← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची
अध्याय तीस: प्रचेता की गतिविधियाँ
4.30तय हिला पा,ये ब्रह्मन्सुता: प्राचीनबर्हिष: ।
ते रुद्रगीतेन हरिं सिद्धिमापु: प्रतोष्य काम् ॥
१॥
विदुरः उवाच--विदुर ने कहा; ये--जो; त्वया--तुम्हारे द्वारा; अभिहिता:--कहे गये थे; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; सुता:--सभी पुत्र;प्राचीनबर्हिष:--राजा प्राचीनबर्हि के; ते--वे सब; रुद्र-गीतेन-- भगवान् शिव द्वारा रचे गये गीत से; हरिम्-- भगवान् को;सिद्धिमू--सफलता; आपु:--प्राप्त किया; प्रतोष्य--प्रसन्न करके; कामू--क्या |
विदुर ने मैत्रेय से जानना चाहा: हे ब्राह्मण, आपने पहले मुझसे प्राचीनबर्हि के पुत्रों के विषयमें बतलाया था कि उन्होंने शिव द्वारा रचे हुए गीत के जप से भगवान् को प्रसन्न किया।
तो उन्हेंइस प्रकार क्या प्राप्त हुआ ?"
किं बाहस्पत्येह परत्र वाथकैवल्यनाथप्रियपार्श्ववर्तिन: ।
आसाद्य देवं गिरिशं यहच्छयाप्रापु: परं नूनमथ प्रचेतस: ॥
२॥
किमू--क्या; बाईस्पत्य--हे बृहस्पति के शिष्य; इह--यहाँ; परत्र--विभिन्न लोकों में; वा--अथवा; अथ--इस तरह; कैवल्य-नाथ--मोक्ष के प्रदाता को; प्रिय--प्यारा; पार्श्-वर्तिन:--से सम्बद्ध होने से; आसाद्य--मिलकर; देवम्--देवता; गिरि-शम्--कैलाश पर्वत के स्वामी को; यहच्छया-- भाग्य से; प्रापु:--प्राप्त किया; परमू--परमे श्वर; नूनम्ू--निश्चय ही; अथ-- अतएव;प्रचेतस:--बर्हिषत् के पुत्र |
हे बार्हस्पत्य, राजा बर्दिषत् के पुत्रों ने, जिन्हें प्रचेता कहते हैं, उन्होंने भगवान् शिवजी सेभेंट करने के बाद क्या प्राप्त किया, जो मोक्षदाता भगवान् को अत्यन्त प्रिय हैं? वे वैकुण्ठलोकतो गये ही, किन्तु इसके अतिरिक्त उन्होंने इस जीवन में, अथवा अन्य जीबनों में इस संसार मेंक्या प्राप्त किया ?"
मैत्रेय उवाचप्रचेतसोन्तरुदधौ पितुरादेशकारिण: ।
जपयज्ञेन तपसा पुरश्ननममतोषयन् ॥
३॥
मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; प्रचेतस:--प्रचेताओं ने; अन्त:-- भीतर; उदधौ--समुद्र में; पितु:--अपने पिता के; आदेश-कारिण:--आज्ञाकारी; जप-यज्ञेन--मंत्रों के जप से; तपसा--कठिन तपस्या से; पुरमू-जनम्-- भगवान् को; अतोषयन्- प्रसन्नकिया।
मैत्रेय ऋषि ने कहा : राजा प्राचीनबर्हि के पुत्र प्रचेताओं ने अपने पिता की आज्ञा का पालनकरने के लिए समुद्र जल के भीतर कठिन तपस्या की।
भगवान् शिव द्वारा प्रदत्त मंत्र काबारम्बार उच्चारण करके वे भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने में समर्थ हुए।
"
दश्वर्षसहस्त्रान्ते पुरुषस्तु सनातनः ।
तेषामाविरभूत्कृच्छुं शान्तेन शमयन्नुच्चा ॥
४॥
दश-वर्ष--दस साल; सहस्त्र-अन्ते--एक हजार के अन्त में; पुरुष: --परम पुरुष; तु--तब; सनातन: --शा श्वत; तेषाम्--प्रचेताओं का; आविरभूत्--प्रकट हुआ; कृच्छुमू--कठिन तपस्या; शान्तेन--तुष्ट करते हुए; शमयन्--शान्त करते हुए; रुचा--अपने सौन्दर्य से।
प्रचेताओं द्वारा दस हजार वर्षो तक कठिन तपस्या किये जाने के बाद भगवान् तपस्या का'फल देने के लिए उनके समक्ष अत्यन्त मनोहर रूप में प्रकट हुए।
इससे प्रचेताओं को अपना श्रमसार्थक प्रतीत हुआ।
"
सुपर्णस्कन्धमारूढो मेरु श्रूड़॒मिवाम्बुद: ।
'पीतवासा मणिग्रीव: कुर्वन्वितिमिरा दिश: ॥
५॥
सुपर्ण--भगवान् विष्णु के वाहन गरुड़ के; स्कन्धम्--कन्धों पर; आरूढ: --आसीन; मेरु--मेरु नामक पर्वत की; श्रृड़म्--चोटी पर; इब--सहश; अम्बुद:ः--बादल; पीत-वासा:--पीला वस्त्र पहने; मणि-ग्रीव: --कौस्तुभ मणि से सुशोभित गर्दन;कुर्वन्ू--करते हुए; वितिमिरा:--अंधकार से मुक्त; दिश:--सारी दिशाएँ।
गरुड़ के कन्धे पर आसीन भगवान् मेरु पर्वत की चोटी पर छाये बादल के समान प्रतीत होरहे थे।
भगवान् का दिव्य शरीर आकर्षक पीताम्बर से ढका था और उनकी गर्दन कौस्तुभ मणिसे सुशोभित थी।
भगवान् के शारीरिक तेज से ब्रह्माण्ड का सारा अंधकार दूर हो रहा था।
"
काशिष्णुना कनकवर्णविभूषणेनभ्राजत्कपोलवदनो विलसत्किरीट: ।
अष्टायुधैरनुचरैर्मुनिभि: सुरेन्द्ररासेवितो गरुडकिन्नरगीतकीर्ति: ॥
६॥
काशिष्णुना--चमकीले; कनक--सोना; वर्ण--रंग के; विभूषणेन-- आभूषणों से; भ्राजत्--चमकते हुए; कपोल--मस्तक;वदन:--मुख; विलसत्---झिलमिलाता हुआ; किरीट:--मुकुट; अष्ट--आठ; आयुधेः:--आयुधों से; अनुचरैः --सेवा करनेवालों से; मुनिभि:--मुनियों से; सुर-इन्द्रै:--देवताओं से; आसेवितः--सेवित; गरुड--गरुड़ द्वारा; किन्नर--किन्नर लोक केवासी; गीत--गाया हुआ; कीर्ति:--कीर्ति, महिमा |
भगवान् का मुख अत्यन्त सुन्दर था और उनका सिर चमकीले मुकुट तथा सुनहरे आभूषणोंसे सुशोभित था।
यह मुकुट झिलमिला रहा था और सिर पर अत्यन्त सुन्दर ढंग से लगा था।
भगवान् के आठ भुजाएँ थीं और प्रत्येक भुजा में एक विशेष आयुध था।
वे देवताओं, ऋषियोंतथा अन्य पार्षदों से घिरे हुए थे।
ये सब उनकी सेवा कर रहे थे।
भगवान् का वाहन गरुड़ अपनेपंखों को फड़फड़ा कर वैदिक स्तोत्रों से भगवान् की महिमा का इस प्रकार गान कर रहा थामानो वह किन्नर लोक का वासी हो।
"
पीनायताष्टभुजमण्डलमध्यलक्ष्म्यास्पर्धच्छया परिवृतो वनमालयाद्य: ।
बर्हिष्मतः पुरुष आह सुतान्प्रपन्नान्पर्जन्यनादरुतया सघूणावलोकः ॥
७॥
पीन--बलिषप्ठ; आयत--लम्बी; अष्ट--आठ; भुज--भुजाएँ; मण्डल--घेरा के; मध्य--बीच में; लक्ष्म्या--लक्ष्मी से; स्पर्धत्--स्पर्धा करते हुए; भ्रिया--जिसकी सुन्दरता; परिवृत:--पड़ी हुई; बन-मालया--फूलों की माला से; आद्य:--आदि भगवान्;बर्हिष्मत:--राजा प्राचीनबर्हि के; पुरुष:-- भगवान्; आह--सम्बोधित किया; सुतान्--पुत्रों को; प्रपन्नान्ू--शरणागत;पर्जन्य--बादल के समान; नाद--जिसकी ध्वनि; रुतया--वाणी से; स-घृण--दयापूर्वक ; अवलोक: --अपनी दृष्टि, चितवन।
भगवान् के गले के चारों ओर घुटनों तक पहुँचने वाली फूलों की माला लटक रही थी।
उनकी आठ बलिष्ट तथा लम्बी भुजाएँ उस माला से विभूषित थीं, जो लक्ष्मी जी की सुन्दरता कोचुनौती दे रही थीं।
दयापूर्ण चितबन तथा मेघ-गर्जना के समान वाणी से भगवान् ने राजाप्राचीनबर्हिषत् के पुत्रों को सम्बोधित किया जो उनकी शरण में आ चुके थे।
"
श्रीभगवानुवाचवरं वृणीध्वं भद्गं वो यूयं मे नृपनन्दना: ।
सौहार्देनापृथग्धर्मास्तुष्टो हं सौहदेन वः ॥
८ ॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; वरमू--वर, आशीर्वाद; वृणीध्वम्--माँगो; भद्रमू-- कल्याण; व:--तुम सबका;यूयम्--तुम सब; मे--मुझसे; नृप-नन्दना: --हे राजपुत्रो; सौहार्देन--मित्रता से; अपृथक् -- अभिन्न; धर्मा:--कार्य ; तुष्ट: --प्रसन्न; अहम्--मैं; सौहदेन--मित्रता से; वः--तुम सबका
भगवान् ने कहा : हे राजपुत्रो, मैं तुम लोगों के परस्पर मित्रतापूर्ण सम्बन्धों से अत्यधिकप्रसन्न हूँ।
तुम सभी एक ही कार्य--भक्ति--में लगे हो।
मैं तुम लोगों की मित्रता से इतनाअधिक प्रसन्न हूँ कि मैं तुम्हारा कल्याण चाहता हूँ।
अब तुम जो वर चाहो माँग सकते हो।
"
योअनुस्मरति सन्ध्यायां युष्माननुदिनं नरः ।
तस्य क्रातृष्वात्मसाम्यं तथा भूतेषु सौहदम् ॥
९॥
यः--जो; अनुस्मरति--सदैव स्मरण करता है; सन्ध्यायाम्ू--शाम के समय; युष्मान्--तुमको; अनुदिनम्-- प्रतिदिन; नर:--मनुष्य; तस्य भ्रातृषु--अपने भाइयों के प्रति; आत्म-साम्यम्-व्यक्तिगत समानता; तथा--और; भूतेषु--समस्त जीवों के प्रति;सौहदम्--मित्रता |
भगवान् ने आगे कहा : जो प्रतिदिन संध्या समय तुम्हारा स्मरण करेंगे वे अपने भाइयों केप्रति तथा अन्य समस्त जीवों के प्रति मैत्रीभाव रखेंगे।
"
येतु मां रुद्रगीतेन सायं प्रातः समाहिता: ।
स्तुवन्त्यह॑ं कामवरान्दास्ये प्रज्ञां च शोभनाम् ॥
१०॥
ये--जो लोग; तु--लेकिन; मामू--मुझको ; रुद्र-गीतेन--रुद्र गीत द्वारा; सायम्--संध्या समय; प्रात:--प्रातःकाल;समाहिता: --सावधान रहकर; स्तुवन्ति--प्रार्थना करते हैं; अहम्--मैं; काम-वरान्--इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए समस्तवर, अभीष्ट वरदान; दास्ये--प्रदान करूँगा; प्रज्ञाम--बुद्धि; च-- भी; शोभनाम्--दिव्य |
जो लोग शिवजी द्वारा प्रणीत स्तुति से प्रातः तथा सायंकाल मेरी प्रार्थना करेंगे, उन्हें में वरप्रदान करूँगा।
इस तरह वे अपनी इच्छाओं को पूरा करने के साथ-साथ सह्ुद्धि भी प्राप्त करसकेंगे।
"
यद्यूयं पितुरादेशमग्रहीष्ट मुदान्विता: ।
अथो व उशती कीर्तिलोकाननु भविष्यति ॥
११॥
यत्--चूँकि; यूयम्--तुम लोगों ने; पितु:--पिता की; आदेशम्-- आज्ञा; अग्रहीष्ट--शिरोधार्य की है; मुदा-अन्विता:--अत्यन्तप्रसन्नतापूर्वक; अथो--अतः ; व:--तुम्हारी; उशती --आकर्षण, कमनीय; कीर्ति: --महिमा; लोकान् अनु--सारे ब्रह्माण्ड भरमें; भविष्यति--सम्भव हो सकेगी, फैल जाएगी।
चूँकि तुम लोगों ने अपने अन्तःकरण से प्रसन्नतापूर्वकक अपने पिता की आज्ञा अत्यन्तश्रद्धापूर्वक शिरोधार्य की है और उसका पालन किया है, अतः तुम्हारे आकर्षक गुण संसार-भरमें सराहे जाएँगे।
"
भविता विश्रुतः पुत्रोउनवमो ब्रह्मणो गुणै: ।
य एतामात्मवीर्येण त्रिलोकीं पूरयिष्यति ॥
१२॥
भविता--होगा; विश्रुतः --अत्यन्त प्रसिद्ध; पुत्र:--पुत्र; अनवमः--न्यून नहीं; ब्रह्मण: --ब्रह्मा से; गुणैः -गुणों में; यः--जो;एताम्ू--यह सब; आत्म-वीर्येण-- अपनी संतति से; त्रि-लोकीम्--तीनों संसार को; पूरयिष्यति--पूर्ण कर देगा।
तुम सब को एक उत्तम पुत्र प्राप्त होगा जो भगवान् ब्रह्माजी से किसी भी प्रकार न्यून नहींहोगा।
फलस्वरूप वह सरे ब्रह्माण्ड में अत्यन्त प्रसिद्ध होगा और उससे उत्पन्न पुत्र तथा पौत्र तीनोंलोकों को भर देंगे।
"
'कण्डोः प्रम्लोचया लब्धा कन्या कमललोचना ।
तां चापविद्धां जगृहुर्भूरहा नृपनन्दना: ॥
१३॥
कण्डो:--कण्डु मुनि की; प्रम्लोचया--प्रम्लोचा नाम की अप्सरा से; लब्धा--प्राप्त किया; कन्या--पुत्री; कमल-लोचना--कमल जैसे नेत्रों वाली; तामू--उसको; च-- भी; अपविद्धाम्--छोड़ी हुई; जगृहुः:--स्वीकार किया; भूरूहाः --वृक्ष; नूप-नन्दनाः--हे राजा प्राचीनबर्हिषत् के पुत्रो!
हे राजा प्राचीनबर्हिषत् के पुत्रो, प्रम्लोचा नामक अप्सरा ने कण्डु की कमलनयनी कन्या को जंगली वृक्षों की रखवाली में छोड़ दिया और फिर वह स्वर्गलोक को चली गई।
यह कन्याकण्डु ऋषि तथा प्रम्लोचा नामक अप्सरा के संयोग से उत्पन्न हुई थी।
"
क्षुक्षामाया मुखे राजा सोम: पीयूषवर्षिणीम् ।
देशिनीं रोदमानाया निदधे स दयान्वित: ॥
१४॥
क्षुतू-- भूख से; क्षामाया:--व्याकुल होने पर; मुखे--मुँह में; राजा--राजा; सोम: --चन्द्रमा; पीयूष-- अमृत; वर्षिणीम्--डालतेहुए; देशिनीम्--तर्जनी अंगुली; रोदमानाया: --रोने पर; निदधे--डाला; सः--वह; दया-अन्वित:--दयालु होते हुए |
ततपश्चात् वृक्षों के संरक्षण में रखा गया वह शिशु भूख से रोने लगा।
उस समय वन के राजा अर्थात् चन्द्रलोक के राजा ने दयावश अपनी अंगुली ( तर्जनी ) शिशु के मुख में रखी जिससेअमृत निकलता था।
इस प्रकार उस शिशु का पालनपोषण चन्द्र राजा की कृपा से हुआ।
"
प्रजाविसर्ग आदिष्टा: पित्रा मामनुवर्तता ।
तत्र कन्यां वरारोहां तामुद्र॒हत मा चिरम् ॥
१५॥
प्रजा-विसगें--सन्तान उत्पन्न करने के लिए; आदिष्टा:--आदेश पाकर; पित्रा--पिता द्वारा; मामू--मेरा आदेश; अनुवर्तता--पालन करती हुई; तत्र--वहाँ; कन्याम्--कन्या को; वर-आरोहाम्-- अत्यन्त योग्य तथा अत्यन्त सुन्दरी; तामू--उसको;उद्ददत--ब्याह लिया; मा--बिना; चिरम्ू--समय गँवाये |
चूँकि तुम सभी मेरी आज्ञा का पालन करने वाले हो, अतः मैं तुम्हें उस कन्या के साथ तुरन्तविवाह करने के लिए कहता हूँ क्योंकि वह अत्यन्त योग्य है, सुन्दरी है और उत्तम गुणों वाली है।
अपने पिता की आज्ञा के अनुसार तुम उससे संतति उत्पन्न करो।
"
अपृथग्धर्मशीलानां सर्वेषां व: सुमध्यमा ।
अपृथग्धर्मशीलेयं भूयात्पत्यर्पिताशया ॥
१६॥
अपृथक्--किसी अन्तर के बिना; धर्म--व्यापार; शीलानाम्--जिसका चरित्र; सर्वेषाम् व:--तुम सबों का; सु-मध्यमा--पतलीकमर वाली लड़की; अपूथक् --समान; धर्म--व्यापार; शीला--अच्छे आचरण वाली; इयम्--यह; भूयात्--हो; पत्ती--पली;अर्पित-आशया--पूर्णतया समर्पित
तुम सभी भाई भक्त तथा अपने पिता के आज्ञाकारी पुत्र होने के कारण समान स्वभाव वालेहो।
यह लड़की भी उसी तरह की है और तुम सबके प्रति समर्पित है।
अत: यह लड़की तथा तुमप्राचीनबर्हिषत् के सारे पुत्र एक ही नियम से बँधे होकर समान पद पर स्थित हो।
"
दिव्यवर्षसहस्त्राणां सहस्त्रमहतौजस: ।
भौमान्भोक्ष्यथ भोगान्वै दिव्यां श्वानुग्रहान्मम ॥
१७॥
दिव्य--स्वर्गिक; वर्ष--वर्ष; सहस्त्राणामू--हजारों का; सहस्त्रमू--एक हजार; अहत--अपराजित रहकर; ओजस: --तुम्हाराबल; भौमान्--इस संसार का; भोक्ष्यथ-- भोगोगे; भोगानू--सुख; बै--निश्चय ही; दिव्यान्ू--स्वर्गलोक का; च--भी;अनुग्रहात्--कृपा से; मम--मेरी |
तब भगवान् ने सभी प्रचेताओं को आशीर्वाद दिया: हे राजकुमारो, मेरे अनुग्रह से तुम इससंसार की तथा स्वर्ग की सभी सुविधाओं को भोग सकते हो।
तुम उन्हें बिना किसी बाधा केपूर्ण समर्थ रहते हुए दस लाख दिव्य वर्षो तक भोग सकते हो।
"
अथ मय्यनपायिन्या भक््त्या पक््वगुणाशया: ।
उपयास्यथ मद्धाम निर्विद्या निर्यादत: ॥
१८ ॥
अथ--अत:; मयि--मुझमें; अनपायिन्या--अविचल; भकत्या-- भक्ति से; पक््व-गुण-- भौतिक कल्मष से रहित; आशया: --मन; उपयास्यथ-प्राप्त करोगे; मत्-धाम--मेरा धाम; निर्विद्य--विरक्त होकर; निरयात्--संसार से; अत:--इस प्रकार
तत्पश्चात् तुम मेरे प्रति शुद्ध भक्ति विकसित करोगे और समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त होजाओगे।
उस समय तथाकथित स्वर्गलोक तथा नरकलोक में भौतिक भोगों से विरक्त होकर तुममेरे धाम को लौटोगे।
"
गृहेष्वाविशतां चापि पुंसां कुशलकर्मणाम् ।
मद्वार्तायातयामानां न बन्धाय गृहा मता: ॥
१९॥
गृहेषु--गृहस्थ जीवन में; आविशताम्--प्रविष्ट हुए; च--तथा; अपि-- भी; पुंसामू--मनुष्यों का; कुशल-कर्मणाम्--शुभ कर्मोंमें लगे हुए; मत्-वार्ता--मेरी कथाओं में; यात--बीतता है; यामानाम्--जिसका प्रत्येक क्षण; न--नहीं; बन्धाय--बन्धन हेतु;गृहा:--गृहस्थ जीवन; मता:--विचार किया गया।
जो लोग भक्ति के शुभ कार्यों में लगे होते हैं, वे यह भलीभाँति समझते हैं कि पूर्णपुरुषोत्तम भगवान् ही समस्त कर्मो के परम भोक्ता हैं।
अतः जब भी ऐसा व्यक्ति कोई कार्यकरता है, तो कर्मफल भगवान् को अर्पित कर देता है और भगवान् की कथाओं में व्यस्त रहतेहुए ही सारा जीवन बिताता है।
ऐसा व्यक्ति गृहस्था भ्रम में रह कर भी कर्मफलों से प्रभावित नहींहोता।
"
नव्यवद्धृदये यज्जञो ब्रहौतद्रह्मवादिभि: ।
न मुहान्ति न शोचन्ति न हृष्यन्ति यतो गता: ॥
२०॥
नव्य-वत्--सदैव नवीन; हृदये--हृदय में; यत्--क्योंकि; ज्ञ:--परमात्मा, परम ज्ञाता; ब्रह्म--ब्रह; एतत्--यह; ब्रह्म-वादिभिः--परम सत्य के पक्षधरों द्वारा; न--कभी नहीं; मुहान्ति--मोहग्रस्त होते हैं; न--कभी नहीं; शोचन्ति--पश्चात्ताप करतेहैं; न--कभी नहीं; हष्यन्ति--हर्षित होते हैं; यत:--जब; गता:--प्राप्त किये हुए।
सदैव भक्ति कार्यों में संलग्न रह कर भक्तजन अपने आपको ताजा तथा अपने कार्यों मेंसदैव नवीन ( नया नया ) अनुभव करते हैं।
भक्त के हृदय के भीतर सर्वज्ञाता परमात्मा प्रत्येकवस्तु को अधिकाधिक नया बनाता रहता है।
परम सत्य के पश्षधर ( ब्रह्मवादी ) इसे ब्रह्मभूतकहते हैं।
ऐसी ब्रह्मभूत अर्थात् मुक्त अवस्था में मनुष्य कभी मोहग्रस्त नहीं होता।
न ही वहपश्चात्ताप करता है, न वृथा ही हर्षित होता है।
यह ब्रह्मभूत अवस्था के कारण होता है।
"
मैत्रेय उवाचएवं ब्रुवाणं पुरुषार्थभाजनंजनार्दन॑ प्राज्ललय: प्रचेतसः ।
तदर्शनध्वस्ततमोरजोमलागिरागृणन्गद्गदया सुहत्तमम् ॥
२१॥
मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; एवम्--इस प्रकार; ब्रुवाणम्--बोलते हुए; पुरुष-अर्थ--जीवन के परम लक्ष्य का; भाजनम्--दाता; जन-अर्दनम्ू--भक्त के समस्त अवगुणों को दूर करने वाला; प्राज्ललय:--हाथ जोड़ कर; प्रचेतस:--प्रचेतागण ; तत्--उसको; दर्शन--देखकर; ध्वस्त--नष्ट; तम: --तमोगुण का; रज:--रजोगुण का; मला:--मल, कल्मष; गिरा--वाणी से;अगृणन्-प्रार्थना की; गदगदया--गद्गद होकर; सुहत्-तमम्--समस्त मित्रों में श्रेष्ठ को |
मैत्रेय ऋषि ने कहा : भगवान् के इस प्रकार कहने पर प्रचेताओं ने उनकी प्रार्थना की।
भगवान् जीवन की समस्त सिद्ध््रियों को देने वाले और परम कल्याणकर्ता हैं।
वे परम मित्र भीहैं, क्योंकि वे भक्तों के समस्त कष्टों को हरते हैं।
प्रचेताओं ने आनन्दातिरिक से गद्गद वाणी मेंप्रार्थना करनी प्रारम्भ की।
वे भगवान् का साक्षात् दर्शन करने से शुद्ध हो गये।
"
प्रचेतस ऊचु:नमो नमः क्लेशविनाशनायनिरूपितोदारगुणाहयाय ।
मनोवचोवेगपुरोजवायसर्वाक्षमार्गरगताध्वने नम: ॥
२२॥
प्रचेतस: ऊचुः--प्रचेताओं ने कहा; नम:ः--नमस्कार है; नमः--नमस्कार है; क्लेश-- भौतिक दुख; विनाशनाय--दूर करनेवाले को; निरूपित--निर्णीत; उदार--उदार; गुण--गुण; आह्ृयाय--नाम वाले को; मन:--मन का; वच: --वाणी का;वेग--चाल; पुर:--सामने; जवाय--गति वाले को; सर्व-अक्ष--सभी इन्द्रियों के; मार्ग:--रास्तों से; अगत-- अदृश्य;अध्वने--जिसका मार्ग; नम:--हम नमस्कार करते हैं।
प्रचेताओं ने कहा : हे भगवन्, आप समस्त प्रकार के क्लेशों को हरने वाले हैं।
आपके उदारदिव्य गुण तथा पवित्र नाम कल्याणप्रद हैं।
इसका निर्णय पहले ही हो चुका है।
आप मन तथावाणी से भी अधिक वेग से जा सकते हैं।
आप भौतिक इन्द्रियों द्वारा नहीं देखे जा सकत।
अतःहम आपको बारम्बार सादर नमस्कार करते हैं।
"
शुद्धाय शान्ताय नमः स्वनिष्ठयामनस्यपार्थ विलसद्द्वयाय ।
नमो जगत्स्थानलयोदयेषुगृहीतमायागुणविग्रहाय ॥
२३॥
शुद्धाय--शुद्ध रूप को; शान्ताय--अत्यन्त शान्त रूप को; नम:ः--नमस्कार है; स्व-निष्ठया-- अपने पद पर स्थित रह कर;मनसि--मन में; अपार्थम्--अर्थहीन, निरर्थ; विलसत्--प्रकट होते हुए; द्वयाय--द्वैत जगत वाले को; नम: --नमस्कार;जगत्--हृश्य जगत का; स्थान--पालन ( स्थिति ); लय--संहार; उदयेषु--तथा उत्पत्ति के लिए; गृहीत--स्वीकृत; माया--भौतिक; गुण--प्रकृति के गुणों के; विग्रहाय--रूपों को |
हे भगवन्, हम आपको प्रणाम करने की याचना करते हैं।
जब मन आप में स्थिर होते हैं, तोयह द्वैतपूर्ण संसार भौतिक सुख का स्थान होते हुए भी व्यर्थ प्रतीत होता है।
आपका दिव्य रूपदिव्य आनन्द से पूर्ण है।
अतः हम आपका अभिवादन करते हैं।
ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव के रूपमें आपका प्राकट्य इस दृश्य जगत की उत्पत्ति, पालन तथा संहार के उद्देश्य से होता है।
"
नमो विशुद्धसत्त्वाय हरये हरिमेधसे ।
वासुदेवाय कृष्णाय प्रभवे सर्वसात्वताम् ॥
२४॥
नमः--नमस्कार; विशुद्ध-सत्त्वाय-- आपको जिसका अस्तित्व समस्त भौतिक प्रभाव से मुक्त है; हरये--भक्तों के कष्टों को हरनेवाला; हरि-मेधसे--जिसका मस्तिष्क बद्धजीव के उद्धार हेतु कार्य करता है; वासुदेवाय--सर्वव्यापी भगवान् को; कृष्णाय--कृष्ण को; प्रभवे--प्रभाव को बढ़ाने वाला; सर्व-सात्वताम्--सभी प्रकार के भक्तों का |
हे भगवन्, हम आपको सादर नमस्कार करते हैं, क्योंकि आपका अस्तित्व समस्त भौतिकप्रभावों से पूर्णतया स्वतंत्र है।
आप सदैव अपने भक्तों के क्लेशों को हर लेते हैं, क्योंकि आपकामस्तिष्क जानता है कि ऐसा किस प्रकार करना चाहिए।
आप परमात्मा रूप में सर्वत्र रहते हैं,अतः आप वासुदेव कहलाते हैं।
आप वसुदेव को अपना पिता मानते हैं और आप कृष्ण नाम सेविख्यात हैं।
आप इतने दयालु हैं कि अपने समस्त प्रकार के भक्तों के प्रभाव को बढ़ाते हैं।
"
नमः कमलनाभाय नमः कमलमालिने ।
नमः कमलपादाय नमस्ते कमलेक्षण ॥
२५॥
" नमः--सादर नमस्कार है; कमल-नाभाय-- भगवान् को जिनकी नाभि से आदि कमल पुष्प प्रकट हुआ; नम:--नमस्कार;कमल-मालिने--कमल पुष्प की माला धारण करने वाला; नम:--नमस्कार; कमल-पादाय--जिसके चरणकमल पुष्प केसमान सुन्दर तथा सुगन्धित हैं; नमः ते--आपको नमस्कार है; कमल-ईक्षण--जिनके नेत्र कमल की पंखड़ियों के सहश हैं|
हे भगवन्, हम आपको सादर नमस्कार करते हैं, क्योंकि आपकी ही नाभि से कमल पुष्पनिकलता है, जो समस्त जीवों का उद्गम है।
आप सदैव कमल की माला से सुशोभित रहते हैंऔर आपके चरण सुगंधित कमल पुष्प के समान हैं।
आपके नेत्र भी कमल पुष्प की पंखड़ियोंके सहृश हैं, अतः हम आपको सदा ही सादर नमस्कार करते हैं।
"
नमः कमलकिड्धल्कपिशड्जमलवाससे ।
सर्वभूतनिवासाय नमोयुद्छ्ष्महि साक्षिणे ॥
२६॥
नमः--नमस्कार; कमल-किज्लल्क--कमल पुष्प के केसर के समान; पिशड्र---पीला; अमल--स्वच्छ; वाससे --उसकोजिसका वस्त्र; सर्व-भूत--समस्त जीवों के; निवासाय--आश्रय को; नम:ः--नमस्कार; अयुद्छमहि --करने दो; साक्षिणे--परमसाक्षी को।
हे भगवन्, आपके द्वारा धारण किया गया वस्त्र कमल पुष्प के केसर के समान पीले रंग काहै, किन्तु यह किसी भौतिक पदार्थ का बना हुआ नहीं है।
प्रत्येक हृदय में निवास करने केश़ कारण आप समस्त जीवों के समस्त कार्यो के प्रत्यक्ष साक्षी हैं।
हम आपको पुनःपुनः सादरनमस्कार करते हैं।
"
रूपं भगवता त्वेतदशेषक्लेशसड्क्षयम् ।
आविष्कृतं नः क्लिष्टानां किमन्यदनुकम्पितम् ॥
२७॥
रूपम्--स्वरूप; भगवता--आप भगवान् द्वारा; तु--लेकिन; एतत्--यह; अशेष--अनन्त; क्लेश--कष्ट; सड्क्षयम्-- भगानेके लिए; आविष्कृतम्--प्रकट; न:--हम सबका; क्लिष्टानामू-- भौतिक दशाओं से कष्ट पाने वालों का; किम् अन्यत्--क्याकहें; अनुकम्पितम्ू--जिन पर आपकी कृपा रहती है।
हे भगवन्, हम बद्धजीव देहात्मबुद्धि के कारण सदैव अज्ञान से घिरे रहते हैं, अतः हमेंभौतिक जगत के क्लेश ही सदैव प्रिय लगते हैं।
इन क्लेशों से हमारा उद्धार करने के लिए हीआपने इस दिव्य रूप में अवतार लिया है।
यह हम-जैसे कष्ट भोगने वालों पर आपकी अनन्तअहैतुकी कृपा का प्रमाण है।
तो फिर उन भक्तों के विषय में कया कहें जिनके प्रति आप सदैव" कृपालु रहते हैं ?एतावत्त्वं हि विभुभिर्भाव्यं दीनेषु वत्सलै: ।
यदनुस्मर्यते काले स्वबुद्धयाभद्ररन्धन ॥
२८॥
एतावत्--इस प्रकार; त्वमू--तुम; हि--निश्चय ही; विभुभि:--अंशों के द्वारा; भाव्यम्ू--समझाने के लिए; दीनेषु--दीन भक्तोंके; वत्सलैः--दयालु; यत्--जो; अनुस्मर्यते--स्मरण किया जाता है; काले--समय के आने पर; स्व-बुद्धया-- अपनी भक्तिसे; अभद्र-रन्धन--हे समस्त अमंगल के विनाशकर्ता, अमंगलहारी।
हे भगवन्, आप समस्त अमंगल के विनाशकर्ता हैं।
आप अपने अर्चा-विग्रह विस्तार केद्वारा अपने दीन भक्तों पर दया करने वाले हैं।
आप हम सबों को अपना शाश्वत दास समझें।
"
येनोपशान्तिर्भूतानां क्षुल्लकानामपीहताम् ।
अन्तर्हितोन्तहंदये कस्मान्नो वेद नाशिष: ॥
२९॥
येन--जिस विधि से; उपशान्ति:--समस्त इच्छाओं की संतुष्टि; भूतानामू--जीवों की; क्षुल्लकानाम्--अत्यन्त पतितों की;अपि--यद्यपि; ईहताम्--अनेक वस्तुओं की कामना करते हुए; अन्तर्हित:--छिपे हुए; अन्त:-हृदये--हृदय के भीतर;कस्मात्--क्यों; नः--हमारे; वेद-- जानता है; न--नहीं; आशिष:--इच्छाएँ |
जब भगवान् अपनी सहज दया से अपने भक्त के विषय में सोचते हैं, तो उस विधि से हीनवदीक्षित भक्तों की सारी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं।
जीव के अत्यन्त तुच्छ होने पर भी भगवान्प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं।
भगवान् जीव के सम्बन्ध में प्रत्येक बात, यहाँ तक कि उसकीसमस्त इच्छाओं, को भी जानते रहते हैं।
यद्यपि हम अत्यन्त तुच्छ जीव हैं फिर भी भगवान् हमारीइच्छाओं को क्यों नहीं जानेंगे ?"
असावेव वरोउस्माकमीप्सितो जगत: पते ।
प्रसन्नो भगवान्येषामपवर्गगुरुर्गति: ॥
३०॥
असौ--उस; एव--निश्चय ही; बर:--वर; अस्माकम्--हमारा; ईप्सित:--इच्छित; जगत: --ब्रह्माण्ड के ; पते--हे स्वामी;प्रसन्न:--प्रसन्न, तुष्ट; भगवान्-- भगवान्; येषाम्--जिसके साथ; अपवर्ग--दिव्य प्रेमा भक्ति का; गुरुः--शिक्षक; गति:--जीवन का चरम लक्ष्य।
हे जगत् के स्वामी, आप भक्तियोग के वास्तविक शिक्षक हैं।
हमें सन््तोष है कि हमारे जीवनके परमलक्ष्य आप हैं और हम प्रार्थना करते हैं कि आप हम पर प्रसन्न हों।
यही हमारा अभीष्ट वरहै।
हम आपकी पूर्ण प्रसन्नता के अतिरिक्त और कुछ भी कामना नहीं करते।
"
किवरं वृणीमहेथापि नाथ त्वत्परत: परात् ।
न हान्तस्त्वद्विभूतीनां सोइनन्त इति गीयसे ॥
३१॥
वरम्--वर; वृणीमहे--माँगेंगे; अथ अपि--अतः ; नाथ--हे स्वामी; त्वत्ू--तुमसे ( आपसे ); परतः परात्--प्रकृति आदि से परे;न--नहीं; हि--निश्चय ही; अन्त: --अन्त; त्वत्--तुम्हारे; विभूतीनाम्--ऐ श्वर्य का; सः--वह ( तुम ); अनन्त:-- अनन्त; इति--इस प्रकार; गीयसे--विख्यात हो |
अतः हे स्वामी, हम आपसे वर देने के लिए प्रार्थना करेंगे, क्योंकि आप समस्त दिव्य प्रकृतिसे परे हैं और आपके ऐश्वर्यों का कोई अन्त नहीं है।
अतः आप अनन्त नाम से विख्यात हैं।
"
पारिजातेझ्जसा लब्धे सारड्लेउन्यन्न सेवते ।
त्वदड्घ्रिमूलमासाद्य साक्षात्कि कि वृणीमहि ॥
३२॥
पारिजाते--पारिजात नामक नैसर्गिक वृक्ष; अज्ञसा--पूर्णतया; लब्धे--प्राप्त करके; सारड्र:--भौंरा; अन्यत्ू--अन्यत्र; नसेवते--सेवन नहीं करता; त्वत्-अड्प्रि--तुम्हिरे चरणकमल; मूलम्-- प्रत्येक वस्तु के मूलाधार तक; आसाद्य--पहुँच कर;साक्षात्- प्रत्यक्ष; किमू--क्या; किम्--क्या; वृणीमहि--माँगें |
हे स्वामी, जब भौंरा दिव्य पारिजात वृक्ष के निकट पहुँच जाता है, तो वह उसे कभी नहींछोड़ता क्योंकि उसे ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती।
इसी प्रकार जब हमनेआपके चरणकमलों की शरण ग्रहण की है, तो हमें और कया वर माँगने की आवश्यकता है?"
यावत्ते मायया स्पृष्टा भ्रमाम इह कर्मभि: ।
तावद्धवद्प्रसड़ानां सड्ढः स्थान्नो भवे भवे ॥
३३॥
यावत्--जब तक; ते--तुम्हारी ( आपकी ); मायया--माया से; स्पृष्टा:--दूषित; भ्रमाम: --हम घूमते हैं; इह--इस संसार में;कर्मभि:--कर्मो के कारण; तावतू--तब तक; भवत्-प्रसड्रानामू--आपके प्रेमी भक्तों की; सड्भ:--संगति; स्यातू--हो; नः--हमारी; भवे भवे-- प्रत्येक योनि में ॥
हे स्वामी, हमारी प्रार्थना है कि जब तक हम अपने सांसारिक कल्मष के कारण इस संसारमें रहें और एक शरीर से दूसरे में तथा एक लोक से दूसरे लोक में घूमते रहें, तब्र तक हम उनकीसंगति में रहें जो आपकी लीलाओं की चर्चा करने में लगे रहते हैं।
हम जन्म-जन्मांतर विभिन्नशारीरिक रूपों में और विभिन्न लोको में इसी वर के लिए प्रार्थना करते हैं।
"
तुलयाम लवेनापि न स्वर्ग नापुनर्भवम् ।
भगवत्सड्विसड्रस्य मर्त्यानां किमुताशिष: ॥
३४॥
तुलयाम--तुलना करते हैं; लवेन-- क्षण ( लव ) से; अपि-- भी; न--नहीं; स्वर्गम्--स्वर्ग लोक की प्राप्ति; न--नहीं; अपुनः-भवम्--ब्रह्मतेज में मिलने के लिए; भगवत्-- भगवान् का; सड्डि--पार्षदों से; सड्रस्थ--संगति का; मर्त्यानाम्ू--मनुष्यों का,जो मरणशील हैं; किम् उत--क्या कम है; आशिष:--आशीर्वाद, वर।
एक क्षण की भी शुद्ध भक्त की संगति के सामने स्वर्गलोक जाने अथवा पूर्ण मोक्ष पा करब्रह्मतेज में मिलने ( कैवल्य ) की कोई तुलना नहीं की जा सकती है।
शरीर को त्याग कर मरनेवाले जीवों के लिए सर्वश्रेष्ठ वर तो शुद्ध भक्तों की संगति है।
"
यत्रेड्यन्ते कथा मृष्टास्तृष्णाया: प्रशमो यतः ।
निर्वैरं यत्र भूतेषु नोद्वेगो यत्र कश्चन ॥
३५॥
यत्र नारायण: साक्षाद्धगवाज्ञ्यासिनां गति: ।
संस्तूयते सत्कथासु मुक्तसड्लैः पुनः पुनः ॥
३६॥
यत्र--जहाँ; नारायण: -- भगवान् नारायण; साक्षात्- प्रत्यक्ष; भगवान्-- भगवान्; न््यासिनामू-- संन्यासियों का; गतिः--परमलक्ष्य; संस्तूयते--पूजा की जाती है; सत्ू-कथासु--अच्छे अच्छे कथा प्रसंगों द्वारा; मुक्त-सद्डैः-- भव कल्मष से मुक्त व्यक्तियोंद्वारा; पुनः पुन:--बारम्बार |
जहाँ भक्तों के बीच भगवान् के पवित्र नाम का श्रवण तथा कीर्तन चलता रहता है, वहाँभगवान् नारायण उपस्थित रहते हैं।
संन्यासियों के चरम लक्ष्य भगवान् नारायण ही हैं औरनारायण की पूजा उन व्यक्तियों द्वारा इस संकीर्तन आन्दोलन के माध्यम से की जाती है, जोभौतिक कल्मष से मुक्त हो चुके हैं।
वे बारम्बार भगवान् के पवित्र नाम का उच्चारण करते हैं।
"
तेषां विचरतां पद्भ्यां तीर्थानां पावनेच्छया ।
भीतस्य कि न रोचेत तावकानां समागम: ॥
३७॥
तेषाम्--उनका; विचरताम्--विचरण करने वालों का; पद्भ्याम्-अपने पाँवों से; तीर्थानाम्--पवित्र स्थानों का; पावन-इच्छया--पवित्र करने की इच्छा से; भीतस्य--डरे हुए संसारी पुरुष का; किम्ू--क्यों; न--नहीं; रोचेत-- अच्छा लगता है;तावकानाम्--आपके भक्तों की; समागम:ः--भेंट |
हे भगवन्, आपके पार्षद तथा भक्त संसार-भर में तीर्थस्थानों तक को पवित्र करने के लिए भ्रमण करते रहते हैं।
जो इस संसार से भयभीत हैं, क्या ऐसा कार्य इन सबके लिए रुचिकर नहींहोता?"
बयं तु साक्षाद्धगवन्भवस्यप्रियस्य सख्यु: क्षणसड्रमेन ।
सुदुश्चिकित्स्यस्थ भवस्य मृत्योर्भिषक्तमं त्वाद्य गतिं गता: सम ॥
३८॥
वयम्--हम; तु--तब; साक्षात्- प्रत्यक्ष; भगवन्--हे स्वामी; भवस्य--शिवजी की; प्रियस्य--अत्यन्त प्रिय; सख्यु:--आपकेमित्र; क्षण-- क्षण भर के; सड्भमेन--संगति से; सुदुश्चिकित्स्यस्थ--जिसका उपचार कर पाना अत्यन्त दुष्कर है; भवस्य--भौतिक अस्तित्व का; मृत्यो:--मृत्यु का; भिषक्ू-तमम्--सर्व श्रेष्ठ वैद्य; त्वा--तुम; अद्य--आज; गतिम्-- लक्ष्य; गता: -- प्राप्तकर लिया; स्म--निश्चय ही
हे भगवन्हम भाग्यशाली हैं कि आपके अत्यन्त प्रिय तथा अभिन्न मित्र शिवजी कीक्षणमात्र की संगति से हम आपको प्राप्त कर सके हैं।
आप इस संसार के असाध्य रोग काउपचार करने में समर्थ सर्वश्रेष्ठ वैद्य हैं।
हमारा सौभाग्य था कि हमें आपके चरणकमलों काआश्रय प्राप्त हो सका।
"
यन्नः स्वधीतं गुरव: प्रसादिताविप्राश्च वृद्धाश्व सदानुवृत्त्या ।
आर्या नताः सुहदो भ्रातरश्नसर्वाणि भूतान्यनसूययैव ॥
३९॥
यन्नः सुतप्तं तप एतदीशनिरन्धसां कालमदशभ्रमप्सु ।
सर्व तदेतत्पुरुषस्य भूम्नोवृणीमहे ते परितोषणाय ॥
४०॥
यत्--जो; नः--हमारे द्वारा; स्वधीतम्-- अध्ययन किया गया; गुरवः-- श्रेष्ठ व्यक्ति, गुरुजन; प्रसादिता: --प्रसन्न होने पर;विप्रा:--ब्राह्मण; च--तथा; वृद्धा:--वृद्धजन; च--तथा; सत्-आनुवृत्त्या--अपने सदाचरण से; आर्या:--श्रेष्ठजन; नता: --नमस्कार करने से; सु-हृदः --मित्रगण; भ्रातर:-- भाई; च--तथा; सर्वाणि--समस्त; भूतानि-- जीव; अनसूयया--द्वेषरहित;एव--निश्चय ही; यत्--जो; न:--हमारा; सु-तप्तम्--कठिन; तपः--तपस्या; एतत्--यह; ईश--हे भगवान्; निरन्धसाम्--निराहार; कालमू--समय तक; अदशभ्रम्-दीर्घ; अप्सु--जल के भीतर; सर्वम्--सभी; तत्--उस; एतत्-- इस; पुरुषस्थ--भगवान् का; भूम्न:--महान; वृणीमहे--वर मार्गते हैं; ते--आपका; परितोषणाय--सन्तोष के लिए
हे भगवन्, हमने वेदों का अध्ययन किया है, गुरु बनाया है और ब्राह्मणों, भक्तों तथाआध्यात्मिक दृष्टि से अत्यधिक उन्नत वरिष्ट पुरुषों को सम्मान प्रदान किया है।
हमने अपने किसीभी भाई, मित्र या अन्य किसी से ईर्ष्या नहीं की।
हमने जल के भीतर रहकर कठिन तपस्या भीकी है और दीर्घकाल तक भोजन नहीं ग्रहण किया।
हमारी ये सारी आध्यात्मिक सम्पदाएँ आपको प्रसन्न करने के लिए सादर समर्पित हैं।
हम आपसे केवल यही वर माँगते हैं, अन्य कुछभी नहीं।
"
मनुः स्वयम्भूभगवान्भवश्चयेडन्ये तपोज्ञानविशुद्धसत्त्वा: ।
अहदृष्टपारा अपि यन्महिम्नःस्तुवन्त्यथो त्वात्मसमं गृणीम: ॥
४१॥
मनुः--स्वायंभुव मनु; स्वयम्भू: --ब्रह्मा; भगवान्--अत्यन्त शक्तिमान; भव:--शिवजी; च-- भी; ये-- जो; अन्ये--अन्य;तपः--तपस्या; ज्ञान--ज्ञान द्वारा; विशुद्ध-शुद्ध; सत्त्वाः--जिसका अस्तित्व; अदृष्ट-पारा:--जो अन्त को नहीं देख सकते;अपि--यद्यपि; यत्--तुम्हारी; महिम्न:--महिमा की; स्तुवन्ति--प्रार्थना करते हैं; अथो --अतः ; त्वा--तुमको; आत्म-समम्--यथाशक्ति; गृणीमः --हमने प्रार्थना की |
हे भगवन्, तप तथा ज्ञान के कारण सिद्ध्रिप्राप्त बड़े-बड़े योगी तथा शुद्ध सत्व में स्थितलोगों के साथ-साथ मनु, ब्रह्म तथा शिव जैसे महापुरुष भी आपकी महिमा तथा शक्तियों कोपूरी तरह नहीं समझ पाते।
फिर भी वे यथाशक्ति आपकी प्रार्थना करते हैं।
उसी प्रकार हम इनमहापुरुषों से काफी क्षुद्र होते हुए भी अपने सामर्थ्य के अनुसार प्रार्थना कर रहे हैं।
"
नमः समाय शुद्धाय पुरुषाय पराय च ।
वासुदेवाय सत्त्वाय तुभ्यं भगवते नमः: ॥
४२॥
नमः--नमस्कार; समाय--सर्वसम को; शुद्धाय--जो कभी पाप कर्मों द्वारा दूषित नहीं होता; पुरुषाय--परम पुरुष को;'पराय--दिव्य; च-- भी; वासुदेवाय--सर्वत्र रहने वाले को; सत्त्वाय--उसे जो दिव्य पद को प्राप्त है; तुभ्यम्--तुमको;भगवते-- भगवान् को; नम: --नमस्कार।
हे भगवन्, आपके न तो शत्रु हैं न मित्र।
अतः आप सबों के लिए समान हैं।
आप पापकर्मोके द्वारा कलुषित नहीं होते और आपका दिव्य रूप सदैव भौतिक सृष्टि से परे है।
आप पूर्णपुरुषोत्तम भगवान् हैं, क्योंकि आप सर्वव्यापी हैं, अतः आप वासुदेव कहलाते हैं।
हम आपकोसादर नमस्कार करते हैं।
"
इति प्रचेतोभिरभिष्ठृतो हरिःप्रीतस्तथेत्याह शरण्यवत्सल: ।
अनिच्छतां यानमतृप्तचक्षुषांययौ स्वधामानपवर्गवीर्य: ॥
४३ ॥
मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; इति--इस प्रकार; प्रचेतोभि:--प्रचेताओं द्वारा; अभिष्ठत:--प्रशंसित, स्तुति करने पर; हरि: --भगवान्; प्रीत:--प्रसन्न होकर; तथा--उसी तरह; इति--इस प्रकार; आह--कहा; शरण्य--शरणागतों के लिए; वत्सल:--स्नेहभाजन; अनिच्छताम्--इच्छा न होते हुए; यानम्--विदा; अतृप्त--तृप्त नहीं हुए; चश्षुषाम्--नेत्र; ययौ--चला गया; स्व-धाम--अपने धाम को; अनपवर्ग-वीर्य:--जिनका वीर्य कभी पराजित नहीं होता, अप्रतिहत।
महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, इस प्रकार प्रचेताओं द्वारा सम्बोधित तथा पूजित होकरशरणागतों के रक्षक भगवान् ने कहा, 'तुमने जो कुछ माँगा है, वह पूरा हो।
तत्पश्चात् कभी नपराजित होनेवाले भगवान् ने विदा ली।
प्रचेतागण उनसे विलग नहीं होना चाह रहे थे, क्योंकिउन्होंने जी-भर कर उन्हें नहीं देखा था।
"
अथ निर्याय सलिलात्प्रचेतस उदन्वतः ।
वीक्ष्याकुप्यन्द्रमैरछन्नां गां गां रोद्गभुमिवोच्छिते: ॥
४४॥
अथ--त्पश्चात्; निर्याय--बाहर निकल कर; सलिलातू--जल से; प्रचेतस:--सभी प्रचेता; उदन््वत:--समुद्र के; वीक्ष्य--देखकर; अकुप्यनू--अत्यन्त क्ुद्ध हुए; ह्रमै:--वृक्षों से; छन्नामू--ढकी हुई; गाम्--पृथ्वी को; गाम्--स्वर्ग को; रोद्ुम्--रोकने के लिए; इब--मानो; उच्छितैः--अत्यन्त ऊँचे-ऊँचे |
तत्पश्चात् सभी प्रचेता समुद्र के जल से बाहर निकल आये।
तब उन्होंने देखा कि पृथ्वी (स्थल ) पर सारे वृक्ष बढ़कर काफी ऊँचे हो चुके हैं मानो वे स्वर्ग के मार्ग को रोकना चाहतेहों।
इन वृक्षों ने सारे पृथ्वीतल को आच्छादित कर रखा था।
उस समय प्रचेता अत्यन्त कुपितहुए।
"
ततोग्निमारुतौ राजन्नमुझन्मुखतो रुषा ।
महीं निर्वीरुधं कर्तु संवर्तक इवात्यये ॥
४५॥
ततः--तत्पश्चात्; अग्नि--आग; मारुतौ--तथा वायु; राजन्--हे राजन; अमुञ्जन्--निकालते हुए; मुखतः--अपने मुखों से;रुषा--क्रोध से; महीम्-पृथ्वी को; निर्वीरुधथम्--वृक्षरहित; कर्तुमू--करने के लिए; संवर्तक:--प्रलयाग्नि; इब--सहश;अत्यये--प्रलय के समय |
हे राजन, प्रलय के समय शिवजी क्रोध में आकर अपने मुख से अग्नि तथा वायु छोड़ते हैं।
प्रचेताओं ने भी पृथ्वीतल को पूर्णतः वृक्षरहित करने के लिए अपने मुखों से अग्नि तथा वायुनिकाली।
"
भस्मसात्तक्रियमाणांस्तान्द्रुमान्वीक्ष्य पितामह: ।
आगतः शमयामास पुत्रान्बर्हिष्मतो नयै: ॥
४६॥
भस्मसात्--जलकर राख होना; क्रियमाणान्ू--किया जाता हुआ; तान्ू--उन सब; द्रुमान्--वृक्षों को; वीक्ष्य--देखकर;पितामहः--ब्रह्मा; आगत:--वहाँ आया; शमयाम् आस--शान्त किया; पुत्रान्--पुत्रों को; बर्हिष्मत:--राजा बर्दिष्मान् के;नयै:--तर्क द्वारा
यह देखकर कि पृथ्वी के सारे वृक्ष जलकर राख हो रहे हैं, ब्रह्माजी तुरन्त राजा बर्हिष्मान् केपुत्रों के पास आये और उन्होंने तर्कपूर्ण शब्दों से उन्हें शान्तर किया।
"
तत्रावशिष्टा ये वृक्षा भीता दुहितरं तदा ।
उज्जहस्ते प्रचेतो भ्य उपदिष्टा: स्वयम्भुवा ॥
४७॥
तत्र--वहाँ; अवशिष्टा:--शेष, बचे हुए; ये--जो; वृक्षा:--वृक्ष; भीता:-- भयभीत; दुहितरम्-- अपनी कन्या को; तदा--उससमय; उजहु:--ला कर दे दिया; ते--उन्होंने; प्रचेतो भ्य:--प्रचेताओं को; उपदिष्टा:--उपदेश पाकर; स्वयम्भुवा--ब्रह्मा द्वारा |
बचे हुए वृक्षों ने प्रचेताओं से डर कर ब्रह्मा की राय से अपनी कन्या को लाकर तुरन्त उन्हें देदिया।
"
ते च ब्रह्मण आदेशान्मारिषामुपयेमिरे ।
यस्यां महदवज्ञानादजन्यजनयोनिजः ॥
४८ ॥
ते--वे समस्त प्रचेता; च-- भी; ब्रह्मण:--ब्रह्मा के; आदेशात्-- आदेश से; मारिषाम्-मारिषा के साथ; उपयेमिरे--ब्याह करलिया; यस्याम्ू-- जिसमें; महत्--महापुरुष को; अवज्ञानात्ू--अवज्ञा के कारण; अजनि--जन्म लिया; अजन-योनि-ज:--ब्रह्मा का पुत्र दक्ष
ब्रह्मा के आदेश से समस्त प्रचेताओं ने उस कन्या को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया।
इस कन्या के गर्भ से ब्रह्मा के पुत्र दक्ष ने जन्म लिया।
दक्ष को मारिष के गर्भ से इसलिएजन्म लेना पड़ा, क्योंकि उसने महादेवजी ( शिवजी ) की आज्ञा का उल्लंघन तथा अनादर कियाथा।
फलतः उसे दो बार शरीर त्याग करना पड़ा।
"
चाक्षुषे त्वन्तरे प्राप्ते प्राक्स्गें कालविद्गुते ।
यः ससर्ज प्रजा इष्टाः स दक्षो दैवचोदित: ॥
४९॥
चाक्षुषे--चाक्षुष नामक; तु--लेकिन; अन्तरे--मन्वन्तर; प्राप्त--आने पर; प्राक्ू--पूर्व; सर्गे--सृष्टि; काल-विद्युते--कालक्रमसे विनष्ट; यः:--जो; ससर्ज--उत्पन्न किया; प्रजा:--जीव; इष्टा:--इच्छित; सः--वह; दक्ष:--दक्ष; दैव-- भगवान् द्वारा;चोदित:-- प्रेरणा पाकर।
उसका पूर्व शरीर विनष्ट हो चुका था, किन्तु उसी दक्ष ने परमेश्वर की प्रेरणा से चाश्षुषमन्वन्तर में समस्त मनोवांछित जीवों की सृष्टि की।
"
यो जायमानः सर्वेषां तेजस्तेजस्विनां रुचा ।
स्वयोपादत्त दाक्ष्याच्च कर्मणां दक्षमब्रुवन् ॥
५०॥
तं प्रजासर्गरक्षायामनादिरभिषिच्य च ।
युयोज युयुजेउन्यां श्व स वै सर्वप्रजापतीन् ॥
५१॥
यः--जो; जायमान:--अपने जन्म के तुरन्त बाद; सर्वेषाम्--सबों का; तेज:--कान्ति; तेजस्विनामू--चमकीला; रुचा--तेजसे; स्वया--उसका; उपादत्त--ढका; दाक्ष्यात्-दक्ष होने से; च--तथा; कर्मणाम्--सकाम कर्मों में; दक्षम्--दक्ष; अब्रुवन्--'कहलाया; तम्--उसको; प्रजा--सभी जीव; सर्ग--उत्पन्न करते हुए; रक्षायामू--पालन कार्य के लिए; अनादि:--प्रथम जन्मा,ब्रह्मा; अभिषिच्य--नियुक्त करके; च-- भी; युयोज--लगाया; युयुजे--लगाया; अन्यान्--दूसरों को; च--तथा; सः--वह;वै--निश्चय ही; सर्व--सभी; प्रजा-पतीन्--
जीवों के जनकों कोजन्म लेने के बाद अपनी अद्वितीय शारीरिक कान्ति के कारण दक्ष ने अन्य सबों कीशारीरिक कान्ति को ढाँप दिया।
चूँकि वह सकाम कार्य करने में अत्यन्त पटु (दक्ष ) था,इसलिए उसका नाम दक्ष पड़ा।
इसलिए ब्रह्मा ने उसे जीवों को उत्पन्न करने तथा उनके पालन केकार्य में लगा दिया।
समय आने पर दक्ष ने अन्य प्रजापतियों को भी उत्पत्ति तथा पालन के कार्यमें नियुक्त कर दिया।
"
