← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 5 की सूची

अध्याय उन्नीस: जम्बूद्वीप का विवरण

5.19श्रीशुक उबाचकिम्पुरुषे वर्षे भगवन्तमादिपुरुषं लक्ष्मणाग्रजं सीताभिरामं रामं तच्चरणसन्निकर्षाभिरत: परमभागवतोहनुमान्सह किम्पुरुषरविरतभक्तिरुपास्ते ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी बोले; किम्पुरुषे वर्ष--किम्पुरुष नामक भूखण्ड में; भगवन्तम्‌-- श्रीभगवान्‌; आदि-पुरुषम्‌--समस्त कारणों के मूल कारण; लक्ष्मण-अग्र-जम्‌--लक्ष्मण के अग्रज ( बड़े भ्राता ); सीता-अभिरामम्‌--सीता माताको अत्यन्त प्रिय अथवा सीतादेवी के पति; रामम्‌-- भगवान्‌ रामचन्द्र को; तत्‌ू-चरण-सत्निकर्ष-अभिरत:-- भगवान्‌ राम केचरणकमलों की सेवा में सदैव तत्पर; परम-भागवतः--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विख्यात महान्‌ भक्त; हनुमान्‌ू-- श्री हनुमानजी;सह--सहित; किम्पुरुषैः --किम्पुरुषवर्ष के निवासियों द्वारा; अविरत--निरन्तर; भक्ति:-- भक्ति करने वाला; उपास्ते--पूजाकरता है।

श्रीशुकदेव गोस्वामी बोले--हे राजन, किम्पुरुषवर्ष में महान्‌ भक्त हनुमान वहाँ केनिवासियों सहित लक्ष्मण के अग्रज तथा सीतादेवी के पति भगवान्‌ रामचन्द्र की सेवा में सदेवतत्पर रहते हैं।

आए्टिषेणेन सह गन्धर्वैरनुगीयमानां परमकल्याणीं भर्तृभगवत्कथां समुपश्रृणोति स्वयं चेदं गायति ॥

२॥

आए्टि-षेणेन--किम्पुरुष वर्ष का प्रधान पुरुष आए्टिषिण; सह--साथ; गन्धर्वै: --गन्धर्वों के द्वारा; अनुगीयमानाम्‌ू--जपे जाकर;परम-कल्याणीम्‌--परम कल्याण प्रदान करने वाली; भर्तु-भगवत्‌-कथाम्‌--अपने पति ( श्रीभगवान्‌ ) का यशोगान;समुपश्रणोति--अत्यन्त मनोयोग से श्रवण करता है; स्वयम्‌ च--स्वयं भी; इदम्‌--यह; गायति--गायन करता है।

गन्धर्वों का समूह सदा ही भगवान्‌ रामचन्द्र के यशों का गान करता है।

ऐसा गायन अत्यन्तमंगलकारी होता है।

हनुमानजी तथा किम्पुरुषवर्ष के प्रधान पुरुष आ्टिषिण अत्यन्त मनोयोग सेइस यशोगान का निरन्तर श्रवण करते हैं।

हनुमानजी निम्न मंत्रों का जप करते हैं।

नमो भगवते उत्तमशएलोकाय नम आर्यलक्षणशीलब्रताय नम उपशिक्षितात्मन उपासितलोकाय नम:साधुवादनिकषणाय नमो ब्रह्मण्यदेवाय महापुरुषाय महाराजाय नम इति ॥

३॥

ओम्‌--हे भगवान्‌; नमः--नमस्कार है; भगवते-- श्रीभगवान्‌ को; उत्तम-शलोकाय--जिनकी अर्चना सदैव उत्तम एलोकों से कीजाती है; नम:--मेरा नमस्कार; आर्य-लक्षण-शील-ब्रताय--जिसमें उत्तम पुरुषों के समस्त गुण विद्यमान हैं; नम:--मेरानमस्कार; उपशिक्षित-आत्मने-- आपको जिनकी इन्द्रियाँ वश में हैं; उपासित-लोकाय--जो समस्त श्रेणियों के लोगों द्वारा सदैवपूजित हैं; नम:--मेरा नमस्कार; साधु-वाद-निकषणाय-- श्रीभगवान्‌ को जो गुणों के परखने की कसौटी तुल्य हैं; नम:--मेरानमस्कार; ब्रह्मण्य-देवाय--जो सुयोग्य ब्राह्मणों द्वारा पूजित हैं; महा-पुरुषाय-- श्रीभगवान्‌ को जो इस भौतिक सृष्टि का कारणहोने की वज़ह से पुरुष-सूक्त द्वारा पूजित हैं; महा-राजाय--सभी राजाओं में श्रेष्ठ महाराज को; नमः --मेरा नमस्कार; इति--इसप्रकार |

हे प्रभो, मैं ओम्‌कार बीजमंत्र के जप से आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ।

मैं उन श्रीभगवान्‌को सादर नमस्कार करता हूँ जो उत्तम पुरुषों में सर्वाधिक हैं।

आप आर्यजनों के समस्त उत्तमगुणों के भंडार हैं।

आपके गुण तथा आचरण सदैव एकसमान रहने वाला है और आप अपनीइन्द्रियों तथा मन को सदैव अपने वश में रखने वाले हैं।

सामान्य व्यक्ति की भाँति आप आदर्शचरित्र प्रस्तुत करके अन्यों को आचरण करना सिखाते हैं।

कसौटी केवल स्वर्ण के गुण कीपरीक्षा करने में समर्थ है, किन्तु आप ऐसे स्पर्श-मणि हैं, जिससे समस्त उत्तम गुणों की परीक्षा हो जाती है।

आप भक्तों में अग्रणी ब्राह्मणों के द्वारा उपासित हैं।

हे परम पुरुष, आप महाराजा हैं,अतः मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।

यत्तद्विशुद्धानुभवमात्रमेककंस्वतेजसा ध्वस्तगुणव्यवस्थम्‌ ।

प्रत्यक्प्रशान्तं सुधियोपलम्भनंहानामरूपं निरहं प्रपद्ये ॥

४॥

यत्‌--जो; तत्‌--उस परम सत्य को; विशुद्ध-विशुद्ध, भौतिक प्रकृति के स्पर्श से दूर; अनुभव--अनुभव; मात्रम्‌--सच्चिदानन्द दिव्य देह; एकम्‌--एकमात्र; स्व-तेजसा--अपने तेज से; ध्वस्त-- ध्वस्त; गुण-व्यवस्थम्‌--गुणों का प्रभाव;प्रत्यक्‌--दिव्य, भौतिक नेत्रों से अदृष्ट; प्रशान्तम्‌--धीर, विक्षोभरहित; सुधिया--कृष्णभावना से, जो भौतिक कामनाओं, कर्मोंतथा कल्पनाओं से अप्रभावित है; उपलम्भनम्‌--उपलब्ध किया जा सकने वाला; हि--निस्सन्देह; अनाम-रूपम्‌ू--नाम तथारूप रहित; निरहम्‌ू-- अहंकाररहित; प्रपद्ये--मुझे नमस्कार करने दें।

भगवान्‌ को, जिनका विशुद्ध रूप ( सच्चिदानन्दविग्रह ) भौतिक गुणों के द्वारा दूषित नहींहै, विशुद्ध चेतना के द्वारा ही देखा जा सकता है।

वेदान्त में उसे अद्वितीय कहा गया है।

अपनेतेजवश वह भौतिक प्रकृति के कल्मष से अछूता है और भौतिक दृष्टि से पर है।

अप्रभावित है,अतः वह दिव्य है।

न तो वह कोई कर्म करता है, न उसका कोई भौतिक रूप अथवा नाम है।

केवल श्रीकृष्णभावना में ही भगवान के दिव्य रूप के दर्शन किये जा सकते हैं।

हमें चाहिए किहम भगवान्‌ रामचन्द के चरणकमलों में हृढ़तापूर्वक स्थित होकर उनको सादर नमन करें।

मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणंरक्षोवधायैव न केवलं विभो: ।

कुतोन्यथा स्यथाद्रमतः स्व॒ आत्मन:सीताकृतानि व्यसनानी श्वरस्य ॥

५॥

मर्त्व--मनुष्य; अवतार: --जिसका अवतार; तु--तो भी; इह--इस लोक में; मर्त्य-शिक्षणम्‌--समस्त जीवों को, विशेष रूप सेमनुष्य को शिक्षा देने के लिए; रक्ष:-वधाय--रावण असुर को मारने के लिए; एव--निश्चय ही; न--नहीं; केवलम्‌--केवल,मात्र; विभोः -- श्रीभगवान्‌ का; कुतः--कहाँ से; अन्यथा-- अन्यथा; स्यातू--होगा; रमत:--रमण करने वाले का; स्वे-- अपनेआप में; आत्मन:--ब्रह्माण्ड का आत्म-स्वरूप; सीता-- भगवान्‌ रामचन्द्र की पत्ती सीता का; कृतानि--वियोग के कारणउत्पन्न; व्यसनानि--समस्त दुख; ईश्वरस्थ-- श्रीभगवान्‌ के |

राक्षमों के नायक रावण को यह वर प्राप्त था कि उसका वध मनुष्य ही कर सकता है,इसलिए पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ रामचन्द्र को मनुष्य रूप धारण करना पड़ा, किन्तु भगवान्‌रामचन्द्र का उद्देश्य मात्र रावण का वध करना ही नहीं था।

वे तो मर्त्य-प्राणियों को यह शिक्षादेना चाहते थे कि भोग विलास अथवा पली के चारों ओर केन्द्रित भौतिक सुख समस्त दुखों काकारण है।

वे स्वयं में पूर्ण हैं और उन्हें किसी भी प्रकार का पश्चात्ताप नहीं है।

अतः भला वे माता सीता के अपहरण से क्या कष्ट भोगते ?

नवैस आत्मात्मवतां सुहत्तमःसक्तर्त्रिलोक्यां भगवान्वासुदेव: ।

न स्त्रीकृतं कश्मलमश्नुवीतन लक्ष्मणं चापि विहातुमहति ॥

६॥

न--नहीं; बै--निस्सन्देह; सः--वह; आत्मा--परम-आत्मा; आत्मवताम्‌--स्वरूपसिद्धों का; सुहत्‌-तम:--सर्वश्रेष्ठ मित्र;सक्त:--आसक्त; त्रि-लोक्याम्‌--तीनों लोकों के भीतर कोई भी; भगवान्‌-- श्रीभगवान्‌; वासुदेव: --सर्वव्यापी भगवान्‌; न--नहीं; स्त्री-कृतम्‌ू--अपनी पत्नी के कारण प्राप्त; कश्मलमू--वियोग-दुख; अश्नुवीत--प्राप्त करेगा; न--नहीं; लक्ष्मणम्‌--रामचन्द्र के लघु भ्राता लक्ष्मण; च-- भी; अपि--निश्चय ही; विहातुम्‌--परित्याग करना; अर्हति--समर्थ होता है

चूँकि भगवान्‌ रामचन्द्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान वासुदेव हैं अतः वे इस भौतिक जगत सेकिसी प्रकार लिप्त नहीं हैं।

वे सभी स्वरूपसिद्ध आत्माओं के परम प्रिय परमात्मा और उनकेघनिष्ठ मित्र हैं।

वे परम ऐश्वर्यवान्‌ हैं।

अत: पत्नी-विछोह के कारण उन्होंने न तो अधिक कष्ट उठाये होंगे, न ही उन्होंने अपनी पत्ली तथा अपने लघु भ्राता लक्ष्मण का परित्याग किया।

उनकेलिए इन दोनों में किसी एक का भी परित्याग सर्वथा असम्भव था।

न जन्म नूनं महतो न सौभगंन वाड्न बुद्धिर्नाकृतिस्तोषहेतु: ।

तैर्यद्विसृष्ठानपि नो वनौकस-श्वकार सख्ये बत लक्ष्मणाग्रज: ॥

७॥

न--न; जन्म--उच्च कुल में जन्म; नूनम्‌--निस्सन्देह; महतः-- श्री भगवान्‌ का; न--न तो; सौभगम्‌--सौभाग्य; न--न तो;वाक्‌--शिष्टाचारपूर्वक बात करना; न--न तो; बुद्धिः:--तीक्ष्ण बुद्धि; न--नहीं; आकृति: --शरीर के अंग-प्रत्यंग; तोष-हेतु:--भगवान्‌ के आनन्द का कारण; तैः--उक्त समस्त गुणों के द्वारा; यत्‌--क्योंकि; विसृष्टान्‌ू-- अस्वीकृत; अपि--यद्यपि; नः--हमको; वन-ओकसः--वनवासी; चकार-- स्वीकार किया; सख्ये--मित्रता से; बत--हाय; लक्ष्मण-अग्र-ज:--लक्ष्मणके बड़े भाई

भगवान्‌ श्रीरामचन्द्र नेउच्चकुल में जन्म धारण करने, शारीरिक सौन्दर्य, वाक्नातुरी, तीक्षण बुद्धि या श्रेष्ठ जातिअथवा राष्ट्र जैसे भौतिक गुणों के कारण कोई चाह कर भी भगवान्‌ रामचन्द्र से मैत्री स्थापितनहीं कर सकता।

उनसे मित्रता स्थापित करने के लिए इन गुणों की आवश्यकता नहीं है, अन्यथाभला हम असभ्य वनवासियों को, बिना उच्च कुल में जन्म लिये तथा रूप-रंग न होते हुए औरभद्र पुरुषों की भाँति बात कर सकने में सक्षम न होने पर भी अपने मित्रों के रूप में क्‍योंस्वीकार करते ?

सुरोसुरो वाप्यथ वानरो नरःसर्वात्मना यः सुकृतज्ञमुत्तमम्‌ ।

भजेत राम॑ मनुजाकृतिं हरिंय उत्तराननयत्कोसलान्दिवमिति ॥

८॥

सुरः--देवता; असुर:-- असुर; वा अपि--अथवा; अथ--अतः; वा--अथवा; अनरः --मनुष्य के अतिरिक्त ( पशु-पक्षीइत्यादि ); नर:--मनुष्य; सर्व-आत्मना--सब प्रकार से, हृदय से; यः--जो; सु-कृतज्ञम्‌--सरलता से आज्ञाकारी बनाया गया;उत्तमम्‌--सर्वोत्कृष्ट; भजेत--पूजा करनी चाहिए; रामम्‌-- श्रीरामचन्द्र को; मनुज-आकृतिम्‌--मनुष्य रूप में प्रकट होकर;हरिम्‌-- श्रीभगवान्‌ को; य:--जो; उत्तरान्‌--उत्तरी भारत के; अनयत्‌--वापस ले गये; कोसलान्‌ू--कोशल देश,अयोध्यावासियों को; दिवम्‌--आध्यात्मिक जगत या वैकुण्ठ लोक में; इति--इस प्रकार।

अतः चाहे सुर हो या असुर, मनुष्य हो या मनुष्येतर प्राणी जैसे पशु या पक्षी, प्रत्येक को उनपूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ रामचन्द्र की पूजा करनी चाहिए जो इस पृथ्वी पर मनुष्य के रूप मेंप्रकट होते हैं।

भगवान्‌ की पूजा के लिए किसी कठोर तप या साधना की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे अपने भक्त की तुच्छ सेवा को भी स्वीकार करने वाले हैं।

इस प्रकार से वे तुष्ट होजाते हैं और उनके तुष्ट होते ही भक्त सफल हो जाता है।

निस्सन्देह, श्रीरामचन्द्र अयोध्या केसमस्त भक्तों को वैकुण्ठ धाम वापस ले गये।

भारतेडपि वर्ष भगवान्नरनारायणाख्यआकल्पान्तमुपचितधर्मज्ञानवैराग्यै श्र्योपशमोपरमात्मोपलम्भनमनुग्रहायात्मवतामनुक म्पयातपोडव्यक्तगतिश्चवरति ॥

९॥

भारते-- भारत; अपि-- भी; वर्षे-- भूभाग में; भगवान्‌ -- श्रीभगवान्‌; नर-नारायण-आख्य: -- नर-नारायण के नाम से विख्यात;आ-कल्प-अन्तम्‌--कल्पान्त तक; उपचित--वर्धमान; धर्म-- धर्म; ज्ञान--ज्ञान; वैराग्य--वैराग्य; ऐश्वर्य--सम्पदा; उपशम--इन्द्रिय-निग्रह; उपरम-- अहंकार से मुक्ति; आत्म-उपलम्भनम्‌--आत्म-साक्षात्कार; अनुग्रहाय--अनुग्रह हेतु; आत्म-वताम्‌--आत्म-साक्षात्कार में रुचि रखने वाले व्यक्तियों को; अनुकम्पया--अहैतुकी दया से; तपः--तप; अव्यक्त-गति:--अकथनीयमहिमामय; चरति--करता है।

श्रीशुकदेव गोस्वामी आगे बोले--श्रीभगवान्‌ की महिमा अकल्पनीय है।

उन्होंने अपनेभक्तों पर अनुग्रहवश उन्हें धर्म, ज्ञान, त्याग, अध्यात्म, इन्द्रिय-निग्रह तथा अहंकार से मुक्ति कीशिक्षा प्रदान करने के लिए भारतवर्ष की भूमि में बदरिकाश्रम नामक स्थान पर अपने को नर-नारायण रूप में प्रकट किया है।

वे आत्मज्ञान की सम्पदा से परिपूर्ण हैं और कल्पान्त तक तप मेंरत रहने वाले हैं।

यही आत्म-साक्षात्कार की क्रिया है।

त॑ भगवान्नारदो वर्णा भ्रमवतीभिर्भारतीभिः प्रजाभिर्भगवत््रोक्ता भ्यां साइख्ययोगाभ्यांभगवदनुभावोपवर्णनं सावर्णेरुपदेक्ष्य्माण: परमभक्तिभावेनोपसरति इदं चाभिगृणाति, ॥

१०॥

तम्‌--उसको ( नर-नारायण ); भगवान्‌--अत्यन्त शक्तिशाली सन्त पुरुष; नारद:--नारद ऋषि; वर्ण-आश्रम-वतीभि: --चारोंवर्णों तथा चारों आश्रमों के अनुयायियों द्वारा; भारतीभि: -- भारतवर्ष नामक देश के; प्रजाभि:--वासियों द्वारा; भगवत्‌-प्रोक्ताभ्याम्‌-- श्री भगवान्‌ द्वारा कथित; साड्ख्य--सांख्य-योग द्वारा ( भौतिक गुणों का विश्लेष्णात्मक अध्ययन );योगाभ्याम्--योग के अभ्यास द्वारा; भगवत्‌-अनुभाव-उपवर्णनम्‌--जो भगवत्‌-प्राप्ति की क्रिया को बताता है; साव्ें:--सावर्णि मनु को; उपदेक्ष्यमाण: --उपदेश करते हुए; परम-भक्ति-भावेन--अत्यन्त भक्तिभाव से; उपसरति-- भगवान्‌ की सेवाकरता है; इृदम्‌--इसे; च--तथा; अभिगृणाति--जप करता है।

नारद पंचरात्र नामक अपने ग्रंथ में भगवान्‌ नारद ने अत्यन्त विस्तारपूर्वक बताया है किकिस प्रकार ज्ञान तथा योगक्रिया के द्वारा जीवन के परम लक्ष्य--भक्ति--को प्राप्त करने केलिए कार्य करना चाहिए उन्होंने श्रीभगवान्‌ की महिमा का भी वर्णन किया है।

महर्षि नारद नेइस दिव्य साहित्य का उपदेश सावर्णि मनु को दिया, जिससे वह भारतवर्ष के उन वासियों कोभगवान्‌ की भक्ति प्राप्त करने की शिक्षा दे सकें, जो हृढ़तापूर्वक वर्णाश्रम धर्म के नियमों कापालन करते हैं।

इस प्रकार नारद मुनि भारतवर्ष के अन्य निवासियों सहित नर-नारायण की सदा सेवा करते हुए निम्नलिखित मंत्र का जप करते रहते हैं।

नमो भगवते उपशमशीलायोपरतानात्म्याय नमोकिज्ञनवित्ताय ऋषिऋषभाय नरनारायणाय'परमहंसपरमगुरवे आत्मारामाधिपतये नमो नम इति ॥

११॥

ओमू--हे परमेश्वर; नम:--मेरा सादर नमस्कार; भगवते-- श्रीभगवान्‌ को; उपशम-शीलाय--जिन्होंने इन्द्रियों को वश में करलिया है; उपरत-अनात्म्याय-- भौतिक जगत से विरक्त; नमः--नमस्कार; अकिञ्जन-वित्ताय-- धनहीन व्यक्तियों के सम्पत्तिस्वरूप श्रीभगवान्‌ को; ऋषि-ऋषभाय--ऋषियों में श्रेष्ठ को; नर-नारायणाय--नर नारायण को; परमहंस-परम-गुरवे--परमहंसों अर्थात्‌ मुक्त पुरुषों के परम आदरणीय गुरु; आत्माराम-अधिपतये--आत्मारामों में श्रेष्ठ; नमः नमः --बारम्बार नमस्कारहै; इति--इस प्रकार।

मैं समस्त सन्त पुरुषों में श्रेष्ठ श्रीभगवान्‌ नर-नारायण को सादर नमस्कार करता हूँ।

वे अत्यन्त आत्मसंयमित तथा आत्माराम हैं, वे झूठी प्रतिष्ठा से परे हैं और निर्धनों की एकमात्रसम्पदा हैं।

वे मनुष्यों में परम सम्माननीय समस्त परमहंसों के गुरु हैं और आत्मसिद्धों के स्वामीहैं।

मैं उनके चरणकमलों को पुनः पुनः नमस्कार करता हूँ।

गायति चेदम्‌--कर्तास्य सर्गादिषु यो न बध्यतेन हन्यते देहगतोपि दैहिकै: ।

द्रष्टन दृग्यस्य गुणैर्विदूष्यतेतस्मै नमोसक्तविविक्तसाक्षिणे ॥

१२॥

गायति--गाता है; च--तथा; इृदम्‌ू--यह; कर्ता--करने वाला; अस्य--इस जगत का; सर्ग-आदिषु--सृष्टि, पालन तथा संहारका; यः--जो; न बध्यते--सृष्टिकर्ता या स्वामी के रूप में लिप्त नहीं है; न--नहीं; हन्यते--पीड़ित किया जाता है; देह-गतःअपि--मनुष्य के रूप में प्रकट होकर भी; दैहिकै:-- भूख, प्यास, थकान जैसी शारीरिक यातनाओं के द्वारा; द्रष्ट:--सर्व द्रष्टाको; न--नहीं; हक्‌--दृष्टि-शक्ति; यस्य--जिसकी; गुणैः-- भौतिक गुणों के द्वारा; विदृष्यते--कलुषित हो जाता है; तस्मै--उसको; नमः--नमस्कार है; असक्त--अनासक्त श्रीभगवान्‌ को; विविक्त--बिना प्यार के; साक्षिणे--सब का साक्षी

परम शक्तिमान ऋषि नारद नर-नारायण की आराधना निम्नलिखित मंत्र का जप करकेकरते हैं--' पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ इस हृश्य जगत के सृष्टिकर्ता, पालक और संहारक हैं, तोभी वे मिथ्या अभिमान से पूर्णतया मुक्त हैं।

यद्यपि मूढ़ों के लिए उन्होंने हमारे समान शरीर धारणकरना स्वीकार किया प्रतीत होता है, किन्तु उन्हें भूख, प्यास तथा थकान जैसे शारीरिक कष्टनहीं सताते।

यद्यपि वे सर्वद्रष्टा हैं, किन्तु जिन वस्तुओं को वे देखते हैं उनसे उनकी इन्द्रियाँ दूषितनहीं होती।

मैं ऐसे अनासक्त, जगत के साक्षी, परमात्मास्वरूप श्रीभगवान्‌ को बारम्बार नमस्कारकरता हैँ।

इदं हि योगेश्वर योगनैपुणंहिरण्यगर्भो भगवाझ्जगाद यत्‌ ।

यदन्तकाले त्वयि निर्गुणे मनोभकत्या दधीतोज्झितदुष्कलेवर: ॥

१३॥

इदम्‌--यह; हि--निश्चयपूर्वक; योग-ई श्वर--हे समस्त योगशक्ति के स्वामी; योग-नैपुणम्‌--योगिक नियमों की साधना में दक्ष;हिरण्य-गर्भ: --भगवान्‌ ब्रह्म; भगवान्‌--सर्वशक्तिमान; जगाद--कहा; यत्‌--जो; यत्‌--जो; अन्त-काले--मृत्यु के समय;त्वयि--तुममें ( आप में ); निर्गुणे--सत्त्व; मन:ः--मन ( मस्तिष्क ); भक्त्या--भक्तिपूर्वक; दधीत--रखना चाहिए; उज्झित-दुष्कलेवर:--भौतिक शरीर के साथ ही अपना स्वरूप त्याग करके |

हे योगेश्वर, आत्माराम भगवान्‌ ब्रह्मा ( हिरण्यगर्भ ) ने योगक्रिया के विषय में जो कुछ कहाहै यह उसकी व्याख्या है।

मृत्यु के समय सभी योगी आपके चरण-कमलों में अपना मन स्थापितकरके अपने भौतिक शरीर को त्यागते हैं।

यह योग सिद्धि है।

यथेहिकामुष्मिककामलम्पट:सुतेषु दारेषु धनेषु चिन्तयन्‌ ।

शड्जेत विद्वान्कुकलेवरात्ययाद्‌यस्तस्य यल: श्रम एव केवलम्‌ ॥

१४॥

यथा--जिस प्रकार; ऐहिक--इस जीवन में; अमुष्मिक-- भावी जीवन में; काम-लम्पट:--कामवासनाओं में लिप्त रहने वालापुरुष; सुतेषु--सन्तान; दारेषु--पत्ली; धनेषु --सम्पत्ति में; चिन्तयन्‌ू--सोचते हुए; शद्लेत-- भयभीत रहता है; विद्वानू--आतमज्ञानी पुरुष; कु-कलेबर--इस मलमूत्र से पूरित शरीर का; अत्ययात्‌--क्षति के कारण; यः--जो कोई; तस्थ--उसका;यलः--प्रयास; श्रम:--समय एवं शक्ति का अपव्यय; एब--निश्चय ही; केवलम्‌--मात्र, केवल |

सामान्य रूप से भौतिकतावादी जन अपने वर्तमान तथा भावी शारीरिक सुखों में अत्यन्तलिप्त रहते हैं।

अतः वे अपनी पत्नी, सन्‍्तान तथा सम्पत्ति के विचारों में सदैव मग्न रहते हैं औरइस मलमूत्र से भरे हुए शरीर को त्यागने से भयभीत रहते हैं।

यदि कृष्णभक्ति में संलग्न व्यक्तिभी अपने शरीर-त्याग से भयभीत हों तो फिर शास्त्रों के अध्ययन में किये श्रम का क्या लाभ?यह केवल समय की बरबादी है।

तन्नः प्रभो त्वं कुकलेवरार्पितांत्वन्माययाहंममतामधोक्षज ।

भिन्द्याम येनाशु वयं सुदुर्भिदांविधेहि योगं त्वयि न: स्वभावमिति ॥

१५॥

तत्‌--अतः; नः--हमारी; प्रभो--हे प्रभो; त्वमू--आप ( तुम ); कु-कलेवर-अर्पिताम्‌--मलमूत्र से पूरित इस बुरे शरीर में लगेहुए; त्वत्‌ू-मायया-- आपकी माया से; अहमू्‌-ममताम्‌---' मैं और मेरा ' का विचार; अधोक्षज-हे सत्त्व; भिन्‍्द्याम--त्यागसकता है; येन--जिससे; आशु--शीघ्र ही; वयम्‌--हम; सुदुर्भिदाम्‌--जिसको त्याग पाना दुष्कर है; विधेहि--कृपया प्रदानकरें; योगम्‌-क्रिया; त्ववि-- आपको; नः--हमारा; स्वभावम्‌--जो स्थिर मन के द्वारा जाना जाता है; इति--इस प्रकार

अतः हे प्रभो, हे अधोक्षजकृपा करके हमें भक्तियोग साधने की शक्ति प्रदान करें जिससेहम अपने अस्थिर मन को वश में करके आप में लगा सकें।

हम सभी आपकी माया से प्रभावितहैं, अतः हम मलमूत्र से पूरित शरीर तथा इससे सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु के प्रति अत्यधिक समर्पितहैं।

इस आसक्ति को त्यागने का एकमात्र उपाय भक्ति है, अतः आप हमें यह वर दें।

भारतेप्यस्मिन्वर्षे सरिच्छैला: सन्ति बहवो मलयो मड़लप्रस्थो मैनाकस्त्रिकूट ऋषभ: कूटकः कोललक:सह्यो देवगिरिरृष्यमूक: श्रीशैलो वेड्डूटो महेन्द्रो वारिधारो विन्ध्यः शुक्तिमानृक्षगिरि: पारियात्रोद्रोणश्चित्रकूटो गोवर्धनो रैवतकः ककुभो नीलो गोकामुख इन्द्रकील: कामगिरिरिति चान्ये चशतसहस्त्रशः शैलास्तेषां नितम्बप्रभवा नदा नद्यश्च सन्त्यसड्ख्याता: ॥

१६॥

भारते-- भारतवर्ष में; अपि-- भी; अस्मिन्‌ू--इस; वर्षे-- भूभाग में ; सरित्‌--नदियाँ; शैला: -- पर्वत; सन्ति-- हैं; बहव: --अनेक; मलय:--मलय; मड्ल-प्रस्थ:--मंगलप्रस्थ; मैनाक:--मैनाक पर्वत; त्रि-कूट:--त्रिकूट पर्वत; ऋषभ:--ऋषभ;कूटकः--कूटक; कोललक:--कोल्लक; सहा: --सह्ाय; देवगिरि: --देवगिरि; ऋष्य-मूक: --ऋष्यमूक; श्री-शैल:-- श्रीशैल;वेड्डूट:--वेंकट; महेन्द्र: --महेन्द्र; वारि-धार: --वारिधार; विन्ध्य: --विन्ध्याचल; शुक्तिमान्‌ू--शुक्तिमान्‌; ऋक्ष-गिरि: --ऋक्षगिरि; पारियात्र:--पारियात्र; द्रोण:--द्रोण; चित्र-कूट:--चित्रकूट; गोवर्धन: --गोवर्धन; रैवतक:--रैवतक ; ककुभ:--ककुभ; नील:--नील; गोकामुख: --गोकामुख; इन्द्रकील: --इन्द्रकील; काम-गिरि:--कामगिरि; इति--इस प्रकार; च--तथा; अन्ये-- अन्य; च-- भी; शत-सहस्त्रशः--सैकड़ों तथा हजारों; शैला:--पर्वत; तेषाम्‌--उनके; नितम्ब-प्रभवा:--ढालों सेउत्पन्न; नदाः:--बड़ी-बड़ी नदियाँ; नद्यः--छोटी नदियाँ; च--और; सन्ति--हैं; असड्ख्याता: --असंख्य |

इलावृत-वर्ष की भाँति ऋक्ष गिरि, पारियात्र, द्रोण, चित्रकुट, गोवर्धन, ऐवतक, भारतवर्ष मेंभी अनेक पर्वत और नदियाँ हैं।

कुछ पर्वत इस प्रकार हैं--मलय, मंगलप्रस्थ, मैनाक, त्रिकूट,ऋषभ, कूटक, कोललक, सहा, देवगिरि, ऋष्यमूक, श्रीशैल, वेंकट, महेन्द्र, वारिधारा, विन्ध्य,शुक्तिमान्‌ू, ऋक्ष गिरि, पारियात्र, द्रोण, चित्रकूट, गोवर्धन, ऐवतक, ककुभ, नील, गोकामुख,इन्द्रकील तथा कामगिरि।

इनके अतिरिक्त अनेक पहाड़ियाँ हैं जिनकी ढालों से अनेक बड़ी तथाछोटी नदियाँ निकलती हैं।

एतासामपो भारत्यः प्रजा नामभिरेव पुनन्तीनामात्मना चोपस्पृशन्ति; चन्द्रवसा ताम्रपर्णी अवटोदाकृतमाला वैहायसी कावेरी वेणी पयस्विनी शर्करावर्ता तुड्रभद्रा कृष्णावेण्या भीमरथी गोदावरीनिर्विन्ध्या पयोष्णी तापी रेवा सुरसा नर्मदा चर्मण्वती सिन्धुरन्ध: शोणश्व नदौ महानदीवेदस्मृतिरृषिकुल्या त्रिसामा कौशिकी मन्दाकिनी यमुना सरस्वती दृषद्गवती गोमती सरयू रोधस्वतीसप्तवती सुषोमा शतद्गृश्चन्द्रभागा मरुद्दुधा वितस्ता असिकनी विश्वेति महानद्य: ॥

१७-१८॥

एतासाम्‌--इन सबों का; अप:--जल; भारत्य:--भारतवर्ष के; प्रजा:--वासी; नामभि:--नामों से; एब--केवल;पुनन्तीनाम्‌--पवित्र बनाती हैं; आत्मना--मन; च--भी ; उपस्पृशन्ति--स्पर्श करती हैं; चन्द्र-वसा--चन्द्रवसा; ताम्र-पर्णी --ताप्र-पर्णी; अवटोदा--अवटोदा; कृत-माला--कृतमाला; वैहायसी--वैहायसी; कावेरी --कावेरी; वेणी-- वेणी; पयस्विनी--पयस्विनी; शर्करावर्ता--शर्करावर्ता ; तुड़-भद्रा--तुंगभद्रा; कृष्णा-वेण्या--कृष्णावेण्या; भीम-रथी -- भीमरथी ; गोदावरी --गोदावरी; निर्विन्ध्या--निर्विन्ध्या; पयोष्णी--पयोष्णी; तापी--तापी; रेवा--रेवा; सुरसा--सुरसा; नर्मदा--नर्मदा; चर्मण्वती --चर्मण्वती; सिन्धु:--सिन्धु; अन्ध:--अन्ध; शोण:--शोण; च--तथा; नदौ--दो नदियाँ; महा-नदी--महानदी; बेद-स्मृतिः --वेदस्मृति; ऋषि-कुल्या--ऋषिकुल्‍या; त्रि-सामा--त्रिसामा; कौशिकी -- कौशिकी ; मन्दाकिनी -- मन्दाकिनी; यमुना--यमुना;सरस्वती--सरस्वती; दृषद्वती --हृषद्गवती; गोमती-- गोमती; सरयू--सरयू; रोधस्वती--रो धस्वती; सप्तवती --सप्तवती; सुषोमा--सुषोमा; शत-द्र:--शतद्रु; चन्द्रभागा--चन्द्रभागा; मरुद्दुधा--मरूद्वृधा; वितस्ता--वितस्ता; असिक्नी-- असिक्‍नी; विश्वा--विश्वा; इति--इस प्रकार; महा-नद्य:ः--बड़ी नदियाँ |

नदियों में से दो नदियाँ--ब्रह्मपुत्र तथा शोण--नद अथवा महा नदियाँ कहलाती हैं।

अन्य प्रमुख बड़ी नदियाँ इस प्रकार हैं--चन्द्रवसा, ताप्रपर्णी, अवटोदा, कृतमाला, वैहायसी, कावेरी,वेणी, पयस्विनी, शर्करावर्ता, तुंगभद्रा, कृष्णावेण्या, भीमरथी, गोदावरी, ऋषिकुलया, त्रिसामा,कौशिकी, मन्दाकिनी, यमुना, सरस्वती, हृषद्गवती, गोमती, सरयू, रोधस्वती, सप्तवती, सुषोमा,शतद्गू, चन्द्रभागा, मरुद्रुधा, वितस्ता, असिक्नी तथा विश्वा।

भारतवर्ष के वासी इन नदियों कास्मरण करने से पवित्र रहते हैं।

कभी-कभी वे इन नदियों के नामों का मंत्रवत्‌ जाप करते हैं औरकभी-कभी जाकर इनका स्पर्श और इनमें स्नान भी करते हैं।

इस तरह भारतवर्ष के निवासीपवित्र होते रहते हैं।

असिमन्नेव वर्ष पुरुषैलब्धजन्मभि: शुक्ललोहितकृष्णवर्णन स्वारब्धेन कर्मणा दिव्यमानुषनारकगतयोबह्व्य आत्मन आनुपूर्व्येण सर्वा होव सर्वेषां विधीयन्ते यथावर्णविधानमपवर्गश्रापि भवति ॥

१९॥

अस्मिन्‌ एव वर्षे--इसी भूभाग ( भारतवर्ष ) में; पुरुषै: --पुरुषों के द्वारा; लब्ध-जन्मभि:--जन्म देने वालों के द्वारा; शुक्ल--सत्त्वगुण का; लोहित--रजोगुण का; कृष्ण--तमोगुण का; वर्णेन--वर्ण ( विभाग ) के अनुसार; स्व--स्वयं; आरब्धेन--प्रारम्भ किया हुआ; कर्मणा--कर्म के द्वारा; दिव्य--दिव्य, दैवी; मानुष--मानवीय; नारक--नारकीय; गतयः--गन्तव्य;बह्व्यः--अनेक; आत्मन:--स्वयं का; आनुपूर्व्येण--पूर्वजन्म के कर्मो के अनुसार; सर्वा:--समस्त; हि--निश्चय-पूर्वक;एव--निस्सन्देह; सर्वेषामू--सबों का; विधीयन्ते-- भाग्य में लिखा है; यथा-वर्ण-विधानम्‌--विभिन्न वर्णों के अनुसार;अपवर्ग:--मुक्ति का मार्ग; च--और; अपि-- भी; भवति--सम्भव है।

इस भूभाग में जन्म लेने वाले व्यक्ति गुणों--सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण--के अनुसारविभाजित हैं।

इनमें से कुछ अत्यन्त महान्‌ व्यक्तियों के रूप में, कुछ सामान्य व्यक्तियों के रूप मेंऔर कुछ अत्यन्त निम्न व्यक्तियों के रूप में जन्म लेते हैं, क्योंकि भारतवर्ष में मनुष्य का विगतकर्म के अनुसार जन्म होता है।

यदि प्रामाणिक गुरु के द्वारा किसी भी मनुष्य की स्थिति निश्चितकी जाये और यदि उसे चार वर्णो ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र ) तथा चार आश्रमों( ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास ) के अनुसार भगवान्‌ विष्णु की सेवा में रत होने कासही-सही प्रशिक्षण दिया जाये तो उसका जीवन सफल हो सकता है।

योउसौ भगवति सर्वभूतात्मन्यनात्म्येडनिरुक्तेडनिलयने परमात्मनि वासुदेवेनन्यनिमित्तभक्तियोगलक्षणोनानागतिनिमित्ताविद्याग्रन्थिरन्धनद्वारेण यदा हि महापुरुषपुरुषप्रसड़: ॥

२०॥

यः--जो कोई; असौ--उस; भगवति-- श्री भगवान्‌ में; सर्व-भूत-आत्मनि--समस्त जीवात्माओं के परम आत्मा; अनात्मे--लगाव रहित; अनिरुक्ते--मन तथा वाणी से परे; अनिलयने-- अन्य किसी पर आश्ित नहीं; परम-आत्मनि--परमात्मा में; वासुदेवे-- भगवान्‌ वासुदेव, वसुदेव के पुत्र; अनन्य--अद्बय; निमित्त--कारण; भक्ति-योग-लक्षण:--शुद्ध भक्ति के लक्षणोंसे युक्त; नाना-गति--विभिन्न गन्तव्यों का; निमित्त--कारण; अविद्या-ग्रन्थि--अज्ञानरूपी बन्धन; रन्धन--काटने का;द्वारेण--साधन द्वारा; यदा--जब; हि--निस्सन्देह; महा-पुरुष-- श्री भगवान्‌ का; पुरुष-- भक्त के साथ; प्रसड़:--घनिष्ठसम्बन्ध

अनेकानेक जन्मों के पश्चात्‌, मनुष्य को अपने पुण्यकर्मों के फलित होने पर शुद्ध भक्तों कीसंगति का अवसर प्राप्त होता है।

तभी उसके अज्ञानरूपी बन्धन की ग्रंथि, जो उसके नाना प्रकारके सकाम कर्मों के कारण जकडे रहती है, कट पाती है।

भक्तों की संगति करने से धीरे-धीरेऐसे भगवान्‌ वासुदेव की सेवा में मन लगने लगता है, जो दिव्य हैं, भौतिक बन्धनों से मुक्त हैं,मन एवं वाणी से परे हैं तथा परम स्वतंत्र हैं।

यही भक्तियोग अर्थात्‌ भगवान्‌ वासुदेव की भक्तिही मुक्ति का वास्तविक मार्ग है।

एतदेव हि देवा गायन्ति--अहो अमीषां किमकारि शोभनंप्रसन्न एषां स्विदुत स्वयं हरिः ।

चर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरेमुकुन्दसेवौपयिकं स्पृहा हि न: ॥

२१॥

एतत्‌--यह; एव--निस्सन्देह; हि--निश्चय ही; देवा:--सभी देवता; गायन्ति--कीर्तन करते हैं; अहो-- अरे; अमीषाम्‌--भारतवर्ष के इन वासियों का; किम्‌--क्या; अकारि--किया गया; शोभनमू--पवित्र सुन्दर कार्य; प्रसन्न: --प्रसन्न; एघामू--उनपर; स्वितू--अथवा; उत--कहा गया; स्वयम्‌--स्वयं; हरिः-- श्रीभगवान्‌; यैः--जिसके द्वारा; जन्म--जन्म; लब्धम्‌-- प्राप्तकिया; नृषु--मानव समाज में; भारत-अजिरे-- भारतवर्ष के प्रांगण में; मुकुन्द--मुक्तिदाता श्रीभगवान्‌; सेवा-औपयिकम्‌--सेवा करने का माध्यम, स्वरूप; स्पृहा--इच्छा; हि--निस्सन्देह; न:ः--हमारी |

चूँकि आत्मसाक्षात्कार के लिए मनुष्य-जीवन ही परम पद है, अतः स्वर्ग के सभी देवता इसप्रकार कहते हैं--इन मनुष्यों के लिए भारतवर्ष में जन्म लेना कितना आश्चर्यजनक है।

इन्होंने भूतकाल में अवश्य ही कोई तप किया होगा अथवा श्रीभगवान्‌ स्वयं इन पर प्रसन्न हुए होंगे।

अन्यथा वे इस प्रकार से भक्ति में संलग्न क्योंकर होते ? हम देवतागण भक्ति करने के लिएभारतवर्ष में मनुष्य जन्म धारण करने की मात्र लालसा कर सकते हैं, किन्तु ये मनुष्य पहले सेभक्ति में लगे हुए हैं।

कि दुष्करैर्न: क्रतुभिस्तपोत्रतै-दनादिभिर्वा द्युजयेन फल्गुना ।

न यत्र नारायणपादपड्डूज-स्मृति: प्रमुष्टातिशयेन्द्रियोत्सवात्‌ ॥

२२॥

किम्‌--क्या लाभ है; दुष्करैः--अत्यन्त कठिन; न:ः--हमारा; क्रतुभि:ः --यज्ञों के करने से; तपः--तप से; ब्रतैः--ब्रत से; दान-आदिभि:--दान देने आदि से; वा--अथवा; द्युजयेन--स्वर्गलोक की प्राप्ति से; फल्गुना--तुच्छ; न--नहीं; यत्र--जहाँ;नारायण-पाद-पड्डज-- भगवान्‌ नारायण के चरणकमल; स्मृति:--स्मरण; प्रमुष्ट--खोया हुआ; अतिशय--अत्यधिक; इन्द्रिय-उत्सवात्‌-भौतिक इन्द्रियतृप्ति के कारण।

देवता आगे कहते हैं--वैदिक यज्ञों के करने, तप करने, व्रत रखने तथा दान देने जैसेदुष्कर कार्यों के करने के पश्चात्‌ ही हमें स्वर्ग में निवास करने का यह पद प्राप्त हुआ है।

किन्तुहमारी इस सफलता का क्या महत्त्व है? यहाँ हम निश्चय ही भौतिक इन्द्रियतृप्ति में व्यस्त रहकरभगवान्‌ नारायण के चरणकमलों का स्मरण तक नहीं कर पाते।

अत्यधिक इन्द्रिय तृप्ति केकारण हम उनके चरणकमलों को लगभग विस्मृत ही कर चुके हैं।

कल्पायुषां स्थानजयात्पुनर्भवात्‌क्षणायुषां भारतभूजयो वरम्‌ ।

क्षणेन मर्त्येन कृतं मनस्विनःसन्न्यस्य संयान्त्यभयं पदं हरे: ॥

२३॥

कल्प-आयुषाम्‌-- जो ब्रह्म के समान कई कल्पों तक जीवित रहते हैं; स्थान-जयात्‌--स्थान अथवा लोकप्राप्ति की अपेक्षा;पुनः-भवात्‌--जन्म, मृत्यु और जरा की सम्भावना से; क्षण-आयुषाम्‌--ऐसे पुरुषों का जिनकी आयु केवल एक सौ वर्ष है;भारत-भू-जय:ः-- भारतवर्ष में जन्म; वरम्‌-- श्रेष्ठ है; क्षणेन-- क्षणिक जीवन के लिए; मर्त्येन--शरीर के द्वारा; कृतम्‌--कियाहुआ कार्य; मनस्विन:--जीवन के सार को ठीक से समझने वाले; सन्न्यस्य-- श्रीकृष्ण के चरणकमलों में आत्म-समर्पण करतेहुए; संयान्ति--प्राप्त करते हैं; अभयम्‌--चिन्तारहित; पदम्‌--धाम; हरे:ः-- श्रीभगवान्‌ का

ब्रह्मलोक में करोड़ों-अरबों वर्ष की आयु प्राप्त करने की अपेक्षा भारतवर्ष में अल्पायु प्राप्तकरना श्रेयस्कर है, क्योंकि ब्रह्मलोक को प्राप्त कर लेने के बाद भी बारम्बार जन्म तथा मरण केचक्र में पड़ना होता है।

यद्यपि मर्त्पलोक के अन्तर्गत भारतवर्ष में जीवन अत्यन्त अल्प है, किन्तुयहाँ का वासी पूर्ण कृष्णभक्ति तक पहुँच सकता है और भगवान्‌ के चरणकमलों में अर्पितहोकर इस लघु जीवन में भी परम सिद्धद्रि प्राप्त कर सकता है।

इस प्रकार उसे वैकुण्ठलोक प्राप्तहोता है जहाँ न तो चिन्ता है, न भौतिक शरीर युक्त पुनर्जन्म।

न यत्र वैकुण्ठकथासुधापगान साधवो भागवतास्तदा श्रया: ।

न यत्र यज्ञेशमखा महोत्सवाःसुरेशलोकोपि न वै स सेव्यताम्‌ ॥

२४॥

न--नहीं; यत्र--जहां; वैकुण्ठ-कथा-सुधा-आपगा: -- समस्त चिन्ताओं को दूर करने वाले श्रीवैकुण्ठ अर्थात्‌ श्रीभगवान्‌ कीअमृतमयी धारा के समान कथा; न--न तो; साधव:--भक्तजन; भागवता: -- श्रीभगवान्‌ की सेवा में निरन्तर तत्पर; ततू-आश्रया:-- श्रीभगवान्‌ की शरण में गये; न--नहीं; यत्र--जहाँ; यज्ञ-ईश-मखा:--यज्ञों के स्वामी के प्रति की गईं भक्ति; महा-उत्सवा:--जो वास्तविक उत्सव हैं; सुरेश-लोक:--स्वर्गवासियों का स्थान; अपि--यद्यपि; न--नहीं; बै--निश्चय ही; सः--उस; सेव्यताम्‌--सेवनीय |

जहाँ श्रीभगवान्‌ की कथा रूपी विशुद्ध गंगा प्रवाहित नहीं होती और जहाँ पवित्रता की ऐसीनदी के तट पर सेवा में तल्‍लीन भक्तजन नहीं रहते, अथवा श्रीभगवान्‌ को प्रसन्न करने के लिएजहाँ संकीर्तन-यज्ञ के उत्सव नहीं मनाये जाते, ऐसे स्थान में बुद्धिमान पुरुष के लिए रूचि नहींहोती।

क्योंकि ( इस युग में विशेषकर संकीर्तन-यज्ञ की संस्तुति की गई है )।

प्राप्ता नृजातिं त्विह ये च जन्तवोज्ञानक्रियाद्रव्यकलापसम्भूताम्‌ ।

नववै यतेरत्नपुनर्भवाय तेभूयो वनौका इव यान्ति बन्धनम्‌ ॥

२५॥

प्राप्ता:--जिन्होंने प्राप्त कर लिया है; नू-जातिम्‌--मनुष्य समाज में जन्म; तु--निश्चय ही; इह--इस भारत देश में; ये--वे जो;च--भी; जन्तवः--जीव; ज्ञान--ज्ञान से; क्रिया--कर्म से; द्रव्य--पदार्थों के; कलाप--समूह से; सम्भूताम्‌--पूर्ण; न--नहीं;वै--निश्चित रूप से; यतेरनू--प्रयत्त; अपुन:-भवाय-- अमर-पद के लिए; ते--ऐसे व्यक्ति; भूय:--पुनः; वनौका:--पक्षियों;इब--जैसा; यान्ति--जाते हैं; बन्धनमू--बन्धन को ।

भक्ति के लिए भारतवर्ष में उपयुक्त क्षेत्र तथा परिस्थितियाँ उपलब्ध हैं, जिस भक्ति से ज्ञानतथा कर्म के फलों से मुक्त हुआ जा सकता है।

यदि कोई भारतवर्ष में मनुष्य देह धारण करकेसंकीर्तन-यज्ञ नहीं करता तो वह उन जंगली पशुओं तथा पक्षियों की भाँति है जो मुक्त किये जानेपर भी असावधान रहते हैं और शिकारी द्वारा पुनः बन्दी बना लिए जाते हैं।

थैः श्रद्धा बर्हिषि भागशो हवि-निरुप्तमिष्टे विधिमन्त्रवस्तुत: ।

एक: पृथड्नामभिराहुतो मुदागृह्नाति पूर्ण: स्वयमाशिषां प्रभु: ॥

२६॥

यैः--जिनके द्वारा ( भारतवासी ); श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक; ब्हिंषि-- वैदिक यज्ञों के करने में; भागश:--विभाजन द्वारा; हवि:--आहुति; निरुप्तम्‌--डाली गई; इष्टमू--इच्छित श्रीविग्रह को; विधि--विधिपूर्वक; मन्त्र--मंत्रोच्चार द्वारा; बस्तुतः--समुचितवस्तुओं सहित; एक:--एक श्रीभगवान्‌; पृथक्‌-भिन्न; नामभि:--नामों से; आहुत: --पुकारा हुआ; मुदा--अत्यधिकसुखपूर्वक; गृह्वाति--स्वीकार करता है; पूर्ण:--परमेश्वर, जो स्वयं में पूर्ण है; स्वयमू--अपने आप में साक्षात्‌; आशिषाम्‌--समस्त आशीर्वादों का; प्रभुः--दाता |

भारतवर्ष में परमेश्वर द्वारा नियुक्त विभिन्न अधिकारी स्वरूप देवताओं--यथा इन्द्र, चन्द्र तथासूर्य--के अनेक उपासक हैं, जिन सभी की पृथक्‌-पृथक्‌ विधियों से पूजा की जाती हैं।

उपासक इन देवताओं को पूर्ण ब्रह्म का अंश मानते हुए अपनी आहुतियाँ अर्पण करते हैं, फलतःश्रीभगवान्‌ इन भेंटों को स्वीकार करते हैं और क्रमशः इन उपासकों की कामनाओं तथाआकांक्षाओं को पूरा करके उन्हें शुद्ध भक्ति पद तक ऊपर उठा देते हैं।

चूँकि श्रीभगवान्‌ पूर्णहैं, अतः वे उनको मनवांछित वर देते हैं, चाहे उपासक उनके दिव्य शरीर के किसी एक अंश कीपूजा क्‍यों न करते हों।

सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो नृणांनैवार्थदो यत्पुनरर्थिता यतः ।

स्वयं विधत्ते भजतामनिच्छता-मिच्छापिधानं निजपादपल्लवम्‌ ॥

२७॥

सत्यमू--सचमुच; दिशति--देता है; अर्थितम्‌--अभीष्ट पदार्थ; अर्थित: --माँगने पर; नृणाम्‌--मनुष्यों के द्वारा; न--नहीं;एव--निस्सन्देह; अर्थ-दः--वर देनेवाला; यत्‌--जो; पुन:ः--फिर; अर्थिता--वर की कामनाएँ; यतः--जिससे; स्वयम्‌--साक्षात्‌; विधत्ते-- प्रदान करता है; भजताम्‌-- भगवान्‌ की सेवा में निरत लोगों को; अनिच्छताम्‌ू--निष्काम भाव से; इच्छा-पिधानम्‌--समस्त वांछित वस्तुएँ; निज-पाद-पललवम्‌--अपने चरणकमलों पर।

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ उस भक्त की भौतिक कामनाओं की पूर्ति करते हैं, जो सकाम भावसे उनके पास जाता है, किन्तु वे भक्त को ऐसा वर नहीं देते जिससे वह अधिकाधिक वर माँगतारहे।

फिर भी, भगवान्‌ प्रसन्नतापूर्वक ऐसे भक्त को अपने चरणकमलों में शरण देते हैं, भले हीवह इसकी आकांक्षा न करे और शरणागत होने पर उसकी समस्त इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं।

यहश् रीभगवान्‌ की विशेष अनुकम्पा है।

यद्यत्र न: स्वर्गसुखावशेषितंस्विष्टस्य सूक्तस्य कृतस्य शोभनम्‌ ।

तेनाजनाभे स्मृतिमज्जन्म नः स्याद्‌वर्षे हरिर्यद्धजतां शं तनोति ॥

२८॥

यदि--यदि; अत्र--इस स्वर्गलोक में; न:ः--हमारा; स्वर्ग-सुख-अवशेषितम्‌--स्वर्गिक सुख भोगने के बाद जो कुछ भी शेषरहता है; सु-इष्टस्थ--पूर्ण यज्ञ का; सु-उक्तस्य--वैदिक साहित्य के पठन का; कृतस्य--सुकर्म का; शोभनम्‌--शेष कार्य;तेन--ऐसे कार्य से; अजनाभे--भारतवर्ष में; स्मृति-मत्‌ जन्म-- भगवान्‌ के चरणों को स्मरण करने वाला जन्म; न:--हमारा;स्थात्‌--हो; वर्षे--देश में; हरिः-- श्री भगवान्‌; यत्‌ू--जिसमें; भजताम्‌-- भक्तों का; शम्‌ तनोति--कल्याण का प्रसार करताहै।

यज्ञ, पुण्य कर्म, अनुष्ठान तथा वेदाध्ययन करते रहने के कारणस्वरूप हम स्वर्ग-लोक मेंवास कर रहे हैं, किन्तु एक दिन ऐसा आएगा जब हमारा भी अन्त हो जाएगा।

हमारी प्रार्थना हैकि उस समय तक यदि हमारे एक भी पुण्य शेष रहें तो हम मनुष्य रूप में भगवान्‌ केचरणकमलों का स्मरण करने के लिए भारतवर्ष में जन्म लें।

श्रीभगवान्‌ इतने दयालु हैं कि वे स्वयं भारतवर्ष में आते हैं और यहाँ के वासियों को सौभाग्य प्रदान करते हैं।

श्रीशुक उबाचजम्बूद्वीपस्थ च राजन्नुपद्वीपानष्टी हैक उपदिशन्ति सगरात्मजैरश्वान्वेषण इमां महीं परितोनिखनद्धिरुपकल्पितान्‌ ॥

२९ ॥

तद्यथा स्वर्णप्रस्थश्चन्द्रशुक्ल आवर्तनो रमणको मन्दरहरिण: पाञ्जजन्य:सिंहलो लड्ढलेति ॥

३०॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी बोले; जम्बूद्वीपस्थ--जम्बूद्वीप का; च--भी; राजन्‌--हे राजा; उपद्वीपान्‌ अष्टौ -- आठउपद्वीप; ह--निश्चय ही; एके--कुछेक; उपदिशन्ति--विद्वान बताते हैं; सगर-आत्म-जैः--महाराज सगर के पुत्रों द्वारा; अश्व-अन्वेषणे--खोये हुए घोड़े को ढूँढते समय; इमामू--इस; महीम्‌-- भूभाग को; परित:--चारों ओर; निखनद्धि:--खोदते हुए;उपकल्पितानू--सृष्टि की; तत्‌--उस; यथा--निम्नलिखित प्रकार से; स्वर्ण-प्रस्थ: --स्वर्ण-प्रस्थ; चन्द्र-शुक्ल:--चन्द्रशुक्ल;आवर्तन:--आवर्तन; रमणक:--रमणक; मन्दर-हरिण: --मन्दरहरिण; पा्जनजन्य: --पांचजन्य; सिंहल:--सिंहल; लड्ढा --लंका; इति--इस प्रकार।

श्रीशुकदेव गोस्वामी बोले--हे राजन, कुछ ज्ञानी पुरुषों के मत के अनुसार जम्बूढ्वीप केचारों ओर आठ छोटे-छोटे द्वीप हैं।

जब महाराज सगर के पुत्र अपने खोये हुए घोड़े की खोजसारे संसार में कर रहे थे, तो उन्होंने पृथ्वी को खोद डाला।

इस प्रकार से निकटस्थ आठ द्वीपअस्तित्व में आए।

इन द्वीपों के नाम हैं--स्वर्णप्रस्थ, चन्द्रशुक्ल, आवर्तन, रमणक, मन्दरहरिण,पांचजन्य, सिंहल तथा लंका।

एवं तब भारतोत्तम जम्बूद्वीपव्षविभागो यथोपदेशमुपवर्णित इति ॥

३१॥

एवम्‌--इस प्रकार; तब--तुमसे; भारत-उत्तम--भरत के वंशजों में श्रेष्ठ; जम्बूद्वीप-वर्ष-विभाग:--इस जम्बूद्वीप का प्रखण्ड;यथा-उपदेशम्‌-- अधिकारियों से मुझे जितना ज्ञान प्राप्त है; उपवर्णित:--मैंने व्याख्या की; इति--इस प्रकारभरत महाराज के वंशजों में श्रेष्ठ, हे राजा परीक्षित्‌, मैंने जितना ज्ञान प्राप्त किया है, उसी के अनुसार मैंने भारतवर्ष तथा उसके निकटवर्ती द्वीपों का वर्णन किया है।

ये ही जम्बूद्वीप के उपद्वीप हैं।

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