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अध्याय बाईसवाँ: पृथु महाराज की चार कुमारों से मुलाकात
4.22मैत्रेय उवाचजनेषु प्रगुणत्स्वेवं पृथुं पुथुलविक्रमम्।
तत्रोपजम्मुर्मुनयश्चत्वारः सूर्यवर्चस: ॥
१॥
मैत्रेय: उबाच--मैत्रेय ने कहा; जनेषु--नागरिक; प्रगृणत्सु--प्रार्थनारत; एवम्--इस प्रकार; पृथुम्--महाराज पृथु को; पुथुल--अत्यधिक; विक्रमम्--शक्तिशाली; तत्र--वहाँ; उपजग्मु:--आये; मुनयः--कुमार; चत्वार:--चारों; सूर्य--सूर्य के समान;वर्चसः--तेजस्वी |
महामुनि मैत्रेय ने कहा : जिस समय सारे नागरिक परम शक्तिमान महाराज पृथु की इसप्रकार स्तुति कर रहे थे उसी समय वहाँ पर सूर्य के समान तेजस्वी चारों कुमार आये।
"
तांस्तु सिद्धेश्वरात्राजा व्योम्नोउवतरतोर्चिषा ।
लोकानपापान्कुर्वाणान्सानुगोचष्ट लक्षितान् ॥
२॥
तानू--उन; तु--लेकिन; सिद्ध-ईश्वरान्ू-- समस्त योग शक्तियों के स्वामी को; राजा--राजा ने; व्योम्न:--आकाश से;अवतरतः --उतरते हुए; अर्चिषा--अपने दिव्य तेज से; लोकान्ू--लोकों को; अपापान्--पापरहित; कुर्वाणान्ू--करते हुए; स-अनुग:--अपने पार्षदों सहित; अचष्ट--पहचान लिया; लक्षितान्---उन्हें देखकर ।
समस्त योग शक्तियों के स्वामी चारों कुमारों के देदीप्यमान् तेज को देखकर राजा तथाउनके पार्षदों ने उन्हें आकाश से उतरते ही पहचान लिया।
"
तदर्शनोदगतान्प्राणान्प्रत्यादित्सुरिवोत्थित: ।
ससदस्यानुगो वैन्य इन्द्रियेशों गुणानिव ॥
३॥
तत्--उसको; दर्शन--देखकर; उद्गतान्--अत्यधिक इच्छा प्रकट किये जाने पर; प्राणान्-- प्राण; प्रत्यादित्सु:--शान्तिपूर्वकजाते हुए; इब--सहश; उत्थित:--उठा; स--सहित; सदस्य-- पार्षद या अनुयायी; अनुग:--अधिकारी; वैन्य:--राजा पृथु;इन्द्रिय-ईशः--जीवात्मा; गुणान् इब--प्रकृति के गुणों से मानो प्रभावित ।
चारों कुमारों को देखकर पृथु महाराज उनके स्वागत के लिए आतुर हो उठे।
अतः अपनेपार्षदों सहित वे तुरन्त इस तरह तेज़ी से उठ कर खड़े हो गये मानो कोई बद्धजीबव प्रकृति केगुणों द्वारा तुरन्त आकृष्ट हो उठा हो ।
"
गौरवाद्यन्त्रितः सभ्य: प्रश्रयानतकन्धरः ।
विधिवत्पूजयां चक्रे गृहीताध्य्हणासनान् ॥
४॥
गौरवात्--गौरव से; यन्त्रितः--पूर्णत:; सभ्य: --अत्यन्त सभ्य; प्रश्रय--विनीत भाव से; आनत-कन्धर:--अपने कन्धे ( गरदन )झुकाए; विधि-वत्--शास्त्रोक्त विधियों से; पूजयाम्--पूजा; चक्रे-- सम्पन्न की; गृहीत--स्वीकार करते हुए; अधि--के सहित;अर्हण--स्वागत की सामग्री; आसनान्--आसन पर।
जब वे महान् ऋषिगण शास्त्रविहित ढंग से उनके द्वारा किये गये स्वागत को स्वीकार करराजा द्वारा प्रदत्त आसनों पर बैठ गये तो राजा उनके गौरव के वशीभूत होकर तुरन्त नतमस्तकहुआ।
इस प्रकार उसने चारों कुमारों की पूजा की।
विनयवश वे कुमारों के समक्ष झुक गये।
"
तत्पादशौचसलिलैर्मार्जितालकबन्धन: ।
तत्र शीलवतां वृत्तमाचरन्मानयन्निव ॥
५॥
तत्-पाद--उनके चरणकमल; शौच--धुला; सलिलै:--जल से; मार्जित--छिड़का गया; अलक--बाल; बन्धन:--जूड़ा,राशि; तत्र--वहाँ; शीलवताम्--सम्मानित पुरुषों के; वृत्तमू-- आचरण; आचरनू्--आचरण करते हुए; मानयन्-- अभ्यासकरते हुए; इब--सदृश |
तत्पश्चात् राजा ने कुमारों के चरणकमलों के धोये हुए जल को लेकर अपने बालों परछिड़का।
ऐसे शिष्ट आचरण से राजा ने आदर्श पुरुष की तरह यह प्रदर्शित किया किआध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत व्यक्ति का किस प्रकार सम्मान करना चाहिए।
"
हाटकासन आसीनान्स्वधिष्ण्येष्विव पावकान् ।
श्रद्धासंयमसंयुक्तः प्रीतः प्राह भवाग्रजान् ॥
६॥
हाटक-आसने--सोने के बने सिंहासन पर; आसीनान्--बैठे हुए; स्व-भिष्ण्येषु--बलिवेदी पर; इब--मानो; पावकान्-- अग्नि;श्रद्धा--सम्मान; संयम--संयम; संयुक्त:--से विभूषित; प्रीत:-- प्रसन्न; प्राह--कहा; भव--शिवजी; अग्र-जानू--से बड़े |
चारों मुनि शिवजी से भी ज्येष्ठ थे और जब वे सोने के बने हुए सिंहासन पर बैठा दिये गयेतो ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वेदी पर अग्नि प्रज्वलित हो रही हो।
महाराज पृथु ने उनसे अत्यन्त शिष्टता तथा सम्मानपूर्वक बड़े ही संयमित स्वर में कहा।
"
पृथुरुवाचअहो आचरितं कि मे मड़लं मड़लायना: ।
यस्य वो दर्शन ह्यासीहुर्दर्शानां च योगिभि: ॥
७॥
पृथु: उबाच--राजा पृथु ने कहा; अहो--हे भगवान्; आचरितम्-- अभ्यास; किम्-क्या; मे--मेरे द्वारा; मड्डलम्--कल्याण;मड्ल-आयना: -हे साक्षात् कल्याण; यस्य--जिससे; वः--तुम्हारा; दर्शनम्-दर्शन; हि--निश्चय ही; आसीत्--सम्भव होसका; दुर्दर्शानामू--कठिनाई से दृश्य, दुर्लभ; च--भी; योगिभि:--योगियों द्वारा |
राजा पृथु ने कहा : हे साक्षात् कल्याणमूर्ति महामुनियो, आपका दर्शन तो योगियों के लिएभी दुर्लभ है।
निस्सन्देह आपका दर्शन दुर्लभ है।
मैं नहीं जानता कि मुझसे ऐसा कौन-सा पुण्यबन पड़ा है, जिससे आप मेरे समक्ष इतनी सहजता से प्रकट हुए हैं।
"
कि तस्य दुर्लभतरमिह लोके परत्र च ।
यस्य विप्रा: प्रसीदन्ति शिवो विष्णुश्न सानुग: ॥
८॥
किम्--क्या; तस्थ--उसका; दुर्लभ-तरम्-- अत्यन्त कठिनाई से प्राप्प; हह--इस; लोके--संसार में; परत्र--मृत्यु के पश्चात्;च--अथवा; यस्य--जिसका; विप्रा:--ब्राह्मण या वैष्णव; प्रसीदन्ति--प्रसन्न हो जाते हैं; शिव:ः--सर्व-कल्याणमय; विष्णु: --भगवान् विष्णु; च-- भी; स-अनुग: --साथ-साथ चलने वाले |
जिस पर ब्राह्मण तथा वैष्णव प्रसन्न हो जाते हैं, वह व्यक्ति इस संसार में तथा साथ ही मृत्युके बाद भी दुर्लभ से दुर्लभ वस्तु प्राप्त कर सकता है।
यही नहीं, ब्राह्मणों तथा वैष्णवों के साथ-साथ रहने वाले कल्याणकारी शिव तथा भगवान् विष्णु का भी उस व्यक्ति को अनुग्रह प्राप्त होजाता है।
"
नेव लक्षयते लोको लोकान्पर्यटतोपि यान् ।
यथा सर्वदृशं सर्व आत्मानं येउस्य हेतवः ॥
९॥
न--नहीं; एव--इस प्रकार; लक्षयते--देख सकते हैं; लोक:--लोग; लोकान्--समस्त लोकों में; पर्यटतः--विचरण करते;अपि--यद्यपि; यानू--जिसको; यथा--जिस तरह; सर्व-हशम्--परमात्मा; सर्वे--सबों में; आत्मानम्--प्रत्येक प्राणी के भीतर;ये--जो; अस्य--इस जगत के; हेतवः--कारण।
पृथु महाराज ने आगे कहा : यद्यपि आप समस्त लोकों में विचरण करते रहते हैं, किन्तु लोगआपको नहीं जान पाते, जिस प्रकार वे प्रत्येक हृदय में वास करने वाले और प्रत्येक वस्तु केसाक्षी परमात्मा को नहीं जान पाते।
यहाँ तक कि ब्रह्मा तथा शिव भी परमात्मा को नहीं जानपाते।
"
अधना अपि ते धन्या: साधवो गृहमेधिन: ।
यदगृहा ह्ईवर्याम्बुतृणभूमी श्ररावरा: ॥
१०॥
अधना:--निर्धन; अपि--यद्यपि; ते--वे; धन्या:-- धन्य हैं; साधव:--साधु पुरुष; गृह-मेधिन:--गृहस्थ लोग; यत्-गृहा:--जिनके घर; हि--निश्चय ही; अर्ह-वर्य--अत्यन्त पूज्य; अम्बु--जल; तृण--घास; भूमि--स्थल; ईश्वर--स्वामी; अवरा:--दास
कोई भी व्यक्ति जो धनवान हो तथा गृहस्थ जीवन व्यतीत कर रहा हो, वह भी अतीव धन्यहो जाता है, जब उसके घर में साधु पुरुष उपस्थित होते हैं।
गृह स्वामी तथा सेवक, जो सम्मान्यअतिथियों को जल, आसन तथा स्वागत सामग्री प्रदान करने में लगे रहते हैं, वे धन्य हो जाते हैंऔर वह घर भी धन्य हो जाता है।
"
व्यालालयद्ुमा बै तेष्वरिक्ताखिलसम्पदः ।
यदगृहास्तीर्थपादीयपादतीर्थविवर्जिता: ॥
११॥
व्याल--विषैले सर्प; आलय--घर; ब्रुमा:--वृक्ष; बै--निश्चय ही; तेषु--उन घरों में; अरिक्त-- अत्यधिक; अखिल--समस्त;सम्पदः--ऐश्वर्य, वैभव; यत्--जो; गृहा:--घर; तीर्थ-पादीय--साधु पुरुषों के चरणों का; पाद-तीर्थ--चरणों के प्रक्षालन सेप्राप्त जल; विवर्जिता:--रहित |
इसके विपरीत जिस गृहस्थ के घर में भगवान् के भक्तों के चरण नहीं पड़ते और जहाँ उनचरणों के प्रक्षालन के लिए जल नहीं रहता, वह घर समस्त ऐश्वर्य तथा धन-सम्पन्न होते हुए भीऐसे वृक्ष के तुल्य माना जाता है, जिसमें केवल विषैले सर्प रहते हैं।
"
स्वागतं वो द्विजश्रेष्ठा यद्व्रतानि मुमुक्षवः ।
चरन्ति श्रद्धया धीरा बाला एव बृहन्ति च ॥
१२॥
सु-आगतम्--स्वागत; वः--तुमको; द्विज-श्रेष्ठा:--ब्राह्मणों में सर्वश्रेष्ठ; यत्--जिसके; ब्रतानि--ब्रत, संकल्प; मुमुक्षवः --मुक्ति की इच्छा रखने वाले पुरुषों के; चरन्ति--आचरण करते हैं; श्रद्धघा-- श्रद्धापूर्वक; धीरा:--संयमी; बाला:--बालक;एव--सहश; बृहन्ति--देते हैं; च-- भी |
महाराज पृथु ने चारों कुमारों को ब्राह्मणश्रेष्ठ सम्बोधित करके स्वागत किया और उन्हें कहाकि आपने जन्म से ही ब्रह्मचर्य व्रत का हढ़ता से पालन किया है और यद्यपि आप मुक्ति केअनुभवी नहीं हैं, तो भी आप अपने को छोटे-छोटे बालकों के समान रखते हैं।
"
कच्चिन्न: कुशल नाथा इन्द्रियार्थार्थवेदिनाम् ।
व्यसनावाप एतस्मिन्पतितानां स्वकर्मभि; ॥
१३॥
'कच्चित्ू--क्या; नः--हमारी; कुशलमू-- कुशलता; नाथा:--हे स्वामियो; इन्द्रिय-अर्थ--इन्द्रियतृप्ति ही जीवन लक्ष्य है; अर्थ-वेदिनाम्--जो व्यक्ति केवल इन्द्रियतृप्ति को ही जान पाते हैं; व्यसन--दुर्गुण, बीमारी; आवापे-- प्राप्त किया; एतस्मिन्--इससंसार में; पतितानाम्--पतित जनों का; स्व-कर्मभि:--अपनी-अपनी सामर्थ्य से |
पृथु महाराज ने मुनियों से ऐसे व्यक्तियों के विषय में पूछा जो अपने पूर्व कर्मों के कारण इसविपत्तिमय संसार में फँसे हुए हैं।
क्या ऐसे व्यक्तियों को, जिनका एकमात्र लक्ष्य इन्द्रियतृप्ति है,सौभाग्य प्राप्त हो सकता है ?"
भवत्सु कुशलप्रश्न आत्मारामेषु नेष्यते ।
कुशलाकुशला यत्र न सन्ति मतिवृत्तय: ॥
१४॥
भवत्सु--आप से; कुशल--सौभाग्य; प्रश्न:--सवाल; आत्म-आरामेषु-- सदैव आत्मिक आनन्द में मग्न; न इष्यते--कोईआवश्यकता नहीं होती; कुशल--सौभाग्य; अकुशला: --अकुशलता; यत्र--जहाँ; न--कभी नहीं; सन्ति--रहते हैं; मति-वृत्तयः--कोरी कल्पना
पृथु महाराज ने आगे कहा : हे महाशयो, आपसे आपकी कुशल तथा अकुशल पूछने कीआवश्यकता नहीं है, क्योंकि आप नित्य आध्यात्मिक आनन्द में लीन रहते हैं।
आप में कुशलतथा अकुशल की मानसिक वृत्तियाँ पाई ही नहीं जाती हैं।
"
तदहं कृतविश्रम्भ: सुहृदो वस्तपस्विनाम् ।
सम्पूच्छे भव एतस्मिन्क्षेम: केनाञ्सा भवेत् ॥
१५॥
तत्--अतः; अहम्--मैं; कृत-विश्रम्भ: --पूरी तरह आश्वस्त होकर; सु-हृदः--मित्र; व:ः--हमारा; तपस्विनामू-- भौतिक कष्टसहने वाले; सम्पृच्छे--पूछना चाहता हूँ; भवे--इस संसार में; एतस्मिन्ू--यह; क्षेम:--अन्तिम वास्तविकता, कल्याण; केन--किस विधि से; अज्ञसा--अविलम्ब; भवेत्-- प्राप्त किया जा सकता है।
मैं पूर्ण रूप से आश्वस्त हूँ कि आप जैसे महापुरुष इस संसार की अग्नि में सन्तप्त होने वालेव्यक्तियों के एकमात्र मित्र हैं।
अत: मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि इस संसार में हम किस प्रकारजल्दी से जल्दी जीवन का परम उद्देश्य प्राप्त कर सकते हैं।
"
व्यक्तमात्मवतामात्मा भगवानात्मभावन: ।
स्वानामनुग्रहायेमां सिद्धरूपी चरत्यज: ॥
१६॥
व्यक्तम्-स्पष्ट; आत्म-वताम्-- अध्यात्मवादियों का; आत्मा--जीवन लक्ष्य; भगवान्-- भगवान्; आत्म-भावन:--जीवों कोऊपर उठाने की कामना करने वाले; स्वानामू--जिनके अपने भक्तगण; अनुग्रहाय--केवल कृपा दिखाने के लिए; इमामू--इसप्रकार; सिद्ध-रूपी--पूर्णतया स्वरूपसिद्ध; चरति-- भ्रमण करते हैं; अज:--नारायण |
भगवान् अपने अंश-रूप जीवों को ऊपर उठाने के लिए सतत इच्छुक रहते हैं और उन्हीं केविषेश लाभ हेतु सारे संसार में आप-जैसे स्वरूपसिद्ध पुरुषों के रूप में भ्रमण करते रहते हैं।
"
मैत्रेय उवाचपृथोस्तत्सूक्तमाकर्णय सारं सुष्ठु मितं मधु ।
स्मयमान इब प्रीत्या कुमार: प्रत्युवाच ह ॥
१७॥
मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा; पृथो:--राजा पृथु का; तत्--वह; सूक्तम्--वैदिक निष्कर्ष; आकर्ण्य--सुनकर;सारम्--अत्यन्त सारगर्भित; सुष्ठु--युक्तियुक्त, उपयुक्त; मितम्--परिमित, न्यूनतम; मधु --सुनने में मधुर; स्मयमान:--हँसते हुए;इब--सहश; प्रीत्या--परम प्रसन्नतापूर्वक; कुमार:--ब्रह्मचारी ने; प्रत्युवाच--उत्तर दिया; ह--इस प्रकार
महर्षि मैत्रेय ने कहा : इस प्रकार ब्रह्मचारियों में श्रेष्ठ सनत्कुमार पृथु महाराज की अत्यन्तसारगर्भित, युक्तियुक्त तथा श्रुतिमधुर वाणी सुनकर अत्यन्त प्रसन्न होकर हँसे और कहने लगे।
"
सनत्कुमार उबवाचसाधु पृष्ठ महाराज सर्वभूतहितात्मना ।
भवता विदुषा चापि साधूनां मतिरीहशी ॥
१८॥
सनत्-कुमार: उबाच--सन त्कुमार ने कहा; साधु--साधु प्रकृति का; पृष्टम्-- प्रश्न; महाराज--हे राजा; सर्व-भूत--सभीजीवात्माएँ; हित-आत्मना--सबों का हित चाहने वाले के द्वारा; भवता--आपके द्वारा; विदुषा--अत्यन्त विद्वान; च--तथा;अपि--यद्यपि; साधूनाम्--साधु पुरुषों की; मतिः --बुद्धि; ईहशी--ऐसी ।
सनत्कुमार ने कहा : हे राजा पृथु, आपने मुझसे बहुत ही अच्छा प्रश्न पूछा है।
ऐसे प्रश्न,विशेष रूप से आप-जैसे पर-हितकारी द्वारा उठाये जाने के कारण समस्त जीवात्माओं के लिएअत्यन्त लाभप्रद हैं।
यद्यपि आप सब कुछ जानते हैं, किन्तु आप ऐसे प्रश्नों को इसीलिए पूछ रहेहैं, क्योंकि यह साधु पुरुषों का आचरण है।
ऐसी बुद्धि आपके सर्वथा अनुरूप है।
"
सड्भमः खलु साधूनामुभयेषां च सम्मतः ।
यत्सम्भाषणसपम्प्रश्न: सर्वेषां वितनोति शम् ॥
१९॥
सड्भम:--संगति; खलु--निश्चय ही; साधूनाम्ू-- भक्तों की; उभयेषाम्-दोनों के लिए; च--भी; सम्मत:--अभिमत्,निर्णायक; यत्--जो; सम्भाषण--विवेचना; सम्प्रश्न: -- प्रश्न तथा उत्तर; सर्वेषामू--सबों का; वितनोति--फैलाता है; शम्--वास्तविक सुख।
जब भक्तों का समागम होता है, तो उनकी विवेचनाएँ, प्रश्न तथा उत्तर वक्ता तथा श्रोतादोनों ही के लिए निर्णायक होते हैं।
इस प्रकार ऐसा समागम प्रत्येक व्यक्ति के वास्तविक सुखके हेतु लाभप्रद है।
"
अस्त्येव राजन्भवतो मधुद्विषःपादारविन्दस्य गुणानुवादने ।
रतिर्दुरापा विधुनोति नैष्ठिकीकाम कषायं मलमन्तरात्मन: ॥
२०॥
अस्ति--है; एव--निश्चय ही; राजन्ू--हे राजा; भवत:--आपका; मधु-द्विष: -- भगवान् का; पाद-अरविन्दस्य-- चरणकमलोंका; गुण-अनुवादने-- महिमा-गायन में; रतिः --आसक्ति; दुरापा--अत्यन्त कठिन; विधुनोति-- धो देती है; नैष्ठिकी -- अत्यन्तनिष्ठावान; कामम्ू--वासनामय; कषायम्-- अतिरंजित काम-वासनाएँ; मलम्--गंदा; अन्त:ः-आत्मन:--अन्तस्तल से |
सनत्कुमार ने आगे कहा : हे राजन, भगवान् के चरणकमलों के गुणानुवाद के प्रति आपकापहले से ही झुकाव है।
ऐसी आसक्ति दुर्लभ होती है, किन्तु एक बार भगवान् में अविचल श्रद्धाहो जाने पर यह अन्तस्तल की समस्त कामवासनाओं को स्वतः ही धो डालती है।
"
शास्क्रेष्वियानेव सुनिश्चितो नृणांक्षेमस्थ सूयग्विमृशेषु हेतु: ।
असडू आत्मव्यतिरिक्त आत्मनिहढा रतिर्ब्रह्मणि निर्गुणे च या ॥
२१॥
शास्त्रेषु--शास्त्रों में; इयान् एब--केवल यह; सु-निश्चित:--ठीक से निर्धारित; नृणामू--मानव समाज के; क्षेमस्थ--कल्याणका; सयक्--पूर्णतया; विमृशेषु--पूर्ण विचार-विमर्श से; हेतु:--कारण; असड्ु:--विरक्ति; आत्म-व्यतिरिक्ते --देहात्मबुर्द्धि;आत्मनि--परमात्मा के प्रति; हढा--सशक्त; रति:ः--आसक्ति; ब्रह्मणि-- अध्यात्म; निर्गुणे--गुणों से परे परमेश्वर में; च--तथा;या--जो।
भलीभाँति विचार करने के बाद शास्त्रों में यह निश्चित किया गया है कि मानव समाज केकल्याण का चरम लक्ष्य देहात्मबुद्धि से विरक्ति एवं प्रकृति के गुणों से परे दिव्य परमेश्वर के प्रतिसुदृढ़ आसक्ति है।
"
सा श्रद्धवा भगवद्धर्मचर्ययाजिज्ञासयाध्यात्मिकयोगनिष्ठया ।
योगेश्वरोपासनया च नित्यपुण्यश्रवःकथया पुण्यया च ॥
२२॥
सा--वह भक्ति; श्रद्धया-- श्रद्धा तथा संकल्प से; भगवत्-धर्म--भक्ति; चर्यया--विवेचना से; जिज्ञासया-- जिज्ञासा से;अध्यात्मिक--अध्यात्म सम्बन्धी; योग-निष्ठया--आत्मज्ञान में दृढ़ निश्चय से; योग-ईश्वर-- भगवान् की; उपासनया-- पूजा से;च--तथा; नित्यमू--नियमित रूप से; पुण्य-श्रव:--जिसके सुनने से; कथया--विवेचना से; पुण्यया--पुण्य से; च--भी |
भक्ति करने, भगवान् के प्रति जिज्ञासा करने, जीवन में भक्तियोग का व्यवहार करने, पूर्णपुरुषोत्तम योगेश्वर भगवान् की पूजा करने तथा भगवान् की महिमा का श्रवण एवं कीर्तन करनेसे परमेश्वर के प्रति आसक्ति बढ़ाई जा सकती है।
ये सारे कार्य अपने आप में परम पवित्र हैं।
"
अर्थेन्द्रियारामसगोष्ठ्यतृष्णयातत्सम्मतानामपरिग्रहेण च्च।
विविक्तरुच्या परितोष आत्मनिविना हरेर्गुणपीयूषपानात् ॥
२३॥
अर्थ--धन; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; आराम--तृप्ति; स-गोष्ठी-- अपने संगी सहित; अतृष्णया--वितृष्णा से; तत्--उस;सम्मतानाम्ू--उनके द्वारा अनुमोदित; अपरिग्रहेण--अस्वीकृति द्वारा; च-- भी; विविक्त-रुच्या-- अरुचि; परितोषे-- प्रसन्नता;आत्मनि--स्व; विना--रहित; हरेः-- भगवान् के; गुण-- गुण; पीयूष-- अमृत; पानात्ू--पीने से |
ऐसे लोगों की संगति न करके, जो केवल इन्द्रियतृष्ति एवं धनोपार्जन के फेर में रहते हैं,मनुष्य को आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करनी चाहिए।
उसे न केवल ऐसे लोगों से दूर रहना चाहिए, वरन् जो उनका संग करते हैं उनसे भी बचना चाहिए।
मनुष्य को अपना जीवन इसप्रकार ढालना चाहिए कि जिसमें उसे भगवान् हरि की महिमा का अमृत पान किये बिना चैन नमिले।
इस प्रकार इन्द्रियभोग से विरक्ति उत्पन्न होने पर मनुष्य उन्नति कर सकता है।
"
अहिंसया पारमहंस्यचर्ययास्मृत्या मुकुन्दाचरिताछयसीधुना ।
यमैरकामैर्नियमै श्राप्पनिन्दयानिरीहया द्वन्द्वतितिक्षया च ॥
२४॥
अहिंसया--अहिंसा द्वारा; पारमहंस्थ-चर्यया--महान् आचार्यों के चरणचिह्नों का अनुसरण करने से; स्मृत्या--स्मरण करने से;मुकुन्द-- भगवान्; आचरित-अछय--उनकी लीलाओं का केवल प्रचार करने से; सीधुना--अमृत से; यमै: --नियामकसिद्धान्तों के पालन से; अकामैः--भौतिक आकांक्षाओं से विहीन; नियमै:--विधि-विधानों का हढ़ता से पालन करने से; च--भी; अपि--निश्चय ही; अनिन्दया--निन््दा किये बिना; निरीहया--सादा जीवन व्यतीत करते हुए; दन्द्र--द्वैत भाव; तितिक्षया--सहिष्णुता से; च--तथा |
आध्यात्मिक उन्नति के इच्छुक व्यक्ति को चाहिए कि वह अहिंसक हो, महान् आचार्यों केपदचिह्नों का अनुगमन करे, भगवान् की लीलाओं के अमृत का सदैव स्मरण करे, बिना किसीभौतिक कामना के यम-नियमों का पालन करे और ऐसा करते हुए दूसरों की निन््दा न करे।
भक्त को अत्यन्त सादा जीवन बिताना चाहिए और विरोधी तत्त्वों की द्वैतता से विचलित नहींहोना चाहिए।
उसे चाहिए कि वह उन्हें सहन करना सीखे।
"
हरेर्मुहुस्तत्परकर्णपूर-गुणाभिधानेन विजृम्भभाणया ।
भकक्त्या हासड्रः सदसत्यनात्मनिस्यान्निर्गुणे ब्रह्मणि चाझ्सा रति: ॥
२५॥
हरेः-- भगवान् के; मुहुः--निरन्तर; तत्-पर-- भगवान् के सन्दर्भ में; कर्ण-पूर--कान का आभूषण; गुण-अभिधानेन --दिव्यगुणों की विवेचना से; विजृम्भभाणया--कृष्ण-चेतना ( भक्ति ) को बढ़ाने से; भक्त्या--भक्ति से; हि--निश्चय ही; असड्भ:--अदूषित; सत्-असति-- भौतिक जगत; अनात्मनि--आत्मनि ( आध्यात्मिक ज्ञान ) का उल्टा; स्थात्ू--होना चाहिए; निर्गुणे--अध्यात्म में; ब्रह्मणि--परमेश्वर में; च--तथा; अज्ञसा--सरलतापूर्वक; रति:ः--आकर्षण ।
भक्त को चाहिए कि भगवान् के दिव्य गुणों के निरन्तर श्रवण द्वारा भक्ति-अनुशीलन मेंउत्तरोत्तर वृद्धि करे।
ये लीलाएँ भक्तों के कानों के आभूषण सहश हैं।
भक्ति करने तथा भौतिकगुणों को पार करने से मनुष्य सहज ही अध्यात्म में भगवान् में स्थिर हो सकता है।
"
यदा रतिर््रह्मणि नैष्ठिकी पुमा-नाचार्यवान्ज्ञानविरागरंहसा ॥
दहत्यवीर्य हृदयं जीवकोशंपश्ात्मकं योनिमिवोत्थितोग्नि: ॥
२६॥
यदा--जब; रति:ः--आसक्ति; ब्रहणि-- भगवान् में; नैष्ठिकी --स्थिर; पुमान्ू--मनुष्य; आचार्यवान्--गुरु के प्रति पूर्णतःसमर्पित; ज्ञान--ज्ञान; विराग--विरक्ति; रहसा--के बल से; दहति--जलाता है; अवीर्यम्--नपुंसक; हृदयम्--हृदय के भीतर;जीव-कोशम्--आत्मा का आवरण; पञ्ञ-आत्मकम्--पाँचों तत्त्व; योनिमू--जन्म का स्त्रोत; इब--सहश; उत्थित:--उद्भूत;अग्निः--आग।
गुरु की कृपा से तथा ज्ञान एवं विराग के जागरित होने से भगवान् के प्रति आसक्ति में स्थिरहो जाने पर जीवात्मा जो शरीर के अन्तस्तल में स्थित तथा पाँच तत्त्वों से आच्छादित है अपनेभौतिक परिवेश को उसी प्रकार जला देता है, जिस प्रकार काष्ठ से उत्पन्न अग्नि काष्ठ को हीभस्मसात् कर देती है।
"
दग्धाशयो मुक्तसमस्ततद्गुणोनैवात्मनो बहिरन्तर्विचष्टे ।
परात्मनोर्यद्व्यवधानं पुरस्तात्स्वप्ने यथा पुरुषस्तद्विनाशे ॥
२७॥
दग्ध-आशय:--समस्त इच्छाओं का जल जाना; मुक्त--मुक्त; समस्त--सभी; तत्-गुण: --द्रव्य के सम्बन्ध में गुण; न--नहीं;एव--निश्चय ही; आत्मन:--आत्मा या परमात्मा; बहिः--बाहा; अन्तः--आन्तरिक; विचष्टे-- कार्यशील; पर-आत्मनो: --परमात्मा का; यत्--जो; व्यवधानम्-- अन्तर; पुरस्तात्--मानो प्रारम्भ में हो; स्वप्ने--स्वप्न में; यथा--जिस प्रकार; पुरुष: --व्यक्ति; तत्--वह; विनाशे--समाप्त होते हुए
जब मनुष्य भौतिक समस्त इच्छाओं से रहित और भौतिक गुणों से मुक्त हो जाता है, तो वहअन्त: तथा बाह्य रूप से किये गये कार्यों में अन्तर नहीं देखता है।
उस समय आत्म-साक्षात्कारके पूर्व विद्यमान आत्मा तथा परमात्मा का अन्तर विनष्ट हो जाता है।
स्वप्न टूटने पर स्वप्न तथास्वप्न देखने वाले के बीच कोई अन्तर नहीं रह जाता।
"
आत्मानमिन्द्रियार्थ च परं यदुभयोरपि ।
सत्याशय उपाधौ बै पुमान्पश्यति नान्यदा ॥
२८॥
आत्मानम्--आत्मा; इन्द्रिय-अर्थम्--इन्द्रियतृप्ति हेतु; च--तथा; परम्--दिव्य; यत्--जो; उभयो:--दोनों; अपि--निश्चय ही;सति--स्थित होकर; आशये-- भौतिक इच्छाएँ; उपाधौ--उपाधि या नाम; बै--निश्चय ही; पुमान्--मनुष्य; पश्यति-- देखता है;न अन्यदा--अन्यथा नहीं
जब आत्मा इन्द्रियतृष्ति के हेतु रहता है, तो वह नाना प्रकार की इच्छाएँ उत्पन्न करता है,जिसके कारण उसको उपाधियाँ दी जाती हैं।
किन्तु जब मनुष्य दिव्य स्थिति में रहता है, तो वहभगवान् की इच्छाओं को पूरा करने के अतिरिक्त और किसी कार्य में रुचि नहीं दिखाता।
"
निमित्ते सति सर्वत्र जलादावपि पूरुष: ।
आत्मनश्च परस्यापि भिदां पश्यति नान्यदा ॥
२९॥
निमित्ते--कारणों के फलस्वरूप; सति--होते हुए; सर्वत्र--सभी जगह; जल-आदौ अपि--जल तथा अन्य प्रतिबिम्बित करनेवाले माध्यम; पूरुष: --पुरुष; आत्मन:--अपने; च--तथा; परस्य अपि--दूसरे का भी; भिदाम्--अन्तर; पश्यति--देखता है;न अन्यदा--अन्य कोई कारण नहीं।
विभिन्न निमित्तों ( कारणों ) के फलस्वरूप ही मनुष्य अपने तथा दूसरों में अन्तर देखता है,जिस प्रकार के जल, तेल या दर्पण में एक ही पदार्थ के प्रतिबिम्ब भिन्न-भिन्न प्रकार से दिखतेहैं।
"
इन्द्रियर्विषयाकृष्ट्रराक्षिप्तं ध्यायतां मन: ।
चेतनां हरते बुद्धेः स्तम्बस्तोयमिव हृदातू ॥
३०॥
इन्द्रिये:--इन्द्रियों के द्वारा; विषय--विषय वस्तु; आकृष्टे:--आकृष्ट होकर; आश्षिप्तमू--विचलित; ध्यायताम्--सदैव सोचतेहुए; मन:ः--मन; चेतनामू-- चेतना; हरते--खो जाती है; बुद्धेः--बुद्धि की; स्तम्ब:ः--बड़े-बड़े तिनके, कुशादि; तोयम्--जल;इब--सहश; हृदात्ू--झील ( जलाशय ) से |
जब मनुष्य का मन तथा इन्द्रियाँ सुख-भोग के हेतु विषय-वस्तुओं के प्रति आकर्षित होतेहैं, तो मन विचलित हो जाता है।
परिणाम स्वरूप लगातार विषय-वस्तुओं का चिन्तन करने सेमनुष्य की असली कृष्णचेतना वैसे ही खो जाती है, जैसे कि जलाशय के किनारे उगे हुए बड़ीबड़ी कुश जैसी घास के द्वारा चूसे जाने के कारण जलाशय का जल।
"
भ्रश्यत्यनुस्मृतिश्ित्तं ज्ञानभ्रंंशः स्मृतिक्षये ।
तद्रोध॑ कवय: प्राहुरात्मापह्तबमात्मन: ॥
३१॥
भ्रश्यति--विनष्ट हो जाती है; अनुस्मृति:--निरन्तर चिन्तन; चित्तम्ू--चेतना; ज्ञान-भ्रंश:--वास्तविक ज्ञान से विरहित; स्मृति-क्षये--स्मृति के विनाश से; ततू-रोधम्--उस विधि का अवरुद्ध होना; कवयः--बड़े-बड़े पंडितों ने; प्राहु:--विचार व्यक्तकिया है; आत्म--आत्मा का; अपहृवम्--विनाश; आत्मन:--आत्मा का।
जब मनुष्य अपनी मूल चेतना से इधर-उधर हटता है, तो वह न तो अपनी पूर्वस्थिति कोस्मरण रख पाता है और न वर्तमान स्थिति को पहचान पाता है।
स्मरण-शक्ति के नष्ट हो जाने परजितना भी ज्ञान अर्जित किया जाता है, वह एक झूठी आधार-शिला पर टिका रहता है।
जबऐसी घटना घटती है, तो पंडित जन कहते हैं कि आत्मा का विनाश हो गया।
"
नातः परतरो लोके पुंसः स्वार्थव्यतिक्रम: ।
यदध्यन्यस्य प्रेयस्त्वमात्मन: स्वव्यतिक्रमात् ॥
३२॥
न--नहीं; अत:--इसके बाद; परतरः --बढ़कर; लोके --इस संसार में; पुंसः --जीवात्माओं का; स्व-अर्थ--लाभ;व्यतिक्रम:--रुकावट; यत्ू-अधि--इसके आगे; अन्यस्य--दूसरों का; प्रेयस्त्वम्-- अधिक रुचिकर; आत्मन:--अपने लिए;स्व--अपना; व्यतिक्रमात्--रूकावट से |
आत्म-साक्षात्कार की अपेक्षा अन्य विषयों को अधिक रुचिकर सोचना--मनुष्य के अपनेहित के लिए इससे बड़ी बाधा कोई नहीं होती है।
"
अर्थेन्द्रियार्थाभिध्यानं सर्वार्थापह्ववो नृणाम् ।
भ्रंशितो ज्ञानविज्ञानाद्येनाविशति मुख्यताम् ॥
३३॥
अर्थ--धन; इन्द्रिय-अर्थ--इन्द्रियों की तुष्टि के लिए; अभिध्यानम्--निरन्तर ध्यान करने से; सर्व-अर्थ--चार प्रकार कीउपलब्धियाँ, पुरुषार्थ; अपह्ृव:--विनाशकारी; नृणाम्--मानव समाज की; भ्रंशित:--से रहित; ज्ञान--ज्ञान; विज्ञानातू-- भक्तिसे; येन--इससे; आविशति--प्रवेश करता है; मुख्यताम्ू--जड़ जीवन |
धन कमाने तथा इन्द्रितृप्ति के लिए उसके उपयोग के विषय में निरन्तर सोचते रहने सेमानव-समाज के प्रत्येक व्यक्ति का पुरुषार्थ विनष्ट होता है।
जब कोई ज्ञान तथा भक्ति से शून्यहो जाता है, वह वृक्षों तथा पत्थरों की सी जड़ योनियों में प्रवेश करता है।
"
न कुर्यात्कर्हिचित्सड़ तमस्तीत्रं तितीरिषु: ।
धर्मार्थकाममोक्षाणां यद॒त्यन्तविघातकम् ॥
३४॥
न--मत; कुर्यातू-करे; कर्हिचितू--क भी भी; सड्रमू--संगति, साथ; तम:--अज्ञान; तीब्रमू--तेज गति से; तितीरिषु:--वेपुरुष जो अज्ञान को पार करने के इच्छुक है; धर्म--धर्म; अर्थ--आर्थिक विकास; काम--इन्द्रियतृष्ति; मोक्षाणाम्--मोक्ष का;यत्--जो; अत्यन्त--अत्यधिक; विघातकम्--बाधक या रुकावट
जो अज्ञान के सागर को पार करने की प्रबल इच्छा रखते हैं, उन्हें कभी भी तमोगुण के साथसाथ नहीं जुड़ना चाहिए, क्योंकि सुखवादी कार्य धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष के मार्ग में अत्यन्तबाधक हैं।
"
तत्रापि मोक्ष एवार्थ आत्यन्तिकतयेष्यते ।
त्रैवर्ग्योथो यतो नित्यं कृतान्तभयसंयुतः ॥
३५॥
तत्र--वहाँ; अपि-- भी; मोक्ष: --मो क्ष; एव--निश्चय ही; अर्थे--के हेतु; आत्यन्तिकतया--सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण; इष्यते--ग्रहण करे; त्रै-वर्ग्य:--अन्य तीन, अर्थात् धर्म, अर्थ तथा काम; अर्थ:--हित, पुरुषार्थ; यतः--जिससे; नित्यमू--नियमित रूपसे; कृत-अन्त-- मृत्यु; भय--डर; संयुत:--संलग्न |
चारों पुरुषार्थ अर्थात्--धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष--में से मोक्ष को अत्यन्त गम्भीरतापूर्वकग्रहण करना चाहिए।
अन्य तीन तो प्रकृति के कठोर नियम अर्थात् काल ( मृत्यु ) द्वारा नाशवान् हैं।
"
परेवरे च ये भावा गुणव्यतिकरादनु ।
न तेषां विद्यते क्षेममीशविध्वंसिताशिषाम् ॥
३६॥
परे--जीवन की उच्चतर स्थिति में; अवरे--जीवन की निम्नतर अवस्था में; च--तथा; ये--ये सब; भावा:--विचार; गुण--भौतिक गुण; व्यतिकरात्--अन्योन्य क्रिया से; अनु--पीछे-पीछे चलना; न--कभी नहीं; तेषाम्ू--उनका; विद्यते--विद्यमानहै; क्षेमम्ू--कुशल; ईश--पर मे श्वर; विध्वंसित--विनष्ट; आशिषाम्--आशीर्वादों का
हम उच्चतर जीवन की विभिन्न अवस्थाओं को जीवन की निम्नतर अवस्थाओं से अलगकरते हुए वरदानस्वरूप ग्रहण करते हैं, किन्तु हमें स्मरण रखना चाहिए कि इस प्रकार केभेदभाव भौतिक प्रकृति के गुणों की अन्योन्य क्रिया के प्रसंग में ही विद्यमान रहते हैं।
वस्तुतःजीवन की इन अवस्थाओं का कोई स्थायी अस्तित्व नहीं होता, क्योंकि ये परम नियन्ता द्वाराविनष्ट कर दी जाएंगी।
"
तत्त्वं नरेन्द्र जगतामथ तस्थूषां चदेहेन्द्रयासुधिषणात्मभिरावृतानाम् ।
यः क्षेत्रवित्तपतया हृदि विश्वगाविःप्रत्यक्ञकास्ति भगवांस्तमवेहि सोउस्मि ॥
३७॥
तत्--अतः; त्वमू-तुम; नर-इन्द्र-हे श्रेष्ठ राजन; जगताम्--चरों का; अथ--इसलिए; तस्थूषाम्--अचर; च-- भी; देह--शरीर; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; असु-- प्राण; धिषणा--विचार से; आत्मभि:--आत्म-साक्षात्कारसे; आवृतानाम्--इस प्रकार सेआच्छादित लोगों का; यः--जो; क्षेत्र-वित्-- क्षेत्र का ज्ञाता; तपतया--वश में करके; हृदि--हृदय में; विश्वक्ू--हर जगह;आवि:--अभिव्यक्त; प्रत्यक्--प्रत्येक रोमकूप में; चकास्ति--चमकता हुआ; भगवान्-- श्री भगवान्; तम्--उसको; अवेहि--जानने का प्रयास करो; सः अस्मि--मैं वह हूँ।
सनत्कुमार ने राजा को उपदेश दिया--अतः हे राजा पृथु, उन भगवान् को समझने का प्रयासकरो जो प्रत्येक हृदय में प्रत्येक जीव के साथ निवास कर रह रहे हैं, चाहे वह चर हो या अचर।
प्रत्येक जीव स्थूल भौतिक शरीर से तथा प्राण एवं बुद्धि से निर्मित सूक्ष्म शरीर से पूर्णतयाआवृत है।
"
यस्मिन्निदं सदसदात्मतया विभातिमाया विवेकविधुति स्त्रजि वाहिबुद्धि: ।
त॑ नित्यमुक्तपरिशुद्धविशुद्धतत्त्वप्रत्यूढकर्मकलिलप्रकृतिं प्रपये ॥
३८ ॥
यस्मिन्ू--जिसमें; इदम्ू--यह; सत्-असत्--परमे श्वर तथा उनकी शक्तियाँ; आत्मतया--समस्त कार्य तथा कारण के मूल रूप;विभाति--प्रकट करता है; माया--माया, मोह; विवेक-विधुति--जानबूझ कर मुक्त किये गये; स्त्रजि--रस्सी में; वा--अथवा;अहि--सर्प; बुद्धिः--बुद्धि; तम्ू--उसको; नित्य--शाश्वत रूप से; मुक्त--मुक्त; परिशुद्ध--कल्मषहीन; विशुद्ध-शुद्ध;तत्त्वमू--सत्य; प्रत्यूड--दिव्य; कर्म--सकाम कर्म; कलिल--अपवित्रताएँ; प्रकृतिमू-- आध्यात्मिक शक्ति में स्थित; प्रपद्ये--आत्मसमर्पण करो।
भगवान् इस शरीर के भीतर कारण तथा कार्य के एकाकार रूप में अपने को प्रकट करतेहैं, किन्तु जो विवेक रस्सी में सर्प के भ्रम को दूर करने वाला है, यदि उससे किसी ने माया कोपार कर लिया है, तो वही यह समझ सकता है कि परमात्मा भौतिक सृष्टि से परे हैं और शुद्धअन्तरंगा शक्ति में स्थित हैं।
भगवान् समस्त भौतिक कल्मष से परे हैं और एकमात्र उन्हीं कीशरण में जाना चाहिए।
"
यत्पादपट्डूजपलाशविलासभकक्त्याकर्माशियं ग्रथितमुद्ग्रथयन्ति सन््तः ।
तद्बन्न रिक्तमतयो यतयोपि रुद्ध-स्त्रोतोगणास्तमरणं भज वासुदेवम् ॥
३९॥
यत्--जिसके; पाद--चरण; पड्डूज--कमल; पलाश--पंखुड़ियाँ या अंगूठे; विलास-- भोग; भक्त्या--भक्ति से; कर्म--सकाम कर्म; आशयमू--इच्छा; ग्रधितम्--कठोर ग्रंथि; उद्ग्रथयन्ति--समूल नष्ट कर देते हैं; सन््त:ः-- भक्तजन; तत्--उसके;बत्--सहृश; न--कभी नहीं; रिक्त-मतय:-- भक्ति से रहित मनुष्य; यतय:--अधिकाधिक प्रयत्त करके; अपि--यद्यपि;रुद्ध--बन्द; सत्रोत:-गणा:--इन्द्रियसुख की लहरें; तम्--उसको; अरणम्--शरण ग्रहण करने योग्य; भज--भक्ति में लगो;वासुदेवम्--वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण की ।
जो भक्तजन नित्य ही भगवान् के चरणकमलों के अँगुष्ठों की सेवा में रत रहते हैं, वे सकामकर्म की जोर से बँधी गाँठ जैसी इच्छाओं को सरलता से लाँघ जाते हैं।
चूँकि ऐसा कर पानादुःसाध्य है, अतः अभक्तजन--ज्ञानी तथा योगी--इन्द्रियतृप्ति की तरंगों को रोकने का प्रयासकरके भी ऐसा नहीं कर पाते।
अतः तुम्हें आदेश है कि तुम वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण की भक्ति मेंलग जाओ।
"
कृच्छो महानिह भवार्णवमप्लवेशांषड्वर्गनक्रमसुखेन तितीर्षन्ति ।
तत्त्व हरेभगवतो भजनीयमद्िंश्रकृत्वोडुपं व्यसनमुत्तर दुस्तरार्णम् ॥
४०॥
कृच्छः--कष्टकारक; महान्-- अत्यधिक; इह--यहाँ ( इस जीवन में ); भव-अर्णवम्--संसार रूपी समुद्र; अप्लब-ईशाम्--अभक्तों का जिन्होंने भगवान् के चरणकमलों की शरण नहीं ग्रहण की; षट्-वर्ग--छहों इन्द्रियाँ; नक्रमू--मगर; असुखेन--अत्यन्त कठिनाई से; तितीर्षन्ति--पार करते हैं; तत्--अतः ; त्वम्--तुम; हरेः-- भगवान् के; भगवतः--पर मे श्वर के;भजनीयम्--आराधनीय; अड्प्रिमू--चरणकमल को; कृत्वा--करके ; उडुपमू--नाव; व्यसनम्--सभी प्रकार के संकट;उत्तर--पार करो; दुस्तर--अत्यन्त कठिन; अर्गमू--सागर को |
अज्ञान के सागर को पार करना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि उसमें अनेक भयानक मगरमच्छभरे पड़े हैं।
जो भक्त नहीं हैं, वे इस समुद्र को पार करने के लिए कठिन तपस्या करते हैं, किन्तुहम तुम्हारे लिए बता रहे हैं कि तुम एकमात्र भगवान् के चरणकमलों का आश्रय लो, बे समुद्रको पार करने के लिए नाव के समान हैं।
यद्यपि सागर को लाँघना कठिन है, किन्तु भगवान् केचरणकमलों की शरण ग्रहण करके तुम सभी संकटों को पार कर जाओगे।
"
मैत्रेय उवाचस एवं ब्रह्मपुत्रेण कुमारेणात्ममेधसा ।
दर्शितात्मगति: सम्यक्प्रशस्योवाच त॑ नूप: ॥
४१॥
मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ऋषि ने कहा; सः--राजा; एवम्--इस प्रकार; ब्रह्म-पुत्रेण-- ब्रह्मा के पुत्र द्वारा; कुमारेण --कुमारों में सेएक के द्वारा; आत्म-मेधसा--आत्मज्ञान में पारंगत; दर्शित--दिखाया जाकर; आत्म-गति:--आध्यात्मिक प्रगति; सम्यक्--पूर्णतया; प्रशस्य--पूजा करके; उबाच--कहा; तम्--उससे; नृप:--राजा ने |
मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा : इस प्रकार ब्रह्मा के पुत्र कुमारों में से एक के द्वारा जो पूर्णआत्रज्ञानी था, पूर्ण आत्मज्ञान प्राप्त करके राजा ने उनकी निम्नलिखित शब्दों से आराधना की।
"
राजोबाचकृतो मेअनुग्रहः पूर्व हरिणार्तानुकम्पिना ।
'तमापादयितुं ब्रह्मन्भगवन्यूयमागता: ॥
४२॥
राजा उवाच--राजा ने कहा; कृत:--किया हुआ; मे--मेरे प्रति; अनुग्रह:ः--अहैतुकी कृपा; पूर्वमू--पहले; हरिणा-- भगवान्विष्णु द्वारा; आर्त-अनुकम्पिना--दुखी पुरुषों पर दयालु; तम्--उस; आपादयितुम्--पुष्टि के लिए; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण;भगवनू--हे शक्तिमान; यूयमू--तुम सब; आगता:--यहाँ आये हो।
राजा ने कहा : हे ब्राह्मण, हे शक्तिमान, पहले भगवान् विष्णु ने मुझ पर अहैतुकी कृपाप्रदर्शित की थी और यह संकेत किया था कि आप मेरे घर पधारेंगे।
आप लोग उसी आशीर्वादकी पुष्टि करने के लिए यहाँ पर आये हैं।
"
निष्पादितश्च कार्त्स्येन भगवद्धिर्घणालुभि: ।
साधूच्छिष्ट हि मे सर्वमात्मना सह कि ददे ॥
४३॥
निष्पादितः च--तथा आज्ञा का समुचित पालन हो गया; कार्त्स्येन--पूर्णत:; भगवद्धि:--भगवान् के प्रतिनिधियों द्वारा;घृणालुभि:--अत्यन्त दयालु द्वारा; साधु-उच्छिष्टम्-साधु पुरुषों का जूठन; हि--निश्चय ही; मे--मेरा; सर्वमू--हर चीज;आत्मना--हृदय तथा आत्मा; सह--साथ; किम्--क्या; ददे--दूँ।
हे ब्राह्ण, आपने तो भगवान् के आदेश का सम्यक् पालन किया है, क्योंकि आप उन्हीं केसमान उदार भी हैं।
अतः यह मेरा कर्तव्य है कि आपको कुछ अर्पित करूँ, किन्तु मेरे पास जोकुछ भी है, वह साधु पुरुषों के भोजन में से बचा-खुचा प्रसाद ही है।
"
मैं आपको क्या दूँ?प्राणा दाराः सुता ब्रह्मन्गृहाश्न सपरिच्छदा: ।
राज्यं बल॑ मही कोश इति सर्व निवेदितम् ॥
४४॥
प्राणा:--प्राण, जीवन; दारा:--स्त्री; सुता:--सन्तानें; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; गृहा:--घर; च-- भी; स--सहित; परिच्छदा: --समस्त सामग्री; राज्यमू--राज्य; बलमू--शक्ति, सेना; मही-- धरती; कोश:--खजाना; इति--इस प्रकार; सर्वम्--सब कुछ;निवेदितम्--अर्पित |
राजा ने आगे कहा : अतः हे ब्राह्मणो, मेरा प्राण, पत्नी, बच्चे, घर, घर का साज-सामान,मेरा राज्य, सेना, पृथ्वी तथा विशेष रूप से मेरा राजकोष--ये सब आपको अर्पित हैं।
"
सैनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च ।
सर्व लोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति ॥
४५॥
सैना-पत्यमू--सेनापति का पद; च--तथा; राज्यमू--शासक का पद; च--तथा; दण्ड-- अनुशासन; नेतृत्वम्--नेतृत्व; एव--निश्चय ही; च--तथा; सर्व--समस्त; लोक-अधिपत्यम्ू--लोकों का स्वामित्व; च--तथा; बेद-शास्त्र-वित्-- वैदिक साहित्यका ज्ञाता; अरहति--पात्र होता है
चूँकि केवल ऐसा व्यक्ति, जो वैदिक ज्ञान के अनुसार पूर्ण रूप से शिक्षित हो, सेनापति,राज्य का शासक, दण्डदाता तथा सारे लोक का स्वामी होने का पात्र होता है, अतः पृथु महाराजने कुमारों को सर्वस्व अर्पित कर दिया।
"
स्वमेव ब्राह्मणो भुड्डे स्व वस्ते स्व॑ं ददाति च ।
तस्यैवानुग्रहेणान्र॑ भुझते क्षत्रियादय: ॥
४६॥
स्वम्--अपना; एव--ही; ब्राह्मण: --ब्राह्मण; भु्ढे -- भोगता है; स्वम्ू-- अपना; वस्ते--पहनता है; स्वम्--अपना; ददाति--दान देता है; च--तथा; तस्य--उसकी; एव--ही; अनुग्रहेण--कृपा से; अन्नम्--अन्न; भुञ्ञते--खाता है; क्षत्रिय-आदय:--क्षत्रिय आदि समाज के अन्य वर्ण
क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र केवल ब्राह्मणों की कृपा से अपना भोजन प्राप्त करते हैं।
केवलब्राह्मण ही ऐसे हैं, जो अपनी ही सम्पत्ति का भोग करते हैं, अपने कपड़े पहनते हैं और अपना हीधन दान में देते हैं।
"
यैरीहशी भगवतो गतिरात्मवादएकान्ततो निगमिभ्रि: प्रतिपादिता नः ।
तुष्यन्त्वद्भ्रकरुणा: स्वकृतेन नित्यको नाम तत्प्रतिकरोति विनोदपात्रम् ॥
४७॥
यैः--उनके द्वारा; ईहशी--इस प्रकार की; भगवत:-- भगवान् की; गति:--गति; आत्म-वादे--आध्यात्मिक विचार;एकान्ततः --पूर्ण जानकारी में; निगमिभि:--वैदिक साक्ष्यों से; प्रतिपादिता--निश्चित रूप से स्थापित; नः--हमको ; तुष्यन्तु--तुष्ट हों; अद्चअ-- अनन्त; करुणा: --कृपा; स्व-कृतेन--अपने कार्य से; नित्यम्ू--शा श्रत; क: --कौन; नाम--कोई नहीं;तत्--वह; प्रतिकरोति--प्रतिकार या बदला ले सकता है; विना--रहित; उद-पात्रमू--अंजली में पानी देना।
पृथु महाराज ने आगे कहा : जिन व्यक्तियों ने भगवान् के सम्बन्ध में आत्म-साक्षात्कार केपथ को बता कर अपार सेवा की हो और जिनकी व्याख्याएँ पूर्ण विश्वास एवं वैदिक साक्ष्य द्वाराहमारे उत्थान के लिए की जाती हों, भला उनसे उऋण होने के लिए अंजुली-भर जल केअतिरिक्त और क्या अर्पित किया जा सकता है? ऐसे महापुरुषों को उनके ही कार्यों के द्वारासन्तुष्ट किया जा सकता है, जो उनकी अपार कृपावश मानव समाज के बीच में संवितरित हुएहैं।
"
मैत्रेय उवाचत आत्मयोगपतय आदिराजेन पूजिता: ।
शीलं तदीयं शंसन्त: खेभवन्मिषतां नृणाम् ॥
४८ ॥
मैत्रेय: उवाच--महर्षि मैत्रेय ने कहा; ते--वे; आत्म-योग-पतय:--भक्ति द्वारा आत्म-साक्षात्कार के स्वामी; आदि-राजेन--मूलराजा ( पृथु ) द्वारा; पूजिता:--पूजित; शीलम्ू-- आचरण; तदीयम्--राजा का; शंसन्त:--प्रशंसति होकर; खे--आकाश में;अभवनू--प्रकट हुआ; मिषताम्--देखते हुए; नृणाम्--मनुष्यों के |
महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा : महाराज पृथु द्वारा इस प्रकार पूजित होकर भक्ति में प्रवीण येचारों कुमार अत्यन्त गद्गद हुए।
दरअसल वे आकाश में दिखाई पड़े और उन्होंने राजा के शीलकी प्रशंसा की और सभी लोगों ने उनके दर्शन किये।
"
वैन्यस्तु धुर्यो महतां संस्थित्याध्यात्मशिक्षया ।
आप्तकाममिवात्मानं मेन आत्मन्यवस्थित: ॥
४९॥
वैन्य:--वेन महाराज के पुत्र ( पृथु ); तु--निस्सन्देह; धुर्य:--प्रमुख; महताम्--महापुरुषों के; संस्थित्या--पूर्णतया स्थिर होकर;आध्यात्म-शिक्षया--आत्म-साक्षात्कार के विषय में; आप्त--लब्ध; कामम्--इच्छाएँ; इब--सहृश; आत्मानम्-- आत्मतोष में;मेने--विचार किया; आत्मनि-- अपने में; अवस्थित:--स्थित |
महाराज पृथु अपने तत्त्वज्ञान में पूर्ण रूप से स्थित होने के कारण महापुरुषों में प्रमुख थे।
वेआध्यात्मिक ज्ञान में सफलता प्राप्त व्यक्ति की भाँति परम संतुष्ट थे।
"
कर्माणि च यथाकालं यथादेशं यथाबलम् ।
यथोचितं यथावित्तमकरोद्गह्मसात्कृतम् ॥
५०॥
कर्माणि--कार्य-कलाप; च-- भी; यथा-कालमू्--समय तथा परिस्थिति के अनुकूल; यथा-देशम्--स्थान तथा स्थिति केउपयुक्त; यथा-बलम्--अपनी शक्ति के अनुरूप; यथा-उचितम्--जहाँ तक सम्भव हो, यथासम्भव; यथा-वित्तम्--इस सम्बन्धमें जो जितना धन व्यय कर सके; अकरोत्--सम्पन्न किया; ब्रह्म-सात्ू--परम सत्य में; कृतम्--किया
आत्मतुष्ट होने के कारण महाराज पृथु समय, स्थान, शक्ति तथा आर्थिक स्थिति के अनुसारजितनी पूर्णता से सम्भव हो सकता था अपने कर्तव्यों को पूरा करते थे।
इन सारे कार्यों के द्वाराउनका एकमात्र उद्देश्य परम सत्य को प्रसन्न करना था।
इस प्रकार उन्होंने अपने कर्मों का भली-भाँति निर्वाह किया।
"
फलं ब्रह्मणि सन्न्यस्य निर्विषड्र: समाहित: ।
कर्माध्यक्षं च मन्वान आत्मानं प्रकृते: परम् ॥
५१॥
'फलम्--परिणाम, फल; ब्रह्मणि--परम सत्य में; सन्न्यस्थ--त्याग कर, अर्पित करके; निर्विषड्र:--दूषित हुए बिना;समाहितः--पूर्णतया समर्पित; कर्म--कर्म; अध्यक्षम्ू-- अधीक्षक; च--तथा; मन्वान: --सदैव चिन्तन करते हुए; आत्मानम्--परमात्मा के विषय में; प्रकृते:--भौतिक प्रकृति का; परम्--अतीत, परे ।
महाराज पृथु ने अपने आपको प्रकृति से परे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के शाश्वत दास के रूपमें समर्पित कर दिया था।
फलस्वरूप उनके कर्मों के सारे फल भगवान् को समर्पित थे।
वे अपनेआपको सदैव सर्वेश्वर भगवान् के दास के रूप में समझते रहे।
"
गृहेषु वर्तमानोपि स साम्राज्यश्रियान्वितः ।
नासजतेन्द्रियार्थेषु निरहम्मतिरकवत् ॥
५२॥
गृहेषु--घर में; वर्तमान: -- उपस्थित; अपि--यद्यपि; सः--राजा पृथु; साम्राज्य--पूरा राज्य; थ्रिया--ऐश्वर्य; अन्बित:--लीन;न--कभी नहीं; असजत--आकर्षित हुआ; इन्द्रिय-अर्थेषु--इन्द्रियतृप्ति हेतु; निः--न तो; अहम्--मैं हूँ; मतिः--विचार;अर्क--सूर्य; बत्ू--सहृश |
महाराज पृथु, जो अपने सारे साम्राज्य की सम्पत्ति के कारण अत्यन्त ऐश्वर्यवान् थे, घर मेंएक गृहस्थ की भाँति रहते थे।
चूँकि वे अपने ऐश्वर्य का उपयोग अपनी इन्द्रियतृप्ति के हेतु कभीनहीं करना चाहते थे, अतः वे विरक्त बने रहे, जिस प्रकार कि सूर्य सभी परिस्थितियों मेंअप्रभावित रहता है।
"
एवमध्यात्मयोगेन कर्माण्यनुसमाचरन् ।
पुत्रानुत्पादयामास पश्चार्चिष्यात्मसम्मतान् ॥
५३ ॥
एवम्--इस प्रकार; अध्यात्म-योगेन-- भक्तियोग के द्वारा; कर्माणि-- कर्म; अनु--सदैव; समाचरन्--करते हुए; पुत्रान्--पुत्रोंको; उत्पादयाम् आस--उत्पन्न किया; पञ्ञ--पाँच; अर्चिषि-- अपनी पत्नी अर्चि से; आत्म--निजी; सम्मतान्ू--इच्छा केअनुसार।
भक्ति की मुक्त अवस्था में स्थित होकर पृथु महाराज ने न केवल समस्त सकाम कर्मों कोसम्पन्न किया, अपितु अपनी पत्नी अर्चि से पाँच पुत्र भी उत्पन्न किये।
निस्सन्देह, उनके सारे पुत्र उनकी निजी इच्छानुसार उत्पन्न हुए थे।
"
विजिताश्च॑ं धूप्रकेशं हर्यक्ष॑ं द्रविणं वृकम् ।
सर्वेषां लोकपालानां दधारैकः पृथुर्गुणान्ू ॥
५४॥
विजिताश्रम्-विजिताश्व नामक; धूम्रकेशम्--धूप्रकेश नामक; हर्यक्षम्-हर्यक्ष नामक; द्रविणम्--द्रविण नामक; वृकम्--बृक नामक; सर्वेषाम्ू--सभी; लोक-पालानाम्--लोकों के लोकपालों का; दधार--स्वीकार किया; एक:--एक; पृथु:--पृथुमहाराज; गुणान्--समस्त गुणों को
विजिताश्व, धूप्रकेश, हर्यक्ष, द्रविण तथा वृक नामक पाँच पुत्र उत्पन्न करने के बाद भी पृथुमहाराज इस लोक पर राज्य करते रहे।
उन्होंने अन्य समस्त लोकों पर शासन करने वाले देवों के समस्त गुणों को आत्मसात् किया।
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गोपीथाय जगत्सूष्टे: काले स्वे स्वेच्युतात्मक: ।
मनोवाग्वृत्तिभि: सौम्यैर्गुणै: संरज्यन्प्रजा: ॥
५५॥
गोपीथाय--सुरक्षा के लिए; जगत्ू-सूष्टे:--परम स्त्रष्टा का; काले--यथा-समय; स्वे स्वे-- अपने-अपने; अच्युत-आत्मक:--कृष्णभक्त होने से; मन:--मन; वाक्ू--शब्द; वृत्तिभि:--व्यवसाय से; सौम्यै:--अत्यन्त सौम्य, भद्ग; गुणैः--गुण से;संरक्षयन्--प्रसन्न रखते हुए; प्रजा:--नागरिक जन।
चूँकि महाराज पृथु भगवान् के पूर्ण भक्त थे, अतः वे सारे नागरिकों को उनकी अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार प्रसन्न रखते हुए भगवान् की सृष्टि की रक्षा करना चाहते थे।
अतः पृथुमहाराज उन्हें अपनी वाणी, मन, कर्म तथा सौम्य आचरण से सभी प्रकार प्रसन्न रखते थे।
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राजेत्यधान्नामधेयं सोमराज इवापरः ।
सूर्यवद्धिसृजन्गृहन्प्रतपं श्र भुवो बसु ॥
५६॥
राजा--राजा; इति--इस प्रकार; अधात्--ले लिया; नामधेयम्--नामधारी; सोम-राज:--चन्द्रलोक का राजा; इब--सहश;अपरः--दूसरी ओर; सूर्य-वत्--सूर्यदेव के समान; विसृजन्ू--वितरित करते हुए; गृह्न्--खींचते हुए; प्रतपन्--कठोरअनुशासन से; च-- भी; भुव:ः--संसार का; वसु--कर या लगान।
महाराज पृथु चन्द्र के राजा सोमराज के समान विख्यात हो गये।
वे सूर्यदेव के समानशक्तिशाली तथा कर-संग्रहणकर्ता भी थे।
सूर्य ताप तथा प्रकाश बाँटता है, किन्तु साथ हीसमस्त लोकों के जल को खींच लेता है।
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दुर्धर्षस्तेजसेवाग्निर्महेन्द्र इव दुर्जय: ।
तितिक्षया धरित्रीव द्यौरिवाभीष्टदो नृणाम् ॥
५७॥
दुर्धर्ष: --अजेय; तेजसा--तेज से; इब--सद्ृश; अग्नि: --अग्नि; महा-इन्द्र:--स्वर्ग के राजा; इब--के समान; दुर्जय:--अजेय;तितिक्षया--सहिष्णुता द्वारा; धरित्री--पृथ्वी; इब--के सहृश; दयौ:--स्वर्ग लोक के; इब--के सदृश; अभीष्ट-दः--इच्छाओं कोपूरा करने वाले; नृणामू--मानव समाज का ।
महाराज पृथु इतने प्रबल तथा शक्तिमान थे कि उनके आदेशों का उल्लंघन करना मानोअग्नि को जीतना था।
वे इतने बलशाली थे कि उनकी उपमा स्वर्ग के राजा इन्द्र से दी जाती थीजिसकी शक्ति अजेय है।
दूसरी ओर महाराज पृथु पृथ्वी के समान सहिष्णु भी थे और मानवसमाज की विभिन्न इच्छाएँ पूरी करने में वे स्वयं स्वर्ग के समान थे।
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वर्षति सम यथाकामं पर्जन्य इब तर्पयन् ।
समुद्र इव दुर्बोध: सत्त्तेनाचलराडिव ॥
५८॥
वर्षति--बरसते; स्म-- थे; यथा-कामम्--इच्छानुसार; पर्जन्य:--जल; इब--के सहश; तर्पयन्-- प्रसन्न करते हुए; समुद्र: --समुद्र; इब--के सहश; दुर्बोध:--न समझ में आने वाला; सत्त्वेन--सत्तात्मक स्थिति से; अचल--पर्वत; राट् इब--राजा केसमान
जिस प्रकार वर्षा से हर एक की इच्छाएँ पूरी होती हैं उसी तरह महाराज पृथु सबों को तुष्टरखते थे।
वे समुद्र के समान थे, क्योंकि कोई उनकी गहराई ( गम्भीरता ) को नहीं समझ सकताथा और उद्देश्य की हृढ़ता में वे पर्वतराज मेरु के समान थे।
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धर्मराडिव शिक्षायामाश्चर्य हिमवानिव ।
कुवेर इब कोशाढ्य़ो गुप्तार्थो वरुणो यथा ॥
५९॥
धर्म-राट् इब--यमराज ( मृत्यु के अधीक्षक ) के समान; शिक्षायाम्-शिक्षा में; आश्चर्य--ऐश्वर्य में; हिमवान् इब--हिमालयपर्वत के समान; कुवेर:--स्वर्गलोक के कोशपति; इब--सहृश; कोश-आढ्य:--सम्पत्ति के स्वामी होने के मामले में; गुप्त-अर्थ:--छिपाना; वरुण:--वरुण नामक देवता; यथा--जिस प्रकार।
महाराज पृथु की बुद्धि तथा शिक्षा मृत्यु के अधीक्षक यमराज के बिलकुल समान थी।
उनका ऐश्वर्य हिमालय पर्वत से तुलनीय था, जहाँ सभी बहुमूल्य हीरे, जवाहरात तथा धातुएँसंचित हैं।
उनके पास स्वर्ग के कोषाध्यक्ष कुवेर के समान विपुल सम्पत्ति थी।
वरुण देवता केही समान उनके रहस्यों का किसी को पता न था।
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मातरिश्वेव सर्वात्मा बलेन महसौजसा ।
अविषह्मतया देवो भगवान्भूतराडिव ॥
६०॥
मातरिश्वा--वायु; इब--सहश; सर्व-आत्मा--सर्वव्यापी; बलेन--शारीरिक बल से; महसा ओजसा--थैर्य तथा शक्ति से;अविषह्ामतया--असहिष्णुता से; देव:ः--देवता; भगवान्--अत्यन्त शक्तिमान; भूत-राट् इब--रुद्र या सदाशिव की तरह |
महाराज पृथु अपनी शारीरिक बल तथा ऐन्द्रिय शक्ति में वायु के समान बलशाली थे, जोकहीं भी तथा सर्वत्र आ जा सकता है।
अपनी असहाता में वे शिवजी या सदाशिव के अंशसर्वशक्तिमान रुद्र के समान थे।
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कन्दर्प इव सौन्दर्य मनस्वी मृगराडिव ।
वात्सल्ये मनुवन्नृणां प्रभुत्वे भगवानज: ॥
६१॥
कन्दर्प:--कामदेव; इब--सहश; सौन्दर्ये --सुन्दरता में; मनस्वी--विचारशीलता में; मृग-राट् इब--पशुओं के राजा सिंह केसमान; वात्सल्ये--स्नेह में; मनु-वत्--स्वायम्भुव मनु के समान; नृणाम्--मानव समाज का; प्रभुत्वे--आधिपत्य, शासन करनेके मामले में; भगवान्--स्वामी; अज:ः--ब्रह्मा |
वे शारीरिक सुन्दरता में कामदेव के समान तथा विचारशीलता में सिंह के समान थे।
वात्सल्य में वे स्वायंभुव मनु के समान थे और अपनी नियंत्रण-क्षमता में ब्रह्माजी के समान थे।
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बृहस्पति्रहावादे आत्मवत्त्वे स्वयं हरिःभक्त्या गोगुरुविप्रेषु विष्वक्सेनानुवर्तिषु ।
हिया प्रश्रयशीलाभ्यामात्मतुल्य: परोद्ममे ॥
६२॥
बृहस्पति:--स्वर्गलोक के पुरोहित; ब्रह्म-वादे--आध्यात्मिक ज्ञान में; आत्म-वचत्त्वे--आत्म-नियंत्रण के मामले में; स्वयम्--साक्षात्; हरिः--श्रीभगवान्; भक्त्या--भक्ति में; गो--गाय; गुरु--गुरु; विप्रेषु--ब्राह्मणों में; विष्वक्सेन-- भगवान्;अनुवर्तिषु-- अनुयायी; हिया--लज्जा से; प्रश्रय-शीला भ्याम्--अत्यन्त भद्र आचरण से; आत्म-तुल्य:--अपने ही समान आप;'पर-उद्यमे--परोपकारी कार्यों में |
पृथु महाराज के निजी आचरण में समस्त उत्तम गुण प्रकट होते थे।
अपने आत्म-न्ञान में वेठीक बृहस्पति के समान थे।
आत्म-नियंत्रण ( इन्द्रियजय ) में वे साक्षात् भगवान् के समान थे।
जहाँ तक भक्ति का प्रश्न था, वे भक्तों के परम अनुयायी थे।
जो गो-रक्षा के प्रति आसक्त औरगुरु तथा ब्राह्मणों की सारी सेवा करते थे।
वे परम सलज्ज थे और उनका आचरण अत्यन्त भद्रथा।
जब वे किसी परोपकार में लग जाते तो इस प्रकार कार्य करते थे मानो अपने लिए ही कार्यकर रहे हों।
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कीरत्योर्ध्वगीतया पुम्भिस्त्रैलोक्ये तत्र तत्र ह ।
प्रविष्ट: कर्णरन्श्रेषु सत्रीणां राम: सतामिव ॥
६३॥
कीर्त्या--कीर्ति से; ऊर्ध्व-गीतया--उच्च घोषणा द्वारा; पुम्भि:--सामान्य जनता द्वारा; त्रै-लोक्ये--ब्रह्माण्ड भर में; तत्र तत्र--सर्वत्र; ह--निश्चय ही; प्रविष्ट:--प्रवेश करते हुए; कर्ण-रन्श्रेषु--कान के छेदों में; सत्रीणाम्--स्त्रियों के; राम:-- भगवान्रामचन्द्र; सतामू--भक्तों के; इब--सहृश
सारे ब्रह्माण्ड भर में--उच्चतर, निम्नतर तथा मध्य लोकों में--पृथु महाराज की कीर्ति उच्चस्वर से घोषित की जा रही थी।
सभी महिलाओं तथा साधु पुरुषों ने उनकी महिमा को सुना जो भगवान् रामचन्द्र की महिमा के समान मधुर थी।
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