← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 5 की सूची
अध्याय चौदह: भौतिक संसार आनंद के महान वन के रूप में
5.14स होवाचस एषदेहात्ममानिनांसत्त्वादिगुणविशेषविकल्पितकुशलाकुशलसमवहारविनिर्मितविविधदेहावलिभिर्वियोगसंयोगाद्यनादिसंसगरानुभवस्य द्वारभूतेन षडिन्द्रियवर्गेण तस्मिन्दुर्गाध्ववदसुगमेध्वन्यापतित ईश्वरस्थ भगवतोविष्णोर्वशवर्तिन्या मायया जीवलोकोयं यथा वणिक्सार्थो<र्थपर: स्वदेहनिष्पादितकर्मानुभव:इमशानवदशिवतमायां संसाराटव्यां गतो नाद्यापि विफलबहुप्रतियोगेहस्तत्तापोपशमनींहरिगुरुचरणारविन्दमधुकरानुपदवीमवरुन्धे ॥
१॥
सः--स्वरूपसिद्ध भक्त ( श्रीशुकदेव गोस्वामी ) ने; ह--निस्संदेह; उवाच--कहा; सः--वह ( बद्ध-आत्मा ); एष: --यह; देह-आत्म-मानिनाम्--अज्ञानवश देह को अपना मानने वाले व्यक्तियों का; सत्त्त-आदि--सत्त्व, रज तथा तम के; गुण--गुणों केद्वारा; विशेष--विशेष; विकल्पित--अज्ञानवश कल्पित; कुशल--कभी-कभी अनुकूल कर्मो द्वारा; अकुशल--कभी-कभीप्रतिकूल कर्मो के द्वारा; समवहार--दोनों के मिश्रण द्वारा, समवहार से; विनिर्मित--प्राप्त; विविध--नाना प्रकार के; देह-आवलिभिः--देहों की श्रृंखला के द्वारा; वियोग-संयोग-आदि--एक प्रकार के देह का त्याग ( वियोग ) तथा अन्य की स्वीकृति( संयोग ) द्वारा; अनादि-संसार-अनुभवस्य--देहान्तर की अनादि प्रक्रिया की प्रतीति का; द्वार-भूतेन--द्वारों के रूप में विद्यमानहोकर; षट्-इन्द्रिय-वर्गंण--इन छः इन्द्रियों ( मन तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियों आँख, कान, जीभ, नाक तथा त्वचा ) द्वारा; तस्मिन्ू--उस पर; दुर्ग-अध्व-वत्--दुल्ल॑घ्य पथ की भाँति; असुगमे--पार करने में सुगम न होने से; अध्वनि--वन के पथ पर;आपतितः--पड़ कर; ईश्वरस्थ--नियन्ता का; भगवतः -- श्रीभगवान् ; विष्णो: -- भगवान् विष्णु के; वश-वर्तिन्या --वश मेंरहकर कर्म करते हुए; मायया--माया द्वारा; जीव-लोक:--बद्ध जीवात्मा; अयम्--यह; यथा--जैसे; वणिक्--व्यापारी,बनिया; स-अर्थ:--उद्देश्य सहित, सोह्देश्य; अर्थ-पर:--धन में आसक्त; स्व-देह-निष्पादित-- अपने देह से किया गया; कर्म--कार्यों का फल; अनुभव:--जो अनुभव करता है; श्मशान-वत् अशिवतमायाम्-- अशुभ एमशान भूमि के सहृश; संसार-अटवब्याम्-- भौतिक जीवन के वन में; गतः--प्रवेश करने पर; न--नहीं; अद्य अपि--अब तक; विफल--असफल; बहु-प्रतियोग--अनेक विघ्नों तथा दुखों से पूर्ण; ईंह:--इस भौतिक जगत में जिनके कार्य; तत्ू-ताप-उपश-मनीम्-- भौतिक जीवनरूपी बन के दुखों को शान्त करने वाला; हरि-गुरु-चरण-अरविन्द-प्रभु तथा भक्तों के चरणारविन्द में; मधुकर-अनुपदवीम्-- भ्रमर सहश अनुरक्त भक्तों के अनुगमन का पथ; अवरुन्धे-्राप्त
राजा परीक्षित् ने जब श्रीशुकदेव गोस्वामी से भौतिक वन का अर्थ स्पष्ट करने के लिए कहातो उन्होंने इस प्रकार उत्तर दिया--हे राजनू, वणिक की रुचि सदैव धन उपार्जन के प्रति रहतीहै।
कभी-कभी वह लकड़ी तथा मिट्टी जैसी कुछ अल्पमूल्य की वस्तुएँ प्राप्त करने और उन्हें लेजाकर नगर में अच्छे मूल्य में विक्रय करने की आकांक्षा से वन में प्रवेश करता है।
इसी प्रकार बद्धजीव लोभवश कुछ भौतिक सुख-लाभ करने की इच्छा से इस भौतिक जगत में प्रवेशकरता है।
धीरे-धीरे वह वन के सघन भाग में प्रवेश करता है तथा वह यह नहीं जानता कि बाहरकैसे निकले।
इस भौतिक जगत में प्रवेश करके शुद्ध जीव सांसारिकता में बँध जाता है, जोभगवान् विष्णु के नियंत्रण में उनकी बहिरंगा शक्ति (माया ) उत्पन्न करती है।
इस प्रकारजीवात्मा बहिरंगा शक्ति दैवी माया के वशीभूत हो जाता है।
स्वतंत्र होने तथा वन में भटकने केकारण वह भगवान् की सेवा में सदैव तत्पर रहने वाले भक्तों का संग प्राप्त नहीं कर पाता।
एकबार देहात्मबुद्धि के कारण वह माया के वशीभूत होकर और भौतिक गुणों ( सत्त्व, रज् तथातम् ) के द्वारा प्रेरित होकर एक के पश्चात् एक अनेक प्रकार के शरीर धारण करता है।
इसप्रकार बद्धजीव कभी स्वर्गलोक तो कभी भूलोक और कभी पाताललोक तथा निम्न योनियों मेंप्रवेश करता है।
इस प्रकार अनेक देहों के कारण वह निरन्तर कष्ट सहन करता है।
ये कष्ट तथापीड़ाएँ कभी-कभी मिश्रित रहती हैं।
कभी तो ये असहा होती हैं, तो कभी नहीं।
ये शारीरिकदशाएँ बद्धजीव को मनोकल्पना के कारण प्राप्त होती हैं।
वह अपने मन तथा पंचेन्द्रियों काउपयोग ज्ञान-प्राप्ति के लिए करता है और इन्हीं से विभिन्न देहें तथा विभिन्न दशाएँ प्राप्त होती हैं।
बहिरंगा शक्ति माया के नियंत्रण में इन इन्द्रियों का उपभोग करके जीव को दुख उठाना पड़ताहै।
वह वास्तव में छुटकारा पाने की खोज में रहता है, किन्तु सामान्य रूप से वह भटकता है,यद्यपि कभी-कभी अत्यन्त कठिनाई के पश्चात् उसे छुटकारा मिल जाता है।
इस प्रकार अस्तित्त्वके लिए संघर्षशील रहने के कारण उसे भगवान् विष्णु के चरणारबिन्दों में भ्रमरों के समानअनुरक्त भक्तों की शरण नहीं मिल पाती है।
यस्यामु ह वा एते षडिन्द्रियनामान: कर्मणा दस्यव एव ते; तद्यथा पुरुषस्य धनं यत्किद्धिद्धर्मोपयिकंबहुकृच्छाधिगतं साक्षात्परमपुरुषाराधनलक्षणो योसौ धर्मस्तं तु साम्पराय उदाहरन्ति; तद्धर्म्य धनदर्शनस्पर्शनश्रवणास्वादनावप्राणसड्डुल्पव्यवसायगृहग्राम्योपभोगेन कुनाथस्याजितात्मनो यथा सार्थस्यविलुम्पन्ति ॥
२॥
यस्याम्--जिसमें; उ ह--निश्चय ही; वा-- अथवा; एते--ये सब; षट्-इन्द्रिय-नामान:--जो छः इन्द्रियाँ ( मन तथा पाँचज्ञानेन्द्रियाँ ) कहलाती हैं; कर्मणा-- अपने कर्म के द्वारा; दस्थव:ः--दस्यु ( लुटेरे ); एब--निश्चय ही; ते--वे; तत्--वह; यथा--जिस प्रकार; पुरुषस्य--व्यक्ति का; धनम्-- धन; यत्--जो भी; किश्ञित्-- थोड़ा; धर्म-औपयिकम्--धार्मिक सिद्धान्तों कासाधन; बहु-कृच्छु-अधिगतम्-- अतीव श्रम से उपार्जित; साक्षात्-- प्रत्यक्ष; परम-पुरुष-आराधन-लक्षण: --यज्ञ इत्यादि के द्वाराभगवान् की पूजा करना जिनके लक्षण हैं; यः--जो; असौ--वह; धर्म:--धार्मिक सिद्धान्त ( मर्यादा ); तमू--उसको; तु--किन्तु; साम्पराये--मृत्यु के पश्चात् जीवात्मा के लाभार्थ; उदाहरन्ति--बुद्धिमान घोषित करते हैं; ततू-धर्म्यम्-- धार्मिक( वर्णाश्रम धर्म के पालन से सम्बधित ); धनम्--धन; दर्शन--दर्शन द्वारा; स्पर्शन--स्पर्श द्वारा; श्रवण-- श्रवण द्वारा;आस्वादन--स्वाद के द्वारा; अवध्राण --सूँघकर; सड्डूल्प--निश्चय द्वारा; व्यवसाय--निष्कर्ष रूप में; गृह--घर में; ग्राम्य-उपभोगेन-- भौतिक उपभोग द्वारा; कुनाथस्य-- भ्रमित बद्ध जीवात्मा का; अजित-आत्मन: --जिसने अपने पर विजय प्राप्त नहींकी; यथा--जैसे; सार्थस्य--इन्द्रियों की तृप्ति में रुचि रखने वाले जीवात्मा का; विलुम्पन्ति--लूट लेते हैं|
संसार रूपी वन में अनियंत्रित इन्द्रियाँ दस्युओं के समान हैं।
बद्धजीव श्रीकृष्णभावनामृत केविकास के लिए कुछ धन अर्जित कर सकता है, किन्तु दुर्भाग्यवश अनियंत्रित इन्द्रियाँ अपनीतुष्टि द्वारा इस धन को लूट लेती हैं; इन्द्रियाँ दस्यु हैं, क्योंकि वे जीव को दर्शन, प्राण, आस्वाद,स्पर्श, श्रवण, संकल्प-विकल्प तथा कामना में अपना धन व्यर्थ व्यय करने के लिए बाध्यकरती हैं।
इस प्रकार बद्धजीव अपनी इन्द्रियों को तुष्ट करने के लिए बाध्य हो जाता है, जिससेउसका सारा धन व्यय हो जाता है।
यद्यपि यह धन यथार्थतः धार्मिक कृत्यों के सम्पादन हेतुअर्जित हुआ होता है, किन्तु दस्यु-इन्द्रियाँ इसका हरण कर लेती हैं।
अथ च यत्र कौटुम्बिका दारापत्यादयो नाम्ना कर्मणा वृकसृगाला एवानिच्छतो5पि कदर्यस्य कुटुम्बिनउरणकवत्संरक्ष्यमाणं मिषतोपि हरन्ति. ॥
३॥
अथ--इस प्रकार; च-- भी; यत्र--जिसमें; कौटुम्बिका:--कुटुम्बी जन; दार-अपत्य-आदय: --स्त्री तथा सन्तान इत्यादि;नाम्ना--केवल नाम के द्वारा; कर्मणा-- अपने आचरण के द्वारा; वृक-सूगाला:--भेड़िया तथा श्रूगाल; एब--निश्चित रूप से;अनिच्छत:--ऐसा मनुष्य जो अपने धन को व्यय करने का अनिच्छुक है; अपि--निश्चय ही; कदर्यस्थ--अत्यन्त कृपण प्राणी,कंजूस का; कुटुम्बिन:--परिवार के प्राणियों से घिरा हुआ; उरणक-वत्--मेमने की भाँति; संरक्ष्यमाणम्--यद्यपि सुरक्षित है;मिषतः--जो देख रहा है; अपि-- भी, ही; हरन्ति--बलपूर्वक छीन लेते हैं।
हे राजनू, इस भौतिक जगत में स्त्री-पुत्रादि नाम से पुकारे जाने वाले कुटुम्बीजन वास्तव मेंभेड़ियों तथा श्रृूगालों की भाँति व्यवहार करते हैं।
चरवाहा अपनी भेड़ों की रक्षा यथाशक्तिकरना चाहता है, किन्तु भेड़िये तथा लोमड़ियाँ उन्हें बलपूर्वक उठा ले जाते हैं।
इसी प्रकार यद्यपिकंजूस पुरुष सतर्कतापूर्वक अपने धन की चौकसी रखना चाहता है, किन्तु उसके पारिवारिकप्राणी उसकी समस्त सम्पत्तियों को उसके जागरूक रहते हुए भी बलपूर्वक छीन लेते हैं।
यथा ह्नुवत्सरं कृष्यमाणमप्यदग्धबीजं क्षेत्र पुन्रेवावपनकाले गुल्मतृणवीरुद्धिर्गह्दरमिव भवत्येवमेवगृहा श्रम: कर्मक्षेत्रं यस्मिन्न हि कर्माण्युत्सीदन्ति यदयं कामकरण्ड एब आवसथः ॥
४॥
यथा--जिस प्रकार; हि--निश्चय ही; अनुवत्सरम्--प्रत्येक वर्ष; कृष्यमाणम्--जोती जाने पर; अपि--यद्यपि; अदग्ध-बीजम्--बिना जले हुए बीज; क्षेत्रमू--खेत; पुनः --फिर; एव--निश्चय ही; आवपन-काले--बीजों को बोते समय; गुल्म--झाड़ियों से; तृण--घास-फूस से; वीरुद्धिः--लताओं से; गह्वरम् इब--कुंज तुल्य; भवति--हो जाता है; एवम्--इस प्रकार;एव--निश्चय ही; गृह-आश्रम:--पारिवारिक जीवन, गृहस्था श्रम; कर्म-क्षेत्रमू--कार्य रूप खेत, कर्मभूमि; यस्मिन्ू--जिसमें;न--नहीं; हि--निश्चय ही; कर्माणि उत्सीदन्ति--सकाम कर्म विलुप्त हो जाते हैं; यत्ू--अत:; अयम्--यह; काम-करण्ड:--'फलवती इच्छाएँ; एषघ:--यह; आवसथः --आवास, निकेतन।
कृषक प्रतिवर्ष अपने अनाज के खेत को जोतकर सारा घास-फूस निकालता रहता है, तो भी उनके बीज उसमें पड़े रहते हैं और पूरी तरह न जल पाने के कारण खेत में बोये गये पौधों केसाथ पुनः उग आते हैं।
घास-फूस को जोतकर पलट देने पर भी वे सघन रूप से उगयकर निकलआते हैं।
इसी प्रकार गृहस्थाश्रम एक कर्मक्षेत्र हे।
जब तक गृहस्थाश्रम भोगने की कामना पूरीतरह भस्म नहीं कर दी जाती, तब तक वह पुनः पुनः उदय होती रहती है।
पात्र में बन्द कपूर कोहटा लेने पर भी पात्र से सुगन्ध नहीं जाती।
उसी तरह जब तक कामनाओं के बीज विनष्ट नहींकर दिये जाते, तब तक सकाम कर्म का नाश नहीं होता।
तत्र गतो दंशमशकसमापसदैर्मनुजैः शलभशकुन्ततस्करमूषकादिभिरुपरु ध्यमानबहि:प्राण:क्वचित्परिवर्तमानोस्मिन्नध्वन्यविद्याकामकर्मभिरुपरक्तमनसानुपपतन्नार्थ नरलोकं गन्धर्वनगरमुपपन्नमितिमिथ्यादृष्टिरनुपश्यति, ॥
५॥
तत्र--उस गृहस्थ जीवन तक; गत:--जाकर; दंश--डाँस; मशक--मच्छर; सम--तुल्य; अपसदै:--निम्न वर्ग के; मनु-जै:--मनुष्यों द्वारा; शलभ--पतंगा, टिट्डी; शकुन्त--एक बड़ा शिकारी पक्षी; तस्कर--चोर; मूषक-आदिभि:--चूहों इत्यादि केद्वारा; उपरुध्यमान--सताया जाकर; बहिः-प्राण:--बाह्म प्राणवायु, जो धन आदि के रूप में होती है; क्वचित्--कभी;परिवर्तमान: -- भ्रमण करते हुए; अस्मिन्--इसमें; अध्वनि-- भौतिक जगत का मार्ग; अविद्या-काम--अज्ञान तथा लोभ से;कर्मभि: --एवं सकाम कर्मों के द्वारा; उपरक्त-मनसा--मन के प्रभावित हो जाने के कारण; अनुपपन्न-अर्थम्--जिसमें वांछित'फल कभी प्राप्त नहीं हो पाते; नर-लोकम्--यह भौतिक जगत; गन्धर्व-नगरम्--गंधर्वों की पुरी, हवाई महल; उपपन्नम्--विद्यमान; इति--ऐसा मानते हुए; मिथ्या-दृष्टि:--जिसको दृष्टि दोष हो; अनुपश्यति--देखता है
सांसारिक सम्पत्ति एवं वैभव में आसक्त गृहस्थाश्रम में बद्धजीव को कभी डाँस तथा मच्छर,तो कभी टिड्डी, शिकारी पक्षी व चूहे सताते हैं।
फिर भी वह भौतिक जगत के पथ पर चलतारहता है।
अविद्या के कारण वह लोभी बन जाता है और सकाम कर्म में लग जाता है।
चूँकिउसका मन इन कार्यकलापों में रमा रहता है इसलिए उसे यह भौतिक जगत नित्य लगता है,यदहापि यह गंधर्वनगर ( हवाई महल ) की भाँति अनित्य है।
तत्र च क्वचिदातपोदकनिभान्विषयानुपधावति पानभोजनव्यवायादिव्यसनलोलुप: ॥
६॥
तत्र--वहाँ ( इस गंधर्व नगर में ); च-- भी; क्वचित्--कभी-कभी; आतप-उदक-निभान्--मरुस्थल में मृगतृष्णा-जल केसमान; विषयान्--इन्द्रिय सुख की वस्तुओं के; उपधावति--पीछे दौड़ता है; पान--पीने के लिए; भोजन--खाने के लिए;व्यवाय--विषयी जीवन के लिए; आदि--इत्यादि; व्यसन--लत से; लोलुप:--विषयी |
बद्धजीव कभी-कभी इस गंधर्वपुरी में खाता, पीता और स्त्री-प्रसंग करता है।
अत्यधिकलगाव के कारण इन्द्रियसुखों के पीछे वह उसी प्रकार दौड़ता है जैसे मरुस्थल में मृगमरीचिकाके पीछे हिरण।
क्वचिच्चाशेषदोषनिषदनं पुरीषविशेषं तद्वर्णगुणनिर्मितमति: सुवर्णमुपादित्सत्यग्निकामकातरइवोल्मुकपिशाचम्, ॥
७॥
क्वचित्--कभी; च-- भी; अशेष--- अनन्त, सीमाहीन; दोष--दुर्गुणों का; निषदनम्--स््रोत; पुरीष--मल का; विशेषम्--विशिष्ट प्रकार के; तत्-वर्ण-गुण--रजोगुण के से रंगवाला ( अरुण ); निर्मित-मति:--जिसका मन उसी में रमा रहता है;सुवर्णम्--स्वर्ण; उपादित्सति--पाने की इच्छा करते हुए; अग्नि-काम--अग्नि की इच्छा से; कातर:--दुखी; इब--सहृश;उल्मुक-पिशाचम्--स्फुरदीप्ति ( कच्छ प्रकाश ) जिसे कभी भूत ( अगिया बेताल ) मान लिया जाता है।
कभी-कभी जीवात्मा स्वर्ण के नाम से पहचाने जाने वाले पीले मल की वांछा करके उसकोपाने के लिए दौड़ता है।
यह स्वर्ण भौतिक वैभव एवं ईर्ष्या का साधन है और इसके कारणजीवात्मा अवैध यौन-सम्बन्ध, द्यूत, मांसाहार तथा मादक द्रव्यों के सेवन में तत्पर होने में समर्थहोता है।
रजोगुणी व्यक्ति स्वर्ण के रंग से उसी प्रकार आकृष्ट होते हैं जिस प्रकार वन में जाड़े सेठिठुरता मनुष्य दलदल में दिखने वाले प्रकाश को अग्नि समझ बैठता है।
अथ कदाचितन्निवासपानीयद्रविणाद्यनेकात्मोपजीवनाभिनिवेश एतस्यां संसाराटव्यामितस्ततःपरिधावति ॥
८॥
अथ--इस प्रकार; कदाचित्ू--क भी -क भी; निवास--वासस्थान; पानीय--जल; द्रविण-- धन; आदि--इत्यादि; अनेक --विविध प्रकार के; आत्म-उपजीवन--जो देह तथा आत्मा को एकसाथ रखने के लिए आवश्यक समझे जाते हैं; अभिनिवेश: --पूर्णतया लीन; एतस्याम्--इस; संसार-अटबव्याम्--विशाल वन के सदृश इस भौतिक जगत में; इतः ततः--इधर-उधर;'परिधावति--चारों ओर दौड़ धूप करता है।
कभी-कभी यह बद्धजीव रहने के लिए वासस्थान खोजने एवं अपने शरीर की रक्षा के लिएजल तथा धन प्राप्त करने में लगा रहता है।
इन नाना प्रकार की आवश्यकताओं को जुटाने मेंसंलग्न रहने के कारण वह सब कुछ भूल जाता है और भौतिक अस्तित्त्व के जंगल में निरन्तरइधर-उधर दौड़-धूप करता रहता है।
क्वचिच्च वात्यौपम्यया प्रमदयारोहमारोपितस्तत्कालरजसा रजनीभूत इवासाधुमर्यादो रजस्वलाक्षोडपिदिग्देवता अतिरजस्वलमतिर्न विजानाति ॥
९॥
क्वचित्--क भी; च-- भी; वात्या औपम्यया--बवण्डर के सहृश; प्रमदया--सुन्दर स्त्री, रमणी; आरोहम् आरोपित: --यौन सुखके लिए अंक में बिठाई गई; तत्ू-काल-रजसा--तत्क्षण भोगेच्छा से; रजनी-भूतः--रात्रि का अंधकार; इब--सहश; असाधु-मर्याद:--सत्पुरुषों के समुचित आदर से रहित; रज:-बल-अक्ष:--आँखों में रजोगुण की धूल पड़ने से अंधी; अपि-- भी; दिक्-देवता:--दिशाओं के देवता, यथा सूर्य तथा चन्द्र; अतिरज:-वल-मति:ः--आसक्ति से पराजित बुद्धि; न विजानाति--नहीं जानपाता ( कि चारों दिशाओं के देवता उसके अविवेकी यौनाचार को देखते हैं )॥
कभी-कभी यह बद्ध आत्मा धूल के बवण्डर से अन्धे के समान स्त्री की सुन्दरता को देखताहै जिसे प्रमाद कहा जाता है।
इस प्रकार से अन्धा होकर वह सुन्दर स्त्री की गोद में जा बैठता है।
उस समय उसके विवेक पर भोगेच्छा विजय पाती है।
इस प्रकार वह वासना से प्रायः अन्धा होजाता है और काम-जीवन के समस्त नियमों का उललघंन करने लगता है।
उसे यह ज्ञान ही नहींरह जाता कि उसके इस उल्लंघन को अनेक देवता देख रहे हैं।
इस प्रकार वह भवितव्य दण्ड कोदेखे बिना अर्धरात्रि में अवैध यौन सुख का आनन्द लेता है।
क्वचित्सकृदवगतविषयवैतशथ्य: स्वयं पराभिध्यानेन विभ्रृंशितस्मृतिस्तयैवमरीचितोयप्रायांस्तानेवाभिधावति, ॥
१०॥
क्वचित्--कभी; सकृत्--एक बार; अवगत-विषय-वैतथ्य:--इन्द्रियतृप्ति पाने की निरर्थकता से सचेष्ट रहकर; स्वयम्--स्वतः; पर-अभिध्यानेन--स्वयं की देहात्म बुद्धि से; विभ्रेशित--विनष्ट; स्मृति:--जिसकी स्मृति; तया--उसके द्वारा; एब--निश्चय ही; मरीचि-तोय--मृगतृष्णा का जल; प्रायान्ू--के सहश; तान्--उन इन्द्रियों को; एब--निश्चय ही; अभिधावति--केपीछे दौड़ता है।
बद्धजीव कभी स्वतः सांसारिक विषयों का निरर्थकता स्वीकार कर लेता है, तो कभी वहभौतिक सुखों को दुखपूर्ण मानता है।
फिर भी अपनी उत्कट देहात्म-बुद्धि के कारण उसकीस्मृति विनष्ट हो जाती है और वह पुनः पुनः भौतिक सुखों के पीछे वैसे ही दौड़ता फिरता है जैसेमरुस्थल में मृगमरीत्विका के पीछे मृग।
क्वचिदुलूकझिल्लीस्वनवदतिपरुषरभसाटो पं प्रत्यक्ष परोक्ष॑ं वारिपुराजकुलनिर्भ््सितेनातिव्यथितकर्णमूलहदय:, ॥
११॥
क्वचित्--कभी-कभी; उलूक--उल्लू का; झिल्ली--झीं गुर; स्वन-वत्--अप्रिय ध्वनियों की तरह; अति-परुष--अत्यन्तकर्णपटु; रभस--थधैर्य से; आटोपम्--घर्षण; प्रत्यक्षम्-प्रत्यक्ष, प्रकटतः; परोक्षम्--अप्रत्यक्ष; वा--या; रिपु--शत्रुओं का;राज-कुल--शासक समुदाय का; निर्भरत्सितेन--ताड़ना या दण्डदान से; अति-व्यथित--अत्यन्त दुखी; कर्ण-मूल-हृदयः --जिसके कान तथा हृदय
कभी-कभी बद्धजीव अपने शत्रुओं तथा शासन-कर्मियों की प्रताड़ना से अत्यन्त व्यथितरहता है, जो प्रत्यक्ष रूप से कटु वचन कहते रहते हैं।
उस समय उसके हृदय ( मन ) तथा कानअतीव व्यथित एवं विषादपूर्ण हो जाते हैं।
ऐसी प्रताड़ना की तुलना उलूकों तथा झींगुरों कीअप्रिय झंकार से की जा सकती है।
स यदा दुग्धपूर्वसुकृतस्तदाकारस्करकाकतुण्डाद्यपुण्यद्रमलताविषोदपानवदुभयार्थशून्यद्रविणान्जी वन्मृतान्स्वयं जीवन्प्रियमाणउपधावति ॥
१२॥
सः--वह बद्ध आत्मा; यदा--जब; दुग्ध-- थकित, रिक्त; पूर्व--पहले का; सुकृत:--अच्छे कर्म; तदा--उस समय; कारस्कर-काकतुण्ड-आदि--कारस्कर, काकतुण्ड आदि नामधारी; अपुण्य-द्रुम-लता--अपवित्र वृक्ष तथा लताएँ; विष-उद-पान-वत्--विषैले जल से युक्त कुँए के समान; उभय-अर्थ-शून्य--जो न तो इस जन्म में न अगले जन्म में सुख दे सकता है;द्रविणान्ू--सम्पत्तिवान्; जीवतू-मृतान्ू--जीवित होकर भी जो मृतक तुल्य है; स्वयम्--वह स्वतः; जीवत्--सजीव;प्रियमाण: --मरा हुआ, मृत; उपधावति--सांसारिक लाभ के लिए निकट आता है।
पूर्वजन्मों में पवित्र कर्मों के कारण बद्ध-आत्मा को इस जीवन में भौतिक सुविधाएँ प्राप्तहोती हैं, किन्तु इनके समाप्त हो जाने पर वह ऐसी सम्पदा तथा धन का सहारा लेता है, जो न तोइस जीवन में न ही अगले जीवन में उसके सहायक होते हैं।
इसलिए वह जीवित मृत-तुल्यमनुष्यों का जिन के पास ये वस्तुएं होती है, सहारा लेना चाहता है।
ऐसे लोग अपवित्र वृक्षों,लताओं और विषैले कुओं के सहश हैं।
एकदासत्प्रसड़ान्निकृतमतिर्व्युदकस्त्रोत:स्खलनवदुभयतोपि दुःखदं पाखण्डमभियाति ॥
१३॥
एकदा--कभी-कभी; असत्-प्रसड्भात्--अभक्तों के संसर्ग से जो वैदिक नियमों के विरुद्ध हैं और अनेक धार्मिक सम्प्रदायों कोजन्म देते हैं; निकृत-मति:--जिनकी बुद्धि इस निम्न स्तर तक पहुँच चुकी होती है कि भगवान् के अस्तित्त्व को नकारते हैं;व्युदक-स्त्रोत:-- प्रचुर जल से रहित नदियों में; स्खलन-वबत्--कूदने के समान; उभयत:--दोनों ओर से; अपि--यद्यपि; दुःख-दम्--दुखदायी; पाखण्डम्--निरीश्वरवादी मार्ग, पाखण्ड; अभियाति--अनुसरण करता है।
कभी-कभी इस संसार अटवी में अपने कष्टों से मुक्ति पाने के लिए बद्धजीव पाखण्डियों केसस्ते आशीर्वाद प्राप्त करता है।
तब उनके सम्पर्क से उसकी मति भ्रष्ट हो जाती है।
यह उथलीनदी में कूदने के समान ही है।
इसका परिणाम यही होता है कि उसका सिर फूटता है।
इस प्रकारवह गर्मी से प्राप्त दुःखों को शान्त करने में समर्थ नहीं होता तथा दोनों ओर से उस की हानि होतीहै।
यह दिग्भ्रमित बद्धजीव तथाकथित साधुओं एवं स्वामियों की भी शरण में जाता है जोवेदविरुद्ध उपदेश देते हैं।
किन्तु इनसे उसे न तो वर्तमान में और न भविष्य में ही लाभ प्राप्त होताहै।
यदा तु परबाधयान्ध आत्मने नोपनमति तदा हि पितृपुत्रबर्हिष्मतः पितृपुत्रान्वा स खलु भक्षयति, ॥
१४॥
यदा--जब; तु--किन्तु ( दुर्भाग्यवश ); पर-बाधया-- अन्य सबों का शोषण करते हुए भी; अन्ध:--अन्धा; आत्मने--अपनेस्वयं के लिए; न उपनमति--हिस्से में नहीं आता; तदा--तब; हि--निश्चय रूप से; पितृ-पुत्र--पिता या पुत्रों का; बर्हिष्मत:--तृणवत्् तुच्छ; पितृ-पुत्रानू--पिता अथवा पुत्रों को; बा--अथवा; सः--वह ( बद्धजीव ); खलु--निस्सन्देह; भक्षयति--कष्टपहुँचाता है।
बद्धजीव जब अन्यों का शोषण करते रहने पर भी इस भौतिक संसार में अपना निर्वाह नहींकर पाता, तो वह अपने पिता या पुत्र का शोषण करने का प्रयास करता है और उसकी सम्पत्तिहर लेता है भले ही वे अति महत्वहीन ही क्यों न हों।
यदि वह पिता, पुत्र या किसी अन्य सम्बन्धीकी सम्पत्ति प्राप्त नहीं कर पाता तो यह उन्हें सभी प्रकार के कष्ट देने के लिए उद्यत हो उठता है।
क्वचिदासाद्य गृहं दाववत्प्रियार्थविधुरमसुखोदर्क शोकाग्निना दह्ममानो भृशं निर्वेदमुपगच्छति ॥
१५॥
क्वचित्--कभी-कभी; आसाद्य--अनुभव करके; गृहम्--गृहस्था श्रम को; दाव-बत्--दावाग्नि तुल्य; प्रिय-अर्थ-विधुरम्--किसी लाभप्रद प्रयोजन के बिना; असुख-उदर्कम्--अधिकाधिक दुख ही प्रतिफलित होता है; शोक-अग्निना--शोक की अग्निसे; दह्ममान:--सन्तप्त होकर; भूशम्--अत्यधिक; निर्वेदम्--निराशा; उपगच्छति--प्राप्त करता है।
इस संसार में गृहस्था श्रम दावाग्नि के तुल्य है।
इसमें तनिक भी सुख नहीं है और मनुष्यक्रमशः अधिकाधिक दुख में उलझता जाता है।
पारिवारिक जीवन में चिरन्तन सुख के लिए कुछभी अनुकूल नहीं होता।
गृहस्था श्रम में रहने के कारण बद्धजीबव पश्चात्ताप की अग्नि से संतप्तरहता है।
कभी वह अपने को अभागा मानते हुए कोसता है, तो कभी वह कहता है कि पूर्वजीवन में शुभ कर्म न करने के कारण ही वह कष्ट का भागी बन रहा है।
क्वचित्कालविषमितराजकुलरक्षसापहतप्रियतमधनासु: प्रमृतक इव विगतजीवलक्षण आस्ते ॥
१६॥
क्वचित्--कभी-क भी; काल-विष-मित--काल के द्वारा कुटिल बनाया गया; राज-कुल--शासक वर्ग; रक्षसा--राक्षसोंद्वारा; अपहत--हर लिये जाने पर; प्रिय-तम--सर्वाधिक प्रिय; धन--सम्पत्ति के रूप में; असु:--जिसकी प्राणवायु;प्रमृतक:--मृत; इब--सहृश, तुल्य; विगत-जीव-लक्षण:--जीवन के समस्त लक्षणों से शून्य; आस्ते--रह जाता है
शासन-कर्मी सदैव नरभक्षी राक्षसों के सह होते हैं।
ये शासन-कर्मी कभी-कभी बद्धजीवसे रुष्ट हो जाते हैं और उसकी सारी संचित सम्पत्ति उठा ले जाते हैं।
इस प्रकार अपने जीवन भरकी संचित पूँजी को खोकर बद्धजीव हतोत्साहित हो जाता है।
दरअसल, यह उसके लिएप्राणान्त के समान है।
कदाचिन्मनोरथोपगतपितृपितामहाद्यसत्सदिति स्वपणनिर्व॒ृतिलक्षणमनुभवति ॥
१७॥
कदाचित्--कभी-क भी; मनोरथ-उपगत--मन में कल्पना द्वारा प्राप्त; पितृ--पिता; पिता-मह-आदि--अथवा बाबा तथा अन्य;असतू--बहुत पूर्व मृत होने पर भी ( और यह न जानते हुए कि जीव चला गया है ); सत्--पिता या पितामह पुनः पधारते हैं;इति--ऐसा सोचकर; स्वप्न-निर्वृति-लक्षणम्--स्वप्न-सुख के समान; अनुभवति--( जीव ) अनुभव करता है।
कभी-कभी बद्धजीव यह कल्पना करने लगता है कि उसके पिता या बाबा अपने पुत्र यापौत्र के रूप में इस संसार में पुनः आ गए।
इस प्रकार उन्हें स्वणण का सा सुख अनुभव होता हैऔर कभी-कभी बद्धजीव को ऐसी मानसिक कल्पनाओं में सुख मिलता है।
क्वचिद्गृहा श्रमकर्मचोदनातिभरगिरिमारुरु क्षमाणो लोकव्यसनकर्षितमना: कण्टकशर्कराक्षेत्रंप्रविशन्निव सीदति ॥
१८॥
क्वचित्--कभी-कभी; गृह-आश्रम--गृहस्थ जीवन; कर्म-चोदन--सकाम कर्म का पालन; अति-भर-गिरिम्--ऊँची पहाड़ी;आरुरुक्षमाण: --चढ़ने की इच्छा लेकर; लोक-- भौतिक ( संसार ); व्यसन--लत; कर्षित-मना:ः--आकर्षित मन वाले;'कण्टक-शर्करा-द्षेत्रमू--काँटे तथा कंकड़ों से आच्छादित खेत में; प्रविशन्--घुसते हुए; इब--सद्ृश; सीदति--पश्चात्तापकरता है।
गृहस्थाश्रम में नाना प्रकार के यज्ञ तथा कर्मकाण्ड ( विशेष रूप से पुत्र-पुत्रियों के लिएविवाह यज्ञ और यज्ञोपवीत संस्कार ) करने होते हैं।
ये सभी गृहस्थ के कर्तव्य हैं।
ये अत्यन्तव्यापक होते हैं और इनको सम्पन्न करना कष्टदायक होता है।
इनकी उपमा एक बड़ी पहाड़ी सेदी जाती है, जिसे सांसारिक कर्मों में संलग्न होने पर लाँघना ही पड़ता है।
जो व्यक्ति इनअनुष्ठानों पर विजय प्राप्त करना चाहता है उसे पहाड़ी में चढ़ते समय काँटों तथा कंकड़ों केचुभने से होने वाली पीड़ा का-सा अनुभव करना होता है।
इस प्रकार बद्धजीव को अनन्तयातनाएँ सहनी पड़ती हैं।
क्वचिच्च दुःसहेन कायाभ्यन्तरवह्निना गृहीतसारः स्वकुटुम्बाय क्रुध्यति ॥
१९॥
क्वचित् च--और कभी-कभी; दुःसहेन-- असहा; काय-अभ्यन्तर-वह्निना--शरीर के अन्तर्गत क्षुधा तथा पिपासा की अग्नि केकारण; गृहीत-सार: -- धैर्य चुकने पर; स्व-कुटुम्बाय--अपने ही कुट॒म्बी जनों पर; क्रुध्यति--क्रुद्ध होता है, नाराज होता है।
कभी-कभी शारीरिक भूख और प्यास से त्रस्त बद्धजीव इतना विचलित हो जाता है किउसका थैर्य टूट जाता है और वह अपने ही प्रिय पुत्रों, पुत्रियों तथा पत्नी पर रूष्ट हो जाता है।
इसप्रकार निष्ठर होने पर उसकी यातना और भी बढ़ जाती है।
स एव पुनर्निद्राजगरगृहीतो उन््थे तमसि मग्न: शून्यारण्य इव शेते नान्यत्किज्ञन वेद शव इवापविद्धः ॥
२०॥
सः--वह बद्धजीव; एव--निश्चय ही; पुन:--फिर से; निद्रा-अजगर--गहरी नींद रूपी अजगर द्वारा; गृहीत:--भक्षण कियेजाने पर; अन्धे--घनान्धकार में; तमसि--अज्ञान में; मग्न: --लिप्त; शून्य-अरण्ये--वीरान वन में; इब--के समान; शेते--लेटजाता है; न--नहीं; अन्यत्-- अन्य; किज्लन-- कुछ भी; वेद--जानता है; शवः--मृत शरीर; इब--सहश; अपविद्ध:--फेंकाहुआ।
शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित् से आगे कहते हैं--प्रिय राजन्, निद्रा अजगर के समानहै।
जो मनुष्य भौतिक जीवनरूप वन में विचरण करते रहते हैं उन्हें निद्रा-अजगर अवश्य हीनिगल जाता है।
इस अजगर द्वारा डसे जाने के कारण वे अज्ञान-अंधकार में खोये रहते हैं।
वेसुदूर वन में मृत शरीर की भाँति फेंक दिये जाते हैं।
इस प्रकार बद्धजीव समझ नहीं पाता किजीवन में क्या हो रहा है।
कदाचिद्धग्नमानदंष्टी दुर्जनदन्दशूकैरलब्धनिद्राक्षणोव्यधितहृदयेनानुक्षीयमाणविज्ञानो उन््धकूपेउन्धवत्पतति, ॥
२१॥
कदाचित्--कभी-कभी; भग्न-मान-दंष्ट: --गर्व रूपी दाँत टूटे हैं जिसके; दुर्जन-दन्द-शूकै:--सर्प तुल्य दुष्ट पुरुषों की ईर्ष्याके कारण; अलब्ध-निद्रा-क्षण:--जिसे सोने का सुअवसर प्राप्त नहीं हो पाता; व्यधित-हदयेन--विश्लुब्ध मन से;अनुक्षीयमाण--क्रमशः ह्ास होते हुए; विज्ञान:--जिसका अन््तर्बोध; अन्ध-कूपे--अंध कुएँ में; अन्ध-वत्--छलावे की तरह;'पतति--गिर पड़ता है।
कभी-कभी भौतिक जगत रूपी वन में बद्धजीव सर्पो तथा अन्य जन्तुओं जैसे ईर्ष्यालुशत्रुओं के द्वारा दंशित होता रहता है।
शत्रु के छलावे से बद्धजीव अपने प्रतिष्ठित पद से च्युत होजाता है।
चिन्ताकुल होने से उसे ठीक से नींद तक नहीं आती।
इस प्रकार वह अधिकाधिक दुखीहोता जाता है और क्रमशः अपना ज्ञान तथा चेतना खो बैठता है।
उसकी दशा उस स्थायी अन्धपुरुष के समान हो जाती है जो अज्ञान के अन्धकूप में गिर गया हो।
कहिं सम चित्काममधुलवान्विचिन्वन्यदा परदारपरद्॒व्याण्यवरुन्धानो राज्ञा स्वामिभिर्वा निहतः पतत्यपारेनिरये ॥
२२॥
कहिं सम चितू--कभी-कभी; काम-मधु-लवान्--इन्द्रियसुख ( विषय ) के लघु मधुकणों के सहश; विचिन्वन्ू--ढूँढते हुए;यदा--जब; पर-दार--परायी स्त्री; पर-द्रव्याणि-- परायी सम्पत्ति; अवरुन्धान:-- अपनी सम्पत्ति मानकर; राज्ञा--राजा के द्वारा;स्वामिभि: वा--अथवा स्त्री के पति वा सम्बन्धियों द्वारा; निहतः--बुरी तरह पिट कर; पतति--गिर पड़ता है; अपारे-- अपार,अछोर; निरये--नारकीय जीवन ( बलात्कार, अपहरण अथवा पराया धन चुराने जैसे कार्यों के लिए राजा द्वारा प्रदत्त कैद ) |
कभी-कभी बद्धजीव इन्द्रिय-तृप्ति से प्राप्त होने वाले क्षिणक सुख की ओर आकर्षित होताहै।
फलस्वरूप वह अवैध यौन-सम्पर्क में रत होता है अथवा पराये धन को चुराता है।
ऐसीअवस्था में वह राजा द्वारा बन्दी बना लिया जाता है।
या फिर उस स्त्री का पति या उसका संरक्षकउसे दण्डित करता है।
इस प्रकार किंचित् सांसारिक तुष्टि हेतु वह नारकीय स्थिति में जा पड़ता हैऔर बलात्कार, अपहरण, चोरी तथा इसी प्रकार के कृत्यों के लिए कारागार में डाल दिया जाताहै।
अथ च तस्मादुभयथापि हि कर्मास्मिन्नात्मन: संसारावपनमुदाहरन्ति ॥
२३॥
अथ--अब; च--और; तस्मात्--इस कारण; उभयथा अपि--इस जन्म में तथा अगले जन्म में; हि--निस्सन्देह; कर्म--सकामकर्म; अस्मिन्--इन्द्रिय सुख के इस मार्ग पर; आत्मन:--जीवात्मा का; संसार--भौतिक जीवन का; आवपनम्--खेत अथवास्रोत; उदाहरन्ति--वेदों का वचन है।
इसीलिए विद्वतूजन तथा अध्यात्मवादीगण कर्म के भौतिक मार्ग ( प्रवृत्ति ) की भर्त्सना करतेहैं, क्योंकि इस जन्म में तथा अगले जन्म में सांसारिक दुखों का आदि स्त्रोत तथा उसको'पल्लवित करने की आधार भूमि वही है।
मुक्तस्ततो यदि बन्धाद्देवदत्त उपाच्छिनत्ति तस्मादपि विष्णुमित्र इत्यनवस्थिति: ॥
२४॥
मुक्त:--मुक्तिप्राप्त; ततः--उससे; यदि--यदि; बन्धात्--राज्य कारावास से या स्त्री-रक्षक द्वारा प्रताड़ित होने पर; देव-दत्त:--देवदत्त नामक व्यक्ति; उपाच्छिनत्ति--उसका धन छीन लेता है; तस्मात्--देवदत्त से; अपि--पुनः ; विष्णु-मित्र:--विष्णुमित्रनामक व्यक्ति; इति--इस प्रकार; अनवस्थिति:-- धन एक स्थान पर न रहकर एक हाथ से दूसरे हाथ में चला जाता है|
यह बद्धजीव पराये धन को चुराकर या ठगकर किसी तरह से उसे अपने पास रखता है औरदण्ड से बच जाता है।
तब देवदत्त नामक एक अन्य व्यक्ति इस धन को उससे ठग लेता है।
इसीप्रकार विष्णुमित्र नामक एक तीसरा व्यक्ति यह धन देवदत्त से छीन लेता है।
यह धन किसी भीदशा में एक स्थान पर टिकता नहीं है।
यह एक हाथ से दूसरे हाथ में जाता रहता है।
अन्त मेंइसका कोई उपभोग नहीं कर पाता और यह श्रीभगवान् की सम्पत्ति बन जाता है।
क्वचिच्च शीतवाताद्यनेकाधिदैविक भौतिकात्मीयानां दशानां प्रतिनिवारणे कल्पो दुरन्तचिन्तया विषण्णआस्ते ॥
२५॥
क्वचित्--कभी-कभी; च-- भी; शीत-वात-आदि--ठंड तथा झंझा इत्यादि; अनेक--कई; अधिदैविक--देवों द्वारा उत्पन्न,दैविक; भौतिक--अधिभौतिक, अन्य जीवों द्वारा उत्पन्न; आत्मीयानामू--अध्यात्मिक, देह तथा मन द्वारा उत्पन्न; दशानाम्--कष्टपूर्ण दशाओं के; प्रतिनिवारणे--निवारण करने में; अकल्प:--अशक्य; दुरन््त--अत्यन्त कठोर; चिन्तया--चिन्ता केकारण; विषणण:--दुखी; आस्ते--रहता है ।
भौतिक जगत के तापत्रय से अपनी रक्षा न कर सकने के कारण बद्धजीव अत्यन्त दुखीरहता है और शोकपूर्ण जीवन बिताता है।
ये तीन प्रकार के संताप हैं--देवताओं द्वारा दियेजानेवाला मानसिक ताप, ( यथा हिमानी हवा तथा चिलचिलाती धूप ), अन्य जीवात्माओं द्वाराप्रदत्त ताप तथा मन एवं देह से उत्पन्न होने वाले ताप।
क्वचिन्मिथो व्यवहरन्यत्किश्निद्धनमन्ये भ्यो वा काकिणिकामात्रमप्यपहरन्यत्किद्धिद्दा विद्वेषमेतिवित्तशाठ्यात्, ॥
२६॥
क्वचित्--कभी-कभी; मिथ: -- परस्पर; व्यवहरन्--व्यवहार करते हुए; यत् किल्ञित्ू--जो कुछ भी थोड़ा सा; धनम्--धन;अन्येभ्य: --अन्यों से; बा--या; काकिणिका-मात्रम्--अत्यल्प धन ( बीस कौड़ी ); अपि--निश्चय ही; अपहरन्--ठग कर लेलेने पर; यत् कि्जित्--जो कुछ भी अल्प मात्रा; वा--या; विद्वेषम् एति--वैर उत्पन्न करता है; वित्त-शाठ्य्यात्ू--ठगने के'फलस्वरूप।
जहाँ तक धन के लेन-देन का सम्बन्ध है, यदि कोई मनुष्य किसी दूसरे की एक कौड़ी याइससे भी कम धन ठग लेता है, तो वे परस्पर शत्रु बन जाते हैं।
अध्वन्यमुष्मिन्नरिम उपसर्गास्तथासुखदुःखरागद्वेषभयाभिमानप्रमादोनन््मादशोकमोहलोभमात्सर्येर्यावमानश्षुत्पिपासाधिव्याधिजन्मजरामरणादयः ॥
२७॥
अध्वनि-- भौतिक जीवन के पथ पर; अमुष्मिनू--उस; इमे--ये सब; उपसर्गा:--शाश्वत कठिनाइयाँ; तथा--और; सुख--तथाकथित सुख; दुःख--कष्ट; राग--आसक्ति; द्वेष--घृणा; भय--डर; अभिमान--झूठा गर्व; प्रमाद-- भ्रम; उन्माद--पागलपन; शोक--शोक; मोह--मोह; लोभ--लालच; मात्सर्य--विद्वेष; ईर्ष्च--दुश्मनी, वैर; अवमान--अनादर; क्षुत्--क्षुधा;पिपासा-- प्यास; आधि--आपदाएँ; व्याधि--रोग; जन्म--जीव धारण करना; जरा--बुढ़ापा; मरण--मृत्यु; आदय:--इत्यादि।
इस भौतिक जगत में अनेकानेक कठिनाइयाँ आती हैं और ये सभी दुर्लघ्य हैं।
इनकेअतिरिक्त तथाकथित सुख, दुख, राग, द्वेष, भय, अभिमान, प्रमाद, उन््माद, शोक, मोह, लोभ,मत्सर, ईर्ष्या, अपमान, क्षुधा, पिपासा, आधि, व्याधि तथा जन्म, जरा, मरण से उत्पन्न होने वालीबाधाएँ आती हैं।
ये सभी मिलकर संसारी बद्धजीव को दुख के अतिरिक्त और कुछ नहीं देपातीं।
क्वापि देवमायया स्त्रिया भुजलतोपगूढ: प्रस्कन्नविवेकविज्ञानोयद्विहारगृहारम्भाकुलहदयस्तदा भ्रयावसक्तसुतदुहितृकलत्रभाषितावलोक विचेष्टितापह तह दयआत्मानमजितात्मापारेन्धे तमसि प्रहिणोति, ॥
२८ ॥
क्वापि--कहीं भी; देव-मायया--देवमाया के वश में होकर; स्त्रिया--सखी या पत्नी के रूप में; भुज-लता--वन की कोमललताओं के सदश सुन्दर बाहुओं के द्वारा; उपगूढ़:ः --अत्यधिक व्याकुल होकर; प्रस्कन्न--खोया हुआ; विवेक--सत् असत् काज्ञान; विज्ञान:--विज्ञान सम्बन्धी ज्ञान; यत्ू-विहार--पत्नी सुख के लिए; गृह-आरम्भ--घर की तलाश करने में; आकुल-हृदयः--व्याकुल चित्त होकर; तत्--उस घर की; आश्रय-अवसक्त--जो शरण में आये हुए हैं; सुत--पुत्रों का; दुहितृ--पुत्रियोंका; कलत्र--पत्ली का; भाषित-अवलोक --उनके सम्भाषणों तथा बाँकी चितवनों से; विचेष्टित--कार्यो से, चेष्टाओं से;अपहत-हृदयः--जिसका हृदय हर लिया गया है, संज्ञाशून्य; आत्मानम्ू--स्वयं; अजित--अवश; आत्मा--जिसका आत्मा;अपारे--अनन्त; अन्धे--घनान्धकार में; तमसि--नारकीय जीवन में; प्रहिणोति--गिरा देता है।
कभी-कभी बद्धजीव प्रमादवश मूर्तिमान माया ( अपनी पत्नी या प्रेयसी ) से आकर्षितहोकर स्त्री द्वारा आलिंगन किये जाने के लिए व्याकुल हो उठता है।
इस प्रकार वह अपनी बुद्धितथा जीवन-उद्देश्य के ज्ञान को खो देता है।
उस समय वह आध्यात्मिक अनुशीलन का प्रयास नकरके अपनी पत्नी या प्रेयसी में अत्यधिक अनुरक्त हो जाता है और उसके लिए उपयुक्त गृहआदि उपलब्ध कराने का प्रयत्त करता है, फिर वह इस घरबार में अत्यधिक व्यस्त हो जाता हैऔर अपनी पत्नी तथा बच्चों की बातों, चितवनों तथा कार्यकलापों में फँस जाता है।
इस प्रकारवह कृष्णभावनामृत से वंचित होकर लौकिक अस्तित्व के गहन अंधकार में गिर जाता है।
कदाचिदी श्वरस्य भगवतो विष्णोश्नक्रात्परमाण्वादिद्विपरार्धापवर्गकालोपलक्षणात्परिवर्तितेन वयसा रंहसाहरत आन्रह्मतृणस्तम्बादीनां भूतानामनिमिषतो मिषतां वित्रस्तहदयस्तमेवे श्रर कालचक्रनिजायुध॑साक्षाद्धगवन्तं यज्ञपुरुषमनाहत्य पाखण्डदेवता: कड्जुगृक्षबकवटप्राया आर्यसमयपरिहता:सड्डेत्येनाभिधत्ते ॥
२९॥
कदाचित्--कभी-कभी; ईश्वरस्थ--ई श्वर का; भगवतः -- श्री भगवान् के; विष्णो: -- भगवान् विष्णु का; चक्रात्ू-चक्र से;'परमाणु-आदि--सूक्ष्म परमाणुओं के काल से प्रारम्भ करके; द्वि-परार्ध--ब्रह्म के जीवन की अवधि; अपवर्ग--अन्त; काल--समय का; उपलक्षणात्--लक्षणों से; परिवर्तितेन--चक्कर लगाता हुआ; वयसा--आयुओं के क्रमानुसार; रंहसा--तेजी से;हरत:--हरण करके; आ-ब्रह्म --ब्रह्माजी से लेकर; तृण-स्तम्ब-आदीनाम्--श्षुद्रातिक्षुद्र तृण पर्यन्त; भूतानामू--समस्तजीवात्माओं का; अनिमिषत:ः--अपलक, निरन्तर; मिषताम्--जीवात्माओं की आँखों के सामने ( फिर भी वे रोक नहीं सकते );वित्रस्त-हदय:--मन में डर कर; तम्--उस ( ईश्वर ); एब--निश्चय ही; ईश्वरम्-- श्री भगवान् को; काल-चक्र-निज-आयुधम्--काल चक्र ही जिसका साक्षात् आयुध है; साक्षात्-प्रत्यक्षतः; भगवन्तम्ू-- श्रीभगवान्; यज्ञ-पुरुषम्--जो सभी प्रकार के यज्ञोंको स्वीकार करता है, यज्ञ पुरुष को; अनाहत्य--अनादर करके, परवाहकिये बिना; पाखण्ड-देवता:--ईश्वर के पाखण्डीअवतार ( मानवकल्पित भगवान् या देवता ); कड्ढू--बाज; गृक्ष--गीध; बक--बगुला; वट-प्राया:--कौंवों के सहश; आर्य-समय-परिहता: --आर्यो के द्वारा स्वीकृत प्रामाणिक वैदिक शास्त्रों से तिरस्कृत होकर; साद्जेत्येन--कपोलकल्पित अप्रामाणिकशास्त्रों द्वारा; अभिधत्ते--पूजा योग्य स्वीकार कर लेता है
श्रीकृष्ण द्वारा प्रयुक्त निजी आयुध हरिचक्र कहलाता है।
यह चक्र कालचक्र है।
यहपरमाणुओं से लेकर ब्रह्मा की मृत्युपर्यन्त फैला हुआ है और यह समस्त कर्मों को नियंत्रित करनेवाला है।
यह निरन्तर घूमता रहता है और ब्रह्माजी से लेकर क्षुद्रातिक्षुद्र तृण तक सभीजीवात्माओं का संहार करता है।
इस प्रकार प्राणी बाल्यपन से यौवन तथा प्रौढ़ अवस्था को प्राप्त करते हुए जीवन के अन्त तक पहुँच जाता है।
काल के इस चक्र को रोक पाना असम्भव है।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का निजी आयुध होने के कारण यह अत्यन्त कठोर है।
कभी-कभीबद्धजीव मृत्यु को निकट आया जानकर ऐसे व्यक्ति की पूजा करने लगता है जो उसे आसतन्नसंकट से उबार सके।
वह ऐसे श्रीभगवान् की परवाह नहीं करता जिनका आयुध अथक कालहै।
उल्टे वह अप्रामाणिक शास्त्रों में वर्णित मानवनिर्मित देवताओं की शरण में जाता है।
ऐसेदेवता बाज, गीध, बगुले तथा कौवे के तुल्य हैं।
वैदिक शास्त्रों में इनका वर्णन नहीं मिलता।
पास खड़ी मृत्यु शेर के आक्रमण की तरह है, जिससे न तो गीध, बाज, कौवे और न ही बगुलेबच सकते हैं।
जो पुरुष ऐसे अप्रामाणिक मानवनिर्मित देवताओं की शरण में जाता है उसे मृत्युके चंगुल से नहीं छुड़ाया जा सकता।
यदा पाखण्डिभिरात्मवज्धितैस्तैरुरु वद्धितो ब्रह्मकुलं समावसंस्तेषांशीलमुपनयनादिश्रौतस्मार्तकर्मानुष्ठानेन भगवतो यज्ञपुरुषस्याराधनमेव तदरोचयन्शूद्रकुलं भजतेनिगमाचारेशुद्धितो यस्य मिथुनीभाव: कुटुम्बभरणं यथा वानरजाते: ॥
३०॥
यदा--जब; पाखण्डिभि:--पाखण्डियों ( नास्तिकों ) द्वारा; आत्म-वज्चितैः-- स्वयं को ठगने वाले; तैः--उनके द्वारा; उरू--अधिकाधिक; वज्धित:--ठगे जाकर; ब्रह्म-कुलम्--वैदिक संस्कृति के पालक एकमात्र ब्राह्मणजन; समावसन्--आत्मिकउन्नति के लिए उनके बीच निवास करते हुए; तेषामू--उनके ( ब्राह्मणों के )) शीलमू--शील, अच्छा आचरण; उपनयन-आदि--उपनयन संस्कार इत्यादि, अर्थात् बद्धजीव को ब्राह्मण बनने की शिक्षा देते हुए; श्रौत--वैदिक नियमों के अनुसार, वेद विधि से;स्मार्त--वेदों से प्राप्त प्रामाणिक उपदेशों के अनुसार; कर्म-अनुष्ठानेन--कर्मो के पालन द्वारा; भगवतः-- श्रीभगवान् की; यज्ञ-पुरुषस्य--जो वैदिक यज्ञों द्वारा पूजित है; आराधनम्ू--उस ईश्वर की पूजा; एव--निश्चयपूर्वक; तत् अरोचयन्--चरित्रहीनव्यक्तियों द्वारा कठिनाई से सम्पन्न होने के कारण उसमें आनन्द प्राप्त न कर सकने से, अरुचिकर लगने के कारण; शूद्र-कुलम्--शूद्रों के कुल ( समाज ) की ओर; भजते--उन्मुख होता है; निगम-आचारे-- वैदिक रीतियों के अनुसार आचरण करनेमें; अशुद्धित: --अशुद्ध; यस्थ--जिसका; मिथुनी-भाव: --मैथुन सुख अथवा सांसारिक जीवन; कुटुम्ब-भरणम्--परिवार कापालन-पोषण; यथा--सहश; वानर-जाते:ः --वानर कुल के, वानर की सन्तानों के |
ऐसे छद्य-स्वामी, योगी तथा अवतारी जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् में विश्वास नहीं करते,पाषण्डी कहलाते हैं।
वे स्वयं पतित होते हैं और ठगे जाते हैं, क्योंकि वे आध्यात्मिक उन्नति कावास्तविक मार्ग नहीं जानते, अतः उनके पास जो भी जाता है, वही ठगा जाता है।
इस प्रकार सेठगे जाने पर वह कभी-कभी वैदिक नियमों के असली उपासकों ( ब्राह्मणों अथवाकृष्णभावनामृत वालों ) की शरण में जाता है, जो सबों को वेदोक्त आचार से श्रीभगवान् कीउपासना करना सिखाते हैं।
किन्तु इन रीतियों का पालन न कर सकने के कारण ये धूर्त पुनःपतित होते हैं और शूद्रों की शरण लेते हैं, जो विषयभोग में मग्न रहने में पटु हैं।
वानर जैसेपशुओं में मैथुन अत्यन्त प्रकट रहता है और ऐसे मैथुन-प्रेमी व्यक्तियों को वानर की सन््तान कहाजा सकता है।
तत्रापि निरवरोध: स्वैरेण विहरन्नतिकृपणबुद्धिरन्योन्यमुखनिरी क्षणादिना ग्राम्यकर्मणैवविस्मृतकालावधि: ॥
३१॥
तत्र अपि--उस अवस्था में ( वानरों की संतति मनुष्यों के समाज में ); निरवरोध: --बिना रोकटोक के; स्वैरैण--स्वच्छन्दतापूर्वक, जीवन के लक्ष्य को ध्यान में न रखकर; विहरन्ू--वानरों की भाँति भोग करते हुए; अति-कृपण-बुद्धधि: --ठीक से प्रयोग न करने के कारण मन्द-बुर्द्धि; अन्योन्य--परस्पर, एक दूसरे का; मुख-निरीक्षण-आदिना--मुखों को देखकर(जब पुरुष किसी स्त्री के सुन्दर मुख को देखता है अथवा कोई स्त्री किसी पुरुष के सुगढ़ शरीर को देखती है, तो वे एक दूसरेकी लालसा करते हैं ); ग्राम्य-कर्मणा--इन्द्रियतृष्टि के लिए कर्म करके; एब--एकमात्र; विस्मृत-- भूला हुआ; काल-अवधि:--सीमित जीवन-काल ( जिसके बाद उसका आवागमन, पतन या उत्कर्ष हो सकता है।
)इस प्रकार वानरों की सन््तानें एक दूसरे से घुलती-मिलती हैं और सामान्य रूप से शूद्र कहलाती हैं।
मुक्त भाव से वे जीवन का उद्देश्य समझे बिना स्वच्छन्द विहार करती हैं।
वे एकदूसरे के मुख को देखकर ही मुग्ध होती रहती हैं, क्योंकि इससे इन्द्रिय-तुष्टि की स्मृति बनी रहतीहै।
वे निरन्तर सांसारिक कर्म में लगी रहती हैं, जिसे ' ग्राम्य-कर्म ' कहते हैं और भौतिक लाभके लिए कठिन श्रम करती हैं।
इस प्रकार वे भूल जाती हैं कि एक दिन उनकी लघु जीवन-अवधि समाप्त हो जाएगी और वे आवागमन के चक्र में नीचे गिर जाएँगी।
क्वचिद्द्रुमवदैहिकार्थिेषु गृहेषु रंस्यन्यथा वानरः सुतदारवत्सलो व्यवायक्षण: ॥
३२॥
क्वचित्--यदा-कदा; द्रम-वत्--वृक्ष के सदश ( जिस प्रकार वानर एक वृक्ष से दूसरे में कूदकर जाता है वैसे ही बद्धजीव एकसे दूसरी देह में देहान्तर करता रहता है ); ऐहिक-अर्थषु--मात्र उत्तम सांसारिक सुविधाएँ प्राप्त करने के लिए; गृहेषु--घरों( देहों ) में; रंस्पन्ू--सुख अनुभव करते हुए ( एक देह से दूसरे में, या तो पशु, मानव या दैव जीवन में ); यथा--सहश;वानरः--बन्दर के ; सुत-दार-वत्सल:--सन्तान तथा पत्नी के लिए अत्यन्त प्रिय; व्यवाय-क्षण:--जिसका समय विषयसुख मेंबीतता है।
जिस प्रकार वानर एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर कूदता रहता हैं, उसी प्रकार बद्धजीव एक देह से दूसरी में जाता रहता है।
जब कोई शिकारी अन्ततोगत्वा वानर को बन्दी बना लेता है, तो वहछूटकर निकल नहीं पाता।
उसी प्रकार यह बद्धजीव क्षणिक इन्द्रिय तृप्ति में फंसकर भिन्न-भिन्नप्रकार की देहों से आसक्त होकर गृहस्थ जीवन में बद्ध जाता है।
गृहस्थ जीवन में बद्धजीव कोक्षणिक इन्द्रियसुख का आनंद प्राप्त होता है और इस प्रकार वह सांसारिक चंगुल से निकलने मेंसर्वथा असमर्थ हो जाता है।
एवमध्वन्यवरुन्धानो मृत्युगजभयात्तमसि गिरिकन्दरप्राये ॥
३३॥
एवम्--इस प्रकार; अध्वनि--इन्द्रियतुष्टि के पथ पर; अवरुन्धान:--अवरुद्ध होने पर ( फँस जाने पर ) वह जीवन के वास्तविकलक्ष्य को भूल जाता है; मृत्यु-गज-भयात्--मृत्यु रूपी हाथी के डर से; तमसि--अंधकार में; गिरि-कन्दर-प्राये-- पर्वत कीगहन गुफाओं के सहृश |
बद्धजीव इस भौतिक जगत में भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को भूलकर तथाश्रीकृष्णभावनामृत की परवाह किये बिना अनेकानेक दुष्कर्मों एवं पापों में प्रवृत्त होने लगता है।
तब उसे ताप-त्रय से पीड़ित होना पड़ता है और वह मृत्यु रूपी हाथी के भय से पर्वत की गुफाके घनान्धकार में जा गिरता है।
क्वचिच्छीतवाताद्यनेकदैविकभौतिकात्मीयानां दुःखानां प्रतिनिवारणेकल्पो दुरन््तविषयविषण्णआस्ते ॥
३४॥
क्वचित्--कभी-कभी; शीत-वात-आदि--ठंड अथवा तेज हवा इत्यादि; अनेक--कई, अनेक प्रकार के; दैविक--देवताओंद्वारा अथवा हमारे वश से परे शक्तियों द्वारा दिए जाने वाले; भौतिक--अन्य जीवात्माओं द्वारा दिए जाने वाले; आत्मीयानाम्--बद्धजीव तथा मन द्वारा दिए जाने वाले; दुःखानाम्--अनेकानेक दुखों; प्रतिनिवारणे--निवृत्त करने में; अकल्प:--अशक्त;दुरन््त--दुर्लध्य; विषय--इन्द्रियतुष्टि, वासना; विषणण:--दुखी, खिन्न; आस्ते--रहता है।
बद्धजीव को अनेक दैहिक कष्ट सहन करने पड़ते हैं यथा अत्यधिक ठंड तथा तेज हवा।
वहअन्य जीवात्माओं के कार्यकलापों तथा प्राकृतिक प्रकोपों के कारण भी कष्ट उठाता है।
जब वहउनका सामना करने में अक्षम होकर दयनीय अवस्था में रहता है, तो स्वभावत: वह अत्यन्त खिन्नहो उठता है, क्योंकि वह सांसारिक सुविधाओं का भोग करना चाहता है।
क्वचिन्मिथो व्यवहरन्यत्किश्चिद्धनमुपयाति वित्तशाठ्यून ॥
३५॥
क्वचित्--कभी-कभी या कहीं भी; मिथ: व्यवहरन्--परस्पर क्रय-विक्रय आदि व्यापार करने पर; यत्ू--जो भी; किश्जित्--रंच भर; धनम्--सम्पत्ति; उपयाति--प्राप्त करता है; वित्त-शाठ्येन--किसी की सम्पत्ति को ठग करके |
कभी-कभी बद्धजीव परस्पर आदान-प्रदान करते हैं, किन्तु कालान्तर में ठगी के कारणउनमें शत्रुता उत्पन्न हो जाती है।
भले ही रंचमात्र लाभ हो, बद्धजीव परस्पर मित्र न रहकर एकदूसरे के शत्रु बन जाते हैं।
क्वचित्क्षीणधन: शय्यासनाशनादयुपभोगविहीनोयावदप्रतिलब्धमनोरथोपगतादाने वसितमतिस्ततस्ततो वमानादीनि जनादभिलभते ॥
३६॥
क्वचित्--कभी-कभी; क्षीण-धन:--पर्याप्त धन न होने पर; शय्या-आसन-अशन-आदि--सोने, बैठने अथवा भोजन के लिएस्थान; उपभोग--सांसारिक सुख का; विहीन:--वंचित होकर; यावत्--जब तक; अप्रतिलब्ध--उपलब्ध न होने पर;मनोरथ--अभिलाषा से; उपगत--प्राप्त।
आदाने--अनैतिक साधनों से हड़पने में; अवसित-मति:--संकल्प; तत:ः--उसकेकारण; ततः--उससे; अवमान-आदीनि--अपमान तथा दंड; जनात्--सामान्यजन से; अभिलभते--प्राप्त करता है।
कभी-कभी धनाभाव के कारण बद्धजीव को पर्याप्त स्थान प्राप्त करने में कठिनाई होतीहै।
कभी तो उसे बैठने तक के लिए स्थान नहीं मिल पाता, न ही उसे अन्य आवश्यक वस्तुएँ हीप्राप्त होती हैं।
दूसरे शब्दों में, वह अभाव का अनुभव करता है और नैतिक साधनों से इनआवश्यकताओं को न प्राप्त कर पाने के कारण वह अनैतिक ढंग से दूसरों की सम्पत्ति काअपहरण करता है।
जब उसे वांछित वस्तुएँ प्राप्त नहीं हो पातीं वह दूसरों से अपमान ही प्राप्तकरता है, जिससे वह अत्यन्त खिन्न हो उठता है।
एवं वित्तव्यतिषड्भविवृद्धवैरानुबन्धोपि पूर्ववासनया मिथ उद्दह॒त्यथापवहति ॥
३७॥
एवम्--इस प्रकार; वित्त-व्यतिषड़-- आर्थिक लेन-देन के कारण; विवृद्ध--बढ़ा हुआ; बैर-अनुबन्ध:--वैर भाव; अपि--यद्यपि; पूर्व-वासनया--पूर्व अशुभ कर्मों के परिणामस्वरूप; मिथ:--परस्पर; उद्ददति--पुत्रों तथा पुत्रियों के विवाह के कारणबँध जाते हैं; अथ--तत्पश्चात्; अपवहति--सम्बन्ध-विच्छेद कर देते हैंअथवा तलाक दे देते हैंअपनी इच्छाओं की बारम्बार पूर्ति के लिए मनुष्य परस्पर शत्रु होने पर भी कभी-कभीविवाह सम्बध स्थापित कर लेते हैं।
दुर्भाग्यवश ये विवाह दीर्घकाल तक नहीं चल पाते और ऐसेलोग तलाक या अन्य कारणों से पुनः विलग हो जाते हैं।
एतस्मिन्संसाराध्वनि नानाक्लेशोपसर्गबाधित आपन्नविपन्नो यत्र यस्तमु ह वावेतरस्तत्र विसृज्य जात॑जातमुपादाय शोचन्मुहान्बिभ्यद्विवदन्क्रन्दन्संहृष्यन्गायन्नह्ममान: साधुवर्जितो नैवावर्ततेडद्यापि यत आरब्धएष नरलोकसार्थो यमध्वन: पारमुपदिशन्ति, ॥
३८ ॥
एतस्मिन्ू--इस; संसार--दुखमय ( संसार ); अध्वनि--पथ पर; नाना--अनेक; क्लेश--कष्ट; उपसर्ग-- भौतिक अस्तित्त्व कीआपत्तियों द्वारा; बाधित:--श्लुब्ध; आपन्न--कभी-कभी प्राप्त करके; विपन्न:--क भी खोकर; यत्र--जिसमें; य: --कौन;तम्--उसको; उ ह वाव--अथवा; इतरः--अन्य कोई; तत्र--वहाँ; विसृज्य-- छोड़ कर; जातम् जातमू--नवजात; उपादाय--स्वीकार करके; शोचन्--शोक करते हुए; मुहान्--मोह ग्रस्त होकर; बिभ्यत्--डरते हुए; विवदन्--कभी-कभी तेज चीखतेहुए; क्रन्दन्ू--कभी-कभी रोते हुए; संहृष्यनू--क भी-कभी प्रसन्न होते हुए; गायन्--गाते हुए; नह्ममान: --बाँधे जाकर; साधु-वर्जितः--सन्त पुरुषों से दूर रहकर; न--नहीं; एब--निश्चय ही; आवर्तते--प्राप्त करता है; अद्य अपि---अब भी; यत:ः--जिससे; आरब्ध:-- आरम्भ किया हुआ; एष:--इस; नर-लोक-- भौतिक जगत का; स-अर्थ:--आत्मकेन्द्रित ( स्वार्थी )जीवात्माएँ; यम्--जिनको ( श्रीभगवान् ); अध्वन:--भौतिक अस्तित्त्व के पथ के; पारम्--उस पार; उपदिशन्ति--ज्ञानीजनइंगित करते हैं।
इस भौतिक जगत का मार्ग क्लेशमय है और बद्धजीव को अनेक कष्ट विचलित करते रहतेहैं।
कभी वह हारता है, तो कभी जीतता है।
प्रत्येक दशा में यह मार्ग विघ्नों से परिपूर्ण है।
कभीबद्धजीव अपने पिता से मृत्यु होने या अन्य कारणों से विलग हो जाता है।
वह उसे छोड़करक्रमशः अन्यों से, यथा अपनी सन््तान से आसक्त हो जाता है।
इस प्रकार बद्धजीव कभी-कभीभ्रमित और कभी भयके मारे जोर जोर से चीत्कार करता है।
कभी वह अपने परिवार का भरणकरते हुए प्रसन्न होता है, तो कभी अत्यधिक प्रसन्न हो जाता है और सुरीले गीत गाता है।
इस तरहवह अनन्त काल से श्रीभगवान् के विछोह को भूलकर अपने में बँधता जाता है।
उसे भौतिकजगत के भयानक पथ पर चलना तो पड़ता है, किन्तु वह इस पथ पर तनिक भी सुखी नहींहोता।
स्वरूप-सिद्ध मनुष्य इस भयानक पथ से छूटने के निमित्त श्रीभगवान् की शरण ग्रहणकरते हैं।
भक्तिमार्ग को स्वीकार किये बिना भौतिक जगत के चंगुल से कोई नहीं निकल पाता।
तात्पर्य यह है कि इस भौतिक जीवन में कोई भी प्रसन्न नहीं हो सकता है।
उसे कृष्णाभावनामृतका आश्रय अवश्य ग्रहण करना चाहिए ॥
यदिदं योगानुशासनं न वा एतदवरुन्धते यन्न्यस्तदण्डा मुनय उपशमशीला उपरतात्मान: समवगच्छन्ति ॥
३९॥
यत्--जो; इृदम्-- भगवान् का यह परम धाम; योग-अनुशासनमू--केवल भक्ति के द्वारा प्राप्तव्य; न--नहीं; बा--अथवा;एतत्--मुक्ति का यह पथ; अवरुन्धते--प्राप्त करते हैं; यत्--अतः; न््यस्त-दण्डा:--ऐसे पुरुष जिन्होंने दूसरों से ईर्ष्या करनाछोड़ दिया है; मुनयः--मुनि अथवा सन्त जन; उपशम-शीला:--जो इस समय अत्यन्त शान्तिमय अस्तित्व को प्राप्त हैं; उपरत-आत्मान:--जिन्होंने मन तथा इन्द्रियों को वश में कर लिया है; समवगच्छन्ति--सरलता से प्राप्त करते हैं।
समस्त जीवात्माओं के मित्र मुनिजन संयतात्मा होते हैं।
वे अपनी इन्द्रियों एवं मन को वश मेंकर चुके होते हैं और उन्हें मुक्तिपथ, जो श्रीभगवान् तक पहुँचने का मार्ग है, सरलतापूर्वक प्राप्तहोता है।
क्लेशमय भौतिक परिस्थितियों में संलग्न रहने तथा हतभाग्य होने के कारणभौतिकतावादी व्यक्ति मुनिजनों की संगति नहीं कर पाता।
यदपि दिगिभजयिनो यज्विनो ये वै राजर्षय: किं तु परं मृथे शयीरत्नस्यामेब ममेयमिति कृतवैरानुबन्धायांविसृज्य स्वयमुपसंहता: ॥
४०॥
यत् अपि--यद्यपि; दिकू-इभ-जयिन:ः --जो सभी दिशाओं में विजयी होते हैं, चक्रवर्ती, दिग्विजयी; यज्विन:--बड़े-बड़े यज्ञोंके करने में पटु; ये--जो सभी; वै--निस्सन्देह; राज-ऋषय:--अत्यन्त महान् सन्त राजा, राजर्षि; किम् तु--किन्तु; परमू--केवल यह पृथ्वी; मृधे--युद्ध में; शयीरन्ू--लेटे हुए; अस्यामू--इस ( पृथ्वी ) पर; एब--निश्चय ही; मम--मेरा; इयम्--यह;इति--उस प्रकार से विचार करने पर; कृत--जिस पर सृष्टि की जाती है; वैर-अनु-बन्धायाम्-- अन्यों से शत्रुता का भाव;विसृज्य--त्याग कर; स्वयम्--अपना जीवन; उपसंहता: --मारे हुए
साधु प्रकृति वाले ऐसे अनेक महान् राजर्षि हो चुके हैं, जो यज्ञ अनुष्ठान में अत्यन्त प्रवीणतथा अन्य राज्यों को जीतने में परम कुशल थे, किन्तु इतनी शक्ति होने पर भी भगवान् कीप्रेमाभक्ति नहीं कर पाये, क्योंकि वे महान् राजा, 'मैं देह-स्वरूप हूँ और यह मेरी सम्पत्ति है'इस मिथ्या बोध को भी नहीं जीत पाये थे।
इस प्रकार उन्होंने प्रतिद्वन्द्नी राजाओं से केवल शत्रुतामोल ली, उनसे युद्ध किया और वे जीवन के वास्तविक लक्ष्य को पूरा किये बिना दिवंगत होगए।
कर्मवल्लीमवलम्ब्य तत आपद: कथश्ञिन्नरकाद्विमुक्त: पुनरप्येवं संसाराध्वनि वर्तमानोनरलोकसार्थमुपयाति एवमुपरि गतोपि, ॥
४१॥
कर्म-वल्लीम्--सकाम कर्मों की लता को; अवलम्ब्य--सहारा बनाकर; ततः--उससे; आपद:--घातक या क्लेशपूर्ण स्थिति;कथश्ित्--किसी न किसी प्रकार से; नरकात्--जीवन की नारकीय दशा से; विमुक्त:--मुक्त होकर; पुनः अपि--फिर से;एवम्--इस प्रकार; संसार-अध्वनि-- भौतिक जगत के मार्ग पर; वर्तमान:--वर्तमान, समुपस्थित; नर-लोक-स-अर्थम्--स्वार्थमय कर्मों का क्षेत्र; उपयाति-- प्रवेश करता है; एवम्--इस प्रकार; उपरि--ऊपर ( उच्चलोकों में ); गतः अपि--( ऊपर )उठाये जाने पर भी।
सकाम कर्म रूपी लता की शरण स्वीकार कर लेने पर बद्धजीव अपने पवित्र कार्यों के'फलस्वरूप स्वर्गलोक को प्राप्त हो सकता है और इस तरह नारकीय स्थिति से तो उसे मुक्ति मिलसकती है, किन्तु वह दुर्भाग्यवश वहाँ रह नहीं पाता।
अपने पवित्र कार्यों का फल भोगने के बादउसे निम्न लोकों में लौटना पड़ता है।
इस प्रकार वह निरन्तर ऊपर और नीचे आता-जाता रहताहै।
तस्थेदमुपगायन्ति--आर्षभस्येह राजर्षेमनसापि महात्मन: ।
नानुवर्त्महति नृपो मक्षिकेव गरुत्मतः ॥
४२॥
तस्य--जड़भरत का; इृदम्ू-- यह यश-गान; उपगायन्ति-गाते हैं; आर्षभस्य--ऋषभदेव के पुत्र का; इहह--यहाँ; राज-ऋषे: --महान् ऋषितुल्य राजा का; मनसा अपि--मन से भी; महा-आत्मन: --महात्मा जड़भरत का; न--नहीं; अनुवर्त्म अहति--पथका अनुसरण करने में समर्थ; नृप: --राजा; मक्षिका--मक्खी; इब--सहश; गरुत्मतः-- श्री भगवान् के वाहन, गरुड़ का।
जड़भरत के उपदेशों का सार सुना चुकने के पश्चात् श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--प्रियराजा परीक्षित्, जड़भरत द्वारा निर्दिष्ट पथ श्रीभगवान् के वाहन गरुड़ द्वारा अनुगमन किये गयेपथ के तुल्य है और सामान्य राजागण मक्खियों के समान हैं।
मक्खियाँ गरुड़ के पथ पर नहींजा सकतीं।
आज तक बड़े-बड़े राजाओं तथा विजयी नेताओं में से किसी ने भी भक्ति-पथ काअनुसरण नहीं किया मानसिक रूप से भी नहीं।
यो दुस्त्यजान्दारसुतान्सुहद्राज्यं हृदिस्पृशः ।
जहौ युवैव मलवदुत्तमश्लोकलालस: ॥
४३॥
यः--वही जड़भरत जो पहले महाराज ऋषभदेव के पुत्र महाराज भरत थे; दुस्त्यजानू--त्याग पाना अत्यन्त कठिन होता है; दार-सुतानू--पत्नी तथा सन््तान अथवा अत्यन्त वैभवपूर्ण गृहस्थ जीवन को; सुहत्ू--मित्र तथा शुभ चिन्तक; राज्यमू--विश्वव्यापीसाम्राज्य; हृदि-स्पृश:--अन्तरतम में स्थित; जहौ--परित्याग कर दिया; युवा एब--तरुण होते हुए; मल-वत्--विष्ठा के सहश;उत्तम-श्लोक-लालस:--उत्तमश्लोक श्रीभगवान् की सेवा करने के लिए लालायित।
महाराज भरत ने अपनी युवावस्था में ही सब कुछ परित्याग कर दिया, क्योंकि वेउत्तमएलोक श्रीभगवान् की सेवा करना चाहते थे।
उन्होंने अपनी सुन्दर पत्नी, उत्तम सन््तान, प्रियमित्र तथा अपने विशाल साम्राज्य का परित्याग कर दिया।
यद्यपि इन वस्तुओं का त्याग कर पानाअत्यन्त कठिन होता है, किन्तु जड़भरत इतने उच्चस्थ थे कि उन्होंने इनको उस तरह से त्यागदिया जैसे मल त्याग के पश्चात् विष्टा को त्याग दिया जाता है।
यो दुस्त्यजान्क्षितिसुतस्वजनार्थदारान्प्रार्थ्या अ्रियं सुरवरै: सदयावलोकाम् ।
नैच्छन्नृपस्तदुचितं महतां मधुद्विट-सेवानुरक्तमनसामभवोपि फल्गु: ॥
४४॥
यः--जो; दुस्त्यजान्ू--जिनका परित्याग कर पाना अत्यन्त कठिन है, दुस्त्यज; क्षिति--पृथ्वी; सुत--सन्तति, पुत्रादि; स्व-जन-अर्थ-दारान्ू--कुट॒म्बी, धन तथा सुन्दर पत्नी को; प्रार्थ्याम्--लालायित; थ्रियम्ू--लक्ष्मी को; सुर-बरैः-- श्रेष्ठ देवताओं द्वारा;स-दय-अवलोकाम्--जिसकी दयादृष्टि; न--नहीं; ऐच्छत्--इच्छा की; नृप:ः--राजा ने; तत्-उचितमू--यह उनके लिए उचित है( था ); महताम्--महात्माओं या महानुभावों का; मधु-द्विट्ू--मधु नामक असुर को मारने वाले, श्रीकृष्ण, मधुसूदन; सेवा-अनुरक्त--सेवा में अनुरक्त; मनसाम्ू--जिन मनस्वियों का; अभव: अपि--मोक्ष पद भी; फल्गु:--तुच्छ |
श्रीशुकदेव गोस्वामी आगे कहते हैं--हे राजनू, भरत महाराज के कार्य आश्चर्यजनक हैं।
उन्होंने अपनी प्रत्येक वस्तु का परित्याग कर दिया जो अन्यों के लिए दुष्कर है।
उन्होंने अपनासाम्राज्य, पत्नी तथा परिवार त्याग दिया।
उनका वैभव इतना प्रभूत था कि देवताओं को भी ईर्ष्याहोती थी, किन्तु उसका भी उन्होंने परित्याग कर दिया।
उनके समान महान् पुरुष के लिए महान्भक्त होना सर्वथा उपयुक्त था।
वे प्रत्येक वस्तु का इसलिए परित्याग कर सके, क्योंकि वेभगवान् श्रीकृष्ण के सौन्दर्य, ऐश्वर्य, यश, ज्ञान, शक्ति तथा त्याग के प्रति अत्यन्त अनुरक्त थे।
कृष्ण इतने आकर्षक हैं कि उनके लिए समस्त इष्ट वस्तुओं का परित्याग किया जा सकता है।
जिनके चित्त भगवान् की सेवा के प्रति आकृष्ट हैं, वे मुक्ति को भी तुच्छ मानते हैं।
यज्ञाय धर्मपतये विधिनैपुणाययोगाय साड्ख्यशिरसे प्रकृती ध्वराय ।
नारायणाय हरये नम इत्युदारंहास्यन्मृगत्वमपि यः समुदाजहार ॥
४५॥
यज्ञाय--समस्त यज्ञों का फल भोगने वाले श्रीभगवान् को; धर्म-पतये-- धार्मिक विधानों के स्वामी को; विधि-नैपुणाय--उसेजो निपुणता से विधि-विधान पालन करने के लिए भक्तों को ज्ञान प्रदान करता है; योगाय--साक्षात् योग को; साड्ख्य-शिरसे--सांख्य दर्शन का उपदेश देने वाले; प्रकृति-ईश्वराय--ब्रह्माण्डके परम नियन्ता को; नारायणाय--असंख्य जीवात्माओंके आश्रय ( नर, जीवात्माएँ तथा अयन, आश्रय, शरण ) को; हरये--हरि स्वरूप श्रीभगवान् को; नम:ः--सादर नमस्कार;इति--इस प्रकार; उदारम्--उच्च स्वर से; हास्यन्--हँसते हुए; मृगत्वम् अपि--मृग की देह धारण किये रहने पर भी; यः--जो;समुदाजहार--जप करता रहा।
मृग देह धारण करने पर भी महाराज भरत ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को विस्मृत नहीं किया; अतः जब वे मृग देह छोड़ने लगे तो उच्च स्वर से इस प्रकार प्रार्थना की, पूर्ण पुरुषोत्तमभगवान् साक्षात् यज्ञ पुरुष हैं।
वे अनुष्ठानों का फल देने वाले हैं।
वे धर्म रक्षक, योगस्वरूप,सर्वज्ञानस्त्रोत ( सांख्य के प्रतिपाद्य ), सम्पूर्ण सृष्टि के नियामक तथा प्रत्येक जीवात्मा में स्थितपरमात्मा हैं।
वे सुन्दर तथा आकर्षक हैं।
मैं उनको नमस्कार करके यह देह त्याग रहा हूँ औरआशा करता हूँ कि उनकी दिव्य सेवा में अहर्निश संलग्न रहूँगा।
यह कह कर महाराज भरत नेअपना शरीर त्याग दिया।
य इदं भागवतसभाजितावदातगुणकर्मणो राजर्षेर्भरतस्यानुचरितं स्वस्त्ययनमायुष्यं धन्यं यशस्यंस्वर्ग्यापवर्ग्य वानुश्रुणोत्याख्यास्यत्यभिनन्दति च सर्वा एवाशिष आत्मन आशास्ते न काञ्जन परतइति ॥
४६॥
यः--जो कोई; इृदम्--इस; भागवत--सामान्य भक्तों के द्वारा; सभाजित--अत्यधिक पूजित; अवदात--शुद्ध; गुण--जिसकेगुण; कर्मण:--तथा कर्म; राज-ऋषे: --राजर्षि; भरतस्य-- भरत महाराज का; अनुचरितम्--चरित्र, कथा को; स्वस्ति-अयनम्--कल्याण का धाम; आयुष्यम्ू--जीवन-अवधि ( आयु ) को बढ़ाने वाला; धन्यम्--धन को बढ़ाने वाला; यशस्यम्--यश प्रदान करने वाला; स्वर्ग्य--स्वर्ग लोक की प्राप्ति कराने वाला ( जो कर्मियों का लक्ष्य है ); अपवर्ग्यमू--इस भौतिक जगतसे मुक्ति प्रदान करके ईश्वर में तदाकार होने में सहायक ( जो ज्ञानियों का लक्ष्य है ); वा--अथवा; अनुश्रणोति--भक्तिमार्ग काअनुसरण करते हुए सदैव सुनता है; आख्यास्यति--परोपकारार्थ वर्णन करता है; अभिनन्दति--भक्तों तथा भगवान् के गुणों कागान करता है; च--तथा; सर्वा:--समस्त; एव--निश्चय ही; आशिष: --आशीर्वाद; आत्मन:--स्वयं के लिए; आशास्ते--प्राप्तकरता है; न--नहीं; काज्नन--कुछ भी; परत:-- अन्य किसी से; इति--इस प्रकार
श्रवण तथा कीर्तन के अनुरागी भक्त नियमित रूप से भरत महाराज के गुणों की विवेचनातथा उनके कर्मों की प्रशंसा करते हैं।
यदि कोई विनीत भाव से सर्व कल्याणमय महाराज भरतके विषय में श्रवण तथा कीर्तन करता है, तो उसकी आयु तथा सांसारिक वैभव में वृद्धि होतीहै।
वह अत्यन्त प्रसिद्ध हो सकता है और सरलता से स्वर्ग अथवा श्रीभगवान् में एकाकार होकरमुक्ति प्राप्त कर सकता है।
महाराज भरत के कर्मों के श्रवण, कीर्तन तथा स्तवन मात्र सेमनोवांछित फल मिलता है।
इस प्रकार मनुष्य की समस्त भौतिक तथा आध्यात्मिक आकांक्षाओंकी पूर्ति होती है।
इन वस्तुओं के लिए और किसी से माँगने की आवश्यकता नहीं रह जाती,क्योंकि महाराज भरत के जीवन के अध्ययन मात्र से सभी वांछित वस्तुएँ प्राप्त हो जाती हैं।
