← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची
अध्याय इक्कीसवाँ: महाराज पृथु द्वारा निर्देश
4.21मैत्रेय उवाचमौक्तिकै: कुसुमस्नग्भिर्दुकूलैः स्वर्णतोरणै: ।
महासुरभिभिर्धूपैमण्डितं तत्र तत्र वै ॥
१॥
मैत्रेय: उबाच--मैत्रेय ने कहा; मौक्तिके:--मोतियों से; कुसुम--फूलों की; स्त्रग्भिः--मालाओं से; दुकूलैः--वस्त्र से; स्वर्ण--सुनहले; तोरणै: --द्वारों से; महा-सुरभिभि:-- अत्यधिक सुगन्धित; धूपैः--धूप ( सुगन्धित द्रव्य ) से; मण्डितम्ू--अलंकृत; तत्रतत्र--वहाँ-वहाँ; वै--निश्चय ही।
महर्षि मैत्रेय ने विदुर से कहा : जब राजा ने अपनी नगरी में प्रवेश किया, तो उसके स्वागतके लिए नगरी को मोतियों, पुष्पहारों, सुन्दर वस्त्रों तथा सुनहरे द्वारों से सुन्दर ढंग से सजाया गयाथा और सारी नगरी अत्यन्त सुगन्धित धूप से सुवासित थी।
"
अन्दनागुरुतोयाद्ररथ्याचत्वरमार्गवत् ।
पुष्पाक्षतफलैस्तोक्मैलजिरचिंभिरचिंतम् ॥
२॥
'चन्दन--चन्दन; अगुरु--एक सुगन्धित बूटी, अरगजा; तोय--जल से; आई--छिड़का हुआ; रथ्या--रथमार्ग; चत्वर--छोटाउद्यान; मार्गवत्--गलियाँ; पुष्प--फूल; अक्षत-- अखंड, समूचे; फलैः--फलों के द्वारा; तोक्मै:--खनिज; लाजैः--गीले अन्न;अर्चिर्भि:--दीपकों से; अर्चितम्--सजाया गया।
नगर भर की गलियाँ, सड़कें तथा छोटे पार्क चन्दन तथा अरगजा के सुगन्धित जल से सींचदिये गये थे और सर्वत्र समूचे फलों, फूलों, भीगोए हुए अन्नों, विविध खनिजों तथा दीपों केअलंकरणों से सजे थे।
सभी मांगलिक वस्तुओं के दृश्य उपस्थित कर रहे थे।
"
सवृन्दे: कदलीस्तम्भे: पूणपोतैः परिष्कृतम् ।
तरुपल्लवमालाभिः सर्वतः समलड्डू तम् ॥
३॥
स-वृन्दै:--फूलों तथा फलों के सहित; कदली-स्तम्भेः--केले के ख भों से; पूग-पोतैः --सुपारी की टहनियों से; परिष्कृतम्--सुन्दर ढंग से स्वच्छ किये गये; तरू--नये पौधे; पललब-- आम की नवीन कोंपलें; मालाभि: --मालाओं से; सर्वतः--सर्वत्र;समलहड्डू तम्--अच्छी तरह सजाया हुआ।
चौराहों पर फलों तथा फूलों के गुच्छे एवं केले के ख भे तथा सुपारी की टहनियाँ लगाईगईं थी।
यह सारी सजावट मिलकर अत्यन्त आकर्षक लग रही थी।
"
प्रजास्तं दीपबलिभि: सम्भूताशेषमड़लैः ।
अभीयुर्मुष्ट कन्याश्व मृष्टकुण्डलमण्डिता: ॥
४॥
प्रजा:--नागरिक; तम्--उसको; दीप-बलिभि:--दीपों से; सम्भूत--सज्जित; अशेष--अपार; मड्लै: --मांगलिक सामग्री से;अभीयु:--स्वागत के लिए आगे आये; मृष्ट--सुन्दर कान्ति वाली; कन्या: च--तथा अविवाहित लड़कियाँ; मृष्ट--टकराते हुए;कुण्डल--कान का आभूषण; मण्डिता:--अलंकृत |
जब राजा ने नगर में प्रवेश किया, तो समस्त नागरिकों ने दीप, पुष्प तथा दधि जैसे अनेकमांगलिक द्रव्यों से उनका स्वागत किया।
राजा की अगवानी अनेक सुन्दर कन््याओं ने भी कीजिनके शरीर विविध आभूषणों से सुशोभित थे और जिनके कुण्डल परस्पर टकरा रहे थे।
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शद्डुदुन्दुभिघोषेण ब्रह्मघोषेण चर्तिजाम् ।
विवेश भवन वीर: स्तूयमानो गतस्मय: ॥
५॥
शट्डभु--शंख; दुन्दुभि--दुन्दुभियों के; घोषेण--शब्द से; ब्रह्य--वैदिक; घोषेण--उच्चारण से; च-- भी; ऋत्विजाम्--पुरोहितोंके; विवेश-- प्रवेश किया; भवनम्--महल में; वीर: --राजा; स्तूयमान:--पूजित होकर; गत-स्मय:--अहंकार-रहित |
जब राजा ने महल में प्रवेश किया, तो शंख तथा दुन्दुभियाँ बजने लगीं, पुरोहित-गणवैदिक मंत्रों का उच्चारण करने लगे और बन्दीजन विभिन्न प्रकार से स्तुतिगान करने लगे।
किन्तुइतने स्वागत-समारोह के बावजूद राजा पर रज्जमात्र भी प्रभाव नहीं पड़ा।
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पूजितः पूजयामास तत्र तत्र महायशा: ।
पौराज्जानपदांस्तांस्तान्प्रीतः प्रियवरप्रद: ॥
६॥
'पूजित:--पूजा जाकर; पूजयाम् आस--पूजा की; तत्र तत्र--जहाँ-तहाँ, सर्वत्र; महा-यशा:--महान् कार्य करने वाले; पौरान्--नगर के भद्र जन; जान-पदान्--सामान्य नागरिक; तान् तान्ू--उसी प्रकार से; प्रीतः--प्रसन्न किया; प्रिय-वर-प्रद:ः --समस्त वरदेने के लिए प्रस्तुत।
नगर के भद्र तथा सामान्य जनों ने राजा का हार्दिक स्वागत किया और राजा ने भी उन्हेंमनवांछित आशीर्वाद दिया।
"
स एवमादीन्यनवद्यचेष्टित:कर्माणि भूयांसि महान्महत्तम: ।
कुर्वन्शशासावनिमण्डलं यश:स्फीतं॑ निधायारुरुहे परं पदम् ॥
७॥
सः--राजा पृथु; एवम्--इस प्रकार; आदीनि-- प्रारम्भ से ही; अनवद्य--उदार; चेष्टित:--विभिन्न कार्य करते हुए; कर्माणि--कार्य; भूयांसि--बारम्बार; महान्ू--महान्; महत्-तम: --सबसे महान्; कुर्वन्ू--करते हुए; शशास--राज्य किया; अवनि-मण्डलम्--पृथ्वी पर; यश:--ख्याति; स्फीतम्--व्यापक; निधाय--प्राप्त करके; आरुरुहे -- प्राप्त किया; परम् पदम्-- परमे श्वरके चरणकमलों को ।
राजा पृथु महानतम से भी महान् महापुरुष थे, अतः वे सबों के पूज्य थे।
उन्होंने पृथ्वी परशासन करते हुए अनेक प्रशंसनीय कार्य किये और अत्यन्त उदार बने रहे।
ऐसी महान् सफलताप्राप्त कर तथा सारे विश्व में अपनी कीर्ति फैलाकर अन्त में वे भगवान् के चरणकमलों को प्राप्तहुए।
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सूत उबाचतदादिराजस्य यशो विजृम्भितंगुणैरशेषैर्गुणवत्सभाजितम् ।
क्षत्ता महाभागवतः सदस्पतेकौषारविं प्राह गृणन्तमर्चयन् ॥
८॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; तत्--वह; आदि-राजस्य--आदि राजा की; यश: --ख्याति; विजृम्भितम्-- अत्यन्त योग्य;गुणैः--गुणों से; अशेषै: -- असीम; गुण-वत्--उपयुक्त; सभाजितम्-- प्रशंसित होकर; क्षत्ता--विदुर; महा-भागवत:--परम-भक्त; सदः-पते--ऋषियों के नायक; कौषारविमू--मैत्रेय से; प्राह-- कहा; गृणन्तम्--बातें करते; अर्चयन्--सादर नमस्कारकरते
सूत गोस्वामी ने आगे कहा : हे ऋषियों के नायक शौनक जी, संसार भर में अत्यन्त योग्य,महिमामंडित तथा जगत भर में प्रशंसित आदि राजा पृथु के विविध कार्यों के विषय में मैत्रेयऋषि को इस प्रकार कहते हुए सुनकर महान् भक्त विदुर ने अत्यन्त विनीत भाव से उनकी पूजाकी और उनसे निम्नानूसार प्रश्न किया।
"
विदुर उवाचसोभिषिक्तः पृथुर्विप्रैलब्धाशेषसुराहण: ।
बिश्रत्स वैष्णवं तेजो बाह्नोर्याभ्यां दुदोह गाम् ॥
९॥
विदुरः उबाच--विदुर ने कहा; सः--वह ( राजा पृथु ); अभिषिक्त:--राज्याभिषेक होने पर; पृथु:--राजा पृथु; विप्रै:--ऋषियोंतथा ब्राह्मणों द्वारा; लब्ध--प्राप्त: अशेष--असंख्य; सुर-अर्हण:--देवताओं द्वारा दिये गये उपहार; बिभ्रत्ू--विस्तार किया;सः--उसने; वैष्णवम्-- भगवान् विष्णु से प्राप्त; तेज:--शक्ति; बाह्नेः-- भुजाएँ; याभ्याम्--जिनसे; दुदोह--दुहा; गामू--पृथ्वीको
विदुर ने कहा: हे ब्राह्मण मैत्रेय, यह जानकर अत्यंत हर्ष हो रहा है कि ऋषियों तथाब्राह्मणों ने राजा पृथु का राज्याभिषेक किया।
सभी देवताओं ने उन्हें अनेक उपहार दिये और उन्होंने स्वयं भगवान् विष्णु से शक्ति प्राप्त करके अपने प्रभाव का विस्तार किया।
इस प्रकारउन्होंने पृथ्वी का अत्यधिक विकास किया।
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को न्वस्य कीर्ति न श्रुणोत्यभिज्ञोयद्विक्रमोच्छिष्टमशेषभूपा: ।
लोकाः सपाला उपजीवन्ति काम-मद्यापि तन्मे वद कर्म शुद्धम् ॥
१०॥
कः--कौन; नु--लेकिन; अस्य--इस राजा पृथु की; कीर्तिम्ू--ख्याति; न श्रूणोति--नहीं सुनता; अभिज्ञ:--बुद्धिमान; यत्--उसका; विक्रम--वीरता; उच्छिष्टमू--जूठन; अशेष-- असंख्य; भूषा:--राजा; लोका:--लोक; स-पाला: --अपने देवताओंसहित; उपजीवन्ति--जीवन यापन करते हैं; कामम्--वांछित वस्तुएँ; अद्य अपि--आज भी; तत्--वह; मे--मुझसे; वद--कृपया कहो; कर्म--कार्य ; शुद्धमू--शुभ
पृथु महाराज के कर्म इतने महान् थे और उनकी शासन-प्रणाली इतनी उदार थी कि आजभी सभी राजा तथा विभिन्न लोकों के देवता उनके चरण-चिह्नों पर चलते हैं।
भला ऐसा कौनहोगा जो उनकी कीर्तिमय कार्यों को सुनना नहीं चाहेगा ? उनके कर्म इतने पवित्र तथा शुभ हैं किमैं उनके सम्बन्ध में पुनः पुनः सुनना चाहता हूँ।
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मैत्रेय उवाचगड्जयमुनयोर्नद्योरन्तरा क्षेत्रमावसन् ।
आरब्धानेव बुभुजे भोगान्पुण्यजिहासया ॥
११॥
मैत्रेय: उबाच--मैत्रेय ने कहा; गड्भा--गंगा नदी; यमुनयो:--यमुना नदी के; नद्यो:--दो नदियों के; अन्तरा--मध्यवर्ती ;क्षेत्रमू-- भूमि में; आवसन्--रहते हुए; आरब्धान्-- प्रारब्धवश; एव--सहृश; बुभुजे-- भोग किया; भोगान्--सम्पत्ति; पुण्य--पवित्र कार्य; जिहासया--कम करने के लिए।
मैत्रेय ऋषि ने विदुर से कहा : हे विदुर, राजा पृथु गंगा तथा यमुना इन दो महान् नदियों केमध्यवर्ती भूभाग में रहते थे।
वे अत्यन्त ऐश्वर्यवान थे, अतः ऐसा प्रतीत होता था मानो अपने पूर्वपुण्यों के फल को कम करने के लिए ही प्रारब्ध से प्राप्त सम्पत्ति का भोग कर रहे थे।
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सर्वत्रास्खलितादेश: सप्तद्वीपैकदण्डधृक् ।
अनन्यत्र ब्राह्मणकुलाद-न्यत्राच्युतगोत्रतः ॥
१२॥
सर्वत्र--सभी स्थानों पर; अस्खलित--अखण्ड, अटल; आदेश:--आज्ञा; सप्त-द्वीप--सात द्वीप; एक--एक; दण्ड- धूक्ू --राजदण्ड धारण करने वाला; अन्यत्र--के अतिरिक्त; ब्राह्मण-कुलात्--ब्राह्मण तथा साधु पुरुष; अन्यत्र--के अतिरिक्त;अच्युत-गोत्रतः-- भगवान् के वंशज ( वैष्णव )
महाराज पृथु चक्रवर्ती राजा थे और इस भूमण्डल के सातों द्वीपों पर शासन करने के लिएराजदण्ड धारण करने वाले थे।
उनके अटल आदेश का उल्लंघन साधु-जनों, ब्राह्मणों औरवैष्णवों के अतिरिक्त कोई नहीं कर सकता था।
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एकदासीन्महासत्रदीक्षा तत्र दिवौकसाम् ।
समाजो ब्रह्मर्षणां च राजर्षीणां च सत्तम ॥
१३॥
एकदा--एक बार; आसीतू--ब्रत लिया; महा-सत्र--महान् यज्ञ; दीक्षा--दी क्षा; तत्र--उस उत्सव में; दिव-ओकसामू--देवताओं का; समाज:--सभा; ब्रह्म-ऋषीणाम्--परम साधु ब्राह्मणों का; च-- भी; राज-ऋषीणाम्--परम साधु राजाओं का;च--भी; सत्-तम--सबसे महान् भक्त
एक बार राजा पृथु ने एक महान् यज्ञ सम्पन्न करने का ब्रत लिया जिसमें ऋषि, ब्राह्मण,स्वर्गलोक के देवता तथा बड़े-बड़े राजर्षि एकत्र हुए।
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तस्मिन्नईत्सु सर्वेषु स्वर्चितेषु यथाईतः ।
उत्थितः सदसो मध्ये ताराणामुडुराडिव ॥
१४॥
तस्मिन्--उस सभा में; अ्हत्सु--पूज्यों का; सर्वेषु--सभी; सु-अर्चितेषु-- भली-भाँति पूजित; यथा-अर्हत:--योग्यता केअनुसार; उत्थितः:--उठकर खड़े हो गये; सदस:--सभासदों के; मध्ये--बीच; ताराणाम्--तारों के; उडु-राट्--चन्द्रमा; इब--सहश।
उस महान् सभा में महाराज पृथु ने सर्वप्रथम समस्त सम्मानीय अतिथियों की उनके पदों केअनुसार यथा-योग्य पूजा की।
फिर वे उस सभा के मध्य में खड़े हो गये।
ऐसा प्रतीत हुआ मानोतारों के बीच पूर्ण चन्द्रमा का उदय हुआ हो।
"
प्रांश: पीनायतभुजो गौर: कजञ्जारुणेक्षण: ।
सुनासः सुमुखः सौम्य:ः पीनांस: सुद्विजस्मित: ॥
१५॥
प्रांश:--अत्यन्त ऊँचा; पीन-आयत--पूर्ण तथा चौड़ी; भुज:--बाँहें; गौर: --गोरे रंग का; कञ्ल--कमल के समान; अरुण-ईक्षण:--चमकीले नेत्र, जो सूर्योदय के समान हैं; सु-नास:--सीधी नाक; सु-मुख: --सुन्दर मुँह; सौम्य: --सौम्य; पीन-अंस:ः--उठे हुए कंधे; सु--सुन्दर; द्विज--दाँत; स्मित:--हँसते हुए।
राजा पृथु का शरीर अत्यन्त ऊँचा और पुष्ठ था और उनका रंग गोरा था।
उनकी बाहें पूर्णतथा चौड़ी और नेत्र उदीयमान सूर्य के समान चमकीले थे।
उनकी नाक सीधी, मुख अत्यन्तसुन्दर तथा व्यक्तित्व सौम्य था।
मुस्कान से युक्त उनके मुख में दाँत सुन्दर ढंग से लगे थे।
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व्यूढवक्षा बृहच्छोणिवलिवल्गुदलोदर: ।
आवर्तनाभिरोजस्वी काझ्जनोरुरुदग्रपात् ॥
१६॥
व्यूढड--चौड़ी; वक्षा:--छाती; बृहत्-श्रोणि:-- चौड़ी कमर; वलि--झुर्रियाँ, सिलवट; वल्गु--अत्यन्त सुन्दर; दल--वटवृक्ष कीपत्ती के समान; उदरः--पेट; आवर्त--कुण्डलीदार; नाभि:--नाभि; ओजस्वी--प्रकाशयुक्त; काञ्नन--सुनहली; उरु:--जाँँें;उदग्र-पात्-- उभरे हुए पंजे।
महाराज पृथु की छाती चौड़ी थी, उनकी कमर अत्यन्त स्थूल तथा उनका उदर बल पड़े हुएहोने के कारण वट वृक्ष की पत्तियों की रचना के समान लग रहा था।
उनकी नाभि भौँवर जैसीतथा गहरी, उनकी जाँघें सुनहरे रंग की तथा उनके पंजे उभरे हुए थे।
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सूक्ष्मवक्रासितस्निग्धमूर्धज: कम्बुकन्धरः ।
महाधने दुकूलाछये परिधायोपवीय च ॥
१७॥
सूक्ष्म--अत्यन्त महीन; वक्र--घुँघराले; असित--काले; स्निग्ध--चिकने; मूर्थज:--सिर के बाल; कम्बु--शंख सहश;कन्धरः --गला; महा-धने--अत्यन्त मूल्यवान; दुकूल-अछये -- धोती पहने; परिधाय--शरीर के ऊपरी भाग में; उपबीय--जनेऊके समान रखा हुआ; च--भी |
उनके सिर के काले तथा चिकने बाल अत्यन्त सुन्दर तथा घुँघराले थे और शंख जैसी गरदनशुभ रेखाओं से अलंकृत थी।
बे अत्यन्त मूल्यवान धोती पहने थे और शरीर के ऊपरी भाग मेंसुन्दर सी चादर ओडढ़े थे।
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व्यज्ञलिताशेषगात्रश्रीनियमे न््यस्तभूषण: ।
कृष्णाजिनधर: श्रीमान्कुशपाणि: कृतोचित: ॥
१८ ॥
व्यद्ञित--सूचित; अशेष--असंख्य; गात्र--शारीरिक; श्री:--शोभा; नियमे--नियमित; न्यस्त--त्यक्त; भूषण: --वस्त्र;कृष्ण--काला; अजिन-- चमड़ी; धर:-- धारण किये; श्रीमान्--सुन्दर; कुश-पाणि:--उँगलियों में कुश धारण किये; कृत--सम्पन्न किया; उचितः--वाउिछत |
चूँकि महाराज को यज्ञ सम्पन्न करने के लिए दीक्षित किया जा रहा था, अतः उन्हें अपनेबहुमूल्य वस्त्र उतारने पड़े थे, जिससे उनका प्राकृतिक शारीरिक सौन्दर्य दृष्टिगोचर हो रहा था।
उन्हें काला मृग चर्म पहने तथा उँगली में कुश-वलय ( पैती ) पहने देखकर अच्छा लग रहा था,क्योंकि इससे उनकी शारीरिक कान्ति बढ़ गई थी।
ऐसा प्रतीत होता है कि यज्ञ के पूर्व महाराजपृथु समस्त विधि-सम्मत कृत्य सम्पन्न कर चुके थे।
"
शिशिरस्निग्धताराक्ष: समैक्षत समन्ततः ।
ऊचिवानिदमुर्वीश: सद:ः संहर्षयन्निव ॥
१९॥
शिशिर--ओस; स्निग्ध--गीला; तारा--नक्षत्र; अक्ष:--आँखें ; समैक्षत--देखा; समन्तत:--चारों ओर; ऊचिवान्--बोलनेलगा; इृदम्--यह; उर्वीश:--अत्यन्त सम्मान्य; सदः--सदस्यों के मध्य; संहर्षबन्--उनकी प्रसन्नता को बढ़ाते हुए; इब--मानो |
सभा के सदस्यों को प्रोत्साहित करने तथा उनकी प्रसन्नता को बढ़ाने के लिए राजा पृथु ने,ओस से नम आकाश में तारों के समान नेत्रों से, उन पर दृष्टि फेरी और फिर गम्भीर वाणी मेंउनसे कहा।
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चारु चित्रपदं एलक्ष्णं मृष्ट गूहमविक्लवम् ।
सर्वेषामुपकारार्थ तदा अनुवदन्निव ॥
२०॥
चारु--सुन्दर; चित्र-पदम्--अलंकारिक; श्लक्ष्णम्--अत्यन्त स्पष्ट; मृष्टमू--महान्; गूढम््--सार्थक; अविक्लवम्--निःशंक;सर्वेषामू--सबों को; उपकार-अर्थम्--लाभ पहुँचाने के लिए; तदा--उस समय; अनुवदन्--दुहराने लगा; इब--समान।
महाराज पृथु की वाणी अत्यन्त सुन्दर आलंकारिक भाषा से युक्त, सुस्पष्ट तथा श्रुतिमधुरथी।
उनके शब्द अत्यन्त गभ्भीर तथा अर्थवान् थे।
ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे बोलते समयपरम सत्य सम्बन्धी अपनी निजी अनुभूति व्यक्त कर रहे थे जिससे वहाँ पर उपस्थित सभी लोगलाभ उठा सकें।
"
राजोबाचसभ्या: श्रणुत भद्वं वः साधवो य इहागता: ।
सत्सु जिज्ञासुभिर्धर्ममावेद्यं स््वमनीषितम् ॥
२१॥
राजा उबाच--राजा ने कहा; सभ्या:--हे देवियों और सज्जनों; श्रुणुत--कृपा करके सुनिये; भद्रमू--कल्याण; व: --तुम्हारा;साधव: --समस्त महापुरुष; ये--जो; इह--यहाँ; आगता: --उपस्थित; सत्सु-- भद्ग पुरुषों के प्रति; जिज्ञासुभि:--जानने केइच्छुक; धर्मम्-धार्मिक नियम; आवेद्यमू--निवेदन करे; स्व-मनीषितम्--अपना-अपना निश्चय
राजा पृथु ने कहा : हे सभासदो, आप सब का कल्याण हो।
जितने भी महापुरुष इस सभामें उपस्थित हुए हैं, बे मेरी प्रार्थना को ध्यानपूर्वक सुनें।
जो भी व्यक्ति वास्तव में कुछ जानने काइच्छुक हो वह भद्ग-जनों की इस सभा के समक्ष अपना निश्चय प्रस्तुत करे।
"
अहं दण्डधरो राजा प्रजानामिह योजितः ।
रक्षिता वृत्तिदः स्वेषु सेतुषु स्थापिता पृथक् ॥
२२॥
अहम्--ैं; दण्ड-धर:--राजदण्ड धारण करने वाला; राजा--राजा; प्रजानाम्-- प्रजा का; इह--इस संसार में; योजित:--तत्पर; रक्षिता--रक्षक; वृत्ति-द:--आजीविका देने वाला; स्वेषु--अपने आप में; सेतुषु--अपनी-अपनी सामाजिक व्यवस्थाओं( मर्यादा ) में; स्थापिता--स्थापित; पृथक्ू--अलग-अलग
राजा पृथु ने आगे कहा : भगवत्कृपा से मैं इस लोक का राजा नियुक्त हुआ हूँ और मैं प्रजाके ऊपर शासन करने, उसे विपत्ति से बचाने तथा वैदिक आदेश से स्थापित सामाजिक व्यवस्थामें प्रत्येक की स्थिति के अनुसार उसे आजीविका प्रदान करने के लिए यह राजदण्ड धारण कररहा हूँ।
"
तस्य मे तदनुष्ठानाद्यानाहुर्ब्रह्यवादिन: ।
लोकाः स्यु: कामसन्दोहा यस्य तुष्यति दिष्टटक् ॥
२३॥
तस्य--उसका; मे--मेरा; ततू--उस; अनुष्ठानातू--सम्पन्न करने से; यान्ू--वह जो; आहुः--कहा जाता है; ब्रह्म-वादिन: --वैदिक ज्ञान के वेत्ता; लोका:-- भूखंड; स्यु:--होए; काम-सन्दोहा:--इच्छित लक्ष्यों की पूर्ति के लिए; यस्थ--जिसका;तुष्यति--संतुष्ट होता है; दिष्ट-हक्--नियति का द्रष्टा।
महाराज पृथु ने कहा : मेरा विचार है कि राजा के कर्तव्य-पालन करने से मैं बैदिक ज्ञान केवेत्ताओं द्वारा वर्णित अभीष्ट उद्देश्य प्राप्त कर सकूंगा।
यह गन्तव्य निश्चय ही भगवान् की प्रसन्नतासे प्राप्त होता है, जो समस्त नियति का द्रष्टा है।
"
य उच्रेत्करं राजा प्रजा धर्मेष्वशिक्षयन् ।
प्रजानां शमलं भुड्ढे भगं च स्वं जहाति सः ॥
२४॥
यः--जो कोई ( राजा या शासक ); उद्धरेत्--वसूल करते हैं; करम्--कर, टैक्स; राजा--राजा; प्रजा:--नागरिक; धर्मेषु--अपने-अपने कर्तव्यों में; अशिक्षयन्--उन्हें उनके कर्तव्यों की शिक्षा दिये बिना; प्रजानामू--नागरिकों का; शमलम्--अपवित्र;भुड़े -- भोगता है; भगम्--धन; च--भी; स्वम्--अपना; जहाति--त्यागता है; सः--वह राजा |
कोई राजा जो अपनी प्रजा को वर्ण तथा आश्रम के अनुसार अपने-अपने कर्तव्यों को करनेकी शिक्षा न देकर उनसे केवल कर और उपकर वसूल करता है, उसे प्रजा द्वारा किये गयेअपवित्र कार्यों के लिए दण्ड भोगना होता है।
ऐसी अवनति के साथ ही राजा की अपनी सम्पदाभी जाती रहती है।
"
तत्प्रजा भर्तृपिण्डार्थ स्वार्थमेवानसूयव: ।
कुरुताधोक्षजधियस्तर्हि मेउनुग्रह: कृतः ॥
२५॥
तत्--अतः; प्रजा:--हे प्रजागण; भर्तू--स्वामी के; पिण्ड-अर्थम्--मृत्यु के पश्चात् कल्याण; स्व-अर्थम्--अपना हित; एब--निश्चय ही; अनसूयव:--बिना ईर्ष्या के; कुरुत--करो; अधोक्षज-- भगवान्; धिय:--उनका चिन्तन; तहिं--अतः; मे--मुझपर; अनुग्रह:--कृपा; कृत:ः--की गई।
पृथु महाराज ने आगे कहा : अतः प्रिय प्रजाजनों, तुम्हें अपने राजा की मृत्यु के बाद उसकेकल्याण के लिए वर्ण तथा आश्रम की अपनी-अपनी स्थितियों के अनुसार अपने-अपने कर्तव्योंका उचित ढंग से पालन करना चाहिए और उस के साथ ही अपने हृदयों में भगवान् का निरन्तरचिन्तन करना चाहिए।
ऐसा करने से तुम अपने हितों की रक्षा कर सकोगे और अपने राजा कीमृत्यु के उपरान्त उसके कल्याण के लिए अनुग्रह प्रदान कर सकोगे।
"
यूयं तदनुमोदध्व॑ पितृदेवर्षयोमला: ।
कर्तुः शास्तुरनुज्ञातुस्तुल्य॑ यत्प्रेत्य तत्फलम् ॥
२६॥
यूयम्--यहाँ पर उपस्थित तुम सभी; तत्--उस; अनुमोदध्वम्--मेरे प्रस्ताव का अनुमोदन करें; पितृ--पितृलोक से आने वालेलोग; देव--स्वर्ग से आने वाले लोग; ऋषय:--बड़े-बड़े मुनि तथा साधुपुरुष; अमला:--पापकर्मो से निर्मल; कर्तु:--कर्ता;शास्तु:--आज्ञा देने वाला; अनुज्ञातु:--समर्थक का; तुल्यम्--समान; यत्--जो; प्रेत्य--मरकर; तत्ू--वह; फलमू--फल।
मैं समस्त शुद्ध अन्तःकरण वाले देवताओं, पितरों तथा साथधुपुरुषों से प्रार्थना करता हूँ कि वेमेरे प्रस्ताव का समर्थन करें, क्योंकि मृत्यु के पश्चात् किसी भी कर्म का फल इसके कर्ता,आदेशकर्ता तथा समर्थक के द्वारा समान रूप से भोग्य होता है।
"
अस्ति यज्ञपतिर्नाम केषाञ्ञिदर्हसत्तमा: ।
इहामुत्र च लक्ष्यन्ते ज्योत्स्नावत्य: क्वचिद्धुव:ः ॥
२७॥
अस्ति--है; यज्ञ-पति:--समस्त यज्ञों का भोक्ता; नाम--नामक; केषाझ्लित्ू--कुछ के मत से; अह-सत्तमा:--हे माननीय;इह--इस लोक में; अमुत्र--मृत्यु के बाद; च--भी; लक्ष्यन्ते--दृष्टिगोचर हैं; ज्योत्स्ना-वत्य:--शक्तिमान, सुन्दर; क्वचित्--कहीं कहीं; भुवः--शरीर
माननीय देवियो तथा सज्जनो, शास्त्रों के प्रामाणिक कथनों के अनुसार कोई ऐसा परमअधिकारी होना चाहिए जो हमें अपने-अपने वर्तमान कार्यों के अनुसार पुरस्कृत कर सके।
अन्यथा इस जीवन में तथा मृत्यु के बाद के जीवन में कुछ लोग असामान्य सुन्दर तथा शक्तिमानक्योंकर हो सकते हैं ?"
मनोरुत्तानपादस्य श्रुवस्थापि महीपते: ।
प्रियब्रतस्य राजर्षेरड्रस्यास्मत्पितु: पितु: ॥
२८॥
ईहृशानामथान्येषामजस्य च भवस्य च ।
प्रह्मदस्य बलेश्रापि कृत्यमस्ति गदाभूृता ॥
२९॥
मनो:--मनु ( स्वायंभुव मनु ) के; उत्तानपादस्य-- श्रुव महाराज के पिता उत्तानपाद के; ध्रुवस्थ-- ध्रुव महाराज के; अपि--निश्चयही; मही-पतेः--राजा के; प्रियत्रतस्थ-- श्वुव महाराज के परिवार में प्रियत्रत के ; राजर्षे: --राजर्षि का; अड्डस्य--अड़ के;अस्मत्-मेरे; पितु:--पिता के; पितु:--पिता के; ईहशानाम्--ऐसे महापुरुषों के; अथ-- भी; अन्येषाम्--अन्यों के; अजस्थ--परम अमर के; च-- भी; भवस्य--जीवात्माओं के ; च-- भी; प्रह्मदस्य--महाराज प्रह्माद के; बलेः--महाराज बलि के; च--भी; अपि--निश्चय ही; कृत्यम्--उनके द्वारा स्वीकार किया हुआ; अस्ति-- है; गदा-भूता--गदा धारण करने वाले भगवान् |
इसकी पुष्टि न केवल वेदों के साक्ष्य से होती है, अपितु मनु, उत्तानपाद, श्रुव, प्रियत्रत तथामेरे पितामह अंग एवं महाराज प्रह्मद तथा बलि जैसे अन्य महापुरुषों तथा सामान्य व्यक्तियों केव्यक्तिगत आचरण द्वारा होती है।
ये सभी आस्तिक थे और गदाधारी भगवान् के अस्तित्व मेंविश्वास करने वाले थे।
"
दौहित्रादीनृते मृत्यो: शोच्यान्धर्मविमोहितान् ।
वर्गस्वर्गापवर्गाणां प्रायेणैकात्म्यहेतुना ॥
३०॥
दौहित्र-आदीनू--मेरे पिता बेन जैसे दौहित्र; ऋते--के अतिरिक्त; मृत्यो:--मृत्यु के; शोच्यान्ू--शोचनीय; धर्म-विमोहितानू--धर्म के पथ पर मोहग्रस्त हुए; वर्ग--धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष; स्वर्ग--स्वर्गलोक तक ऊपर उठना; अपवर्गाणामू-- भौतिककल्मष से मुक्त; प्रायेण--प्रायः; एक--एक; आत्म्य-- श्री भगवान्; हेतुना--के कारण |
यद्यपि धर्म के पथ पर साक्षात् मृत्यु के दौहित्र तथा मेरे पिता वेन जैसे शोचनीय पुरुषमोहग्रस्त हो जाते हैं, किन्तु ऊपर जिन समस्त महापुरुषों का उल्लेख हुआ है, वे यह स्वीकारकरते हैं कि चतुर्वर्गो--धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष--का अथवा स्वर्ग के एकमात्र दाता पूर्णपुरुषोत्तम परमेश्वर हैं।
"
यत्पादसेवाभिरुचिस्तपस्विना-मशेषजन्मोपचितं मल॑ धियः ।
सद्यः क्षिणोत्यन्वहमेधती सतीयथा पदाडुष्ठविनि:सृता सरित् ॥
३१॥
यत्-पाद--जिनके चरणकमल की; सेवा--सेवा; अभिरुचि: --रुचि; तपस्विनामू--कठिन तपस्या करने वाले व्यक्ति;अशेष--असंख्य; जन्म--जन्म; उपचितम्--ग्रहण करते हैं; मलम्--गन्दगी; धिय:--मन; सद्यः--शीघ्र; क्षिणोति--नष्ट करताहै; अन्वहम्-- प्रतिदिन; एधती--बढ़ने वाली; सती--होते हुए; यथा--जिस प्रकार; पद-अड्डुष्ट--चरणकमलों के अँगूठे से;विनिःसृता--निकला; सरित्--जल।
भगवान् के चरणकमलों की सेवा के लिए अभिरुचि होने से सन्तप्त मनुष्य अपने मन मेंअसंख्य जन्मों से संचित मल को शीघ्र ही धो सकते हैं।
जिस तरह भगवान् के चरणकमलों केश़ अँगूठों से निकलने वाला गंगा जल सब मलों को धो देता है, उसी प्रकार इस विधि से मन तुरन्तही स्वच्छ हो जाता है और धीरे-धीरे आध्यात्मिकता अथवा कृष्णचेतना का विकास होता है।
"
विनिर्धुताशेषमनोमल: पुमा-नसड्डविज्ञानविशेषवीर्यवान् ।
यदड्प्रिमूले कृतकेतनः पुनर्न संसृतिं क्लेशवहां प्रपद्यते ॥
३२॥
विनिर्धुत--विशेष रूप से धुला हुआ; अशेष--अनन्त; मन:-मलः--मानसिक चिन्तन अथवा मन का संचित मल; पुमान्--पुरुष; असड्र--ऊब कर; विज्ञान--वैज्ञानिक ढंग से; विशेष--विशेष रूप से; वीर्य-वान्--भक्तियोग से पुष्ट; यत्ू--जिसके;अड्प्रि--चरणकमल की; मूले--जड़ में; कृत-केतन:--शरण में जाकर; पुनः--फिर; न--कभी नहीं; संसूतिमू--संसार को;क्लेश-वहाम्-कष्टों से पूर्ण; प्रपद्यते--ग्रहण करता है |
जब भक्त पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के चरणकमलों की शरण में आ जाता है, तो उसका साराअज्ञान या कपोल कल्पनाएं धुल जाते हैं और उसमें वैराग्य प्रकट होने लगता है।
यह तभीसम्भव है, जब वह भक्तियोग के अभ्यास से परिपुष्ट हो ले।
एक बार भगवान् के चरणकमलोंकी शरण ग्रहण कर लेने पर भक्त कभी भी इस संसार में लौटना नहीं चाहता, जो तीन प्रकार केतापों ( क््लेशों ) से भरा हुआ है।
"
मनोवच:कायगुणै: स्वकर्मभि: ।
अमायिनः कामदुघाडूप्रिपड्डजंयथाधिकारावसितार्थसिद्धयः ॥
३३॥
तम्--उसको; एव--निश्चय ही; यूयम्ू--तुम समस्त नागरिक; भजत--पूजा करो; आत्म--अपना; वृत्तिभि:--वृत्तिपरक कार्यद्वारा; मनः--मन; बच: --वाणी; काय--शरीर; गुणैः--विशिष्ट गुणों द्वारा; स्व-कर्मभि: -- अपने-अपने कर्मों से; अमायिन:--बिना हिचक; काम-दुघ--समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाले; अड्प्रि-पड्डूजम्ू--चरणकमल की; यथा--जिस प्रकार;अधिकार--सामर्थ्य; अवसित-अर्थ--अपने हित के विषय में पूरी तरह आश्वस्त; सिद्धयः--तुष्टि |
पृथु महाराज ने अपने प्रजाजनों को उपदेश दिया : तुम सबों को अपने मन, वचन, देह तथाकर्मो के फल सहित सदैव खुले मन से भगवान् की भक्ति करनी चाहिए।
तुम सब अपनीसामर्थ्य तथा वृत्तिपरक कार्यों के अनुसार पूरे विश्वास तथा बिना हिचक के भगवान् केचरणकमलों की सेवा में संलग्न रहो।
तब निश्चय ही तुम्हें अपने-अपने जीवन-उद्देश्य प्राप्त करनेमें सफलता प्राप्त होगी।
"
असाविहानेकगुणोगुणो ध्वरःपृथग्विधद्रव्यगुणक्रियोक्तिभि: ।
सम्पद्यतेर्थाशयलिड्रनामभि-विशुद्धविज्ञानघन: स्वरूपत: ॥
३४॥
असौ-- भगवान्; इह--इस संसार; अनेक--विभिन्न; गुण: --गुण; अगुण: --दिव्य; अध्वर: --यज्ञ; पृथक्-विध--किस्में;द्रव्य-- भौतिक तत्त्व; गुण--अवयव; क्रिया--कार्य; उक्तिभि: --विभिन्न मंत्रों के उच्चारण से; सम्पद्यते--पूजा जाता है;अर्थ--हित; आशय--प्रयोजन; लिड्ड--रूप; नामभि:--नाम से; विशुद्ध--कल्मषरहित; विज्ञान--विज्ञान; घन: --घनी भूत;स्व-रूपत:--अपने निजी रूप में |
भगवान् दिव्य हैं।
वे इस भौतिक जगत द्वारा कलुषित नहीं होते।
यद्यपि वे घनीभूत आत्मा हैंजिसमें कोई भौतिक विविधता नहीं है, किन्तु फिर भी बद्धजीव के लाभ हेतु वे विभिन्न भौतिकतत्त्वों, अनुष्ठानों तथा मंत्रों द्वारा यज्ञकर्ता के मनोरथों एवं उद्देश्यों के अनुसार विविध नामों सेदेवताओं को समर्पित होने वाले यज्ञों को स्वीकार करते हैं।
"
प्रधानकालाशयधर्मसड्ग्रहेशरीर एष प्रतिपद्य चेतनाम् ।
क्रियाफलत्वेन विभुर्विभाव्यतेयथानलो दारुषु तद्गुणात्मकः ॥
३५॥
प्रधान-- प्रकृति; काल--समय; आशय--अभिलाषा; धर्म--वृत्तिपरक कर्म; सड़्ग्रहे--समुच्चय में; शरीरे--शरीर में ; एब: --यह; प्रतिपद्य--स्वीकार करके; चेतनाम्--चेतना को; क्रिया--कार्य के; फलत्वेन--फल से; विभुः--भगवान्; विभाव्यते--प्रकट होती है; यथा--जिस प्रकार; अनलः--अग्नि; दारुषु--काष्ट में; तत्ू-गुण-आत्मक:--आकार तथा गुण के अनुसार
भगवान् सर्वव्यापी हैं, किन्तु वे प्रकृति, काल, अभिलाषा तथा वृत्तिपरक कर्मो के संयोग सेउत्पन्न विभिन्न प्रकार के शरीरों में भी प्रकट होते हैं।
इसी प्रकार विभिन्न प्रकार की चेतनाएँ विकसित होती हैं, जिस प्रकार विभिन्न आकार-प्रकार वाले काष्ठ खण्डों में एक सी ही अग्निविभिन्न रूपों में प्रकट होती है।
"
अहो ममामी वितरन्त्यनुग्रहंहरिं गुरुं यज्ञभुजामधी श्वरम् ।
स्वधर्मयोगेन यजन्ति मामकानिरन्तर क्षोणितले दृढब्रता: ॥
३६॥
अहो--हे तुम सब; मम--मेरे; अमी--वे सब; वितरन्ति--बाँटते हुए; अनुग्रहम्--कृपा; हरिम्-- भगवान्; गुरुम्--परम गुरु;यज्ञ-भुजाम्--यज्ञ की बलि ग्रहण करने के पात्र सभी देवता; अधी श्वरम्--परम स्वामी; स्व-धर्म--वृत्तिपरक कर्म के; योगेन--बल पर; यजन्ति--पूजा करते हैं; मामका:--मेंरे सम्बन्धी; निरन््तरम्--लगातार; क्षोणि-तले--पृथ्वी तल पर; हृढ-ब्रता:--हृढ़संकल्प के साथ
भगवान् समस्त यज्ञों के फल के स्वामी तथा भोक्ता हैं।
साथ ही वे परम गुरु भी हैं।
इसभूतल के आप सभी नागरिक, जिनका मुझसे सम्बन्ध है और जो अपने कर्मो द्वारा भगवान् की पूजा कर रहे हैं, मुझ पर परम अनुग्रह कर रहे हैं।
अत: हे नागरिको, मैं तुम सबको धन्यवाद देताहूँ।
"
मा जातु तेज: प्रभवेन्महर्द्धेभि-स्तितिक्षया तपसा विद्यया च ।
देदीप्यमानेडजितदेवतानांकुले स्वयं राजकुलादिद्वजानाम् ॥
३७॥
मा--कभी मत करो; जातु--किसी भी समय; तेज:--परम शक्ति; प्रभवेत्--प्रकट करते हैं; महा--बड़ी; ऋद्धिभि:--ऐश्वर्यसे; तितिक्षया--सहिष्णुता से; तपसा--तप से; विद्यया--शिक्षा द्वारा; च--भी; देदीप्यमाने--पहले से महिमामंडितों पर;अजित-देवतानाम्--वैष्णव अथवा भगवान् के भक्त के; कुले--समाज में; स्वयम्--व्यक्तिगत रूप से; राज-कुलात्ू--राजपरिवार से बड़ा; द्विजानामू--ब्राह्मणों का।
ब्राह्मण तथा वैष्णव अपनी सहिष्णुता, तपस्या, ज्ञान तथा शिक्षा जैसे गुणों के द्वारा स्वयं हीमहिमामंडित होते हैं।
इन दिव्य ऋद्धियों के कारण वैष्णव राजकुल से अधिक शक्तिशाली होतेहैं।
अतः यह सलाह दी जाती है कि राजकुल इन दोनों कुलों पर अपना शौर्य ( विक्रम ) प्रदर्शितन करें और उनको अपमानित करने से बचें।
"
ब्रह्मण्यदेव: पुरुष: पुरातनोनित्य॑ हरिर्यच्चरणाभिवन्दनातू ।
अवाप लक्ष्मीमनपायिनीं यशोजगत्पवित्रं च महत्तमाग्रणीः ॥
३८॥
ब्रह्मण्य-देव: --ब्राह्मण संस्कृति का स्वामी; पुरुष:--परम पुरुष; पुरातन:--सबसे प्राचीन; नित्यम्--शा श्वत; हरि:-- भगवान्;यत्--जिसका; चरण---चरणकमल; अभिवन्दनात्--पूजा के द्वारा; अवाप--प्राप्त किया; लक्ष्मीम्--ऐश्वर्य; अनपायिनीम्ू--निरन्तर; यशः--ख्याति; जगत्--विश्व का; पवित्रम्--पवित्र करने वाली; च-- भी; महत्--महान्; तम--सर्वाधिक परम;अग्रणी:--सर्वोपरि प्रथम |
पुरातन, शाश्वत तथा समस्त महापुरुषों में अग्रणी भगवान् ने अपनी स्थिर ख्याति के ऐश्वर्यको ब्राह्मणों तथा वैष्णवों के चरणकमलों की उपासना के द्वारा प्राप्त किया जो समग्र ब्रह्माण्डको पवित्र करने वाला है।
"
यत्सेवयाशेषगुहाशय: स्वराड्विप्रप्रियस्तुष्यति काममी श्वर: ।
तदेव तद्धर्मपरैर्विनीतैःसर्वात्मना ब्रह्मकुलं निषेव्यताम् ॥
३९॥
यत्--जिसकी; सेवया--सेवा से; अशेष--- अपार; गुहा-आशय: -- प्रत्येक के हृदय में वास; स्व-राट्--लेकिन फिर भी पूर्णतःस्वतंत्र; विप्र-प्रियः--ब्राह्मणों तथा वैष्णवों को प्यारे; तुष्यति--सन्तुष्ट होता है; कामम्--इच्छाओं का; ई श्वरः -- भगवान्;तत्--उस; एब--निश्चय ही; तत्-धर्म-परः-- भगवान् के चरणचिह्नों का अनुसरण करते हुए; विनीतैः--विनप्रता से; सर्व-आत्मना--सभी प्रकार से; ब्रह्य-कुलम्--ब्राह्मणों तथा वैष्णवों के वंशज; निषेव्यताम्ू--उनकी सेवा में निरन्तर लगे रहकर।
अनन्त काल तक स्वतंत्र रहने वाले तथा प्रत्येक हृदय में वास करने वाले भगवान् उन लोगोंसे अत्यधिक प्रसन्न रहते हैं, जो उनके चरणचिह्लों का अनुसरण करते हैं और बिना किसी हिचकके ब्राह्मणों तथा वैष्णवों के वंशजों की सेवा करते हैं, क्योंकि वे सदैव ब्राह्मणों तथा वैष्णवोंको परम प्रिय हैं और ये सदा ही उनको प्रिय हैं।
"
पुमॉल्लभेतानतिवेलमात्मनःप्रसीदतोत्यन्तशमं स्वत: स्वयम् ।
यन्नित्यसम्बन्धनिषेवया ततःपरं किमत्रास्ति मुखं हविर्भुजाम् ॥
४०॥
पुमान्ू--पुरुष; लभेत--प्राप्त कर सकता है; अनति-वेलम्ू--अविलम्ब; आत्मन:--अपनी आत्मा के; प्रसीदत:--प्रसन्न होनेपर; अत्यन्त--अत्यधिक; शमम्--शान्ति; स्वतः-- अपने आप; स्वयम्--स्वयं; यत्--जिसका; नित्य--नियमित; सम्बन्ध--सम्बन्ध; निषेवया--सेवा के बल पर; ततः--तत्पश्चात्; परम्-- श्रेष्ठ; किम्ू--क्या; अत्र--यहाँ; अस्ति-- है; मुखम्--मुख;हवि:--घी; भुजाम्-पीने वाले
ब्राह्मणों तथा वैष्णवों की नियमित सेवा करते रहने से मनुष्य के हृदय का मैल दूर होता हैऔर इस प्रकार परम शान्ति तथा भौतिक आसक्ति से मुक्ति मिलती है और वह समन्तुष्ट हो जाताहै।
इस संसार में ब्राह्मणों की सेवा से बढ़कर कोई सकाम कर्म नहीं, क्योंकि इससे देवता प्रसन्नहोते हैं जिनके लिए अनेक यज्ञों की संस्तुति की जाती है।
"
आअश्नात्यनन्तः खलु तत्त्वकोविदैःश्रद्धाहुतं यन्मुख इज्यनामभि: ॥
नवै तथा चेतनया बहिष्कृतेहुताशने पारमहंस्यपर्यगु; ॥
४१॥
अश्नाति--खाता है; अनन्तः--भगवान्; खलु--तो भी; तत्त्व-कोविदैः --परम सत्य को जानने वाले व्यक्ति; श्रद्धा--विश्वास;हुतम्--अग्नि में आहुतियाँ देना; यत्-मुखे--जिसका मुख; इज्य-नामभि:--विभिन्न देवताओं के नाम से; न--कभी नहीं; बै--निश्चय ही; तथा--उसी तरह; चेतनया--जीवनी शक्ति से; बहि:-कृते--विलग किया जाकर; हुत-अशने--यज्ञ-अग्नि में;पारमहंस्य--भक्तों का; पर्यगुः--कभी भी बाहर नहीं जाता है।
यद्यपि भगवान् अनन्त विभिन्न देवताओं के नामों से अग्नि में अर्पित हवियों को खाते हैं,किन्तु वे अग्नि के माध्यम से खाने में उतनी रुचि नहीं दिखाते जितनी कि विद्वान साधुओं तथा भक्तों के मुख से भेंट को स्वीकार करने में, क्योंकि तब उन्हें भक्तों की संगति त्यागनी नहींहोती।
"
यह्ह्य नित्यं विरजं सनातनश्रद्धातपोमड्रलमौनसंयमै: ।
समाधिना बिश्रति हार्थदृष्टयेयत्रेदमादर्श इवावभासते ॥
४२॥
यत्--जो; ब्रह्म--ब्राह्मण-संस्कृति; नित्यम्ू--शाश्वत रूप से; विरजम्--निष्कलंक ; सनातनम्--अनादि; श्रद्धा-- श्रद्धा;तपः--तपस्या; मड्गल--शुभ; मौन--मूक रहना; संयमैः--मन तथा इन्द्रियों को वश में करते हुए; समाधिना--पूर्ण मनोयोग से;बिभ्रति-- प्रकाशित करता है; ह--जैसे उसने किया; अर्थ--वेदों का असली प्रयोजन; दृष्टये--प्राप्त करने के उद्देश्य से; यत्र--जिसमें; इदम्--यह सब; आदर्शे --दर्पण में; इब--सहृश; अवभासते-- प्रकट होता है।
ब्राह्मण-संस्कृति में ब्राह्मणों का दिव्य स्थान शाश्रत रूप से बनाए रखा जाता है, क्योंकिवेदों के आदेशों को श्रद्धा, तप, शास्त्रीय निर्णय, मन तथा इन्द्रिय-निग्रह एवं ध्यान के साथस्वीकार किया जाता है।
इस प्रकार जीवन का वास्तविक लक्ष्य ठीक उसी तरह से प्रकाशमान होउठता है, जिस प्रकार स्वच्छ दर्पण में किसी का मुँह भली-भाँति प्रतिबिम्बित होता है।
"
तेषामहं पादसरोजरेणु-मार्या वहेयाधिकिरीटमायु: ।
यं नित्यदा बिभ्रत आशु पापंनश्यत्यमुं सर्वगुणा भजन्ति ॥
४३॥
तेषामू--उन सबके; अहम्--मैं; पाद-- पाँव; सरोज--कमल ; रेणुमू-- धूलि; आर्या: -हहे श्रेष्ठ व्यक्तियो; वबहेय-- धारणकरूँगा; अधि--तक; किरीटमू--मुकुट; आयुः:--जीवन भर; यम्--जिसको; नित्यदा--सदैव; बिभ्रत:--लेते हुए; आशु--शीघ्र ही; पापमू--पापकर्म; नश्यति--नष्ट हो जाते हैं; अमुम्--वे सब; सर्व-गुणा:--अत्यन्त योग्य; भजन्ति--पूजा करते हैं।
यहाँ पर समुपस्थित हे आर्यगण, मैं आपका आशीर्वाद चाहता हूँ कि मैं आजीवन अपनेमुकुट में ऐसे ब्राह्मणों तथा वैष्णवों के चरणकमलों की धूलि धारण करता रहूँ।
जो ऐसी चरण-धूलि धारण करता है, वह शीघ्र ही पापमय जीवन से उत्पन्न समस्त कर्मफलों से मुक्त हो जाता हैऔर अंततः समस्त उत्तम तथा वांछित गुणों से परिपूर्ण हो जाता है।
"
गुणायनं शीलधनं कृतज्ञंवृद्धाश्रयं संवृणतेडनु सम्पदः ।
प्रसीदतां ब्रह्मकुलं गवां चजनार्दनः सानुचरश्च महाम् ॥
४४॥
गुण-अयनम्--जिसने समस्त सद्गुण प्राप्त किये हैं; शील-धनम्--उत्तम आचरण ही जिसकी सम्पत्ति है; कृत-ज्ञममू--आभारी;वृद्ध-आश्रयम्--विद्वानों की शरण ग्रहण करने वाला; संवृणते--प्राप्त करता है; अनु--निश्चय ही; सम्पदः--समस्त ऐ श्वर्य;प्रसीदताम्--प्रसन्न हों; ब्रह्य-कुलम्--ब्राह्मण वर्ग; गवाम्--गौएं; च--तथा; जनार्दन:-- भगवान्; स--सहित; अनुचरः --अपने भक्त; च--तथा; महाम्--मुझको |
जो कोई भी ब्राह्मणत्व के गुणों को अर्थात् सदाचार, कृतज्ञता तथा अनुभवी लोगों काआश्रय प्राप्त कर लेता है, उसे संसार का सारा ऐश्वर्य प्राप्त हो जाता है।
अतः मेरी यही चाह हैकि श्रीभगवान् अपने पार्षदों सहित ब्राह्मण कुल, गौओं तथा मुझ पर प्रसन्न रहें।
"
मैत्रेय उवाचइति ब्रुवाणं नृपतिं पितृदेवद्विजातय: ।
तुष्ठवुईष्टमनस: साधुवादेन साधव: ॥
४५॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा; इति--इस प्रकार; ब्रुवाणम्--बोलते हुए; नृू-पतिम्--राजा को; पितृ--पितृलोक केवबासी; देव--देवता; द्वि-जातय: --तथा द्विजों ( ब्राह्मणों एवं वैष्णवों ) ने; तुष्ठवु:--सन्तुष्ट; हृष्ट-मनस:ः--मन में अत्यन्त प्रसन्न;साधु-वादेन--बधाई देते हुए; साधव:--उपस्थित समस्त साधु पुरुष |
मैत्रेय ऋषि ने कहा : राजा पृथु को इस प्रकार सम्भाषण करते सुनकर सभी देवताओं,पितृलोक के वासियों, ब्राह्मणों तथा उस सभा में उपस्थित साधु पुरुषों ने अपनी शुभकामनाएँव्यक्त करते हुए साधुवाद दिया।
"
पुत्रेण जयते लोकानिति सत्यवती श्रुति: ।
ब्रह्मदण्डहतः पापो यद्वेनोउत्यतरत्तम: ॥
४६॥
पुत्रेण--पुत्र के द्वारा; जयते--विजय प्राप्त करता है; लोकान्--समस्त स्वर्ग लोकों की; इति--इस प्रकार; सत्य-वती--सत्यहोता है; श्रुतिः--वेद; ब्रह्म-दण्ड--ब्राह्मणों के शाप से; हतः--मारा गया; पाप:--परम पापी; यत्-- क्योंकि; वेन:--महाराजपृथु का पिता; अति--अत्यधिक; अतरत्--उद्धार हो गया; तमः--नारकीय जीवन के अंधकार से |
उन सबों ने घोषित किया कि वेदों का यह निर्णय पूरा हुआ कि पुत्र के कर्म से मनुष्यस्वर्गलोकों को जीत सकता है, क्योंकि ब्राह्मणों के शाप से मारा गया अत्यन्त पापी वेन अबअपने पुत्र महाराज पृथु के द्वारा नारक्मीय जीवन के गहन अंधकार से उबारा गया था।
"
हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमः ।
विविश्षुरत्यगात्सूनो: प्रह्मदस्यानुभावत: ॥
४७॥
हिरण्यकशिपु:--प्रह्नद महाराज का पिता; च-- भी; अपि-- पुनः; भगवत्-- भगवान् की; निन्दया--निन्दा से; तम:--नारकीयजीवन के गहनतम क्षेत्र में; विविक्षु:--प्रविष्ट किया; अत्यगात्--उबार लिया गया; सूनो:--अपने पुत्र; प्रहादस्य--महाराजप्रह्ाद के; अनुभावत:--प्रभाव से।
इसी प्रकार हिरण्यकशिपु अपने पापकर्मों से भगवान् की सत्ता ( श्रेष्ठठा ) का उल्लंघनकरता हुए नारकीय जीवन के गहनतम क्षेत्र में प्रविष्ट हुआ, किन्तु अपने महान पुत्र प्रह्मदमहाराज की कृपा से उसका भी उद्धार हो सका और वह भगवान् के धाम वापस चला गया।
"
वीरवर्य पितः पृथ्व्या: समा: सञ्जीव शाश्वतीः ।
यस्येदृरश्यच्युते भक्ति: सर्वलोकैक भर्तरि ॥
४८॥
वीर-वर्य--वीरों में सर्वश्रेष्ठ; पित:--पिता; पृथ्व्या:--पृथ्वी का; समाः--वर्ष में बराबर; सझ्जीव-- जीवित रहते; शा श्वती: --सदा के लिए; यस्य--जिसका; ईहशी--इस तरह; अच्युते--परमेश्वर को; भक्ति: --भक्ति में बराबर; सर्व--सभी; लोक--लोक, ग्रह; एक--एक; भर्तरि--पालक |
सभी साधु ब्राह्मणों ने पृथु महाराज को इस प्रकार सम्बोधित किया--हे वीरश्रेष्ठ, हे पृथ्वीके पिता, आप दीर्घजीवी हों, क्योंकि आपमें समस्त ब्रह्माण्ड के स्वामी अच्युत भगवान् के प्रतिअत्यधिक श्रद्धा है।
"
अहो वयं ह्द्य पवित्रकीर्तेत्वयैव नाथेन मुकुन्दनाथा: ।
य उत्तमएलोकतमस्य विष्णो-ब्रह्मण्यदेवस्थ कथां व्यनक्ति ॥
४९॥
अहो--ओह, ओरे; वयम्--हम; हि--निश्चय ही; अद्य--आज; पवित्र-कीर्ते--हे परम शुद्ध; त्वया--तुम्हारे द्वारा; एव--निश्चयही; नाथेन-- भगवान् द्वारा; मुकुन्द-- श्रीभगवान्; नाथा: -- परमेश्वर की प्रजा होकर; ये--जो; उत्तम-श्लोक-तमस्य-- भगवान्का, जिनकी प्रशंसा उत्तम इलोकों द्वारा की जाती है; विष्णो: --विष्णु का; ब्रह्मण्य-देवस्थ--ब्राह्मणों के पूज्य भगवान् का;कथाम्--शब्द; व्यनक्ति--व्यक्त किये गये।
श्रोताओं ने आगे कहा : हे राजा पृथु, आपकी कीर्ति परम शुद्ध है, क्योंकि आप ब्राह्मणों केस्वामी भगवान् की महिमाओं का उपदेश दे रहे हैं।
हमारे बड़े भाग हैं कि हमने आपको स्वामीरूप में प्राप्त किया जिससे हम अपने आपको भगवान् के प्रत्यक्ष आश्रय में समझ रहे हैं।
"
नात्यद्भुतमिदं नाथ तवाजीव्यानुशासनम् ।
प्रजानुरागो महतां प्रकृति: करुणात्मनाम् ॥
५०॥
न--नहीं; अति--अत्यधिक; अद्भुतम्ू--आश्चर्यजनक; इृदम्ू--यह; नाथ--हे स्वामी; तब--तुम्हारा; आजीव्य--आय कास्त्रोत; अनुशासनम्--प्रजा के ऊपर शासन; प्रजा--नागरिक; अनुराग: --प्रेम; महताम्--बड़े का; प्रकृतिः--प्रकृति; करूण--दयावान; आत्मनाम्--जीवात्माओं का।
हे नाथ! अपनी प्रजा पर शासन करना तो आपका तवृत्तिपरक धर्म है।
यह आप-जैसेमहापुरुष के लिए कोई आश्चर्यजनक कार्य नहीं है, क्योंकि आप अत्यन्त दयालु हैं और अपनीप्रजा के हितों के प्रति अत्यन्त प्रेम रखते हैं।
यही आपके चरित्र की महानता है।
"
अद्य नस्तमस: पारस्त्वयोपासादितः प्रभो ।
भ्राम्यतां नष्टदृष्टीनां कर्मभिर्देवसंज्ञिति: ॥
५१॥
अद्य--आज; नः--हम सबों का; तमस:--संसार के अंधकार का; पार: --दूसरी ओर; त्वया--तुम्हारे द्वारा; उपासादित:--बढ़ाहुआ; प्रभो--हे स्वामी; भ्राम्यतामू-- भटकने वालों को; नष्ट-दृष्टीनामू--जिनका जीवन-लक्ष्य खो चुका है; कर्मभि:--गत कर्मोंके कारण; दैव-संज्ञितैः-- श्रेष्ठ अधिकारी द्वारा व्यवस्थित |
नागरिकों ने आगे कहा : आज आपने हमारी आँखें खोल दी हैं और हमें बताया है कि इसअंधकार के सागर को किस प्रकार पार किया जाये।
अपने पूर्वकर्मों तथा दैवी व्यवस्था केकारण हम सकाम कर्मों के जाल में फँसे हुए हैं और हमारा जीवन-लक्ष्य ओझल हो चुका है,जिसके कारण हम इस ब्रह्माण्ड में भटक रहे हैं।
नमो विवृद्धसत्त्वाय पुरुषाय महीयसे ।
यो ब्रह्म क्षत्रमाविश्य बिभर्तीदं स्वतेजसा ॥
५२॥
नमः--नमस्कार है; विवृद्ध--अत्यन्त सम्मानित; सत्त्वाय--सत्त्व को; पुरुषाय--पुरुष को; महीयसे--इस प्रकार सेमहिमामंडित पुरुष को; य: --जो; ब्रह्म --ब्राह्मण संस्कृति; क्षत्रमू--प्रशासनिक कार्य; आविश्य--प्रविष्ट होकर; बिभर्ति--पालन करते हुए; इृदम्--यह; स्व-तेजसा--अपने तेज से
हे स्वामी! आप विशुद्ध सत्त्व-स्थिति को प्राप्त हैं, अत: आप परमेश्वर के सक्षम प्रतिनिधि हैं।
आप अपने तेज से ही महिमावान हैं और इस तरह ब्राह्मण-संस्कृति को पुनर्स्थापित करते हुएसारे संसार का पालन करते हैं तथा अपने क्षात्र धर्म का निर्वाह करते हुए प्रत्येक व्यक्ति की रक्षाकरते हैं।
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