← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची
अध्याय छब्बीसवाँ: राजा पुरंजन शिकार के लिए जंगल में जाते हैं, और उनकी रानी क्रोधित हो जाती है
4.26नारद उवाचस एकदा महेष्वासो रथ पश्ञाश्रमाशुगम् ।
द्वीषंद्विचक्रमेकाक्षं त्रिवेणुं पञ्नबन्धुरम् ॥
१॥
एकरश्म्येकदमनमेकनीडं द्विकूबरम् ।
पञ्ञप्रहरणं सप्तवरूथं पदञ्ञविक्रमम् ॥
२॥
हैमोपस्करमारुह्य स्वर्णवर्माक्षयेषुधि: ।
एकादशचमूनाथ: पद्चप्रस्थमगाठ्दनम् ॥
३॥
नारदः उवाच--नारद ने कहा; सः--राजा पुरझञ्ञन; एकदा--एक बार; महा-इष्वास:--विशाल धनुष बाण लेकर; रथम्--रथ;पश्चञ-अश्वम्-पाँच घोड़े; आशु-गम्--तेजी से चलने वाले; द्वि-ईषम्--दो तीर; द्वि-चक्रम्ू--दो पहिए; एक--एक; अक्षम्--धुरी; त्रि--तीन; वेणुम्-- ध्वजाएँ; पञ्ञ-- पाँच; बन्धुरमू-- अवरोध, डोरियाँ; एक--एक; रश्मि--लगाम; एक--एक;दमनम्--सारथी; एक--एक; नीडम्--बैठने का स्थान; द्वि--दो; कूबरम्--जुए; पश्च-- पाँच; प्रहरणम्-- आयुध; सप्त--सात; वरूथम्ू--आवरण अथवा शरीर के अवयव; पश्च--पाँच; विक्रमम्--चालें; हैम--सुनहला; उपस्करम्-- आभूषण;आरुह्म--चढ़ कर, सवार होकर; स्वर्ण--सोने का; वर्मा--कवच; अक्षय--न समाप्त होने वाला; इषु-धि:--तरकस;एकादश- ग्यारह; चमू-नाथ: --सेनापतियों; पञ्ञ--पाँच; प्रस्थम्--गन्तव्य; अगात्--गया; वनम्--वन में |
नारद मुनि ने आगे कहा : हे राजनू, एक बार राजा पुरझ्षन ने अपना विशाल धनुष लियाऔर सोने का कवच धारण करके तरकस में असंख्य तीर भर कर वह अपने ग्यारह सेनापतियोंके साथ अपने रथ पर बैठ गया, जिसे पाँच तेज घोड़े खींच रह थे और पशञ्ञप्रस्थ नामक वन मेंगया।
उसने अपने साथ उस रथ में दो विस्फोटक तीर ले लिये।
यह रथ दो पहियों तथा एकघूमते हुए धुरे पर स्थित था।
रथ पर तीन ध्वजाएँ, एक लगाम, एक सारथी, एक बैठने कास्थान, दो काठी ( जुए ), पाँच आयुध तथा सात आवरण थे।
यह रथ पाँच भिन्न-भिन्न शैलियोंसे गति कर रहा था और उसके सामने पाँच अवरोध थे।
रथ की सारी साज-सज्जा सोने की बनीथी।
"
अचार मृगयां तत्र हप्त आत्तेषुकार्मुक: ।
विहाय जायामतदर्हा मृगव्यसनलालसः ॥
४॥
चचार--किया ( खेला ); मृगयाम्--आखेट, शिकार; तत्र--वहाँ; हप्तः--गर्वपूर्वक; आत्त--लेकर; इषु--तीर; कार्मुक:--धनुष; विहाय--त्याग कर; जायाम्--अपनी पतली को; अ-तत््-अर्हाम्--यद्यपि असम्भव; मृग--आखेट, मृगया; व्यसन--बुरीलत; लालसः--से प्रोत्साहित होकर।
यद्यपि राजा पुरजझ्ञन के लिए अपनी रानी को एक पल भर भी छोड़ना कठिन था।
तो भी उस दिन उसे शिकार का ऐसा शौक लगा कि अपनी पत्नी की परवाह किये बिना वह बड़े गर्व सेधनुष-बाण लेकर जंगल चला गया।
"
आसूुरी वृत्तिमाश्रित्य घोरात्मा निरनुग्रह: ।
न्यहनन्निशितैर्बाणैर्वनेषु वनगोचरान् ॥
५॥
आसुरीम्--आसुरी; वृत्तिमू--व्यापार; आश्रित्य--ग्रहण करने से; घोर--कठोर; आत्मा--चेतना, हृदय; निरनुग्रह:--दयाहीन;न्यहनतू--वध किया; निशितैः--तीखे; बाणैः--बाणों से; वनेषु--वन में; वन-गोचरान्ू--जंगली पशुओं को |
उस समय राजा पुरञ्जन आसुरी वृत्तियों के प्रभाव में आ गया था, जिसके कारण उसकाहृदय कठोर तथा दयाशून्य हो गया था, अतः उसने अपने तीखे बाणों से बिना सोचे-विचारेअनेक निर्दोष जंगली पशुओं का वध कर दिया।
"
तीर्थेषु प्रतिदृष्टेचु राजा मेध्यान्पशून्वने ।
यावदर्थमलं लुब्धो हन्यादिति नियम्यते ॥
६॥
तीर्थषु--पवित्र स्थानों में; प्रतिहृष्टचु--वेदों के आदेशानुसार; राजा--राजा; मेध्यान्ू--वध के योग्य; पशूनू--पशुओं को;बने--वन में; यावत्--जब तक; अर्थम्--आवश्यकतानुसार; अलम्--इससे अधिक नहीं; लुब्ध:--लालची बनकर; हन्यात्--वध करे; इति--इस प्रकार; नियम्यते--नियमित करता है।
यदि राजा मांस खाने का अत्यधिक इच्छुक हो तो वह यज्ञ के लिए शास्त्रों में दिये गयेआदेशों के अनुसार बन जाकर कुछ केवल वध्य पशुओं का वध करे।
किसी को वृथा ही याबिना रोकटोक पशुओं के वध की अनुमति नहीं है।
वेद उन मूर्ख पुरुषों के द्वारा अंधाधुंधपशुवध को नियमित करते हैं, जो तमोगुण तथा अविद्या द्वारा प्रभावित रहते हैं।
"
य एवं कर्म नियतं दिद्वान्कुर्वीत मानव: ।
कर्मणा तेन राजेन्द्र ज्ञानेन नस लिप्यते ॥
७॥
यः--जो; एवम्--इस प्रकार; कर्म--कार्य; नियतम्--नियमित; विद्वानू--विद्वान्; कुर्वीत--करना चाहिए; मानव: --मनुष्य;कर्मणा--ऐसे कार्यो से; तेन--इससे; राज-इन्द्र--हे राजा; ज्ञानेन--ज्ञान से; न--कभी नहीं; सः--वह; लिप्यते--लिप्त होता
हैनारद मुनि ने राजा प्राचीनबर्हिषत् से आगे कहा : हे राजा, जो व्यक्ति शास्त्रानुमोदित कर्मोंका आचरण करता है, वह सकाम कर्मों में लिप्त नहीं होता।
"
अन्यथा कर्म कुर्वाणो मानारूढो निबध्यते ।
गुणप्रवाहपतितो नष्टप्रज्ञो त्रजत्यध: ॥
८॥
अन्यथा--नहीं तो; कर्म--सकाम कर्म; कुर्वाण:--करते हुए; मान-आरूढ:--अभिमान के वशीभूत होकर; निबध्यते--फँसजाता है; गुण-प्रवाह--गुणों के प्रभाव से; पतितः--गिरा हुआ, पतित; नष्ट-प्रज्ञ:--बुद्धि भ्रष्ट; त्रजति--जाता है; अधः--गर्तमें, नीचे।
अन्यथा जो मनुष्य मनमाना कर्म करता है, वह मिथ्या अभिमान के कारण नीचे गिर जाता हैऔर इस तरह प्रकृति के तीनों गुणों में फँस जाता है।
इस प्रकार से जीव अपनी वास्तविक बुद्ध्धिसे रहित हो जाता है और जन्म-मृत्यु के चक्र में सदा-सदा के लिए खो जाता है।
"
तत्र निर्भिन्नगात्राणां चित्रवाजैः शिलीमुखेः ।
विप्लवो भूहु:खितानां दु:सह: करुणात्मनाम् ॥
९॥
तत्र--वहाँ; निर्भिन्न--भिदकर; गात्राणामू--शरीरों वाले; चित्र-वाजैः--तरह तरह के पंखों वाले; शिली-मुखै:--तीरों द्वारा;विप्लव:--विनाश, संहार; अभूत्ू--हुआ; दुःखितानाम्--अत्यन्त दुखितों का; दुःसह:--असहा; करुण-आत्मनाम्--अत्यन्तदयालु पुरुषों का
जब राजा पुरज्न इस प्रकार आखेट करने लगा तो तीक्ष्ण बाणों से भिदकर जंगल में अनेकपशु अत्यधिक पीड़ा से अपना प्राण त्यागने लगे।
राजा के इन विनाशकारी निर्दयतापूर्ण कार्योको देखकर दयालु पुरुष अत्यन्त खिन्न हो गए।
इस प्रकार के दयालु पुरूष यह सारा वध देखकर सहन नहीं कर सके।
"
शशान्वराहान्महिषान्गवयात्रुरुशल्यकान् ।
मेध्यानन्यां श्र विविधान्विनिष्नन्श्रममध्यगात् ॥
१०॥
शशान्--खरगोशों; वराहान्ू--सुअरों; महिषान्ू-- भेसों; गवयान्--नीलगायों; रुरू-- कृष्ण मृग; शल्यकान्--साहियों;मेध्यानू--शिकारी जानवरों; अन्यान्ू--अन्यों को; च--तथा; विविधानू--विभिन्न; विनिष्ननू-- मार करके ; श्रमम् अध्यगात्--अत्यधिक थक गया।
इस प्रकार राजा पुरझ्षन ने अनेक पशुओं का वध किया जिसमें खरगोश, सुआर, भेंसे,नीलगाय, श्याम हिरण, साही तथा अन्य शिकारी जानवर शामिल थे।
लगातार शिकार करतेरहने से राजा अत्यधिक थक गया।
"
ततः क्षुत्तूट्परिश्रान्तो निवृत्तो गृहमेयिवान् ।
कृतस्नानोचिताहार: संविवेश गतक्लम: ॥
११॥
ततः-पत्पश्चात; क्षुत्- भूख से; तृटू--प्यास से; परिश्रान्त:--अत्यधिक थक कर; निवृत्त:--विराम या विरक्ति लेकर; गृहम्एयिवान्ू-- अपने घर वापस आया; कृत--करके; स्नान--स्नान; उचित-आहार: -- समुचित भोजन; संविवेश--विश्राम किया;गत-क्लमः-- थकान से रहित होकर।
इसके बाद अत्यन्त थका-माँदा, भूखा एवं प्यासा राजा अपने राजमहल लौट आया।
लौटनेके बाद उसने स्नान किया और यथोचित भोजन किया।
तब उसने विश्राम किया और इस तरहसारी थकान से मुक्त हो गया।
"
आत्मानमर्ईयां चक्रे धूपालेपस्त्रगादिभि: ।
साध्वलड्डू तसर्वाझे महिष्यामादधे मनः ॥
१२॥
आत्मानम्--अपने आप; अर्हयाम्--मानो किया जाना हो; चक्रे--किया; धूप--सुगंधित पदार्थ; आलेप--चन्दन से शरीर कोपोतना; स्रकू--माला; आदिभि:--इत्यादि से; साधु--अच्छे स्वभाव का, सुन्दर ढंग से; अलड्डू त--सजा हुआ; सर्व-अड्ड--सारे शरीर पर; महिष्याम्--रानी को; आदधे --दिया, किया; मन:--ध्यान |
तत्पश्चात् राजा पुरञ्जन ने अपने शरीर में उपयुक्त आभूषण धारण किये।
उसने अपने शरीर केऊपर चन्दन का लेप किया और फूलों की माला पहनी।
इस प्रकार वह पूर्णतः तरोताजा( विश्रान्त ) हो गया।
इसके बाद वह अपनी रानी की खोज करने लगा।
"
तृप्तो हष्ठ: सुहृप्तश्च॒ कन्दर्पाकृष्टमानस: ।
न व्यचष्ट वरारोहां गृहिणीं गृहमेधिनीम् ॥
१३ ॥
तृप्त:--तुष्ट; हष्ट:--प्रसन्न; सु-हृप्त:--अत्यन्त गर्वित; च-- भी; कन्दर्प--कामदेव से; आकृष्ट-- आकर्षित; मानस: --उसकामन; न--नहीं; व्यचष्ट-- प्रयल किया; वर-आरोहाम्---उच्चतर चेतना; गृहिणीम्--पत्नी को; गृह-मेधिनीम्--जो अपने पति कोभौतिक जीवन में रखती है।
भोजन कर लेने तथा अपनी भूख और प्यास बुझा लेने के बाद पुरझ्षन को मन में कुछप्रफुल्लता हुई।
वह उच्चतर चेतना तक न पहुँच कर कामदेव द्वारा मोहित हो गया और उसेअपनी पत्नी को ढूँढने की इच्छा हुई जिसने उसे गृहस्थ जीवन में प्रसन्न कर रखा था।
"
अन्तःपुरस्त्रियोपृच्छद्विमना इब वेदिषत् ।
अपि व: कुशल रामा: से श्वरीणां यथा पुरा ॥
१४॥
अन्तः-पुर--रनिवास की; स्थत्रियः--स्त्रियों से; अपूच्छत्--पूछा; विमना: --अत्यन्त उत्सुक होकर; इब--मानो; वेदिषत्--हेराजा प्राचीनबर्हि; अपि--क्या; व:--तुम्हारी; कुशलम्--कुशल मंगल; रामा: --हे सुन्दरियो; स-ईश्वरीणाम्ू-- अपनी मालकिनया स्वामिनी सहित; यथा--जिस तरह; पुरा--पहले।
उस समय राजा पुरञझ्न कुछ-कुछ उत्सुक हुआ और उसने रनिवास की स्त्रियों से पूछा: हेसुन्दरियो, तुम सब अपनी स्वामिनी सहित पहले के समान प्रसन्न तो हो ?"
न तथैतर्हि रोचन्ते गृहेषु गृहसम्पदःयदि न स्यादगृहे माता पत्नी वा पतिदेवता ।
व्यड्जे रथ इव प्राज्ञ: को नामासीत दीनवत् ॥
१५॥
न--नहीं; तथा--पूर्ववत्; एतह्ि--इस क्षण; रोचन्ते-- अच्छे लगते हैं; गृहेषु--घर में; गृह-सम्पदः--घरेलू साज-सामान;यदि--अगर; न--नहीं; स्थात्--हो; गृहे--घर में; माता--माँ; पत्ती -- भार्या; वा-- अथवा; पति-देवता-- पति-परायण;व्यड्रे--पहियों से रहित; रथे--रथ में; इब--सहश; प्राज्:--विद्वान मनुष्य; कः--ऐसा कौन है; नाम--निस्सन्देह; आसीत--बैठेगा; दीन-वत्--दीन के समान।
राजा पुरक्षन ने कहा : मेरी समझ में नहीं आ रहा कि मेरे घर का सारा साज-सामान पहलेकी भाँति मुझे अच्छा क्यों नहीं लग रहा? मैं सोचता हूँ कि यदि घर में माता अथवा पति-परायणपत्नी न हो तो घर पहियों से विहीन रथ की तरह प्रतीत होता है।
ऐसा कौन मूर्ख है, जो ऐसे व्यर्थके रथ पर बैठेगा ?"
क्व वर्तते सा ललना मज्नन्तं व्यसनार्णवे ।
या मामुद्धरते प्रज्ञां दीपयन्ती पदे पदे ॥
१६॥
क्व--कहाँ; वर्तते--इस समय है; सा--वह; ललना--स्त्री; मजनन्तम्--डूबते हुए; व्यसन-अर्णवे--संकट के सागर में; या--जो; माम्--मुझको ; उद्धरते--उबारती है; प्रज्ञामू--सह्दुब्द्धि; दीपयन्ती--जागृत करके; पदे पदे-- प्रत्येक पग पर।
कृपया मुझे उस सुन्दरी का पता बताओ जो मुझे सदैव संकट के समुद्र में डूबने से उबारतीहै।
वह मुझे पग-पग पर सहुद्धि प्रदान करके बचाती है।
"
रामा ऊचु:नरनाथ न जानीमस्त्वत्प्रिया यद्व्यवस्यति ।
भूतले निरवस्तारे शयानां पश्य शत्रुहन् ॥
१७॥
रामाः ऊचु:--स्त्रियों ने कहा; नर-नाथ--हे राजा; न जानीम:--हम नहीं जानतीं; त्वत्-प्रिया--तुम्हारी प्रिया ने; यत्व्यवस्यति--क्यों इस प्रकार का जीवन धारण कर रखा है; भू-तले--पृथ्वी पर; निरवस्तारे--बिना बिस्तर के; शयानाम्ू--लेटीहुई; पश्य--देखो; शत्रु-हन्ू--हे शत्रुओं का वध करने वाले।
सभी स्त्रियों ने राजा को सम्बोधित किया: हे प्रजा के स्वामी, हम यह नहीं जानतीं किआपकी प्रिया ने क्यों ऐसी स्थिति बना रखी है।
हे शत्रुओं के संहारक ! कृपया देखें।
वे बिनाबिस्तर के जमीन पर लेटी हुई हैं।
हम नहीं समझ पा रहीं कि वे ऐसा क्यों कर रही हैं।
"
नारद उबाच पुरञ्ञनः स्वमहिषीं निरीक्ष्यावधुतां भुवि ।
तत्सड्लोन्मथितज्ञानो वैक्लव्यं परमं ययौ ॥
१८॥
नारद: उवाच--नारद मुनि ने कहा; पुरञ्जन:--राजा पुरझ्ञन; स्व-महिषीम्-- अपनी रानी को; निरीक्ष्य--देखकर; अवधुताम्--साधु की तरह; भुवि--पृथ्वी पर; तत्--उसके; सड्ड--साथ से; उनन््मधित--प्रोत्साहित; ज्ञान: --जिसका ज्ञान; वैक्लव्यम्ू--मोहग्रस्त; परममू-- परम; ययौ--हो गया |
महर्षि नारद ने कहा : हे राजा प्राचीनबर्हि, जैसे ही राजा पुरझ्ञन ने अपनी रानी को अवधूत की भाँति पृथ्वी पर लेटे देखा, वह तुरन्त मोहग्रस्त हो गया।
"
सान्त्वयन्श्लक्ष्णया वाचा हृदयेन विदूयता ।
प्रेयस्या: स्नेहसंरम्भलिड्रमात्मनि नाभ्यगात् ॥
१९॥
सान्त्वयन्--समझाते हुए; श्लक्ष्णया--मीठे; वाचा--वचनों से; हृदयेन--हृदय से; विदूयता--अत्यधिक पछताते हुए;प्रेयस्था:-- अपनी प्रेयसी के; स्नेह--प्यार से; संरम्भ--क्रोध का; लिड्रमू--लक्षण; आत्मनि--हृदय में; न--नहीं; अभ्यगात् --उठा।
दुखित हृदय से राजा अपनी पत्नी से अत्यन्त मीठे शब्द कहने लगा।
यद्यपि वह दुखी थाऔर ससे प्रसन्न करने का प्रयास कर रहा था, किन्तु उसने अपनी प्राणप्रिया पत्नी के हृदय मेंक्रोध का एक भी लक्षण नहीं देखा।
"
अनुनिन्येथ शनकैर्वीरोनुनयकोविदः ।
पस्पर्श पादयुगलमाह चोत्सड्रलालिताम् ॥
२०॥
अनुनिन्ये--मनाना आरम्भ किया; अथ--इस प्रकार; शनकै:--धीरे-धीरे; वीर:--वीर; अनुनय-कोविदः --मनाने में निपुण;पस्पर्श--स्पर्श किया; पाद-युगलम्--दोनों पाँव; आह--कहा; च--भी; उत्सड्ू--गोद में; लालिताम्ू--इस प्रकार आलिंगनकरते हुए।
चूँकि राजा मनाने में अत्यन्त निपुण था, अतः उसने रानी को धीरे-धीरे मनाना प्रारम्भकिया।
पहले उसने उसके दोनों पाँव छुये, फिर उसका आलिंगन किया और अपनी गोद मेंबैठाकर इस प्रकार कहना प्रारम्भ किया।
"
पुरझ्ञन उबाचनूनं त्वकृतपुण्यास्ते भृत्या येष्वी श्वरा: शुभे ।
कृतागःस्वात्मसात्कृत्वा शिक्षादण्डं न युज्ञते ॥
२१॥
पुरझनः उवाच--पुरञ्ञन ने कहा; नूनम्--निश्चय ही; तु--तब; अकृत-पुण्या:--जो पुण्यात्मा नहीं है, अभागा; ते--वे;भृत्या:--दास; येषु--जिनको; ईश्वरा:--स्वामी; शुभे--हे शुभ लक्षणों वाली; कृत-आग:सु--पाप करके; आत्मसात्-- अपनाकर; कृत्वा--करके; शिक्षा--उपदेश के रूप में; दण्डमू--दण्ड; न युद्धते--नहीं देते |
राजा पुरञ्जन ने कहा : हे सुन्दरी, जब स्वामी किसी मनुष्य को दास रूप में स्वीकार तो करलेता है, किन्तु उसके अपराधों के लिए उसे दण्ड नहीं देता तो उस दास को समझना चाहिए किवह अभागा है।
"
परमोनुग्रहो दण्डो भृत्येषु प्रभुणार्पित: ।
बालो न वेद तत्तन्वि बन्धुकृत्यममर्षण: ॥
२२॥
'परम:--परम; अनुग्रहः--कृपा; दण्ड:--दण्ड; भृत्येषु--दासों पर; प्रभुणा--स्वामी द्वारा; अर्पित:--दिया गया; बाल:--मूर्ख;न--नहीं; वेद--जानता है; तत्--उस; तन्वि--हे तन्वंगी; बन्धु-कृत्यम्--मित्र का कर्तव्य; अमर्षण:--क्रुद्ध |
हे तन्वंगी, जब कोई स्वामी अपने सेवक को दण्ड देता है, तो उसे परम अनुग्रह समझ कर स्वीकार कर लेना चाहिए।
जो क्ुद्ध होता है, वह अत्यन्त मूर्ख है और वह यह नहीं जानता किऐसा करना तो उसके मित्र का कर्तव्य होता है।
"
सा त्वं मुखं सुदति सुप्वनुराग भार-ब्रीडाविलम्बविलसद्धसितावलोकम् ।
नीलालकालिभिरुपस्कृतमुन्नसं नःस्वानां प्रदर्शय मनस्विनि वल्गुवाक्यम् ॥
२३॥
सा--वह ( तुम, मेरी पत्नी ); त्वम्ू--तुम; मुखम्--अपना मुँह; सु-दति--सुन्दर दाँतों वाली; सु-भ्रु--सुन्दर भौंहों वाली;अनुराग--प्यार, आसक्ति से; भार--बोझिल; ब्रीडा--लज्जा; विलम्ब--नीचे झुके; विलसत्--चमकते हुए; हसित--हँसतेहुए; अवलोकम्--चितवन से; नील--नीले; अलक--बाल से युक्त; अलिभि: -- भौंरों के समान; उपस्कृतम्--इस प्रकार सुन्दरबनकर; उन्नसम्--उठी हुई ( उन्नत ) नाक से युक्त; न:--मुझको; स्वानाम्--तुम्हारा अपना हूँ; प्रदर्शम--दिखलाओ;मनस्विनि--हे विचारमग्न सुन्दरी; बल्गु-वाक्यम्--मीठे बचनों से |
हे प्रिये, तुम अत्यन्त सुन्दर दाँतों वाली हो।
तुम अपने आकर्षक अंगों के कारण अत्यन्तमनस्वी लगती हो।
तुम अपना क्रोध त्याग कर मुझ पर कृपा करो और अत्यन्त प्यार से तनिक मुस्कराओ।
जब मैं तुम्हारे सुन्दर मुखमण्डल की मुसकान, तुम्हारे नीले रंग वाले बाल एवंतुम्हारी उन्नत नासिका को देखूँगा तथा तुम्हारे मीठे वचनों को सुनूंगा तो तुम मुझे और भी सुन्दरलगोगी और अपनी ओर आकृष्ट करती प्रतीत हो ओगी।
तुम मेरी अत्यन्त आदरणीया स्वामिनीहो।
"
तस्मिन्दधे दममहं तव वीरपत्नियोउन्यत्र भूसुरकुलात्कृतकिल्बिषस्तम् ।
पश्ये न वीतभयमुन्मुदितं त्रिलोक्या-मन्यत्र वै मुररिपोरितरत्र दासात्ू ॥
२४॥
तस्मिन्ू--उसको; दधे--दूँगा; दमम्--दण्ड; अहम्--मैं; तब--तुमको; वीर-पत्नि--हे वीर की पत्नी; यः--जो; अन्यत्र--इसके अतिरिक्त; भू-सुर-कुलात्--इस पृथ्वी पर देवताओं के कुल से ( ब्राह्मणों से ); कृत--किया हुआ; किल्बिष: --अपराध;तम्--उसको; पश्ये--मैं देखता हूँ; न--नहीं; बीत--रहित; भयम्--डर; उन्मुदितम्--चिन्तारहित; त्रि-लोक्याम्--तीनों लोकोंमें; अन्यत्र--और कहीं; बै--निश्चय ही; मुर-रिपो:--मुर के शत्रु ( कृष्ण ) का; इतरत्र--दूसरी ओर; दासात्ू--दास कीअपेक्षा
हे बवीरपत्नी, मुझे बताओ कि क्या किसी ने तुम्हें अपमानित किया है? मैं ऐसे व्यक्ति को यदि वह ब्राह्मण कुल का नहीं है, दण्ड देने के लिए तैयार हूँ, मैं मुररिपु ( श्रीकृष्ण ) के दास केअतिरिक्त तीनों लोकों में किसी को भी क्षमा नहीं करूँगा।
तुम्हें अपमानित करके कोईस्वच्छन्दतापूर्वक विचरण नहीं कर सकता, क्योंकि मैं उसे दण्ड देने के लिए तैयार हूँ।
"
वक्त्रं न ते वितिलकं मलिनं विहर्षसंरम्भभीममविमृष्ठटमपेतरागम् ।
पश्ये स्तनावषि शुच्चोपहतौ सुजातौबिम्बाधरं विगतकुद्डू मपड्डरागम् ॥
२५॥
वक्त्रमू--मुख; न--कभी नहीं; ते--तुम्हारा; वितिलकम्--निरलंकृत; मलिनम्--मलिन; विहर्षम्--खिन्न; संरम्भ--क्रो ध से;भीमम्-- भयानक; अविमृष्टम्ू--कान्तिहीन; अपेत-रागम्--स्नेहशून्य; पश्ये -- मैने देखा है; स्तनौ--तुम्हारे स्तन; अपि-- भी;शुचा-उपहतौ--तुम्हारे आँसुओं से सिक्त; सु-जातौ--इतने सुन्दर; बिम्ब-अधरम्--बिम्बा के समान लाल होंठ; विगत--रहित;कुट्डु म-पड्ढूं--केशर के; रागमू--रंग।
प्रिये, आज तक मैंने कभी भी तुम्हारे मुख को तिलक से रहित नहीं देखा, न ही मैंने तुम्हेंकभी खिन्न तथा कान्ति या स्नेह से रहित देखा है।
न ही मैंने तुम्हारे दोनों स्तनों को नेत्र अश्रुओंसे सिक्त देखा है।
न ही मैंने तुम्हारे बिम्बा फलों के समान लाल-लाल होठों को कभी लालिमासे रहित देखा है।
"
तन्मे प्रसीद सुहद: कृतकिल्बिषस्यस्वैरं गतस्य मृगयां व्यसनातुरस्य ।
का देवरं वशगतं कुसुमास्त्रवेग-विस्त्रस्तपौंस्नमुशती न भजेत कृत्ये ॥
२६॥
तत्ू--अतः; मे--मुझसे; प्रसीद--प्रसन्न हो जाओ; सु-हृदः--अभिन्न मित्र; कृत-किल्बिषस्थ--पापकर्म किये जाने पर;स्वैरम्--स्वतंत्र रूप से; गतस्य--गये हुए का; मृगयाम्--आखेट के लिए; व्यसन-आतुरस्य--पापपूर्ण इच्छा से प्रभावितहोकर; का--कौन स्त्री; देवरम्--पति को; वश-गतम्--अपने वश में; कुसुम-अस्त्र-वेग--कामदेव के तीर से बिंधा;विस्रस्त--छिन्न; पौंस्नमू--थैर्य ; उशती-- अत्यन्त सुन्दर; न--कभी नहीं; भजेत--प्यार करते; कृत्ये--कर्तव्य में |
हे रानी, मैं अपनी पापपूर्ण इच्छाओं के कारण तुमसे बिना पूछे शिकार करने जंगल चलागया।
अतः मैं स्वीकार करता हूँ कि मुझसे अपराध हुआ।
फिर भी मुझे अपना अन्तरंग समझ कर तुम्हें अत्यन्त प्रसन्न होना चाहिए।
मैं वास्तव में अत्यधिक दुखी हूँ, किन्तु कामदेव के बाणोंसे बिद्ध होने के कारण मैं कामुक हो रहा हूँ।
भला ऐसी कौन सुन्दरी होगी जो अपने कामुकपति को त्याग देगी और उससे मिलना अस्वीकार कर देगी ?"
