← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची
अध्याय पच्चीसवाँ: राजा पुरंजन के लक्षणों का वर्णन
4.25मैत्रेय उवाचइति सन्दिश्य भगवान्बारहिषदेरभिपूजित: ।
पश्यतां राजपुत्राणां तत्रैवान्तर्दधे हर: ॥
१॥
मैत्रेय: उवाच--महर्षि मैत्रेय ने कहा; इति--इस प्रकार; सन्दिश्य--उपदेश देकर; भगवान्--सर्वशक्तिमान; बार्हिषदै:--राजाबर्दिषत् के पुत्रों द्वारा; अभिपूजित:--पूजा किया जाकर; पश्यताम्--उनके देखते-देखते; राज-पुत्राणाम्--राजा के पुत्रों का;तत्र--वहाँ; एव--निश्चय ही; अन्तर्दधे--अर्न्तधान हो गये; हरः--शिवजी |
महर्षि मैत्रैय ने विदुर से आगे कहा : हे विदुर, शिवजी ने इस प्रकार से राजा बर्हिषत् के पुत्रोंको उपदेश दिया।
राजकुमारों ने भी शिवजी की अगाध भक्ति के साथ तथा श्रद्धापूर्वक पूजाकी।
अन्त में वे राजकुमारों की दृष्टि से ओझल हो गये।
"
रुद्रगीत॑ भगवतः स्तोत्र सर्वे प्रचेतस: ।
जपन्तस्ते तपस्तेपुर्वर्षाणामयुतं जले ॥
२॥
रुद्र-गीतम्--शिवजी द्वारा गाया गया गीत; भगवतः -- भगवान् का; स्तोत्रमू--स्तुति; सर्वे--सभी; प्रचेतस: --प्रचेता नामकराजकुमार; जपन्त:--उच्चारण करते हुए; ते--उन सबों ने; तप:--तपस्या; तेपु:--साधना की; वर्षाणाम्--वर्षो की;अयुतम्--दस हजार; जले--जल के भीतर
सभी प्रचेतागण दस हजार वर्षों तक जल के भीतर खड़े रहकर शिवजी द्वारा दिये गये स्तोत्रका जप करते रहे।
"
प्राचीनबर्दिषं क्षत्त: कर्मस्वासक्तमानसम् ।
नारदोध्यात्मतत्त्वज्ञः कृपालु: प्रत्यवोधयत् ॥
३॥
प्राचीनबर्हिषम्--राजा प्राचीनबर्हिषत् को; क्षत्त:--हे विदुर; कर्मसु--सकाम कर्मों में; आसक्त--रत; मानसमू--चित्त;नारदः--नारदमुनि ने; अध्यात्म--अध्यात्मविद्या; तत्त्व-ज्ञः--विशारद, सत्य का ज्ञाता; कृपालु:--कृपा करके; प्रत्यबोधयत्--उपदेश दिया।
जब राजकुमार जल के भीतर कठिन तपस्या कर रहे थे तो उनके पिता विभिन्न प्रकार केसकाम कर्म सम्पन्न करने में रत थे।
उसी समय समस्त आध्यात्मिक जीवन के ज्ञाता तथा शिक्षकपरम सन्त नारद ने राजा पर अत्यन्त कृपालु होकर उन्हें आध्यात्मिक जीवन के विषय में उपदेशदेने का निश्चय किया।
"
श्रेयस्त्वं कतमद्राजन्कर्मणात्मन ईहसे ।
दुःखहानि: सुखावाप्ति: श्रेयस्तन्नेह चेष्यते ॥
४॥
श्रेय:--चरम अशीर्वाद, वर; त्वमू--तुम; कतमत्--वह क्या है ?; राजन्-हे राजा; कर्मणा--सकाम कार्म द्वारा; आत्मन:--आत्मा का; ईहसे--चाहते हो; दुःख-हानि:--समस्त कष्टों का लोष; सुख-अवाप्ति:--समस्त सुखों की प्राप्ति; श्रेयः--आशीर्वाद; तत्ू--वह; न--कभी नहीं; इह--इस प्रसंग में; च--तथा; इष्यते--प्राप्य है |
नारद मुनि ने राजा प्राचीनबर्हिषत् से पूछा: हे राजनू, तुम इन सकाम कर्मो के द्वारा कौन सीइच्छा पूरी करना चाहते हो ? जीवन का मुख्य उद्देश्य तो समस्त कष्टों से छुटकारा पाना तथा सुखभोगना है, किन्तु इन दोनों को सकाम कर्म द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता।
"
राजोबाचन जानामि महाभाग परं कर्मापविद्धधी: ।
ब्रृहि मे विमल॑ ज्ञानं येन मुच्येय कर्मभि; ॥
५॥
राजा उवाच--राजा ने उत्तर दिया; न--नहीं; जानामि--जानता हूँ; महा-भाग--हे महापुरुष; परम्--दिव्य; कर्म--कर्मों केद्वारा; अपविद्ध--बींधी जाकर; धीः--मेरी बुद्धि; बरूहि--कृपया बताइये; मे--मुझको; विमलम्--विशुद्ध; ज्ञाममू--ज्ञान;येन--जिससे; मुच्येय--मैं छुटकारा पा सकूँ; कर्मभि: --कर्मो से
राजा ने उत्तर दिया: हे महात्मन् नारद, मेरी बुद्धि सकाम कर्मो में उलझी हुई है, अतः मुझेअपने जीवन के चरम लक्ष्य का ज्ञान नहीं रह गया है।
कृपा करके मुझे विशुद्ध ज्ञान प्रदानकीजिये जिससे मैं सकाम कर्मो के बन्धन से छुटकारा पा सकूँ।
"
गृहेषु कूटधर्मेषु पुत्रदारधनार्थधी: ।
न परं विन्दते मूढो भ्राम्यन्संसारवर्त्मसु ॥
६॥
गृहेषु--गृहस्थ जीवन में; कूट-धर्मेषु--छद्गा धर्म में; पुत्र--पुत्र; दार--स्त्री; धन--सम्पत्ति; अर्थ--जीवन लक्ष्य पुरुषार्थ;धी:--मानने वाला; न--नहीं; परमू--परम; विन्दते--प्राप्त करता है; मूढः--दुष्ट; भ्राम्यन्ू--घूमता हुआ; संसार--संसार के;वर्त्मसु--रास्तों पर।
जो तथाकथित सुन्दर जीवन अर्थात् सन्तान तथा स्त्री में फंस कर गृहस्थ के रूप में रहने तथासम्पत्ति के पीछे लगे रहने में ही रुचि रखते हैं, वे इन्हीं वस्तुओं को जीवन का चरम लक्ष्य मानबैठते हैं।
ऐसे लोग जीवन का चरम लक्ष्य प्राप्त किये बिना इस संसार में ही विभिन्न देहों में घूमतेरहते हैं।
"
नारद उवाचभो भो: प्रजापते राजन्पशून्पश्य त्वयाध्वरे ।
संज्ञापिताझ्जीवसज्जञन्निर्धणेन सहस्त्रश: ॥
७॥
नारद: उबाच--नारद मुनि ने उत्तर दिया; भो: भोः--हे, अरे; प्रजा-पते--हे प्रजा के शासक; राजन्--हे राजा; पशून्--पशुओंको; पश्य--देखो; त्वया--तुम्हारे द्वारा; अध्वरे--यज्ञ में; संज्ञापितान्ू--मारे गये; जीव-सझ्ञन्ू--पशु समूह; निर्घुणेन--निर्दयतापूर्वक; सहस्त्रश:--हजारों |
नारद मुनि ने कहा : हे प्रजापति, हे राजन, तुमने यज्ञस्थल में जिन पशुओं का निर्दयतापूर्वकवध किया है, उन्हें आकाश में देखो।
"
एते त्वां सम्प्रतीक्षन्ते स्मरन््तो वैशरस तव ।
सम्परेतमयःकूटैए्हिन्दन्त्युत्थितमन्यव: ॥
८ ॥
एते--ये सब; त्वाम्--तुम्हारी; सम्प्रतीक्षन्ते--प्रती क्षा कर रहे हैं; स्मरन््तः--स्मरण करते हुए; वैशसम्--पीड़ा; तब--तुम्हारी;सम्परेतम््--मृत्यु के पश्चात्; अयः--लोहे के; कूटैः--सींगों से; छिन्दन्ति--छेदेंगे; उत्थित--जागृत; मन्यवः--क्रोध ।
ये सारे पशु तुम्हारे मरने की प्रतीक्षा कर रहे हैं जिससे वे उन पर किये गये आघातों काबदला ले सकें तुम्हारी मृत्यु के बाद वे अत्यन्त क्रोधपूर्वक तुम्हारे शरीर को लोहे के अपने सींगोंसे बेध डालेंगे।
"
अत्र ते कथयिष्येमुमितिहासं पुरातनम् ।
पुरझ्ञषनस्यथ चरितं निबोध गदतो मम ॥
९॥
अतन्न--यहाँ पर; ते--तुमसे; कथयिष्ये--कहूँगा; अमुम्--इस प्रसंग में; इतिहासम्--इतिहास; पुरातनम्ू--अत्यन्त प्राचीन;पुरझनस्य--पुरझ्न के विषय में; चरितमू--उसका चरित्र, आख्यान; निबोध--समझने का यत्न करो; गदतः मम--मैं सुना रहाहूँ
इस सम्बन्ध में मैं एक प्राचीन इतिहास सुनाना चाहता हूँ जो पुरञ्नन नामक राजा के चरित सेसम्बन्धित है।
इसे ध्यानपूर्वक सुनो।
"
आसीत्पुरञ्जनो नाम राजा राजन्बृहच्छुवा: ।
तस्थाविज्ञातनामासीत्सखाविज्ञातचेष्टित: ॥
१०॥
आसीतू-- था; पुरञ्न:--पुरञझ्ञन; नाम--नामक; राजा--राजा; राजन्--हे राजा; बृहत्- श्रवा:--यशस्वी, जिसके कार्य महान्थे; तस्य--उसका; अविज्ञात--अविज्ञात, ज्ञात न होना; नामा--नामक; आसीतू-- था; सखा--मित्र; अविज्ञात--अज्ञात;चेष्टित:--जिसके कर्म |
हे राजन, प्राचीन काल में पुरुज्ञन नामक एक राजा था, जो अपने महान् कार्यों के लिएविख्यात था।
उसके एक मित्र था जिसका नाम अविज्ञात ( अज्ञात ) था।
अविज्ञात के कार्यों कोकोई भी नहीं समझ सकता था।
"
सो<न्वेषमाण: शरणं बश्चाम पृथिवीं प्रभु: ।
नानुरूप॑ यदाविन्ददभूत्स विमना इब ॥
११॥
सः--वह राजा पुरज्जन; अन्वेषमाण: --खोजता हुआ; शरणम्--आश्रय; बश्राम--घूमा; पृथिवीम्--सम्पूर्ण पृथ्वीलोक पर;प्रभुः--स्वतंत्र स्वामी बनने के लिए; न--कभी नहीं; अनुरूपम्--इच्छानुकूल, उपयुक्त; यदा--जब; अविन्दत्--पा सका;अभूत्--हुआ; सः--वह; विमना:--खितन्न; इब--सहृश
राजा पुरक्षन अपने रहने के लिए उपयुक्त स्थान खोजने लगा और इस तरह वह सारा संसारघूम आया।
फिर भी कड़ी दौड़-धूप के बाद भी उसे अपनी इच्छा के अनुकूल कोई स्थान नहींमिला।
अन्त में वह अत्यन्त खितन्न और निराश हो उठा।
"
न साधु मेने ता: सर्वा भूतले यावतीः पुरः ।
कामान्कामयमानोसौ तस्य तस्योपपत्तये ॥
१२॥
न--कभी नहीं; साधु--अच्छा; मेने--सोचा था; ता:--उनको; सर्वा:--सब; भू-तले--इस पृथ्वी पर; यावती:ः --सभी प्रकारके; पुरः--आवास स्थान; कामान्--इन्द्रियभोग के साधन; कामयमान:--इच्छा करते हुए; असौ--वह राजा; तस्य--उसका;तस्य--उसका; उपपत्तये--प्राप्त करने के लिए
राजा पुरञ्जन की इन्द्रियभोग की लालसाएँ असीम थीं, अतः वह सारे संसार में ऐसा स्थान खोजने के लिए भ्रमण करता रहा जहाँ उसकी इच्छाएँ पूरी हो सकें।
किन्तु हाय! उसे सर्वत्रअभाव की अनुभूति ही प्रतीत हुई।
"
स एकदा हिमवतो दक्षिणेष्वथ सानुषु ।
ददर्श नवभिर्द्वार्भि: पुरं लक्षितलक्षणाम् ॥
१३॥
सः--उस राजा पुरज्ञन ने; एकदा--एक बार; हिमबतः--हिमालय पर्वत के; दक्षिणेषु--दक्षिणी; अथ--तत्पश्चात्; सानुषु--शिखरों पर; दरदर्श--देखा; नवभि:--नौ; द्वार्भि:--द्वारों से युक्त; पुरमू--नगर; लक्षित--हृश्य; लक्षणाम्--सुलक्षणों वाला।
एक बार, इस प्रकार से विचरण करते हुए, उसने हिमालय पर्वत के दक्षिण में, भारतवर्षनामक देश में एक नगर देखा जिसमें चारों ओर नौ दरवाजे थे और जो समस्त सुलक्षणों से युक्तथा।
"
प्राकारोपवनाटालपरिखैरक्षतोरणै: ।
स्वर्णरैष्यायसै: श्रृद्वैः स्डु लां सर्वतो गृहै: ॥
१४॥
प्राकार--दीवालें; उपवन--उद्यान; अट्टाल--अटारियाँ, मीनारें; परिखै:--खाइयों से; अक्ष--खिड़कियों; तोरणै:--द्वारों से;स्वर्ण--सोना; रौप्य--चाँदी; अयसै:--लोहे से निर्मित; श्रृज्ैः--कंगूरों या शिखरों से; सड्डु लाम्--खचाखच भरा हुआ;सर्वतः--चारों ओर; गृहैः--घरों से |
वह नगर चारों ओर दीवालों तथा उद्यानों से घिरा था और उसके भीतर मीनारें, नहरें,खिड़कियाँ तथा झरोखे थे।
वहाँ के घर सोने, चाँदी तथा लोहे के बने गुम्बदों से अलंकृत थे।
"
नीलस्फटिकवैदूर्यमुक्तामरकतारुणै: ।
क्रिप्तहर्म्यस्थलीं दीप्तां अया भोगवतीमिव ॥
१५॥
नील--नीलम; स्फटिक--स्फटिक; बैदूर्य--हीरे; मुक्ता--मोती; मरकत--पन्ना; अरुणैः--लालों से; क्रिप्त--सजा हुआ;हर्म्य-स्थलीम्--राजमहल की फर्शें; दीप्ताम्-दीप्ति युक्त; अ्रिया--सौंदर्य से; भोगवतीम्-- भोगवती नामक स्वर्ग की नगरी;इब--सहश।
उस नगर के घरों की फर्श नीलम, स्फटिक, हीरे, मोती, पन्ना तथा लाल से निर्मित थीं।
घरोंकी कान्ति के कारण यह नगर भोगवती नामक स्वर्गीय नगरी के समान लग रहा था।
"
सभाचत्वररथ्याभिराक्रीडायतनापणै: ।
चैत्यध्वजपताकाभिरयुक्तां विद्ुमवेदिभि: ॥
१६॥
सभा--सभा भवन; चत्वर--चौराहे; रथ्याभि:--सड़कों से; आक्रीड-आयतन---द्यूतक्री ड़ा स्थल; आपणै:--दूकानों से;चैत्य--विहार स्थल; ध्वज-पताकाभि:--ध्वज तथा पताकाओं से; युक्ताम्--सुसज्जित; विद्रुम--वृक्षरहित; वेदिभि:--चबूतरोंसे
उस नगर में अनेक सभाभवन, चौराहे, सड़कें, खान-पान-गृह, द्यूतक्रीड़ा-स्थल, बाजार,विश्रामालय, झंडियाँ, पताकाएँ तथा सुन्दर उद्यान थे।
वह नगर इन सबसे घिरा था।
"
पुर्यास्तु बाह्योपवने दिव्यद्रुमलताकुले ।
नदद्विहड्रालिकुलकोलाहलजलाशये ॥
१७॥
पुर्या:--नगर के; तु--तब; बाह्य-उपवने--बाहरी उद्यान में; दिव्य--अत्यन्त सुन्दर; द्रम--वृक्ष; लता--बेलों; आकुले--सेपूरित; नदत्ू-शब्द करते हुए; विहड्ग-- पक्षी; अलि-- भौंरा; कुल--समूह; कोलाहल--गुंजार; जल-आशये--सरोवर में |
उस नगर के बाहर एक सुन्दर सरोवर के चारों ओर अनेक सुन्दर वृक्ष तथा लताएँ थीं।
उससरोवर में पक्षियों तथा भौंरों के झुंड के झुंड थे, जो सदैव कूजते तथा गुंजार करते थे।
"
हिमनिर्झरविप्रुष्मत्कुसुमाकरवायुना ।
अलत्प्रवालविटपनलिनीतटसम्पदि ॥
१८॥
हिम-निर्झर--हिमाच्छादित पर्वत प्रपातों से; विप्रुटू-मत्--जलकणों को ले जाकर; कुसुम-आकर--वासन्ती; वायुना--वायुसे; चलत्--हिलते हुए; प्रवाल--शाखाएँ; विटप--वृक्ष; नलिनी-तट--कमलिनी से भरे सरोवर के तट पर; सम्पदि--ऐश्वर्यवान
सरोवर के तट पर खड़े हुए वृक्षों की शाखाएँ उन जलकणों को ग्रहण कर रही थीं जोहिमाच्छादित पर्वत से गिरने वाले झरनों से वासन्ती वाय द्वारा ले जाये जा रहे थे।
"
नानारण्यमृगब्रातैरनाबाधे मुनित्रतैः ।
आहूतं मन्यते पान्थो यत्र कोकिलकूजितैः ॥
१९॥
नाना--विभिन्न; अरण्य--वन; मृग--पशु; ब्रातैः--समूहों से; अनाबाधे-- अहिंसा के मामले में; मुनि-ब्रतैः--मुनियों के तुल्य;आहूतम्--मानो बुलाये जा रहे हों; मन्यते--सोचता है; पान्थ:--यात्री, पथिक; यत्र--जहाँ; कोकिल--कोयल के; कूजितै: --कू-कू करने से
ऐसे वातावरण में वन के पशु भी मुनियों के समान ही अहिंसक एवं ईर्ष्याहीन हो गये थे,अतः वे किसी पर आक्रमण नहीं करते थे।
यही नहीं, सर्वत्र कोयलें कूज रही थीं।
उस रास्ते सेनिकलने वाले किसी भी पथधिक को मानो उस सुन्दर उद्यान में विश्राम करने का निमंत्रण दियाजा रहा हो।
"
यहच्छयागतां तत्र ददर्श प्रमदोत्तमाम् ।
भृत्यर्दशभिरायान्तीमेकेकशतनायकै : ॥
२०॥
यहच्छया-- अचानक, बिना किसी प्रयोजन के; आगताम्--आयी हुई; तत्र--वहाँ; ददर्श--देखा; प्रमदा--एक स्त्री;उत्तमाम्--अत्यन्त सुन्दरी; भृत्यैः--सेवकों से घिरी; दशभि:--दस; आयान्तीम्--आगे आती हुई; एक-एक-- प्रत्येक; शत--सौ; नायकै:--मुखिया, पति के साथ।
उस अद्भुत उद्यान में विचरण करते हुए राजा पुरञझ्नन ने अचानक एक सुन्दर स्त्री देखी जोअनायास ही चली आ रही थी।
उसके साथ दस नौकर थे और प्रत्येक नौकर के साथ सैकड़ोंपत्लियाँ थीं।
"
पञ्जञशीर्षाहिना गुप्तां प्रतीहारेण सर्वतः ।
अन्वेषमाणामृषभमप्रौढां कामरूपिणीम् ॥
२१॥
पश्च--पाँच; शीर्ष--सिर; अहिना---सर्प द्वारा; गुप्तामू--रक्षित; प्रतीहोरेण--अंगरक्षक द्वारा; सर्वतः--चारों ओर;अन्वेषमाणाम्--खोज करती हुईं; ऋषभम्--पति; अप्रौढाम्-- भोली-भाली, किशोरी; काम-रूपिणीम्-- अत्यन्त आकर्षक |
वह स्त्री पाँच फनों वाले एक सर्प द्वारा चारों ओर से रक्षित थी।
वह अत्यन्त सुन्दरी तथातरुणी थी और उपयुक्त पति खोजने के लिए अत्यधिक उत्सुक प्रतीत हो रही थी।
"
सुनासां सुदतीं बालां सुकपोलां वराननाम् ।
समविन्यस्तकर्णाभ्यां बिश्रतीं कुण्डलश्रियम् ॥
२२॥
सु-नासाम्--अत्यन्त सुन्दर नाक; सु-दतीम्--अत्यन्त सुन्दर दाँत; बालामू--तरुणी; सु-कपोलाम्--सुन्दर मस्तक; बर-आननाम्--सुन्दर मुख; सम--समान रूप से; विन्यस्त--व्यवस्थित; कर्णाभ्याम्-दोनों कान; बिभ्रतीम्--चमचमाते हुए;कुण्डल-भ्रियम्--सुन्दर कुण्डलों ( बालियों ) वाली |
उस स्त्री के नाक, दाँत तथा मस्तक सभी अतीव सुन्दर थे।
उसके कान भी समान रूप सेसुन्दर थे और चमचमाते कुण्डलों से सुशोभित थे।
"
पिशड्रनीवीं सुश्रोणी शयामां कनकमेखलाम् ।
पदभ्यां क्वणद्भ्यां चलन्तीं नूप्रैर्देवतामिव ॥
२३॥
पिशड़र--पीला; नीवीम्--वस्त्र; सु-ओणीम्--सुन्दर कमर; श्यामाम्-श्याम रंग की; कनक--सुनहली; मेखलाम्--करधनी;पद्भ्याम्-पाँवों से; क्वणद्भ्यामू-शब्द करती हुए; चलन्तीम्--चलते हुए; नूपुरैः--नूपुरों से; देवताम्--स्वर्ग का वासी;इब--सहश।
उस स्त्री की कमर तथा नितम्ब अत्यन्त सुन्दर थे।
वह पीली साड़ी और सुनहरी करधनी पहनेथी।
चलते समय उसके नूपुर खनक रहे थे।
वह ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो स्वर्ग की निवासिनीहो।
"
स्तनौ व्यज्चितकैशोरी समवृत्तौ निरन्तरौ ।
वस्त्रान्तेन निगूहन्ती त्रीडया गजगामिनीम् ॥
२४॥
स्तनौ--दो उरोजों; व्यज्ञित--सूचित करने वाले; कैशोरौ--किशोरावस्था; सम-वृत्तौ--समान गोलाकार; निरन्तरौ--सटे हुए,अत्यन्त निकट स्थित; वस्त्र-अन्तेन--साड़ी के आँचल से; निगूहन्तीमू--ढकने का प्रयास करती हुई; ब्रीडया--लज्जावश; गज-गामिनीमू--हाथी के समान चलने वाली
स्त्री अपनी साड़ी के अज्जल से अपने समवर्तुल एवं सटे हुए स्तनों को ढकने का प्रयास कररही थी।
वह हाथी के समान चलती हुई लज्जावश अपने स्तनों को बारम्बार ढकने का प्रयासकर रही थी।
"
तामाह ललितं वीर: सत्रीडस्मितशो भनाम् ।
स्निग्धेनापाडुपुड्डेन स्पृष्ट: प्रेमोद्भ्रमद्भ्रुवा ॥
२५॥
तामू--उसको; आह--सम्बोधित किया; ललितम्--अत्यन्त धीमे से; वीर:--वीर ने; स-ब्रीड--लज्जा से युक्त; स्मित-- हँसतेहुए; शोभनाम्-- अत्यन्त सुन्दर; स्निग्धेन--काम वासना से; अपाड़-पुद्डेन--चितवन के तीर से; स्पृष्ट:--इस प्रकार बिंधा हुआ;प्रेम-उद्भ्रमत्ू-प्रेम उत्पन्न करने वाली; भ्रुवा--भौंहों से ।
वीर पुरझ्षन उस सुन्दर रमणी की भौंहो तथा मुख की मुसकान से अत्यधिक आकृष्ट हुआऔर उसके कामवासना रूपी तीरों से तुरन्त बिंध गया।
जब वह लजाती हुई हँसी तो पुरझन कोऔर भी सुन्दर लगी, अतः वीर होते हुए भी वह उसको सम्बोधित करने से अपने को रोक नसका।
"
का त्वं कञ्लअपलाशाक्षि कस्यासीह कुतः सति ।
इमामुप पुरी भीरु कि चिकीर्षसि शंस मे ॥
२६॥
का--कौन; त्वमू--तुम; कल्अ-पलाश--कमल की पंखड़ियों के समान; अक्षि-- आँखें; कस्य--किसकी; असि--हो; इह--यहाँ; कुतः--कहाँ से; सति--हे साध्वी; इमामू--यह; उप--निकट; पुरीमू--नगर; भीरू--हे डरपोक; किम्-- क्या;चिकीर्षसि--करना चाहती हो; शंस--कृपा करके बताओ; मे--मुझे |
है कमलनयनी, कृपा करके मुझे बताओ कि तुम कहाँ से आ रही हो, तुम कौन हो और तुमकिसकी पुत्री हो? तुम अत्यन्त साध्वी लगती हो।
यहाँ आने का तुम्हारा क्या प्रजोजन है? तुमक्या करना चाह रही हो ? कृपया ये सारी बातें मुझसे कहो।
"
क एतेनुपथा ये त एकादश महाभटा: ।
एता वा ललना:ः सुथ्रु कोयं तेडहिः पुरः:सर: ॥
२७॥
के--कौन; एते--ये सब; अनुपथा: -- अनुचर; ये-- जो; ते--तुम्हारे; एकादश--ग्यारह; महा- भटा: --अ त्यन्त शूरवीर अंगरक्षक; एता:--ये सब; वा-- भी; ललना: --स्त्रियाँ; सु-भ्रु--हे सुलोचनी; कः--कौन; अयम्--यह; ते--तुम्हारा; अहिः--सर्प; पुरः--सामने; सर:--चलने वाला
हे कमलनयनी, तुम्हारे साथ के ग्यारह बलिष्ट अंगरक्षक और ये दस विशिष्ट सेवक कौन हैं ?इन दस सेवकों के पीछे-पीछे ये स्त्रियाँ कौन हैं तथा तुम्हिरे आगे-आगे चलने वाला यह सर्प कौन है?"
त्वं हीर्भवान्यस्यथ वाग्रमा पतिंविचिन्वती किं मुनिवद्रहो वने ।
त्वदड्पप्रिकामाप्तसमस्तकामंक्व पद्यकोश: पतितः कराग्रातू ॥
२८॥
त्वमू--तुम; ही:--लज्जा; भवानी--शिव की पत्नी; असि--हो; अथ--कि; वाक्--सरस्वती, विद्या की देवी; रमा--लक्ष्मी;पतिम्ू--पति के; विचिन्वती--विचार में मग्न, खोज में रत; किम्--क्या तुम हो; मुनि-वत्--मुनि के समान; रह: --एकान्तस्थान में; वने--वन में; त्वत्ू-अड्प्रि--तुम्हारे पाँव; काम--इच्छुक; आप्त--प्राप्त; समस्त--सभी; कामम्--इच्छित वस्तुएँ;क्व--कहाँ हैं; पद्मय-कोश:--कमल पुष्प; पतित:--गिरा हुआ; कर--हाथ के; अग्रातू--अग्रभाग या हथेली से।
हे सुन्दर बाला, तुम साक्षात् लक्ष्मी या भगवान् शिव की पत्नी भवानी अथवा ब्रह्मा की पत्नीअर्थात् विद्या की देवी सरस्वती के समान हो।
यद्यपि तुम अवश्यमेव इनमें से एक हो, किन्तु मैंतुम्हें इस वन में अकेले विचरण करती देख रहा हूँ।
निस्सन्देह, तुम मुनियों की भाँति मौन हो।
ऐसा तो नहीं है कि तुम अपने पति को खोज रही हो ? चाहे तुम्हारा पति जो कोई भी हो, किन्तुजिस तन्मयता से तुम उसे खोज रही हो यह देखकर उसे सारे ऐश्वर्य प्राप्त हो जाएँगे।
मैं सोचता हूँ कि तुम लक्ष्मी हो, किन्तु तुम्हारे हाथ में कमल पुष्प नहीं है, अतः मैं पूछ रहा हूँ कि तुमने उसेकहाँ फेंक दिया ?"
नासां वरोर्वन्यतमा भुविस्पृक्पुरीमिमां वीरवरेण साकम् ।
अ्हस्यलड्ड्तुमदभ्रकर्मणालोकं परं श्रीरिव यज्ञपुंसा ॥
२९॥
न--नहीं; आसाम्--इनके ; वरोरु --हे सुभगे; अन्य-तमा--कोई भी; भुवि-स्पृक्--प्ृथ्वी को छूते हुए; पुरीम्ू--नगरी;इमाम्--यह; वीर-वरेण--महान् वीर; साकम्--सहित; अर्हसि--पात्र हो; अलड्डर्तुमू--अलंकृत करने के लिए; अदभ्न--यशस्वी; कर्मणा--कार्यो से; लोकम्--संसार; परमू--दिव्य; श्री:--लक्ष्मी; इब--सहश; यज्ञ-पुंसा--समस्त यज्ञों के भोक्तासहित
हे परम सौभाग्यशालिनी, ऐसा लगता है कि मैंने जिन स्त्रियों के नाम गिनाये हैं उनमें से तुमकोई नहीं हो, क्योंकि मैं देख रहा हूँ कि तुम्हारे पाँव पृथ्वी का स्पर्श कर रहे हैं।
किन्तु यदि तुमइस लोक की कोई सुन्दरी हो, तो जिस प्रकार लक्ष्मी जी विष्णु के साथ वैकुण्ठहलोक कीश्रीवृद्धि करती हैं, उसी प्रकार तुम भी मेरे साथ संगति करके इस नगरी की सुन्दरता बढ़ाओ।
तुम्हें ज्ञात हो कि मैं महान् वीर हूँ और इस लोक का अत्यन्त पराक्रमी राजा हूँ।
"
यदेष मापाड्भविखण्डितेन्द्रियंसब्रीडभावस्मितविभ्रमद्भ्रुवा ।
त्वयोपसूष्ठटो भगवान्मनोभव:प्रबाधतेथानुगृहाण शोभने ॥
३०॥
यत्--क्योंकि; एषघ:--यह; मा--मुझको; अपाड्ु--तुम्हारी चितवन ने; विखण्डित--विचलित; इन्द्रियमू--जिसकी इन्द्रियाँअथवा मन; स-ब्रीड--लज्जायुत; भाव--प्यार; स्मित--हँसती हुईं; विभ्रमत्ू--मोहने वाली; भ्रुवा--भौंहों वाली; त्वया--तुम्हारेद्वारा; उपसूष्ट:--प्रभावित होकर; भगवान्--अत्यन्त शक्तिमान; मन:-भव:--कामदेव; प्रबाधते--पीड़ित कर रहा है; अथ--अतः; अनुगृहाण--कृपा करो; शोभने--हे सुन्दरी |
सचमुच तुम्हारी चितवन ने आज मेरे मन को अत्यन्त विचलित कर दिया है।
तुम्हारी मुस्कानलज्ायुक्त होकर भी अत्यन्त कामयुक्त होने के कारण मेरे अन्तर में परम शक्तिशाली कामदेवको जाग्रत कर रही है।
अतः हे सुन्दरी, मैं तुमसे कृपा की याचना करता हूँ।
"
त्वदाननं सुभ्रु सुतारलोचनंव्यालम्बिनीलालकवृन्दसंवृतम् ।
उन्नीय मे दर्शय वल्गुवाचर्कयद्त्रीडया नाभिमुखं शुच्चिस्मिते ॥
३१॥
त्वत्--तुम्हारा; आननम्ू--मुख; सु-भ्रु--सुन्दर भौंहों वाली; सु-तार--सुन्दर पुतलियों वाली; लोचनम्--आँखें; व्यालम्बि--छितरे हुए; नील--नीले रंग के; अलक-वृन्द--केश राशि; संवृतम्--घिरे हुए; उन्नीय--ऊपर उठाकर; मे--मुझको; दर्शय--दिखाओ; वल्गु-वाचकम्--सुनने में मधुर शब्दों वाली; यत्--जो; ब्रीडया--लज्जा से; न--नहीं; अभिमुखम्--समक्ष, आमने-सामने; शुचि-स्मिते--हे सुन्दर हँसी वाली स्त्री, सुहासिनी।
हे सुन्दरी, सुन्दर भौंहों तथा आँखों से युक्त तुम्हारा मुख अत्यन्त सुन्दर है, जिस पर नीलेकेश बिखरे हुए हैं।
साथ ही तुम्हारे मुख से मधुर ध्वनि निकल रही है।
फिर भी तुम लज्जा सेइतनी आवृत हो कि मेरी ओर देख नहीं पा रही।
अतः हे सुन्दरी, मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कितुम हँसो और अपना सिर उठाकर मुझे देखो तो।
"
नारद उबाचइत्थं पुरझ्ननं नारी याचमानमधीरवत् ।
अभ्यनन्दत तं वीरं हसन्ती वीर मोहिता ॥
३२॥
नारदः उवाच--नारद मुनि ने कहा; इत्थम्--इसके पश्चात्; पुरक्षमम्-पुरक्षन को; नारी--स्त्री; याचमानम्--याचना करते हुए;अधीर-वत्--अत्यन्त अधीर होकर; अभ्यनन्दत--उसने सम्बोधित किया; तम्--उस; वीरम्--वीर को; हसन्ती--हँसते हुए;वीर--हे वीर; मोहिता--उससे आकृष्ट होकर।
नारद ने आगे कहा : हे राजन, जब राजा उस सुन्दरी का स्पर्श करने तथा उसका भोग करनेके लिए अत्यधिक मोहित एवं अधीर हो उठा तो वह बाला भी उसके शब्दों से आकृष्ट हुई औरउसने हँसते हुए उसकी याचना स्वीकार कर ली।
इस समय तक वह राजा के प्रति निश्चय हीआकृष्ट हो चुकी थी।
न विदाम वयं सम्यक्र्तारें पुरुषर्षभ ।
"
आत्मनश्च परस्यापि गोत्र नाम च यत्कृतम् ॥
३३॥
न--नहीं; विदाम--जानती हूँ; वयम्--मैं ( हम ); सम्यक्--भली-भाँति; कर्तारम्--पैदा करने वाले को; पुरुष-ऋषभ--हेमनुष्यों में श्रेष्ठ; आत्मन:ः--अपना; च--तथा; परस्य--औरों का; अपि--भी; गोत्रम्--गोत्र, वंश का इतिहास; नाम--नाम;च--तथा; यत्-कृतम्--कौन किसके द्वारा बनाया गया है।
उस युवती ने कहा : हे मनुष्यश्रेष्ठ, मैं नहीं जानती कि मुझे किसने उत्पन्न किया है? मैं तुम्हेंयह ठीक-ठीक नहीं बता सकती।
न ही मैं अपने या दूसरों के गोत्र के नामों को जानती हूँ।
"
इहाद्य सन््तमात्मानं विदाम न ततः परम् ।
येनेयं निर्मिता वीर पुरी शरणमात्मन: ॥
३४॥
इह--यहाँ; अद्य--आज; सन्तम्ू--विद्यमान; आत्मानम्--जीवात्माएँ; विदाम--इतना ही जानते हैं; न--नहीं; ततः परम्--इसके आगे; येन--जिससे; इयम्ू--यह; निर्मिता--उत्पन्न की गईं; वीर--हे वीर; पुरी--नगरी; शरणम्--विश्रामस्थल;आत्मन:--समस्त जीवों का।
है वीर, हम इतना ही जानते हैं कि हम इस स्थान में हैं।
हम यह नहीं जानते कि आगे कयाहोगा।
दरअसल, हम इतने मूर्ख हैं कि यह भी जानने का प्रयत्न नहीं करते कि हमारे रहने केलिए किसने इतना सुन्दर स्थान बनाया है?"
एते सखायः सख्यो मे नरा नार्यश्व मानद ।
सुप्तायां मयि जागर्ति नागोयं पालयन्पुरीम् ॥
३५॥
एते--ये सब; सखाय:--पुरुष मित्र; सख्य:--स्त्री संगीजन; मे--मेरे; नरा:--मनुष्य; नार्य:--स्त्रियाँ; च--तथा; मान-द--हेअत्यन्त सम्माननीय; सुप्तायाम्--सोते हुए; मयि--मैं हूँ; जागर्ति--जगता रहता है; नाग: --सर्प; अयम्--यह; पालयन्--रक्षाकरते हुए; पुरीम--इस नगरी की।
हे भद्र पुरुष, ये सारे पुरुष तथा स्त्रियाँ जो मेरे साथ हैं, मेरे मित्र हैं और यह साँप सदैवजागता रहता है तथा मेरे सोते समय भी इस पुरी की रक्षा करता है।
मैं इतना ही जानती हूँ, इसकेआगे कुछ भी नहीं जानती।
"
दिष्ट्यागतोउसि भद्र ते ग्राम्यान्कामानभीप्ससे ।
उद्दहिष्यामि तांस्तेहं स्वबन्धुभिररिन्दम ॥
३६॥
दिष्टयया--मेरे सौभाग्य से; आगतः असि--यहाँ आये हो; भद्रमू--कल्याण हो; ते--तुम्हारा; ग्राम्घान्--विषय भोग की;कामान्--इच्छित वस्तुएँ; अभीप्ससे-- भोग करना चाहते हो; उद्दहिष्यामि-- पूरा करूँगी; तानू--उन सबको; ते--तुमको;अहमू--ैं; स्व-बन्धुभि:--अपने समस्त मित्रों सहित; अरिम्-दम--हे शत्रु संहारक ।
हे शत्रुसंहारक, तुम किसी न किसी तरह यहाँ पर आये, यह मेरे लिए अत्यन्त सौभाग्य कीबात है।
तुम्हारा कल्याण हो।
तुम्हें अपनी इन्द्रियों को सन्तुष्ट करने की उत्कष्ठा है, अतः मैं तथामेरे सभी मित्र तुम्हारी इच्छाओं को पूरा करने का भरसक प्रयास करेंगे।
"
इमां त्वमधितिष्ठस्व पुरीं नवमुखीं विभो ।
मयोपनीतान्गृह्ानः कामभोगान्शतं समा: ॥
३७॥
इमाम्--इस; त्वम्-तुम; अधितिष्ठस्व--जरा ठहरो; पुरीम्--नगरी में; नव-मुखीम्--नौ द्वारों वाली; विभो--मेरे स्वामी;मया--मेरे द्वारा; उपनीतान्ू--व्यवस्थित; गृह्ान:--ग्रहण करते हुए; काम-भोगान्--इन्द्रियतृप्ति के लिए वस्तुएँ; शतम्--सौ;समा:--वर्ष |
हे स्वामी, मैंने तुम्हारे लिए ही इस नौ द्वारों वाली नगरी की व्यवस्था की है, जिससे सभीप्रकार से तुम्हारी इन्द्रिय-तुष्टि हो सके।
तुम यहाँ सौ वर्षो तक रह सकते हो और तुम्हें भोग कीसारी सामग्री प्रदान की जायेगी।
"
क॑ नु त्वदन्यं रमये हारतिज्ञमकोविदम् ।
असम्परायाभिमुखम श्रस्तनविदं पशुम् ॥
३८ ॥
कं--किससे; नु--तब; त्वत्--तुम्हारी अपेक्षा; अन्यं--अन्य; रमये--मैं भोग करूँगी; हि--निश्चय ही; अरति-ज्ञमू--कामसुखन जानने वाला; अकोविदम्--अत:, मूर्ख; असम्पराय--अगले जीवन के ज्ञान से रहित; अभिमुखम्--आगे देखते हुए;अश्वस्तन-विदम्ू--जो यह नहीं जानता कि आगे क्या हो रहा है; पशुम्--पशु तुल्य |
भला मैं अन्यों के साथ कैसे रमण करने की अपेक्षा कर सकती हूँ, क्योंकि न तो उन्हें रतिका ज्ञान है, न वे जीवित अवस्था में अथवा मरने के बाद इस जीवन का भोग करना जानते हैं ?ऐसे मूर्ख व्यक्ति पशुतुल्य हैं क्योंकि वे इन्द्रिय-भोग की क्रिया को न इस जीवन में और न हीमृत्यु के उपरान्त जानते हैं।
"
धर्मो ह्त्रार्थकामौ च प्रजानन्दोमृतं यशः ।
लोका विशोका विरजा यात्र केवलिनो विदुः ॥
३९॥
धर्म:--धार्मिक अनुष्ठान; हि--निश्चय ही; अत्र--यहाँ ( गृहस्थाश्रम में ); अर्थ-- आर्थिक विकास; कामौ--इन्द्रियतृप्ति; च--तथा; प्रजा-आनन्द: --सन्तति का सुख; अमृतम्--त्याग का फल; यश: --यश, प्रतिष्ठा; लोकाः--लोक; विशोका: --शोकरहित; विरजा:--रोगरहित; यान्ू-- जो; न--कभी नहीं; केवलिन:--योगी; विदुः--जानते हैं |
सुन्दरी ने आगे कहा : इस संसार में गृहस्थ जीवन में ही धर्म, अर्थ, काम तथा पुत्र-पौत्रइत्यादि सन्ततियाँ उत्पन्न करने का सारा सुख है।
इसके पश्चात् चाहे तो मोक्ष तथा भौतिक यशभी प्राप्त किया जा सकता है।
गृहस्थ ही यज्ञ के फल का रस ग्रहण कर सकता है, जिससे उसेश्रेष्ठ लोकों की प्राप्ति होती है।
योगियों ( यतियों ) के लिए यह भौतिक सुख अज्ञात जैसा है।
वेऐसे सुख की कल्पना भी नहीं कर सकते।
"
पितृदेवर्षिमर्त्यानां भूतानामात्मनश्व ह ।
क्षेम्यं वदन्ति शरणं भवेस्मिन्यदगृहा श्रम: ॥
४०॥
पितृ--पूर्वज, पितरगण; देव--देवता; ऋषि--ऋषिगण; मर्त्यानाम्ू--सामान्य मनुष्यों का; भूतानाम्ू--जीवों का; आत्मन:--अपना; च--भी; ह--निश्चय ही; क्षेम्यम्--लाभप्रद; वदन्ति--कहते हैं; शरणम्--शरण; भवे-- भौतिक जगत में; अस्मिन्ू --इस; यत्--जो; गृह-आश्रम: --गृहस्थ जीवन |
उस स्त्री ने आगे कहा : अधिकारियों के अनुसार गृहस्थ जीवन न केवल अपने को वरन्समस्त पितरों, देवताओं, ऋषियों, साधु पुरुषों तथा अन्य सबों को अच्छा लगने वाला है।
इसप्रकार गृहस्थ जीवन अत्यन्त उपयोगी है।
"
का नाम वीर विख्यातं वदान्यं प्रियदर्शनम् ।
न वृणीत प्रियं प्राप्त माहशी त्वाह॒शं पतिम् ॥
४१॥
का--कौन; नाम--निस्सन्देह; वीर--हे वीर पुरुष; विख्यातम्--सुप्रसिद्ध; वदान्यम्--उदार; प्रिय-दर्शनम्--सुन्दर; न--नहीं;वृणीत--स्वीकार करेगा; प्रियम्--सरलता से; प्राप्तम्-प्राप्त हुआ; माहशी--मुझ जैसी; त्वाहशम्--तुम्हारे समान; पतिम्ू--पति
हे वीर पुरुष, इस संसार में ऐसी कौन ( स्त्री) होगी जो तुम जैसे पति को स्वीकार नहींकरेगी ? तुम इतने प्रसिद्ध, उदार, इतने सुन्दर तथा सुलभ हो।
"
कस्या मनस्ते भुवि भोगिभोगयोःस्त्रिया न सज्जेद्भधुजयोर्महा भुज ।
योउनाथवर्गाधिमलं घृणोद्धतस्मितावलोकेन चरत्यपोहितुम् ॥
४२॥
कस्या:--किसका; मनः--मन; ते--तुम्हारा; भुवि-- इस संसार में; भोगि-भोगयो: --सर्प के समान शरीर वाला; स्थ्रिया: --स्त्रीका; न--नहीं; सज्जेत्ू--आकर्षित हो जाता है; भुजयो:-- भुजाओं द्वारा; महा-भुज--हे बलिष्ठ भुजाओं वाले, महाबाहु; यः--जो; अनाथ-वर्गा--हम जैसी अनाथ स्त्रियों का; अधिमू--मन का सन्ताप; अलमू--सक्षम; घृणा-उद्धत-- छेड़छाड़ से; स्मित-अवलोकेन--आकर्षक हँसी से; चरति--विचरण करता है; अपोहितुम्ू--कम ( शान्त ) करने के लिए
हे महाबाहु, इस संसार में ऐसा कौन है, जो सर्प के शरीर जैसी तुम्हारी भुजाओं से आकृष्ट नहो जाये? वास्तव में तुम अपनी मोहक मुस्कान तथा अपनी छेड़छाड़ युक्त दया से हम जैसीपतिविहीन स्त्रियों के सन््ताप को दूर करते हो।
हम सोचती हैं कि तुम केवल हमारे हित के लिएही पृथ्वी पर विचरण कर रहे हो।
"
नारद उवाचइति तौ दम्पती तत्र समुद्य समयं मिथ: ।
तां प्रविश्य पुरी राजन्मुमुदाते शर्तं समा: ॥
४३॥
नारदः उवाच--नारद ने कहा; इति--इस प्रकार; तौ--वे दोनों; दम्-पती--पति तथा पतली; तत्र--वहाँ; समुद्य--समान रूप सेउत्साही; समयम्--स्वीकार करते हुए; मिथ: --परस्पर; ताम्ू--उस स्थान में; प्रविश्य--प्रवेश करके ; पुरीम्--नगरी में;राजनू--हे राजा; मुमुदाते--जीवन का भोग किया; शतम्--एक सौ; समा:--वर्ष |
नारद मुनि ने आगे कहा : हे राजन, वे दोनों--स्त्री तथा पुरुष--एक दूसरे का पारस्परिकसौहार्द द्वारा समर्थन करते हुए उस नगरी में प्रविष्ट हुए और उन्होंने एक सौ वर्षो तक जीवन का सुख भोगा।
"
उपगीयमानो ललित तत्र तत्र च गायकै: ।
क्रीडन्परिवृतः स्त्रीभिईदिनीमाविशच्छुचौ ॥
४४॥
उपगीयमान:--गाया जाकर; ललितम्--अत्यन्त सुन्दर ढंग से; तत्र तत्र--जहाँ तहाँ; च-- भी; गायकै: --चारणों द्वारा;क्रीडन्--खेलते हुए; परिवृत:--घिरा हुआ; स्त्रीभि:--स्त्रियों से; हदिनीमू--नदी के जल में; आविशत्--घुसा; शुचौ--जबवह बहुत गर्म होता तो |
राजा पुरञ्जन की महिमा तथा महिमामय कार्यों का गान अनेक चारण किया करते थे।
ग्रीष्मऋतु में जब बहुत गर्मी पड़ती तो वह जलाशय में प्रवेश करता था।
उसके चारों ओर अनेकस्त्रियाँ होती थीं और वह उनके संग आनन्द उठाता।
"
सप्तोपरि कृता द्वारः पुरस्तस्यास्तु द्वे अधः ।
पृथग्विषयगत्यर्थ तस्यां यः कश्चनेश्वर: ॥
४५॥
सप्त--सात; उपरि--ऊपर; कृता:--निर्मित; द्वार:--द्वार; पुर: --नगरी के; तस्या:--उस; तु--तब; द्वे--दो; अध: --नीचे;पृथक्-भिन्न-भिन्न; विषय--स्थानों तक; गति-अर्थम्--जाने के लिए; तस्याम्--उस नगरी में; यः--जो; कश्चन--कोई भी;ईंश्वरः --स्वामी, अधीक्षक |
उस नगरी के नौ द्वारों में से सात तो भूतल पर थे और दो पृथ्वी के नीचे थे।
कुल नौ द्वारबनाए गए थे और ये नवों द्वार भिन्न-भिन्न स्थानों को जाते थे।
इन सारे द्वारों का उपयोग उसनगरी का अधीक्षक करता था।
"
पञ्न द्वारस्तु पौरस्त्या दक्षिणैका तथोत्तरा ।
पश्चिमे द्वे अमूषां ते नामानि नृप वर्णये ॥
४६॥
पश्ञ--पाँच; द्वारः--द्वार; तु--तब; पौरस्त्या:--पूर्व दिशा की ओर; दक्षिणा--दक्षिणी; एका--एक; तथा-- भी; उत्तरा--उत्तरकी ओर एक; पश्चिमे--इसी प्रकार पश्चिमी दिशा में; द्वे--दो; अमूषाम्--उनमें से; ते--तुमसे; नामानि--नाम; नृप--हे राजा;वर्णये--मैं वर्णन करूँगा।
हे राजन, नौ द्वारों में से पाँच पूर्व की ओर, एक उत्तर तथा एक दक्षिण दिशा को और दोपश्चिम की ओर जाते थे।
अब मैं इन विभिन्न द्वारों के नाम बताने का प्रयास करूँगा।
"
खटद्योताविर्मुखी च प्राग्द्वारावेकत्र निर्मिते ।
विभ्राजितं जनपदं याति ताभ्यां द्युमत्सख: ॥
४७॥
खटद्योता--खद्योता नामक; आविर्मुखी--आविर्मुखी नामक; च--भी; प्राक् --पूर्व दिशा की ओर; द्वारौ--दो द्वार; एकत्र--एकस्थान पर; निर्मिते--बनाये गये थे; विश्राजितम्ू--विभ्राजित नामक; जन-पदम्--नगरी; याति--जाता था; ताभ्याम्--उनसे;झुमत्--दछ्युमान नामक; सखः--अपने मित्र के साथ
खटद्योता तथा आविर्मुखी नाम के दो द्वार पूर्व की ओर स्थित थे, किन्तु वे दोनों एक स्थानपर ही बनाये गये थे।
राजा इन दोनों द्वारों से होकर विभ्राजित नामक नगरी को अपने मित्र झ्युमानके साथ जाया करता था।
"
नलिनी नालिनी च प्राग्द्वारावेकत्र निर्मिते ।
अवधूतसखस्ताभ्यां विषयं याति सौरभम् ॥
४८॥
नलिनी--नलिनी नामक; नालिनी--नालिनी नामक; च-- भी; प्राक्--पूर्वी; द्वारा --दो द्वार; एकत्र--एक स्थान पर; निर्मिते--निर्मित; अवधूत--अवधूत नामक; सखः--अपने मित्र के साथ; ताभ्याम्--उन दोनों द्वारों से; विषयम्--स्थान; याति--जाताथा; सौरभमू--सौरभ नामक |
इसी प्रकार पूर्व में नलिनी तथा नालिनी नामक ( अन्य ) दो द्वार थे और ये भी एक स्थान परबनाये गये थे।
इन द्वारों से राजा अपने मित्र अवधूत के साथ सौरभ नगर को जाया करता था।
"
मुख्या नाम पुरस्ताददवास्तयापणबहूदनौ ।
विषयौ याति पुरराड्सज्ञविपणान्वित: ॥
४९॥
मुख्या--मुख्यता या मुख्य; नाम--नामक; पुरस्तात्--पूर्व दिशा में; द्वा:--द्वार; तया--उससे; आपण--आपण नामक;बहूदनौ--बहूदन नामक; विषयौ--दो स्थान; याति--जाता था; पुर-राट्--नगर का राजा ( पुरञ्ञन ); रस-ज्ञ--रसज्ञ नामक;विपण--विपण नामक; अन्वित:--के साथ।
पूर्व दिशा में स्थित पाँचवें द्वार का नाम मुख्या अर्थात् मुख्य था।
इस द्वार से वह रसज्ञ तथाविपण नामक दो मित्रों के साथ बहूदन तथा आपण नामक दो स्थानों को जाता था।
"
पितृहूर्नूप पुर्या द्वार्दक्षिणेन पुरझ्नन: ।
राष्ट्र दक्षिणपञ्ञालं याति श्रुतधरान्वित: ॥
५०॥
पितृहू:--पितृहू नामक; नृप--हे राजा; पुर्या:--पुरी को; द्वा:--द्वार; दक्षिणेन--दक्षिण का; पुरञ्न:--राजा पुरझ्ञन; राष्ट्रमू--राष्ट्र; दक्षिण--दक्षिणी; पञ्ञालमू-पञ्ञाल नामक; याति--जाता था; श्रुत-धर-अन्वितः--अपने मित्र श्रुतधर के साथ
नगर के दक्षिणी द्वार का नाम पितृहू था, जिससे होकर राजा पुरक्षन अपने मित्र श्रुतधर केसाथ दक्षिण-पञ्ञाल नामक नगर देखने जाया करता था।
"
देवहूर्नाम पुर्या द्वा उत्तेण पुरझ्जनः ।
राष्ट्रमुत्तरपञ्ञालं याति श्रुतधरान्वित: ॥
५१॥
देवहू: --देवहू; नाम--नाम से विख्यात; पुर्या:--पुरी का; द्वा:--द्वार; उत्तेण--उत्तरी दिशा में; पुरक्षन:--राजा पुरज्जन;राष्ट्रमू--देश; उत्तर--उत्तरी; पञ्चालम्--पंचाल; याति--जाता था; श्रुत-धर-अन्वित:--अपने मित्र श्रुतधर के साथ।
उत्तर दिशा में देवहू नामक द्वार था जिससे होकर राजा पुरज्जन अपने मित्र श्रुतधर के साथउत्तर-पञ्ञाल नामक स्थान को जाया करता था।
"
आसुरी नाम पश्चाददवास्तया याति पुरझ्जन: ।
ग्रामक॑ नाम विषयं दुर्मदेन समन्वित: ॥
५२॥
आसुरी-- आसुरी; नाम--नामक; पश्चात्-पश्चिम दिशा में; द्वा:--टद्वार; तया--उससे; याति--जाया करता था; पुरक्षन:--राजापुरक्षन; ग्रामकम्--ग्रामक; नाम--नामक; विषयम्--विषय भोग की नगरी; दुर्मदेन--दुर्मद से; समन्वित:--के साथ-साथ
पश्चिम दिशा में आसुरी नामक एक द्वार था, जिससे होकर राजा पुरञ्जन अपने मित्र दुर्मद केसाथ ग्रामक नाम की नगरी को जाया करता था।
"
निर्क्रतिर्नाम पश्चाद् द्वास्तया याति पुरझ्नन: ।
वैशसं नाम विषयं लुब्धकेन समन्वित: ॥
५३॥
निर्क्रतिः--निर्क्रति; नाम--नामक; पश्चात्-पश्चिमी; द्वा:--द्वार; तया--जिससे; याति--जाया करता था; पुरक्षन:--राजापुरझ्नन; वैशसम्--वैशस; नाम--नामक; विषयम्-- स्थान को; लुब्धकेन--अपने मित्र लुब्धक; समन्वित:--के साथ-साथ।
पश्चिम दिशा का दूसरा द्वार निर्रति कहलाता था।
पुरक्षन इस द्वार से होकर अपने मित्रलुब्धक के साथ वैशस नामक स्थान को जाया करता था।
"
अन्धावमीषां पौराणां निर्वाक्पेशस्कृतावुभौ ।
अक्षण्वतामधिपतिस्ता भ्यां याति करोति च ॥
५४॥
अन्धौ--अन्धा; अमीषाम्--उनमें से; पौराणाम्--निवासियों से; निर्वाकु--निर्वाक् नामक; पेशस्कृतौ--पेशस्कृत नाम का;उभौ--दोनों; अक्षण्-वताम्--आँख वाले व्यक्तियों को; अधिपति:--शासक; ताभ्याम्--उन दोनों के साथ; याति--जायाकरता था; करोति--कार्य करता था; च--तथा |
इस नगरी के अनेक निवासियों में निर्वाक् तथा पेशस्कृत नामक दो व्यक्ति थे।
यद्यपि राजापुरञ्नन आँख वाले व्यक्तियों ( दिठियारों ) का शासक था, किन्तु वह इन दोनों अंधों के साथरहता था।
वह उनके साथ जहाँ-तहाँ जाता था और नानाविध कार्य किया करता था।
"
स यहान्तःपुरगतो विषूचीनसमन्वित: ।
मोहं प्रसादं हर्ष वा याति जायात्मजोद्धवम् ॥
५५॥
सः--वह; यहिं-- जब; अन्तः-पुर--अपने रनिवास में; गत: --जाता था; विषूचीन--मन के ; समन्वित:--सहित; मोहम्--मोह;प्रसादम्--संतोष; हर्षम्--हर्ष; वा--अथवा; याति--अनुभव करता था; जाया--पती; आत्म-ज--पुत्र; उद्धवम्--से उत्पन्न |
कभी-कभी वह अपने एक मुख्य दास (मन ) विषूचीन के साथ अपने अन्तःपुर जायाकरता था।
उस समय उसकी पत्नी तथा पुत्रों से मोह, संतोष तथा हर्ष उत्पन्न होते थे।
"
एवं कर्मसु संसक्त: कामात्मा वज्ञितोबुध: ।
महिषी यद्यदीहेत तत्तदेवान्ववर्तत ॥
५६॥
एवम्--इस प्रकार; कर्मसु--कर्मो में; संसक्त:--अत्यन्त आसक्त; काम-आत्मा--कामी; वजद्धित:ः--ठगा गया; अबुध: --अल्पज्ञानी; महिषी--पटरानी; यत् यत्ू--जो जो; ईहेत--चाहती थी; तत् तत्--वही वही; एब--निश्चय ही; अन्ववर्तत--पालनकरता था।
इस प्रकार विभिन्न प्रकार के मानसिक उहापोह तथा सकाम कर्मों में फँसा रह कर राजापुरक्षन पूर्ण रूप से भौतिक बुद्धि के वश में हो गया और ठगा गया।
वह दरअसल ही अपनीरानी की समस्त इच्छाओं को पूरा किया करता था।
"
क्वचित्पिबन्त्यां पिबति मदिरां मदविह्लः ।
अश्नन्त्यां क्वचिदृश्नाति जक्षत्यां सह जक्षिति ॥
५७॥
क्वचिद्गायति गायन्त्यां रुदत्यां रूदति क्वचित् ।
क्वचिद्धसन्त्यां हसति जल्पन्त्यामनु जल्पति ॥
५८॥
क्वचिद्धावति धावन्त्यां तिष्ठन्त्यामनु तिष्ठति ।
अनु शेते शयानायामन्वास्ते क्वचिदासतीम् ॥
५९॥
क्वचिच्छुणोति श्रृण्वन्त्यां पश्यन्त्यामनु पश्यति ।
क्वचिजिनप्नति जिप्रन्त्यां स्पृशन्त्यां स्पृशति क्वचित् ॥
६०॥
क्वचिच्च शोचतीं जायामनु शोचति दीनवत् ।
अनु हृष्यति हृष्यन्त्यां मुदितामनु मोदते ॥
६१॥
क्वचित्--कभी कभी; पिबन्त्यामू--पीते हुए; पिबति--वह पीता था; मदिराम्--शराब; मद-विहलः --उन्मत्त; अश्नन्त्याम्ू--जब वह खाती; क्वचित्ू--क भी; अश्नाति--खाता था; जक्षत्यामू--जब चबाती; सह--उसके साथ; जक्षिति--वह चबाताथा; क्वचित्--कभी; गायति--गाता था; गायन्त्यामू--अपनी पली के गाने पर; रुदत्यामू--जब वह रोती; रुदति--वह भीरोता; क्वचित्ू--क भी; क्वचित्--कभी; हसन्त्यामू--जब वह हँसती; हसति--हँसता था; जल्पन्त्यामू--जब वह अनाप-शनापबोलती; अनु--साथ-साथ; जल्पति--वह बकता; क्वचित्--कभी; धावति--वह दौड़ता था; धावन्त्यामू--जब वह दौड़ती;तिष्ठन््यामू--उसके शान्त खड़े रहने पर; अनु--साथ-साथ; तिष्ठति--खड़ा रहता था; अनु--उसके साथ; शेते--सोता था;शयानायाम्--जब वह सोती थी; अनु--उसके साथ; आस्ते--वह भी बैठता था; क्वचित्--कभी; आसतीम्--जब वह बैठतीथी; क्वचित्--कभी; श्रूणोति--सुनता था; श्रृण्वन्त्यामू--जब वह सुनने में व्यस्त होती; पश्यन्त्यामू--जब वह कुछ देखतीहोती; अनु--उसके साथ; पश्यति--वह भी देखता था; क्वचित्--कभी; जिप्नति--सूँघता था; जिप्रन्त्यामू--जब उसकी पतलीसूँघती होती; स्पृशन्त्यामू--जब वह कुछ स्पर्श करती; स्पृशति--वह भी छूता था; क्वचित्--उस समय; क्वचित् च--कभीकभी; शोचतीम्--जब विलाप करती; जायाम्--उसकी पत्नी; अनु--उसके साथ; शोचति--वह भी विलाप करता; दीन-बत्--दीन व्यक्ति के समान; अनु--उसके साथ; हृष्यति-प्रसन्न होता था; हृष्यन्त्यामू--जब वह प्रसन्न होती; मुदितामू--जबवह सन्तुष्ट होती; अनु--उसके साथ; मोदते--उसे भी संतोष होता |
जब रानी मद्यपान करती तो राजा पुरञ्जन भी मदिरा पीने में व्यस्त रहता।
जब रानी भोजनकरती तो वह भी उसके साथ-साथ खाता; जब वह चबाती तो वह भी साथ-साथ चबाता।
जबरानी गाती तो राजा भी गाता।
इसी प्रकार जब रानी रोती तो वह रोता और जब-जब रानी हँसतीतो वह भी हँसता।
जब रानी अनाप-शनाप बोलती तो वह भी उसी तरह बोलता करता और जब रानी चलती तो वह उसके पीछे हो लेता।
जब रानी शान्त भाव से खड़ी होती तो वह भी खड़ारहता और जब रानी बिस्तर में लेट जाती तो वह भी लेट जाता।
जब रानी बैठती तो वह भी बैठजाता और जब रानी कुछ सुनती तो वह भी वही सुनता।
जब रानी कोई वस्तु देखती तो वह भीउसी को देखता और जब रानी कुछ सूँघती तो राजा भी उसी को सूँघने लगता।
जब रानी कुछछूती तो राजा भी उसे छूता था और जब उसकी प्रिया रानी शोकमग्न होती तो बेचारा राजा भीशोक में उसका साथ देता।
इसी तरह रानी को जब सुख मिलता उसका भोग राजा भी करताऔर जब रानी सन्तुष्ट हो जाती तो राजा भी तुष्टि का अनुभव करता।
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विप्रलब्धो महिष्यैवं सर्वप्रकृतिवश्चितः ।
नेच्छन्ननुकरोत्यज्ञः क्लैब्यात्क्रीडामृगो यथा ॥
६२॥
विप्रलब्ध: --बन्दी; महिष्या--महिषी ( पटरानी ) द्वारा; एवम्--इस प्रकार; सर्व--समस्त; प्रकृति-- अस्तित्व; वच्चित:--ठगाजाकर; न इच्छन्--न चाहते हुए; अनुकरोति--अनुकरण करता था; अज्ञ:--मूर्ख राजा; क्लैब्यात्--बलपूर्वक; क्रीडा-मृग: --पालतू जानवर; यथा--के समान।
इस प्रकार राजा पुरक्षन अपनी सुन्दर पतली के द्वारा बन्दी बना हुआ था और ठगा जा रहाथा।
वास्तव में वह संसार में अपने सम्पूर्ण अस्तित्व में ठगा जा रहा था।
बेचारा वह मूर्ख राजाअपनी इच्छा के विरुद्ध अपनी पत्नी के वश में उसी प्रकार रहता जिस प्रकार कोई पालतूजानवर अपने स्वामी की इच्छानुसार नाचता रहता है।
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