्त्री-संभोग में ही लिप्त रहता है, अतः इसे शीघ्र ही बकरे का मुख प्राप्तहोगा।
"
विद्याबुद्धिरविद्यायां कर्ममय्यामसौ जड: ।
संसरन्त्विह ये चामुमनु शर्वावमानिनम् ॥
२४॥
विद्या-बुर्द्ध:--भौतिक शिक्षा तथा बुद्धि; अविद्यायाम्--अज्ञान में; कर्म-मय्याम्--सकाम कर्म से उत्पन्न; असौ--यह ( दक्ष );जडः--मन्द; संसरन्तु--बारम्बार जन्म धारण करे; इह--इस जगत में; ये--जो; च--तथा; अमुम्ू--दक्ष का; अनु--अनुसरणकरने वाले; शर्ब--शिव; अवमानिनम्-- अनादर करने से |
जो लोग भौतिक विद्या तथा युक्ति के अनुशीलन से पदार्थ की भाँति जड़ बन चुके हैं, वेअज्ञानवश सकाम कर्मों में लगे हुए हैं।
ऐसे मनुष्यों ने जानबूझकर भगवान् शिव का अनादरकिया है।
ऐसे लोग जन्म-मरण के चक्र में पड़े रहें।
"
गिरः श्रुताया: पुष्पिण्या मधुगन्धेन भूरिणा ।
मथ्ना चोन्मधितात्मान: सम्मुहान्तु हरद्विष: ॥
२५॥
गिरः--शब्द; श्रुताया:--वेदों के; पुष्पिण्या:--पुष्पों से युक्त; मधु-गन्धेन--शहद की गन्ध से; भूरिणा--अत्यधिक; मथ्ना--मोहने वाली; च--तथा; उन्मधित-आत्मान:--जिनके मन जड़ बन चुके हैं; सम्मुहान्तु--वे आसक्त रहें; हर-द्विष:--शिव सेईर्ष्या करने वाले, शिवद्रोही |
मोहक वैदिक प्रतिज्ञाओं की पुष्पमयी ( अलंकृत ) भाषा से आकृष्ट होकर जो जड़ बन चुकेहैं और शिव-द्रोही हैं, वे सदैव सकाम कर्मों में निरत रहें।
"
सर्वभक्षा द्विजा वृत्त्ये धृतविद्यातपोब्रता: ।
वित्तदेहेन्द्रियारामा याचका विचरन्त्विह ॥
२६॥
सर्व-भक्षाः--सब कुछ खाने वाले; द्विजा:--ब्राह्मण लोग; वृत्त्य--शरीर पालने के लिए; ध्ृत-विद्या--शिक्षा का कार्य ग्रहणकरके; तपः--तपस्या; ब्रता:--तथा ब्रत; वित्त-- धन; देह--शरीर; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; आरामा: --तुष्टि; याचका:--भिक्षुकों केसमान; विचरन्तु--इधर-उधर घूमें; इह--यहाँ
ये ब्राह्मण केवल अपने शरीर-पालन के लिए विद्या, तप तथा ब्रतादि का आश्रय लें।
इन्हेंभक्ष्याभक्ष्य का विवेक न रह जाए।
ये द्वार-द्वार भिक्षा माँगकर अपने शरीर की तुष्टि के लिए धनकी प्राप्ति करें।
"
तस्यैवं बदतः शाप श्रुत्वा द्विजकुलाय वै ।
भृगुः प्रत्यसृजच्छापं ब्रह्मदण्डं दुरत्ययम् ॥
२७॥
तस्य--उसका ( नन्दीश्वर का ); एवम्ू--इस प्रकार; बदत:--शब्द; शापम्--शाप; श्रुत्वा--सुनकर; द्विज-कुलाय--ब्राह्मणोंको; बै--निस्सन्देह; भृगु:--भूगु ने; प्रत्यसूजत्--दिया; शापम्--शाप; ब्रह्म-दण्डम्--ब्राह्मण द्वारा दिया गया दण्ड;दुरत्ययम्--दुर्लघ्य, दुस्तर।
इस प्रकार जब नन्दीश्वर ने समस्त कुलीन ब्राह्मणों को शाप दे दिया तो प्रतिक्रियास्वरूपभूगमुनि ने शिव के अनुयायियों की भर्त्सना की और उन्हें घोर ब्रह्म-शाप दे दिया।
"
भवद्रतधरा ये च ये च तान्समनुव्रता: ।
पाषण्डिनस्ते भवन्तु सच्छास्त्रपरिपन्थिन: ॥
२८॥
भव-ब्रत-धरा:--शिव के अनुयायी; ये--जो; च--तथा; ये--जो; च--तथा; तान्--ऐसे नियम; समनुव्रता:--पालन करतेहुए; पाषण्डिन:--नास्तिक; ते--वे; भवन्तु--हों; सत्-शास्त्र-परिपन्थिन:--दिव्य शास्त्रीय आदेशों से विपथ ।
जो शिव को प्रसन्न करने का ब्रत धारण करता है अथवा जो ऐसे नियमों का पालन करताहै, वह निश्चित रूप से नास्तिक होगा और दिव्य शास्त्रों के विरुद्ध आचरण करने वाला बनेगा।
"
नष्टशौचा मूढधियो जटाभस्मास्थिधारिण: ।
विशन्तु शिवदीक्षायां यत्र दैवं सुरासवम् ॥
२९॥
नष्ट-शौचा:--शुचिता ( पवित्रता ) का परित्याग करके; मूढ-धिय:--मूर्ख; जटा-भस्म-अस्थि-धारिण:--जटा, राख तथाहड्डियाँ धारण किये; विशन्तु--प्रवेश करें; शिव-दीक्षायाम्--शिव पूजा की दीक्षा में; यत्र--जहाँ; दैवम्--ई श्वरी हैं; सुर-आसवम्--मदिरा तथा आसव
जो शिव की पूजा का ब्रत लेते हैं, वे इतने मूर्ख होते हैं कि वे उनका अनुकरण करके अपनेशरीर पर लम्बी जटाएँ धारण करते हैं और शिव की उपासना की दीक्षा ले लेने के बाद वेमदिरा, मांस तथा अन्य ऐसी ही वस्तुएँ खाना-पीना पसंद करते हैं।
"
ब्रह्म च ब्राह्मणां श्षैव यद्यूयं परिनिन्दथ ।
सेतुं विधारणं पुंसामत: पाषण्डमाश्रिता: ॥
३०॥
ब्रह्म--वेद; च--तथा; ब्राह्मणान्ू--ब्राह्मणों को; च--तथा; एव--निश्चय ही; यत्-- क्योंकि; यूयम्--तुम सब; परिनिन्दथ--निन्दा करते हो; सेतुम्--वैदिक सिद्धान्त; विधारणम्-- धारण करते हुए; पुंसामू--मनुष्य जाति का; अत:--इसलिए;पाषण्डमू--नास्तिकता; आश्रिता:--शरण ले रखी है
भूगु मुनि ने आगे कहा : चूँकि तुम वैदिक नियमों के अनुयायी ब्राह्मणों तथा वेदों की निन््दाकरते हो इससे ज्ञात होता है कि तुमने नास्तिकता की नीति अपना रखी है।
"
एष एव हि लोकानां शिव: पन्था: सनातन: ।
यं पूर्वे चानुसन्तस्थुर्यत्प्रमाणं जनार्दन: ॥
३१॥
एषः--वेद; एव--निश्चय ही; हि-- क्योंकि; लोकानाम्--समस्त लोगों का; शिव:--कल्याणकारी; पन्था: --पथ; सनातन: --शाश्वत; यम्--जो ( वैदिक पथ ); पूर्वे-- भूतकाल में; च--तथा; अनुसन्तस्थु:--हढ़तापूर्वक पालित होता था; यत्--जिसमें;प्रमाणम्--साक्ष्य; जनार्दन: --जनार्दन |
वेद मानवीय सभ्यता के कल्याण की प्रगति हेतु शाश्वत विधान प्रदान करने वाले हैं जिसकाप्रीचीन काल में हढ़ता से पालन होता रहा है।
इसका सशक्त प्रमाण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्स्वयं हैं, जो जनार्दन अर्थात् समस्त जीवात्माओं के शुभेच्छु कहलाते हैं।
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तद्गह्म परमं शुद्धं सतां वर्त्म सनातनम् ।
विगर्ह्य यात पाषण्डं दैवं वो यत्र भूतराटू ॥
३२॥
ततू--वह; ब्रह्म--वेद; परमम्--परम; शुद्धम्-शुद्ध; सताम्--साथु पुरुषों का; वर्त्म--पथ; सनातनम्--शाश्वत; विग्हा--निन््दा करके; यात--जाओ; पाषण्डम्--नास्तिकता को; दैवम्--देव; वः--तुम सबका; यत्र--जहाँ; भूत-राट्-- भूतों केस्वामी ।
ऐसे वेदों के नियमों की निन्दा करके, जो सत्पुरुषों के शुद्ध एवं परम पथ-रूप हैं, अरेभूतपति शिव के अनुयायियों तुम, निस्सन्देह नास्तिकता के स्तर तक जाओगे।
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मैत्रेय उवाचतस्यैवं बदत: शापं भूगो: स भगवान्भव: ।
निश्चक्राम ततः किञ्ञिद्विमना इव सानुग: ॥
३३॥
मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; तस्य--उसका; एवम्--इस प्रकार; वदतः--कहते हुए; शापम्--शाप; भूगो:-- भूगु का; सः --वह; भगवानू--सर्व ऐश्वर्यों का स्वामी; भव:--शिव; निश्चक्राम--चला गया; ततः--वहाँ से; किल्ञित्--कुछ-कुछ;विमना:--खिन्न; इब--सहश; स-अनुग: -- अपने शिष्यों सहित ।
मैत्रेय मुनि ने कहा : जब शिवजी के अनुयायियों तथा दक्ष एवं भूगु के पक्षधरों के बीचशाप-प्रतिशाप चल रहा था, तो शिवजी अत्यन्त खिन्न हो उठे और बिना कुछ कहे अपने शिष्योंसहित यज्ञस्थल छोड़कर चले गये।
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चले जाँए।
तेउपि विश्वसृजः सत्र॑ सहस्त्रपरिवत्सरान् ।
संविधाय महेष्वास यत्रेज्य ऋषभो हरि: ॥
३४॥
ते--वे; अपि-- भी; विश्व-सृज:--ब्रह्मण्ड के जनक; सत्रम्ू--यज्ञ; सहस्त्र--एक हजार; परिवत्सरान्--वर्ष; संविधाय--सम्पन्नकरते हुए; महेष्वास--हे विदुर; यत्र--जिसमें; इज्य: --पूजनीय, उपास्य; ऋषभ:--समस्त देवताओं के प्रमुख देव; हरिः--हरि।
मैत्रेय मुनि ने आगे कहा : हे विदुर, इस प्रकार विश्व के सभी जनकों ( प्रजापतियों ) ने एकहजार वर्ष तक यज्ञ किया क्योंकि भगवान् हरि की पूजा की सर्वोत्तम विधि यज्ञ ही है।
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आप्लुत्यावभूथ॑ यत्र गड़ा यमुनयान्विता ।
विरजेनात्मना सर्वे स्व स्व॑ं धाम ययुस्तत:ः ॥
३५॥
आप्लुत्य--स्नान करके; अवभूथम्--यज्ञ सम्पन्न करने के पश्चात् किया गया स्नान; यत्र--जहाँ; गड़ा--गंगा नदी; यमुनया--यमुना नदी से; अन्विता--मिली हुई; विरजेन--बिना किसी छूत से; आत्मना--मन से; सर्वे--सभी; स्वम् स्वम्-- अपने-अपने;धाम--निवास स्थान; ययु:--चले गये; तत:--वहाँ से |
हे धनुषबाणधारी विदुर, सभी यज्ञकर्ता देवताओं ने यज्ञ समाप्ति के पश्चात् गंगा तथा यमुनासंगम में स्नान किया।
ऐसा स्नान अवभूथ स्नान कहलाता है।
इस प्रकार से मन से शुद्ध होकर वेअपने-अपने धामों को चले गये।
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