← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची

अध्याय बीस: महाराज पृथु के यज्ञ क्षेत्र में भगवान विष्णु का प्रकट होना

4.20मैत्रेय उवाचभगवानपि वैकुण्ठ: साक॑ मघवता विभु:।

यज्जैर्यज्ञपतिस्तुष्टो यज्ञभुक्तमभाषत ॥

१॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा; भगवानू-- भगवान्‌ विष्णु; अपि-- भी; वैकुण्ठ:--वैकुण्ठवासी; साकम्‌--के साथ;मघवता--राजा इन्द्र; विभु:-- भगवान्‌; यज्जैः --यज्ञों के द्वारा; यज्-पतिः--समस्त यज्ञों का स्वामी; तुष्ट:--प्रसन्न; यज्ञ-भुक्‌ --यज्ञों का भोक्ता; तमू--राजा पृथु से; अभाषत--कहा |

मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, महाराज पृथु द्वारा निन्‍्यानवे अश्वमेध यज्ञों के सम्पन्न कियेजाने से भगवान्‌ विष्णु अत्यन्त प्रसन्न हुए और वे यज्ञस्थल में प्रकट हुए।

उनके साथ राजा इन्द्रभी था।

तब भगवान्‌ विष्णु ने कहना प्रारम्भ किया।

"

श्रीभगवानुवाचएष तेकार्षीद्धड़ं हयमेधशतस्य ह ।

क्षमापयत आत्मानममुष्य क्षन्तुमहसि ॥

२॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ विष्णु ने कहा; एषः--यह राजा इन्द्र; ते--तुम्हारा; अकार्षीत्‌ू--किया; भड़म्‌--उत्पात; हय--अश्व; मेध--यज्ञ; शतस्य--एक सौवें का; ह--निश्चय ही; क्षमापयतः--क्षमाप्रार्थी; आत्मानम्‌--तुम से; अमुष्य--उसको;क्षन्तुमू-- क्षमा करने के लिए; अर्हसि--तुम्हें चाहिए

भगवान्‌ विष्णु ने कहा : हे राजा पृथु, स्वर्ग के राजा इन्द्र ने तुम्हारे सौवें यज्ञ में विघ्म डालाहै।

अब वह मेरे साथ तुमसे क्षमा माँगने के लिए आया है, अतः उसे क्षमा कर दो।

"

सुधिय: साधवो लोके नरदेव नरोत्तमा: ।

नाभिद्दुह्मान्ति भूते भ्यो यहिं नात्मा कलेवरम्‌ ॥

३॥

सु-धियः--परम बुद्धिमान व्यक्ति; साधव:--शुभ करने के लिए उद्यत; लोके--इस जगत में; नर-देव--हे राजा; नर-उत्तमा:--मनुष्यों में श्रेष्ठ; न अभिद्गुद्मन्ति--द्रोह नहीं करते; भूतेभ्य:--अन्य जीवों से; यहिं-- क्योंकि; न--कभी नहीं; आत्मा--स्व याआत्मा; कलेवरम्‌--यह शरीर।

हे राजन, जो व्यक्ति परम बुद्धिमान तथा दूसरों का शुभचिन्तक होता है, वह मनुष्यों में श्रेष्ठसमझा जाता है।

सिद्ध पुरुष कभी दूसरों से बैर नहीं करता।

जो अग्रगण्य बुद्धिमान हैं, वे यहभली-भाँति जानते हैं कि यह भौतिक शरीर आत्मा से भिन्न है।

"

पुरुषा यदि मुहान्ति त्वाइशा देवमायया ।

श्रम एव परं जातो दीर्घया वृद्धसेवया ॥

४॥

पुरुषा:--लोग; यदि--यदि; मुहान्ति--मोह ग्रस्त होते हैं; त्वाहशा:--तुम्हारी तरह; देव--परमेश्वर की; मायया--माया से;श्रम:--परिश्रम; एव--निश्चय ही; परम्‌--एकमात्र; जात:--उत्पन्न; दीर्घया--दीर्घकाल तक; वृद्ध-सेवया--गुरुजनों की सेवासेयदि

तुम जैसे पुरुष, जो पूर्व आचार्यों के आदेशों के अनुसार कार्य करने के कारण इतनेउन्नत हैं, मेरी माया से मोहग्रस्त हो जाँय तो तुम्हारी समस्त सिद्धि को समय का अपव्यय मात्र हीसमझा जाएगा।

"

अतः कायमिमं विद्वानविद्याकामकर्मभि: ।

आरब्ध इति नैवास्मिन्प्रतिबुद्धो उनुषज्जते ॥

५॥

अतः--अतएव; कायम्‌--शरीर; इमम्‌--यह; विद्वानू--ज्ञानी; अविद्या--अज्ञान से; काम--इच्छाएँ; कर्मभि:--कर्म से;आरब्ध: --उत्पन्न; इति--इस प्रकार; न--कभी नहीं; एब--निश्चय ही; अस्मिन्‌--इस शरीर के प्रति; प्रतिबुद्ध:--ज्ञानी;अनुषजते--आसक्त होता है

जो लोग जीवन की देहात्मबुद्धि की अवधारणा से भली-भाँति परिचित हैं, जो यह जानते हैंकि यह शरीर मोह से उत्पन्न अज्ञान, आकांक्षाओं तथा कर्मों से रचित है, वे इस शरीर के प्रतिकभी भी आसक्त नहीं होते।

"

असंसक्त: शरीरेउस्मिन्नमुनोत्पादिते गृहे ।

अपत्ये द्रविणे वापि कः कुर्यान्ममतां बुध: ॥

६॥

असंसक्त: --अनासक्त; शरीरे--शरीर में; अस्मिनू--इस; अमुना--ऐसी देहात्मबुद्धि से; उत्पादिते--उत्पन्न; गृहे--घर में;अपत्ये--सन्तान में; द्रविणे--सम्पत्ति में; वा--अथवा; अपि-- भी; क:ः --कौन; कुर्यात्‌ू--करना चाहिए; ममताम्‌--आकर्षण;बुध:--विद्वान पुरुष |

जो देहात्मबुद्धि के प्रति रंचमात्र भी आसक्त नहीं है, भला ऐसा अत्यन्त बुद्धिमान पुरुषकिस प्रकार घर, सनन्‍्तान, सम्पत्ति तथा ऐसी ही अन्य शारीरिक बातों में देहात्मबुद्धि के द्वाराप्रभावित हो सकता है?"

एकः शुद्धः स्वयंज्योतिर्निर्गुणोडइसौ गुणाश्रयः ।

सर्वगोनावृतः साक्षी निरात्मात्मात्मन: पर ॥

७॥

एक:ः--एक; शुद्धः--शुद्ध; स्वयम्‌--स्वयं; ज्योति:--तेजोमय; निर्गुण:-- भौतिक उपाधियों से रहित; असौ--वह; गुण-आश्रय:--उत्तम गुणों का आगार; सर्व-ग:--सर्वत्र जाने में समर्थ; अनावृत:--अनाच्छादित; साक्षी --गवाह; निरात्मा--किसीअन्य आत्मा के; आत्म-आत्मन:--शरीर तथा मन को; पर:--दिव्य ।

आत्मा एक, शुद्ध, अभौतिक तथा स्वयं-तेजमय है।

वह समस्त उत्तम गुणों का आगार एवंसर्व-व्यापक है।

वह किसी भौतिक आवरण से रहित और समस्त कार्यो का साक्षी है।

वह अन्यजीवात्माओं से सर्वथा भिन्न तथा समस्त देहधारियों से परे है।

"

य एवं सन्तमात्मानमात्मस्थं वेद पूरुष: ।

नाज्यते प्रकृतिस्थोपि तद्गुणै: स मयि स्थित: ॥

८॥

यः--जो कोई; एवम्‌--इस प्रकार; सन्तम्‌--विद्यमान; आत्मानम्‌--आत्मा तथा परमात्मा; आत्म-स्थम्‌--अपने शरीर के भीतरस्थित; बेद--जानता है; पूरुष:--पुरुष; न--कभी नहीं; अज्यते--प्रभावित होता है; प्रकृति-- भौतिक प्रकृति में; स्थ:--स्थित;अपि--यद्यपि; ततू-गुणैः-- प्रकृति के गुणों से; सः--ऐसा व्यक्ति; मयि--मुझमें; स्थित:--स्थित ।

ऐसा व्यक्ति जो परमात्मा तथा आत्मा के पूर्णज्ञान को प्राप्त होता है, भौतिक प्रकृति में रहतेहुए भी उसके गुणों से प्रभावित नहीं होता, क्योंकि वह सदैव मेरी दिव्य प्रेमाभक्ति में स्थित रहताहै।

"

यः स्वधर्मेण मां नित्यं निराशीः श्रद्धयान्वित: ।

भजते शनकैस्तस्य मनो राजन्प्रसीदति ॥

९॥

यः--जो भी; स्व-धर्मेण-- अपने वृत्तिपरक कार्यो के द्वारा; मामू--मुझको; नित्यम्‌ू--नियमित रूप से; निराशी: --बिना किसीउद्देश्य के; श्रद्धया-- श्रद्धा तथा भक्ति से; अन्वित:--युक्त; भजते--पूजता है; शनकै: -- धीरे-धीरे; तस्थय--उसका; मन: --मन;राजनू--हे राजा पृथु; प्रसीदति--पूर्णतया तुष्ट हो जाता है |

भगवान्‌ विष्णु ने आगे कहा : हे राजा पृथु, जब कोई अपना वृत्तिपरक कर्म करता हुआ,किसी भौतिक लाभ के उद्देश्य के बिना मेरी सेवा में लगा रहता है, तो वह अपने अन्तःकरण मेंउत्तरोत्तर संतुष्टि प्राप्त करता है।

"

परित्यक्तगुण: सम्यग्दर्शनो विशदाशय: ।

शान्ति मे समवस्थानं ब्रह्म कैवल्यमएनुते ॥

१०॥

परित्यक्त-गुण:--जो गुणों से विरक्त है; सम्यक्‌--सम; दर्शन:--जिसकी दृष्टि; विशद--अकलुषित; आशय:ः--जिसका मनया हृदय; शान्तिम्‌--शान्ति; मे-- मेरा; समवस्थानम्‌--समान पद; ब्रह्म--आत्मा; कैवल्यम्‌ू-- भौतिक कल्मष से मुक्ति;अश्नुते--प्राप्त करता है।

जब हृदय समस्त भौतिक कल्मषों से शुद्ध हो जाता है, तो भक्त का मन विशद तथापारदर्शी हो जाता है और वह वस्तुओं को समान रूप में देख सकता है।

जीवन की इस अवस्थामें शान्ति मिलती है और मनुष्य मेरे समान पद के सच्चिदानन्द-विग्रह रूप में स्थित हो जाता है।

"

उदासीनमिवाध्यक्षं द्रव्यज्ञानक्रियात्मनाम्‌ ।

कूटस्थमिममात्मानं यो वेदाप्नोति शो भनम्‌ ॥

११॥

उदासीनम्‌ू--उदासीन; इब--केवल; अध्यक्षम्‌--अधीक्षक; द्रव्य-- भौतिक तत्त्वों; ज्ञान--ज्ञानेन्द्रियाँ; क्रिया--कर्मेन्द्रियाँ;आत्मनाम्‌ू--तथा मन का; कूट-स्थम्‌--स्थिर; इममू--यह; आत्मानम्‌--आत्मा; यः--जो कोई; वेद--जानता है; आप्नोति--प्राप्त करता है; शोभनम्‌--कल्याण ।

जो कोई भी यह जानता है कि पाँच तत्त्वों, कर्मेन्द्रियों, ज्ञानेन्द्रियों तथा मन से निर्मित यहशरीर केवल स्थिर आत्मा द्वारा संचालित होता है, वह भौतिक बन्धन से मुक्त होने योग्य है।

"

भिन्नस्य लिड्डस्य गुणप्रवाहोद्रव्यक्रियाकारकचेतनात्मन: ।

इृष्टासु सम्पत्सु विपत्सु सूरयोन विक्रियन्ते मयि बद्धसौहदा: ॥

१२॥

भिन्नस्य-भिन्न; लिड्डस्य--शरीर का; गुण--तीनों गुणों का; प्रवाह:--निरन्तर परिवर्तन; द्रव्य-- भौतिक तत्त्व; क्रिया--कर्म;कारक-देवता; चेतना--तथा मन; आत्मन:--से युक्त; दृष्टासु-- अनुभव होने पर; सम्पत्सु--सुख; विपत्सु--दुख; सूरय: --ज्ञानी लोग; न--कभी नहीं; विक्रियन्ते--विचलित होते हैं; मयि-- मुझ में; बद्ध-सौहदा:--मित्रता में बँध कर।

भगवान्‌ विष्णु ने राजा पृथु से कहा : हे राजन, तीनों गुणों की अन्योन्य क्रिया से ही यहभौतिक जगत निरन्तर परिवर्तनशील है।

यह शरीर पाँच तत्त्वों, इन्द्रियों, इन्द्रियों के नियामकदेवताओं तथा आत्मा द्वारा विश्लुब्ध किये जाने वाले मन से मिल कर बना है।

चूँकि आत्मा इन स्थूल तथा सूक्ष्म तत्त्वों के इस मेल से सर्वथा भिन्न है, अतः मेरा भक्त जो मित्रता तथा प्रेम केद्वारा मुझसे हढ़तापूर्वक बँधा है, यह भली भाँति जानते हुए, कभी भी भौतिक सुख तथा दुख सेविचलित नहीं होता।

"

समः समानोत्तममध्यमाधम:सुखे च दुःखे च जितेन्द्रियाशय: ।

मयोपक्रिप्ताखिललोकसंयुतोविधत्स्व वीराखिललोकरक्षणम्‌ ॥

१३॥

समः--समभाव; समान--सभी समान; उत्तम-- श्रेष्ठ; मध्यम--बीच की स्थिति वाला; अधमः--निम्नस्तरीय; सुखे--सुख में;च--तथा; दुःखे--दुख में; च-- भी; जित-इन्द्रिय--जिसने इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है; आशय:--तथा मन; मया--मेंरेद्वारा; उपक्रिप्त--व्यवस्थित; अखिल--सम्पूर्ण;, लोक--लोगों द्वारा; संयुतः:--साथ-साथ; विधत्स्व-- प्रदान करो; वीर--हेवीर; अखिल--समस्त; लोक--नागरिकों को; रक्षणम्‌--सुरक्षा, आश्रय |

हे बीर राजा, स्वयं समभाव रखते हुए अपने से उत्तम, मध्यम तथा निम्न स्तर के लोगों परसमानता का व्यवहार करो, क्षणिक सुख या दुख से विचलित न हो।

अपने मन तथा इन्द्रियों परपूर्ण संयम रखो।

मेरी व्यवस्था से तुम जिस किसी भी परिस्थिति में रखे जाओ, उस दिव्य स्थितिमें रह कर राजा का कर्तव्य निबाहो, किन्तु तुम्हारा एकमात्र कर्तव्य अपने राज्य के नागरिकों कोसंरक्षण प्रदान करना है।

"

श्रेय: प्रजापालनमेव राज्ञोयत्साम्पराये सुकृतात्षष्ठटमंशम्‌ ।

हर्तान्यथा हृतपुण्य: प्रजाना-मरक्षिता करहारोउघमत्ति ॥

१४॥

श्रेय:--शुभ; प्रजा-पालनम्‌--जनता पर शासन; एब--निश्चय ही; राज्ञ:--राजा के लिए; यत्‌--क्योंकि; साम्पराये--अगलेजन्म में; सु-कृतात्‌-पुण्यों से; षष्ठम्‌ अंशम्‌--छठा भाग; हर्ता--संग्रह करने वाला; अन्यथा--नहीं तो; हृत-पुण्य:--पुण्य सेवश्चित; प्रजानामू-- प्रजा का; अरक्षिता--रक्षा न करने वाला; कर-हार:ः--कर वसूल करने वाला; अघम्‌--पाप; अत्ति--प्राप्तकरता है या भोगता है।

राजा का निर्दिष्ट धर्म है कि वह राज्य के सारे के सारे नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करे।

ऐसा करने से राजा को अगले जन्म में प्रजा के पुण्यों का छठा भाग प्राप्त होता है।

किन्तु जो राजाअथवा प्रशासक प्रजा से केवल कर वसूल करता है और नागरिकों को समुचित सुरक्षा प्रदाननहीं करता तो उसके पुण्य प्रजा छीन लेती है और सुरक्षा न प्रदान करने के बदले में उसे प्रजा केपापकर्मों का भागी होना पड़ता है।

"

एवं द्विजाछयानुमतानुवृत्त-धर्मप्रधानोउन्यतमोवितास्या: ।

हस्वेन कालेन गृहोपयातान्‌द्रष्टासि सिद्धाननुरक्तलोकः ॥

१५॥

एवम्‌--इस प्रकार; द्विज--ब्राह्मणों का; अछब--अग्रणी द्वारा; अनुमत--स्वीकृत; अनुवृत्त--गुरु परम्परा से प्राप्त; धर्म--धार्मिक सिद्धान्त; प्रधान:-- प्रमुख; अन्यतम: --अनासक्त; अविता--रक्षक; अस्या: --पृथ्वी का; हस्वेन--लघु; कालेन--समय से; गृह--अपने घर; उपयातान्‌--स्वतः आया हुआ; द्रष्टास--तुम देखोगे; सिद्धान्‌ू--सिद्ध पुरुष; अनुरक्त-लोक:--प्रजाका

प्रियभगवान्‌ विष्णु ने आगे कहा : हे राजा पृथु, यदि तुम विद्वान्‌ ब्राह्मणों से शिष्य परम्परा द्वाराप्राप्त आदेशों के अनुसार प्रजा का संरक्षण करते रहोगे और यदि तुम उनके द्वारा निर्दिष्ट धार्मिकनियमों का अनुसरण मनोरथों से अनासक्त रहकर करते रहोगे तो तुम्हारी सारी प्रजा सुखी रहेगीऔर तुमसे स्नेह रखेगी और तब तुम्हें शीघ्र ही सनकादि ( सनक, सनातन, सनन्दन, सनत्‌कुमार )चारों कुमारों जैसे मुक्त पुरुषों के दर्शन हो सकेंगे।

"

वरं च मत्कदझ्जन मानवेन्द्रवृणीष्व तेहं गुणशीलयन्द्रित: ।

नाहं मखैर्वें सुलभस्तपोभि-योगेन वा यत्समचित्तवर्ती ॥

१६॥

वरम्‌--आशीर्वाद; च-- भी; मत्‌-- मुझसे; कज्लन--जो भी चाहो; मानव-इन्द्र--हे मनुष्यों के प्रमुख; वृणीष्व--माँगो; ते--तुम्हारा; अहम्‌-मैं; गुण-शील--उच्चगुणों तथा श्रेष्ठ आचरणों द्वारा; यन्त्रितः--मुग्ध होकर; न--नहीं; अहम्‌--मैं; मखै:--यज्ञों से; बै--निश्चय ही; सु-लभ:ः --सरलता से प्राप्त; तपोभि:--तपस्या द्वारा; योगेन--योगाभ्यास के द्वारा; वा--अथवा;यत्‌--जिससे; सम-चित्त--समभाव वालों में; वर्ती--स्थित |

हे राजन्‌, मैं तुम्हारे उच्च गुणों तथा उत्तम आचरण से मुग्ध और प्रभावित हूँ; अतः तुम मुझसेमनचाहा वर माँग सकते हो।

जो उत्तम गुणों तथा शील से युक्त नहीं है, वह मात्र यज्ञ, कठिनतपस्या अथवा योग के द्वारा मेरी कृपा प्राप्त नहीं कर सकता।

किन्तु जो समस्त परिस्थितियों मेंसमभाव बनाए रखता है, मैं उसके अन्तःकरण में सदैव सन्तुलित रहता हूं।

"

मैत्रेय उवाचस इत्थं लोकगुरुणा विष्वक्सेनेन विश्वजित्‌ ।

अनुशासित आदेशं शिरसा जगूहे हरे: ॥

१७॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; सः--उसने; इत्थम्‌--इस प्रकार; लोक-गुरुणा--समस्त लोकों के परम स्वामी द्वारा;विष्वक्सेनेन-- भगवान्‌ द्वारा; विश्व-जित्‌--विश्व पर विजय करने वाला ( महाराज पृथु ); अनुशासित:--आदेश दिया गया;आदेशम्‌--आदेश, आज्ञा; शिरसा--सिर से; जगृहे-- स्वीकार किया; हरेः-- भगवान्‌ का।

महानू संत मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, इस प्रकार समस्त विश्व के जीतने वाले महाराजपृथु ने भगवान्‌ के आदेशों को शिरोधार्य किया।

"

स्पृशन्तं पादयो: प्रेम्णा त्रीडितं स्वेन कर्मणा ।

शतक्रतुं परिष्वज्य विद्वेषं विससर्ज ह ॥

१८॥

स्पृशन्तम्‌-स्पर्श करते हुए; पादयो:--पाँवों का; प्रेम्णा--हर्षातिरिकवश; ब्रीडितम्‌--लज्जित; स्वेन-- अपने ही; कर्मणा--कार्यों से; शत-क्रतुम्‌--राजा इन्द्र को; परिष्वज्य--हृदय से लगाकर; विद्वेषम्‌--ईर्ष्या; विससर्ज--त्याग दिया; ह--निस्सन्देह |

राजा इन्द्र जो सामने खड़ा था, अपने कार्यो से अत्यन्त लज्जित हुआ और राजा पृथु केचरणकमलों का स्पर्श पाने के लिए उनके समक्ष गिर पड़ा।

किन्तु पृथु महाराज ने अत्यन्तहर्षातिरिक में उसे तुरन्त हृदय से लगा लिया और यज्ञ के अश्व को चुराने के कारण उत्पन्न समस्तईर्ष्या त्याग दी।

"

भगवानथ विश्वात्मा पृथुनोपहताईण: ।

समुज्जिहानया भक्त्या गृहीतचरणाम्बुज: ॥

१९॥

भगवान्‌-- भगवान्‌; अथ--तदनन्तर; विश्व-आत्मा--परमात्मा; पृथुना--राजा पृथु द्वारा; उपहत-प्रदत्त; अर्हण:--पूजा कीसारी सामग्री; समुज्जिहानया--क्रमशः वर्द्धित; भक्त्या--जिसकी भक्ति; गृहीत--पकड़ा हुआ; चरण-अम्बुज:--चरणकमल।

राजा पृथु ने अपने ऊपर कृपालु भगवान्‌ के चरण-कमलों की प्रभूत पूजा की।

इस प्रकारभगवान्‌ के चरणकमलों की आराधना करते हुए भक्ति में महाराज पृथु का आनन्द क्रमशःबढ़ता गया।

"

नप्रस्थानाभिमुखोप्येनमनुग्रहविलम्बित: ।

पश्यन्पदापलाशाक्षो न प्रतस्थे सुहृत्सताम्‌ ॥

२०॥

प्रस्थान--जाने के लिए; अभिमुख: --उद्यत; अपि--यद्यपि; एनम्‌--उसको ( पृथु को ); अनुग्रह--दया से; विलम्बित:--रोकलिया गया; पश्यन्‌--देखते हुए; पद्म-पलाश-अक्ष:--जिसके नेत्र कमल की पंखुड़ियों के समान हैं; न--नहीं; प्रतस्थे--प्रस्थान किया; सुहत्‌-शुभेच्छु; सतामू-भक्तों का

भगवान्‌ प्रस्थान करने ही वाले थे, किन्तु वे राजा पृथु के व्यवहार के प्रति इतने वत्सल होचले थे कि वे गये नहीं।

अपने कमलनेत्रों से महाराज पृथु के आचरण को देखकर वे रुक गये,क्योंकि वे सदा ही अपने भक्तों के हितैषी हैं।

"

स आदिराजो रचिताझ्लिहीरिंविलोकितुं नाशकदश्रुलोचन: ।

न किश्जनोवाच स बाष्पविक्लवोहृदोपगुह्यामुमधादवस्थित: ॥

२१॥

सः--वह; आदि-राज:--आदि राजा; रचित-अज्जलि:--हाथ जोड़े हुए; हरिम्‌ू-- भगवान्‌ को; विलोकितुम्‌--देखने के लिए;न--नहीं; अशकत्‌--समर्थ था; अश्रु-लोचन:--अश्रुपूरित नेत्र; न--नहीं; किज्ञन--कुछ भी; उवाच--कहा; सः --उसने;बाष्प-विक्लव: --वाणी रुद्ध होने से, गद्गद्‌ कण्ठ से; हदा--अपने हृदय से; उपगुहा--आलिंगन करके; अमुम्‌-- भगवान्‌ को;अधात्‌--रहता रहा; अवस्थित: --खड़ा ।

नेत्रों में अश्रु भर आने तथा वाणी रुद्ध हो जाने आदि से राजा महाराज पृथु न तो ठीक सेभगवान्‌ को देख सके और न भगवान्‌ को सम्बोधित करके कुछ बोल सके।

उन्होंने केवलअपने हृदय के भीतर भगवान्‌ का आलिंगन किया और हाथ जोड़े हुए उसी तरह खड़े रहे।

"

अथावमृज्याश्रुकला विलोकयनू-नतृप्तहग्गोचरमाह पूरुषम्‌ ।

पदा स्पृशन्तं क्षितिमंस उन्नतेविन्यस्तहस्ताग्रमुरड्भविद्विष: ॥

२२॥

अथ--त्पश्चात्‌; अवमृज्य--पोंछ कर; अश्रु-कला:--अपने नेत्रों के अश्रु; विलोकयन्‌--देखते हुए; अतृप्त--असंतुष्ट; हक्‌-गोचरम्‌--आँखों को दिखाई पड़ने वाला; आह--कहा; पूरुषम्‌-- भगवान्‌ को; पदा--अपने चरणकमलों से; स्पृशन्तम्‌--स्पर्शकरते हुए; क्षितिम्‌-पृथ्वी; अंसे--कंधे पर; उन्नते--उठा हुआ; विन्यस्त--बिखरा; हस्त--हाथ का; अग्रमू--अगला भाग;उरड्ु-विद्विष:--सर्पो के शत्रु, गरुड़ का।

भगवान्‌ अपने चरण-कमलों से पृथ्वी को स्पर्श करते हुए खड़े थे और उनके हाथ काअगला भाग सर्पो के शत्रु गरुड़ के उन्नत कंधे पर था।

महाराज पृथु नेत्रों से अश्रु पोंछते हुएभगवान्‌ को देखने का प्रयास कर रहे थे, किन्तु ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो राजा उन्हें देखकरअघा नहीं रहा था।

इस प्रकार राजा ने निम्नलिखित स्तुतियाँ अर्पिथ कीं।

"

पृथुरुवाचवरान्विभो त्वद्ठरदे श्वराद्दुध:कथं वृणीते गुणविक्रियात्मनाम्‌ ।

ये नारकाणामपि सन्ति देहिनांतानीश कैवल्यपते वृणे नच ॥

२३॥

पृथु: उबाच--पृथु महाराज ने कहा; वरान्‌ू--आशीर्वाद, वर; विभो--हे परमेश्वर; त्वत्‌--तुमसे; बर-द-ईश्वरात्‌-- भगवान्‌ से,जो वर देने वालों में अग्रणी हैं; बुध:--बुद्धिमान पुरुष; कथम्‌--कैसे; वृणीते--याचना कर सकता है; गुण-विक्रिया--प्रकृतिके गुणों से मोहग्रस्त; आत्मनाम्‌--जीवात्माओं का; ये--जो; नारकाणाम्‌--नरकवासी जीवात्माओं का; अपि-- भी; सन्ति-- हैं;देहिनाम्‌ू--देहधारियों का; तानू--वे सब; ईश--हे ईश्वर; कैवल्य-पते--तादात्म्य के दाता; वृणे--याचना करता हूँ; न--नहीं;च--भी |

हे प्रभो, आप वर देने वाले देवों में सर्वश्रेष्ठ हैं।

अत: कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति आपसे ऐसेवर क्यों माँगेगा जो प्रकृति के गुणों से मोहग्रस्त जीवात्माओं के निमित्त हैं? ऐसे वरदान तो नरकमें वास करने वाली जीवात्माओं को भी अपने जीवन-काल में स्वतः प्राप्त होते रहते हैं।

हेभगवन्‌, आप निश्चित ही अपने साथ तादात्म्य प्रदान कर सकते हैं, किन्तु मैं ऐसा वर नहींचाहता।

"

न कामये नाथ तदप्यहं क्वचिन्‌-न यत्र युष्मच्चरणाम्बुजासव: ।

महत्तमान्तईदयान्मुखच्युतोविधत्स्व कर्णायुतमेष मे वर; ॥

२४॥

न--नहीं; कामये--इच्छा करता हूँ; नाथ--हे स्वामी; तत्‌ू--वह; अपि-- भी; अहम्‌--मैं; क्वचित्‌--किसी भी समय; न--नहीं; यत्र--जहाँ; युष्मत्‌--तुम्हारे; चरण-अम्बुज--चरणकमलों का; आसव:-- अमृत; महत्‌-तम--सबसे बड़े भक्तों के;अन्तः-हृदयात्‌--अन्तस्तल से; मुख--मुखों से; च्युतः--निकली; विधत्स्व-- प्रदान कीजिये; कर्ण--कान; अयुतम्‌ू--दसलाख; एष:--यह; मे--मेरा; वर:--वर |

हे भगवान्‌, मैं आपसे तादात्म्य के वर की इच्छा नहीं करता, क्योंकि इसमें आपके चरण-कमलों का अमृत रस नहीं है।

मैं तो दस लाख कान प्राप्त करने का वर माँगता हूँ जिससे मैंआपके शुद्ध भक्तों के मुखारविन्दों से आपके चरण-कमलों की महिमा का गान सुन सकूँ।

"

स उत्तमश्लोक महन्मुखच्युतोभवत्पदाम्भोजसुधा कणानिल: ।

स्मृति पुनर्विस्मृततत्त्ववर्त्मनांकुयोगिनां नो वितरत्यलं वरैः ॥

२५॥

सः--वह; उत्तम-श्लोक--चुने हुए श्लोकों से प्रशंसित, हे भगवान्‌; महत्‌--महान्‌ भक्तों के; मुख-च्युतः--मुख से निकली;भवत्‌--आपके; पद-अम्भोज--चरणकमलों से; सुधा--अमृत के; कण--छोट-छोटे खण्ड; अनिल:--सुखकर वायु;स्मृतिमू--स्मरण शक्ति; पुनः--फिर; विस्मृत-- भूली हुईं; तत्त्त--सत्य के प्रति; वर्त्मनामू--ऐसे पुरुषों का जिनका पथ; कु-योगिनाम्‌ू--जो भक्ति में नहीं लगे, ऐसे पुरुषों का; नः--हम सबों का; वितरति--पुनः देता है; अलमू--वृथा; वरैः--अन्य वर।

हे भगवान्‌, महान्‌ पुरुष आपका महिमा-गान उत्तम एलोकों द्वारा करते हैं।

आपके चरण-कमलों की प्रशंसा केसर कणों के समान है।

जब महापुरुषों के मुखों से निकली दिव्य वाणीआपके चरण-कमलों की केसर-धूलि की सुगन्ध का वहन करती है, तो विस्मृत जीवात्माआपसे अपने सम्बन्ध को स्मरण करता है।

इस प्रकार भक्त-गण क्रमशः जीवन के वास्तविकमूल्य को समझ पाते हैं।

अतः हे भगवान्‌, मैं आपके शुद्ध भक्त के मुख से आपके विषय मेंसुनने का अवसर प्राप्त करने के अतिरिक्त किसी अन्य वर की कामना नहीं करता।

"

यश: शिवं सुश्रव आर्यसड़्मेयहच्छया चोपश्रुणोति ते सकृत्‌ ।

कथं गुणज्ञो विरमेद्विना पशुंश्रीर्यत्प्रवत्रे गुणसड्ग्रहेच्छया ॥

२६॥

यशः-कीर्ति; शिवम्‌--कल्याणकारी, मंगलमय; सु-भ्रव:--हे सुकीर्ति वाले भगवान्‌; आर्य-सड्डमे--उच्च भक्तों की संगतिमें; यहच्छया--जिस-तिस प्रकार, जैसे-तैसे; च--भी; उपश्रुणोति--सुनता है; ते--तुम्हारा; सकृतू--एक बार भी; कथम्‌--कैसे; गुण-ज्ञ:--उत्तम गुणों की प्रशंसा करने वाला; विरमेत्‌ू--रुक सकता है; विना--जब तक; पशुम्‌--पशु; श्री: --सम्पत्तिकी देवी, लक्ष्मीजी; यत्‌--जो; प्रवत्रे--स्वीकृत; गुण--आपके गुण; सड्ग्रह--प्राप्त करने की; इच्छया--इच्छा से |

हे अत्यन्त कीर्तिमय भगवान्‌, यदि कोई शुद्ध भक्तों की संगति में रहकर आपकेकार्यकलापों की कीर्ति का एक बार भी श्रवण करता है, तो जब तक कि वह पशु तुल्य न हो,वह भक्तों की संगति नहीं छोड़ता, क्योंकि कोई भी बुद्धिमान पुरुष ऐसा करने की लापरवाहीनहीं करेगा।

आपकी महिमा के कीर्तन और श्रवण की पूर्णता तो धन की देवी लक्ष्मी जी द्वारातक स्वीकार की गई थीं जो आपके अनन्त कार्यकलापों तथा दिव्य महिमा को सुनने की इच्छुकरहती थीं।

श" अथाभजे त्वाखिलपूरुषोत्तमं गुणालयं पद्यकरेव लालस: ।

अप्यावयोरेकपतिस्पृधो: कलि-न॑ स्यात्कृतत्वच्चरणैकतानयो: ॥

२७॥

अथ--अतः; आभजे--मैं भक्ति करूँगा; त्वा--तुम्हारे प्रति; अखिल--समस्त; पूरुष-उत्तमम्‌--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌; गुण-आलयमू--समस्त दिव्य गुणों के आगार; पदा-करा--कमल धारण करने वाली लक्ष्मीजी; इब--सहृश; लालस:--इच्छुक;अपि--निस्सन्देह; आवयो: --लक्ष्मी का तथा मेरा; एक-पति--एक स्वामी, पतिक्रता; स्पृधो: --स्पर्धा करते हुए; कलि:--झगड़ा; न--नहीं; स्थात्‌ू--हो सकता है; कृत--किया हुआ; त्वत्‌-चरण--आपके चरणकमलों के प्रति; एक-तानयो: --एकाग्रता

अब मैं भगवान्‌ के चरणकमलों की सेवा में संलग्न रहना और कमलधारिणी लक्ष्मीजी केसमान सेवा करना चाहता हूँ, क्योंकि भगवान्‌ समस्त दिव्य गुणों के आगार हैं।

मुझे भय है किलक्ष्मीजी तथा मेरे बीच झगड़ा छिड़ जाएगा, क्योंकि हम दोनों एक ही सेवा में एकाग्र भाव सेलगे होंगे।

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जगज्जनन्यां जगदीश वैशसंस्यादेव यत्कर्मणि न: समीहितम्‌ ।

करोषि फल्ग्वप्युरु दीनवत्सलःस्व एव धिष्ण्येईभिरतस्य कि तया ॥

२८॥

जगतू-जनन्याम्‌-विश्व की माता ( लक्ष्मी ) में; जगत्‌-ईश--हे विश्व के स्वामी; वैशसम्‌--क्रो ध; स्थातू-- हो सकता है; एव--निश्चय ही; यत्‌-कर्मण--जिसके कार्य में; न:ः--मेरा; समीहितम्‌--आकांक्षा; करोषि--विचार करते हो; फल्गु--तुच्छ सेवा;अपि--यद्यपि; उरु-- अत्यधिक; दीन-वत्सल: --दीनों के प्रति स्नेह करने वाले; स्वे--अपने; एव--निश्चय ही; धिष्ण्ये--तुम्हारेऐश्वर्य में; अभिरतस्यथ--परम सन्तुष्ट का; किमू--क्या आवश्यकता; तया--उसके साथ ।

हे जगदीश्वर, लक्ष्मीजी विश्व की माता हैं, तो भी मैं सोचता हूँ कि उनकी सेवा में हस्तक्षेपकरने तथा उसी पद पर जिसके प्रति वे इतनी आसक्त हैं कार्य करने से, वे मुझसे क्रुद्ध हो सकतीहैं।

फिर भी मुझे आशा है कि इस भ्रम के होते हुए भी आप मेरा पक्ष लेंगे, क्योंकि आपदीनवत्सल हैं और भक्त की तुच्छ सेवाओं को भी बहुत करके मानते हैं।

अतः यदि वे रुष्ट भी होजाँय तो आपको कोई हानि नहीं होगी, क्योंकि आप आत्मनिर्भर हैं, अतः उनके बिना भीआपका काम चल सकता है।

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भजन्त्यथ त्वामत एव साधवोव्युदस्तमायागुणविभ्रमोदयम्‌ ।

भवत्पदानुस्मरणाहते सतांनिमित्तमन्यद्धगवन्न विद्दाहे ॥

२९॥

भजन्ति--पूजते हैं; अथ--अतः; त्वामू-तुमको; अतः एब--अतः; साधव: --सभी साधु पुरुष; व्युदस्त--जो दूर करते हैं;माया-गुण--प्रकृति के गुण; विभ्रम-- भ्रान्त विचार; उदयम्‌--उत्पन्न; भवत्‌-- आपके; पद--चरणकमल; अनुस्मरणात्‌--निरन्तर स्मरण करने से; ऋते--सिवाय; सताम्‌--महान्‌ पुरुषों का; निमित्तमू--कारण; अन्यत्‌--अन्य; भगवन्‌--हे भगवान्‌;न--नहीं; विद्यहे-- समझता हूँ

बड़े-बड़े साधु पुरुष जो सदा ही मुक्त रहते हैं, आपकी भक्ति करते हैं, क्योंकि भक्ति केद्वारा ही इस संसार के मोहों से छुटकारा पाया जा सकता है।

हे भगवन्‌, मुक्त जीवों द्वारा आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण करने का एकमात्र कारण यही हो सकता है कि ऐसे जीव आपकेचरणकमलों का निरन्तर ध्यान धरते हैं।

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मन्ये गिरं ते जगतां विमोहिनींवरं वृणीष्वेति भजन्तमात्थ यत्‌ ।

वाचा नु तन्त्या यदि ते जनोसितः कथं पुनः कर्म करोति मोहित: ॥

३०॥

मन्ये--मानता हूँ; गिरमू--वाणी; ते--तुम्हारी; जगताम्‌-- भौतिक जगत के प्रति; विमोहिनीम्‌--मोहने वाली; वरम्‌--वर;वृणीष्व--स्वीकार करो ( माँगो ); इति--इस प्रकार; भजन्तम्‌ू--आपके भक्तों को; आत्थ--आपने कहा; यत्‌-- क्योंकि;वाचा--वेदों के कथन से; नु--निश्चय ही; तन्त्या--रस्सियों से; यदि--यदि; ते--तुम्हारे; जन: --सामान्य लोग; असितः --बँथेहुए नहीं; कथम्‌--कैसे; पुनः --फिर-फिर; कर्म--सकाम कर्म; करोति--करते हैं; मोहित:--मोहित होकर ।

हे भगवन्‌, आपने अपने विशुद्ध भक्त से जो कुछ कहा है, वह निश्चय ही अत्यन्त मोह मेंडालने वाला है।

आपने वेदों में जो लालच दिये हैं, वे शुद्ध भक्तों के लिए उपयुक्त नहीं हैं।

सामान्य लोग वेदों की अमृतवाणी से बँधकर कर्मफल से मोहित होकर पुनः पुनः सकाम कर्मोंमें लगे रहते हैं।

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त्वन्माययाद्धा जन ईश खण्डितोयदन्यदाशास्त ऋतात्मनोबुध: ।

यथा चरेद्वालहितं पिता स्वयंतथा त्वमेवाहसि न: समीहितुम्‌ ॥

३१॥

त्वत्‌ू--तुम्हारी; मायया--माया द्वारा; अद्धा--निश्चय ही; जन:--सामान्यजन; ईश--हे भगवान्‌; खण्डित:--विभक्त; यत्‌--क्योंकि; अन्यत्‌--अन्य; आशास्ते--कामना करते हैं; ऋत--वास्तविक; आत्मन:--अपने से; अबुध:--बिना जाने; यथा--जिस प्रकार; चरेत्‌--प्रवृत्त होता है; बाल-हितम्‌--अपने बालक का कल्याण; पिता--पिता; स्वयम्‌--स्वतः; तथा--उसीप्रकार; त्वमू--आप; एव--निश्चय ही; अर्हसि न: समीहितुम्‌--मेरे हित में करें।

है भगवन्‌, आपकी माया के कारण इस भौतिक जगत के सभी प्राणी अपनी वास्तविकस्वाभाविक स्थिति भूल गये हैं और वे अज्ञानवश समाज, मित्रता तथा प्रेम के रूप में निरन्तरभौतिक सुख की कामना करते हैं।

अतः आप मुझे किसी प्रकार का भौतिक लाभ माँगने केलिए न कहें, बल्कि जिस प्रकार पिता अपने पुत्र द्वारा माँगने की प्रतीक्षा किये बिना उसकेकल्याण के लिए सब कुछ करता है, उसी प्रकार से आप भी जो मेरे हित में हो मुझे प्रदान करें।

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मैत्रेय उवाचइत्यादिराजेन नुतः स विश्वद॒क्‌तमाह राजन्मयि भक्तिरस्तु ते ।

दिष्टय्रेदशी धीर्मयि ते कृता ययामायां मदीयां तरति सम दुस्त्यजाम्‌ ॥

३२॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; इति--इस प्रकार; आदि-राजेन--आदि राजा ( पृथु ) द्वारा; नुतः--पूजित होकर; सः--वह( भगवान्‌ ); विश्व-हक्‌--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को देखने वाला; तम्‌--उससे; आह--कहा; राजन्‌--हे राजा; मयि--मुझमें;भक्ति:--भक्ति; अस्तु--ऐसा ही हो; ते--तुम्हारा; दिछ्य्या--सौभाग्य से; ईहशी--इस प्रकार की; धी:--बुद्धि; मयि--मुझमें;ते--तुम्हारे द्वारा; कृता--किया जाकर; यया--जिससे; मायाम्‌--माया को; मदीयाम्‌--मेरा; तरति--पार करता है; स्म--निश्चय ही; दुस्त्यजाम्‌-त्यागने में कठिन |

मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा कि पृथु महाराज की प्रार्थना सुनकर ब्रह्माण्ड के साक्षी भगवान्‌ नेराजा को इस प्रकार सम्बोधित किया: हे राजन्‌, तुम्हारी मुझमें निरन्तर भक्ति बनी रहे।

ऐसे शुद्ध उद्देश्य से, जिसे तुमने बुद्धिमत्तापूर्वक व्यक्त किया है, दुर्लघ्य माया को पार किया जा सकता है।

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तत्त्व कुरु मयादिष्टमप्रमत्त: प्रजापते ।

मदादेशकरो लोक: सर्वत्राप्णोति शोभनम्‌ ॥

३३॥

तत्‌--अतः ; त्वम्‌--तुम; कुरू-- करो; मया--मेरे द्वारा; आदिष्टम्‌-- आज्ञा; अप्रमत्त:--दिग्भ्रमित हुए बिना; प्रजा-पते--हे प्रजाके स्वामी; मत्‌--मेरा; आदेश-करः--आज्ञा पालन करने वाला; लोक:--कोई व्यक्ति; सर्वत्र--सभी जगह; आणष्नोति--प्राप्तकरता है; शोभनमू-मड़ल।

हे प्रजा के पालक राजा, अब से मेरी आज्ञा का पालन करने में सावधानी बरतना और किसीभी प्रकार दिग्भ्रमित मत होना।

जो भी श्रद्धापूर्वक इस प्रकार मेरी आज्ञा का पालन करता हैउसका सर्वत्र मंगल होता है।

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मैत्रेय उवाचइति वैन्यस्य राजर्षे: प्रतिनन्द्यार्थवद्धच: ।

पूजितो<नुगृहीत्वैनं गन्तुं चक्रे च्युतो मतिम्‌ ॥

३४॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; इति--इस प्रकार; वैन्यस्थ--राजा बेन के पुत्र ( पृथु महाराज ) का; राज-ऋषे:--राजर्षि का;प्रतिनन्य--आदर करके; अर्थ-बत्‌ वच:--सारगर्भित प्रार्थना; पूजित:--पूजित होकर; अनुगृहीत्वा--अनुग्रह जता कर; एनम्‌--राजा पृथु; गन्तुम्‌--उस स्थान से जाने के लिए; चक्रे --निश्चय किया; अच्युत:--भूल न करने वाले, अर्थात्‌ अचूक भगवान्‌;मतिम्‌--मन।

मैत्रेय वे विदुर से कहा कि भगवान्‌ ने महाराज पृथु द्वारा की गई सारगर्भित प्रार्थना कीभूरि-भूरि प्रशंसा की।

इस प्रकार राजा द्वारा समुचित रूप से पूजित होकर भगवान्‌ ने उन्हेंआशीर्वाद दिया और प्रस्थान का निश्चय किया।

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देवर्षिपितृगन्धर्वसिद्धचारणपन्नगा: ।

किन्नराप्सरसो मर्त्या: खगा भूतान्यनेकशः ॥

३५॥

यज्ञेश्वरधिया राज्ञा वाग्वित्ताज्ललिभक्तित: ।

सभाजिता ययु: सर्वे वैकुण्ठानुगतास्ततः ॥

३६॥

देव--देवता; ऋषि--ऋषिगण; पितृ--पितृलोक के वासी; गन्धर्व--गन्धर्व लोक के वासी; सिद्ध--सिद्धलोक के वासी;चारण--चारणलोक के वासी; पन्नगाः--सर्पलोक के वासी; किन्नर--किन्नरलोक के वासी; अप्सरसः--अप्सरा लोक केवासी; मर्त्या:--पृथ्वी के वासी; खगा:--पक्षी; भूतानि--अन्य जीवात्माएँ; अनेकश:--अनेक; यज्ञ-ई ध्वर-धिया-- अपने कोपरमेश्वर का अंश मानने वाली बुद्धि से; राज्ञा--राजा द्वारा; वाक्‌ु--मधुर शब्दों से; वित्त--सम्पत्ति; अज्ललि--करबद्ध;भक्तित:--भक्तिभाव से; सभाजिता: -- भली भाँति पूजित; ययु:--चले गये; सर्वे--सभी; वैकुण्ठ-- भगवान्‌ विष्णु के;अनुगता:--अनुचर; ततः--वहाँ से

राजा पृथु ने देवताओं, ऋषियों, पितृलोक, गंधर्वलोक, सिद्धलोक, चारणलोक,पन्नगलोक, किन्नरलोक, अप्सरो लोक तथा पृथ्वीलोक और पक्षियों के लोक के वासियों कीपूजा की।

उन्होंने यज्ञस्थल पर उपस्थित अन्य अनेक जीवों की पूजा की।

उन्होंने इन सबकी तथाभगवान्‌ के पार्षदों की मधुर वचन तथा यथासम्भव धन के द्वारा, हाथ जोड़कर पूजा की।

इसउत्सव के बाद भगवान्‌ विष्णु के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए वे सभी अपने-अपने लोकोंको चले गये।

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भगवानपि राजर्षे: सोपाध्यायस्य चाच्युतः ।

हरन्निव मनोअमुष्य स्वधाम प्रत्यपद्मयत ॥

३७॥

भगवान्‌-- भगवान्‌; अपि-- भी; राज-ऋषे: --राजर्षि का; स-उपाध्यायस्य-- अन्य समस्त पुरोहितों सहित; च--भी; अच्युत:--अचूक भगवान्‌; हरन्‌ू--मोहते हुए; इव--निस्सन्देह; मन: --मन; अमुष्य--उसका; स्व-धाम-- अपने धाम को; प्रत्यपद्मयत--लौट गये।

राजा तथा वहाँ पर उपस्थित पुरोहितों के मनों को मोहित करने के बाद अच्युत भगवान्‌परव्योम में अपने धाम वापस चले गये।

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अदृष्टाय नमस्कृत्य नृपः सन्दर्शितात्मने ।

अव्यक्ताय च देवानां देवाय स्वपुरं ययौ ॥

३८॥

अदृष्टाय--जो दृष्टि से नहीं देखा जा सकता है उसको; नमः-कृत्य--नमस्कार करके; नृप:ः--राजा; सन्दर्शित-- अभिव्यक्त,प्रकट; आत्मने--परमात्मा को; अव्यक्ताय--जो भौतिक जगत में प्रकट न हो सके; च-- भी; देवानाम्‌--देवताओं के;देवाय--पर मे श्वर को; स्व-पुरम्‌ू-- अपने घर को; ययौ--लौट गये |

तत्पश्चात्‌ राजा पृथु ने समस्त देवों के परम स्वामी भगवान्‌ को सादर नमस्कार किया।

यद्यपिवे भौतिक दृष्टि से देखे जाने की वस्तु नहीं हैं, फिर भी भगवान्‌ ने महाराज पृथु के नेत्रों के समक्षअपने को प्रकट किया।

भगवान्‌ को नमस्कार करके राजा अपने घर चले आये।

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