← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 5 की सूची
अध्याय अठारह: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान को की गई प्रार्थनाएँ
5.18श्रीशुक उवाचतथा च भद्गभ्रवा नाम धर्मसुतस्तत्कुलपतय: पुरुषा भद्राश्ववर्षे साक्षाद्धगवतो वासुदेवस्य प्रियां तनुंधर्ममयीं हयशीर्षाभिधानां परमेण समाधिना सन्निधाप्येदमभिगृणन्त उपधावन्ति ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी बोले; तथा च--इसी प्रकार ( जिस प्रकार इलाबृत-बर्ष में शिवजी संकर्षण की पूजा करतेहैं ); भद्र-श्रवा-- भद्र भ्रवा; नाम-- नामक ; धर्म-सुत:--धर्मराज के पुत्र; ततू--उससे; कुल-पतय: -- कुल के मुखिया;पुरुषा:--समस्त वासी; भद्गाश्व-वर्षे -- भद्रा श्रवर्ष नामक भूखण्ड में; साक्षात्--प्रकट रूप में, स्वयं; भगवतः -- श्रीभगवान्;वासुदेवस्य--वासुदेव का; प्रियाम् तनुम्--अत्यन्त प्रिय रूप; धर्म-मयीम्--समस्त धार्मिक नियमों का निदेशक; हयशीर्ष-अभिधानाम्--हयशीर्ष ( हयग्रीव भी कहा जाता है ) नामक भगवान् के अवतार; परमेण समाधिना--परम समाधि द्वारा;सन्निधाप्य--समीप आकर; इृदम्--यह; अभिगृणन्त:--कीर्तन करते हुए; उपधावन्ति--पूजा करते हैं।
श्रीशुकदेव गोस्वामी बोले--धर्मराज के पुत्र भद्रश्रवा भद्राश्चवर्ष नामक भूखण्ड में राज्यकरते हैं।
जिस प्रकार इलावृतवर्ष में भगवान् शिव संकर्षण की पूजा करते हैं उसी प्रकारभद्रश्रवा अपने सेवकों तथा राज्य के समस्त वासियों समेत वासुदेव के स्वांश हयशीर्ष की पूजाकरते हैं।
हयशीर्ष भक्तों को अत्यन्त प्रिय हैं और वे समस्त धार्मिक विधानों के निदेशक हैं।
गहनसमाधि में स्थित भद्र॒श्रवा तथा उनके सेवक भगवान् को सादर नमस्कार करते हैं और सावधानीपूर्वक उच्चारण करते हुए निम्नलिखित स्तुतियों का कीर्तन करते हैं।
भद्रभ्रवस ऊचुः नमो भगवते धर्मायात्मविशोधनाय नम इति ॥
२॥
भद्र॒भ्रवसः ऊचु:--शासक भद्ग॒श्रवा तथा उसके पार्षद बोले; ओम्--हे ईश्वर; नम:--सादर नमस्कार है; भगवते-- श्रीभगवान्को; धर्माय--समस्त धार्मिक विधानों के स्त्रोत; आत्म-विशोधनाय-- भौतिक दूषण से शुद्ध करने वाले को; नम:--नमस्कारकरते हैं; इति--इस प्रकार
राजा भद्रश्रवा तथा उसके घनिष्ठ सेवक इस प्रकार स्तुति करते हैं--इस भौतिक जगत मेंबद्धजीव के चित्त को शुद्ध करने वाले, समस्त धार्मिक विधानों के आगार भगवान् को हमारानमस्कार है।
हम उन्हें बारम्बार सादर नमस्कार करते हैं।
अहो विचित्र भगवद्विचेष्टितंघ्नन्तं जनोयं हि मिषन्न पश्यति ।
ध्यायन्नसद्य्हिं विकर्म सेवितुंनित्य पुत्रं पितरं जिजीविषति ॥
३॥
अहो--ेरे; विचित्रम्ू--आश्चर्यजनक; भगवत्ू-विचेष्टितम्-- भगवान् की लीला; घ्लन्तम्--मृत्यु; जन:--व्यक्ति; अयम्ू--यह;हि--निश्चय ही; मिषन्--देखकर भी; न पश्यति--नहीं देखता; ध्यायन्--ध्यान करते हुए; असत्-- भौतिक सुख; यहिं--क्योंकि; विकर्म--वर्जित कार्य; सेवितुमू--उपभोग करते हुए; निईत्य--जलाकर; पुत्रमू-पुत्रों का; पितरम्-पिता को;जिजीविषति--दीर्घायु की इच्छा करता है।
अहो! कितने आश्चर्य की बात है कि मूर्ख संसारी अपने सिर पर नाचती मृत्यु की ओर भीध्यान नहीं देता।
यह जानते हुए भी कि मृत्यु अटल है, वह उसके प्रति उदासीन एवं लापरवाहरहता है।
चाहे उसके पिता की मृत्यु हो, अथवा पुत्र की मृत्यु क्यों न हो, वह उसकी सम्पत्ति काउपभोग करना चाहता है।
प्रत्येक दशा में वह अर्जित धन से किसी की परवाह किये बिनासांसारिक सुख का उपभोग करने का प्रयत्त करता है।
वदन्ति विश्व कवयः सम नश्वरं'पश्यन्ति चाध्यात्मविदो विपश्चितः ।
तथापि मुहान्ति तवाज माययासुविस्मितं कृत्यमजं नतोस्मि तम् ॥
४॥
वदन्ति--वे साधिकार कहते हैं; विश्वम्ू--समस्त भौतिक सृष्टि को; कवय:--विद्वान सन्त; स्म--निश्चय ही; नश्वरम्--नश्वर,विनाशशील; पश्यन्ति-- समाधि में देखते हैं; च-- भी; अध्यात्म-विदः--आत्मज्ञानी; विपश्चित:--अत्यन्त ज्ञानीजन; तथा अपि--तिस पर भी; मुहान्ति--मोहित हो जाते हैं; तब--आपके; अज--हे अजन्मा; मायया--माया के द्वारा; सु-विस्मितमू--अत्यन्त विचित्र; कृत्यमू--कार्य; अजमू--परम अजन्मा को; नतः अस्मि--मैं नमस्कार करता हूँ; तम्ू--उसको है अजन्मा
आत्मज्ञान में समुन्नत वेदविद् अन्य तार्किकों तथा दार्शनिकों की तरह यहभलीभाँति जानते हैं कि यह भौतिक जगत नश्वर है।
वे समाधि की दशा में इस जगत कीवास्तविक स्थिति का अनुभव करते हैं।
वे सत्य का भी उपदेश देते हैं।
किन्तु कभी-कभी वे भीआपकी माया से मोहित हो जाते हैं।
यह आपकी अपनी ही विचित्र लीला है, अतः मैं समझसकता हूँ कि आपकी माया अत्यन्त विचित्र है।
मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
विश्वोद्धवस्थाननिरोधकर्म तेहाकर्तुरड़्ीकृतमप्यपावृतः ।
युक्त न चित्र॑ त्वयि कार्यकारणेसर्वात्मनि व्यतिरिक्ते च वस्तुतः ॥
५॥
विश्व--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की; उद्धव--उत्पत्ति का; स्थान--स्थिति या पालन का; निरोध--लय का; कर्म--ये कर्म; ते--आपके ( हे ईश्वर ); हि--ही; अकर्तु:--पृथक्, विलग; अड्रीकृतम्--वैदिक शास्त्रों द्वारा अब भी मान्य; अपि--यद्यपि;अपाबृतः--इन समस्त कर्मों से अछूता; युक्तम्ू--अनुकूल, योग्य; न--नहीं; चित्रमू--विचित्र; त्वयि--आप में; कार्य-कारणे--समस्त कार्यों का मूल कारण; सर्व-आत्मनि--सभी प्रकार से; व्यतिरिक्ते--विलग; च--भी; वस्तुतः--मूल वस्तु ।
हे भगवन्, यद्यपि आप इस भौतिक जगत की उत्पत्ति, पालन तथा प्रलय से सर्वथा विरत हैंऔर इन कार्यों से आप प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित नहीं होते, तो भी वे आपके द्वारा किये गये मानेजाते हैं।
हमें इस पर विस्मय नहीं होता, क्योंकि सर्वात्मरूप होने से आप समस्त कारणों केकारण हैं।
आप प्रत्येक वस्तु से विलग रहते हुए भी प्रत्येक वस्तु के सक्रिय तत्त्व हैं।
इस प्रकारहम अनुभव करते हैं कि आपकी अचिन्त्य शक्ति के कारण ही प्रत्येक घटना घटती है।
वेदान्युगान्ते तमसा तिरस्कृतान्रसातलाद्यो नृतुरड्रविग्रह: ।
प्रत्याददे वै कवयेभियाचतेतस्मै नमस्तेडवितथेहिताय इति ॥
६॥
वेदान्ू--चारों वेदों को; युग-अन्ते--कल्प के अन्त में; तमसा--साक्षात् अज्ञानरूपी दैत्यों द्वारा; तिरस्कृतान्ू--चुराये जाकर;रसातलातू--रसातल ( निम्नतम लोक ) से; यः--जो ( श्रीभगवान् ); नू-तुरड्ग-विग्रह:--आधा घोड़ा तथा आधा मनुष्य का रूपधारण कर; प्रत्याददे--लौटा दिया; बै--निश्चय ही; कवये--परम कवि ( भगवान् ब्रह्मा ) को; अभिया-चते--उनके माँगने पर;तस्मै--उनको ( हयग्रीव रूप ); नम:--मेरा नमस्कार है; ते--आपको; अवितथ-ईहिताय--जिसका संकल्प विफल नहीं होता;इति--इस प्रकार।
कल्प के अन्त में साक्षात् अज्ञान एक दैत्य का रूप धारण कर सभी वेदों को चुरा कर उन्हेंरसातल ले गया।
किन्तु श्रीभगवान् ने हयग्रीव का रूप धारण करके वेदों को पुनः प्राप्त कियाऔर ब्रह्माजी के विनय करने पर उन्हें लाकर दे दिया।
हे सत्यसंकल्प पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
हरिवर्षे चापि भगवान्नरहरिरूपेणास्ते; तद्गूपग्रहणनिमित्तमुत्तरत्राभिधास्ये; तदयितं रूप॑महापुरुषगुणभाजनो महाभागवतो दैत्यदानवकुलतीर्थीकरणशीलाचरितःप्रह्मदोव्यवधानानन्यभक्तियोगेन सह तह्टर्षपुरुषैरुपास्ते इदं चोदाहरति ॥
७॥
हरि-वर्षे--हरिवर्ष नामक भूभाग में; च-- भी; अपि--निस्सन्देह; भगवान्-- श्रीभगवान्; नर-हरि-रूपेण--नृसिंह देव के रूपमें; आस्ते--अवस्थित है; तत्-रूप-ग्रहण-निमित्तम्-- श्रीकृष्ण ( केशव ) ने नूसिंह रूप जिस कारण धारण किया; उत्तरत्र--अगले अध्यायों में; अभिधास्ये--मैं वर्णन करूँगा; तत्--वह; दबितम्--अत्यन्त प्रिय; रूपमू--रूप; महा-पुरुष-गुण-भाजनः--प्रह्मद महाराज, जो महापुरुषोचित गुणों के आगार हैं; महा-भागवतः --सर्व श्रेष्ठ भक्त; दैत्य-दानव-कुल-तीर्थी -करण-शीला-चरित:ः--उनके कर्म तथा चरित्र इतने पवित्र थे कि अपने कुल में उत्पन्न समस्त दैत्यों का मोक्ष करा दिया;प्रह्मादः--महाराज प्रह्माद; अव्यवधान-अनन्य-भक्ति-योगेन--अविच्छिन्न एवं अनन्य भक्ति के द्वारा; सह--सहित; तत्-वर्ष-पुरुषैः--हरिवर्ष के निवासियों के ; उपास्ते--नमस्कार एवं पूजन करता है; इृदम्--यह; च--और; उदाहरति--जप करता है।
श्रीशुकदेव गोस्वामी आगे कहते हैं--हे राजन्ू, भगवान् नृसिंह हरिवर्ष नामक भूभाग मेंवास करते हैं।
मैं श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कंध में आपको बताऊँगा कि प्रह्माद महाराज ने किसप्रकार श्रीभगवान् को नृसिंह देव रूप धारण करने के लिए बाध्य किया।
प्रह्नाद महाराजभगवदू-भक्तों में शिरोमणि हैं और महापुरुषों के अनुरुप समस्त उत्तम गुणों के आगार हैं।
उनकेचरित्र और कर्म से उनके दैत्य वंश के समस्त पतित जनों का उद्धार हुआ है।
उन्हें भगवान् नूसिंहदेव परम प्रिय हैं।
इस प्रकार प्रहाद महाराज अपने समस्त सेवकों तथा हरिवर्ष के समस्त वासियोंसहित भगवान् नृसिंह देव की पूजा निम्नलिखित मंत्रोच्चार द्वारा करते हैं।
नमो भगवते नरसिंहाय नमस्तेजस्तेजसे आविराविर्भव वज्नख वच्धदंष्ट कर्माशयात्रन्धय रन्धय तमोग्रस ग्रस ३७ स्वाहा; अभयमभयमात्मनि भूयिष्ठा ३» करौम्, ॥
८॥
&--हे ईश्वर; नम: --सादर नमस्कार; भगवते-- भगवान् को; नर-सिंहाय--नृसिंह नाम से विख्यात; नम:ः--नमस्कार है; तेज:-तेजसे--समस्त तेजों के तेज; आवि:-आविर्भव--कृपया पूर्णरूप से प्रकट करें; वज़ञ-नख--वज्ज के समान नखों वाले; वज्ञ-दंध्र--वज़ के समान दाँतों वाले; कर्म-आशयान्-- भौतिक कर्म के द्वारा सुखी रहने की आसुरी इच्छाएँ; रन्धय रन्धय--कृपयापरास्त करें; तम:ः--अज्ञान; ग्रस--दूर करें; ग्रस--दूर करें; ०--हे ईश्वर; स्वाहा--सादर आहुति; अभयमू--निर्भीकता;अभय निरभीकता आत्मनि--मेरे मन में; भूयिष्ठा:--आप प्रकट हों; ३०--हे ईश; क्षमू-- भगवान् नृसिंह की स्तुतियों का
हु समस्त तेज के स्त्रोत भगवान् नृसिंहदेव, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
हे वज़ के समाननख तथा दांतों वाले प्रभु! आप इस भौतिक जगत में हमारी आसुरी सकाम कर्म-वासनाओं कोमिटा दें।
हमारे हृदय में प्रकट होकर हमारे अज्ञान को भगा दें, जिससे इस भौतिक जगत में हमनिडर होकर जीवन के लिए संघर्ष कर सकें।
स्वस्त्यस्तु विश्वस्य खल: प्रसीदतांध्यायन्तु भूतानि शिवं मिथो धिया ।
मनश्च भद्गं भजतादधो क्षजेआवेश्यतां नो मतिरप्यहैतुकी ॥
९॥
स्वस्ति--कल्याण, मंगल; अस्तु--हो; विश्वस्थ--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का; खलः--ईर्ष्यालु ( लगभग सभी ); प्रसीदताम्--प्रसन्नहों; ध्यायन्तु--विचार करें; भूतानि-- सभी जीवात्माएँ; शिवम्--मंगल; मिथ: -- परस्पर; धिया-- अपनी बुद्धि से; मन:--मन;च--और; भद्रमू--शान्ति; भजतात्--अनुभव होने दें; अधोक्षजे--मन, बुद्धि तथा इन्द्रियों के द्वारा अगम्य भगवान् में;आवेश्यताम्--ध्यानमग्न हों; न:ः--हमारी; मतिः--बुद्धि; अपि--निस्सन्देह; अहैतुकी --बिना किसी हेतु के
इस सम्पूर्ण विश्व का कल्याण हो और सभी इर्ष्यालु व्यक्ति शान्त हों, सभी जीवात्माएँभक्तियोग का अभ्यास करके प्रशान्त हों, क्योंकि भक्ति करने पर वे एक दूसरे का कल्याण-चिन्तन कर सकेंगे।
अतः हम सभी भगवान् श्रीकृष्ण की परम भक्ति में लगकर उन्हीं के विचारमें मग्न रहें।
मागारदारात्मजवित्तबन्धुषुसड् यदि स्याद्धगवत्प्रियेषु न: ।
यः प्राणवृत्त्या परितुष्ट आत्मवान्सिद्धबत्यदूरात्र तथेन्द्रियप्रियः ॥
१० ॥
मा--नहीं; अगार--घर; दार--पतली; आत्म-ज--सन्तान; वित्त--धन; बन्धुषु--मित्रों एवं सम्बंधियों के मध्य; सड्र:--साथ,लगाव; यदि--यदि; स्थात्ू--होना चाहिए; भगवत्-प्रियेषु-- श्रीभगवान् के अत्यन्त प्रिय व्यक्तियों में; नः--हम लोगों में से;यः--जो कोई; प्राण-वृत््या--जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं से; परितुष्ट:--सन्तुष्ट; आत्म-वान्--जिसने अपने मन को वशमें कर लिया है और अपने आपको जान लिया ( आतज्ञान ) है; सिद्धयति--सफल होता है; अदूरात्ू--शीघ्र ही; न--नहीं;तथा--तथा; इन्द्रिय-प्रिय:--इन्द्रियतुष्टि में लीन व्यक्ति
हे भगवन्, हमारी प्रार्थना है कि हम पारिवारिक जीवन के बन्धन जिसमें घर, स्त्री, सन््तान,मित्र, धन तथा सम्बन्धीजन इत्यादि सम्मिलित हैं, इसके प्रति कभी भी आकृष्ट न हों।
यदि हम मेंकिसी से किंचित आसक्ति हो भी तो वह भक्तों से हो जिनके लिए श्रीकृष्ण ही परम प्रिय हैं।
जिस व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार हो चुका है और जिसने अपने मन को वश में कर लिया है,वह जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं से तुष्ट रहता है।
वह अपनी इन्द्रियतुष्टि का प्रयास नहींकरता।
ऐसा व्यक्ति जल्दी ही कृष्णभावनामृत की ओर अग्रसर होता है, किन्तु जो भौतिकवस्तुओं में अत्यधिक लिप्त रहते हैं, उनके लिए ऐसा कर पाना कठिन है।
यत्सड्ुलब्धं निजवीर्यवैभवंतीर्थ मुहुः संस्पृश॒तां हि मानसम् ।
हरत्यजो उन््तः श्रुतिभिर्गतोड्रजंको बैन सेवेत मुकुन्दविक्रमम् ॥
११॥
यत्--जिनके ( भक्तों के ); सड्र-लब्धमू--संग से उपलब्ध; निज-वीर्य-वैभवम्--जिसका प्रभाव असामान्य है; तीर्थम्--तीर्थस्थल, यथा गंगा नदी; मुहुः--बारम्बार; संस्पृशताम्--उन स्परशों का; हि--निश्चयपूर्वक; मानसम्--मन के मल; हरति--हर लेती है; अज: --अजन्मा; अन्त: --अन्तःकरण में; श्रुतिभि:--कानों से; गत:--प्रविष्ट; अड़-जम्--शरीर के मल यासंदूषण; कः--कौन; बै--निस्सन्देह; न--नहीं; सेवेत--सेवा करेगा; मुकुन्द-विक्रमम्-- भगवान् मुकुन्द के यशस्वी कार्योंकी
ऐसे व्यक्तियों की संगति करने से, जिनके लिए पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् मुकुन्द ही सब कुछहैं, भगवान् के यशस्वी कार्यों को सुनकर शीघ्र ही समझ सकता है।
मुकुन्द के यशस्वी कार्यइतने सक्षम हैं कि इनको सुनकर ही भगवान् की संगति प्राप्त की जा सकती है।
निरन्तरउत्सुकतापूर्वक भगवान् के यशस्वी कार्यो का वर्णन सुनते रहने से परम सत्य श्रीभगवान् ध्वनितरंगों के रूप में हृदय में प्रवेश करते हैं और समस्त कल्मष को दूर कर देते हैं।
दूसरी ओर यद्यपिगंगास्नान से मल तथा संदूषण घटते हैं, किन्तु स्नान तथा पवित्र स्थानों के दर्शन से दीर्घकाल केअनन्तर ही हृदय स्वच्छ हो पाता है।
अतः कौन ऐसा विज्ञपुरुष होगा जो जीवन की सिद्धि केलिए भक्तों की संगति नहीं करना चाहेगा ?
यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्ञनासर्वर्गुणैस्तत्र समासते सुरा: ।
हरावभक्तस्य कुतो महदगुणामनोरथेनासति धावतो बहिः ॥
१२॥
यस्य--जिसकी; अस्ति--है; भक्ति: -- भक्ति; भगवति-- श्रीभगवान् के प्रति; अकिज्ञना--निष्काम; सर्वे: --समस्त; गुणैः --उत्तम गुणों के द्वारा; तत्र--वहाँ ( उस व्यक्ति में )) समासते--निवास करते हैं; सुराः:--समस्त देवता; हरौ-- भगवान् में;अभक्तस्य--अभक्त का; कुतः--कहाँ; महत्-गुणा: --उत्तम गुण; मनोरथेन--मानसिक चिन्तन द्वारा; असति--नश्वर भौतिकजगत में; धावतः--दौड़ता हुआ; बहि:--बाहर।
जो व्यक्ति पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् वासुदेव के प्रति शुद्ध भक्ति उत्पन्न कर लेता है उसकेशरीर में सभी देवता तथा उनके महान् गुण यथा धर्म, ज्ञान तथा त्याग प्रकट होते हैं।
इसकेविपरीत जो व्यक्ति भक्ति से रहित है और भौतिक कर्मों में व्यस्त रहता है उसमें कोई सद्गुण नहींआते।
भले ही कोई व्यक्ति योगाभ्यास में दक्ष क्यों न हो और अपने परिवार और सम्बन्धियों काभलीभाँति भरण-पोषण करता हो वह अपनी मनोकल्पना द्वारा भगवान् की बहिरंगा-शक्ति कीसेवा में तत्पर होता है।
भला ऐसे पुरुष में सदुगुण कैसे आ सकते हैं ?
हरिर्ि साक्षाद्धगवान्शरीरिणाम्आत्मा झषाणामिव तोयमीप्सितम् ।
हित्वा महांस्तं यदि सज्जते गृहेतदा महत्त्वं वयसा दम्पतीनाम् ॥
१३॥
हरिः--भगवान्; हि--निश्चय ही; साक्षात्-प्रत्यक्ष रूप में; भगवान्-- भगवान्; शरीरिणाम्--समस्त देहधारियों की; आत्मा--आत्मा; झषाणामू--जलचरों के; इब--सहृश; तोयमू--जल; ईप्सितम्--कामना की जाती है; हित्वा--त्यागकर; महानू--महान् व्यक्ति; तमू-- उसको; यदि--यदि; सज्जते--लिप्त हो जाता है; गृहे--गृहस्थ जीवन में; तदा--उस समय; महत्त्वम्--बड़प्पन; वयसा--आयु से; दम्-पतीनाम्--पति-पत्नी का।
जिस प्रकार जलचर प्राणी सदैव विशाल जलराशि में रहना चाहते हैं उसी प्रकार समस्तबद्धात्माएँ श्रीभगवान् के अपार अस्तित्त्व में रहने की कामना करती हैं।
अतः यदि भौतिकगणना के आधार पर माना गया कोई श्रेष्ठ पुरुष किन्हीं कारणों से परमात्मा की शरण न ग्रहणकर गृहस्थ जीवन में लिप्त हो जाता है, तो उसकी श्रेष्ठता निम्न श्रेणी के तरुण दम्पत्ति जैसीहोती है।
भौतिक जीवन के प्रति अत्यधिक आसक्ति से समस्त आध्यात्मिक गुणों का लोप होजाता है।
तस्माद्रजोरागविषादमन्युमानस्पृहाभयदैन्याधिमूलम् ।
हित्वा गृहं संसृतिचक्रवालंनृसिंहपादं भजताकुतो भयमिति ॥
१४॥
तस्मात्ू--अतः:; रज:--रजोगुण का; राग-- भौतिक वस्तुओं के प्रति लगाव; विषाद--तब निराशा; मन्यु--क्रो ध; मान-स्पृहा--समाज में सम्मानित बनने की कामना; भय--भय; दैन्य--दीनता का; अधिमूलम्ू--मूल कारण; हित्वा--परित्यागकरके; गृहम्--गृहस्थ जीवन; संसृति-चक्रवालम्--जन्म-मरण का चक्र; नूसिंह-पादम्--भगवान् नृसिंह देव के चरणारविन्द;भजत--पूजा करते हुए; अकुतः-भयम्--निर्भीकता की शरण; इति--इस प्रकार |
अतः, हे असुरगण, गृहस्थ जीवन के तथाकथित सुख का परित्याग करके भगवान् नृसिंहदेव के चरणारविन्दों की शरण ग्रहण करो।
वे ही निर्भीकता की वास्तविक शरण-स्थली हैं।
सांसारिक अनुरक्ति, दुर्दमनीय कामनाएँ, विषाद, क्रोध, निराशा, भय, झूठी प्रतिष्ठा की भूख इनसबका मूल कारण गृहस्थ जीवन में आसक्ति है, जिसके कारण जीवन-मरण का चक्र चलतारहता है।
केतुमालेपि भगवान्कामदेवस्वरूपेण लक्ष्म्या: प्रियच्चिकीर्षया प्रजापतेर्दुहितृण्ाां पुत्राणां तद्वर्षपतीनांपुरुषायुषाहोरात्रपरिसड्ख्यानानां यासां गर्भा महापुरुषमहास्त्रतेजसोद्देजितमनसां विध्वस्ता व्यसव:ःसंवत्सरान्ते विनिपतन्ति, ॥
१५॥
केतुमाले--केतुमालवर्ष में; अपि-- भी; भगवानू-- श्री भगवान्, विष्णु; कामदेव-स्वरूपेण--कामदेव के रूप में ( प्रद्युम्न );लक्ष्म्या:--लक्ष्मी देवी की; प्रिय-चिकीर्षया--तुष्ट करने की कामना; प्रजापते:--प्रजापति की; दुहितृणाम्--पुत्रियों के;पुत्राणाम्ू--पुत्रों का; तत्-वर्ष-पतीनाम्--उस भूभाग ( वर्ष ) के राजा; पुरुष-आयुषा--मनुष्य के जीवनकाल में ( लगभग१०० वर्ष ); अहः-रात्र--दिन तथा रातें; परिसड्ख्यानानाम्--समान संख्या वाले; यासाम्--जिनका ( पुत्रियों के ); गर्भा:--गर्भ; महा-पुरुष-- श्री भगवान् का; महा-अस्त्र-महास्त्र ( चक्र ); तेजसा--तेज या प्रभा के द्वारा; उद्देजित-मनसाम्--उत्तेजितचित्त से; विध्वस्ता:--विध्व॑ंस; व्यसव: --मृत; संवत्सर-अन्ते--वर्ष के अन्त में; विनिपतन्ति--गिर जाते हैं।
शुकदेव गोस्वामी आगे बोले--केतुमालवर्ष नामक भूभाग में भगवान् विष्णु अपने भक्तोंके संतोष के लिए ही कामदेव के रूप में रहते हैं।
इन भक्तों में लक्ष्मीजी, प्रजापति संवत्सर तथा संवत्सर के समस्त पुत्र तथा पुत्रियाँ सम्मिलित हैं।
प्रजापति की पुत्रियाँ रात के तथा उनके पुत्रदिन के नियामक देवता माने जाते हैं।
प्रजापति की सन््तानों की संख्या ३६,००० है जो मनुष्य केजीवन काल के प्रत्येक दिन तथा रात की संख्या के तुल्य है।
प्रत्येक वर्ष के अन्त में प्रजापतिकी पुत्रियाँ श्रीभगवान् के चक्र को देखकर अत्यन्त उद्देलित हो उठती हैं जिससे उन सबों कागर्भपात हो जाता है।
अतीव सुललितगतिविलासविलसितरुचिरहासलेशावलोकलीलयाकिश्ञिदुत्तम्भितसुन्दरभ्रूमण्डलसुभगवदनारविन्दश्निया रमां रमयन्निन्द्रियाणि रमयते ॥
१६॥
अतीव--अत्यन्त; सु-ललित--सुन्दर; गति--चाल से; विलास--लीलाओं से; विलसित--प्रकट रूप; रुचिर--मनोहर; हास-लेश--मन्द मुसकान; अवलोक-लीलया--लीलापूर्ण चितवन से; किझ्ञित्-उत्तम्भित--कुछ-कुछ ऊपर उठा; सुन्दर--सुन्दर;भ्रू-मण्डल--भौंहों से; सुभग--शुभ; वदन-अरविन्द-अरिया--अपने कमल तुल्य मुख से; रमाम्--रमा अथवा लक्ष्मी देवी को;रमयन्--आनन्दित करते हुए; इन्द्रियाणि--समस्त इन्द्रियों को; रमयते--आनन्दित करते हैं।
केतुमालवर्ष में भगवान् कामदेव ( प्रद्युम्न ) अत्यन्त लालित्य पूर्ण चाल से चलते हैं।
उनकीमन्द मुसकान मनोहर है और जब वे अपनी भृकुटियों को किंचित ऊपर उठा कर लीलापूर्वकदेखते हैं, तो उनके मुख की सुन्दरता बढ़ जाती हैं और वे लक्ष्मीजी को आनन्दित करते हैं।
इसप्रकार वे अपनी दिव्य इन्द्रियों का आनन्द लेते हैं।
तद्धगवतो मायामयं रूपं परमसमाधियोगेन रमा देवी संवत्सरस्य रात्रिषु प्रजापतेर्दुहितृभिरुपेताह:सु चतद्धर्तृभिरुपास्ते इदं चोदाहरति ॥
१७॥
तत्--वह; भगवतः -- श्रीभगवान् का; माया-मयम्-- भक्तों के लिए स्नेह से पूरित; रूपम्--रूप; परम--सर्वोच्च; समाधि-योगेन--प्रभु की सेवा में मन तल्लीन होने से; रमा--लक्ष्मी; देवी--दिव्य नारी; संवत्सरस्य--संवत्सर नामक; रात्रिषु--रात्रि में;प्रजापते:--प्रजापति की; दुहितृभि:--पुत्रियों के साथ; उपेत--मिलकर; अहःसु--दिन में; च-- भी; ततू-भर्तृभि: -- पतियों केसाथ; उपास्ते--पूजा करती हैं; इदम्--यह; च-- भी; उदाहरति--जप करती हैं।
लक्ष्मीजी संवत्सर की अवधि में दिन के समय प्रजापति के पुत्रों के साथ और रात्रि में उनकीपुत्रियों के साथ मिलकर परम दयालु कामदेव रूप में भगवान् की पूजा करती हैं।
भक्ति मेंतल्लीन रहकर लक्ष्मीजी निम्नलिखित मंत्रों का जप करती हैं।
हां हीं हूं नमो भगवते हषीकेशाय सर्वगुणविशेषैर्विलक्षितात्मने आकूतीनां चित्तीनां चेतसांविशेषाणां चाधिपतये घोडशकलाय च्छन्दोमयायान्नमयायामृतमयाय सर्वमयाय सहसे ओजसे बलायकान्ताय कामाय नमस्ते उभयत्र भूयात् ॥
१८॥
ओम्- हे ईश्वर; हाम् हीम् हम--सिद्धि के लिए जप करने जाने वाला बीज मंत्र; ओम्--हे ईश्वर; नम: --नमस्कार है;भगवते-- श्री भगवान् के चरणकमलों में; हषीकेशाय--इन्द्रियों के स्वामी हषीकेश को; सर्व-गुण--समस्त दिव्य गुणों सहित;विशेषै:--समस्त प्रकारों सहित; विलक्षित--विशेष रूप से दृष्टव्य; आत्मने--समस्त जीवात्माओं में; आकूतीनाम्--समस्तप्रकार के कार्यों का; चित्तीनाम्ू--समस्त प्रकार के ज्ञानों का; चेतसाम्--मन के कार्यो, यथा संकल्प तथा मानसिक प्रयत्नों का; विशेषाणाम्-- अपने-अपने लक्ष्यों का; च--तथा; अधिपतये---अधिपति तक; षोडश-कलाय--उत्पत्ति की सोलह कलाएँजिनके अंगस्वरूप ( यथा पाँच इन्दियों के विषय तथा मन सहित ग्यारह इन्दियाँ ); छन्दः-मयाय--समस्त अनुष्ठानों को; अन्न-मयाय--जो समस्त जीवात्माओं का भरण करता है; अमृत-मयाय--जो अमर रहता है; सर्व-मयाय--जो सर्वव्यापी है; सहसे--शक्तिमान; ओजसे--इन्द्रियों को बल प्रदान करने वाला; बलाय--शरीर को शक्ति प्रदान करने वाला; कान्ताय--समस्तजीवात्माओं के परम भर्ता या स्वामी; कामाय--भक्तों की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले को; नम:--विनीतनमस्कार; ते--आपको; उभयत्र--सदैव ( दिन तथा रात्रि अथवा इस तथा अगले जीवन में ); भूयात्--शुभ हो |
मेरी समस्त इन्द्रियों के नियन््ता तथा समस्त वस्तुओं की उत्पत्ति के स्तोत्र भगवान् हषीकेशको मेरा नमस्कार है।
वे समस्त दैहिक, मानसिक तथा बौद्धिक कर्मों के अधीश्वर और उनकेफलों के एकमात्र भोक्ता हैं।
पाँचों इन्द्रियों के विषय तथा मन समेत ग्यारह इन्द्रियाँ उनकीआंशिक अभिव्यक्तियाँ हैं।
वे समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले हैं, जो उनकीशक्तिस्वरूपा होने के कारण उनसे अभिन्न हैं; वे प्रत्येक व्यक्ति की दैहिक और मानसिक शक्तिके कारण रूप हैं, जो उनसे अभिन्न हैं।
दरअसल, वे समस्त जीवात्माओं की आवश्यकताओं कीपूर्ति करने वाले तथा उनके भर्ता हैं।
समस्त वेदों का ध्येय उनकी उपासना है।
अतः हम सभी उन्हेंसविनय नमस्कार करते हैं।
वे इस जन्म में तथा अगले जन्म में सदा हमारे अनुकूल रहें।
स्त्रियो ब्रतैस्त्वा हृषीके श्वर स्वतोझाराध्य लोके पतिमाशासतेन्यम् ।
तासां न ते वै परिपान्त्यपत्यंप्रियं धनायूंषि यतोस्वतन्त्रा: ॥
१९॥
स्त्रियः--सभी स््रियाँ; ब्रते:--त्रत उपवास रखकर; त्वा--आप; हषीके श्वरम्--इन्द्रियों के स्वामी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को;स्वत:--स्वयमेव; हि--निश्चयपूर्वक; आराध्य--आराधना करके; लोके--इस जगत में; पतिम्--पति, स्वामी; आशासते--याचना करते हैं; अन्यम्ू--दूसरा; तासामू--उन सभी स्त्रियों का; न--नहीं; ते--वे पति; वै--निस्सन्देह; परिपान्ति--रक्षा करनेमें समर्थ; अपत्यम्--सन्तानें; प्रियम्--अत्यन्त प्रिय; धन--सम्पत्ति; आयूंषि--अथवा जीवनकाल; यत:-- क्योंकि; अस्ब-तन्त्रा:--आश्रित |
हे प्रभो, आप निश्चित रूप से समस्त इन्द्रियों के पूर्ण रूप से स्वतंत्र स्वामी हैं।
अतः समस्तस्त्रियाँ जो अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए पति को पाने की कामना से संकल्पों का दृढ़पालन करकेआपकी उपासना करती हैं, वे अवश्य ही मोहग्रस्त हैं।
वे यह नहीं जानती कि ऐसा पति न तोउनकी और न ही उनकी सन््तानों की रक्षा कर सकता है।
वह स्वयं ही काल, कर्मफल तथाप्रकृति-गुणों के अधीन है जो सब आपके अधीनस्थ हैं, अत: वह न तो सम्पत्ति की रक्षा करसकता है और न अपने सन््तानों की।
स बे पतिः स्थादकुतोभयः स्वयंसमन्ततः पाति भयातुरं जनम् ।
स एक एवेतरथा मिथो भयंनैवात्मलाभादधि मन्यते परम् ॥
२०॥
सः--वह; बवै--निस्संदेह; पति: --पति; स्थात्--हो; अकुतः-भयः--जो किसी से भयभीत नहीं है, निर्भय; स्वयम्--आत्मनिर्भर; समन्तत:--पूर्णतया; पाति-- भरण करता है; भय-आतुरम्--अत्यन्त भयभीत; जनम्--व्यक्ति को; सः--अतःवह; एक:--एक; एव--केवल; इतरथा-- अन्यथा; मिथ: --एक दूसरे से; भयम्-- भय, डर; न--नहीं; एब--निस्सन्देह;आत्म-लाभात्--आपकी प्राप्ति की अपेक्षा; अधि--महत्तर; मन्यते--मानी जाती है; परम्--अन्य वस्तु
जो स्वयं निर्भय है तथा जो सभी भयभीत व्यक्तियों को शरण प्रदान करता है, केवल वहीवास्तव में पति तथा रक्षक हो सकता है।
अतः, हे प्रभो, आप ही एकमात्र पति हैं, कोई अन्य इसपद का भागी नहीं हो सकता।
यदि आप एकमात्र पति न होते तो आप भी अन्यों से डरते।
अतःवेदों के पारंगत व्यक्ति आपको ही प्रत्येक का स्वामी स्वीकार करते हैं और यह मानते हैं किआपसे बढ़कर कोई अन्य पति एवं रक्षक नहीं है।
या तस्य ते पादसरोरुहाईणंनिकामयेत्साखिलकामलम्पटा ।
तदेव रासीप्सितमीप्सितोर्चितोयद्भग्नयाच्चञा भगवन्प्रतप्यते ॥
२१॥
या--जो स्त्री; तस्थ--उसका; ते--आपका; पाद-सरोरुह--चरणकमलों का; अर्हणम्--पूजा; निकामयेत्-- पूर्णतया कामनाकरती है; सा--ऐसी स्त्री; अखिल-काम-लम्पटा--समस्त प्रकार की लौकिक कामनाएँ करते हुए भी; तत्ू--वह; एव--केवल; रासि--आप प्रदान करते हैं; ईप्सितम्--कुछ अन्य वाउछा; ईप्सित:--वाजिछत; अर्चित:--पूजित; यत्--जिससे; भग्न-याच्ञा--जो आपके चरणकमलों को छोड़कर अन्य वस्तुओं की कामना करती है और इस प्रकार भग्नचित्त हो जाती है;भगवनू--हे ईश्वर; प्रतप्यते--पीड़ा को प्राप्त होती है |
हे भगवन्, जो स्त्री आपके चरणकमल की आराधना विशुद्ध प्रेमवश करती है, आप उसकीसमस्त कामनाओं को स्वतः ही पूरा करते हैं।
यदि कोई स्त्री आपके चरणकमलों की पूजाकिसी विशेष प्रयोजन के लिए करती है, तो भी आप उसकी कामनाओं को शीघ्र पूरा करते हैं,किन्तु अन्ततः वह टूटे हुए मन से पश्चात्ताप करती है।
अत: किसी भौतिक लाभ के लिए आपकेचरणकमलों की आराधना नहीं की जानी चाहिए।
मत्प्राप्तये जेशसुरासुरादय -स्तप्यन्त उग्र॑ तप ऐन्द्रिये धियः ।
ऋते भवत्पादपरायणान्न मांविन्दन्त्यहं त्वद्धृदया यतोडजित ॥
२२॥
मत्-प्राप्तये--मेरी दया प्राप्त करने के लिए; अज--ब्रह्माजी; ईश--शिवजी; सुर--अन्य देवता जिनके स्वामी इन्द्र, चन्द्र तथावरुण हैं; असुर-आदय:-- असुर भी; तप्थन्ते--तप करते हैं; उग्रमू--कठिन; तपः--तपस्या; ऐन्द्रिये धिय:ः --जिनके मस्तिष्कमहत् इन्द्रियतृप्ति में लीन रहते हैं; ऋते--जब तक; भवत्-पाद-परायणात्--जो श्रीभगवान् के चरणारविन्द की सेवा में एकान्तभाव से तल्लीन रहते हैं; न--नहीं; माम्--मुझको; विन्दन्ति--प्राप्त करते हैं; अहम्--मैं; त्वत्--आप में; हृदया:--जिनकेहृदय; यत:--अतः; अजित-हे दुर्जेय |
है अजेय परमेश्वर, मेरा आशीर्वाद पाने के लिए इन्द्रियसुख के अभिलाषी ब्रह्माजी तथाशिवजी आदि समस्त सुर-असुरगण घोर तपस्या करते हैं, किन्तु आपके चरणारविन्द की सेवा मेंसंलग्न भक्त के अतिरिक्त अन्य पर मैं अनुग्रह नहीं करती, चाहे वह कितना भी महान् क्यों न हो।
चूँकि मैं निरन्तर आपको अपने हृदय में बसाये रहती हूँ इसलिए मैं भक्त के अतिरिक्त अन्य किसीपर अनुग्रह नहीं करती।
स त्वं ममाप्यच्युत शीर्णिण वन्दितंकराम्बुजं यत्त्वदधायि सात्वताम् ।
बिभर्षि मां लक्ष्म वरेण्य माययाक ईश्वरस्थेहितमूहितुं विभुरिति ॥
२३॥
सः--वह; त्वमू--आप; मम--मेरे; अपि-- भी; अच्युत--च्युत न होने वाले; शीर्ण्णि--शिर पर; वन्दितम्--पूजित; कर-अम्बुजम्ू--आपके कर-कमल; यत्--जो; त्वत्ू--आपके द्वारा; अधायि--रखे गये; सात्वताम्--भक्तों के ऊपर; बिभर्षि--आप पालन करते हैं; मामू--मुझको; लक्ष्म--आपके वक्षस्थल पर चिह्न; वरेण्य--हे पूज्य; मायया--माया से, भ्रम से; कः--कौन; ईश्वरस्थ--ई श्वर का; ईहितमू--इच्छाएं; ऊहितुम्--तर्क द्वारा समझना; विभु:--समर्थ है; इति--इस प्रकार,हे अच्युत, आपका कर-कमल सभी वरदानों का स्त्रोत है।
अतः आपके शुद्ध भक्त उसकीपूजा करते हैं और आप अत्यन्त दयापूर्वक उनके शिरों पर अपना हाथ रखते हैं।
मेरी भी यहीकामना है कि आप मेरे मस्तक पर अपना हाथ रखें, यद्यपि आप पहले से ही अपने वक्षस्थल परश्रीलक्ष्म रूप में मुझे धारण करते हैं, किन्तु इस सम्मान को मैं मिथ्या प्रतिष्ठा की तरह मानती हूँ।
आप अपनी वास्तविक दया भक्तों पर ही दिखाते हैं, मुझ पर नहीं।
निस्सन्देह, आप सर्वसमर्थनियंता हैं, आपके प्रयोजन को भला कौन समझ सकता है ?
रम्यके च भगवत: प्रियतमं मात्स्यमवताररूपं तद्वर्षपुरुषस्य मनोः प्राक्प्रदर्शितं स इदानीमपि महताभक्तियोगेनाराधयतीदं चोदाहरति ॥
२४॥
रम्यके च--रम्यकवर्ष में भी; भगवत:-- श्री भगवान् का; प्रिय-तमम्--अत्यन्त प्रिय; मात्स्यमू--मछली; अवतार-रूपम्--अवतार स्वरूप; ततू-वर्ष-पुरुषस्य--उस भूभाग के शासक; मनो:--मनु के; प्राकू--इसके पूर्व ( चाक्षुष-मन्वन्तर के अन्त में );प्रदर्शितम्-- प्रदर्शित; सः--वह मनु; इृदानीम् अपि--यहाँ तक कि आज भी; महता भक्ति-योगेन--महती भक्ति के द्वारा;आराधयति-- श्रीभगवान् की आराधना करता है; इृदम्ू--यह; च--तथा; उदाहरति--जप करता है।
शुकदेव गोस्वामी आगे कहते हैं--रम्यकवर्ष में पिछले मन्वन्तर (चाश्लुष ) के अन्त मेंश्रीभगवान् मत्स्य रूप में प्रकट हुए, जहाँ के अधिपति वैवस्वत मनु हैं।
वे आज भी मत्स्यभगवान् की शुद्ध भक्ति करते हैं और निम्नलिखित मंत्र का जप करते हैं।
नमो भगवते मुख्यतमाय नम: सत्त्वाय प्राणायौजसे सहसे बलाय महामत्स्याय नम इति ॥
२५॥
ओमू-हे ईश्वर; नम: --नमस्कार है; भगवते-- श्रीभगवान् को; मुख्य-तमाय--प्रथम अवतार को; नम:--मेरा नमस्कार है;सत्त्वाय--सत्त्व रूप को; प्राणाय--जीवन के मूलाधार को; ओजसे--इन्द्रियों के ओजस्वरूप; सहसे--समस्त बुद्धि बल केस्त्रोत; बलाय--शारीरिक शक्ति के उद्गम; महा-मत्स्याय--महा मत्स्यावतार को; नम:ः--नमस्कार है; इति--इस प्रकारमैं सत्त्व स्वरूप श्रीभगवान् को नमस्कार करता हूँ।
वे प्राण, शारीरिक शक्ति, बौद्धिकशक्ति तथा ज्ञानेन्द्रिय शक्ति के मूल स्त्रोत हैं।
समस्त अवतारों में प्रकट होने वाले वेमहामत्स्यावतार हैं।
मैं पुन: उनको नमस्कार करता हूँ।
अन्तर्बहिश्वाख्खिलिलोकपालकै -रहृष्टरूपो विचरस्युरुस्वनः ।
स ईश्वरस्त्वं य इृदं वशे नय-न्ञाम्ता यथा दारुमयीं नरः स्त्रियम्ू ॥
२६॥
अन्तः-- भीतर; बहि:--बाहर; च-- भी; अखिल-लोक-पालकै :--विभिन्न लोकों, समाजों, राज्यों आदि के नायकों द्वारा;अदृष्ट-रूप:--अहृश्य; विचरसि--विचरण करते हो; उरु--अत्यन्त महान्; स्वन:--जिसकी ध्वनि ( वैदिक मंत्र ); सः--वह;ईश्वर: --परम नियन्ता; त्वमू--आपको; य:--जो; इृदम्--वह; वशे--वश में; अनयत्--ले आया; नाम्ना--विभिन्न नामों से,जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र; यथा--ठीक वैसा ही; दारुमयीम्--काष्ठ की बनी; नरः--मनुष्य; स्त्रियमू--पुतली को
हे ईश्वर, जिस प्रकार एक नटकठ पुतलियों को तथा पति अपनी पत्नी को वश में रखता है,उसी प्रकार आप इस ब्रह्माण्ड की समस्त जीवात्माओं को, चाहे वे ब्राह्मण हों या क्षत्रिय, वैश्यअथवा शूद्र, अपने वश में रखने वाले हैं।
यद्यपि आप जन-जन के हृदयों के भीतर परम साक्षीके रूप में और उनके बाहर भी निवास करते हैं, किन्तु समाज, जाति तथा देश के तथाकथितनेता आपको समझ नहीं पाते।
केवल वैदिक मंत्रों की स्वरलहरियों को सुनने वाले आपको जानपाते हैं।
यं लोकपालाः किल मत्सरज्वराहित्वा यतन्तोपि पृथक्समेत्य च ।
पातुं न शेकुद्विपदश्चतुष्पदःसरीसूप॑ स्थाणु यदत्र हृश्यते ॥
२७॥
यम्--जिसको ( आपको ); लोक-पाला:--इस ब्रह्माण्ड के महान् नेता, जिनमें ब्रह्मा प्रथम हैं; किल--अन््यों की क्या कहें;मत्सर-ज्वरा:--जिन्हें ईर्ष्या का ज्वर चढ़ा हुआ है; हित्वा--परित्याग करके; यतन्त:ः--यत्न करते हुए; अपि--यद्यपि; पृथक्--अलग से; समेत्य--सम्मिलित; च-- भी; पातुम्--रक्षा करने में; न--नहीं; शेकु:--समर्थ ; द्वि-पदः--दो पैर वाले; चतुः-'पदः--चार पाँव वाले; सरीसृूपम्-रेंगने वाले; स्थाणु--जड़; यत्--जो भी; अत्र--इस भौतिक जगत के भीतर; दृश्यते--दीखपड़ता है।
हे ईश्वर, इस ब्रह्माण्ड के बड़े से बड़े नेता, यथा ब्रह्मा तथा अन्य देवताओं से लेकर इससंसार के राजनीतिक नेताओं तक, सभी आपकी सत्ता के प्रति ईष्यालु हैं।
किन्तु आपकीसहायता के बिना वे न तो पृथक्-पृथक्, न ही सम्मिलित रूप से इस ब्रह्माण्ड के असंख्य जीवोंका पालन कर सकते हैं।
आप समस्त मनुष्यों, पशुओं ( यथा गाय, गधा ) तथा समस्त वनस्पतियों, रेंगने वाले जीवों, पक्षियों, पर्वतों तथा इस संसार में जो भी दिखाई पड़ता है उसकेएकमात्र वास्तविक पालक हैं।
भवान्युगान्तार्णव ऊर्मिमालिनिक्षोणीमिमामोषधिवीरुधां निधिम् ।
मया सहोरु क्रमतेडज ओजसातस्मै जगत्प्राणगणात्मने नम इति ॥
२८॥
भवान्--आप; युग-अन्त-अर्णवे-- प्रलयकालीन सागर में; ऊर्मि-मालिनि--उत्ताल तरंगों के स्वामी; क्षोणीम्--पृथ्वी को;इमामू--इस; ओषधि-वबीरुधाम्-- समस्त प्रकार की औषधियों एवं लताओं को; निधिम्--आगार, संग्रह; मया--मेरे; सह--साथ; उरुू--महान्; क्रमते--आप भ्रमण करते रहे; अज--हे अजन्मा; ओजसा-गतिपूर्वक; तस्मै--उसको; जगत्--सम्पूर्णब्रह्माण्ड का; प्राण-गण-आत्मने--जीवन का परम स्त्रोत; नम:--नमस्कार है; इति--इस प्रकार।
हे सर्वशक्तिमान ईश्वर, कल्पान्त में यह पृथ्वी, जो सभी प्रकार की जड़ी बूटियों तथा वृक्षोंकी आगार है, जल की बाढ़ से प्रलयकारी तरंगों के नीचे डूब गईं।
उस समय आपने पृथ्वी सहितमेरी रक्षा की और अत्यन्त वेग से आप समुद्र में भ्रमण करते रहे।
हे अजन्मा, आप इस समग्र सृष्टिके वास्तविक पालनकर्ता हैं, इसलिए आप ही सभी जीवात्माओं के कारणस्वरूप हैं।
मैं आपकोसादर नमस्कार करता हूँ ।
हिरण्मयेपि भगवान्निवसति कूर्मतनुं बिभ्राणस्तस्य तत्प्रियतमां तनुमर्यमा सह वर्षपुरुषै:पितृगणाधिपतिरुपधावति मन्त्रमिमं चानुजपति ॥
२९॥
हिरण्मये--हिरण्मयवर्ष में; अपि--निस्सन्देह; भगवान्-- श्रीभगवान्; निवसति--निवास करते हैं; कूर्म-तनुम्--कछुए काशरीर; बिभ्राण: -- प्रकट करते हुए; तस्य-- श्रीभगवान् का; तत्--वह; प्रिय-तमाम्--सर्वाधिक प्रिय; तनुम्--शरीर; अर्यमा--हिरण्मय वर्ष का प्रमुख वासी अर्यमा के; सह--साथ; वर्ष-पुरुषै:--उस भूभाग के व्यक्ति; पितृ-गण-अधिपति:--जो पितरोंका प्रतिनिधि है; उपधावति--भक्तिपूर्वक पूजा करता है; मन्त्रमू--मंत्र को; इममू--इस; च-- भी; अनुजपति-- जपता है।
शुकदेव गोस्वामी आगे बोले--हिरण्मयवर्ष में भगवान् विष्णु कच्छप रूप में निवास करतेहैं।
इस परम प्रिय एवं सुन्दर रूप की आराधना हिरण्मयवर्ष के प्रमुख निवासी अर्यमा तथा उसवर्ष के अन्य वासियों द्वारा सदैव की जाती है।
वे निम्नलिखित स्तुति करते हैं।
नमो भगवते अकूपाराय सर्वसत्त्वगुणविशेषणायानुपलक्षितस्थानाय नमो वर्ष्मणे नमो भूम्ने नमोनमोवस्थानाय नमस्ते ॥
३०॥
ओम्-हे ईश्वर; नम: -- नमस्कार है; भगवते-- श्रीभगवान् को; अकूपाराय--कूर्म के रूप में; सर्व-सत्त्व-गुण-विशेषणाय--जिसका रूप शुद्ध सत्त्वमय है; अनुपलक्षित-स्थानाय-- आपको, जिनका स्थान अनिश्चित है; नमः--नमस्कार है; वर्ष्षणे--काल की मर्यादा के बाहर आपको; नम:ः--आद पूर्वक नमस्कार; भूम्ने--उस महान् को जो सर्वत्र जा सकता हैं; नमः नम:--बारम्बार नमस्कार है; अवस्थानाय--सर्वाधार; नम:--नमस्कार है; ते--आपको।
हे प्रभो, कच्छप स्वरूप आपको मेरा सादर नमस्कार है।
आप समस्त दिव्य गुणों के आगारहैं।
आप भौतिकता से पूर्णतः रहित तथा परम सत्त्व में स्थित हैं।
आप जल में विचरण करते रहतेहैं, किन्तु कोई आपका पता नहीं लगा पाता, अतः मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
अपनी दिव्य स्थिति के कारण आप भूत, वर्तमान तथा भविष्य से बँधे नहीं रहते।
आप सर्वत्र सर्वाधाररूप में उपस्थित रहते हैं, अत: मैं बारम्बार आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
यद्ूपमेतन्निजमाययार्पित-मर्थस्वरूपं बहुरूपरूपितम् ।
सड़्ख्या न यस्यास्त्ययथोपलम्भनातू-तस्मै नमस्तेव्यपदेशरूपिणे ॥
३१॥
यत्--जिसका; रूपम्--रूप; एतत्--यह; निज-मायया अर्पितम्--आपकी माया से प्रकट; अर्थ-स्वरूपम्--यह समस्त दृश्यसार्वभौम अभिव्यक्ति ( प्रकाश ); बहु-रूप-रूपितम्--अनेक रूपों में प्रकट; सड्ख्या--गणना; न--नहीं; यस्य--जिसकी;अस्ति--है; अयथा--झूठे ही; उपलम्भनात्-- देखने से; तस्मै--उसे ( भगवान् को ); नमः--मेरा नमस्कार; ते--आपको;अव्यपदेश--मानसिक चिन्ता द्वारा निश्चित न हो सकने वाला, अनिवर्चनीय; रूपिणे--जिसका सत्य रूप।
हे भगवन्, यह विराट दृश्य अभिव्यक्ति आपकी अपनी सृजनात्मक शक्ति का प्रदर्शन है।
इसके अन्तर्गत अनन्त रूप आपकी बहिरंगा शक्ति ( माया ) का प्रदर्शन मात्र है, अतः यह विराटरूप आपका वास्तविक रूप नहीं है।
आपके वास्तविक रूप का दर्शन तो केवल दिव्य भावनाभावित भावित भक्तजन कर सकते हैं, अन्य कोई नहीं।
इसलिए मैं आपको सादर नमस्कारकरता हूँ।
जरायुजं स्वेदजमण्डजोद्धधिदंचराचरं देवर्षिपितृभूतमैन्द्रियम् ।
हो: खं क्षिति: शैलसरित्समुद्र -द्वीपग्रहर्क्षत्यभिधेय एक: ॥
३२॥
जरायु-जम्--गर्भ से उत्पन्न; स्वेद-जम्-पसीने से उत्पन्न; अण्ड-ज--अंडे से उत्पन्न; उद्धिदम्-पृथ्वी से उत्पन्न; चर-अचरम्--चर तथा अचर ( स्थावर तथा जंगम ); देव--देवता; ऋषि--ऋषि; पितृ--पितृलोक के वासी; भूतम्--वायु, अग्नि जल तथाक्षिति नामक तत्त्व; ऐन्द्रियमू--सभी इन्द्रियाँ; द्यौ:--उच्चतर लोक; खम्--आकाश ; क्षितिः--पृथ्वी; शैल--पर्वत; सरित्--नदियाँ; समुद्र--सागर; द्वीप--द्वीप; ग्रह-ऋक्ष --नक्षत्र तथा ग्रह; इति--इस प्रकार; अभिधेय:--विभिन्न नामों से अभिहित;एकः--एक |
हे प्रिय प्रभु, आप अपनी विविध शक्तियाँ अनगिनत खूपों में प्रदर्शित करते हैं--जैसे कि गर्भ सेअंडे से तथा स्वेद से उत्पन्न होने वाले जीव; धरती से पौधों एवं वृक्षों के रूप में विकसित होने वालेजीव; देवता , विद्वान, ऋषि-मुनि तथा पितृओं सहित चर तथा अचर सारे जीव; बाह्यावकाश,स्वर्गलोक सहित उच्चतर ग्रहमंडल एवं पर्वत, नदियाँ, महासागरों तथा द्वीपों सहित पथ्वी ग्रह इत्यादि।
यस्मिन्नसड्ख्येयविशेषनाम-रूपाकृतौ कविभिः कल्पितेयम् ।
सड़्ख्या यया तत्त्वदशापनीयतेतस्मै नमः साड्ख्यनिदर्शनाय ते इति ॥
३३॥
यस्मिनू--जिसमें ( श्रीभगवान् में )असड्ख्येय--अगणित; विशेष--विशेष; नाम--नाम; रूप--रूप; आकृतौ--शारीरिकस्वरूप से युक्त; कविभि:--दविद्वान व्यक्तियों के द्वारा; कल्पिता--कल्पित की गई; इयम्--यह; सड्ख्या--गिनती; यया--जिसके द्वारा; तत्त्व--सत्य का; दहशा--ज्ञान से; अपनीयते--निकाल लेते हैं; तस्मै-- उसे; नम:ः-- नमस्कार; साड्ख्य-निरदर्शनाय--जो सांख्य दर्शन के उद्धाटक हैं; ते--आपको; इति--इस प्रकार।
हे प्रभो, आपका नाम, रूप तथा आकृति असंख्य रूपों में अभिव्यक्त होते हैं।
निश्चित रूप सेयह नहीं कहा जा सकता है कि आप कितने रूपों में विद्यमान हैं, फिर भी आपके स्वयं केअवतार कपिलदेव जैसे मुनियों ने इस विराट जगत में चौबीस तत्त्व निश्चित किये हैं।
अत: यदिकोई सांख्य दर्शन में रुचि रखता है, तो उसे चाहिए कि विभिन्न सत्यों को वह आपसे सुने।
दुर्भाग्यवश जो आपके भक्त नहीं हैं, वे केवल तत्त्वों की गणना कर पाते हैं, किन्तु आपकेवास्तविक रूप से अनजान रहते हैं।
मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
उत्तरेषु च कुरुषु भगवान्यज्ञपुरुष: कृतवराहरूप आस्ते तं तु देवी हैषा भू: सहकुरुभिरस्खलितभक्तियोगेनोपधावति इमां च परमामुपनिषदमावर्तयति, ॥
३४॥
उत्तरेषु--उत्तर दिशा में; च--भी; कुरुषु-- कुरुवर्ष में; भगवान्-- श्री भगवान्; यज्ञ-पुरुष:--समस्त यज्ञों के फल को स्वीकारकरने वाला; कृत-वराह-रूप:--शूकर ( वराह ) रूप को धारण करके; आस्ते--शाश्वत विद्यमान रहता है; तम्--उसको; तु--निश्चयपूर्वक; देवी--देवी; ह--निश्चय ही; एघा--यह; भू:--पृथ्वी लोक; सह--के साथ; कुरुभिः--कुरु-देश के वासी;अस्खलित--स्खलित न होने वाली; भक्ति-योगेन--भक्ति के द्वारा; उपधावति--पूजा करता है; इमाम्--इस; च-- भी; परमाम्उपनिषदम्--श्रेष्ठठटम उपनिषद् ( भगवान् तक पहुँचने की विधि ) को; आवर्तयति--अभ्यास हेतु बारम्बार जप करता है।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा, हे राजन, सभी यज्ञाहुतियों को स्वीकार करने वाले श्रीभगवान्वराह रूप में जम्बूद्वीप के उत्तरी भाग में निवास करते हैं।
वहाँ उत्तर-कुरुवर्ष में पृथ्वी माता तथा अन्य सभी वासी निम्नलिखित उपनिषद् मंत्र का बारम्बार जप करते हुए उनकी आराधना करतेहैं।
नमो भगवते मन्त्रतत्त्वलिड्राय यज्ञक्रतवे महाध्वरावयवाय महापुरुषाय नमः कर्मशुक्लाय त्रियुगायनमस्ते ॥
३५॥
ओम्-हे प्रभो; नम:--नमस्कार; भगवते-- श्री भगवान् को; मन्त्र-तत्त्व-लिड्राय--जो विभिन्न मंत्रों द्वारा समझे जाते हैं; यज्ञ--'पशु-बलि के रूप में; क्रतवे--तथा पशुबलि; महा-ध्वर--बड़ी-बड़ी बलियाँ; अवयवाय--जिनके शरीर के अंग; महा-पुरुषाय--परमात्मा को; नमः--नमस्कार; कर्म-शुक्लाय--जो जीवात्माओं के कर्मों को पवित्र करने वाला है; त्रि-युगाय--तीन युगों में
छः ऐश्वर्यों के साथ प्रकट होने वाले श्रीभगवान् ( चतुर्थ युग में प्रच्छन्न रहने वाले ) को; नमः--नमस्कार; ते--आपको ।
हे प्रभो, हम विराट पुरुष के रूप में आपको सादर नमस्कार करते हैं।
केवल मंत्रोच्चार सेहम आपको पूर्णतः समझ सकते हैं।
आप यज्ञरूप हैं, आप क्रतु हैं।
अतः यज्ञ के सभी अनुष्ठानआपके दिव्य शरीर के अंशरूप हैं और केवल आप ही समस्त यज्ञों के भोक्ता हैं।
आपकास्वरूप दिव्य गुणों से युक्त है।
आप 'त्रियुग ' कहलाते हैं, क्योंकि कलियुग में आपने प्रच्छन्नअवतार लिया है और आप छहों ऋद्धियों के स्वामी हैं।
यस्य स्वरूपं कवयो विपश्चितोगुणेषु दारुष्विव जातवेदसम् ।
मथ्नन्ति मथ्ना मनसा दिदक्षवोगूढं क्रियार्थरनम ईरितात्मने ॥
३६॥
यस्य--जिसका; स्व-रूपम्--स्वरूप; कवय:--महान् सन्त; विपश्चित:--परम सत्य को सुनिश्चित करने में पटु; गुणेषु--तीनगुणों से युक्त भौतिक जगत में; दारुषु--काष्ठ में; इब--सहृश; जात--प्रकट; वेदसम्-- अग्नि; मथ्नन्ति--मथते हैं; मथ्ना--अरणी या मथानी से उत्पन्न अग्नि; मनसा--मन के द्वारा; दिदृक्षव: --उत्सुकजन; गूढम्--छिपे; क्रिया-अर्थे;--कर्मों तथा उनकेफलों के द्वारा; नम:ः--नमस्कार है; ईरित-आत्मने-- प्रकट होने वाले प्रभु को |
ऋषि तथा मुनि काठ में छिपी अग्नि को अरणी के द्वारा उत्पन्न कर सकने में समर्थ हैं।
हेप्रभो, परम सत्य को समझने में दक्ष ऐसे व्यक्ति आपको प्रत्येक वस्तु में, यहाँ तक कि अपनेशरीर में भी देखने का प्रयास करते हैं किन्तु आप फिर भी अप्रकट रहते हैं।
मानसिक याभौतिक क्रियाओं जैसी अप्रत्यक्ष विधियों से आपको नहीं समझा जा सकता।
आप स्वतः प्रकटहोने वाले हैं, अतः जब आप देख लेते हैं कि कोई व्यक्ति सर्वभावेन आपकी खोज में संलग्न हैतभी आप अपने को प्रकट करते हैं।
अतः मैं आपको सादर प्रणाम करता हूँ।
द्रव्यक्रियाहेत्वयनेशकर्तृभि-मायागुणैर्वस्तुनिरीक्षितात्मने ।
अन्वीक्षयाड्रातिशयात्मबुद्द्धेभि-निरस्तमायाकृतये नमो नमः: ॥
३७॥
द्रव्य--इन्द्रियसुख के पदार्थों द्वारा; क्रिया--इन्द्रियों का व्यापार; हेतु--इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता; अयन--शरीर; ईश--प्रबल काल; कर्तृभिः--झूठे अहंकार से; माया-गुणैः--भौतिक प्रकृति के गुणों द्वारा; वस्तु--तथ्य स्वरूप; निरीक्षित--निरीक्षण किया जाकर; आत्मने--परमात्मा को; अन्वीक्षया-- अत्यन्त विचार करके; अड़--योगसाधना के अंगों द्वारा;अतिशय-आत्म-बुद्धिभि:--जिनकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है उनके द्वारा; निरस्त--पूर्णतया मुक्त; माया--माया; आकृतये --जिनकी आकृति ( रूप ); नम:--नमस्कार; नमः--नमस्कार है।
भौतिक सुख के साधन ( शब्द, गन्ध, रूप, स्पर्श, स्वाद ), ऐन्द्रिय कर्म, इन्द्रियों केअधिष्ठाता देवता, शरीर, अनन्त काल तथा अहंकार--ये सभी आपकी माया से उत्पन्न हैं।
जिन्होंने योग के द्वारा अपनी बुद्धि को स्थिर कर लिया है वे यह देख सकते हैं कि ये सभी तत्त्वआपकी माया के ही परिणाम हैं।
वे आपके दिव्य रूप को भी प्रत्येक वस्तु की पृष्ठ भूमि में परमआत्मा के रूप में देख सकते हैं।
अतः मैं पुनः पुन: आपको नमस्कार करता हूँ।
करोति विश्वस्थितिसंयमोदयंअस्येप्सितं नेप्सितमीक्षितुर्गुणै: ।
माया यथायो भ्रमते तदा श्रयंग्राव्णो नमस्ते गुणकर्मसाक्षिणे ॥
३८॥
करोति--करता है; विश्व--ब्रह्मांड की; स्थिति-- भरण; संयम--विलोप; उदयम्--सृष्टि; यस्थ--जिसका; ईप्सितमू--वांछित;न--नहीं; ईप्सितम्--वांछित; ईक्षितु:--ऊपर से देखने वाले का; गुणैः --गुणों के द्वारा; माया--माया; यथा--जितना;अयः--लोहा; भ्रमते-- भ्रमण करता है; तत्-आ श्रयमू--उसके निकट स्थित; ग्राव्ण:--चुम्बक पत्थर; नम:--नमस्कार; ते--आपको; गुण-कर्म-साक्षिणे-- भौतिक प्रकृति की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के साक्षी |
हे प्रभो, आप इस भौतिक जगत की सृष्टि, पालन या संहार के इच्छुक नहीं हैं, किन्तुबद्धजीवों के लिए अपनी सृजनात्मक शक्ति के द्वारा इन क्रियाओं को निष्पादित करते हैं।
जिसप्रकार चुम्बक-पत्थर के प्रभाव से लोहे का टुकड़ा घूमता है ठीक उसी प्रकार जब आप समस्तमाया पर दृष्टि फेरते हैं, तो सारे जड़ पदार्थ गति करने लगते हैं।
प्रमथ्य दैत्यं प्रतिवारणं मृधेयो मां रसाया जगदादिसूकरः ।
कृत्वाग्रदंष्टे निरगादुदन्वतःक्रीडब्निवेभः प्रणतास्मि तं विभुमिति ॥
३९॥
प्रमथ्य--वध करके; दैत्यम्--असुर को; प्रतिवारणम्ू--अत्यन्त शक्तिशाली प्रतियोगी; मृधे--युद्ध में; य:ः--वह जो; माम्--मुझको ( पृथ्वी ); रसाया:--रसातल में पड़ी हुईं; जगत्ू--इस भौतिक जगत में; आदि-सूकरः --आदिसूकर रूप; कृत्वा--धारण करके; अग्र-दंष्टे--दाँतों के अग्रभाग में; निरगात्ू--जल के बाहर लाया; उदन्वतः--गर्भोदक सागर से; क्रीडन्--खेलतेहुए; इब--समान्, सहश; इभः--हाथी; प्रणता अस्मि--मैं आपके समक्ष नतमस्तक हूँ; तम्--उसको; विभुम्-- भगवान् को;इति--इस प्रकार।
हे प्रभो, इस ब्रह्माण्ड में आदि शूकर रूप में आपने हिरण्याक्ष दैत्य के साथ युद्ध करकेउसका संहार किया।
फिर आपने अपने दाढ़ो के अग्र भाग से मुझ पृथ्वी को गर्भोदक सागर सेउसी प्रकार ऊपर उठा लिया जैसे क्रौड़ारत गज जल में से कमल-पुष्प तोड़ लेता है।
मैं आपके समक्ष नतमस्तक हूँ।
