← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची
अध्याय सत्रह: महाराज पृथु का पृथ्वी पर क्रोधित होना
4.17मैत्रेय उवाचएवं स भगवान्वैन्य: ख्यापितो गुणकर्मभि: ।
छन्दयामासतान्कामै: प्रतिपूज्याभिनन्द्य च ॥
१॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रय ने कहा; एवम्--इस प्रकार; सः--वह; भगवान्-- भगवान्; वैन्य: --राजा बेन के पुत्र रूप में;ख्यापित:--प्रशंसित; गुण-कर्मभि:--गुणों एवं वास्तविक कार्यो द्वारा; छन्दयाम् आस--प्रसन्न किया हुआ; तानू--उन गायकोंको; कामै: --विभिभन्न भेंटों द्वारा; प्रतिपूज्य--सम्मान प्रदान करके; अभिनन्द्य--प्रार्थना करके; च-- भी ।
मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा : इस प्रकार उन गायकों ने जो महाराज पृथु की महिमा का गायनकर रहे थे, उनके गुणों तथा बीरतापूर्ण कार्यों का वर्णन किया।
अन्त में महाराज पृथु नेसम्मानपूर्वक उन्हें अनेक भेंटें प्रदान कीं और उनकी यथेष्ट पूजा की।
"
ब्राह्मणप्रमुखान्वर्णान्भृत्यामात्यपुरोधस: ।
पौराज्जानपदान्श्रेणी: प्रकृती: समपूजयत् ॥
२॥
ब्राह्मण-प्रमुखान्ू--ब्राह्मण जाति के प्रधानों को; वर्णान्ू--अन्य जातियों को; भृत्य--नौकर; अमात्य--मंत्रीगण; पुरो धस: --पुरोहितों को; पौरानू--पुरवासियों को; जान-पदान्--देशवासियों को; श्रेणी:--विभिन्न जातियों को; प्रकृती:--प्रशंसकों को;समपूजयत्--उचित सत्कार किया।
इस प्रकार राजा पृथु ने ब्राह्मण तथा अन्य जातियों के समस्त नायकों, अपने नौकरों,मंत्रियों, पुरोहितों, नागरिकों, सामान्य देशवासियों, अन्य जाति के लोगों, प्रशंसकों तथा अन्योंको प्रसन्न किया और उनका सभी प्रकार से सम्मान किया।
इस प्रकार वे सभी अत्यन्त प्रसन्न होगये।
"
विदुर उवाचकस्माहधार गोरूपं धरित्री बहुरूपिणी ।
यां दुदोह पृथुस्तत्र को वत्सो दोहनं च किम् ॥
३॥
विदुरः उवाच--विदुर ने पूछा; कस्मात्-क्यों; दधार-- धारण किया; गो-रूपम्--गाय का स्वरूप; धरित्री--पृथ्वी ने; बहु-रूपिणी--अनेक रूपों वाली; याम्--जिसको; दुदोह--दुहा; पृथु:--राजा पृथु ने; तत्र--वहाँ; कः--कौन; वत्स:--बछड़ा;दोहनम्--दोहनी, दुहने का पात्र; च-- भी; किम्ू--क्या |
विदुर ने मैत्रेय ऋषि से पूछा : हे ब्राह्मण, जब धरती माता अनेक रूप धारण कर सकती है,तो फिर उसने गाय का ही रूप क्यों ग्रहण किया ? और जब राजा पृथु ने उसको दुहा तो कौनबछड़ा बना और दुहने का पात्र क्या था?"
प्रकृत्या विषमा देवी कृता तेन समा कथम् ।
तस्य मेध्यं हयं देव: कस्य हेतोरपाहरत् ॥
४॥
प्रकृत्या--स्वभाव से; विषमा--ऊँची-नीची; देवी-- पृथ्वी; कृता--किया गया; तेन--उसके द्वारा; समा--समतल; कथम्--कैसे; तस्य--उसका; मेध्यम्--यज्ञ में बलि के हेतु; हयम्--घोड़ा; देव:ः--इन्द्रदेव; कस्य--किस; हेतो:--लिए; अपाहरत्--चुरा लिया।
पृथ्वी की सतह स्वभावतः कहीं ऊँची है, तो कहीं नीची।
तो फिर राजा पृथु ने पृथ्वी कीसतह को कैसे समतल बनाया, और स्वर्ग के राजा इन्द्र ने यज्ञ के घोड़े को क्यों चुराया ?"
सनत्कुमाराद्धगवतो ब्रह्मन्ब्रह्मविदुत्तमात् ।
लब्ध्वा ज्ञानं सविज्ञानं राजर्षि: कां गतिं गतः ॥
५॥
सनतू-कुमारात्--सनत्कुमार से; भगवत:--परम शक्तिमान; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; ब्रह्म-वित्-उत्तमात्--वैदिक ज्ञान में दक्ष;लब्ध्वा-प्राप्त करके; ज्ञानम्--ज्ञान; स-विज्ञानमू--व्यावहारिक प्रयोग के लिए; राज-ऋषि:--परम साधु राजा ने; कामू--कौन सी; गतिमू--पद; गतः--प्राप्त किया |
महान् साधु राजा, महाराज पृथु, ने परम वैदिक विद्वान सनत्कुमार से ज्ञान प्राप्त किया।
अपने जीवन में इस ज्ञान को व्यवहत करने के लिए ज्ञान प्राप्त करके उस राजा ने इच्छित गंतव्यकिस प्रकार प्राप्त किया ?"
यच्चान्यद॒पि कृष्णस्थ भवान्भगवतः प्रभो: ।
श्रव: सुश्रवसः पुण्य पूर्वदेहकथा श्रयम् ॥
६॥
भक्ताय मेउनुरक्ताय तव चाधोक्षजस्य च ।
वक्तुमहसि योउदुह्ाद्वैन्यरूपेण गामिमाम् ॥
७॥
यत्--जो; च--तथा; अन्यत्ू--दूसरा; अपि--निश्चय ही; कृष्णस्य--कृष्ण का; भवान्ू--आप; भगवत:-- भगवान् का;प्रभो;--शक्तिशाली; श्रव:ः --महिमामय कार्य; सु-अ्रवस:--जो सुनने में अत्यन्त मधुर लगे; पुण्यम्--पतवित्र; पूर्व-देह-- अपनेपूर्व अवतार का; कथा-आश्रयम्--कथा से सम्बन्धित; भक्ताय--भक्त के लिए; मे--मुझको; अनुरक्ताय--अत्यन्त ध्यानमग्न;तव--तुम्हारा; च--तथा; अधोक्षजस्य-- भगवान् का जो अधोक्षज कहलाते हैं; च--और; वक्तुम् अहसि--सुनाएँ; यः--जिसने; अदुह्मत्--दुहा; वैन्य-रूपेण--राजा वेन के पुत्र रूप में; गामू--गाय रूपी पृथ्वी को; इमामू--इस
पृथु महाराज भगवान् कृष्ण की शक्तियों के शक्त्यावेश अवतार थे।
फलत: उनके कार्यों सेसम्बन्धित कोई भी कथा सुनने में ममभावन लगती है और कल्याणकर होती है।
मैं तो आपकातथा अधोक्षज भगवान् का भी भक्त हूँ।
अतः आप उन राजा पृथु की सभी कथाएँ सुनाएँजिन्होंने राजा बेन के पुत्र के रूप में गोरूप धरती का दोहन किया।
"
सूत उबाचचोदितो विदुरेणैवं वासुदेवकथां प्रति ।
प्रशस्य त॑ प्रीतमना मैत्रेय: प्रत्यभाषत ॥
८ ॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; चोदित:--प्रोत्साहित; विदुरेण --विदुर के द्वारा; एबम्ू--इस प्रकार; वासुदेव-- भगवान्कृष्ण की; कथाम्--कथा के; प्रति--विषय में; प्रशस्य-- प्रशंसा करके; तम्ू--उसको; प्रीत-मना:--अत्यधिक प्रसन्न होकर;मैत्रेय:--मैत्रेय ने; प्रत्मभाषत--उत्तर दिया।
सूत गोस्वामी ने आगे कहा : कि जब विदुर को भगवान् कृष्ण के विविध अवतारों केकार्यकलापों को सुनने की प्रेरणा प्राप्त हुईं तो मैत्रेय ने विदुर की प्रशंसा की क्योंकि वे स्वयंउनसे प्रोत्साहित और अत्यधिक प्रसन्न थे।
तब मैत्रेय ने इस प्रकार कहा।
"
मैत्रेय उवाचयदाभिषिक्त: पृथुरड् विप्रै-रामन्त्रितो जनतायाश्व पाल: ।
प्रजा निरत्ने क्षितिपृष्ठ एत्यक्षुक्षामदेहा: पतिमभ्यवोचन् ॥
९॥
मैत्रेय: उबाच--मैत्रेय ऋषि ने कहा; यदा--जब; अभिषिक्त: --गद्दी पर बिठा दिये गये; पृथु;--राजा पृथु; अड्भ--हे विदुर;विप्रै:--ब्राह्मणों के द्वारा; आमन्त्रित:--घोषित; जनताया: -- प्रजा का; च-- भी; पाल:--रक्षक; प्रजा:--नागरिक; निरतन्ने--बिना अन्न के; क्षिति-पृष्ठे--पृथ्वी की सतह पर; एत्य--पास आकर; क्षुत्-- भूख से; क्षाम--दुर्बल; देहा:--उनके शरीर;पतिम्ू--रक्षक से; अभ्यवोचन्--कहा।
मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, जब ब्राह्मणों तथा ऋषियों ने राजा पृथु को राजसिंहासन परबिठाया दिया तथा उन्हें नागरिकों का रक्षक घोषित किया तो उस समय अन्न का अभाव था।
नागरिक भूख के मारे सूख कर काँटा हो गये थे, अतः वे राजा के समक्ष आये और उन्हें अपनीवास्तविक स्थिति कह सुनाई।
"
बयं राजज्जाठरेणाभितप्तायथाग्निना कोटरस्थेन वृक्षा: ।
त्वामद्य याता: शरणं शरण्यंयः साधितो वृत्तिकरः पतिर्न; ॥
१०॥
तन्नो भवानीहतु रातवेउन्नंक्षुधार्दितानां नरदेवदेव ।
यावन्न नद्क्ष्यामह उज्झितोर्जावार्तापतिस्त्वं किल लोकपाल: ॥
११॥
वयम्--हम; राजन्--हे राजा; जाठरेण-- भूख की ज्वाला से; अभितप्ता:--अत्यन्त त्रस्त; यथा--जिस प्रकार; अग्निना--आगसे; कोटर-स्थेन--पेड़ के कोटर में; वृक्षा:--वृक्ष; त्वामू--तुम तक; अद्य--आज; याताः:--हम आये हैं; शरणम्--शरण;शरण्यम्--शरण लेने के योग्य; य:--जो; साधित:ः--नियुक्त; वृत्ति-करः--रोजगार देने वाला; पति: --स्वामी; न:--हमारे;तत्--अतः; न:--हमको; भवान्ू--आप; ईहतु-- प्रयत्त करो; रातवे--देने के लिए; अन्नम्--अनाज; क्षुधा-- भूख से;अर्दितानाम्ू-कष्ट भोगते हुए; नर-देव-देव--हे समस्त राजाओं के परम स्वामी; यावत् न--जब तक नहीं; नड्छ्ष्यामहे --हम मरजाएंगे; उज्झित--विहीन; ऊर्जा: --अन्न; वार्ता--व्यवसाय का; पति:--देनेवाला; त्वम्ू--तुम; किल--निस्सन्देह; लोक-पाल:--जनता के रक्षक
हे राजन, जिस प्रकार वृक्ष के कोटर में लगी आग वृक्ष को धीरे-धीरे सुखा देती है, उसीप्रकार हम जठराग्नि ( भूख ) से सूख रहे हैं।
आप शरणागत जीवों के रक्षक हैं और आप हमेंवृत्ति ( जीविका ) देने के लिए नियुक्त हुए हैं।
अतः हम सभी आपके संरक्षण में आये हैं।
आपकेवल राजा ही नहीं हैं, आप भगवान् के अवतार भी हैं।
वास्तविक रूप में आप राजाओं केराजा हैं।
आप हमें सभी प्रकार की जीविकाएँ प्रदान कर सकते हैं, क्योंकि आप हमारी जीविकाके स्वामी हैं।
अतः हे राजराजेश्वर, उचित अन्न वितरण के द्वारा हमारी भूख को शान्त करने कीव्यवस्था कीजिये।
आप हमारी रक्षा करें जिससे हम अन्न के अभाव से मरें नहीं।
तत्काल उपाय करे।
"
मैत्रेय उवाचपृथु: प्रजानां करुणं निशम्य परिदेवितम् ।
दीर्घ दध्यौ कुरु श्रेष्ठ निमित्तं सोउन्वपद्यत ॥
१२॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; पृथु:--राजा पृथु; प्रजानामू--नागरिकों की; करुणम्ू--दयनीय स्थिति; निशम्य--सुनकर;परिदेवितम्--विलाप; दीर्घम्--दीर्घकाल तक; दध्यौ--विचार किया; कुरु- श्रेष्ठ --हे विदुर; निमित्तमू--कारण; सः --उसने;अन्वपद्यत--ढूँढ लिया |
नागरिकों के इस शोकालाप को सुनकर तथा उनकी दयनीय स्थिति देखकर राजा नेदीर्घकाल तक इस विषय पर विचार किया कि क्या वह मूलभूत कारणों को खोज सकता है ?"
इति व्यवसितो बुद्धय्या प्रगृहीतशरासन: ।
सन्दधे विशिखं भूमे: क्रुद्धस्त्रिपुह्ह यथा ॥
१३॥
इति--इस प्रकार; व्यवसितः--निष्कर्ष पर पहुँच कर; बुद्धया--बुद्धि से; प्रगृहीत-- धारण किये हुए; शरासन:-- धनुष;सन्दधे--चढ़ाया; विशिखम्--बाण; भूमेः--पृथ्वी पर; क्रुद्ध:--क्रोध से पूर्ण; त्रि-पुर-हा--शिवजी; यथा--मानो |
ऐसा निश्चय करके, राजा ने अपना धनुष-बाण उठाया और उन्हें पृथ्वी की ओर उसी प्रकारलक्षित किया जिस प्रकार शिवजी क्रोध से सारे जगत का विनाश कर देते हैं।
"
प्रवेषमाना धरणी निशाम्योदायुधं च तम् ।
गौः सत्यपाद्रवद्धीता मृगीव मृगयुद्रुता ॥
१४॥
प्रवेषमाना--काँपते हुए; धरणी--पृथ्वी; निशाम्य--देखकर; उदायुधम्-- धनुष-बाण लेकर; च-- भी; तम्ू--राजा को; गौ: --गाय; सती--बन कर; अपाद्रवत्-- भागने लगी; भीता--अत्यधिक डरी हुईं; मृगी इब--हिरनी के समान; मृगयु--शिकारीद्वारा; द्रता--पीछा की गई |
जब पृथ्वी ने देखा कि राजा पृथु उसे मारने के लिए धनुष-बाण धारण कर रहे हैं, तो वहभय के मारे काँपने लगी।
उसके बाद वह उसी प्रकार भागी जिस प्रकार शिकारी द्वारा पीछाकिये जाने पर हिरनी तेजी से भागती है।
राजा के भय से पृथ्वी ने गाय का रूप धारण कर लियाऔर भागने लगी।
"
तामन्वधावत्तद्वैन्य: कुपितोत्यरुणेक्षण: ।
शरं धनुषि सन्धाय यत्र यत्र पलायते ॥
१५॥
तामू--गोरूप पृथ्वी का; अन्वधावत्--पीछा किया; तत्--तब; वैन्य:--राजा बेन के पुत्र ने; कुपित:--अत्यन्त क्रुद्ध होकर;अति-अरुण--अत्यन्त लाल-लाल; ईक्षण:--आँखें ; शरम्--तीर; धनुषि-- धनुष पर; सन्धाय--रखकर; यत्र यत्र--जहाँ-जहाँ;पलायते--वह भागती |
यह देखकर महाराज पृथु अत्यन्त क्रुद्ध हुए और उनकी आँखें प्रातःकालीन सूर्य की भाँतिलाल-लाल हो गईं।
अपने धनुष पर बाण चढ़ाये वे जहाँ-जहाँ गोरूप पृथ्वी दौड़कर जाती,वहीं-वहीं उसका पीछा करते रहे।
"
सा दिशो विदिशो देवी रोदसी चान्तरं तयो: ।
धावन्ती तत्र तत्रैनं ददर्शानूद्यतायुधम् ॥
१६॥
सा--वह गोरूप पृथ्वी; दिश:--चारों दिशाओं में; विदिश:--इधर-उधर; देवी--देवी; रोदसी-- आकाश तथा पृथ्वी की ओर;च--भी; अन्तरम्ू--मध्य में; तयो:--उनके; धावन्ती--दौड़ती हुई; तत्र तत्र--जहाँ-जहाँ; एनम्ू--राजा को; ददर्श--देखा;अनु--पीछे; उद्यत--ग्रहण किये; आयुधम्-- अपने हथियार।
गोरूप पृथ्वी स्वर्ग तथा पृथ्वी के बीच अन्तरिक्ष में इधर-उधर दौड़ने लगी और जहाँ भी वहजाती, राजा अपना धनुष-बाण लिए उसका पीछा करते रहे।
"
लोके नाविन्दत त्राणं वैन्यान्मृत्योरिव प्रजा: ।
त्रस्ता तदा निववृते हृदयेन विदूयता ॥
१७॥
लोके--तीनों लोकों में; न--नहीं; अविन्दत--प्राप्त करा सका; त्राणम्ू-- मुक्ति; वैन्यात्-राजा वेन के पुत्र के हाथों से;मृत्यो: --मृत्यु से; इब--सद्श; प्रजा: --लोग; त्रस्ता--अत्यन्त भयभीत; तदा--उस काल; निववृते--पीछे मुड़ी; हृदयेन--अपने हृदय में; विदूयता--अत्यन्त दुखित |
जिस प्रकार मनुष्य मृत्यु के क्रूर हाथों से नहीं बच सकता, उसी प्रकार गोरूप पृथ्वी वेन केपुत्र से नहीं बच सकी।
अन्त में पृथ्वी भयभीत होकर और दुखित हृदय से असहायावस्था में पीछेकी ओर मुड़ी।
"
उबाच च महाभागं धर्मज्ञापन्नवत्सल ॥
त्राहि मामपि भूतानां पालनेवस्थितो भवान् ॥
१८॥
उबाच--उसने कहा; च--तथा; महा-भागम्--महान् भाग्यशाली राजा के प्रति; धर्म-ज्ञ-हे धर्म के नियमों के ज्ञाता; आपन्न-बत्सल--हे शरणागत के शरण; त्राहि--बचाओ; माम्--मुझको; अपि--निस्सन्देह; भूतानामू--जीवात्माओं के; पालने--संरक्षण में; अवस्थित:--स्थित; भवान्ू--आप।
परम ऐश्वर्यवान् राजा पृथु को धर्म के ज्ञाता तथा शरणागतों के आश्रय के रूप में सम्बोधितकरते हुए उसने कहा--कृपया मुझे बचाइये।
आप समस्त जीवात्माओं के रक्षक हैं।
अब आपइस लोक के राजा के रूप में पदस्थ हैं।
"
स त्वं जिघांससे कस्माद्दीनगामकृतकिल्बिषाम् ।
अहनिष्यत्कथं योषां धर्मज्ञ इति यो मतः ॥
१९॥
सः--वही व्यक्ति; त्वमू--तुम; जिघांससे--मारना चाहते हो; कस्मात्--क्यों; दीनामू--दीना को; अकृत--निरपराध, बिनाकुछ किये; किल्बिषाम्ू--कोई पापमय कर्म; अहनिष्यत्--मारोगे; कथम्--कैसे; योषाम्--स्त्री को; धर्म-ज्ञ:--धर्म कोजाननेवाला; इति--इस प्रकार; यः--जो; मतः--माना जाता है।
गोरूप पृथ्वी राजा से अनुनय-विनय करती रही--मैं अत्यन्त दीन हूँ और मैंने कोई पापकर्मनहीं किया।
तो फिर आप मुझे क्यों मारना चाहते हैं ? आप धर्म के नियमों को जाननेवाले हैं, तोफिर आप क्यों मुझसे द्वेष रख रहे हैं और क्यों एक स्त्री को मारने के लिए इस प्रकार उद्यत हैं?"
प्रहरन्ति न बै स्त्रीषु कृताग:स्वषि जन्तव: ।
किमुत त्वद्विधा राजन्करुणा दीनवत्सला: ॥
२०॥
प्रहरन्ति--मारते हैं; न--नहीं; बै--निश्चय ही; स्त्रीषु--स्त्रियों को; कृत-आगःसु--पापकर्म करने पर; अपि--यद्यपि;जन्तव:--मानव प्राणी; किम् उत--फिर क्या कहा जाये; त्वत्-विधा:--तुम्हारे समान महापुरुष; राजन्ू--हे राजा; करुणा: --दयालु; दीन-वत्सला:--दीनों के प्रति स्नेहिल |
यदि स्त्री कोई पापकर्म भी करे तो मनुष्य को उस पर हाथ नहीं उठाना चाहिए।
हे राजन,आप तो इतने दयालु हैं कि आपके विषय में क्या कहा जाये ? आप रक्षक हैं और दीनवत्सल हैं।
"
मां विपाट्याजरां नावं यत्र विश्व॑ं प्रतिष्ठितम् ।
आत्मानं च प्रजाश्रेमा: कथमम्भसि धास्यसि ॥
२१॥
माम्-- मुझको; विपाट्य--खण्ड-खण्ड करके; अजराम्--अत्यन्त बढ़; नावम्--नाव; यत्र--जहाँ; विश्वम्--समस्त संसार कीसामग्री; प्रतिष्ठितम्--खड़ी हुई; आत्मानमू--अपने आपको; च--तथा; प्रजा:--अपनी प्रजा; च--भी; इमा:--ये सारे;कथम्--कैसे; अम्भसि--जल में; धास्यसि-- धारण करोगेगोरूप
पृथ्वी ने आगे कहा : हे राजन, मैं एक सुदृढ़ नाव के तुल्य हूँ और समस्त संसार कीसारी सामग्री मुझी पर टिकी है।
यदि आप मुझे छिन्न कर देंगे तो फिर आप अपने को तथा अपनीप्रजा को डूबने से किस प्रकार बचा पायेंगे ?पृथुरुवाचवसुधे त्वां वधिष्यामि मच्छासनपराड्मुखीम् ।
"
भागं बर्हिषि या वृड्डे न तनोति च नो वसु ॥
२२॥
पृथु: उबाच--पृथु ने उत्तर दिया; वसु-धे--हे पृथ्वी; त्वामू--तुमको; वधिष्यामि--मार डालूँगा; मत्--मेरा; शासन-- आदेश;पराक्-मुखीम्--अवज्ञा करके; भागम्--अपना अंश; बर्हिषि--यज्ञ में; या--जो; वृड्डे --स्वीकार करती है; न--नहीं;तनोति--देती है; च--तथा; नः--हमको; वसु--उपज |
राजा पृथु ने पृथ्वी को उत्तर दिया: हे पृथ्वी, तुमने मेरी आज्ञा तथा नियमों का उल्लंघनकिया है।
तुमने हमारे द्वारा सम्पन्न यज्ञों में देवता के रूप में अपना अंश ग्रहण किया है, किन्तुबदले में पर्याप्त अन्न नहीं उत्पन्न किया।
इस कारण मैं तुम्हारा वध कर दूँगा।
"
यवसं जग्ध्यनुदिनं नैव दोग्ध्यौधसं पय: ।
तस्यामेवं हि दुष्टायां दण्डो नात्र न शस्यते ॥
२३॥
यवसम्--हरी घास; जग्धि--चरती हो; अनुदिनम्-- प्रतिदिन; न--कभी नहीं; एव--निश्चय ही; दोग्धि--देती हो; औधसम्--थन में; पय:--दूध; तस्यामू--जब एक गाय; एवम्--इस प्रकार; हि--निश्चय ही; दुष्टायामू--अपराधी होकर; दण्ड:--दण्ड,सजा; न--नहीं; अन्र--यहाँ; न--नहीं; शस्यते--उचित |
यद्यपि तुम नित्य ही हरी घास चरती हो, किन्तु तुम हमारे उपयोग के लिए अपने थन को दूधसे भरती नहीं हो।
चूँकि तुम जान-बूझ कर अपराध कर रही हो, अतः तुम्हारे द्वारा गाय का रूपधारण करने के कारण तुम्हें दण्ड देना अनुचित नहीं कहा जा सकता।
"
त्वं खल्वोषधिबीजानि प्राक्सृष्टानि स्वयम्भुवा ।
न मुझस्यात्मरुद्धानि मामवज्ञाय मन्दधी: ॥
२४॥
त्वमू--तुम; खलु--निश्चय ही; ओषधि--जड़ी-बूटियों तथा अन्नों के; बीजानि--बीज; प्राक् --पूर्वकाल में; सृष्टानि--उत्पन्न;स्वयम्भुवा--ब्रह्मा द्वारा; न--नहीं; मुझ्लसि--देती हो; आत्म-रुद्धानि-- अपने भीतर छिपाये हुए; माम्--मुझको; अवज्ञाय--आज्ञा का पालन न करके; मन्द-धी:--अल्प बुद्धि वाली |
तुमने इस तरह अपनी बुद्धि गँवा दी है कि मेरी आज्ञा के होते हुए भी तुम जड़ी-बूटियों तथाअन्नों के बीज नहीं दे रही हो, जिन्हें पूर्वकाल में ब्रह्मा ने उत्पन्न किया था और जो तुम्हारे भीतरछिपे हुए हैं।
"
अमूषा क्षुत्परीतानामार्तानां परिदेवितम् ।
शमयिष्यामि मद्ठाणैर्भिन्नायास्तव मेदसा ॥
२५॥
अमूषाम्--उन सबों का; क्षुत्ू-परीतानाम्-- भूख से पीड़ितों का; आर्तानाम्-दुखियों का; परिदेवितम्--क्रन्दन, विलाप;शमयिष्यामि--शमन करूँगा; मत्-बाणै:--मेरे बाणों से; भिन्नाया:--खण्ड-खण्ड करके ; तब--तुम्हारे; मेदसा--मांस से ॥
अब मैं अपने बाणों से तुम्हारा खण्ड-खण्ड कर दूँगा और तुम्हारे मांस से श्लुधार्त नागरिकोंको, जो अन्न के अभाव में त्राहि-त्राहि कर रहे हैं, सन्तुष्ट करूँगा।
इस प्रकार मैं अपने राज्य कीप्रजा का बिलखना दूर करूँगा।
"
पुमान्योषिदुत क्लीब आत्मसम्भावनोधम: ।
भूतेषु निरनुक्रोशो नृपाणां तद्धधोडबध: ॥
२६॥
पुमान्ू--पुरुष; योषित्--स्त्री; उत-- भी; क्लीब: --नपुंसक; आत्म-सम्भावन: -- अपने ही पोषण ही रुचि रखनेवाला;अधम:--नीच; भूतेषु--अन्य जीवात्माओं को; निरनुक्रोश:--बिना दया के, निर्दय; नृपाणाम्ू--राजाओं के लिए; तत्--उसका; वध:--वध करना, मारना; अवध:--न मारने के समान।
ऐसा कोई भी क्रूर व्यक्ति--चाहे वह पुरुष, स्त्री या नपुंसक हो--जो अपनी निजी भरण-पोषण में ही रूचि रखता है और दूसरे जीवों पर दया नहीं दिखाता, राजा द्वारा वध्य है।
ऐसा वधकभी भी वास्तविक वध नहीं माना जाता।
"
त्वां स्तब्धां दुर्मदां नीत्वा मायागां तिलशः शरैः ।
आत्मयोगबलेनेमा धारयिष्याम्यहं प्रजा: ॥
२७॥
त्वामू--तुम; स्तब्धाम्--अत्यन्त गर्वीली; दुर्मदाम्--उन्मत्त; नीत्वा--ऐसी दशा में ले जाकर; माया-गाम्--छद्म गाय;तिलश:--खण्ड-खण्ड; शरैः--अपने बाणों से; आत्म-- अपने; योग-बलेन--योगशक्ति से; इमाः--ये सब; धारयिष्यामि--धारण करूँगा; अहम्--मैं; प्रजाः:--सभी नागरिक या जीवात्माएँ।
तुम गर्व से अत्यन्त फूली हुई हो और प्रायः उन््मत सी हो गई हो।
इस समय तुमने अपनीयोगशक्ति से गाय का रूप धारण कर रखा है, तो भी मैं तुम्हें अनाज की दानों की भाँन्तिखण्ड-खण्ड कर दूँगा और अपने योग-बल से सारी जनता को धारण करूँगा।
"
एवं मन्युमयीं मूर्ति कृतान्तमिव बिश्रतम् ।
प्रणता प्राज्जलि: प्राह मही सञ्जातवेपथु; ॥
२८ ॥
एवम्--इस प्रकार; मन्यु-मयीम्--अत्यधिक क्रुद्ध; मूर्तिमू--रूप; कृत-अन्तम्--साक्षात् काल ( मृत्यु ), यमराज; इब--सहश;बिभ्रतम्--से युक्त; प्रणता--शरणागत; प्राज्ललि:--हाथ जोड़े; प्राह--कहा; मही--पृथ्वी ने; सज्ञात--उत्पन्न; वेपथु:--कम्पन।
इस समय पृथु महाराज ठीक यमराज जैसे बन गये और उनका सारा शरीर अत्यन्त क्रोधितप्रतीत होने लगा।
दूसरे शब्दों में, वे साक्षात् क्रोध लग रहे थे।
उनके शब्द सुनकर पृथ्वी काँपनेलगी।
उसने आत्म-समर्पण कर दिया और हाथ जोड़ कर इस प्रकार कहने लगी।
"
धरोवाचनमः परस्मै पुरुषाय माययाविन्यस्तनानातनवे गुणात्मने ।
नमः स्वरूपानुभवेन निर्धुत-द्रव्यक्रियाकारकविश्रमोर्मये ॥
२९॥
धरा--पृथ्वी; उवाच--बोली; नम:--मैं नमस्कार करती हूँ; परस्मै--सत्त्व को; पुरुषाय--पुरुष को; मायया--माया से;विन्यस्त--विस्तारित; नाना-- अनेक; तनवे--जिसके रूप; गुण-आत्मने--तीनों गुणों के स्त्रोत को; नम:--नमस्कार करती हूँ;स्वरूप--वास्तविक रूप का; अनुभवेन--समझ कर; निर्धुत-- अप्रभावित; द्र॒व्य--पदार्थ; क्रिया--कर्म; कारक--कर्ता;विभ्रम--मोह; ऊर्मये-- भवसागर की तरंगें।
पृथ्वी ने कहा : हे भगवन्, आपकी स्थिति दिव्य है और आपने अपनी माया के द्वारा तीनोंगुणों की अन्योन्य क्रिया से स्वयं को नाना रूपों तथा योनियों में विस्तारित कर रखा है।
अन्यकुछ स्वामियों से भिन्न आप सदैव दिव्य स्थिति में रहते हैं और भौतिक सृष्टि द्वारा प्रभावित नहींहोते जो विभिन्न भौतिक अन्योन्य क्रियाओं से प्रभावित है।
फलतः आप भौतिक कर्मों सेमोहग्रस्त नहीं होते।
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येनाहमात्मायतनं विनिर्मिताधात्रा यतोयं गुणसर्गसड्ग्रह: ।
स एव मां हन्तुमुदायुधः स्वरा-डुपस्थितोन्यं शरणं कमाश्रये ॥
३०॥
येन--जिसके द्वारा; अहम्--मैं; आत्म-आयतनम्--समस्त जीवात्माओं का आश्रय; विनिर्मिता--बनाया गया; धात्रा--परमे श्वरद्वारा; यतः--कारण; अयम्--यह; गुण-सर्ग-सड्ग्रह:--विभिन्न भौतिक तत्त्वों का मेल; सः--वह; एव--निश्चय ही; माम्--मुझको; हन्तुमू--मारने के लिए; उदायुध:--हथियार सहित उद्यत; स्वराट्--पूर्णतया स्वतंत्र; उपस्थित:--मेरे समक्ष उपस्थित;अन्यमू-- अन्य; शरणम्--शरण; कम्--किसकी; आश्रये--शरण में जाऊँपृथ्वी ने आगे कहा : हे भगवन्ू, आप भौतिक सृष्टि के पूर्ण संचालक हैं।
आपने इस दृश्यजगत की तथा तीन गुणों की उत्पत्ति की है, अत: आपने मुझ पृथ्वी को बनाया है, जो समस्तजीवात्माओं की आश्रय है।
फिर भी हे भगवन्, आप परम स्वतंत्र हैं।
अब जबकि चूँकि आप मेरेसमक्ष उपस्थित होकर मुझे अपने हथियारों से मारने के लिए उद्यत हैं, आप मुझे बताएँ कि मैंकिसकी शरण गहूँ और मुझे शरण दे भी कौन सकता है?"
य एतदादावसूजच्चराचरंस्वमाययात्माश्रययावितर्क्यया ।
तयैव सोयं किल गोप्तुमुद्यतःकथ॑ नु मां धर्मपरो जिघांसति ॥
३१॥
यः--जो; एतत्--ये; आदौ--सृष्टि के आरम्भ में; असृजत्--उत्पन्न किया; चर-अचरम्--जड़ तथा जंगम जीव; स्व-मायया--अपनी शक्ति से; आत्म-आश्रयया--अपने ही आश्रय में शरण प्राप्त; अवितर्क्यया--अकल्पनीय; तया--उसी माया से; एव--निश्चय ही; सः--वह; अयम्--यह राजा; किल--निश्चय ही; गोप्तुम् उद्यतः--शरण देने के लिए तैयार; कथम्--कैसे; नु--तब; मामू-- मुझको; धर्म-परः--धर्मपालक; जिघांसति--मारने की इच्छा करता है |
आपने सृष्टि के प्रारम्भ में अपनी अकल्पनीय शक्ति से इन समस्त जड़ तथा चेतन जीवों कोउत्पन्न किया है।
अब आप उसी शक्ति से जीवात्माओं की रक्षा करने के लिए उद्यत हैं।
आप धर्मके नियमों के परम रक्षक हैं।
आप मुझ गोरूप को मारने के लिए इतने उत्सुक क्यों हैं?"
नूनं बतेशस्य समीहितं जनै-स्तन्मायया दुर्जययाकृतात्मभि: ।
न लक्ष्यते यस्त्वकरोदकारयदू-योउनेक एक: परतश्च ईश्वर: ॥
३२॥
नूनमू--अवश्य ही; बत--निश्चय ही; ईशस्य-- भगवान् का; समीहितम्--कार्य, योजना; जनैः--मनुष्यों द्वारा; तत्ू-मायया--उनकी शक्ति से; दुर्जयया--जो दुर्जय है; अकृत-आत्मभि: --जो अधिक अनुभवी नहीं हैं; न--कभी नहीं; लक्ष्यते--देखे जातेहैं; यः--जो; तु--तब; अकरोत्-- उत्पन्न किया; अकारयत्--उत्पन्न कराया; यः--जो; अनेक:--कई; एकः--एक; परत:--अकल्पनीय शक्ति से; च--तथा; ईंश्वरः --नियन्ता |
हे भगवन्, यद्यपि आप एक हैं, तो भी अपनी अकल्पनीय शक्तियों से आपने अपने कोअनेक रूपों में विस्तारित कर रखा है।
आपने इस ब्रह्माण्ड की रचना ब्रह्मा के माध्यम से की है।
अतः आप प्रत्यक्षतः पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।
जो लोग अधिक अनुभवी नहीं हैं, वे आपकेदिव्य कार्यो को नहीं समझ सकते क्योंकि वे व्यक्ति आपकी माया से आवृत हैं।
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सर्गादि यो<स्यानुरुणद्ध्धि शक्तिभि-दरव्यक्रियाकारकचेतनात्मभि: ।
तस्मै समुन्नद्धनिरुद्धशक्तयेनमः परस्मै पुरुषाय वेधसे ॥
३३॥
सर्ग-आदि--उत्पत्ति, पालन तथा संहार; यः--जो; अस्य--इस भौतिक जगत का; अनुरुणर्द्धि--उत्पन्न करता है; शक्तिभि:--अपनी ही शक्ति से; द्रव्य-- भौतिक तत्त्व; क्रिया--इन्द्रियाँ; कारक--नियामक देवता; चेतना--बुद्धधि; आत्मभि:--अहंकार से;तस्मै--उसको; समुन्नद्ध--प्रकट; निरुद्ध-- अवरुद्ध, छिपी; शक्तये--इन शक्तियों का स्वामी; नमः--नमस्कार; परस्मै--दिव्य; पुरुषाय-- भगवान् को; वेधसे--समस्त कारणों के कारण।
हे भगवन्, आप अपनी शक्तियों द्वारा भौतिक तत्त्वों, इन्द्रियों, इनके नियामक देवों, बुद्धि,अहंकार तथा प्रत्येक वस्तु के आदि कारण हैं।
अपनी शक्ति से आप इस सम्पूर्ण हश्य जगत कीसृष्टि, पालन और संहार करते हैं।
आपकी ही शक्ति से प्रत्येक वस्तु कभी प्रकट होती है औरकभी प्रकट नहीं होती है।
अतः आप समस्त कारणों के कारण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।
मैं आपकोसादर नमस्कार करती हूँ।
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सब भवानात्मविनिर्मितं जगद्भूतेन्द्रियान््तःकरणात्मक॑ विभो ।
संस्थापयिष्यन्नज मां रसातला-दश्युजहाराम्भस आदिसूकरः ॥
३४॥
सः--वह; बै--निश्चय ही; भवान्--स्वयं; आत्म--अपने से; विनिर्मितम्ू--निर्मित; जगत्--जगत; भूत-- भौतिक तत्त्व;इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; अन्तः-करण--मन, हृदय; आत्मकम्--से बना; विभो--हे स्वामी; संस्थापयिष्यन्ू--पालन करते हुए;अज--हे अजन्मा; माम्--मुझको; रसातलात्ू--रसातल नामक अधो लोक से; अभ्युजहार--बाहर निकाला; अम्भस:--जलसे; आदि--प्रारम्भिक; सूकर:--वराह |
हे भगवन्, आप अजन्मा हैं।
एक बार आपने आदि सूकर ( वराह ) रूप में मुझे ब्रह्माण्ड केनीचे के जल से बाहर निकाला था।
आपने संसार के पालन हेतु अपनी शक्ति से सभी भौतिकतत्त्वों, इन्द्रियों तथा मन की उत्पत्ति की है।
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अपामुपस्थे मयि नाव्यवस्थिता:प्रजा भवानद्य रिरक्षिषु;: किल ।
स वीरमूर्ति: समभूद्धराधरोयो मां पयस्युग्रशरो जिघांससि ॥
३५॥
अपाम्--जल की; उपस्थे--सतह पर स्थित; मयि--मुझमें; नावि--नाव में; अवस्थिता:--खड़े हुए; प्रजा:--जीवात्माएँ;भवान्--आप; अद्य--जब; रिरक्षिषु:--रक्षा करने के इच्छुक; किल--निस्सन्देह; सः--वह; वीर-मूर्ति:--परम वीर के रूप में;समभूत्--हो गया; धरा-धर:--पृथ्वीलोक का रक्षक; यः--जो; मामू--मुझको; पयसि--दूध के लिए; उग्र-शरः--तीखेबाणों से; जिघांससि--मारना चाहते हो।
हे भगवन्, इस प्रकार आपने एक बार जल-राशि से मेरा उद्धार किया, जिससे आपका नामधराधर, अर्थात् पृथ्वी को धारण करनेवाला पड़ा।
तो भी आप इस समय, महान् वीर के रूप मेंअपने तीखे बाणों से मुझे मारने के लिए उद्यत हैं।
किन्तु मैं तो जल की नाव के सहृश हूँ जोप्रत्येक वस्तु को तैराये रखती है।
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नूनं जनैरीहितमी श्वराणा-अस्मद्विथेस्तद्गुणसर्गमायया ।
न ज्ञायते मोहितचित्तवर्त्मभि-स्तेभ्यो नमो वीरयशस्करेभ्य: ॥
३६॥
नूनम्--निस्सन्देह; जनैः--जनता द्वारा; ईहितमू--कार्यकलाप, गतिविधियाँ; ईश्वराणाम्--नियन्ताओं के; अस्मत्-विधैः --मेरेसहश; तत्-- भगवान् के; गुण-- भौतिक प्रकृति के गुणों का; सर्ग--सृष्टि करनेवाली; मायया--अपनी शक्ति से; न--कभीनहीं; ज्ञायते--समझे जाते हैं; मोहित--मोहग्रस्त; चित्त--जिनके मन; वर्त्मभि:--रास्ता; तेभ्य:--उनको; नम:--नमस्कार;वीर-यशः-करेभ्य:--जो वीरों को भी ख्याति प्रदान करता है।
हे भगवन्, मैं भी आपकी त्रिगुणात्मक शक्ति से उत्पन्न हूँ, फलतः मैं आपकी गतिविधियों सेभ्रमित हूँ।
जब आपके भक्तों के कार्यकलाप समझ के परे हैं, तो फिर आपकी लीलाओं केविषय में क्या कहा जाये ? इस प्रकार प्रत्येक वस्तु हमें विरोधाभासी और आश्चर्यजनक लगती है।
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