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अध्याय पंद्रह: राजा पृथु का प्राकट्य और राज्याभिषेक

4.15मैत्रेय उवाचअथ तस्य पुनर्विप्रैरपुत्रस्य महीपते: ।

बाहुभ्यांमथ्यमानाभ्यां मिथुनं समपद्यत ॥

१॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने आगे कहा; अथ--इस प्रकार; तस्थय--उसका; पुनः--फिर; विप्रैः--ब्राह्मणों द्वारा; अपुत्रस्थ--पुत्रहीन;महीपते:--राजा की; बाहुभ्याम्‌-बाँहों से; मधथ्यमानाभ्याम्‌--मंथन करने से; मिथुनम्‌--युग्म; समपद्यत--उत्पन्न हुआ |

मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा : हे विदुर, इस प्रकार ब्राह्मण तथा ऋषियों ने राजा बेन के मृतशरीर की दोनों बाहुओं का भी मंथन किया।

फलस्वरूप उसकी बाँहों से एक स्त्री तथा एकपुरुष का जोड़ा उत्पन्न हुआ।

"

तदूष्ठा मिथुनं जातमृषयो ब्रह्मवादिन: ।

ऊचुः परमसन्तुष्टा विदित्वा भगवत्कलाम्‌ ॥

२॥

तत्‌--उस; दृष्ला--देखकर; मिथुनम्‌--युग्म को; जातम्‌--उत्पन्न; ऋषय:--ऋषियों ने; ब्रह्म-वादिन:--वैदिक ज्ञान में अत्यन्तपारंगत; ऊचु:--कहा; परम--अत्यधिक; सन्तुष्टाः--प्रसन्न; विदित्वा--जानकर; भगवत्‌-- भगवान्‌ का; कलाम्‌--विस्तार।

ऋषिगण बैदिक ज्ञान में पारंगत थे।

जब उन्होंने वेन की बाहुओं से एक स्त्री तथा पुरुष कोउत्पन्न देखा, तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए क्योंकि वे जान गये कि यह युगल ( दम्पति ) भगवान्‌विष्णु के पूर्णाश का विस्तार है।

"

ऋषय ऊचुःएष विष्णोर्भगवत: कला भुवनपालिनी ।

इयं च लक्ष्म्या: सम्भूतिः पुरुषस्थानपायिनी ॥

३॥

ऋषय: ऊचु:--ऋषियों ने कहा; एष:--यह नर; विष्णो:-- भगवान्‌ विष्णु का; भगवतः -- भगवान्‌ का; कला--विस्तार;भुवन-पालिनी--जगत का पालन करनेवाली; इयम्‌--यह स्त्री; च-- भी; लक्ष््या:--लक्ष्मी की; सम्भूतिः --विस्तार;पुरुषस्थ-- भगवान्‌ की; अनपायिनी -- अभिन्न ।

ऋषियों ने कहा : यह पुरुष तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का पालन करनेवाले भगवान्‌ विष्णु कीशक्ति का अंश है और यह स्त्री भगवान्‌ विष्णु से कभी अलग न होनेवाली एवं सम्पत्ति की देवी,लक्ष्मी का अंश है।

"

अयं तु प्रथमो राज्ञां पुमान्प्रथयिता यश: ।

पृथुर्नाम महाराजो भविष्यति पृथु श्रवा: ॥

४॥

अयमू--यह; तु--तब; प्रथम: --प्रथम; राज्ञामू--राजाओं का; पुमानू--नर; प्रथयिता--विस्तार करेगा; यश:--ख्याति;पृथु:--महाराज पृथु; नाम--नामक; महा-राज:--महान्‌ राजा; भविष्यति--होगा; पृथु-श्रवा:--व्यापक ख्याति का।

इन दोनों में से, जो नर है, वह अपने यश को विश्व भर में फैला सकेगा।

उसका नाम पृथुहोगा।

निस्सन्देह, वह राजाओं में सबसे पहला राजा होगा।

"

इयं च सुदती देवी गुणभूषणभूषणा ।

अर्चिर्नाम वरारोहा पृथुमेवावरुन्धती ॥

५॥

इयम्‌--यह स्त्री; च--तथा; सु-दती--सुन्दर दाँतों वाली; देवी--सम्पत्ति की देवी; गुण--उत्तम गुणों के कारण; भूषण --आभूषण; भूषणा--विभूषित करनेवाली; अर्चि: --अर्चि; नाम--नामक; वर-आरोहा--अत्यन्त सुन्दर; पृथुम्‌--राजा पृथु को;एव--निश्चय ही; अवरुन्धती--अत्यन्त आसक्त रहनेवाली।

सुन्दर दाँतों वाली स्त्री उत्तम गुणों से युक्त होने के कारण पहने गये आभूषणों को भीविभूषित करनेवाली होगी ।

उसका नाम अर्चि होगा और भविष्य में वह राजा पृथु को अपना पतिस्वीकार करेगी।

"

एष साक्षाद्धरेरंशो जातो लोकरिरक्षया ।

इयं च तत्परा हि श्रीरनुजज्ञेडनपायिनी ॥

६॥

एषः--यह नर; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; हरेः-- भगवान्‌ का; अंश:--आंशिक प्रतिनिधि; जात:--उत्पन्न; लोक--सारा विश्व;रिरक्षया--रक्षा करने की इच्छा से; इयम्‌--यह स्त्री; च-- भी; तत्‌-परा--उससे अत्यधिक आसक्त; हि--निश्चय ही; श्री: --सम्पत्ति की देवी ने; अनुजज्ञे--जन्म लिया; अनपायिनी--अभिन्न |

राजा पृथु के रूप में, भगवान्‌ अपनी शक्ति के एक अंश से संसार के लोगों की रक्षा केलिए प्रकट हुए हैं।

सम्पत्ति की देवी भगवान्‌ की निरन्तर सहचरी हैं, अतः वे अंश रूप में राजापृथु की रानी बनने के लिए अर्चि रूप में अवतरित हुई हैं।

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मैत्रेय उवाचप्रशंसन्ति सम त॑ विप्रा गन्धर्वप्रवरा जगुः ।

मुमुचु: सुमनोधारा: सिद्धा नृत्यन्ति स्वःस्त्रियः ॥

७॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; प्रशंसन्ति स्म--प्रशंसा करते थे; तम्‌--उसका ( पृथु ); विप्रा:--समस्त ब्राह्मण; गन्धर्व-प्रवरा:--गन्धर्वो में श्रेष्ठ; जगु:--जप किया; मुमुचु:--छोड़ी, फेंकी; सुमन:-धारा: --पुष्पों की वर्षा; सिद्धा:--सिद्धलोक केपुरुष; नृत्यन्ति--नाच रही थीं; स्व:--स्वर्गलोक की; स्त्रियः--स्त्रियाँ ( अप्सराएँ )॥

महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर जी, उस समय समस्त ब्राह्मणों ने राजा पृथु की प्रशंसाऔर स्तुति की और गन्धर्वलोक के सर्वश्रेष्ठ गायकों ने उनकी महिमा का गायन किया।

सिद्धलोक के वासियों ने उन पर पुष्पवर्षा की और स्वर्ग की सुन्दरियाँ ( अप्सराएँ ) भाव विभोरहोकर नाचने लगीं।

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शद्डुतूर्यमृदड्ाद्या नेदुर्दुन्दुभयो दिवि ।

तत्र सर्व उपाजम्मुर्देवर्षिपितृणां गणा: ॥

८॥

शब्डभु--शंख; तूर्य--तुरही; मृदड़--- ढोल; आद्या:--इत्यादि; नेदु:--बजने लगे; दुन्दुभय:--दुन्दुभियाँ; दिवि--अन्तरिक्ष में;तत्र--वहाँ; सर्वे--सभी; उपाजग्मु:--आये; देव-ऋषि--देवता तथा मुनि; पितृणाम्‌ू--पितरों के; गणा:--समूह।

अन्तरिक्ष में शंख, दुंदुभि, तुरही तथा मृदड़ बजने लगे।

बड़े-बड़े मुनि, पितरगण तथा स्वर्गके पुरुष विभिन्न लोकों से पृथ्वी पर आ गये।

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ब्रह्मा जगदगुरुदेवै: सहासृत्य सुरेश्वर: ।

वैन्यस्य दक्षिणे हस्ते दृष्ठा चिह्न गदाभृतः ॥

९॥

पादयोररविन्दं च तं वै मेने हरे: कलाम्‌ ।

अस्याप्रतिहतं चक्रमंश: स परमेष्ठिन; ॥

१०॥

ब्रह्मा--ब्रह्माजी; जगत्‌-गुरु:--ब्रह्माण्ड के स्वामी; देवैः--देवताओं द्वारा; सह--साथ में; आसृत्य--आकर; सुर-ईश्वरै: --समस्त स्वर्गों के प्रमुखों सहित; वैन्यस्य--वेन के पुत्र महाराज पृथु के; दक्षिणे--दाहिने; हस्ते--हाथ में; दृष्टा--देखकर;चिहमम्‌ू--चिह्न; गदा-भृतः--गदाधारी भगवान्‌ विष्णु के; पादयो:--दोनों पाँवों पर; अरविन्दमू--कमल; च-- भी; तम्‌--उसको; बै--निश्चय ही; मेने--वह समझ गया; हरेः-- भगवान्‌ के; कलाम्‌ू-- अंश; यस्य--जिसका; अप्रतिहतम्‌--अपराजेय;चक्रम्‌--चक्र; अंश: --आंशिक स्वरूप; सः--वह; परमेष्ठिन:-- भगवान्‌ का।

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी ब्रह्मा, देवताओं तथा उनके प्रमुखों सहित, वहाँ पधारे।

राजा पृथु के दाहिने हाथ में विष्णु भगवान्‌ की हथेली की रेखाएँ तथा चरण के तलवों पर कमल का चिह्नदेखकर ब्रह्मा समझ गये कि राजा पृथु भगवान्‌ के अंश-स्वरूप थे।

जिसकी हथेली में चक्र तथाअन्य ऐसी रेखाएँ हों, उसे परमेश्वर का अंश या अवतार समझना चाहिए।

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तस्याभिषेक आरब्धो ब्राह्मणै््नह्मवादिभि: ।

आभिषेचनिकान्यस्मै आजहु: सर्वतो जना: ॥

११॥

तस्य--उसका; अभिषेक: --राजतिलक; आरब्ध:-- आयोजन किया गया; ब्राह्मणै:--ब्राह्मणों द्वारा; ब्रह्य-वादिभि: --वैदिकअनुष्ठानों को माननेवाले; आभिषेचनिकानि--उत्सव के लिए आवश्यक विविध सामग्री; अस्मै--उसको; आजह्ु: --एकत्रकिया; सर्वतः--चारों ओर; जना: --मनुष्यों ने।

तब ब्रह्मवादी ब्राह्मणों ने राजा के अभिषेक का सारा आयोजन किया।

उत्सव में लगनेवालीविभिन्न सामग्रियों का संग्रह चारों दिशाओं के लोगों ने किया।

इस प्रकार सब कुछ पूरा हो गया।

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सरित्समुद्रा गिरयो नागा गाव: खगा मृगा: ।

दो: क्षिति: सर्वभूतानि समाजहुरुपायनम्‌ ॥

१२॥

सरित्‌--नदियाँ; समुद्रा: --समुद्र; गिरयः --पर्वत; नागा:--सर्प; गाव:--गाएँ; खगा:--पक्षी; मृगा:--पशु; द्यौ:-- आकाश;क्षिति:--पृथ्वी; सर्व-भूतानि--समस्त जीवात्माएँ; समाजह्ु:--एकत्र किया; उपायनम्‌--विभिन्न प्रकार के उपहार

अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार नदी, समुद्र, पर्वत, सर्प, गाय, पक्षी, पशु, स्वर्गलोक,पृथ्वीलोक तथा अन्य सभी लोकों की जीवात्माओं ने राजा को भेंट करने के लिए विविध उपहारएकत्रित किये।

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सोभिषिक्तो महाराज: सुवासा: साध्वलड्डू तः ।

पत्यार्चिषालड्डू तया विरेजेडग्निरिवापर: ॥

१३॥

सः--राजा; अभिषिक्त:--अभिषेक हो जाने पर; महाराज: --महाराज पृथु; सु-वासा:--सुन्दर वस्त्रों से सज्जित; साधु-अलड्डू त:ः--आभूषणों से अत्यधिक विभूषित; पतल्या--अपनी पत्नी; अर्चिषा--अर्चि के साथ; अलड्डू तया--आभूषणों सेसजाकर; विरेजे--विराज रहे थे; अग्नि:--अग्नि; इब--सह्ृश; अपर:--दूसरा |

इस प्रकार वस्त्रों तथा आभूषणों से सुन्दर रूप से अलंकृत महाराज पृथु का अभिषेक कियागया और उन्हें सिंहासन पर बैठाया गया।

वे सुन्दर आभूषणों से सज्जित अपनी पतली अर्चि केसाथ, अग्नि के समान लग रहे थे।

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तस्मै जहार धनदो हैमं वीर वरासनम्‌ ।

वरुण: सलिलस्त्रावमातपत्र॑ शशिप्रभम्‌ ॥

१४॥

तस्मै--उसको; जहार--भेंट दिया; धन-दः--देवताओं के कोषाध्यक्ष ( कुबेर ) ने; हैमम्‌--सोने का बना हुआ; वीर--हे विदुर;वर-आसनम्‌--राज-सिंहासन; वरूण: --वरुणदेव: ; सलिल-स्त्रावमू--जल की फुहारें बरसाते हुए; आतपत्रम्‌--छाता; शशि-प्रभमू--चन्द्रमा के समान प्रकाशयुक्त |

ऋषि ने आगे कहा, हे विदुर, कुबेर ने महान्‌ राजा पृथु को सुनहरा सिंहासन भेंट किया;वरुणदेव ने एक छाता प्रदान किया जिससे निरन्तर जल की फुहारें निकल रही थीं और जोचन्द्रमा के समान प्रकाशमान था।

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वायुश्च वालव्यजने धर्म: कीर्तिमयीं स्त्रजम्‌ ।

इन्द्र: किरीटमुत्कृष्टे दण्डं संयमनं यम: ॥

१५॥

वायु:--वायुदेव ने; च-- भी; वाल-व्यजने--बालों के बने दो चँवर; धर्म:--धर्मराज ने; कीर्ति-मयीम्‌--नाम तथा यश कोबढ़ानेवाले; सत्रजमू--हार; इन्द्र:--स्वर्ग के राजा इन्द्र ने; किरीटमू--मुकुट; उत्कृष्टम्‌--अत्यन्त मूल्यवान; दण्डम्‌ू--राजदण्ड;संयमनम्‌--संसार पर शासन करने के लिए; यम: --मृत्यु के अधीक्षक ने

वायु ने बालों से बने दो चामर, धर्म ने यश को बढ़ानेवाला पुष्पहार, स्वर्ग के राजा इन्द्र नेमूल्यवान मुकुट तथा यमराज ने विश्व पर शासन करने के लिए एक राजदण्ड प्रदान किया।

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ब्रह्मा ब्रह्ममयं वर्म भारती हारमुत्तमम्‌ ।

हरिः सुदर्शन चक्र तत्पत्यव्याहतां भ्रियम्‌ ॥

१६॥

ब्रह्मा--ब्रह्मा ने; ब्रह्य-मयम्‌-- आत्मज्ञान से निर्मित; वर्म--कवच; भारती--विद्या की देवी ने; हारम्‌--हार; उत्तमम्‌--दिव्य;हरिः--भगवान्‌ ने; सुदर्शनम्‌ चक्रम्‌--सुदर्शन चक्र; तत्‌-पत्नी--उनकी पत्ती ( लक्ष्मी ) ने; अव्याहताम्‌-- अविचल; थ्रियम्‌--सुन्दरता तथा ऐश्वर्य

ब्रह्मुजी ने राजा पृथु को आत्मज्ञान से निर्मित कवच भेंट किया।

ब्रह्म की पत्नी भारती( सरस्वती ) ने दिव्य हार दिया।

भगवान्‌ विष्णु ने सुदर्शन-चक्र दिया और उनकी पली, ऐश्वर्यकी देवी लक्ष्मी जी, ने उन्हें अविचल ऐ श्वर्य प्रदान किया।

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दशचन्द्रमसिं रुद्र: शतचन्द्रं तथाम्बिका ।

सोमोमृतमयानश्चांस्त्वष्टा रूपाश्रयं रथम्‌ ॥

१७॥

दश-चन्द्रमू-दस चन्द्रमाओं से भूषित; असिम्‌ू--तलवार; रुद्र:--शिवजी ने; शत-चन्द्रमू--एक सौ चन्द्रमाओं से सुशोभित;तथा--उसी तरह से; अम्बिका--देवी दुर्गा ने; सोम:--चन्द्रदेव; अमृत-मयान्‌--अमृत से युक्त; अश्वान्‌--घोड़े; त्वष्टा--विश्वकर्मा ने; रूप-आश्रयम्‌--अत्यन्त सुन्दर; रथम्‌-रथ |

शिवजी ने दस चन्द्रमाओं से अंकित कोष ( म्यान ) वाली तलवार भेंट की और देवी दुर्गा नेएक सौ चन्द्रमाओं से अंकित एक ढाल भेंट की।

चन्द्रदेव ने उन्हें अमृतमय घोड़े तथा विश्वकर्माने एक अत्यन्त सुन्दर रथ प्रदान किया।

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अग्निराजगवं चापं॑ सूर्यो रश्मिमयानिषून्‌ ।

भू: पादुके योगमय्यौ झौ: पुष्पावलिमन्वहम्‌ ॥

१८॥

अग्नि:ः--अग्निदेव ने; आज-गवम्‌--बकरे तथा गायों के सींगों से बने; चापम्‌-- धनुष; सूर्य: --सूर्यदेव ने; रश्मि-मयान्‌--सूर्यकी किरणों के समान चमकता; इषून्‌--तीर; भू:-- भूमि ने; पादुके-- खड़ाऊँ; योग-मय्यौ--योगशक्ति से युक्त; द्यौ:--आकाश के देवताओं ने; पुष्प--फूलों की; आवलिम्‌-- भेंट; अनु-अहम्‌--दिन-प्रति-दिन |

अग्निदेव ने बकरों तथा गौंओं के सीगों से निर्मित धनुष, सूर्यदेव ने सूर्यप्रकाश के समानतेजवान बाण, भूलोंक के प्रमुख देव ने योगशक्ति-सम्पन्न चरण-पादुकाएँ तथा आकाश के देवताओं ने पुनः पुनः पुष्पों की भेंटें प्रदान की।

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नाट्य सुगीतं वादित्रमन्तर्धानं च खेचरा: ।

ऋषयश्चाशिषः सत्या: समुद्र: शद्भुमात्मजम्‌ ॥

१९॥

नाट्यमू--नाटक की कला; सु-गीतम्‌ू--मधुर गायन की कला; वादित्रम्‌--वाद्ययंत्र बजाने की कला; अन्तर्धानम्‌--छिपने कीकला; च-- भी; खे-चरा:--आकाश--मार्ग में यात्रा करनेवाले देवताओं ने; ऋषय:--ऋषिगणों ने; च-- भी; आशिष:--आशीर्वाद; सत्या:--अमोघ; समुद्र:--समुद्र के देवता ने; शट्डमू--शंख; आत्म-जम्‌--अपने में से उत्पन्न

गगनचारी देवताओं ने राजा पृथु को नाटक, संगीत, वाद्ययंत्र तथा इच्छानुसार अन्तर्धान होनेकी कला प्रदान की।

ऋषियों ने भी उन्हें अमोघ आशीर्वाद दिये।

समुद्र ने स्वयं सागर से उत्पन्नशंख भेंट किया।

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सिन्धव: पर्वता नद्यो रथवीथीर्महात्मन: ।

सूतोथ मागधो बन्दी तं स्तोतुमुपतस्थिरे ॥

२०॥

सिन्धवः--समुद्रों; पर्वता:--पर्वतों; नद्यः --नदियों ने; रथ-वीथी:--रथ जाने के लिए मार्ग; महा-आत्मन:--महापुरुष का;सूत:ः--स्तुति करनेबाला; अथ--तब; मागध: -- भाट; वन्दी--स्तुति करनेवाला; तमू--उसको; स्तोतुमू--बड़ाई करने के लिए;उपतस्थिरे--स्वयं उपस्थित हुए।

समुद्रों, पर्वतों, तथा नदियों ने उन्हें किसी अवरोध के बिना रथ हॉकने के लिए मार्ग प्रदानकिया।

सूत, मागध तथा वन्दीजनों ने प्रार्थनाएँ तथा स्तुतियाँ कीं।

वे सभी उनके समक्ष अपनीअपनी सेवाएँ करने के लिए उपस्थित हो गये।

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स्तावकांस्तानभिप्रेत्य पृथुर्वैन्य: प्रतापवान्‌ ।

मेघनिर्वदया वाचा प्रहसन्निदमत्रवीत्‌ ॥

२१॥

स्तावकान्‌--स्तुति करने वाले; तानू--उन व्यक्तियों को; अभिप्रेत्य--देखकर, समझकर; पृथु:--राजा पृथु; बैन्य:--वेन कापुत्र; प्रताप-वान्‌--अत्यन्त शक्तिशाली; मेघ-निर्हादया -- मेघ-गर्जना के समान गम्भीर; वाचा--वाणी से; प्रहसन्‌--हँसते हुए;इदम्‌--यह; अब्नवीत्‌--बोला |

जब महान्‌ शक्तिशाली वेन के पुत्र राजा पृथु ने अपने समक्ष इन सबों को देखा, तो वे उन्हेंबधाई देने के लिए हँसे और मेघ-गर्जना जैसी गम्भीर वाणी में इस प्रकार बोले।

"

पृथुरुवाचभो: सूत हे मागध सौम्य वन्दि-ल्लोके धुनास्पष्टगुणस्य मे स्थात्‌ ।

किमाश्रयो मे स्तव एष योज्यतांमा मय्यभूवन्वितथा गिरो व: ॥

२२॥

पृथु: उबाच--राजा पृथु ने कहा; भो: सूत--हे सूत; हे मागध--हे मागध; सौम्य-- भद्ग; वन्दिन्‌--हे प्रार्थनारत भक्त; लोके--इस जगत में; अधुना--इस समय; अस्पष्ट--अप्रकट; गुणस्य--जिसके गुण; मे--मेरे; स्थात्‌ू--होवें; किम्‌--क्यों; आ श्रय:--शरण; मे--मेरा; स्तव:--प्रशंसा; एब:--यह; योज्यताम्‌--प्रयुक्त हो सके; मा--क भी नहीं; मयि--मुझमें; अभूवन्‌--थे;वितथा:--वृथा; गिर: --शब्द; व: --तुम्हारे

राजा पृथु ने कहा : हे भद्र सूत, मागध तथा अन्य प्रार्थनारत भक्तो, आपने मुझमें जिन गुणोंका बखान किया है, वे तो अभी मुझमें प्रकट नहीं हुए।

तो फिर आप मेरे इन गुणों की क्‍योंप्रशंसा कर रहे हैं? मैं नहीं चाहता कि मेरे विषय में कहे गये शब्द वृथा जाएँ।

अतः अच्छा हो,यदि इन्हें किसी दूसरे को अर्पित करें।

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तस्माप्परोक्षे स्मदुपश्रुतान्यलं-करिष्यथ स्तोत्रमपीच्यवाच: ।

सत्युत्तमश्लोकगुणानुवादेजुगुप्सितं न स्तवयन्ति सभ्या: ॥

२३॥

तस्मात्‌ू--अतः ; परोक्षे--निकट भविष्य में; अस्मत्‌--मेरा; उपश्रुतानि--कहे गये गुणों के विषय में; अलमू्‌--पर्याप्त;'करिष्यथ--तुम कर सकोगे; स्तोत्रम्‌--स्तुतियाँ; अपीच्य-वाच:--हे भद्र गायक; सति--समुचित कार्य होने से; उत्तम-श्लोक--श्रीभगवान्‌ का; गुण--गुणों की; अनुवादे--विवेचना; जुगुप्सितम्‌-घृणित व्यक्ति को; न--कभी नहीं; स्तवयन्ति--स्तुति प्रदान करें; सभ्या:-- भद्र लोग |

हे भद्र गायको, कालान्तर में वे गुण, जिनका तुम लोगों ने वर्णन किया है, जब वास्तव मेंप्रकट हो जाँय तब मेरी स्तुति करना।

जो भद्गलोग भगवान्‌ की प्रार्थना करते हैं, वे ऐसे गुणों कोकिसी ऐसे मनुष्य में थोपा नहीं करते, जिनमें सचमुच वे न पाए जाते हों।

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महदगुणानात्मनि कर्तुमीशः'कः स्तावकै: स्तावयतेसतोपि ।

तेस्थाभविष्यन्निति विप्रलब्धोजनावहासं कुमतिर्न वेद ॥

२४॥

महत्‌--महान; गुणान्‌--गुण; आत्मनि--अपने आप में; कर्तुमू-- प्रकट करने के लिए; ईश:--सक्षम; कः--कौन;स्तावकैः --अनुयायियों द्वारा; स्तावयते--स्तुति कराता है; असतः--न होनेवाले; अपि--यद्यपि; ते--वे; अस्य--उसका;अभविष्यन्‌--हो सकता है; इति--इस प्रकार; विप्रलब्ध:--ठगा गया; जन--लोगों का; अवहासम्‌--उपहास, अपमान;कुमति:--मूर्ख; न--नहीं; वेद--जानता है।

भला ऐसे महान्‌ गुणों को धारण करने में सक्षम बुद्धिमान पुरुष किस तरह अपनेअनुयायियों को ऐसे गुणों की प्रशंसा करने देगा जो वास्तव में उसमें न हों ? किसी मनुष्य कीयह कह कर प्रशंसा करना कि यदि वह शिक्षित हो तो महान्‌ विद्वान्‌ या महापुरुष हो जाता है,ठगने के अतिरिक्त और क्‍या है? मूर्ख व्यक्ति जो ऐसी बड़ाई स्वीकार कर लेता है, वह यह नहींजानता कि ऐसे शब्द उसके अपमान के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं।

प्रभवो ह्यात्मनः स्तोत्र जुगुप्सन्त्यपि विश्रुता: ।

ह्लीमन्तः परमोदारा: पौरुषं वा विगर्हितम्‌ ॥

२५॥

प्रभव:--अत्यन्त पराक्रमी पुरुष; हि--निश्चय ही; आत्मन: --अपनी; स्तोत्रमू--प्रशंसा; जुगुप्सन्ति--नहीं चाहते; अपि--यद्यपि;विश्रुता:--अत्यन्त प्रसिद्ध; ही-मन्तः--सौम्य; परम-उदारा: --अत्यन्त उदार पुरुष; पौरुषम्‌--शक्तिशाली कार्य; वा-- भी;विगर्हितम्‌--निन्दनीय |

जिस प्रकार कोई सम्मानित तथा उदार व्यक्ति अपने निन्दनीय कार्यों के विषय में सुनना नहींचाहता, उसी प्रकार अत्यन्त प्रसिद्ध तथा पराक्रमी पुरुष अपनी प्रशंसा सुनना पसन्द नहीं करता।

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वयं त्वविदिता लोके सूताद्यापि वरीमभि: ।

कर्मभि: कथमात्मानं गापयिष्याम बालवत्‌ ॥

२६॥

वयम्‌--हम; तु--तब; अविदिता:--अप्रसिद्ध; लोके -- संसार में; सूत-आद्य--हे सूत इत्यादि जनो; अपि--इस समय तुरन्त;वरीमभि:ः--महान्‌, प्रशंसनीय; कर्मभिः--कर्मों से; कथम्‌ू--कैसे; आत्मानम्‌--अपने आप; गापयिष्याम--स्तुति करने के लिएलगा लूँ; बालवतू--बच्चों के समान

राजा पृथु ने आगे कहा : हे सूत आदि भक्तो, इस समय मैं अपने व्यक्तिगत गुणों के लिएअधिक प्रसिद्ध नहीं हूँ क्योंकि अभी तो मैंने ऐसा कुछ किया नहीं जिसकी तुम लोग प्रशंसा करसको।

अतः मैं बच्चों की तरह तुम लोगों से अपने कार्यो का गुणगान कैसे कराऊँ ?"

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