← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची
अध्याय उन्नीस: राजा पृथु का एक सौ घोड़ों का बलिदान
4.19मेत्रेय उवाचअथादीक्षत राजा तु हयमेधशतेन सः ।
ब्रह्मावर्ते मनोः क्षेत्रे यत्र प्राची सरस्वती ॥
१॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; अथ--तत्पश्चात्; अदीक्षत--शुरू किया; राजा--राजा ने; तु--तब; हय--घोड़ा, अश्व; मेध--यज्ञ; शतेन--एक सौ सम्पन्न करने के लिए; सः--वह; ब्रह्मावर्ते--ब्रह्मावर्त नाम से विख्यात; मनो:--स्वायंभुव मनु के; क्षेत्रे--भूभाग में; यत्र--जहाँ; प्राची --पूर्व की ओर; सरस्वती--सरस्वती नदी |
महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, राजा पृथु ने उस स्थान पर जहाँ सरस्वती नदी पूर्वमुखीहोकर बहती है, एक सौ अश्वमेध यज्ञ आरम्भ किए।
यह भूखण्ड ब्रह्मावर्त कहलाता है, जोस्वायंभुव मनु द्वारा शासित था।
"
'तदभिप्रेत्य भगवान्कर्मातिशयमात्मनः ॥
शतक्रतुर्न ममृषे पृथोर्यज्ञमहोत्सवम् ॥
२॥
तत् अभिप्रेत्य--यह विचार कर; भगवान्--परमशक्तिशाली; कर्म-अतिशयम्--सकाम कर्मो में बाजी मारनेवाला; आत्मन:--स्व; शत-क्रतु:--इन्द्र, जिसने एक सौ यज्ञ किये थे; न--नहीं; ममृषे--सहन कर सका; पृथो:--राजा पृथु का; यज्ञ-यज्ञ का;महा-उत्सवम्--महोत्सव |
जब स्वर्ग के राजा सर्वाधिक शक्तिशाली इन्द्र ने यह देखा तो उसने विचार किया कि सकामकर्मो में राजा पृथु उससे बाजी मारने जा रहा है।
अतः वह राजा पृथु द्वारा किये जा रहे यज्ञ-महोत्सव को सहन न कर सका।
"
यत्र यज्ञपतिः साक्षाद्धगवान्हरिरी श्वर: ।
अन्वभूयत सर्वात्मा सर्वलोकगुरु: प्रभु: ॥
३॥
यत्र-- जहाँ; यज्ञ-पति:--समस्त यज्ञों का भोक्ता; साक्षात्- प्रत्यक्ष; भगवान्-- भगवान्; हरिः--विष्णु ने; ईश्वर: --परमनियन्ता; अन्वभूयत--दर्शन दिया; सर्व-आत्मा-- प्रत्येक का परमात्मा; सर्व-लोक-गुरु:--समस्त लोकों का स्वामी अथवा हरएक का शिक्षक; प्रभुः--स्वामी |
भगवान् विष्णु हर प्राणी के हृदय में परमात्मा-रूप में स्थित हैं।
वे समस्त लोकों के स्वामीतथा समस्त यज्ञ-फलों के भोक्ता हैं।
वे राजा पृथु द्वारा किये गये यज्ञों में साक्षात् उपस्थित थे।
"
अन्वितो ब्रह्मशर्वाभ्यां लोकपालै: सहानुगैः ।
उपगीयमानो गयन्धर्वर्मुनिभिश्चाप्सरोगणै: ॥
४॥
अन्वित:--साथ में; ब्रह्म--ब्रह्मा द्वारा; शर्वाभ्यामू-- तथा शिव द्वारा; लोक-पालै:--विभिन्न लोकों के प्रधानों द्वारा; सहअनुगैः-- अपने-अपने अनुचरों के साथ; उपगीयमान:--प्रशंसित होकर; गन्धर्वैं:--गन्धर्वलोक के वासियों द्वारा; मुनिभि: --मुनियों द्वारा; च-- भी; अप्सर:ः-गणै:--अप्सरालोक के वासियों द्वारा
जब भगवान् विष्णु यज्ञस्थल में प्रकट हुए तो उनके साथ ब्रह्माजी, शिवजी तथा सभीलोकपाल एवं उनके अनुचर भी थे।
जब वे वहाँ प्रकट हुए तो गन्धर्वलोक-निवासियों, ऋषियोंतथा अप्सरा लोक के निवासियों सभी ने मिलकर प्रशंसा की।
"
सिद्धा विद्याधरा दैत्या दानवा गुह्मकादयः ।
सुनन्दनन्दप्रमुखा: पार्षदप्रवरा हरे: ॥
५॥
सिद्धा:--सिद्ध लोक के वासी; विद्याधरा:--विद्याधर लोक के वासी; दैत्या:--दिति के वंशज, दैत्य; दानवा:--असुर; गुह्क-आदय:ः --यक्ष इत्यादि; सुनन्द-नन्द-प्रमुखा: --सुनन्द तथा नन्द इत्यादि भगवान् के मुख्य पार्षद; पार्षद--पार्षद, सहयोगी;प्रवरा:--प्रतिष्ठित; हरेः -- भगवान् के
भगवान् के साथ में सिद्धलोक तथा विद्याधर लोक के वासी, दिति की समस्त सन्तानें,असुर तथा यक्षगण थे।
उनके साथ सुनन्द तथा नन्द इत्यादि उनके प्रमुख पार्षद भी थे।
"
कपिलो नारदो दत्तो योगेशा: सनकादय: ।
तमन्वीयुर्भागवता ये च तत्सेवनोत्सुका: ॥
६॥
कपिल:--कपिल मुनि; नारद: --नारद ऋषि; दत्त:--दत्तात्रेय; योग-ईशा:--योगशक्ति के स्वामी; सनक-आदय: --सनकइत्यादि; तम्-- भगवान् विष्णु; अन्बीयु:--पीछे-पीछे; भागवता:--परम भक्तजन; ये--सभी जो; च-- भी; ततू-सेवन-उत्सुका:--भगवान् की सेवा के लिए सदैव उत्सुक रहने वाले।
भगवान् विष्णु के साथ भगवान् की सेवा में सदैव लगे रहनेवाले परम भक्तगण अर्थात्कपिल, नारद तथा द्त्तात्रेय नामक ऋषि और साथ ही साथ सनत्कुमार इत्यादि योगेश्वर उस यज्ञमें सम्मिलित हुए।
"
यत्र धर्मदुघा भूमि: सर्वकामदुघा सती ।
दोग्धि स्माभीप्सितानर्थान््यजमानस्यथ भारत ॥
७॥
यत्र--जहाँ; धर्म-दुघा--धर्म हेतु प्रचुर दूध को उत्पन्न करनेवाली; भूमि: --पृथ्वी; सर्व-काम--समस्त इच्छाएँ; दुघा--दूध रूपमें प्रदान करनेवाली; सती--गाय; दोग्धि स्म-- पूर्ण किया; अभीप्सितान्ू--इच्छाओं को; अर्थान्--वस्तुएँ; यजमानस्थ--यज्ञकर्ता के; भारत--हे विदुर
हे बिदुर, उस महान् यज्ञ में सारी भूमि दूध देनेवाली कामधेनु बन गई और इस प्रकार यज्ञसम्पन्न करने से जीवन की समस्त आवश्यकताएँ पूरी होने लगीं।
"
ऊहुः सर्वरसान्नद्यः क्षीरदध्यन्नगोरसान् ।
तरवो भूरिवर्ष्पाण: प्रासूयन्त मधुच्युत: ॥
८॥
ऊहुः--लाती थी; सर्व-रसान्ू--सभी प्रकार के स्वाद; नद्यः--नदियाँ; क्षीर--दूध; दधि--दही; अन्न--तरह-तरह के अनाज;गो-रसान्--अन्य दूध की वस्तुएँ; तरव: --वृक्ष; भूरि--अधिक; वर्ष्षाण:--देहधारी; प्रासूयन्त--फल देने लगे; मधु-च्युत:--मधु चुवाते हुए
बहती हुई नदियाँ समस्त प्रकार के स्वाद--मीठा, खट्टा, चटपटे इत्यादि--प्रदान करने लगींतथा बड़े-बड़े वृक्ष प्रचुर मात्रा में फल तथा मधु देने लगे।
गायें पर्याप्त हती घास खाकर प्रभूतमात्रा में दूध, दही, घी तथा अन्य आवश्यक वस्तुएँ देने लगीं।
"
सिन्धवो रत्ननिकरानिगरयोन्न॑ चतुर्विधम् ।
उपायनमुपाजहु: सर्वे लोका: सपालकाः ॥
९॥
सिन्धव: --समुद्र; रल-निकरान्--रत्नों के समूह; गिरय:--पर्वत; अन्नम्--खाद्य वस्तुएँ; चतु:-विधम्--चारों प्रकार की;उपायनम्--उपहार; उपाजहु: --ले आय; सर्वे--समस्त; लोका:--सभी लोकों के मनुष्य; स-पालका:--अपने-अपने लोक-पालों सहित।
सामान्य जनों तथा समस्त लोकों के प्रमुख देवों ने राजा पृथु को तरह-तरह के उपहारलाकर प्रदान किये।
समुद्र अमूल्य रत्नों से तथा पर्वत रसायनों एवं उर्वरकों से पूर्ण थे।
चारोंप्रकार के खाद्य पदार्थ प्रभूत मात्रा में उत्पन्न होते थे।
"
इति चाधोक्षजेशस्य पृथोस्तु परमोदयम् ।
असूयन्भगवानिन्द्र: प्रतिघितमचीकरत् ॥
१०॥
इति--इस प्रकार; च-- भी; अधोक्षज-ईशस्य--अधोक्षज को पूज्य भगवान् माननेवाले; पृथो:--राजा पृथु का; तु--तब;परम--सर्वोच्च; उदयम्--ऐश्वर्य; असूयन्--ईर्ष्यावश; भगवान्--अत्यन्त शक्तिमान; इन्द्र: --स्वर्ग के राजा ने; प्रतिघातम्--विघ्न; अचीकरत्--चेष्टा की
राजा पृथु पुरुषोत्तम भगवान् पर आश्ित थे जिन्हें अधोक्षज कहा जाता है।
राजा पृथु ने इतनेयज्ञ सम्पन्न किये थे कि ईश्वर की कृपा से उनका अत्यधिक उत्कर्ष हुआ था।
किन्तु उनका यहऐश्वर्य स्वर्ग के राजा इन्द्र से न सहा गया और उसने इसमें विघ्न डालने की चेष्टा की।
"
चरमेणाश्वमेधेन यजमाने यजुष्पतिम् ।
वैन्ये यज्ञपशुं स्पर्धन्नपोवाह तिरोहित: ॥
११॥
चरमेण--अन्तिम; अश्व-मेधेन--अश्वमेध यज्ञ द्वारा; यजमाने--यज्ञ करते समय; यजु:-पतिम्--यज्ञ के स्वामी, विष्णु को प्रसन्नकरने के लिए; वैन्ये--राजा बेन के पुत्र; यज्ञ-पशुम्--यज्ञ में बलि होनेवाला पशु; स्पर्धन्--ईर्ष्यावश; अपोवाह--चुरा लिया;तिरोहित:--अहृश्य |
जिस समय महाराज पृथु अन्तिम अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे, तो इन्द्र ने अहश्य होकर यज्ञ काघोड़ा चुरा लिया।
उसने राजा पृथु के प्रति ईर्ष्या भाव से ही ऐसा किया।
"
तमत्रिर्भगवानै क्षत्त्वरमाणं विहायसा ।
आमुक्तमिव पाखण्डं योधर्मे धर्मविभ्रम: ॥
१२॥
तम्--राजा इन्द्र को; अत्रि:--अत्रि मुनि; भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली; ऐश्षत्--देख सका; त्वरमाणम्--तेजी से बढ़ते हुए;विहायसा--आकाश् में; आमुक्तम् इब--मुक्त पुरुष की भाँति; पाखण्डम्--पाखण्डी, धूर्त; यः--जो; अधर्मे --अधर्म में;धर्म--धर्म ; विभ्रम:--धोखे से, भ्रमवश।
घोड़े को ले जाते समय राजा इन्द्र ने ऐसा वेष धारण कर रखा था जिससे वह मुक्त पुरुषजान पड़े।
वास्तव में उसका यह वेष ठगी के रूप में था, क्योंकि इससे झूठे ही धर्म का बोध होरहा था।
इस प्रकार जब इन्द्र आकाश मार्ग में पहुँचा तो अत्रि मुनि ने उसे देख लिया और समझगये कि स्थिति क्या है।
"
अत्रिणा चोदितो हन्तुं पृथुपुत्रो महारथः ।
अन्वधावत सड्क्ुद्धस्तिष्ठ तिष्ठेति चात्रवीत् ॥
१३॥
अतन्रिणा--अत्रि मुनि के द्वारा; चोदित:ः--कहतने से, प्रेरणा से; हन्तुमू--मारने के लिए; पृथु-पुत्र:--राजा पृथु के पुत्र ने; महा-रथ:--परमवीर; अन्वधावत--पीछा किया; सड्क्रुद्ध:--अत्यन्त क्रुद्ध; तिष्ठ तिष्ठ--ठहरो ठहरो; इति--इस प्रकार; च-- भी;अब्नवीत्ू--कहा |
जब अत्रि मुनि ने राजा पृथु के पुत्र को राजा इन्द्र की चाल बतायी तो वह अत्यन्त क्रुद्ध हुआऔर 'ठहरो! ठहरो!! ' कहते हुए इन्द्र को मारने के लिए उसका पीछा करने लगा।
"
त॑ं ताहशाकृतिं वीक्ष्य मेने धर्म शरीरिणम् ।
जटिलं भस्मनाच्छन्न॑ तस्मै बाणं न मुझ्ञति ॥
१४॥
तम्--उसको; ताहश-आकृतिम्--वैसे वेश में; वीक्ष्य--देख कर; मेने--समझा; धर्मम्--पतवित्र या धार्मिक; शरीरिणम्--देहधारी; जटिलम्--जटाजूट; भस्मना--राख से; आच्छन्नम्--सारे शरीर को पोते; तस्मै--उस पर; बाणम्--बाण; न--नहीं;मुझ्नति-छोड़ा
राजा इन्द्र ने संन्यासी का कपट-वेष धारण कर रखा था, उसके सिर पर जटा-जूट था औरसारा शरीर राख से पुता था।
ऐसे वेश में देखकर राजा पृथु के पुत्र ने इन्द्र को धर्मात्मा तथापवित्र संन््यासी समझा, अतः उसने उस पर अपने बाण नहीं छोड़े ।
"
वधान्निवृत्तं तं भूयो हन्तवेउत्रिरचोदयत् ।
जहि यज्ञहनं तात महेन्द्र विबुधाधमम् ॥
१५॥
वधात्--मारने से; निवृत्तम्--रुके; तम्-पृथु के पुत्र को; भूय:--पुनः; हन्तवे--मारने के लिए; अत्रि:--अत्रि मुनि ने;अचोदयत्--प्रेरित किया; जहि--मारो; यज्ञ-हनम्--यज्ञ में बाधक; तात-हे पुत्र; महा-इन्द्रमू--स्वर्ग के महान् राजा इन्द्र को;विबुध-अधमम्--समस्त देवताओं में निम्नतम |
जब अत्रि मुनि ने देखा कि राजा पृथु के पुत्र ने इन्द्र को नहीं मारा वरन् उससे धोखा खाकरवह लौट आया है, तो मुनि ने पुनः उसे स्वर्ग के राजा को मारने का आदेश दिया, क्योंकि उनकेविचार से इन्द्र राजा पृथु के यज्ञ में विघ्म डाल कर समस्त देवताओं में सबसे अधम बन चुकाथा।
"
एवं वैन्यसुतः प्रोक्तस्त्वरमाणं विहायसा ।
अन्वद्रबदभिक्रुद्धो रावणं गृश्रराडिव ॥
१६॥
एवम्--इस प्रकार; वैन्य-सुतः--राजा पृथु का पुत्र; प्रोक्त:--आज्ञा किये जाने पर; त्वरमाणम्--तेजी से आगे बढ़ रहा, इन्द्र;विहायसा--आकाश्ण में; अन्वद्रब॒त्--पीछा करने लगा; अभिक्रुद्ध:--अत्यन्त क्ुद्ध होकर; रावणम्--रावण को; गृश्च-राट्--गृद्धराज, जटायु; इब--सहश |
इस प्रकार सूचित किये जाने पर राजा वेन के पौजत्र ने तुरन्त इन्द्र का पीछा करना प्रारम्भकिया, जो तेजी से आकाश से होकर भाग रहा था।
वह उस पर अत्यन्त कुपित हुआ और उसकापीछा करने लगा मानो गृद्धराज रावण का पीछा कर रहा हो।
"
सोडश्वं रूपं च तद्द्वित्वा तस्मा अन्तर्हितः स्वराट् ।
वीर: स्वपशुमादाय पितुर्यज्ञमुपेयिवान् ॥
१७॥
सः--राजा इन्द्र; अश्वम्-घोड़ा; रूपमू--साधु पुरुष का छद्मा वेश; च-- भी; तत्--वह; हित्वा--त्याग कर; तस्मै--उसकेलिए; अन्तर्हित:--अप्रकट, लुप्त; स्व-राट्--इन्द्र; वीर: --परम वीर; स्व-पशुम्--अपना पशु; आदाय--लाकर; पितु:--अपनेपिता के; यज्ञम्--यज्ञ में; उपेयिवानू--लौट आया।
जब इन्द्र ने देखा कि पृथु का पुत्र उसका पीछा कर रहा है, तो उसने तुरन्त ही अपना कपट-वेष त्याग दिया और घोड़े को छोड़ कर वह उस स्थान से अन्तर्धान हो गया।
महाराज पृथु कामहान् वीर पुत्र घोड़े को लेकर अपने पिता के यज्ञस्थल में लौट आया।
"
तत्तस्य चाद्भुतं कर्म विचक्ष्य परमर्षय: ।
नामधेयं ददुस्तस्मै विजिताश्व इति प्रभो ॥
१८॥
तत्--उस; तस्य--उसके; च--भी; अद्भुतम्--विस्मयकारी; कर्म--पराक्रम; विचक्ष्य--देख कर; परम-ऋषय: --बड़े-बड़ेमुनियों ने; नामधेयम्--नाम; ददुः--प्रदान किया; तस्मै-- उसको; विजित-अश्व:ः--विजिताश्व ( जिसने घोड़े को जीत लिया );इति--इस प्रकार; प्रभो--हे विदुर महाशय |
हे विदुर महाशय, जब ऋषियों ने राजा पृथु के पुत्र का आश्चर्यजनक पराक्रम देखा तो सबोंने उसका नाम विजिताश्व रखना स्वीकार किया।
"
उपसृज्य तमस्तीत्रं जहाराश्व॑ पुनहरिः ।
चषालयूपतएछन्नो हिरण्यरशनं विभु: ॥
१९॥
उपसृज्य--उत्पन्न करके; तमः--अंधकार; तीब्रमू--घना; जहार--ले गया; अश्वम्--घोड़ा; पुनः: --फिर से; हरिः--राजा इन्द्र ने;चषाल-यूपत:--पशु की बलि दिये जानेवाले काठ के यंत्र से; छन्न:--घिर कर; हिरण्य-रशनम्--सोने की जंजीर से बँधा;विभुः--अत्यन्त शक्तिमान।
हे विदुर, स्वर्ग का राजा तथा अत्यन्त शक्तिशाली होने के कारण इन्द्र ने तुरन्त यज्ञस्थल परघोर अंधकार फैला दिया।
इस प्रकार पूरे स्थल को प्रच्छन्न करके उसने पुन: वह घोड़ा हर लियाजो बलि-स्थल पर काष्ठ-यंत्र के समीप सोने की जंजीर से बँधा था।
"
अत्रि: सन्दर्शयामास त्वरमाणं विहायसा ।
कपालखट्वाडुधरं वीरो नेैनमबाधत ॥
२०॥
अत्रि:--अत्रि मुनि ने; सन्दर्शयाम् आस--दिखलाया; त्वरमाणम्--तेजी से जाते हुए; विहायसा--आकाश में; कपाल-खट्वाड़ु--लाठी के ऊपर खोपड़ी टाँगे; धरम्--धारण किये; वीर: --वीर ( राजा पृथु का पुत्र ); न--नहीं; एनम्--स्वर्ग काराजा, इन्द्र; अबाधत--मारा
अत्रि मुनि ने राजा पृथु के पुत्र को पुनः: दिखलाया कि इन्द्र आकाश से होकर भागा जा रहाहै।
परम वीर पृथु-पुत्र ने पुन: उसका पीछा किया।
किन्तु जब उसने देखा कि उसने हाथ में जोदण्ड धारण कर रखा है उस पर खोपड़ी लटक रही है और वह पुनः संन्यासी वेश में है, तो उसनेउसे मारना उचित नहीं समझा।
"
अत्रिणा चोदितस्तस्मै सन्दधे विशिखं रुषा ।
सोडश्व॑ं रूपं च तद्द्वित्वा तस्थावन्तर्हित: स्वराट् ॥
२१॥
अत्रिणा--अत्रि मुनि द्वारा; चोदित:--प्रेरित; तस्मै--इन्द्र के लिए; सन्दधे--स्थापित किया; विशिखम्-- अपना तीर; रुषा--क्रोध से; सः--राजा इन्द्र; अश्वम्--घोड़े को; रूपम्--संन्यासी वेश को; च-- भी; तत्--उस; हित्वा--त्याग कर; तस्थौ--वहाँरहता रहा; अन्तर्हित:-- अदृश्य; स्व-राट्--स्वाधीन इन्द्र |
जब अत्रि मुनि ने पुन: आदेश दिया तो राजा पृथु का पुत्र अत्यन्त कुपित हुआ और उसनेअपने धनुष पर बाण चढ़ा लिया।
यह देख कर राजा इन्द्र ने तुरन्त संन््यासी का वह कपट वेषत्याग दिया और घोड़े को छोड़ कर वह स्वयं अदृश्य हो गया।
"
वीरश्वाश्वमुपादाय पितृयज्ञमथात्रजत् ।
तदवद्यं हरे रूपं जगृहुज्ञानदुर्बला: ॥
२२॥
वीर:--राजा पृथु का पुत्र; च-- भी; अश्वम्-घोड़े को; उपादाय--लेकर; पितृ-यज्ञम्ू--अपने पिता के यज्ञस्थल पर; अथ--तत्पश्चात्; अब्रजत्--गया; तत्--वह; अवद्यम्--निन््दनीय; हरे:--इन्द्र का; रूपम्--वेश; जगृहुः--ग्रहण कर लिया; ज्ञान-दुर्बला:--जिनमें ज्ञान की कमी है।
तब परम वीर पृथु-पुत्र विजिताश्व पुनः: वह घोड़ा लेकर अपने पिता के यज्ञ स्थल पर लौटआया।
उसी काल से, कुछ अल्पज्ञानी पुरुष छद्मा संन्यासी का वेष धारण करने लगे हैं।
राजा इन्द्रने ही इसका सूत्रपात किया था।
"
यानि रूपाणि जगूहे इन्द्रो हयजिहीर्षया ।
तानि पापस्य खण्डानि लिड्डंं खण्डमिहोच्यते ॥
२३॥
यानि--ये सब; रूपाणि--रूप; जगृहे--स्वीकार किया; इन्द्र:--स्वर्ग के राजा इन्द्र ने; हय--घोड़ा; जिहीर्षया--चुराने कीइच्छा से; तानि--उन सब; पापस्थ--पापकर्मो का; खण्डानि--चिह्न; लिड्रमू--प्रतीक; खण्डम्ू--खण्ड शब्द; इह--यहाँ;उच्यते--कहा जाता है।
इन्द्र ने घोड़े को चुरा ले जाने की इच्छा से संन्यासी के जो जो रूप धारण किये, वेनास्तिकवाद दर्शन के प्रतीक हैं।
"
एवमिद्दे हरत्यश्व॑ वैन्ययज्ञजिघांसया ।
तद्गृहीतविसूष्टेपु पाखण्डेषु मति्नृणाम् ॥
२४॥
धर्म इत्युपधर्मेषु नग्नरक्तपटादिषु ।
प्रायेण सजते भ्रान्त्या पेशलेषु च वाग्मिषु ॥
२५॥
एवम्--इस प्रकार; इन्द्रे--जब स्वर्ग के राजा इन्द्र ने; हरति--चुरा लिया; अश्वम्--धघोड़ा; वैन्य--राजा बेन के पुत्र का; यज्ञ--यज्ञ; जिघांसया--बन्द करने की इच्छा से; तत्--उसके द्वारा; गृहीत--स्वीकृत; विसूष्टेपु--त्यक्त; पाखण्डेषु--छदा वेष केप्रति; मतिः--आकर्षण; नृणाम्--सामान्य लोगों का; धर्म:--धर्म-पद्धति; इति--इस प्रकार; उपधर्मेषु--झूठे धर्मों के प्रति;नग्न--नंगा; रक्त-पट--लाल-वेश वाला; आदिषु--इत्यादि; प्रायेण--सामान्यतः; सज्जते--आकर्षित होता है; भ्रान्या--मूर्खतावश; पेशलेषु--पटु; च--तथा; वाग्मिषु--वाक्पटु, विदग्ध |
इस प्रकार पृथु महाराज के यज्ञ से घोड़े को चुराने के लिए राजा इन्द्र ने कई प्रकार केसंन्यास धारण किये।
कुछ संन्यासी नंगे रहते हैं और कभी-कभी लाल वस्त्र धारण करते हैं--वेकापालिक कहलाते हैं।
ये इनके पापकर्मो के प्रतीक मात्र हैं।
ऐसे तथाकथित संन्यासी पापियों द्वारा अत्यन्त समाहत होते हैं, क्योंकि वे नास्तिक होते हैं और अपने को सही ठहराने के लिएतर्क प्रस्तुत करने में अत्यन्त पटु होते हैं।
किन्तु हमें ज्ञान होना चाहिए कि ऐसे लोग ऊपर से धर्मके समर्थक प्रतीत होते हैं, किन्तु वास्तव में होते नहीं।
दुर्भाग्यवश मोहग्रस्त व्यक्ति इन्हें धार्मिकमानकर इनकी ओर आकृष्ट होकर अपना जीवन विनष्ट कर लेते हैं।
"
तदभिज्ञाय भगवान्पूथु: पृथुपराक्रम: ।
इन्द्राय कुपितो बाणमादत्तोद्यतकार्मुक: ॥
२६॥
तत्--वह; अभिज्ञाय--जान कर; भगवान्--ईश्वर के अवतार; पृथु:--राजा पृथु ने; पृथु-पराक्रम: --अत्यन्त पराक्रमी;इन्द्राय--इन्द्र पर; कुपित:--अत्यन्त क्रुद्ध होकर; बाणम्--बाण; आदत्त--लिया; उद्यत--तैयार; कार्मुक:--तीर।
अत्यन्त पराक्रमी महाराज पृथु ने तुरन्त अपना धनुष-बाण ले लिया और वे इन्द्र को मारने केलिए सन्नद्ध हो गये, क्योंकि इन्द्र ने इस प्रकार के अनियमित संन्यास का सूत्रपात्र किया था।
"
तमृत्विज: शक्रवधाभिसन्धितंविच॒क्ष्य दुष्प्रेक्षष्मसहारंहसम् ।
निवारयामासुरहो महामतेन युज्यतेउत्रान्यवध: प्रचोदितात् ॥
२७॥
तम्--राजा पृथु को; ऋत्विज:--पुरोहितगण; शक्र-वध--इन्द्र का वध; अभिसन्धितम्ू-- अपने को तैयार करते हुए; विचक्ष्य--देखकर; दुष्प्रेक्ष्मम्--देखने में भयंकर; असहा-- असहनीय; रंहसम्--जिसका वेग; निवारयाम् आसु:--उन्होंने मना किया;अहो--ओह; महा-मते--हे महापुरुष; न--नहीं; युज्यते--आपको शोभनीय; अत्र--इस यज्ञ-स्थल में; अन्य--दूसरे; वध: --वध; प्रचोदितात्--शास्त्र-विहित |
जब पुरोहितों तथा अन्य सबों ने महाराज पृथु को अत्यन्त कुपित तथा इन्द्र वध के लिएउद्यत देखा तो उन्होंने प्रार्थना की : हे महात्मा, उसे मत मारें, क्योंकि यज्ञ में केवल यज्ञ-पशु काही वध किया जा सकता है।
शास्त्रों में ऐसे ही आदेश दिये गये हैं।
"
वयं मरुत्वन्तमिहार्थनाशनंह्ृयामहे त्वच्छुवसा हतत्विषम् ।
अयातयामोपहवैरनन्तरंप्रसह्ा राजन्जुहवाम तेडहितम् ॥
२८ ॥
वयम्--हम; मरुत्-वन्तम्--राजा इन्द्र को; हह--यहाँ; अर्थ--आपके हेतु; नाशनम्--विध्वंसक ; हृयामहे --बुला लेंगे; त्वतू-अश्रवसा--आपके सुयश से; हत-त्विषम्--पहले से अपनी शक्ति से रहित, निस्तेज; अयातयाम--इसके पूर्व कभी भी न प्रयुक्त;उपहवैः--आवाहन-मंत्रों के द्वारा; अनन्तरम्-शीघ्र ही; प्रसह्या--बलपूर्वक; राजन्ू--हे राजा; जुहवाम--अग्नि में बलि करदेंगे; ते--तुम्हारे; अहितम्-शत्रु
हे राजनू, आपके यज्ञ में विघ्न डालने के कारण इन्द्र का तेज वैसे ही घट चुका है।
हमअभूतपूर्व वैदिक मंत्रों के द्वारा उसका आवाहन करेंगे।
वह अवश्य आएगा।
इस प्रकार हम अपने मंत्र-बल से उसे अग्नि में गिरा कर देंगे, क्योंकि वह आपका शत्रु है।
"
इत्यामन्त्य क्रतुपतिं विदुरास्यर्त्विजो रुषा ।
स््रुग्घस्ताञ्ुह्नतो भ्येत्य स्वयम्भू: प्रत्यषेधत ॥
२९॥
इति--इस प्रकार; आमन्य--सूचित करके; क्रतु-पतिम्--यज्ञों के स्वामी, राजा पृथु को; विदुर--हे विदुर; अस्य--पृथु के;ऋत्विज: -- पुरोहित; रुषा--क्रोध में; स्रुक्ु-हस्तान्--हाथ में स्त्रुवा लेकर; जुह्वतः--आहुति डालते हुए; अभ्येत्य-- प्रारम्भ करतेही; स्वयम्भू: --ब्रह्माजी ने; प्रत्यषेधत--रोक दिया।
हे बिदुर, राजा को यह सलाह दे चुकने पर, यज्ञ करने में जुटे हुए पुरोहितों ने क्रोध मेंआकर स्वर्ग के राजा इन्द्र का आवाहन किया।
वे अग्नि में आहुति डालने ही वाले थे कि वहाँपर ब्रह्माजी प्रकट हुए और उन्होंने यज्ञ आरम्भ करने से रोक दिया।
"
न वध्यो भवतामिन्द्रो यद्यज्ञो भगवत्तनु: ।
यं जिघांसथ यज्ञेन यस्येष्टास्तनव: सुरा: ॥
३०॥
न--नहीं; वध्य:--वध के योग्य; भवताम्--आप सबों के द्वारा; इन्द्र: --स्वर्ग का राजा इन्द्र; यत्--क्योंकि; यज्ञ:--इन्द्र कानाम; भगवतू-तनु:-- भगवान् के शरीर का अंश; यम्--जिसको; जिघांसथ--मारना चाह रहे हो; यज्ञेन--यज्ञ के द्वारा; यस्थ--इन्द्र का; इष्टा:--पूज्य होकर; तनव:--शरीर के अंग; सुरा:--देवता |
ब्रह्माजी ने उन्हें इस प्रकार सम्बोधित किया : हे याजको, आप स्वर्ग के राजा इन्द्र को नहींमार सकते, यह कार्य आपका नहीं है।
आपको जान लेना चाहिए कि इन्द्र भगवान् के ही समानहैं।
वस्तुतः वे भगवान् के सबसे अधिक शक्तिशाली सहायक हैं।
आप इस यज्ञ द्वारा समस्तदेवताओं को प्रसन्न करना चाह रहे हैं, किन्तु आपको ज्ञात होना चाहिए कि ये समस्त देवता स्वर्गके राजा इन्द्र के ही अंश हैं।
तो फिर आप इस महान् यज्ञ में उनका वध कैसे कर सकते हैं ?"
तदिदं पश्यत महद्धर्मव्यतिकरं द्विजा: ।
इन्द्रेणानुष्ठितं राज्ञ: कर्मतद्विजिघांसता ॥
३१॥
ततू्--तब; इदम्--यह; पश्यत--जरा देखो; महत्--महान; धर्म--धार्मिक जीवन का; व्यतिकरम्--विघ्त; द्विजा:--हेब्राह्मणों; इन्द्रेण--इन्द्र द्वारा; अनुष्ठितमू--किया गया; राज्:--राजा का; कर्म--कार्य; एतत्--यह यज्ञ; विजिघांसता--विघ्नडालने का इच्छुक |
राजा पृथु के महान् यज्ञ में विघध्न डालने तथा आपत्ति उठाने के उद्देश्य से राजा इन्द्र ने ऐसेसाधन अपनाये हैं, जो भविष्य में धार्मिक जीवन के सुपथ को नष्ट कर सकते हैं।
मैं इस ओरआप लोगों का ध्यान आकृष्ट कर रहा हूँ।
यदि आप और अधिक विरोध करेंगे तो वह अपनीशक्ति का दुरुपयोग करके अनेक अधार्मिक पद्धतियों को फैलाएगा।
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पृथुकीतते: पृथोर्भूयात्तहेंकोनशतक्रतु: ।
अलं ते क्रतुभिः स्विष्टेयद्धवान्मोक्षधर्मवित् ॥
३२॥
पृथु-कीर्ते: --व्यापक कीर्तिवाले; पृथो: --राज पृथु का; भूयात्--हो; तह्ि--अत:; एक-ऊन-शत-क्रतुः--निन्यानब्वे यज्ञ'करनेवाला; अलमू--कोई लाभ नहीं, बस; ते--तुम्हारे; क्रतुभिः--यज्ञ करने से; सु-इष्टे:--सुसम्पन्न; यत्--क्योंकि; भवान्--आप; मोक्ष-धर्म-वित्--मोक्ष के मार्ग को जाननेवाले।
ब्रह्माजी ने अन्त में कहा : 'बस, महाराज पृथु के निन्यानब्वे यज्ञ ही रहने दो।
' फिर वेमहाराज पृथु की ओर मुड़े और उनसे कहा 'आप मोक्ष मार्ग से भलीभाँति परिचित हैं, अतःआपको और अधिक यज्ञ करने से क्या मिलेगा ? '!" नैवात्मने महेन्द्राय रोषमाहर्तुमहसि ।
उभावपि हि भद्रं ते उत्तमशलोकविग्रहौ ॥
३३॥
न--नहीं; एब--निश्चय ही; आत्मने--तुमसे अभिन्न; महा-इन्द्राय--स्वर्ग के राजा इन्द्र पर; रोषम्-क्रोध; आहर्तुमू--करने केलिए; अर्हसि--तुम्हें चाहिए; उभौ--तुम दोनों; अपि--निश्चय ही; हि-- भी; भद्रमू--कल्याण; ते--तुम्हारा; उत्तम-शलोक-विग्रहौ-- भगवान् के अवतार।
ब्रह्माजी ने कहा : आप दोनों का कल्याण हो क्योंकि आप तथा इन्द्र दोनों ही भगवान् केअंश हैं।
अत: आपको इन्द्र पर क्रुद्ध नहीं होना चाहिए; वह आपसे अभिन्न है।
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मास्मिन्महाराज कृथाः सम चिन्तांनिशामयास्मद्बच आहतात्मा ।
यद्धयायतो दैवहतं नु कर्तुमनोतिरुष्टं विशते तमोउन्धम् ॥
३४॥
मा--मत; अस्मिन्--इसमें; महा-राज--हे राजा; कृथा:--करें; स्म--पूर्ववत्; चिन्तामू--मन का विक्षोभ; निशामय--कृपयाविचार करें; अस्मत्--मेरे; बच: --वचन; आहत-आत्मा--अत्यन्त पूज्य; यत्-- क्योंकि; ध्यायत:--ध्यानमग्न का; दैव-हतम्--विधाता द्वारा बिगाड़ा गया; नु--निश्चय ही; कर्तुमू--करने के लिए; मन:--मन; अति-रुष्टम्--अत्यन्त क्रुद्ध; विशते--प्रवेश करता है; तम:ः--अंधकार; अन्धम्--घना
हे राजन, दैवी व्यवधानों के कारण उचित रीति से आप के यज्ञ सम्पन्न न होने पर आपतनिक भी क्षुब्ध तथा चिन्तित न हों।
कृपया मेरे बचनों को अति आदर भाव से ग्रहण करें।
सदैवस्मरण रखें कि प्रारब्ध से जो कुछ घटित होता है उसके लिए हमें अधिक दुखी नहीं होनाचाहिए।
ऐसी पराजयों को सुधारने का जितना ही प्रयत्न किया जाता है, उतना ही हमभौतिकतावादी विचार के घने अंधकार में प्रवेश करते हैं।
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क्रतुर्विर्मतामेष देवेषु दुरवग्रह: ।
धर्मव्यतिकरो यत्र पाखण्डैरिन्द्रनिर्मित: ॥
३५॥
क्रतुः--यज्ञ; विरमताम्--बन्द हो; एष:--यह; देवेषु--देवताओं में; दुरवग्रह:-- अवांछित कामनाएँ; धर्म-व्यतिकरः--नियमोंका अतिक्रमण; यत्र--जहाँ; पाखण्डै: -- पापकर्मो के द्वारा; इन्द्र--स्वर्ग के राजा द्वारा; निर्मित:--बनाये गये।
ब्रह्माजी ने आगे कहा : इन यज्ञों को बन्द कीजिये क्योंकि इनके कारण इन्द्र अनेक अधर्मकर रहा है।
आपको भली भाँति ज्ञात होना चाहिए कि देवताओं में भी अनेक अवांछित कामनाएँहोती हैं।
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एभिरिन्रोपसंसूष्टे: पाखण्डै्हारिभिर्जनम् ।
हियमाणं विचश्ष्वैनं यस्ते यज्ञ श्रुगश्चमुट् ॥
३६॥
एमि:ः--इन; इन्द्र-उपसंसृष्टे:--इन्द्र द्वारा विरचित; पाखण्डै: --पापपूर्ण कार्य द्वारा; हारिभिः--मनोहर; जनम्--सामान्य लोग;हियमाणम्--चुराये गये; विचक्ष्व--देखो तो; एनम्ू--ये; य:--जो; ते--तुम्हारा; यज्ञ-श्रुक् --यज्ञ में विघ्न उत्पन्न करके; अश्व-मुटू-धोड़े को चुरानेवाला।
जरा देखिये कि राजा इन्द्र यज्ञ के घोड़े को चुरा कर किस प्रकार यज्ञ में विघ्न डाल रहा था!उसके द्वारा प्रचारित मनोहर पापमय कार्य सामान्य जनों द्वारा आगे बढ़ाये जाते रहेंगे।
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भवान्परित्रातुमिहावतीर्णोधर्म जनानां समयानुरूपम् ।
वेनापचारादवलुप्तमद्यतदेहतो विष्णुकलासि वैन्य ॥
३७॥
भवान्--आप; परित्रातुमू--उद्धार के लिए; इह--इस संसार में; अवतीर्ण:--अवतार लेकर; धर्मम्--धर्म; जनानामू--सामान्यलोगों का; समय-अनुरूपम्--समय तथा परिस्थिति के अनुसार; बेन-अपचारात्--राजा वेन के दुष्कर्मो से; अवलुप्तम्--लुप्तप्राय; अद्य--इस समय; तत्--उसकी; देहतः --देह से; विष्णु--विष्णु का; कला-- अंश; असि--तुम हो; वैन्य--हे राजाबेन के पुत्र |
हे बेन-पुत्र राजा पृथु, आप भगवान् विष्णु के अंश हैं।
राजा वेन के उत्पाती कार्यो केकारण धर्म प्रायः लुप्त हो चुका था।
आपने उचित समय पर भगवान् विष्णु के रूप में अवतारलिया।
निस्सन्देह, आप धर्म की रक्षा के लिए ही राजा वेन के शरीर से प्रकट हुए हैं।
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स त्वं विमृश्यास्य भवं प्रजापतेसड्डल्पनं विश्वसृजां पिपीपृहि ।
ऐन्द्रीं च मायामुपधर्ममातरंप्रचण्डपाखण्डपथं प्रभो 'जहि ॥
३८ ॥
सः--उपर्युक्त; त्वम्ू--तुम; विमृश्य--विचार करके; अस्य--इस जगत का; भवम्--अस्तित्व, संसार; प्रजा-पते--हे मनुष्यों केत्राता; सद्डूल्पनम्-हढ़ निश्चय; विश्व-सृजाम्-विश्व के जनकों का; पिपीपृहि--पूरा करो; ऐन्द्रीमू-- इन्द्र के द्वारा उत्पन्न; च--भी; मायाम्--माया; उपधर्म--तथाकथित संन्यास के अधर्म का; मातरम्--माता; प्रचण्ड--घातक; पाखण्ड-पथम्--पापपूर्णकर्मो का मार्ग; प्रभो--हे भगवान्; जहि--जीत लीजिए
हे प्रजा-पालक, विष्णु द्वारा प्रदत्त अपने इस अवतार के उद्देश्य पर विचार कीजिये।
इन्द्रद्वारा सर्जित अधर्म अनेक अवांछित धर्मों की जननी है।
अतः आप तुरन्त ही इन पाखण्डों काअन्त कर दीजिये।
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मैत्रेय उवाचइत्थं स लोकगुरुणा समादिष्टो विशाम्पति: ।
तथा च कृत्वा वात्सल्यं मघोनापि च सन्दधे ॥
३९॥
मैत्रेय: उबाच--मैत्रेय ने कहा; इत्थम्--इस प्रकार; सः--राजा पृथु; लोक-गुरुणा--समस्त मनुष्यों के आदि गुरु ब्रह्मा द्वारा;समादिष्ट: --आदेशित; विशाम्-पतिः --लोगों का स्वामी, राजा; तथा--उस प्रकार; च-- भी; कृत्वा--करके; वात्सल्यम्--स्नेह; मघोना--इन्द्र से; अपि--तक; च-- भी; सन्दधे--सन्धि कर ली।
महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा : जब परम गुरु ब्रह्माजी ने राजा पृथु को इस प्रकार उपदेश दियातो उन्होंने यज्ञ करने की अपनी उत्सुकता त्याग दी और अत्यन्त स्नेहपूर्वक राजा इन्द्र से सन्धि करली।
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कृतावभूथस्नानाय पृथवे भूरिकर्मणे ।
वरान्ददुस्ते वरदा ये तद्गर्हिषि तर्पिता: ॥
४०॥
कृत--सम्पन्न करके; अवभूथ-स्नानाय--यज्ञ के पश्चात् स्नान करके; पृथवे--राजा पृथु को; भूरि-कर्मणे--अनेक शौर्यवालेकार्य के लिए विख्यात; वरान्ू--वर, आशीर्वाद; ददुः--दिया; ते--वे सब; वर-दाः--वर देनेवाले, देवतागण; ये--जो; ततू-बर्हिषि--ऐसे यज्ञ करने में ; तर्पिता:-- प्रसन्न हो गये |
इसके पश्चात् पृथु महाराज ने स्नान किया, जो प्रथानुसार यज्ञ के अन्त में किया जाता है,और महिमायुक्त कार्यों से अत्यन्त प्रसन्न देवताओं से आशीष तथा वर प्राप्त किये।
विप्रा: सत्याशिषस्तुष्टा: श्रद्धया लब्धदक्षिणा: ।
आशिषो युयुजु: क्षत्तरादिराजाय सत्कृता: ॥
४१॥
विप्रा:--सभी ब्राह्मण; सत्य--सही; आशिष: --जिसके आशीर्वाद; तुष्टा:--अत्यन्त सन्तुष्ट होकर; श्रद्धया--अत्यन्तसम्मानपूर्वक; लब्ध-दक्षिणा:--दक्षिणा प्राप्त किये हुए; आशिष:-- आशीर्वाद; युयुजु:--प्रदान किया; क्षत्त:--हे विदुर;आदि-राजाय--आदि राजा को; सत्ू-कृता:--सम्मानित होकर।
आदिराज पृथु ने उस यज्ञ में उपस्थित समस्त ब्राह्मणों को अत्यन्त सम्मानपूर्वक सभी प्रकारकी भेंटें प्रदान कीं।
इन ब्राह्मणों ने प्रसन्न होकर राजा को अपनी ओर से हार्दिक शुभाशीष दिये।
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त्वयाहूता महाबाहो सर्व एवं समागता: ।
पूजिता दानमानाभ्यां पितृदेवर्षिमानवा: ॥
४२॥
त्वया--तुम्हारे द्वारा; आहूता:--आमंत्रित; महा-बाहो--हे परम शक्तिशाली; सर्वे--सभी; एव--निश्चय ही; समागता: --एकत्र;पूजिता:--सम्मानित हुए; दान--दान से; मानाभ्याम्--सम्मान से; पितृ--पितृलोक के वासी; देव--देवता; ऋषि--ऋषिगण;मानवा:--तथा सामान्य
जनसमस्त ऋषियों तथा ब्राह्मणों ने कहा : हे शक्तिशाली राजा, आपके आमंत्रण पर सभी वर्गके जीवों ने इस सभा में भाग लिया है।
वे पितृलोक तथा स्वर्गलोकों से आये हैं, साथ हीसामान्यजन एवं ऋषिगण भी इस सभा में उपस्थित हुए हैं।
अब वे सभी आपके व्यवहार तथाआपके दान से अत्यन्त सन्तुष्ठ हैं।
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