← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 5 की सूची
अध्याय तेरह: राजा राहुगण और जड़ भरत के बीच आगे की बातचीत
5.13ब्राह्मण उवाचदुरत्यये ध्वन्यजया निवेशितोरजस्तमःसत्त्वविभक्तकर्महक् ।
स एघ सार्थोथपर: परिभ्रमन्भवाटवीं याति न शर्म विन्दति ॥
१॥
ब्राह्मण: उवाच--ब्राह्मण जड़ भरत ने कहा; दुरत्यये--जिसको पार करना कठिन है, दुर्गम; अध्वनि--सकाम कर्मों के पथ पर( इस जन्म में कर्म करना, इन कर्मों के आधार पर अगले जन्म में शरीर ग्रहण करना और इस प्रकार जन्म-मरण के चक्र कोस्वीकार करना ); अजया--माया के द्वारा, श्रीभगवान् की बहिरंगा शक्ति; निवेशित:--सन्निविष्ट; रज:-तमः-सत्त्व-विभक्त-कर्म-हक्--बद्ध आत्मा जो लाभप्रद कर्मों तथा उनके फलों को तुरन्त देख लेता है जो सतो, रजो तथा तमो गुणों द्वारा तीनसमूहों में विभक्त है; सः--वह; एष:--यह; स-अर्थ:--सकाम; अर्थ-पर:--धन प्राप्ति में तुला हुआ; परिभ्रमन्--सर्वत्र घूमतेहुए; भव-अटवीम्-- भव नामक जंगल अर्थात् जन्म-मरण का चक्र; याति-- प्रवेश करता है; न--नहीं; शर्म--सुख;विन्दति-प्राप्त करता है|?
ब्रह्म-साक्षात्कार-प्राप्त जड़ भरत ने आगे कहा--हे राजा रहूगण, जीवात्मा इस संसार केदुर्लघ्य पथ पर घूमता रहता है और बारम्बार जन्म तथा मृत्यु स्वीकार करता है।
प्रकृति के तीनगुणों ( सत्त्व, रज तथा तम ) के प्रभाव से इस संसार के प्रति आकृष्ट होकर जीवात्मा प्रकृति केजादू से केवल तीन प्रकार के फल जो शुभ, अशुभ तथा शुभाशुभ होते हैं देख पाता है।
इसप्रकार वह धर्म, आर्थिक विकास, इन्द्रियतृप्ति तथा मुक्ति की अद्बैत भावना ( परमात्मा में तादात्म्य ) के प्रति आसक्त हो जाता है।
वह उस वणिक के समान अहर्निश कठोर श्रम करता हैजो कुछ सामग्री प्राप्त करने और उससे लाभ उठाने के उद्देश्य से जंगल में प्रवेश करता है।
किन्तुउसे इस संसार में वास्तविक सुख उपलब्ध नहीं हो पाता।
यस्यामिमे षण्नरदेव दस्यवःसार्थ बिलुम्पन्ति कुनायकं बलातू ।
गोमायवो यत्र हरन्ति सार्थिकंप्रमत्तमाविश्य यथोरणं वृका: ॥
२॥
यस्यामू--जिसमें ( भवाटवी में ); इमे--ये; घट्ू--छ: ; नर-देव--हे राजा; दस्यव:--लुटेरे; स-अर्थम्--मिथ्या विचारों में ग्रस्तबद्धजीव; विलुम्पन्ति--लूटते हैं सर्वस्व हर लेते हैं; कु-नायकम्--जो नामधारी गुरुओं द्वारा सदैव ही कुमार्ग में ले जाये जाते हैं;बलातू--बलपूर्वक; गोमायव: --लोमड़ियों की तरह; यत्र--जिस जंगल में; हरन्ति--लूट लेते हैं; स-अर्थिकम्--जीव जो अपनेशरीर और आत्मा के पोषण के लिए धन की खोज करता रहता है; प्रमत्तमू--आत्महित न समझने वाला पागल व्यक्ति;आविश्य-- भीतर प्रवेश करके; यथा--जिस प्रकार; उरणम्--सुरक्षित मेमने को; वृका:--भेड़िये |
हे राजा रहूगण, इस संसार रूपी जंगल ( भवाटवी ) में छह अत्यन्त प्रबल लुटेरे हैं।
जबबद्धजीव कुछ भौतिक लाभ के हेतु इस जंगल में प्रवेश करता है, तो ये छहों लुटेरे उसे गुमराहकर देते हैं।
इस प्रकार से बद्ध वणिक ( व्यापारी ) यह नहीं समझ पाता कि वह अपने धन कोकिस प्रकार खर्चे और यह धन इन लुतेरों द्वारा छीन लिया जाता है।
जिस प्रकार चौकसी में पलेमेमने को उठा ले जाने के लिए जंगल में भेड़िए, सियार तथा अन्य हिंस््र पशु रहते हैं उसी प्रकार पत्नी तथा सन्तान उस वणिक के हृदय में प्रवेश करके अनेक प्रकार से लूटते रहते हैं।
प्रभूतवीरुत्तणगुल्मगह्नरेकठोरदंशैर्मशकैरुपद्गुतः ।
क्वचित्तु गन्धर्वपुरं प्रपश्यतिक्वचित्क्वचिच्चाशुरयोल्मुकग्रहम् ॥
३॥
प्रभूत-- प्रचुर; वीरुतू--लताओं; तृण--घास के तिनकों; गुल्म--घने जंगलों के ; गह्हे--कुंजों में; कठोर--क्रूर; दंशै: --काटने से; मशकै:--मच्छरों के द्वारा; उपद्रुत:--विश्लुब्ध; क्वचित्ू--कभी-कभी; तु--लेकिन; गन्धर्व-पुरम्--गन्धर्वों द्वाराबनाया गया मिथ्या स्थान, कल्पित गन्धर्वपुरी; प्रपश्यति--देखता है; क्वचित्--( तथा ) कभी-कभी; क्वचित्--कभी-कभी;च--तथा; आशु-रय--अ त्यन्त तेजी से; उल्मुक--उल्का के तुल्य; ग्रहम्-- भूतप्रेत, पिशाच।
इस जंगल में झाड़ियों, घास तथा लताओं के झाड़-झंखाड़ से बने सघन कुंजों में बुरी तरहसे काटने वाले मच्छरों (ईर्ष्यालु पुरुषों ) के होने से बद्धजीव निरन्तर परेशान रहता है।
कभीकभी उसे जंगल में काल्पनिक महल ( गन्धर्वपुर ) दिखता है, तो कभी कभी वह आसमान सेटूटते उल्का के समान प्रेत को देखकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है।
निवासतोयद्रविणात्मबुद्धि-स्ततस्ततो धावति भो अटव्याम् ।
क्वचिच्च वात्योत्थितपांसुधूप्रादिशो न जानाति रजस्वलाक्ष: ॥
४॥
निवास--आवास; तोय--जल; द्रविण--सम्पत्ति; आत्म-बुद्द्धिः--जो भौतिक वस्तुओं को आत्मा या स्वयं मानता है; ततःततः--इधर-उधर; धावति--दौड़ता है; भोः--हे राजा; अटव्याम्--इस संसार रूपी जंगल-मार्ग पर; क्वचित् च--तथा कभी-कभी; वात्या--बवंडर से; उत्थित--ऊपर उठ कर; पांसु-- धूलि से; धूप्राः--धुंएँ के रंग का प्रतीत होता है; दिश:--दिशाएँ;न--नहीं; जानाति--जानता है; रज:-वल-अक्ष:--हवा की धूल से ढकी हुई आँखों वाला अथवा जो रजस्वला पतली के प्रतिआकृष्ट है।
हे राजनू, इस संसार रूपी जंगल के मार्ग में घर, सम्पत्ति, कुटुम्बी इत्यादि से भ्रमित बुद्धिवाला वणिक सफलता की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान को दौड़ता रहता है।
कभी-कभीउसकी आँखें बवंडर की धूल से ढक जाती हैं, अर्थात् कामवश वह अपनी स्त्री की सुन्दरता केप्रति, उसे विशेष रूप से रजोकाल में, मुग्ध हो जाता है।
इस प्रकार अन्धा होने से उसे यह नहींदिखाई पड़ता कि उसे कहाँ जाना है, अथवा वह क्या कर रहा है।
अदृश्यझिल्लीस्वनकर्णशूलउलूकवाग्भिव्यथिितान्तरात्मा ।
अपुण्यवृक्षान्श्रयते श्षुधार्दितोमरीचितोयान्यभिधावति क्वचित् ॥
५॥
अदृश्य--न दिखने वाले; झिल्ली--झींगुरों अथवा मधुमक्खियों के प्रकार का एक कीट; स्वन--शब्द से; कर्ण-शूल--कानोंके लिए दुखदायी, कर्णकटु; उलूक--उल्लू की; वाग्भि: --बोली से; व्यधित--अत्यन्त विचलित; अन्त:-आत्मा--मन तथाहृदय; अपुण्य-वृक्षान्ू--अपवित्र वृक्ष, जिनमें फल-फूल नहीं लगते; श्रयते--शरण लेता है; क्षुध-- भूख से; अर्दित:--सतायाहुआ; मरीचि-तोयानि--मृगतृष्णा के लिए; अभिधावति--पीछे दौड़ता है; क्वचित्ू--कभी-कभी |
संसार रूपी जंगल में घूमते हुए बद्धजीव को कभी-कभी अदृश्य झींगुरों की तीक्ष्ण ध्वनिसुनाई पड़ती है जो उसके कानों को अत्यन्त दुखदायी लगती है।
कभी-कभी उसका हृदय अपनेशत्रुओं के कटु वचनों जैसी प्रतीत होने वाली उल्लुओं की ध्वनि से व्यधित ( विचलित ) होउठता है।
कभी वह बिना फल फूल वाले वृक्षों का आश्रय ग्रहण करता है क्योंकि वह भूखाहोता है, किन्तु उसे कुछ न मिलने से कष्ट भोगना पड़ता है।
उसे जल की इच्छा होती है किन्तु वह केवल मृगतृष्णा से मोहित हो जाने के कारण उसके पीछे दौड़ता है।
क्वचिद्वितोया: सरितोभियातिपरस्परं चालषते निरन्ध: ।
आसाद्य दावं क्वचिदग्नितप्तोनिर्विद्यते क्व च यक्षेहदतासु: ॥
६॥
क्वचित्--कभी; वितोया:--जलहीन; सरित:--नदियाँ; अभियाति--नहाने जाता है अथवा भीतर कूदता है; परस्परम्ू--एकदूसरे से; च--तथा; आलषते--कामना करता है; निरन्ध:--अन्नहीन होने पर; आसाद्य--अनुभव करके; दावम्ू-- पारिवारिकजीवन में जंगल की आग, दावाग्नि; क्वचित्--कभी; अग्नि-तप्त:--आग से जलने के कारण; निर्विद्यते--निराश होता है;क्व--कहीं; च--तथा; यक्षेः--डाकुओं तथा उचक्कों जैसे राजाओं द्वारा; हत--ले लिया जाने पर, छीने जाने पर; असु:--सम्पत्ति, जो प्राणों के समान प्रिय है|?
कभी-कभी बद्धजीव उथली नदी में कूद पड़ता है अथवा खाद्यान्न न होने पर ऐसे लोगों सेअन्न माँगता है जो दानी नहीं हैं ही नहीं।
कभी कभी वह गृहस्थ जीवन की अग्नि से जलने लगताहै जो दावाग्नि जैसी होती है और कभी कभी वह उस सम्पत्ति के लिए दुखी हो उठता है जो उसेप्राणों से भी प्रिय है और जिसका अपहरण राजा लोग भारी आयकर के नाम पर करते हैं।
श्रैईतस्वः क्व च निर्विण्णचेताःशोचन्विमुहान्रुपपाति कश्मलम् ।
क्वचिच्च गन्धर्वपुरं प्रविष्ट:प्रमोदते निर्वृतवन्मुहूर्तम् ॥
७॥
श्रैः--प्रबल शत्रुओं द्वारा; हृत-स्व:--जिसका समस्त धन चुराया जा चुका है; कब च--कभी-कभी; निर्विण्ण-चेता:--हृदयमें अन्यन्त खिन्न एवं व्यधित; शोचन्--अत्यधिक पकश्चात्ताप करते हुए; विमुहान्ू--किंकर्तव्यविमूढ़ होकर; उपयाति--हो जाताहै; कश्मलम्--संज्ञाशून्य, अचेत; क्वचित्ू--कभी-कभी; च-- भी ; गन्धर्व-पुरम्ू-- जंगल में स्थित कपोलकल्पित नगर में;प्रविष्ट: --प्रवेश हुआ; प्रमोदते--आनन्द भोगता है; निर्वृत-वत्--सिद्ध पुरुष के समान; मुहूर्तम्--केवल क्षण भर के लिए?
कभी-कभी अपने से बड़े तथा बलवान व्यक्ति द्वारा पराजित होने अथवा लूटे जाने परजीवात्मा की सारी सम्पत्ति चली जाती है।
इससे वह दुखी हो जाता है, क्षति पर पश्चात्ताप करताहै यहाँ तक कि कभी-कभी अचेत भी हो जाता है।
कभी-कभी वह ऐसे विशाल प्रासाद कीकल्पना करने लगता है, जिसमें वह अपने परिवार तथा अपने धन समेत सुखपूर्वक रह सके।
यदि ऐसा हो सके तो वह अपने को अत्यन्त सन्तुष्ट समझता है, किन्तु ऐसा तथाकथित सुखक्षणिक होता है।
चलन्क््वचित्कण्टकशर्कराड्प्रि-न॑गारुरुक्षुविमना इवास्ते ।
पदे पदे भ्यन्तरवह्निनार्दितःकौटुम्बिक: क्रुध्यति वै जनाय ॥
८॥
चलनू--चलते हुए; क्वचित्ू--कभी कभी; कण्टक-शर्कर--काँटे तथा कंकड़ों से छिद कर; अड्भप्रि:--जिनके पाँव; नग--पर्वत; आरुरुक्षु;--चढ़ने का इच्छुक; विमना:--उदास; इब--सहृश; आस्ते--हो जाता है; पदे पदे--प्रत्येक पग पर;अभ्यन्तर-- भीतरी, पेट के भीतर; वहिना--श्लुधा की प्रबल अग्नि से; अर्दित:--थक कर तथा दुखी होकर; कौटुम्बिक: --कुटुम्बियों के साथ रहने वाला व्यक्ति; क्रुध्यति--क्रोध करता है; बै--निश्चय ही; जनाय--अपने परिवार के सदस्यों पर।
कभी-कभी जंगल का व्यापारी पर्वतों तथा पहाड़ियों के ऊपर चढ़ना चाहता है, किन्तुअपर्याप्त पदत्राण के कारण उसके पैरों में कंकड़ तथा काँटे गड़ जाते हैं जिससे वह अत्यन्तउदास हो जाता है।
कोई व्यक्ति जो अपने परिवार के प्रति आसक्त होता है, वह कभी कभी जबअत्यधिक भूख के मारे त्रस्त हो जाता है, तो वह अपनी दयनीय स्थिति के कारण अपनेकुटुम्बियों पर विफर उठता है।
क्वचित्निगीर्णोउजगराहिना जनोनावैति किद्ञिद्दिपिनेउपविद्धः ।
दष्ट: सम शेते क्व च दन्दश्कैर्अन्धोन्धकूपे पतितस्तमिस्त्रे ॥
९॥
क्वचित्--कभी-कभी; निगीर्ण:--निगले जाने पर; अजगर-अहिना--अजगर नामक बड़े सर्प द्वारा; जन:--बद्धजीव; न--नहीं; अवैति--समझता है; किज्जितू--कुछ भी; विपिने--जंगल में; अपविद्ध:--कष्ट के तीरों से बेधा हुआ; दष्ट:--दंश कियागया, काटे जाने पर; स्म--निस्संदेह; शेते--लेट जाता है; क्व च--कभी-क भी; दन्द-शूकैः -- अन्य सर्पों द्वारा; अन्ध:--अन्धा; अन्ध-कूपे--अंधे कुएँ में; पतित:--गिरा हुआ; तमिस्त्रे--नारकीय जीवन में?
कभी-कभी इस भौतिक जंगल में बद्धजीव को अजगर निगल लेते हैं या मरोड़ डालते हैं।
ऐसी अवस्था में वह चेतना तथा ज्ञान शून्य होकर मृत व्यक्ति तुल्य जंगल में पड़ा रहता है।
कभी-कभी अन्य विषैले सर्प भी आकर काट लेते हैं।
अचेतन होने के कारण वह नारकीय जीवन केअन्धे कूप में गिर जाता है जहाँ से बचकर निकल पाने की कोई आशा नहीं रहती।
कर्हि सम चित्क्षुद्रससान्विचिन्व॑-स्तन्मक्षिकाभिव्यथितो विमान: ।
तत्रातिकृच्छात्प्रतिलब्धमानोबलाद्विलुम्पन्त्यथ तं ततोउन्ये ॥
१०॥
कहि सम चितू--क भी-कभी; क्षुद्र-- अत्यन्त लघु; रसान्ू--रति सुख; विचिन्वन्--ढूँढने के लिए; तत्--उन स्त्रियों का;मक्षिकाभि:--मधुमक्खियों से अथवा पतियों या कुटुम्बियों से; व्यधित:ः--अत्यन्त दुखी; विमान: --अपमानित; तत्र--वहाँ पर;अति--अत्यन्त; कृच्छात्ू--धन के व्यय के कारण कठिनाई से; प्रतिलब्धमान: --रति सुख प्राप्त करके ; बलात्--बलपूर्वक;बिलुम्पन्ति--अपहरण की गईं; अथ--तत्पश्चात्; तम्--इन्द्रिय सुख की वस्तु ( स्त्री ); ततः--उससे; अन्ये--अन्य व्यभिचारी( कामी )?
कभी-कभी थोड़े से रति-सुख के लिए मनुष्य चरित्रहीन स्त्री की खोज करता रहता है।
इसप्रयास में उस स्त्री के सम्बन्धियों द्वारा उसका अपमान एवं प्रताड़न होता है।
यह वैसा ही है जैसाकि मधुमक्खी के छत्ते से शहद ( मधु ) निकालते समय मक्खियाँ आक्रमण कर दें।
कभी-कभीप्रचुर धन व्यय करने पर उसे कुछ अतिरिक्त इन्द्रिय भोग के लिए दूसरी स्त्री प्राप्त हो सकती है।
किन्तु दुर्भाग्यवश इन्द्रिय सुख की सामग्री रूप वह स्त्री चली जाती है, अथवा किसी अन्य कामीद्वारा अपहरण कर ली जाती है।
क्वचिच्च शीतातपवातवर्ष -प्रतिक्रियां कर्तुमनीश आस्ते ।
क्वचिन्मिथो विपणन्यच्च किश्ञिद्विद्वेषमृच्छत्युत वित्तशाठ्यात् ॥
११॥
क्वचित्--क भी; च-- भी; शीत-आतप-वात-वर्ष--ठंड, कड़ी गर्मी, तेज हवा तथा अधिक वर्षा की; प्रतिक्रियाम्--प्रतिक्रिया, जवाबी क्रिया; कर्तुमू--करना; अनीश:--असमर्थ; आस्ते--कष्ट में रहता है; क्वचित्--कभी-कभी; मिथ: --परस्पर; विपणन्--बेच कर; यत् च--जो कुछ; किझ्ञित्-- थोड़ा भी; विद्वेषम्--पारस्परिक द्वेष ( शत्रुता ); ऋच्छति--प्राप्तकरता है; उत--ऐसा कहते हैं; वित्त-शाठ््यात्-केवल धन के लिए एक दूसरे को ठगने के कारण।
कभी-कभी जीवात्मा बर्फीली ठंड, कड़ी गर्मी, तेज हवा, अति-वृष्टि इत्यादि प्राकृतिकउत्पातों का सामना करने में लगा रहता है।
किन्तु जब वह ऐसा नहीं कर पाता तो अत्यन्त दुखीहो जाता है।
कभी-कभी वह एक के बाद एक व्यावसायिक लेन-देन में ठगा जाता है।
इसप्रकार ठगे जाने पर जीवात्माएँ एक दूसरे से शत्रुता ठान लेती हैं।
क्वचित्क्वचित्क्षीणधनस्तु तस्मिन्शय्यासनस्थानविहारहीनः ।
याचन्परादप्रतिलब्धकाम:पारक्यदृष्टिलभतेडवमानम् ॥
१२॥
क्वचित् क्वचित्--कभी-कभी; क्षीण-धन:--धनहीन होने पर; तु--लेकिन; तस्मिनू--उस जंगल में; शय्या--लेटने काबिस्तर; आसन--बैठने का स्थान; स्थान--आवास; विहार--परिवार सहित सुखोपभोग; हीन:--विहीन होकर; याचन्-- भीखमाँग कर; परात्--अन््यों ( मित्रों तथा सम्बधियों ) से; अप्रतिलब्ध-काम:--कामना की पूर्ति न होने से; पारक्य-दृष्टि:--अन्योंकी सम्पत्ति का लालची; लभते--प्राप्त करता है; अवमानम्--अनादर।
संसार के जंगली मार्ग में कभी-कभी व्यक्ति धनहीन हो जाता है, जिसके कारण उसके पासन समुचित घर न बिस्तर या बैठने का स्थान होता है, न ही समुचित पारिवारिक सुख ही उपलब्धहो पाता है।
अतः वह अन्यों से धन माँगता है, किन्तु जब माँगने पर भी उसकी इच्छाएँ अपूर्णरहती हैं, तो वह या तो उधार लेना चाहता है या फिर अन्यों की सम्पत्ति चुराना चाहता है।
इसतरह वह समाज में अपमानित होता है।
अन्योन्यवित्तव्यतिषड्रवृद्ध-वैरानुबन्धो विवहन्मिथश्व ।
अध्वन्यमुष्मिन्नुरुकृच्छुवित्त-बाधोपसगैर्विहरन्विपन्नः ॥
१३॥
अन्योन्य--एक दूसरे से; वित्त-व्यतिषड्र-- धन के लेन-देन द्वारा; वृद्ध--बढ़ा हुआ; बैर-अनुबन्ध: --वैर भाव; विवहन्--कभी-कभी ब्याह द्वारा; मिथ:-- परस्पर; च--तथा; अध्वनि--संसार-पथ पर; अमुष्मिन्-- वह; उरु-कृच्छु--कठिनाइयों से;वित्त-बाध-- धन की कमी से; उपसर्गैं:--रोगों से; विहरनू--घूमते हुए; विपन्न:ः--अत्यन्त चिन्तित हो जाता है।
आर्थिक लेने-देन के कारण सम्बन्धों में कटुता उत्पन्न होती है, जिसका अन्त शत्रुता में होताहै।
कभी पति-पत्नी भौतिक उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होते हैं और अपने सम्बन्ध बनाये रखनेके लिए वे कठोर श्रम करते हैं, तो कभी धनाभाव अथवा रुग्ण दशा के कारण वे अत्यधिकचिन्तित रहकर मरणासतन्न हो जाते हैं।
तांस्तान्विपन्नान्स हि तत्र तत्रविहाय जात॑ परिगृह् सार्थ: ।
आवर्ततेउद्यापि न कश्िदत्रवीराध्वन: पारमुपैति योगम् ॥
१४॥
तान् तानू--उन सबों को; विपन्नान्ू--विभिन्न प्रकार से व्यधित; सः--जीव; हि--निश्चय ही; तत्र तत्र--यहाँ-वहाँ; विहाय--छोड़कर; जातमू--नवजातों को, नये पैदा हुओं को; परिगृह्य--लेकर; स-अर्थ:--अपने हित की खोज में जीव; आवर्तते--जंगल में घूमता रहता है; अद्य अपि--आज तक; न--नहीं; कश्चित्--कोई भी; अत्र--यहाँ इस जंगल में; वीर--हे वीर;अध्वन:--भौतिक जीवन का मार्ग; पारमू--अन्त; उपैति--पाता है; योगम्-- श्रीभगवान् की भक्ति-साधना।
हे राजनूु, भौतिक जीवन रूपी जंगल के मार्ग में मनुष्य पहले अपने पिता तथा माता कोखोता है और उनकी मृत्यु के बाद वह नवजात बच्चों से आसक्त हो जाता है।
इस तरह वहभौतिक प्रगति के मार्ग में घूमता रहता है और अन्त में अत्यन्त व्यधित हो जाता है।
किसी कोमृत्यु के क्षण तक यह पता नहीं चल पाता कि वह उससे किस प्रकार निकले।
मनस्विनो निर्जितदिग्गजेन्द्राममेति सर्वे भुवि बद्धवैरा: ।
मृधे शयीरतन्न तु तद्व्र॒जन्तियन्ञ्यस्तदण्डो गतवैरोडईभियाति ॥
१५॥
मनस्विन:--बड़े-बड़े वीर पुरुष ( विचारक ); निर्जित-दिक्-गजेन्द्रा:--जिन्होंने हाथियों के समान बलशाली वीरों को जीतलिया है; मम--मेरा ( मेरा देश, मेरी भूमि, मेरा परिवार, मेरा धर्म ); इति--इस प्रकार; सर्वे--समस्त ( महान् राजनैतिक,सामाजिक तथा धार्मिक नेता ); भुवि--इस संसार में; बद्ध-वैरा:--परम्परा से वैरभाव उत्पन्न कर रखा है; मृधे--युद्ध में;शयीरन्-- भूमि में मृत होकर गिरे हुए; न--नहीं; तु--लेकिन; तत्-- श्रीभगवान् का धाम; ब्रजन्ति--पहुँचते हैं; यत्--जो;न्यस्त-दण्ड:--संन्यासी; गत-बैर:--जिसका विश्व भर में किसी से वैर-भाव नहीं है; अभियाति--उस सिद्धिद्रि को प्राप्त करताहै?
ऐसे अनेक राजनैतिक तथा सामाजिक वीर पुरुष हैं और थे जिन्होंने सम-शक्ति वाले शत्रुओंपर विजय प्राप्त की है, तो भी वे अज्ञानवश यह विश्वास करके कि यह भूमि उनकी है परस्परलड़ते हैं और युद्धभूमि में अपने प्राण गँवाते हैं।
वे सन््यासियों के द्वारा स्वीकृत आध्यात्मिक पथको ग्रहण कर सकने में अक्षम रहते हैं।
वीर पुरुष तथा राजनैतिक नेता होते हुए भी वे आत्म-साक्षात्कार का पथ नहीं अपना सकते हैं।
प्रसजजति क्वापि लताभुजा श्रय-स्तदाश्रयाव्यक्तपदद्विजस्पृहः ॥
क्वचित्कदाचिद्धरिचक्रतस्त्रसन्सख्यं विधत्ते बककड्डूगृश्चे: ॥
१६॥
प्रसजजति--अधिकाधिक आसक्त होता है; क्वापि--कभी-कभी; लता-भुज-आ श्रय:--जो पत्नी की लताओं जैसी कोमलबाहों में आश्रय लेते हैं; तत्ू-आश्रय--जो ऐसी लताओं द्वारा आश्रय प्रदान किये जाते हैं; अव्यक्त-पद--जो अस्पष्ट पद ( गीत )गाते हैं; द्विज-स्पृह:-- पक्षियों का गाना सुनने का इच्छुक; क्वचित्--कभी-कभी; कदाचित्--कहीं; हरि-चक्रतः त्रसन्--सिंहकी दहाड़ से भयभीत; सख्यम्--मित्रता; विधत्ते--करता है; बक-कड्डू-गृश्नै:--बगुलों, सारसों तथा गीधों के साथ।
कभी-कभी जीवात्मा संसार रूपी जंगल में लताओं का आश्रय लेता है और उन लताओं मेंबैठें पक्षियों की चहचहाहट सुनना चाहता है।
जंगल के सिंहों की दहाड़ से भयभीत होकर वहबगुलों, सारसों तथा गृद्धों से मैत्री स्थापित करता है।
तैर्वश्वितो हंसकुलं समाविश-न्नरोचयन्शीलमुपैति वानरान् ।
तज्जातिरासेन सुनिर्व॒तेन्द्रियःपरस्परोद्वीक्षणविस्पृतावधि; ॥
१७॥
तैः--उनके द्वारा ( बंचकों, तथाकथित योगियों, स्वामियों, अवतारों तथा गुरुओं द्वारा ); वश्चित:--ठगा जाकर; हंस-कुलम्--परमहंसों या भक्तों की संगति; समाविशनू--सम्पर्क करके; अरोचयनू--संतुष्ट न रहकर; शीलम्--शील, आचार; उपैति--पासजाता है; वानरान्--बंदरों को, जो दुश्चरित्र कामी पुरुष तुल्य हैं; तत्-जाति-रासेन--ऐसे कामी पुरुषों के संग में विषय-तृप्तिद्वारा; सुनिर्वुत-इन्द्रियः--इन्द्रिय-सुख प्राप्त होने से अत्यधिक संतुष्ट; परस्पर उद्दी क्षण --एक दूसरे का मुख देख-देख कर;विस्मृत-- भूला हुआ; अवधि: -- जीवन का अन्त।
संसार रूपी जंगल में तथाकथित योगियों, स्वामियों तथा अवतारों से ठगा जाकर जीवात्माउनकी संगति छोड़कर असली भक्तों की संगति में आने का प्रयत्त करता है, किन्तु दुर्भाग्यवशवह सदगुरु या परम भक्त के उपदेशों का पालन नहीं कर पाता, अतः वह उनकी संगति छोड़करपुनः बन्दरों की संगति में वापस आ जाता है जो मात्र इन्द्रिय-तृप्ति तथा स्त्रियों में रूचि रखते हैं।
वह इन विषयीजनों की संगति में रहकर तथा काम और मद्यपान में लगा रहकर तुष्ट हो लेता है।
इस तरह वह काम और मद्यसेवन से अपना जीवन नष्ट कर देता है।
वह अन्य विषयीजनों केमुखों को देख-देख कर भूला रहता है और मृत्यु निकट आ जाती है।
ब्रुमेषु रंस्यन्सुतदारवत्सलोव्यवायदीनो विवशः स्वबन्धने ।
क्वचित्प्रमादादिगरिकन्दरे पतन्वललीं गृहीत्वा गजभीत आस्थित: ॥
१८॥
ब्रुमेषु--वृक्षों में ( अथवा वृक्षवत् घरों में जिनमें बन्दर एक डाली से दूसरी डाली पर कूदते रहते हैं ); रंस्थन्ू-- भोगता हुआ; सुत-दार-वत्सल:--बच्चों तथा पत्नी के प्रति अनुरक्त; व्यवाय-दीन:--विषय भोग के कारण दुर्बल हृदय वाला; विवश: --त्यागने मेंअक्षम; स्व-बन्धने--कर्मफल के बन्धन में; क्वचित्--कभी-कभी; प्रमादात्--आसत्न मृत्यु के भय से; गिरि-कन्दरे--पर्वतकी गुफा में; पतन्ू--गिरकर; वलल्लीम्ू--लताओं की शाखाएँ; गृहीत्वा--पकड़कर; गज-भीतः--मृत्यु रूपी हाथी से भयभीत;आस्थितः--उस स्थिति में रहा जाता है।
जब जीवात्मा एक शाखा से दूसरी शाखा पर कूदने वाले बन्दर के सहश बन जाता है, तोगृहस्थ जीवन के वृक्ष में मात्र विषय सुख ( संभोग ) के लिए रहता है।
इस प्रकार वह अपनीपत्नी से वैसे ही पाद-प्रहार पाता है जैसे कि गधा गधी से।
मुक्ति का साधन न पाने के कारण वह असहाय बनकर उसी अवस्था में रहता है।
कभी-कभी उसे असाध्य रोग हो जाता है जो पर्वत कीगुफा में गिरने जैसा है।
वह इस गुफा के पीछे रहने वाले मृत्यु रूपी हाथी से भयभीत हो उठता हैऔर लताओं की टहनियाँ पकड़े रहकर लटका रहता है।
अतः कथश्ञित्स विमुक्त आपदःपुनश्च सार्थ प्रविशत्यरिन्दम ।
अध्वन्यमुष्मिन्नजया निवेशितोभ्रमझ्जनोद्यापि न वेद कश्चन ॥
१९॥
अतः--इससे; कथज्ञित्--कुछ भी; सः--वह; विमुक्त:--मुक्त; आपद:--विपत्ति से; पुनः: च--फिर से; स-अर्थम्--जीवन मेंरुचि लेता हुआ; प्रविशति--प्रवेश करता है, प्रारम्भ करता है; अरिमू-दम--शत्रुओं के हंता, हे राजन्; अध्वनि-- भोग-पथ पर;अमुष्मिन्ू--उस; अजया--माया के प्रभाव से; निवेशित:--डूबा हुआ; भ्रमन्--घूमते हुए; जन:ः--बद्धजीव; अद्य अपि--मृत्युतक; न वेद--नहीं जानता; कश्चन--कुछ भी |
हे शत्रुओं के संहारक, महाराज रहूगण, यदि बद्धजीव किसी प्रकार से इस भयानक स्थितिसे उबर आता है, तो वह पुन: विषयी जीवन बिताने के लिए अपने घर को लौट जाता है, क्योंकिवही आसक्ति का मार्ग है।
इस प्रकार ईश्वर की माया से वशीभूत वह संसार रूपी जंगल में घूमतारहता है।
मृत्यु के निकट पहुँच कर भी उसे अपने वास्तविक हित का पता नहीं चल पाता।
रहूगण त्वमपि ह्ाध्वनोस्यसन्न्यस्तदण्ड: कृतभूतमैत्र: ।
असजितात्मा हरिसेवया शितंज्ञानासिमादाय तरातिपारम् ॥
२०॥
रहूगण--हे राजा रहूगण; त्वम्ू--तुम; अपि-- भी; हि--निश्चय ही; अध्वन:--संसार पथ का; अस्य--इस; सन्न्यस्त-दण्ड:--अपराधियों को दण्ड देने वाले राज-दण्ड को त्याग कर; कृत-भूत-मैत्र:-- प्रत्येक प्राणी के मित्र बन कर; असत्-जित-आत्मा--जिसका मन जीवन के भौतिक सुख के प्रति आकृष्ट नहीं होता; हरि-सेवया--परमे श्वर की प्रेममय सेवा के द्वारा;शितम्--पैनी; ज्ञान-असिम्--ज्ञान की तलवार; आदाय--हाथ में लेकर; तर--पार करो; अति-पारमू--उस अन्तिम छोर को( दूसरे पार )?
है राजा रहूगण, तुम भी भौतिक सुख के प्रति आकर्षण-मार्ग में स्थित होकर माया केशिकार हो।
मैं तुम्हें राज पद तथा उस दण्ड का जिससे अपराधियों को दण्डित करते हो परित्यागकरने की सलाह देता हूँ जिससे तुम समस्त जीवात्माओं के सुहृद ( मित्र ) बन सको।
विषयभोगोंको त्याग कर अपने हाथ में भक्ति के द्वारा धार लगायी गयी ज्ञान की तलवार को धारण करो।
तब तुम माया की कठिन ग्रंथि को काट सकोगे और अज्ञानता के सागर को पार करके दूसरेछोर पर जा सकोगे।
राजोबाचअहो नृजन्माखिलजन्मशोभनंकि जन्मभिस्त्वपरैरप्यमुष्मिन् ।
न यद्धृषीकेशयश:ःकृतात्मनांमहात्मनां वः प्रचुर: समागमः ॥
२१॥
राजा उबाच--राज रहूगण ने कहा; अहो--ओह; नृ-जन्म--मनुष्य का जन्म लेने वाले तुम; अखिल-जन्म-शोभनम्--सर्वयोनियों में श्रेष्ठ; किमू--क्या आवश्यकता; जन्मभि:ः--स्वर्ग लोकों के देवता जैसी उच्चयोनि में जन्म लेने से; तु--लेकिन;अपरैः--अन्यान्य, निकृष्ट; अपि--निस्संदेह; अमुष्मिन्-- अगले जन्म में; न--नहीं; यत्--जो; हषीकेश-यशः:-- समस्त इन्द्रियोंके स्वामी श्रीभगवान् हषीकेश के पवित्र यश से; कृत-आत्मनाम्--जिनके हृदय विमल हैं, शुद्ध अन्तःकरण वाले; महा-आत्मनाम्--महात्माओं की; व:--हम सबकी; प्रचुर: --अत्यधिक; समागम:--संगति |
राज रहूगण ने कहा--यह मनुष्य जन्म समस्त योनियों में श्रेष्ठ है।
यहाँ तक कि स्वार्ग मेंदेवताओं के बीच जन्म लेना उतना यश्पूर्ण नहीं जितना कि इस पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में जन्मलेना।
तो फिर देवता जैसे उच्च पद का क्या लाभ ? स्वर्गलोक में अधाह भोग-सामग्री के कारणदेवताओं को भक्तों की संगति का अवसर ही नहीं मिलता।
न ह्वद्भधुतं त्वच्चरणाब्जरेणुभि-ईतांहसो भक्तिरधो क्षजेउमला ।
मौहूर्तिकाह्यस्थ समागमाच्च मेदुस्तर्कमूलोडपहतोविवेक: ॥
२२॥
न--नहीं; हि--निश्चय ही; अद्भुतम्--अद्भुत; त्वत्ू-चरण-अब्ज-रेणुभि:--आपके चरणकमलों की धूलि से; हत-अंहस:--पाप के फल से मुक्त मैं; भक्ति:--प्रेम तथा भक्ति; अधोक्षजे-- श्री भगवान् में, जो व्यवहार-ज्ञान की पकड़ से परे है; अमला--सांसारिक कल्मषों से रहित, विमल; मौहूर्तिकात्-- क्षणिक; यस्य--जिसके ; समागमात्-- आगमन तथा संगति से; च--भी;मे--मेरा; दुस्तर्क--झूठ तर्को का, कुतरकों का; मूल:--मूल, मूलकारण; अपहत:--पूर्णतया विनष्ट हो गया; अविवेक:--अज्ञान।
यह कोई विचित्र बात नहीं है कि केवल आपके चरण-कमलों की धूलि से धूसरित होने सेमनुष्य तुरन्त विशुद्ध भक्ति के अधोक्षज पद को प्राप्त होता है जो ब्रह्म जैसे महान् देवताओं केलिए भी दुर्लभ है।
आपके क्षणमात्र के समागम से अब मैं समस्त तर्को, अहंकार तथा अविवेकसे मुक्त हो गया हूँ जो इस भौतिक जगत में बंधन के मूल कारण हैं।
मैं अब इन समस्त झंझटों सेमुक्त हूँ।
नमो महदभ्योउस्तु नमः शिशुभ्योनमो युवभ्यो नम आवटुभ्य: ।
ये ब्राह्मणा गामवधूतलिड्र-श्वरन्ति तेभ्य: शिवमस्तु राज्ञामू ॥
२३॥
नमः--नमस्कार है; महद्भ्य:--महापुरुषों को; अस्तु--हो; नमः--मेरा नमस्कार; शिशुभ्य:--जो महापुरुष शिशु रूप में हो,उनको; नमः --सादर नमस्कार; युवभ्य:--जो युवा ( तरुण ) हों, उन्हें; नम:--सादर नमस्कार; आ-वटुभ्य:--जो बालक केरूप में हों उन्हें; ये--जो सब; ब्राह्मणा:--दिव्य ज्ञान में सिद्ध; गाम्--पृथ्वी; अवधूत-लिज्लः--विभिन्न शारीरिक वेषों में छिपेरहने वाले; चरन्ति--घूमते रहते हैं; तेभ्य:--उनसे; शिवम् अस्तु--कल्याण हो; राज्ञामू--राजाओं को ( जो सदैव गर्वित रहतेहैं)म?
ैं उन महापुरुषों को नमस्कार करता हूँ जो इस धरातल पर शिशु, तरुण बालक, अवधूतया महान् ब्राह्मण के रूप में विचरण करते हैं।
यदि वे विभिन्न वेशों में छिपे हुए हैं, तो भी मैं उनसबको नमस्कार करता हूँ।
उनके अनुग्रह से उनका अपमान करने वाले राजवंशों का कल्याणहो।
श्रीशुक उबाचइत्येवमुत्तरामातः स बै ब्रह्मर्षिसुतः सिन्धुपतय आत्मसतत्त्वं विगणयतः परानुभावः'परमकारुणिकतयोपदिश्य रहूगणेन सकरुणमभिवन्दितचरण आपूर्णार्णव इव निभृतकरणोर्म्याशयोधरणिमिमां विचचार ॥
२४॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति एवम्--इस प्रकार; उत्तरा-मात:--हे माता उत्तरा के पुत्र, महाराजपरीक्षित; सः--वह ब्राह्मण; वै--निस्संदेह; ब्रह्म -ऋषि-सुतः --अत्यन्त शिक्षित ब्राह्मण का पुत्र, जड़ भरत; सिन्धु-पतये--सिंधुराज्य के राजा को; आत्म-स-तत्त्वम्ू--आत्मा की वास्तविक स्वाभाविक स्थिति; विगणयत:--जड़ भरत का अपमान करने परभी; पर-अनुभाव:--परम आत्मज्ञानी; परम-कारुणिकतया--पतित-आत्माओं के प्रति अत्यन्त दयालु होने के कारण;उपदिश्य--उपदेश देकर; रहूगणेन--राजा रहूगण के द्वारा; स-करुणम्--दीनभाव से; अभिवन्दित-चरण: --जिसकेचरणकमलों की बन्दना की गई; आपूर्ण-अर्णव: इब--परिपूर्ण सागर के समान; निभृत--पूर्णतया शान्त; करण--इन्द्रियों की;ऊर्मि--लहरें; आशय: --अन्तःकरण में; धरणिम्--पृथ्वी पर; इमामू--इस; विचचार--घूमने लगे ।
श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा, हे राजन्, हे उत्तरा-पुत्र, राजा रहूगण द्वारा अपनीपालकी ढोये जाने के लिए बाध्य किये जाने से अपमानित होकर जड़ भरत के मन में असंतोषकी कुछकुछ लहरें थीं, किन्तु उन्होंने इनकी उपेक्षा की और उनका हृदय पुनः सागर के समानशान्त हो गया।
यद्यपि राजा रहूगण ने उनका अपमान किया, किन्तु वे महान् परमहंस थे।
वैष्णवहोने के नाते वे परम दयालु थे, अतः उन्होंने राजा को आत्मा की वास्तविक स्वाभाविक स्थितिबतलाई।
तब उन्हें अपमान भूल गया, क्योंकि राजा रहूगण ने विनीत भाव से उनके चरणकमलोंपर क्षमा माँग ली थी।
इसके बाद वे पुनः पूर्ववत् सारे विश्व का भ्रमण करने लगे।
सौबीरपतिरपि सुजनसमवगतपरमात्मसतत्त्व आत्मन्यविद्याध्यारोपितां च देहात्ममतिं विससर्ज; एवं हिनृप भगवदाश्रिताअतानुभावः ॥
२५॥
सौवीर-पतिः--सौवीर राज्य का राजा; अपि--निश्चय ही; सु-जन--महापुरुष से; समवगत-- भली-भाँति अवगत होकर,जानकर; परमात्म-स-तत्त्व:--आत्मा तथा परमात्मा की स्वाभाविक स्थिति की सत्यता; आत्मनि--अपने आप में; अविद्या--अज्ञान से; अध्यारोपिताम्-- भूल से आरोपित; च--तथा; देह--शरीर में; आत्म-मतिम्--स्व-बोध; विससर्ज--पूर्णतया त्यागदिया; एवम्--इस प्रकार; हि--निश्चय ही; नृप--हे राजन; भगवत्-आश्रित-आश्रित-अनुभाव: -- परम्परानुसार सदगुरु कीशरण में आये हुए भक्त की शरण में ( जो निश्चित रूप से अविद्या रूपी देहात्म-बुद्धि को निकाल पाने में समर्थ है )?
परम भक्त जड़ भरत से उपदेश ग्रहण करने के पश्चात् सौवीर का राजा रहूगण आत्मा कीस्वाभाविक स्थिति से पूर्णतया परिचित हो गया।
उसने देहात्मबुद्धि का सर्वश: परित्याग करदिया।
हे राजन, जो भी ईश्वर के भक्त के दास की शरण ग्रहण करता है, वह धन्य है, क्योंकिवह बिना कठिनाई के देहात्मबुद्धि त्याग सकता है।
यो ह वा इह बहुविदा महाभागवत त्वयाभिहितः परोक्षेण वचसा जीवलोकभवाध्वा स ह्ार्यमनीषया'कल्पितविषयो नाञझसाव्युत्पन्नलोकसमधिगम:; अथ तदेवैतहुरवगमं समवेतानुकल्पेन निर्दिश्यतामिति ॥
२६॥
राजा उबाच--राजा परीक्षित ने कहा; यः--जो; ह--निश्चय ही; वा--अथवा; इह--इस वर्णन में; बहु-विदा--दिव्य ज्ञान कीअनेक घटनाओं को जानने वाले; महा-भागवत--हे परम भक्त साधु; त्वया--आपके द्वारा; अभिहित: --वर्णित; परोक्षेण--अलंकारिक रीति से; वचसा--शब्दों से; जीव-लोक-भव-अध्वा--बद्धजीव का संसार रूप मार्ग; सः--वह; हि--निस्संदेह;आर्य-मनीषया--सिद्ध भक्तों की बुद्धि से; कल्पित-विषय:ः --कल्पना किया गया विषय; न--नहीं; अद्सा- प्रत्यक्ष;अव्युत्पन्न-लोक--अल्प बुद्धि वाले पुरुष; समधिगम:--पूर्ण ज्ञान; अथ--अत:; तत् एब--उसके कारण; एतत्--यह विषय;दुरबगमम्-दुर्बोध, समझने में कठिन; समवेत-अनुकल्पेन--ऐसी घटनाओं ( रूपक ) का स्पष्टीकरण करने वाले;निर्दिश्यताम्--वर्णन करें; इति--इस प्रकार?
तब राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से कहा--हे स्वामी, हे परम भक्त साधु, आपसर्वज्ञाता हैं।
आपने जंगल के वणिक के रूप में बद्धजीव की स्थिति का अत्यन्त मनोहर वर्णनकिया है।
इन उपदेशों से कोई भी बुद्धिमान मनुष्य समझ सकता है कि देहात्मबुद्धि वाले पुरुषकी इन्द्रियाँ उस जंगल में चोर-उचक्कों सी हैं और उसकी पत्नी तथा बच्चे सियार तथा अन्य हिंस्त्रपशुओं के तुल्य हैं।
किन्तु अल्पज्ञानियों के लिए इस आख्यान को समझ पाना सरल नहीं हैक्योंकि इस रूपक का सही-सही अर्थ निकाल पाना कठिन है।
अतः मैं आपसे प्रार्थना करता हूँकि इसका अर्थ स्पष्ट करके बताएँ।
