← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची
अध्याय सोलह: पेशेवर वाचकों द्वारा राजा पृथु की स्तुति
4.16मैत्रेय उवाचइति ब्रुवाणं नृपतिं गायका मुनिचोदिता: ।
तुष्ठवुस्तुष्टमनसस्तद्वागमृतसेवया ॥
१॥
मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; इति--इस प्रकार; ब्रुवाणम्--कहते हुए; नृपतिम्--राजा को; गायका:--स्तुति करनेवाले;मुनि--मुनियों द्वारा; चोदिता:--आदेश पाकर; तुष्ठुवु:--प्रशंसित; तुष्ट--संतुष्ट, प्रसन्न; मनसः--उनके मन; तत्--उसके ;वाक्ू--शब्द; अमृत-- अमृत के समान; सेवया--सुनने से
महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा : जब राजा पृथु इस प्रकार विनम्रता से बोले, तो उनकी अमृत-तुल्य वाणी से गायक अत्यधिक प्रसन्न हुए।
तब वे पुनः ऋषियों द्वारा दिये गये आदेशों केअनुसार राजा की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।
"
नालं वबयं ते महिमानुवर्णनेयो देववर्योडबततार मायया ।
वेनाड्रजातस्य च पौरुषाणि तेवाचस्पतीनामपि बश्रमुर्धिय: ॥
२॥
न अलमू्--समर्थ नहीं; वयम्--हम; ते--तुम्हारी; महिम--महिमा, यश; अनुवर्णने--वर्णन करने में; य:--जो; देव-- भगवान्;वर्य:--सर्वप्रथम; अवततार--अवतरित हुआ; मायया--अन्तरंगा शक्ति अथवा अहैतुकी कृपा से; वेन-अड़्र--राजा बेन केशरीर से; जातस्य--उत्पन्न होनेवाले की; च--तथा; पौरुषाणि--महिमामय कार्य; ते--तुम्हारा; वाच:-पतीनाम्--महान्वक्ताओं का; अपि--यद्यपि; बश्रमु:--चकरा जाते हैं; धियः--मन |
गायकों ने आगे कहा : हे राजनू, आप भगवान् विष्णु के साक्षात् अवतार हैं और उनकीअहैतुकी कृपा से आप पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं।
अतः हममें इतनी सामर्थ्य कहाँ कि आपकेमहान् कार्यों का सही-सही गुणगान कर सकें ? यद्यपि आप राजा बेन के शरीर से प्रकट हुए हैं,तो भी ब्रह्मा तथा अन्य देवताओं के समान बड़े-बड़े वाचक और वक्ता भी आपके महिमामयकार्यों का सही-सही वर्णन नहीं कर सकते।
"
अथाप्युदारश्रवस: पृथोहरेःकलावतारस्य कथामृताहता: ।
यथोपदेशं मुनिभिः प्रचोदिताःएइलाधघ्यानि कर्माणि वबयं वितन्महि ॥
३॥
अथ अपि--तो भी; उदार--उदार; श्रवसः--जिसका यश; पृथो:--राजा पृथु का; हरेः-- भगवान् विष्णु का; कला--अंश;अवतारस्य--अवतार; कथा--शब्द; अमृत-- अमृतमय, मधुर; आहता: --के प्रति सावधान; यथा--के अनुसार; उपदेशम्--उपदेश; मुनिभि:--बड़े-बड़े साधुओं द्वारा; प्रचोदिता:--प्रोत्साहित; श्लाध्यानि-- प्रशंसनीय; कर्माणि--कार्य; वयम्--हम;वितन्महि--विस्तार करने का यत्न करेंगे।
यद्यपि हम आपका ठीक से गुणगान कर सकने में असमर्थ हैं, तो भी हमें आपके कार्यों की महिमा के गायन में दिव्य स्वाद प्राप्त हो रहा है।
हम प्राधिकार प्राप्त मुनियों तथा पंडितों से मिलेआदेशों के अनुसार ही आपकी महिमा का वर्णन करेंगे।
फिर भी हम जो कुछ कह रहे हैं, वहअपर्याप्त तथा नगण्य है।
हे राजनू, चूँकि आप भगवान् के साक्षात् अवतार हैं, अतः आपकेसमस्त कर्म उदार तथा सदैव प्रशंसनीय हैं।
"
एष धर्मभूतां श्रेष्ठो लोक॑ धर्मेंडनुवर्तयन् ।
गोप्ता च धर्मसेतूनां शास्ता तत्परिपन्थिनाम् ॥
४॥
एषः--यह राजा पृथु; धर्म-भूताम्--धार्मिक कर्म करनेवाले पुरुषों में; श्रेष्ठ: -- श्रेष्ठ लोकम्--सारा संसार; धर्मे-- धार्मिककार्यो के; अनुवर्तयन्--ठीक से लगाये रखते हुए; गोप्ता--रक्षक; च--भी; धर्म-सेतूनाम्-- धर्म के नियमों का; शास्ता--दण्डदेनेवाला; ततू-परिपन्थिनामू--उनके विरोधियों को
यह राजा, महाराज पृथु, धार्मिक नियमों के पालन करनेवालों में सर्वश्रेष्ठ है।
अत: वहप्रत्येक व्यक्ति को धर्म में प्रवृत्त करेगा और धर्म के उन सिद्धान्तों की रक्षा करेगा।
अधर्मियों तथानास्तिकों के लिए वह महान् दण्ड-दाता भी होगा।
"
एष वै लोकपालानां बिभर्त्येकस्तनौ तनू: ।
काले काले यथाभागं लोकयोरुभयोहितम् ॥
५॥
एष:--यह राजा; बै--निश्चय ही; लोक-पालानाम्ू-- समस्त देवताओं का; बिभर्ति-- धारण करता है; एक:--अकेले; तनौ--अपने शरीर में; तनू:--अनेक शरीर; काले काले--यथासमय; यथा--के अनुसार; भागम्--उचित भाग; लोकयो:--लोकोंका; उभयो:--दोनों; हितम्ू--कल्याण |
यह राजा अकेले, अपने ही शरीर में यथासमय समस्त जीवात्माओं का पालन करने तथाविभिन्न प्रकार के कार्यों को सम्पन्न करने के लिए विभिन्न देवताओं के रूप में प्रकट होकरउनको प्रसन्न रखने में समर्थ होगा।
इस प्रकार वह प्रजा को वैदिक यज्ञ करने के लिए प्रेरितकरके स्वर्गलोक का पालन करेगा।
यथासमय वह उचित वर्षा द्वारा इस पृथ्वीलोक का भीपालन करेगा।
"
वसु काल उपादत्ते काले चायं विमुज्जञति ।
सम: सर्वेषु भूतेषु प्रतपन्सूर्यवद्धिभु: ॥
६॥
वसु-- धन; काले--समय पाकर; उपादत्ते--वसूल करता या निकालता है; काले--यथासमय; च-- भी; अयम्ू--यह राजापृथु; विमुल्ञनति--वापस कर देता है; समः--उतना ही, बराबर; सर्वेषु--सब; भूतेषु--जीवात्माओं में; प्रतपन्ू--चमकते हुए;सूर्य-बत्--सूर्यदेव के समान; विभुः--शक्तिमान।
यह राजा पृथु सूर्यदेव के समान प्रतापी होगा और जिस प्रकार सूर्यदेव हर एक को समानरूप से अपना प्रकाश वितरित करता है, उसी तरह राजा पृथु अपनी कृपा सबों को संवितरितकरेगा।
जिस प्रकार सूर्यदेव आठ मास तक जल को वाष्पित करता है और वर्षा ऋतु में प्रचुरमात्रा में उसको लौटा देता है, उसी प्रकार यह राजा भी नागरिकों से कर वसूल करेगा औरआवश्यकता के समय इस धन को लौटा देगा।
"
तितिक्षत्यक्रमं वैन्य उपर्याक्रमतामपि ।
भूतानां करुण: शश्वदार्तानां क्षितिवृत्तिमान् ॥
७॥
तितिक्षति--सहन करता है; अक्रमम्-- अपराध; वैन्य:--राजा बेन का पुत्र; उपरि--सिर के ऊपर; आक्रमताम्--पद रखनेवालोंको; अपि-- भी; भूतानामू--समस्त जीवात्मा के; करुण:--अत्यन्त दयालु; शश्वत्--सदैव; आर्तानाम्--दुखियों का; क्षिति-वृत्ति-मानू--पृथ्वी की वृत्ति ग्रहण करनेवाले |
यह राजा पृथु समस्त नागरिकों पर अत्यधिक दयालु रहेगा।
यदि एक दीन पुरुष विधि-विधानों की अवहेलना करके राजा के सिर पर अपना पाँव रख दे, तो भी राजा अपनी अहैतुकी कृपा से उस पर ध्यान न देकर क्षमा कर देगा।
जगत के रक्षक के रूप में यह पृथ्वी की ही भाँतिसहिष्णु होगा।
"
देवेवर्षत्यसौ देवो नरदेववपुहरि: ।
कृच्छुप्राणा: प्रजा होष रक्षिष्यत्यञ्जसेद्धवत् ॥
८॥
देवे--तब देवता ( इन्द्र ); अवर्षति--वर्षा नहीं करता; असौ--वह; देव: --महाराज पृथु; नर-देव--राजा का; वपु:--शरीरयुत; हरिः-- भगवान्; कृच्छु-प्राणा: --दुखी जीवात्माएँ; प्रजा:--नागरिक; हि--निश्चय ही; एब:--यह; रक्षिष्यति--रक्षाकरेगा; अज्ञसा--सरलतापूर्वक ; इन्द्र-वत्--राजा इन्द्र के समान
जब वर्षा नहीं होगी और जल के अभाव से नागरिक महान् संकट में होंगे तो यहराजवेषधारी भगवान् स्वर्ग के राजा इन्द्र के समान जल की पूर्ति करेगा।
इस प्रकार अनावृष्टि( सूखे ) से वह नागरिकों की रक्षा कर सकेगा।
"
आप्याययत्यसौ लोकं वदनामृतमूर्तिना ।
सानुरागावलोकेन विशद॒स्मितचारुणा ॥
९॥
आप्याययति--बढ़ाता है; असौ--वह; लोकम्--सम्पूर्ण संसार; बदन-- अपने मुखमंडल से; अमृत-मूर्तिना-- चन्द्रमा सहश; स-अनुराग--वत्सल, प्यारी; अवलोकेन--चितवन से; विशद--चमकीली; स्मित--मन्द हास, मुसकान; चारुणा--मनोहर।
यह राजा, पृथु महाराज, अपनी प्यारी चितबन तथा अपने चन्द्रमा सहश मुखमंडल से, जोनागरिकों के लिए अत्यधिक प्यार से सदैव हँसता रहता है, सबों के शान्त जीवन में और वृद्धिकरेगा।
"
अव्यक्तवर्त्मैष निगूढकार्योंगम्भीरवेधा उपगुप्तवित्त: ।
अनन्तमाहात्म्यगुणैकधामापृथु: प्रचेता इव संवृतात्मा ॥
१०॥
अव्यक्त--अप्रकट; वर्त्मा--उसकी नीतियाँ; एष:--यह राजा; निगूढ--गुप्त; कार्य:--उसके कार्यकलाप; गम्भीर--गुप्त;वेधा:--सम्पन्न करने की विधि; उपगुप्त--गुप्त रखी जानेवाला; वित्त:--उसका कोष; अनन्त--अपार; माहात्म्य--महिमा का;गुण--उत्तम गुणों का; एक-धामा--एकमात्र आगार; पृथु:--राजा पृथु; प्रचेता:--समुद्रों का राजा, वरुण; इब--सहश;संवृत--आच्छादित; आत्मा--स्वयं, स्व |
गायकों ने आगे कहा : राजा द्वारा अपनाई गई नीतियों को कोई भी नहीं समझ सकेगा।
उसके कार्य भी गुप्त रहेंगे और कोई यह न जान सकेगा कि वह प्रत्येक कार्य को किस प्रकारसफल बनाएगा।
उसका कोष सदा ही लोगों से अज्ञात रहेगा।
वह अनन्त महिमा तथा उत्तम गुणों का आगार होगा।
उसका पद स्थायी तथा प्रच्छन्न बना रहेगा जिस प्रकार कि समुद्रों के देववरुण चारों ओर जल से ढके रहते हैं।
"
दुरासदो दुर्विषह आसन्नोपि विदूरवत् ।
नैवाभिभवितुं शकक््यो वेनारण्युत्थितोइनलः ॥
११॥
दुरासद:--पास तक न पहुँचा जाने योग्य; दुर्विषह: --दुःसह; आसन्न:ः --समीप होकर; अपि--यद्यपि; विदूर-बत्--मानोअत्यन्त दूर; न--कभी नहीं; एब--निश्चय ही; अभिभवितुम्--जीते जा सकने के लिए; शक््य:--समर्थ; वेन--राजा बेन;अरणि--अग्नि उत्पन्न करनेवाले काष्टर से; उत्थित:--उत्पन्न; अनल:--अग्नि |
राजा पृथु का जन्म राजा वेन के मृत शरीर से उसी प्रकार हुआ जिस प्रकार अरणि से अग्निउत्पन्न होती है।
अतः राजा पृथु सदैव अग्नि के समान रहेंगे और उनके शत्रु उनके पास तक नहींपहुँच पाएँगे।
निस्सन्देह, वे अपने शत्रुओं के लिए दुःसह होंगे, वे उनके पास रह कर भी उनकेपास नहीं पहुँच पाएंगे, मानो वे दूर रहने के लिए बने हो।
कोई भी राजा पृथु को हरा नहींसकेगा।
"
अन्तर्बहिश्च भूतानां पश्यन्कर्माणि चारणै: ।
उदासीन इवाध्यक्षो वायुरात्मेव देहिनामू ॥
१२॥
अन्त:ः--आन्तरिक रूप से; बहिः--बाह्य रूप से; च--तथा; भूतानाम्--जीवात्माओं का; पश्यन्ू--देखते हुए; कर्माणि--कार्य; चारणै:--गुप्तचरों द्वारा; उदासीन:--निरपेक्ष; इब--सहश; अध्यक्ष:--साक्षी; वायु:--प्राणवायु; आत्मा--प्राणशक्ति;इब--सहश; देहिनामू--समस्त देहधारियों की
राजा पृथु अपने प्रत्येक नागरिक के आन्तरिक तथा बाह्य कार्यों को देख सकने में समर्थ होंगे।
फिर भी उनकी गुप्तचर व्यवस्था को कोई जान नहीं सकेगा और वे अपनी स्तुति अथवानिन्दा-सम्बन्धी मामलों में सदैव उदासीन रहेंगे।
वे शरीर के भीतर स्थित वायु, अर्थात् प्राण केसमान होंगे, जो बाह्य तथा आन्तरिक रूप से प्रकट होता है, किन्तु सभी व्यापारों से सदैवनिरपेक्ष रहता है।
"
नादण्ड्यं दण्डयत्येष सुतमात्मद्विषामपि ।
दण्डयत्यात्मजमपि दण्ड्यं धर्मपथे स्थित: ॥
१३॥
न--नहीं; अदण्ड्यम्--अदण्डनीय; दण्डयति--दण्ड देता है; एष:--यह राजा; सुतम्--पुत्र; आत्म-द्विषाम्-- अपने शत्रुओंको; अपि-- भी; दण्डयति--दण्ड देता है; आत्म-जम्--अपना पुत्र; अपि-- भी; दण्ड्यम्--दण्डनीय; धर्म-पथे-- धर्मनिष्ठा केमार्ग पर; स्थित:--स्थित होकर
चूँकि यह राजा सदैव धर्मनिष्ठा के मार्ग पर रहेगा, अतः वह अपने पुत्र तथा अपने शत्रु केपुत्र दोनों के प्रति समभाव रखेगा।
यदि उसके शत्रु का पुत्र दण्डनीय नहीं है, तो वह उसे दण्डनहीं देगा, किन्तु यदि स्वयं का पुत्र दण्डनीय है, तो उसे दंडित करेगा।
"
अस्याप्रतिहतं चक्रं पृथोरामानसाचलातू ।
वर्तते भगवानकों यावत्तपति गोगणै: ॥
१४॥
अस्य--इस राजा का; अप्रतिहतम्--न रुकनेवाला; चक्रम्--प्रभाव का वृत्त; पृथो:--राजा पृथु के; आ-मानस-अचलातू--मानस पर्वत तक; वर्तते--है; भगवान्--परम शक्तिमान; अर्क:--सूर्यदेव; यावत्--जिस प्रकार; तपति--चमकता है; गो-गणै:-- प्रकाश की किरणों से |
जिस प्रकार सूर्यदेव अपनी प्रकाशमान रश्मियों को आर्कटिक प्रदेश तक बिना किसीअवरोध के बिखेरते हैं, उसी प्रकार राजा पृथु का प्रभाव आर्कटिक क्षेत्र तक के समस्त भूभागोंपर होगा और वह आजीवन अविचल रहेगा।
"
रज्जयिष्यति यल्लोकमयमात्मविचेष्टितैः ।
अथामुमाहू राजानं मनोरञ्जनकै: प्रजा: ॥
१५॥
रज्जयिष्यति-- प्रसन्न करेगा; यत्ू--क्योंकि; लोकम्--समग्र संसार; अयम्--यह राजा; आत्म--निजी; विचेष्टितैः--कार्यों द्वारा;अथ--अतः; अमुम्--उसको; आहु:--कहते हैं; राजानम्--राजा; मनः-र्जनकै:--मन को अच्छा लगनेवाला; प्रजा:--नागरिक
यह राजा अपने व्यावहारिक कार्यो द्वारा सबों को प्रसन्न करेगा और उसके सारे नागरिकअत्यन्त प्रसन्न होंगे।
इस कारण नागरिकों को उसे अपना शासक राजा स्वीकार करने मेंअत्यधिक सन््तोष मिलेगा।
"
हृढब्रतः सत्यसन्धो ब्रह्मण्यो वृद्धसेवकः ।
शरण्यः सर्वभूतानां मानदो दीनवत्सल: ॥
१६॥
हढ-ब्रतः--हृढ़संकल्प वाला; सत्य-सन्ध: --सत्य-प्रतिज्ञ; ब्रह्मण्य:--ब्राह्मण संस्कृति का प्रेमी; वृद्ध-सेवक:--वृद्ध पुरुषों कादास; शरण्य: --शरणागत-वत्सल; सर्व-भूतानाम्--समस्त जीवात्माओं का; मान-दः --सबों का सम्मान करनेवाला; दीन-बत्सलः--दीनों तथा अनाथों पर अत्यधिक दयालु।
यह राजा दृढ़संकल्प वाला तथा सत्यव्रती होगा।
यह ब्राह्मण-संस्कृति का प्रेमी, वृद्धों कीसेवा करने वाला तथा शरणागतों को प्रश्नय देने वाला होगा।
यह सबों का सम्मान करेगा औरदीन-दुखियों तथा अबोधों पर सदैव कृपालु रहेगा।
"
मातृभक्ति: परस्त्रीषु पत्यामर्ध इवात्मन: ।
प्रजासु पितृवत्स्निग्ध: किड्डूरो ब्रह्मवगादिनाम् ॥
१७॥
मातृ-भक्ति:-- अपनी माता के समान आदर करने वाला; पर-स्त्रीषु--पराई स्त्री के प्रति; पल््याम्--अपनी पत्नी को; अर्ध:--आधा; इब--सहृश; आत्मन: -- अपने शरीर का; प्रजासु--नागरिकों के प्रति; पितृ-वत्--पिता के समान; स्निग्ध:--स्नेही;किड्जरः--दास; ब्रह्म-वादिनामू-- भगवान् की महिमा का उपदेश करने वाले भक्तों का।
यह राजा सभी स्त्रियों को अपनी माता के समान सम्मान देगा और अपनी पत्नी को अपनेशरीर का आधा अंग ( अर्द्धांड़िनी ) मानेगा।
यह अपनी प्रजा के प्रति पिता के समान स्नेही होगाऔर अपने आपको भगवान् की महिमा का उपदेश करने वाले भक्तों का परम आज्ञाकारी दाससमझेगा।
"
देहिनामात्मवत्प्रेष्ठ: सुहृदां नन्दिवर्धन: ।
मुक्तसड्डप्रसड्रोयं दण्डपाणिरसाधुषु ॥
१८॥
देहिनाम्ू--समस्त शरीरधारी जीवों को; आत्म-वत्--अपने समान; प्रेष्ट:--प्रिय मानते हुए; सुहृदाम्-मित्रों का; नन्दि-वर्धन:--आनन्द बढ़ाते हुए; मुक्त-सड़--समस्त भौतिक कल्मष से रहित पुरुषों के साथ; प्रसड्र:ः--घनिष्ठतःसम्बन्धित; अयम्--यह राजा;दण्ड-पाणि:--दण्ड देने वाला हाथ; असाधुषु-- अपराधियों को |
यह राजा समस्त जीवधारी प्राणियों को अपने ही समान प्रिय मानेगा और अपने मित्रों केआनन्द को सदैव बढ़ाने वाला होगा।
यह मुक्त पुरुषों से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित रहेगा और समस्त अपवित्र व्यक्तियों को कठोर दण्ड देने वाला होगा।
"
अयं तु साक्षाद्धगवांस्त्यधीश:कूटस्थ आत्मा कलयावतीर्ण: ।
यस्मिन्नविद्यारचितं निरर्थक'पश्यन्ति नानात्वमपि प्रतीतम् ॥
१९॥
अयम्--यह राजा; तु--तब; साक्षात्--प्रत्यक्ष; भगवान्-- भगवान्; त्रि-अधीश:--तीनों लोकों का स्वामी; कूट-स्थ:--बिनाकिसी परिवर्तन के; आत्मा--परमात्मा; कलया--आंशिक विस्तार से; अवतीर्ण: --अवतरित; यस्मिनू--जिसमें; अविद्या-रचितम्--अज्ञान से उत्पन्न; निरर्थकम्--अर्थरहित; पश्यन्ति--देखते हैं; नानात्वमू--विविधता; अपि--निश्चय ही; प्रतीतम्--मिथ्या, अप्रकट |
यह राजा तीनों लोकों का स्वामी है और सीधे भगवान् ने इसे शक्ति प्रदान की है।
यहअपरिवर्तनीय है और परमेश्वर का शकत्यावेश अवतार है।
मुक्त आत्मा तथा परम दिद्वान् होने केकारण यह समस्त भौतिक विविधताओं को अर्थहीन मानता है, क्योंकि इनका मूलाधार अविद्याहै।
"
अयं भुवो मण्डलमोदयाद्रे-गेप्तिकवीरों नरदेवनाथः ।
आस्थाय जैत्रं रथमात्तचापःपर्यस्यते दक्षिणतो यथार्क: ॥
२०॥
अयमू--यह राजा; भुव:ः--जगत का; मण्डलम्ू--गोलक; आ-उदय-अद्रे:--उदयाचल से, जहाँ सबसे पहले सूर्य दिखता है;गोप्ता--रक्षा करेगा; एक--अद्वितीय; वीर:--शक्तिशाली; नर-देव--समस्त राजाओं का, मानव समाज में देवों का; नाथ:--स्वामी; आस्थाय--स्थित होकर; जैत्रमू--विजयी; रथम्--उसका रथ; आत्त-चाप: -- धनुष धारण करते हुए; पर्यस्यते--प्रदक्षिणा करेगा; दक्षिणत:ः--दक्षिण दिशा से; यथा--जिस प्रकार; अर्क:--सूर्य |
यह राजा अद्वितीय शक्तिशाली तथा वीर होगा, जिससे इसका कोई प्रतिद्वन्द्दी नहीं होगा।
यहअपने हाथ में धनुष धारण करके विजयी रथ पर चढ़कर सूर्य के समान दिखाई देता हुआभूमण्डल की प्रदक्षिणा करेगा, जो दक्षिण से अपनी कक्षा पर परिभ्रमण करता है।
"
अस्मै नृपाला: किल तत्र तत्रबलि हरिष्यन्ति सलोकपाला: ।
मंस्यन्त एषां स्त्रिय आदिराजं॑अक्रायुध॑ तद्य॒श उद्धरन्त्य: ॥
२१॥
अस्मै--उसको; नृू-पाला:--समस्त राजा; किल--निश्चय ही; तत्र तत्र--जहाँ जहाँ; बलिम्--उपहार, भेंट; हरिष्यन्ति--प्रदानकरेंगे; स--सहित; लोक-पाला:--देवता; मंस्यन्ते--मानेगा; एघाम्--इन राजाओं का; स्त्रियः--पत्लियाँ; आदि-राजम्ू--पहला राजा; चक्र-आयुधम्--चक्ररूपी हथियार को; तत्--उसका; यशः--ख्याति; उद्धरन्त्यः-- धारण किये।
जब यह राजा सारे संसार में भ्रमण करेगा तो अन्य राजा तथा अन्य देवतागण इसे सभीप्रकार के उपहार भेंट करेंगे।
उनकी रानियां भी उसे आदि राजा मानेंगी, जो अपने हाथों में चक्रतथा गदा चिह्नों को धारण करता है और उसी के गुणगान करेंगी, क्योंकि वह भगवान् के समानख्याति वाला होगा।
"
अयं महीं गां दुदुहेधिराज:प्रजापतिर्वृत्तिकर: प्रजानाम् ।
यो लीलयाद्रीनस्वशरासकोटयाभिन्दन्समां गामकरोद्यथेन्द्र: ॥
२२॥
अयम्--यह राजा; महीम्--पृथ्वी को; गामू-गाय के रूप में; दुदुहे--दुहेगा; अधिराज:--अद्वितीय राजा; प्रजा-पति:--मनुष्यका जनक; वृत्ति-करः--जीवन सुविधाएँ प्रदान करते हुए; प्रजानामू--नागरिकों की; यः--जो; लीलया--खेल-खेल में;अद्रीन्--पर्वत; स्व-शरास--अपने बाण की; कोट्या--नोक से; भिन्दन्--विदीर्ण करके; समाम्--समतल; गाम्--पृथ्वी को;अकरोत्--करेगा; यथा--जैसे; इन्द्र:--स्वर्ग का राजा इन्द्र प्रजा का पालक
यह राजा अद्वितीय है और प्रजापति देवों के तुल्य है।
प्रजा के जीवन-निर्वाह के लिए यह गौ रूपी पृथ्वी का दोहन करेगा।
यही नहीं, यह अपने बाण की नोक से समस्त पर्वतों को विदीर्ण करके धरती को वैसे ही समतल करेगा, जिस प्रकार स्वर्ग का राजाइन्द्र अपने प्रबल वज्र से पर्वतों को तोड़ता है।
"
विस्फूर्जयन्नाजगवं धनु: स्वयंयदाचरत्क्ष्ममविषहामाजौ ।
तदा निलिल्युर्दिशि दिश्यसन्तोलाज्ूूलमुद्यम्य यथा मृगेन्द्र ४ ॥
२३॥
विस्फूर्जयन्--टंकार करते हुए; आज-गवम्--बकरों तथा बैलों के सींगों से बना हुआ; धनु:--अपना धनुष; स्वयम्--स्वयं;यदा--जब; अचरत्--विचरण करेगा; क्ष्मामू--पृथ्वी पर; अविषह्मम्-दुर्धर, बिना रोक के; आजौ--युद्ध में; तदा--उससमय; निलिल्यु:--छिप जाएँगे; दिशि दिशि--चारों दिशाओं में; असन्त:--आसुरी लोग; लाडूलम्--पूँछ को; उद्यम्य--ऊँचीकरके; यथा--जिस प्रकार; मृगेन्द्र:--सिंह |
जब सिंह अपनी पूँछ ऊपर उठाकर वन में विचरण करता है, उस समय छोटे-छोटे पशु छिपजाते हैं।
इसी प्रकार जब राजा पृथु अपने राज्य में भ्रमण करेंगे और बकरों तथा बैलों के सींगोंसे बने अपने धनुष की टंकार करेंगे जिसका युद्ध में कोई सामना नहीं कर सकता, तो सभीआसुरी धूर्त तथा चोर चारों दिशाओं में छिप जाएँगे।
"
एषो श्रमेधाब्शतमाजहारसरस्वती प्रादुरभावि यत्र ।
अहार्षीद्यस्य हयं पुरन्दरःशतक्रतुश्चरमे वर्तमाने ॥
२४॥
एषः--यह राजा; अश्वमेधान्--अश्वमेध यज्ञ; शतम्--एक सौ; आजहार--करेगा; सरस्वती --सरस्वती नदी; प्रादुरभावि--प्रकट होती है; यत्र--जहाँ; अहार्षीत्ू-- चुराएगा; यस्य--जिसका; हयम्--घोड़ा; पुरन्दरः --इन्द्र; शत-क्रतु:ः--जिसने सौ यज्ञकिये हैं; चरमे-- अन्तिम यज्ञ में; वर्तमाने--वर्तमान
यह राजा सरस्वती नदी के उद्गम स्थान पर सौ अश्वमेध यज्ञ करेगा।
अन्तिम यज्ञ के समय,स्वर्ग का राजा इन्द्र यज्ञ के घोड़े को चुरा लेगा।
"
एष स्वसद्योपवने समेत्यसनत्कुमारं भगवन्तमेकम् ।
आराध्य भक््त्यालभतामलं तज्ज्ञानं यतो ब्रह्म परं विदन्ति ॥
२५॥
एषः--यह राजा; स्व-सद्य -- अपने महल में; उपवने--उद्यान में; समेत्य-- भेंट करके; सनत्-कुमारम्--सनत्कुमार;भगवन्तम्--पूज्य; एकम्--अकेले; आराध्य--पूजकर; भकत्या--भक्तिपूर्वक; अलभत--प्राप्त करेगा; अमलम्--कल्मषरहित,निर्मल; ततू--वह; ज्ञानमू-दिव्य ज्ञान; यतः--जिससे; ब्रह्म-- आत्मा; परमू--परम दिव्य; विदन्ति--जानते हैं, भोगते हैं।
यह राजा पृथु अपने प्रासाद के उद्यान में चार कुमारों में से एक, सनत्कुमार से भेंट करेगा।
राजा उनकी भक्तिपूर्वक पूजा करेगा और उनसे सौभाग्यवश उपदेश प्राप्त करेगा जिससे मनुष्यदिव्य आनन्द उठा सकता है।
"
तत्र तत्र गिरस्तास्ता इति विश्रुतविक्रम: ।
श्रोष्यत्यात्माश्रिता गाथा: पृथु: पृथुपराक्रम: ॥
२६॥
तत्र तत्र--जहाँ जहाँ; गिर:--शब्द; ता: ताः--अनेक, विविध; इति--इस प्रकार; विश्रुत-विक्रम:--जिसके वीरता के कार्यदूर-दूर तक विख्यात हों; श्रोष्यति--सुनेगा; आत्म-आश्रिता:--अपने विषय में; गाथा: --गीत, आख्यान; पृथु:--राजा पृथु;पृथु-पराक्रम:--स्पष्टतः शक्तिमान।
इस प्रकार जब इस राजा के वीरतापूर्ण कार्य जनता के समक्ष आ जाएँगे तो यह राजा अपनेविषय में तथा अपने अद्वितीय पराक्रमपूर्ण कार्यो के विषय में सदैव सुनेगा।
"
दिशो विजित्याप्रतिरुद्धचक्र:स्वतेजसोत्पाटितलोकशल्य: ।
सुरासुरेन्द्रैपगीयमान-महानुभावो भविता पतिर्भुव: ॥
२७॥
दिशः--सभी दिशाएँ; विजित्य--जीतकर; अप्रतिरुद्ध--बिना रोक के; चक्र:--प्रभाव या शक्ति; स्व-तेजसा-- अपने तेज से;उत्पाटित--उच्छेदित, निकाला हुआ; लोक-शल्य:--जनता के दुख; सुर--देवताओं का; असुर--असुरों का; इन्द्रै:--प्रमुखोंद्वारा; उपगीयमान--प्रशंसित होकर; महा-अनुभाव: --महा-पुरुष; भविता--होगा; पति:--स्वामी; भुव:ः--जगत का।
पृथु महाराज की आज्ञाओं का उल्लंघन कोई नहीं कर सकेगा।
सारे जगत को जीतकर वहनागरिकों के तीनों तापों को समूल नष्ट करेगा।
तब सारे जगत में उसको मान्यता प्राप्त होगी।
तबसुर तथा असुर दोनों उसके उदार कार्यों की निस्सन्देह प्रशंसा करेंगे।
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