← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची

अध्याय इकतीसवाँ: नारद प्रचेताओं को निर्देश देते हैं

4.31मैत्रेय उवाचतत उत्पन्नविज्ञाना आश्वधोक्षजभाषितम्‌ ।

स्मरन्त आत्मजे भार्या विसृज्य प्राव्रजन्गृूहात्‌ ॥

१॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; ततः--पत्पश्चात्‌; उत्पन्न--विकसित; विज्ञाना: --पूर्ण ज्ञान से युक्त; आशु--अत्यन्त शीघ्र;अधोक्षज--भगवान्‌ द्वारा; भाषितम्‌ू--कहे गये; स्मरन्त:--याद करते हुए; आत्म-जे--अपने पुत्र के पास; भार्यामू--पली को;विसृज्य--छोड़ कर; प्रात्रजन्‌--चले गये; गृहात्‌--घर से |

महान्‌ सन्त मैत्रेय ने आगे कहा: तत्पश्चात्‌ प्रचेता हजारों वर्षो तक घर में रहे औरआध्यात्मिक चेतना में पूर्ण ज्ञान विकसित किया।

अन्त में उन्हें भगवान्‌ के आशीर्वादों की याद आई और वे अपनी पत्नी को अपने सुयोग्य पुत्र के जिम्मे छोड़कर घर से निकल पड़े।

"

दीक्षिता ब्रह्मसत्रेण सर्वभूतात्ममेधसा ।

प्रतीच्यां दिशि वेलायां सिद्धो भूद्यत्र जाजलि: ॥

२॥

दीक्षिता:--संकल्प करके; ब्रह्म-सत्रेण--परमात्मा के ज्ञान द्वारा; सर्व--समस्त; भूत--जीव; आत्म-मेधसा--आत्म ( अपने )स्वरूप को मानते हुए; प्रतीच्यामू--पश्चिमी; दिशि--दिशा में; वेलायाम्‌--समुद्र तट पर; सिद्धः--पूर्ण; अभूत्‌--हो गया;यत्र--जहाँ; जाजलि:--ऋषि जाजलिप

्रचेतागण पश्चिम दिशा में समुद्रतट की ओर गये जहाँ जाजलि ऋषि निवास कर रहे थे।

उन्होंने वह आध्यात्मिक ज्ञान पुष्ट कर लिया जिससे मनुष्य समस्त जीवों के प्रति समभाव रखनेलगता है।

इस तरह वे कृष्णभक्ति में पटु हो गये।

"

ताब्निर्जितप्राणमनोवचोहशोजितासनान्शान्तसमानविग्रहान्‌ ।

परेमले ब्रह्मणि योजितात्मन:सुरासुरेड्यो ददशे सम नारद: ॥

३॥

तान्‌ू--उन सबों को; निर्जित--पूर्णतया संयमित; प्राण--प्राणवायु ( प्राणायाम विधि से ); मन: --मन; वच:ः--वाणी; दृशः --तथा दृष्टि; जित-आसनान्‌--योगिक आसन को जीतने वाला; शान्त--शान्त; समान--सीधा; विग्रहान्‌ू--जिनके शरीर; परे--दिव्य; अमले--समस्त भौतिक कल्मष से रहित; ब्रह्मणि--ब्रह्म में; योजित--संलग्न; आत्मन:--जिनके मन; सुर-असुर-ईड्य:--देवों तथा असुरों द्वारा पूजित; ददशे--देखा; स्म-- था; नारद:--नारद मुनि ने |

योगासन का अभ्यास कर लेने पर प्रचेताओं ने प्राणवायु, मन, वाणी तथा बाह्य दृष्टि कोवश में करना सीख लिया।

इस तरह प्राणायाम विधि से वे भौतिक आसक्ति से पूर्ण रूप से मुक्तहो गये।

सीधे बैठकर वे परब्रह्म में अपने मन को केन्द्रित कर सके।

जब वे यह प्राणायाम कररहे थे तो देवताओं तथा असुरों दोनों द्वारा पूजित वन्दित नारद मुनि उन्हें देखने आये।

"

तमागतं त उत्थाय प्रणिपत्याभिनन्द्य च ।

पूजयित्वा यथादेशं सुखासीनमथाब्रुवन्‌ ॥

४॥

तम्‌--उसको; आगतम्‌--आया हुआ; ते--सभी प्रचेता; उत्थाय--उठकर; प्रणिपत्य--नमस्कार करके; अभिनन्द्य--स्वागतकरके; च-- भी; पूजयित्वा--पूजा करके; यथा आदेशम्‌--विधिपूर्वक; सुख-आसीनम्‌--सुखपूर्वक आसीन होकर; अथ--इस प्रकार; अब्लुवन्‌--उन्होंने कहा।

प्रचेताओं ने ज्योंही देखा कि नारद मुनि आये हुए हैं, वे नियमानुसार तुरन्त अपने आसनों सेखड़े हो गये।

यथा अपेक्षित तुरन्त उन्हें नमस्कार किया तथा उनकी पूजा करने लगे और जबउन्होंने देखा कि वे ठीक से आसन ग्रहण कर चुके हैं, तो उन्होंने उनसे प्रश्न पूछना प्रारम्भकिया।

"

प्रचेतस ऊचु:स्वागतं ते सुरषें उद्य दिष्ठय्या नो दर्शन गतः ।

तब अड्क्रमणं ब्रह्मन्नभयाय यथा रबे; ॥

५॥

प्रचेतस: ऊचु:--प्रचेताओं ने कहा; सु-आगतम्‌--स्वागत; ते--तुम्हारा ( तुमको ); सुर-ऋषे--हे देवर्षि; अद्य--आज;दिष्टाया--सौभाग्य से; न:--हम सबके ; दर्शनम्‌--दर्शन; गत:--आया हुआ; तव--तुम्हारा; चड्क्रमणम्‌--घूमना-फिरना,गतिविधियाँ; ब्रह्मनू--हे ब्राह्ण; अभयाय--अभय के लिए; यथा--जिस तरह; रवेः--सूर्य की |

सभी प्रचेता नारद मुनि को सम्बोधित करने लगे: हे ऋषि, हे ब्राह्मण, आशा है कि आपकोयहाँ आने में किसी प्रकार की बाधा नहीं हुई होगी।

यह हमारा परम सौभाग्य है कि हमें आपकेदर्शन हो रहे हैं।

सूर्य के चलने से लोग रात के अंधकार के भय से मुक्ति पाते हैं--यह भय चोरोंतथा उचक्कों से उत्पन्न होता है।

उसी प्रकार आपका भ्रमण सूर्य के ही समान है, क्योंकि आपसमस्त प्रकार के भय को भगाने वाले हैं।

"

यदादिष्ठं भगवता शिवेनाधोक्षजेन च ।

तदग्हेषु प्रसक्तानां प्रायशः क्षपितं प्रभो ॥

६॥

यत्‌--जो; आदिष्टम्‌ू--आदेश ( उपदेश ) दिया गया था; भगवता--महापुरुष; शिवेन--शिवजी द्वारा; अधोक्षजेन-- भगवान्‌विष्णु द्वारा; च-- भी; तत्‌--वह; गृहेषु--गृहस्थी में; प्रसक्तानामू--हम आससक्तों द्वारा; प्रायशः--लगभग, प्राय: ; क्षपितम्‌--विस्मृत; प्रभो--हे स्वामी |

हे स्वामी, हम आपको बता दें कि गृहस्थी में अत्यधिक आसक्त रहने के कारण हम शिवजीतथा भगवान्‌ विष्णु से प्राप्त उपदेशों को प्राय: भूल चुके हैं।

"

तन्नः प्रद्योतयाध्यात्मज्ञानं तत्त्वार्थदर्शनम्‌ ।

येनाञझ्जसा तरिष्यामो दुस्तरं भवसागरम्‌ ॥

७॥

तत्‌--अतः; न:--हमारे लिए; प्रद्योतय--कृपया जगाइये; अध्यात्म--दिव्य ; ज्ञानम्‌ू--ज्ञान; तत्त्व--परम सत्य; अर्थ--के हेतु;दर्शनम्‌-दर्शन शास्त्र; येन--जिससे; अद्धसा--सरलता से; तरिष्याम:--तर सकें; दुस्तरम्‌--पार करने में कठिन; भव-सागरमू--अविद्या के समुद्र को

है स्वामी, हमें दिव्य ज्ञान से प्रकाशित कीजिये जो उस प्रकाश स्तम्भ की तरह कार्य करसके जिससे हम अविद्या रूपी संसार-सागर को पार कर सकें।

"

मैत्रेय उवाचइति प्रचेतसां पृष्टो भगवान्नारदो मुनि: ।

भगवत्युत्तमश्लोक आविष्टात्माब्रवीन्रूपान्‌ ॥

८॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; इति--इस प्रकार; प्रचेतसाम्‌--प्रचेताओं द्वारा; पृष्ट:--पूछे जाने पर; भगवानू-- भगवान्‌ केमहान्‌ भक्त; नारद:--नारद ने; मुनि:ः--अत्यन्त विचारवान; भगवति-- भगवान में; उत्तम-श्लोके -- अत्यन्त ख्याति वाले;आविष्ट--मग्न; आत्मा--जिसका मन; अब्रवीत्‌--उत्तर दिया; नृपान्‌ू--राजाओं को

ऋषि मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, प्रचेताओं द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर भगवान्‌ केविचारों में निरन्तर लीन रहने वाले परम भक्त नारद ने उत्तर दिया।

"

नारद उवाचतज्जन्म तानि कर्माणि तदायुस्तन्मनो वच: ।

नृणां येन हि विश्वात्मा सेव्यते हरिरीश्वर: ॥

९॥

नारद: उवाच--नारद ने कहा; तत्‌ जन्म--वही जन्म; तानि--वे; कर्माणि--कर्म; तत्‌--वही; आयु: --उम्र; तत्‌-- वही;मनः--मन; वच:--वाणी; नृणाम्‌--मनुष्यों की; येन--जिससे; हि--निश्चय ही; विश्व-आत्मा--परमात्मा; सेव्यते--सेवितहोता है; हरिः-- भगवान्‌; ईश्वर: -- परम नियन्ता

महर्षि नारद ने कहा : जब कोई जीवात्मा परम नियन्ता भगवान्‌ की भक्ति करने के लिएजन्म लेता है, तो उसका जन्म, उसके सारे सकाम कर्म, उसकी आयु, उसका मन तथा उसकीवाणी सभी यथार्थ में सिद्ध हो जाते हैं।

"

कि जन्मभिस्त्रिभि्वेह शौक्रसावित्रयाज्ञिकै: ।

कर्मभिर्वा त्रयीप्रोक्तै: पुंसोडपि विबुधायुषा ॥

१०॥

किमू्‌--क्या लाभ; जन्मभि:--जन्मों से; त्रिभिः--तीन; वा--अथवा; इह--इस संसार में; शौक्र--वीर्य से; सावित्र--दीक्षा से;याज्ञिकैः--पूर्ण ब्राह्मण बनने से; कर्मभि:--कर्म से; वा--अथवा; त्रयी--वेदों में; प्रोक्तै:--उपदिष्ट; पुंस:--मनुष्य को;अपि--भी; विबुध--देवताओं की; आयुषा--आयु सेसुसंस्कारी मनुष्य के तीन प्रकार के जन्म होते हैं।

पहला जन्म शुद्ध माता-पिता से होता है,जिसे वीर्य द्वारा जन्म ( शौक्र ) कहते हैं।

दूसरा जन्म गुरु से दीक्षा लेते समय होता है और यह'सावित्र' कहलाता है।

तीसरा जन्म 'याज्ञिक' कहलाता है और यह भगवान्‌ विष्णु की पूजा काअवसर मिलने पर होता है।

ऐसे जन्म लेने के अवसर प्राप्त होने पर भी यदि किसी को किसीदेवता की भी आयु मिल जाये और वह वस्तुतः भगवान्‌ की सेवा में रत न हो तो सब कुछ व्यर्थहो जाता है।

इसी प्रकार कर्म चाहे सांसारिक हों या आध्यात्मिक, यदि वे भगवान्‌ को प्रसन्नकरने हेतु न हों तो वे व्यर्थ हैं।

"

श्रुतेन तपसा वा कि वचोभिभश्ित्तवृत्तिभि: ।

बुद्धया वा कि निपुणया बलेनेन्द्रियगाधसा ॥

११॥

श्रुतेन--वैदिक शिक्षा से; तपसा--तपस्या से; वा--अथवा; किम्‌--क्या अर्थ; वचोभि:--वाणी से; चित्त--चेतना का;वृत्तिभि:--व्यापार से; बुद्धय्ा--बुद्धि से; वा--अथवा; किम्‌--क्या लाभ; निपुणया--निपुण, पटु; बलेन--बल से; इन्द्रिय-राधसा--इन्द्रियों की शक्ति से।

भक्ति के बिना कठिन तपस्या, सुनने, बोलने की शक्ति, चिन्तन शक्ति, उच्च ज्ञान, बल तथाइन्द्रियों की शक्ति का कोई अर्थ नहीं रह जाता।

"

कि वा योगेन साड्ख्येन न्‍्यासस्वाध्याययोरपि ।

कि वा श्रेयोभिरन्यैश्व न यत्रात्मप्रदो हरि: ॥

१२॥

किमू्‌--क्या लाभ; वा--अथवा; योगेन--योगाभ्यास द्वारा; साड्ख्येन--सांख्य दर्शन के अध्ययन से; न्यास--संन्यास ग्रहणकरने से; स्वाध्याययो:--तथा वैदिक साहित्य के अध्ययन से; अपि-- भी; किमू-- क्या लाभ; वा--अथवा; श्रेयोभि:--शुभकर्मों द्वारा; अन्यै:-- अन्य; च--तथा; न--कभी नहीं; यत्र--जहाँ; आत्म-प्रदः --आत्मा की तुष्टि; हरिः-- भगवान्‌

जो दिव्य विधिविधान पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ का साक्षात्कार कराने में सहायक नहीं होते,वे व्यर्थ हैं, चाहे वह योगाभ्यास हो या पदार्थ का वैश्लेषिक अध्ययन, कठिन तपस्या, संन्यासग्रहण करना या कि वैदिक साहित्य का अध्ययन हो।

भले ही ये आध्यात्मिक प्रगति के महत्त्वपूर्ण पक्ष क्यों न हों, किन्तु जब तक कोई भगवान्‌ हरि को नहीं जान लेता ये सारी विधियाँव्यर्थ हैं।

"

श्रेयसामपि सर्वेषामात्मा हावधिरर्थतः ।

सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्मात्मद: प्रियः ॥

१३॥

श्रेयसाम्‌ू-शुभ कार्यों का; अपि--निश्चय ही; सर्वेषाम्‌--समस्त; आत्मा--आत्मा; हि--निश्चय ही; अवधि:--लक्ष्य;अर्थतः--वास्तव में; सर्वेषामू--सभी; अपि--निश्चय ही; भूतानाम्‌--जीवों का; हरिः:-- भगवान्‌; आत्मा--परमात्मा; आत्म-दः--मूल पहचान प्रदान करने वाला; प्रिय:--प्रिय |

यथार्थ रूप में भगवान्‌ ही समस्त आत्म-साक्षात्कार के मूल स्त्रोत हैं।

फलतः समस्त शुभकार्यो--कर्म, ज्ञान, योग तथा भक्ति--का लक्ष्य भगवान्‌ हैं।

"

तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखा: ।

प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणांतथेव सर्वा्हणमच्युतेज्या ॥

१४॥

यथा--जिस प्रकार; तरोः--वृक्ष की; मूल--जड़; निषेचनेन--सींचने से; तृप्यन्ति--संतुष्ट हो जाते हैं; तत्‌--इसके; स्कन्ध--तना; भुज--शाखाएँ; उपशाखा:--टहनियाँ; प्राण--प्राण वायु; उपहारात्‌-- भोजन करने से; च--तथा; यथा--जिस तरह;इन्द्रियाणाम्‌--इन्द्रियों का; तथा एब--उसी तरह; सर्व--सभी देवताओं की; अर्हणम्‌--पूजा; अच्युत-- भगवान्‌ की; इज्या--पूजा।

जिस तरह वृक्ष की जड़ को सींचने से तना, शाखाएँ तथा टहनियाँ पुष्ट होती हैं और जिसतरह पेट को भोजन देने से शरीर की इन्द्रियाँ तथा अंग प्राणवान्‌ बनते हैं उसी प्रकार भक्ति द्वाराभगवान्‌ की पूजा करने से भगवान्‌ के ही अंग रूप सभी देवता स्वतः तुष्ट हो जाते हैं।

"

यथैव सूर्यात्प्रभवन्ति वार:पुनश्च तस्मिन्प्रविशन्ति काले ।

भूतानि भूमौ स्थिरजड्रमानितथा हरावेव गुणप्रवाह: ॥

१५॥

यथा--जिस तरह; एव--निश्चय ही; सूर्यात्‌--सूर्य से; प्रभवन्ति--उत्पन्न होता है; वार:--जल; पुनः--फिर से; च--तथा;तस्मिन्‌--उसमें; प्रविशन्ति--प्रवेश कर जाता है; काले--कालक्रम से; भूतानि--समस्त जीव; भूमौ--पृथ्वी पर; स्थिर--अचर; जड़मानि--तथा चर; तथा--उसी प्रकार; हरौ--भगवान्‌ में; एब--निश्चय ही; गुण-प्रवाह:--भौतिक प्रकृति काउद्भव

वर्षा काल में सूर्य से जल उत्पन्न होता है और कालक्रम में अर्थात्‌ ग्रीष्मकाल में वही जलसूर्य द्वारा पुन सोख लिया जाता है।

इसी प्रकार समस्त चर तथा अचर जीव इस पृथ्वी से उत्पन्नहोते हैं और कुछ काल के पश्चात्‌ वे पुनः पृथ्वी में धूल के रूप में मिल जाते हैं।

इसी प्रकार सेप्रत्येक वस्तु श्रीभगवान्‌ से उदभूत होती है और कालक्रम से पुनः उन्हीं में लीन हो जाती है।

"

एतत्पदं तज्जगदात्मनः परसकृद्धिभातं सवितुर्यथा प्रभा ।

यथासवो जाग्रति सुप्तशक्तयोद्रव्यक्रियाज्ञानभिदाभ्रमात्यय: ॥

१६॥

एतत्‌--यह दृश्य जगत; पदम्‌--निवास स्थान; तत्‌--वह; जगत्‌-आत्मन:-- भगवान्‌ का; परम्‌--दिव्य; सकृत्‌ू--क भी-कभी;विभातमू-- प्रकट होने वाला; सवितु:--सूर्य का; यथा--जिस प्रकार; प्रभा--सूर्य प्रकाश; यथा--जिस प्रकार; असब:--इन्द्रियाँ; जाग्रति--प्रकट होती हैं; सुप्त--निष्क्रिय; शक्तय: --शक्तियाँ; द्रव्य-- भौतिक तत्त्व; क्रिया--कर्म; ज्ञान--ज्ञान;भिदा-भ्रम-- भ्रम से उत्पन्न अन्तर; अत्यय: --लुप्त हो जाते हैं।

जिस प्रकार सूर्य-प्रकाश सूर्य से अभिन्न है, उसी प्रकार यह दृश्य जगत भी भगवान्‌ सेअभिन्न है।

अतः भगवान्‌ इस भौतिक सृष्टि के भीतर सर्वत्र व्याप्त हैं।

जब इन्द्रियाँ चेतन रहती हैं,तो वे शरीर के अंगस्वरूप प्रतीत होती हैं, किन्तु जब शरीर सोया रहता है, तो सारी क्रियाएँ अव्यक्त होती हैं।

इसी प्रकार सारा दृश्य जगत भिन्न प्रतीत होने पर भी परम पुरुष से अभिन्न है।

"

यथा नभस्यभ्रतम:प्रकाशाभवन्ति भूपा न भवन्त्यनुक्रमात्‌ ।

एवं परे ब्रह्मणि शक्तयस्त्वमूरजस्तम: सत्त्वमिति प्रवाह: ॥

१७॥

यथा--जिस तरह; नभसि--आकाश में; अभ्र--बादल; तम:--अंधकार; प्रकाशा:--तथा प्रकाश; भवन्ति--विद्यमान रहते हैं;भू-पा:ः--हे राजाओं; न भवन्ति--प्रकट नहीं होते; अनुक्रमात्‌--क्रम से; एबम्‌--इस प्रकार; परे--परम; ब्रह्मणि--ब्रह्म में;शक्तय:--शक्तियाँ; तु--तब; अमू:--वे; रज:--रजोगुण; तम:ः--तमोगुण; सत्त्वम्‌ू--सतोगुण; इति--इस प्रकार; प्रवाह: --प्राकट्य, प्रवाह

है राजाओ, आकाश में कभी बादल, कभी अंधकार और कभी प्रकाश रहता है।

इनकाप्राकट्य एक क्रम से होता रहता है।

इसी तरह सतो, रजो तथा तमोगुण परब्रह्म में क्रमश: शक्तिरूप में प्रकट होते हैं।

कभी वे प्रकट होते हैं, तो कभी लुप्त होते हैं।

"

तेनैकमात्मानमशेषदेहिनांकाल प्रधानं पुरुष परेशम्‌ ।

स्वतेजसा ध्वस्तगुणप्रवाहम्‌आत्मैकभावेन भजध्वमद्धा ॥

१८॥

तेन--अतः; एकम्‌--एक; आत्मानम्‌--परमात्मा को; अशेष-- अनन्त; देहिनामू--जीवों का; कालम्‌--काल, समय;प्रधानम्‌-- भौतिक कारण; पुरुषम्‌--परम पुरुष; पर-ईशम्‌--दिव्य नियन्ता; स्व-तेजसा--अपनी आध्यात्मिक शक्ति से;ध्वस्त--विलग; गुण-प्रवाहम्‌-- भौतिक प्रवाह से; आत्म--आत्मा; एक-भावेन--एक के रूप में स्वीकार करने से;भजध्वम्‌-भक्ति में लगो; अद्धा-प्रत्यक्ष ।

चूँकि परमेश्वर समस्त कारणों के कारण हैं, अतः वे समस्त जीवों के परमात्मा हैं और वेनिकटवर्ती तथा सुदूर कारण हैं।

चूँकि वे भौतिक प्रसर्जनों से विलग हैं, अतः वे उनकी अन्योन्यक्रियाओं से मुक्त हैं और प्रकृति के स्वामी हैं।

अतः तुम्हें उनसे गुणात्मक रूप से अपने आपकोअभिन्न मानते हुए उनकी सेवा करनी चाहिए।

"

दयया सर्वभूतेषु सन्तुष्टठया येन केन वा ।

सर्वेन्द्रियोपशान्त्या च तुष्यत्याशु जनार्दन: ॥

१९॥

दयया--दया दिखाने से; सर्व-भूतेषु--समस्त जीवों पर; सन्तुष्टठया--सन्तुष्ट होने से; येन केन वा--किसी न किसी तरह; सर्व-इन्द्रिय--समस्त इन्द्रियाँ; उपशान्त्या--वश में करके; च-- भी; तुष्यति--सन्तुष्ट होता है; आशु--तुरनन्‍्त; जनार्दन:--समस्तजीवों का स्वामी

समस्त जीवों पर दया करने से, येन-केन प्रकार से सन्तुष्ट रहने से तथा इन्द्रियों को वश मेंकरने से मनुष्य भगवान्‌ जनार्दन को बहुत शीघ्र संतुष्ट कर सकता है।

"

अपहतसकलैषणामलात्म-न्यविरतमेधितभावनोपहूतः ।

निजजनवशगत्वमात्मनोय-न्न सरति छिद्रवरदक्षर: सतां हि ॥

२०॥

अपहत-परास्त हुईं; सकल--सभी; एषण--इच्छाएँ; अमल--निष्कलंक; आत्मनि--मन को; अविरतम्‌--निरन्तर; एधित--बढ़ते हुए; भावना-- भव से; उपहूतः --बुलाया जाकर; निज-जन--अपने भक्तों के; वश--नियंत्रण में; गत्वम्‌--जाते हुए;आत्मन:--अपने; अयनू--जानते हुए; न--कभी नहीं; सरति--दूर चला जाता है; छिद्गर-वत्‌-- आकाश की तरह; अक्षर:--भगवान्‌; सताम्‌ू-भक्तों को; हि--निश्चय ही |

समस्त इच्छाओं के दूर हो जाने से भक्तगण समस्त मानसिक विकारों ( कल्मष ) से मुक्त होजाते हैं।

इस तरह वे भगवान्‌ का निरन्तर चिन्तन कर सकते हैं और उनको भावपूर्वक सम्बोधनकर सकते हैं।

भगवान्‌ अपने को अपने भक्तों के वश में जानते हुए उन्हें क्षण भर के लिए भीनहीं छोड़ते, जिस प्रकार सिर के ऊपर का आकाश कभी अदृश्य नहीं होता।

"

न भजति कुमनीषिणां स इज्यांहरिरधनात्मधनप्रियो रसज्ञ: ।

श्रुतधनकुलकर्मणां मद्दैर्ये विदधति पापमकिञझ्जनेषु सत्सु ॥

२१॥

न--कभी नहीं; भजति--स्वीकार करता है; कु-मनीषिणाम्‌ू--मलिन हृदय वाले पुरुषों का; सः--वह; इज्याम्‌ू--अर्पित;हरिः-- भगवान्‌; अधन--निर्धन; आत्म-धन--केवल भगवान्‌ पर आश्रित रहने वाले; प्रिय: --प्रिय; रस-ज्ञ:--जीवन के रसको स्वीकार करने वाला, रसिक; श्रुत--शिक्षा; धन--सम्पत्ति; कुल--वंश; कर्मणाम्‌--तथा कर्मो का; मदैः--गर्व से; ये--जो; विद्धति--सम्पन्न करता है; पापमू--तिरस्कार; अकिड्जनेषु--निर्धन; सत्सु-- भक्तों का।

भगवान्‌ उन भक्तों को अत्यन्य प्रिय होते हैं जिनके पास कोई भौतिक सम्पत्ति नहीं है, किन्तुजो भगवद्भक्ति को ही अपना धन मानकर प्रसन्न रहते हैं।

दरअसल, भगवान्‌ ऐसे भक्तों केभक्ति-कार्यों का आनन्द लेते हैं।

जो लोग अपनी शिक्षा, सम्पत्ति, कुलीनता और सकाम कर्मइत्यादि भौतिक वस्तुओं के मद से फूले रहते हैं, वे कभी-कभी भक्तों का उपहास करते हैं।

ऐसेलोग यदि भगवान्‌ की पूजा करते भी हैं, तो वे उसे कभी स्वीकार नहीं करते।

"

भ्रियमनुचरतीं तदर्थिनश्नद्विपदपतीन्विबुधांश्व यत्स्वपूर्ण: ।

न भजति निजभूृत्यवर्गतन्त्रःकथममुमुद्विसूजेत्पुमान्कृतज्ञ: ॥

२२॥

भ्रियम्‌--लक्ष्मी जी को; अनुचरतीम्‌--अनुसरण करने वाली; तत्‌--उसका; अर्थिन:--कृपाकांक्षी; च--तथा; द्विपद-पतीनू--मनुष्यों के स्वामी को; विबुधान्‌ू--देवताओं को; च-- भी; यत्‌--क्योंकि; स्व-पूर्ण:-- आत्मनिर्भर; न--कभी नहीं; भजति--परवाह करता है; निज--अपना; भृत्य-वर्ग--भक्तों पर; तन्त्रः--आश्रित; कथम्‌--कैसे; अमुम्‌--उसको; उद्विसृजेतू--छोड़सकता है; पुमान्‌ू--व्यक्ति; कृत-ज्ञ:--आभारी, कृतज्ञ )यद्यपि श्रीभगवान्‌ आत्मनिर्भर हैं, किन्तु वे भक्तों पर आश्वित हो जाते हैं।

वे न तो लक्ष्मी जीकी परवाह करते हैं और न उन राजाओं तथा देवताओं की जो लक्ष्मी जी के कृपाभाजन बननाचाहते हैं।

ऐसा कौन व्यक्ति होगा जो वास्तव में कृतज्ञ होते हुए भगवान्‌ की पूजा न करे ?"

मैत्रेय उवाचइति प्रचेतसो राजन्नन्याश्व भगवत्कथा: ।

श्रावयित्वा ब्रह्मलोक॑ ययौ स्वायम्भुवो मुनि: ॥

२३॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; इति--इस प्रकार; प्रचेतस:--प्रचेतागण; राजन्‌--हे राजन; अन्या:--अन्य लोग; च-- भी;भगवतू-कथा: -- भगवान्‌ विषयक कथाएँ; श्रावयित्वा--निर्देश देकर; ब्रह्म -लोकम्‌--ब्रह्मलोक को; ययौ--चला गया;स्वायम्भुव:ः--ब्रह्मा का पुत्र; मुनिः--परम साधु।

मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा : हे विदुर, इस प्रकार ब्रह्मा के पुत्र नारद मुनि ने प्रचेताओं सेभगवान्‌ के साथ इन सम्बन्धों का वर्णन किया।

तत्पश्चात्‌ वे ब्रह्यलोक को चले गये।

"

तेडपि तन्मुखनिर्यातं यशो लोकमलापहम्‌ ।

हरेर्निशम्य तत्पादं ध्यायन्तस्तद्गतिं ययु: ॥

२४॥

ते--प्रचेतागण; अपि-- भी; तत्‌--नारद के; मुख--मुख से; निर्यातमू--निकला; यश:--महिमागान; लोक--संसार का;मल--पाप; अपहम्‌--नष्ट करते हुए; हरेः--हरि का; निशम्य--सुनकर; तत्‌-- भगवान्‌ के; पादम्‌--पाँव; ध्यायन्त:-- ध्यानकरते हुए; तत्‌-गतिम्‌--उनके धाम को; ययु:--चले गये ।

नारद के मुख से संसार के समस्त दुर्भाग्य को दूर करने वाली भगवान्‌ की महिमा को सुनकर प्रचेता गण भी भगवान्‌ के प्रति आसक्त हो उठे।

वे भगवान्‌ के चरणकमलों का ध्यान करतेहुए चरम गन्तव्य को चले गये।

"

एतत्तेभिहितं क्षत्तर्यन्मां त्वं परिपृष्टवान्‌ ।

प्रचेतसां नारदस्य संवादं हरिकीर्तनम्‌ ॥

२५॥

एतत्‌--यह; ते--तुमसे; अभिहितम्‌--कहा गया क्षत्त:--हे विदुर; यत्‌--जो भी; माम्‌--मुझसे; त्वम्‌--तुमने; परिपृष्टवान्‌ --पूछा; प्रचेतसाम्‌ू--प्रचेताओं की; नारदस्य--नारद की; संवादम्‌--वार्ता; हरि-कीर्तनम्‌-- भगवान्‌ की महिमा का वर्णन करतेहुए

हे विदुर, मैंने तुम्हें वह सब कुछ सुना दिया है, जो तुम नारद तथा प्रचेताओं के भगवत्कथासम्बन्धी वार्तालाप के विषय में जानना चाह रहे थे।

जहाँ तक सम्भव था मैंने तुम्हें बता दिया है।

"

श्रीशुक उबाचय एष उत्तानपदो मानवस्यानुवर्णित: ।

वंशः प्रियव्रतस्थापि निबोध नृपसत्तम ॥

२६॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; य:ः--जो; एष:--इस वंश; उत्तानपदः--राजा उत्तानपाद का; मानवस्य--स्वयंभुव मनु का पुत्र; अनुवर्णित: --पूर्व आचार्यो के पदचिह्नों पर चलते हुए वर्णित; बंश:--वंश, कुल; प्रियब्रतस्थ--राजाप्रियत्रत का; अपि-- भी; निबोध-- समझने का प्रयास करो; नृप-सत्तम--हे राजाओं में श्रेष्ठ |

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे श्रेष्ठ राजन्‌ ( राजा परीक्षित ), यहाँ तक मैंने स्वायम्भुवमनु के प्रथम पुत्र उत्तानपाद के वंश का वर्णन किया है।

अब मैं स्वायंभुव मनु के द्वितीय पुत्रप्रियव्रत के वंशजों के कार्यकलापों का वर्णन करने का प्रयास करूँगा।

कृपया ध्यान पूर्वक सुनें।

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यो नारदादात्मविद्यामधिगम्य पुनर्महीम्‌ ।

भुक्त्वा विभज्य पुत्रेभ्य ऐश्वर समगात्पदम्‌ ॥

२७॥

यः--जो; नारदातू--नारद मुनि से; आत्म-विद्याम्‌-- आध्यात्मिक ज्ञान को; अधिगम्य--सीख कर; पुनः--फिर; महीम्‌--पृथ्वीको; भुक्त्वा-- भोग कर; विभज्य--बाँट कर; पुत्रेभ्य:--पुत्रों को; ऐश्वरम्‌--दिव्य; समगात्‌--प्राप्त किया; पदम्‌--पद को |

यद्यपि महाराज प्रियत्रत ने नारद मुनि से उपदेश प्राप्त किया था, तो भी वे पृथ्वी पर राज्यकरने में संलग्न हुए।

भौतिक सम्पत्ति का पूर्ण भोग कर चुकने के बाद उन्होंने उसे अपने पुत्रों मेंबाँट दिया।

तब उन्हें वह पद प्राप्त हुआ जिससे वे भगवद्धाम को लौट सके।

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इमां तु कौषारविणोपवर्णितांक्षत्ता निशम्याजितवादसत्कथाम्‌ ।

प्रवृद्धभावो श्रुकलाकुलो मुने-्दधार मूर्ध्ना चरणं हृदा हरे: ॥

२८॥

इमामू--यह सब; तु--तब; कौषारविणा--मैत्रेय द्वारा; उपवर्णिताम्‌ू--वर्णित; क्षत्ता--विदुर; निशम्य--सुनकर; अजित-वबाद--भगवान्‌ की महिमा का वर्णन; सत्‌-कथाम्‌--दिव्य कथा; प्रवृद्ध--बढ़ी हुईं; भाव:--हर्षातिरिक; अश्रु--आँसुओं के;कला--बिन्दुओं से; आकुल:--विभोर; मुनेः--मुनि का; दधार--पकड़ लिया; मूर्ध्ना--सिर से; चरणम्‌--चरणकमल;हृदा--हृदय से; हरेः-- भगवान्‌ के |

हे राजन, इस प्रकार मैत्रेय मुनि से भगवान्‌ तथा उनके भक्तों की दिव्य कथाएँ सुनकर विदुरभावविभोर हो उठे।

आँखों में आँसू भर कर वे तुरन्त अपने गुरु के चरणकमलों पर गिर पड़े।

तब उन्होंने अपने अन्तःकरण में भगवान्‌ को स्थिर कर लिया।

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विदुर उवाचसोयमद्य महायोगिन्भवता करुणात्मना ।

दर्शितस्तमसः पारो यत्राकिञ्लनगो हरि; ॥

२९॥

विदुरः उवाच--विदुर ने कहा; सः--वह; अयम्‌--यह; अद्य--आज; महा-योगिन्‌--हे महान्‌ योगी; भवता--आपके द्वारा;'करुण-आत्मना--अत्यन्त करुणामय; दर्शित:-- मुझे दिखाया गया है; तमस:--अधंकार का; पार: --दूसरा छोर; यत्र--जहाँ;अकिद्धन-ग:--भौतिक रूप से मुक्त व्यक्ति के द्वारा पहुँचने योग्य; हरिः-- भगवान्‌ |

श्रीविदुर ने कहा : हे परम योगी, हे भक्तों में महान्‌, आपने अहैतुकी कृपा से मुझे इसअंधकार रूपी संसार से मोक्ष का पथ प्रदर्शित किया है।

इस भौतिक संसार से मुक्त पुरुष इसपथ पर चल कर इस संसार से भगवान्‌ के धाम को वापस जा सकता है।

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श्रीशुक उबाचइत्यानम्य तमामन्त्रय विदुरो गजसाह्यम्‌ ।

स्वानां दिहश्षु: प्रययौ ज्ञातीनां निर्वुताशयः ॥

३०॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; आनम्य--नमस्कार करके ; तम्‌ू--मैत्रेय को; आमन््रय--अनुमति लेकर; विदुर:ः --विदुर; गज-साह्यम्‌--हस्तिनापुर नगरी को; स्वानाम्‌--अपनी; दिदृक्षु;--देखने के लिए इच्छुक;प्रययौ--वहाँ से चला गया; ज्ञातीनामू--अपने परिजनों का; निर्वृत-आशय:-- भौतिक इच्छाओं से मुक्त |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार मैत्रेय मुनि को नमस्कार करके और उनसे अनुमतिलेकर भौतिक इच्छाओं से रहित विदुर ने अपने परिजनों से मिलने के लिए हस्तिनापुर के लिएप्रस्थान किया।

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एतद्य: श्रृणुयाद्राजन्नाज्ञां हर्यर्पितात्मनाम्‌ ।

आयुर्धनं यशः स्वस्ति गतिमैश्वर्यमाप्नुयात्‌ ॥

३१॥

एतत्‌--यह; यः--जो; श्रूणुयात्‌--सुनता है; राजनू--हे राजा परीक्षित; राज्ञामू--राजाओं का; हरि-- श्री भगवान्‌ को; अर्पित-आत्मनामू--जीवन तथा आत्मा को अर्पित करने वाले; आयु:--उम्र; धनम्‌--धन; यश:--ख्याति; स्वस्ति--क्षेम; गतिम्‌--जीवन का चरम लक्ष्य, सदगति; ऐश्वर्यमू-- भौतिक ऐश्वर्य; आप्नुयात्‌--प्राप्त करता है।

हे राजन, जो लोग श्रीभगवान्‌ के प्रति पूर्णतः समर्पित राजाओं से सम्बन्धित इन कथाओंको सुनते हैं, वे बिना कठिनाई के दीर्घायु, सम्पत्ति, ख्याति, सौभाग्य ( क्षेम ) तथा अन्त मेंभगवद्धाम जाने का अवसर प्राप्त करते हैं।

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