← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 5 की सूची

अध्याय बीस: ब्रह्मांड की संरचना का अध्ययन

5.20श्रीशुक उबाचअतः परं प्लक्षादीनां प्रमाणलक्षणसंस्थानतो वर्षविभाग उपवर्ण्यते ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी बोले; अतः परम्‌--इसके पश्चात्‌; प्लक्ष-आदीनाम्‌-प्लक्षद्वीप तथा अन्य द्वीप; प्रमाण-लक्षण-संस्थानतः -- आकार-प्रकार, लक्षण तथा स्थिति की दृष्टि से; वर्ष-विभाग:--ट्वीप का विभाजन; उपवर्ण्यते--वर्णनकिया जा रहा है।

महर्षि शुकदेव गोस्वामी बोले--इसके पश्चात्‌ मैं प्लक्षादि अन्य छः द्वीपों के आकार प्रकार,लक्षण तथा स्थिति का वर्णन करूँगा।

जम्बूद्वीपोयं यावत्प्रमाणविस्तारस्तावता क्षारोदधिना परिवेष्टितो यथा मेरुर्ज॑म्ब्बाख्येन लवणोदधिरपिततो द्विगुणविशालेन प्लक्षाख्येन परिक्षिप्तो यथा परिखा बाह्योपवनेन; प्लक्षो जम्बूप्रमाणो द्वीपाख्याकरोहिरण्मय उत्थितो यत्राग्निरुपास्ते सप्तजिहस्तस्याधिपति: प्रियव्रतात्मज इध्मजिह्नः स्वं द्वीपं सप्तवर्षाणिविभज्य सप्तवर्षनामभ्य आत्मजे भ्य आकलय्य स्वयमात्मयोगेनोपरराम ॥

२॥

जम्बू-द्वीप:--जम्बू नामक द्वीप, जम्बूद्यीप; अयम्‌--यह; यावत््‌-प्रमाण-विस्तार: --इसके विस्तार के तुल्य परिमाप अर्थात्‌१,००,००० योजन ( एक योजन आठ मील के तुल्य है ); तावता--इतना; क्षार-उदधिना--खारे सागर द्वारा; परिवेष्टित:--घिराहुआ; यथा--जिस प्रकार; मेरु:--सुमेरु पर्वत; जम्बू-आख्येन--जम्बू नामक द्वीप से; लवण-उदधि:--लवण-सागर; अपि--निश्चय ही; ततः--तत्पश्चात्‌; द्वि-गुण-विशालेन--दुगुना विस्तृत; प्लक्ष-आख्येन--प्लक्ष नामक द्वीप से; परिक्षिप्त:--घिराहुआ; यथा--सहृश; परिखा--खाईं; बाह्य --बाहरी; उपवनेन--उद्यानवत्‌ वन के द्वारा; प्लक्ष:--प्लक्ष ( पाकड़ ) वृक्ष; जम्बू-प्रमाण:--जम्बू वृक्ष जितना ऊँचा; द्वीप-आख्या-करः--द्वीप का नाम पड़ा; हिरण्मय:--अत्यन्त तेजमय; उत्थित:--ऊपर उठाहुआ; यत्र--जहाँ; अग्नि:ः--अग्नि; उपास्ते--स्थित है; सप्त-जिह्ः--सात ज्वालाओं वाली; तस्य--उस द्वीप का; अधिपति:--राजा अथवा स्वामी; प्रियत्रत-आत्मज:--राजा प्रियव्रत का पुत्र; इध्म-जिह्न:--इध्मजिह्न नामक; स्वम्‌--निजी; द्वीपम्‌-द्वी प;सप्त--सात; वर्षाणि-- भूभागों में; विभज्य--विभाजित होकर; सप्त-वर्ष-नामभ्य: --जिन पर सातों भूभागों के नाम रखे गये;आत्मजेभ्य:--अपने पुत्रों को; आकलय्य--भेंट, अर्पण; स्वयम्‌--स्वतः; आत्म-योगेन-- भगवान्‌ की भक्ति द्वारा; उपरराम--समस्त भौतिक कार्यो से अवकाश ग्रहण कर लिया।

जिस प्रकार सुमेरु पर्वत चारों ओर से जम्बूद्वीप द्वारा घिरा हुआ है, उसी प्रकार जम्बूद्वीप भीलवण के सागर से घिरा है।

जम्बूद्वीप की चौड़ाई १,००,००० योजन ( ८,००,००० मील ) हैऔर लवण का सागर भी इतना ही चौड़ा है।

जिस तरह कभी-कभी दुर्ग की खाई उपवन से घिरीरहती है उसी प्रकार जम्बूढ्वीप को घेरने वाला लवण-सागर भी प्लक्षद्वीप से घिरा हुआ है।

प्लक्षद्वीप की चौड़ाई लवण के सागर से दुगुनी अर्थात्‌ २,००,००० योजन (१६,००,०००मील ) है।

प्लक्षद्वीप में स्वर्ण के समान चमकीला एक वृक्ष है जो जम्बूद्वीप स्थित जम्बूवृक्ष केबराबर ऊँचा है।

इसके मूल भाग में सात ज्वालाओं वाली अग्नि है।

यह वृक्ष प्लक्ष का है, अतःइस द्वीप का नाम प्लक्षद्वीप पड़ा।

यह द्वीप महाराज प्रियत्रत के एक पुत्र इध्मजिह्न द्वारा शासितथा।

उन्होंने सातों द्वीपों के नाम अपने सात पुत्रों के नामों पर रखे और उन्हें अपने पुत्रों को देकर,सक्रिय जीवन से अवकाश प्राप्त कर वे स्वयं श्रीभगवान्‌ की सेवा में लीन रहने लगे।

शिवं यवसं सुभद्रं शान्तं क्षेमममृतमभयमिति वर्षाणि तेषु गिरयो नद्यश्च सप्तैवाभिज्ञाता:; मणिकूटोवज्कूट इन्द्रसेनो ज्योतिष्मान्सुपर्णो हिरण्यष्टीवो मेघमाल इति सेतुशैला: अरुणा नृम्णाड्रिरसी सावित्रीसुप्तभाता ऋतम्भरा सत्यम्भरा इति महानद्य:; यासां जलोपस्पर्शनविधूतरजस्तमसोहंसपतक्ेर्ध्वायनसत्याडूसंज्ञाश्चत्वारो वर्णा: सहस्त्रायुषो विबुधोपमसन्दर्शनप्रजनना: स्वर्गद्वारं त्रय्याविद्यया भगवन्तं त्रयीमयं सूर्यमात्मानं यजन्ते ॥

३-४ ॥

शिवम्‌--शिव; यवसम्‌--यवस; सुभद्रम्‌--सुभद्र; शान्तम्‌--शान्त; क्षेमम्‌-- क्षेम; अमृतम्‌-- अमृत; अभयम्‌-- अभय; इति--इस प्रकार; वर्षाणि--सातों पुत्रों के नामों के अनुसार सात वर्ष; तेषु--उनमें; गिरय: --पर्वत; नद्यः च--और नदियाँ; सप्त--सात; एव--निस्संदेह; अभिज्ञाता: --जाने जाते हैं; मणि-कूट:--मणिकूट; वज़-कूट:--वज़कूट; इन्द्र-सेन:--इन्द्सेन;ज्योतिष्मान्‌--ज्योतिष्मान्‌; सुपर्ण:--सुपर्ण ; हिरण्य-ष्ठीव: --हिरण्यष्ठीव; मेघ-माल:--मेघ-माल; इति--इस प्रकार; सेतु-शैला:--वर्षों की सीमा बनाने वाली पर्वत श्रेणियाँ; अरूणा-- अरुणा; नृम्णा--नृम्णा; आड्विरसी --आंगिरसी; सावित्री--सावित्री; सुप्त-भाता--सुप्तभाता; ऋतम्भरा--ऋतम्भरा; सत्यम्भरा--सत्यंभरा; इति--इस प्रकार; महा-नद्य:--बड़ी बड़ीनदियाँ; यासामू--जिनकी; जल-उपस्पर्शन--जल स्पर्श मात्र से; विधूत-- धुल जाते हैं; रज:-तमस:--जिनके रजो तथा तमोगुण; हंस--हंस; पतड्ग--पतंग; ऊर्ध्वायन--ऊर्ध्वायन; सत्याड्गर--सत्यांग; संज्ञा:--नाम वाले; चत्वार:--चारों; वर्णा: --जातियाँ; सहस्त्र-आयुष:--एक हजार वर्षों तक जीवित रहकर; विबुध-उपम--देवताओं के समान; सन्दर्शन--अत्यन्त सुन्दररूप होने में; प्रजनना:--तथा संतति उत्पन्न करने में; स्वर्ग-द्वारम्‌--स्वर्गलोक जाने का द्वार; त्रय्या विद्यया--वैदिक नियमों केअनुसार अनुष्ठान करके; भगवन्तम्‌-- श्री भगवान्‌; त्रयी-मयम्‌--वेदों में स्थापित; सूर्यम्‌ आत्मानम्‌--सूर्यदेव रूपी परमात्मा को;यजन्ते--पूजा करते हैं।

इन सात वर्षो के नाम उन सातों पुत्रों के अनुसार क्रमशः शिव, यवस, सुभद्र, शान्त, क्षेम,अमृत तथा अभय पड़े।

इन सात वर्षो में सात पर्वत तथा सात नदियाँ हैं।

पर्वतों के नाम हैं--मणिकूट, वज्जकूट, इन्द्रसेन, ज्योतिष्मान्‌ू, सुपर्ण, हिरण्यष्ठटीव तथा मेघमाल और नदियों के नामहैं--अरूणा, नृम्णा, आंगिरसी, सावित्री, सुप्रभाता, ऋतम्भरा तथा सत्यम्भरा।

इन नदियों केस्पर्श करने या स्नान करने से भौतिक मल तुरन्त दूर हो जाते और प्लक्षद्वीप में रहने वाली हंस,पतंग, ऊर्ध्वायन तथा सत्यांग नामक चार जातियाँ अपने को इसी प्रकार पवित्र करती हैं।

इसद्वीप के वासी एक हजार वर्ष तक जीवित रहते हैं।

वे देवताओं के समान सुन्दर हैं और उनकीसनन्‍्तानें भी उन्हीं के अनुरूप हैं।

वे वेदों में वर्णित अनुष्ठानों को पूरा करके तथा श्रीभगवान्‌ केप्रतिनिधि स्वरूप सूर्यदेव की उपासना करके सूर्यलोक को प्राप्त होते हैं, जो स्वर्गलोक ही है।

प्रत्नस्य विष्णो रूपं यत्सत्यस्यर्तस्य ब्रह्मण: ।

अमृतस्य च मृत्यो श्व सूर्यमात्मानमीमहीति ॥

५॥

प्रलतस्य-- प्राचीनतम पुरुष का; विष्णो: -- भगवान्‌ विष्णु का; रूपम्‌--रूप; यत्‌--जो; सत्यस्य--परम सत्य का; ऋतस्य-- धर्मका; ब्रह्मण:--परब्रह्म का; अमृतस्य--शुभ फल का; च--तथा; मृत्यो:--मृत्यु ( अशुभ फल ) का; च--तथा; सूर्यम्‌--सूर्यदेवता; आत्मानमू--सभी आत्माओं के मूल परमात्मा की; ईमहि--शरण की याचना करते हैं; इति--इस प्रकार।

[ इस मंत्र के द्वारा प्लक्षद्वीप के वासी परब्रह्न की उपासना करते हैं।

हम सूर्य देवता कीशरण ग्रहण करें जो परम प्रकाशित, पुराणपुरुष श्रीभगवान्‌ के प्रतिबिम्ब हैं।

विष्णु ही एकमात्रआशध्य हैं।

वही वेद हैं, वही धर्म हैं और वही शुभाशुभ फलों के स्त्रोत हैं।

प्लक्षादिषु पञ्ञसु पुरुषाणामायुरिन्द्रियमोज: सहो बल बुद्धिर्विक्रम इति च सर्वेषामौत्पत्तिकीसिद्धिरविशेषेण वर्तते ॥

६॥

प्लक्ष-आदिषु--प्लक्ष आदि द्वीपों में; पक्लसु-- पाँच; पुरुषाणाम्‌--निवासियों का; आयु:--दीर्घ जीवनकाल; इन्द्रियम्‌ू--इन्द्रियोंकी पुष्ठता; ओज:--शारीरिक बल; सह:--मनोबल; बलम्‌--शारीरिक शक्ति; बुद्धि:--बुद्धि; विक्रम:--शौर्य; इति--इसप्रकार; च-- भी; सर्वेषामू--सबों का; औत्पत्तिकी-- अंतः भूत; सिद्द्धि:ः--सिद्धि; अविशेषेण--बिना किसी भेदभाव के;वर्तते--विद्यमान है।

हे राजन, प्लक्ष आदि पाँच द्वीपों में सभी वासियों में जन्म से ही आयु, मनोबल, इन्द्रिय बल,शारीरिक बल, बुद्धि और शौर्य ( पराक्रम ) समान रूप में प्रकट रहते हैं।

प्लक्ष: स्वसमानेनेक्षुरसोदेनावृतो यथा तथा द्वीपोपि शाल्मलो द्विगुणविशाल: समानेन सुरोदेनावृतःपरिवृड्डे ॥

७॥

प्लक्ष:-प्लक्षद्वीप; स्व-समानेन--विस्तार में समान; इश्लु-रस--गन्ने के रस के; उदेन--समुद्र से; आवृत:--घिरा हुआ; यथा--जिस प्रकार; तथा--उसी प्रकार; द्वीप:-- अन्य द्वीप; अपि-- भी; शाल्मल:--शाल्मल नामक; द्वि-गुण-विशाल: --दुगुनेविस्तार का; समानेन--विस्तार में समान; सुरा-उदेन--मदिरा के सागर से; आवृत:--घिरा हुआ; परिवृड्ढे --विद्यमान है।

प्लक्षद्वीप अपने ही समान चौड़ाई वाले इश्षुरस के समुद्र से घिरा हुआ है।

इसी प्रकार उसकेआगे उससे दुगुने परिमाण वाला शाल्मलीद्वीप है (४,००,००० योजन अथवा ३२,००,०००मील चौड़ा ) जो उतने ही चौड़ाईवाले जल समूह अर्थात्‌ सुरासागर से घिरा हुआ है।

यत्र ह वै शाल्मली प्लक्षायामा यस्यां वाव किल निलयमाहुर्भगवतए्छन्दःस्तुतः पतत्त्रिरजस्य साद्वीपहूतये उपलक्ष्यते ॥

८॥

यत्र--जहाँ; ह वै--निश्चय ही; शाल्मली--शाल्मली वृक्ष; प्लक्ष-आयामा--प्लक्ष वृक्ष जितना बड़ा ( १९०० योजन चौड़ा तथा११०० योजन ऊँचा ); यस्याम्‌--जिसमें; वाव किल--निस्सन्देह; निलयम्‌--निवासस्थान; आहुः--ऐसा कहते हैं; भगवत: --सर्वशक्तिमान का; छन्दः-स्तुत:--जो वैदिक स्तुतियों द्वारा ईश्वर की उपासना करता है; पतत्त्रि-राजस्य-- भगवान्‌ विष्णु कावाहन पक्षिराज गरुड़; सा--वह वृक्ष; द्वीप-हूतये--द्वीप के नाम हेतु; उपलक्ष्यते--प्रसिद्ध है ५शाल्मलीद्वीप में शाल्मली का एक वृक्ष है, जिससे इस द्वीप का यह नाम पड़ा।

यह प्लक्षवृक्ष के बराबर चौड़ा और ऊँचा है, अर्थात्‌ १०० योजन ८०० मील चौड़ा तथा ११०० योजन८८०० मील ऊँचा है।

विद्वानों का कथन है कि यह विशाल वृक्ष पक्षियों के राजा तथा विष्णु के वाहन गरुड़ का निवासस्थान है।

यहाँ गरुड़ भगवान्‌ विष्णु की वैदिक स्तुति करता है।

तद्दूवीपाधिपति:ः प्रियव्नतात्मजो यज्ञबाहु: स्वसुते भ्य: सप्तभ्यस्तन्नामानि सप्तवर्षाणि व्यभजत्सुरोचनंसौमनस्यं रमणकं देववर्ष पारिभद्रमाप्यायनमविज्ञातमिति ॥

९॥

तत्‌-द्वीप-अधिपति:--उस द्वीप का स्वामी; प्रियत्रत-आत्मज:--महाराज प्रियव्रत का पुत्र; यज्ञ-बाहु:--यज्ञबाहु है; स्व-सुतेभ्य:--अपने पुत्रों के; सप्तभ्य:--सातों; तत्‌-नामानि--जिनके नाम उनके नामों के अनुसार; सप्त-वर्षाणि--सातों वर्षो( भूखण्डों ) को; व्यभजतू--विभाजित; सुरोचनम्‌--सुरोचन; सौमनस्यम्‌--सौमनस्य; रमणकम्‌--रमणक; देव-वर्षम्‌--देववर्ष; पारिभद्रमू--पारिभद्र; आप्यायनम्‌-- आप्यायन; अविज्ञातम्‌-- अविज्ञात; इति--इस प्रकार |

शाल्मलीद्वीप के स्वामी महाराज प्रियत्रत के पुत्र यज्ञबाहु ने इस द्वीप को सात भागों मेंविभाजित करके उन्हें अपने पुत्रों को दे दिया।

इन विभागों के नाम उनके पुत्रों के नामों पर हैं--सुरोचन, सौमनस्य, रमणक, देववर्ष, पारिभद्र, आप्यायन तथा अविज्ञात।

तेषु वर्षाद्रयो नद्यश्च॒ सप्तैवाभिज्ञाता: स्वरसः शतश्रुड़्ो वामदेवः कुन्दो मुकुन्दः पुष्पवर्ष: सहस्त्रश्नुतिरिति;अनुमति: सिनीवाली सरस्वती कुहू रजनी नन्दा राकेति ॥

१०॥

तेषु--इन भागों में; वर्ष-अद्गय: --पर्वत; नद्य:ः च--नदियाँ भी; सप्त एब--सात; अभिज्ञाता:--जाना गया; स्वरसः--स्वरस;शत-श्रृड्र:ः--शतश्रृंग; वाम-देव:--वामदेव; कुन्दः--कुन्द; मुकुन्दः--मुकुन्द; पुष्प-वर्ष: --पुष्पवर्ष ; सहस्त्र- श्रुति: --सहस्त्रश्रुति; इति--इस प्रकार; अनुमति:--अनुमति; सिनीवाली--सिनीवाली; सरस्वती--सरस्वती; कुहू--कुहू; रजनी --रजनी; नन्दा--नन्दा; राका--राका; इति--इस प्रकारइन सातों विभागों में सात पर्वत हैं, जिनके नाम स्वरस, शतश्रृंग, वामदेव, कुन्द, मुकुन्द,पुष्पवर्ष तथा सहस्त्रश्नुति हैं।

उनमें सात नदियाँ भी हैं जिनके नाम अनुमति, सिनीवाली, सरस्वती,कुहू, रजनी, नन्दा तथा राका हैं।

ये आज भी विद्यमान हैं।

तद्र्षपुरुषा: श्रुतधरवीर्यधरवसुन्धरेषन्धरसंज्ञा भगवन्तं वेदमयं सोममात्मानं वेदेन यजन्ते ॥

११॥

ततू-वर्ष-पुरुषा:--उन वर्षों के निवासी; श्रुतधर-- श्रुतधर; वीर्यधर--वीर्यधर; वसुन्धर--वसुन्धर; इषन्धर--इषन्धर; संज्ञा: --के नाम से विख्यात; भगवन्तम्‌-- श्रीभगवान्‌; वेद-मयम्‌--वैदिक ज्ञान से सुपरिचित; सोमम्‌ आत्मानम्‌--सोम नामक जीवात्माद्वारा प्रदर्शित; वेदेन--वैदिक नियमों के पालन से; यजन्ते--उपासना करते हैं।

इन द्वीपों के वासी श्रुतिधर, वीर्यधर, वसुन्धर तथा इषन्धर नामों से विख्यात हैं और वेवर्णाश्रम धर्म का कठोरता से पालन करते हुए श्रीभगवान्‌ के सोम नामक अंश की, जो साक्षात्‌अन्द्रदेव हैं, उपासना करते हैं।

स्वगोभि: पितृदेवे भ्यो विभजन्कृष्णशुक्लयो: ।

प्रजानां सर्वासां राजान्ध: सोमो न आस्त्विति ॥

१२॥

स्व-गोभि:--अपनी प्रकाशमय किरणों के विस्तार से; पितृ-देवेभ्य:-- अपने पितरों तथा देवता-गणों को; विभजन्‌--विभाजितकरके; कृष्ण-शुक्लयो: --कृष्ण तथा शुक्ल पक्षों में; प्रजानामू--निवासियों का; सर्वासाम्‌ू--सभी; राजा--राजा; अन्ध: --अन्न; सोम: --चन्द्रदेव; नः--हम पर; आस्तु--अनुकूल रहे; इति--इस प्रकार |

[ शाल्मलीद्वीप के वासी चन्द्रदेवता की आराधना निम्नलिखित शब्दों से करते हैं।

पितरोंतथा देवताओं को अन्न देने के उद्देश्य से चन्द्रदेव ने अपने ही किरणों से मास को शुक्ल तथाकृष्ण नामक दो पक्षों में विभाजित किया है।

चन्द्र देवता काल का विभाजन करने वाला औरब्रह्माण्ड के वासियों का अधिपति है।

अत: हम यह प्रार्थना करते हैं कि वह हमारा अधिपति तथापथप्रदर्शक बना रहे।

हम उसे सादर नमस्कार करते हैं।

एवं सुरोदाद्वहिस्तद्द्‌वगुण: समानेनावृतो घृतोदेन यथापूर्व: कुशद्वीपो यस्मिन्कुशस्तम्बोदेवकृतस्तद्द्वीपाख्याकरो ज्वलन इवापर: स्वशष्परोचिषा दिशो विराजयति ॥

१३॥

एवम्‌--इस प्रकार; सुरोदात्‌ू--सुरासागर से; बहिः--बाहर; तत्‌ू-द्वि-गुण:--उसका दुगुना; समानेन--चौड़ाई में समान;आवृतः--घिरा हुआ; घृत-उदेन--घृत सागर के द्वारा; यथा-पूर्व:--शाल्मलीद्वीप के ही समान; कुश-द्वीप--कुशद्वी प;यस्मिन्‌--जिसमें; कुश-स्तम्बः--कुश नामक घास; देव-कृत:-- श्रीभगवान्‌ की परमेच्छा से उत्पन्न; तत्‌-द्वीप-आख्या-करः --द्वीप का नामकरण करके; ज्वलन:ः--अग्नि; इब--सहृश; अपर: -- अन्य; स्व-शष्प-रोचिषा-- अंकुरित दूब के ऐश्वर्य से;दिशः--समस्त दिशाएँ; विराजयति-- प्रकाशित करता है।

सुरासागर के बाहर कुशद्वीप नामक एक अन्य द्वीप है जो सुरासागर से दूना अर्थात्‌८,००,००० योजन ( ६४,००,००० मील ) चौड़ा है।

जिस प्रकार शाल्मली द्वीप सुरासागर सेघिरा है उसी प्रकार कुशद्वीप अपने तुल्य विस्तार वाले घृतसागर से घिरा है।

इस द्वीप में कुशघासके पौधे पाये जाते हैं, इसीलिए द्वीप का यह नाम पड़ा है।

यह कुशघास परमेश्वर की इच्छा केअनुसार देवताओं द्वारा उत्पन्न की गई थी और द्वितीय अग्नि जैसी दृष्टिगोचर होती है, किन्तुइसकी ज्वालाएँ अत्यन्त मृदु तथा मनोहर हैं।

इसके नव-अंकुर ( शिखर ) समस्त दिशाओं कोप्रकाशित करते हैं।

तद्दवीपपति: प्रैयत्रतो राजन्हिरण्यरेता नाम स्वं द्वीपं सप्तभ्यः स्वपुत्रेभ्यो यथाभागं विभज्य स्वयं तपआतिष्ठत वसुवसुदानह॒ढरुचिनाभिगुप्तस्तुत्यत्रतविविक्तवामदेवनाम भ्य: ॥

१४॥

तत्-द्वीप-पति:--उस द्वीप का स्वामी; प्रैयत्रत:ः--महाराज प्रियव्रत का पुत्र; राजन्‌ू--हे राजा; हिरण्यरेता--हिरण्यरेता; नाम--नामक; स्वम्‌--उसका अपना; द्वीपम्‌-द्वीप; सप्तभ्य: --सातों; स्व-पुत्रे भ्यः --अपने पुत्रों को; यथा-भागम्‌--हिस्से केअनुसार; विभज्य--विभाजित करके; स्वयम्‌--स्वयं; तप: आतिष्ठत--तप में लग गया; वसु--वसु को; वसुदान--वसुदान;हृढरुचि--हृढ़रूचि; नाभि-गुप्त--नाभिगुप्त; स्तुत्य-ब्रत--स्तुत्यत्रत; विविक्त--विविक्त; वाम-देव--वामदेव; नामभ्य: --नामक

हे राजन, महाराज प्रियत्रत के दूसरे पुत्र हिरण्यरेता इस द्वीप के राजा थे।

उन्होंने इसके सातविभाग किये और उसके एक-एक विभाग को उत्तराधिकारी के अनुसार अपने सातों पुत्रों बसु,वसुदान, हढ़रुचि, नाभिगुप्त, स्तुत्यत्रत, विविक्त और वामदेव को दे दिये।

राजा स्वयं गृहस्थजीवन से विरक्त होकर तप करने लगे।

तेषां वर्षेषु सीमागिरयो नद्यश्चाभिज्ञाता: सप्त सप्तैव चक्रश्चतुः श्रृड़अः कपिलश्ित्रकूटो देवानीक ऊर्ध्वरोमाद्रविण इति रसकुल्या मधुकुल्या मित्रविन्दा श्रुतविन्दा देवगर्भा घृतच्युता मन्त्रमालेति, ॥

१५॥

तेषाम्‌ू--उन पुत्रों के; वर्षेषु-- भूभागों ( वर्षों ) में; सीमा-गिरय:ः --सीमान्त पर्वत; नद्यः च-- और नदियाँ भी; अभिन्ञाता:--ज्ञात; सप्त--सात; सप्त--सात; एव--निश्चय ही; चक्र:--चक्र; चतुः-श्रूड़:ः --चतु: श्रृंग; कपिल:--कपिल ; चित्र-कूट:--चित्रकूट; देवानीक: --देवानीक; ऊर्ध्व-रोमा--ऊर्ध्वरोमा; द्रविण: --द्रविण; इति--इस प्रकार; रस-कुल्या--रमकुल्या; मधु-कुल्या--मधुकुल्या; मित्र-विन्दा--मित्रविन्दा; श्रुत-विन्दा-- श्रुतविन्दा; देव-गर्भा--देवगर्भा; घृत-च्युता--घृतच्युता; मन्त्र-माला--मंत्रमाला; इति--इस प्रकार।

इन सातों द्वीपों में सात सीमान्त पर्वत हैं, जिनके नाम चक्र, चतु:श्रृंग, कपिल, चित्रकूट,देवानीक, ऊर्ध्वरोमा तथा द्रविण हैं।

इसी प्रकार सात नदियाँ हैं जिनके नाम रमकुल्या,मधुकुल्या, मित्रविन्दा, श्रुतविन्दा, देवगर्भा, घृतच्युता तथा मंत्रमाला हैं।

यासां पयोभि: कुशद्वीपौकसः कुशलकोविदाभियुक्तकुलकसंज्ञा भगवन्तं जातवेदसरूपिणंकर्मकौशलेन यजन्ते ॥

१६॥

यासाम्‌--जिनके; पयोभि:--जल से; कुश-द्वीप-ओकसः--कुशद्वीप के वासी; कुशल--कुशल; कोविद--कोविद;अभियुक्त--अभियुक्त; कुलक--कुलक; संज्ञा:--नामक; भगवन्तम्‌-- श्रीभगवान्‌ को; जातवेद--अग्नि देवता; स-रूपिणम्‌--स्वरूप को प्रकट करके; कर्म-कौशलेन--अनुष्ठानों में कुशलता के कारण; यजन्ते--आराधना करते हैं।

कुशद्वीप के वासी कुशल, कोविद, अभियुक्त तथा कुलक नामों से विख्यात हैं।

वे क्रमशःब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रों के सहश हैं।

उक्त नदियों के जल में स्नान करके ये सभी वासीपवित्र होते हैं।

वे वैदिक शास्त्रों के अनुसार अनुष्ठानों को सम्पन्न करने में कुशल हैं।

इस प्रकारवे अग्नि देवता के रूप में भगवान्‌ की उपासना करते हैं।

परस्य ब्रह्मण: साक्षाज्ञातवेदोसि हव्यवाट्‌ ।

देवानां पुरुषाड़ानां यज्ञेन पुरुष यजेति ॥

१७॥

'परस्य--परमेश्वर की; ब्रह्मण:--ब्रह्म का; साक्षात्‌--प्रकट रूप में, साक्षात्‌: जात-वेदः --हे अग्निदेव; असि-- आप हैं;हव्यवाट्‌--अन्न तथा घृत की आहुति के वाहक; देवानाम्‌--समस्त देवताओं के; पुरुष-अड्जानामू--जो परम पुरुष के अंग हैं;यज्ञेन--यज्ञों के द्वारा; पुरुषम्‌--परम्‌ पुरुष को; यज--यज्ञ करो; इति--इस प्रकार।

[ यह वह मंत्र है, जिसके द्वारा कुशट्वीप के वासी अग्निदेव की पूजा करते हैं।

हे अग्निदेव,आप श्रीभगवान्‌ हरि के अंश रूप हैं और उन तक समस्त हवियों को पहुँचाते हैं।

अतः हमआपसे प्रार्थना करते कि हम देवताओं को जो भी यज्ञ-सामग्री अर्पण कर रहे हैं, उसे आप पूर्णपुरुषोत्तम भगवान्‌ को अर्पित करें, क्योंकि परमेश्वर ही असली भोक्ता हैं।

तथा घृतोदाद्वहिः क्रौ्जद्वीपो द्विगुणः स्वमानेन क्षीरोदेन परित उपक्रिप्तो वृतो यथा कुशद्वीपो घृतोदेनयस्मिन्क्रौद्चो नाम पर्वतराजो द्वीपनामनिर्वर्तक आस्ते ॥

१८ ॥

तथा--और उसी प्रकार; घृत-उदात्‌--घृत सागर से; बहि:--बाहर, परे; क्रौद्ञ-द्वीप:--क्रौंच द्वीप नामक अन्य द्वीप; द्वि-गुण:--दुगुना बड़ा; स्व-मानेन--समान विस्तार का; क्षीर-उदेन--दुग्ध सगार से; परित:--चारों ओर; उपक्लुप्त:--घिरा हुआ;बृतः--घिरा; यथा--सदृश; कुश-द्वीप:--कुशद्वीप; घृत-उदेन--घृत सागर से; यस्मिन्‌--जिसमें; क्रौज्ञ: नाम--क्रौंच नामक;पर्वत-राज:--पर्वतों का राजा; द्वीप-नाम--द्वीप का नाम; निर्वर्तक:--लिया जाता है; आस्ते--विद्यमान है।

घृतसागर के बाहर क्रौंचद्वीप नाम का एक अन्य द्वीप है, जिसकी चौड़ाई घृतसागर से दुगुनीअर्थात्‌ १६,००, ००० योजन ( १२९,८००,००० मील ) है।

जिस प्रकार कुशद्वीप घृतसागर से घिराहुआ है उसी प्रकार क्रौंचद्वीप अपने ही समान चौड़ाई वाले दुग्ध-सागर ( क्षीरसागर ) से घिराहुआ है।

क्रौंचद्वीप में क्रॉंच नामक एक विशाल पर्वत है, जिसके कारण इस द्वीप का यह नामपड़ा।

योउसौ गुहप्रहरणोन्मधितनितम्बकुझ्जोपि क्षीरोदेनासिच्यमानो भगवता वरुणेनाभिगुप्तो विभयोबभूव ॥

१९॥

यः--जो; असौ--वह ( पर्वत ); गुह-प्रहरण-- भगवान्‌ शिव के पुत्र कार्तिकेय के प्रहार द्वारा; उन्मधित--मथा हुआ; नितम्ब-कुझ्ः--ढालों पर के वृक्ष तथा वनस्पतियाँ; अपि--यद्यपि; क्षीर-उदेन-- क्षीर सागर से; आसिच्यमान:--सदैव सिंचित होकर;भगवता--सर्वशक्तिमान द्वारा; वरुणेन--वरुण नाम देवता के द्वारा; अभिगुप्त:--सुरक्षित; विभय: बभूव--निर्भय हो गया है।

यद्यपि कार्त्तिक्ये के शस्त्र प्रहार से क्रौंच पर्वत के ढालों की वनस्पतियाँ विनष्ट हो गई थीं,किन्तु चारों ओर से क्षीरसागर द्वारा सदा सिंचित होने एवं वरुण देव के द्वारा संरक्षित होने से यहपर्वत पुनः निर्भीक हो गया है।

तस्मिन्नपि प्रैयत्नतो घृतपृष्ठो नामाधिपति:ः स्वे द्वीपे वर्षाणि सप्त विभज्य तेषु पुत्रनामसु सप्तरिक्थादान्वर्षपान्निवेश्य स्वयं भगवान्भगवत: परमकल्याणयशस आत्मभूतस्यहरेश्वरणारविन्दमुपजगाम ॥

२०॥

तस्मिनू--उस द्वीप में; अपि-- भी; प्रैयत्रतः--महाराज प्रियब्रत का पुत्र; घृत-पृष्ठः --घृतपृष्ठ; नाम--नामक; अधिपति:--स्वामी,राजा; स्वे-- अपने; द्वीपे--द्वीप में; वर्षाणि-- भूभाग; सप्त--सात; विभज्य--विभाजित करके; तेषु--उनमें से प्रत्येक में; पुत्र-नामसु--अपने पुत्रों के नाम वाले; सप्त--सात; रिक्था-दान्‌--पुत्र; वर्ष-पान्‌--वर्षो के स्वामी; निवेश्य--नियुक्त करके;स्वयम्‌--स्वयं; भगवान्‌--अत्यन्त शक्तिमान; भगवतः-- श्री भगवान्‌ का; परम-कल्याण-यशसः -- जिसका यश परमकल्याणकारी है; आत्म-भूतस्य-- समस्त आत्माओं की आत्मा; हरे: चरण-अरविन्दम्‌--हरि के चरणकमल में; उपजगाम--शरण ली

इस द्वीप के अधिपति महाराज प्रियत्रत के अन्य पुत्र थे जिनका नाम घृतपृष्ठ था और जोअत्यन्त विद्वान थे।

उन्होंने भी अपने देश को सात भागों में विभाजित करके उनके नाम अपनेसातों पुत्रों के नामों के अनुसार रखे और स्वयं गृहस्थ जीवन से विरक्त होकर परमकल्याणकारी, समस्त आत्माओं की आत्मा श्रीभगवान्‌ के पदारविन्दों में शरण ली।

इस प्रकारवे सिद्धि को प्राप्त हुए।

आमो मधुरुहो मेघपृष्ठ: सुधामा भ्राजिष्ठो लोहितार्णों वनस्पतिरिति घृतपृष्ठसुतास्तेषां वर्षगिरय: सप्तसप्तैव नद्यश्चाभिख्याता: शुक्लो वर्धभानो भोजन उपबर्हिणो नन्दो नन्दन: सर्वतोभद्र इति अभयाअमृतौघा आर्यका तीर्थवती रूपवती पवित्रवती शुक्लेति ॥

२१॥

आमः--आम; मधु-रूहः --मधुरुह; मेघ-पृष्ठ:--मेघपृष्ठ; सुधामा--सुधामा; भ्राजिष्ठ:-- भ्राजिष्ठ; लोहितार्ण:--लोहितार्ण ;वनस्पति: --वनस्पति; इति--इस प्रकार; घृतपृष्ठ-सुता:--घृतपृष्ठ के पुत्र; तेषाम्‌--इन पुत्रों के; वर्ष-गिरयः--देश की सीमाविभाजन करने वाले पर्वत; सप्त--सात; सप्त--सात; एव-- भी; नद्य:ः--नदियाँ; च--तथा; अभिख्याता: --सुप्रसिद्ध; शुक्ल:वर्धमान:--शुक्ल तथा वर्धमान; भोजन: -- भोजन; उपबर्हिण: --उपबर्हिण; नन्द: --नन्द; नन्दन: --नदंन; सर्वतः -भद्ग:--सर्वतोभद्र; इति--इस प्रकार; अभया--अभया; अमृतौघा-- अमृतौघा; आर्यका--आर्यका; तीर्थवती--तीर्थवती ; रूपवती --रूपवती; पवित्रवती--पवित्र-वती; शुक्ला--शुक्ला; इति--इस प्रकार

महाराज घृतपृष्ठ के पुत्रों के नाम आम, मधुरुह, मेघपृष्ठ, सुधामा, भ्राजिष्ठ, लोहितार्ण तथावनस्पति थे।

उनके द्वीप में सात पर्वत थे, जो सात देशों की सीमाओं को सूचित करने वाले थेऔर सात नदियाँ भी थीं।

पर्वतों के नाम हैं-शुक्ल, वर्धभान, भोजन, उपबर्हिण, नन्द, नन्दन तथासर्वतोभद्र।

नदियों के नाम अभया, अमृतौघा, आर्यका, तीर्थवती, रूपवती, पवित्रवती तथाशुक्ला हैं।

यासामम्भ: पवित्रममलमुपयुज्जाना: पुरुषऋषभद्रविणदेवकसंज्ञा वर्षपुरुषा आपोमयं देवमपांपूर्णेनाज्ललिना यजन्ते ॥

२२॥

यासाम्‌--सभी नदियों का; अम्भ:--जल; पवित्रमू--अत्यन्त पावन; अमलम्‌--अत्यन्त निर्मल; उपयुज्ञाना:--उपयोग करतेहुए; पुरुष-- पुरुष; ऋषभ--ऋषभ; द्रविण--द्रविण; देवक--देवक; संज्ञा:--नामों वाले; वर्ष-पुरुषा:--उन वर्षों के निवासी;आपः-मयम्‌--जल के स्वामी वरुण को; देवम्‌--उपास्य श्रीविग्रह के रूप में; अपाम्‌--जल को; पूर्णेन--पूर्ण; अज्ञलिना--अंजुली से; यजन्ते--आराधना करते हैं।

क्रौंच द्वीप के निवासी चार वर्णों में विभाजित हैं--पुरुष, ऋषभ, द्रविण तथा देवक।

वेजल के स्वामी वरुण जिन का रूप जल के समान है के चरणारविन्दों पर इन पवित्र नदियों कीजलांजलि अर्पित करके श्रीभगवान्‌ की पूजा करते हैं।

आप: पुरुषवीर्या: स्थ पुनन्‍्तीर्भू्भुवःसुवः ।

ता नः पुनीतामीवध्नी: स्पृशतामात्मना भुव इति ॥

२३॥

आप: --हे जल; पुरुष-वीर्या:-- श्री भगवान्‌ की शक्ति से युक्त; स्थ--आप हैं; पुनन्ती:--पवित्र करने वाले; भू: -- भूव: नामकलोक; भुवः-- भूव: नामक लोक; सुवः--स्वःलोक; ताः--वह जल; नः--हम सबको; पुनीत--पवित्र करता है; अमीव-घ्नी:--पापों का नाश करने वाला; स्पृशताम्‌--स्पर्श करने वालों के; आत्मना--अपने स्वाभाविक पद के कारण; भुवः--देह;इति--इस प्रकार।

[ क्रौंच द्वीप के निवासी इस मंत्र से उपासना करते हैं हे नदियों के जल, आपकोश्रीभगवान्‌ से शक्ति प्राप्त है।

अत: आप भूलोक, भुवर्लोक तथा स्वलोक को पवित्र करते हैं।

अपने स्वाभाविक पद के कारण आप पापों को ग्रहण करते हैं, इसलिए हम आपका स्पर्श करतेहैं।

आप हमें पवित्र करते रहें।

एवं पुरस्तात्क्षीरोदात्परित उपवेशित: शाकद्दीपो द्वात्रिंशल्लक्षयोजनायाम: समानेन च दधिमण्डोदेनपरीतो यस्मिन्शाको नाम महीरुहः स्वक्षेत्रव्ययदेशको यस्य ह महासुरभिगन्धस्तं द्वीपमनुवासयति ॥

२४॥

एवम्‌---इस प्रकार; पुरस्तात्‌ू--परे; क्षीर-उदात्‌-- क्षीर सागर से; परित:--चारों ओर; उपवेशित:--स्थित; शाक-द्वीप: --शाकद्ठवीप नामक अन्य द्वीप; द्वा-त्रिंशत्‌--बत्तीस; लक्ष--लाख; योजन--योजन; आयाम: --जिसकी माप; समानेन--समानलम्बाई वाला; च--और; दधि-मण्ड-उदेन--मट्टे के समान जल वाले समुद्र द्वारा; परीत:--आवबृत; यस्मिन्‌--जिसमें; शाक: --शाक; नाम--नामक; महीरुह:--अंजीर का वृशक्ष; स्व-क्षेत्र-व्यपदेशक: --जिससे द्वीप का यह नाम पड़ा; यस्य--जिसका;ह--निस्सन्देह; महा-सुरभि-- अत्यधिक भीनी; गन्ध: --सुगन्ध; तम्‌ द्वीपम्‌--उस द्वीप को; अनुवासयति--महकाती रहती है।

क्षीर समुद्र से बाहर शाकद्ठवीप है, जिसकी चौड़ाई ३२,००,००० योजन ( २,५६,००,०००मील ) है।

जिस प्रकार क्रौंचद्वीप अपने ही क्षीरसागर से घिरा है उसी प्रकार शाकद्ठीप अपने हीसमान चौड़ाई वाले मट्टठे के समुद्र से घिरा है।

शाकद्ठीप में एक विशाल शाक वृक्ष है, जिससे इसद्वीप का यह नाम पड़ा।

यह वृक्ष अत्यन्त सुगन्धित है।

इससे सारा द्वीप महकता रहता है।

तस्यापि प्रैयत्रत एवाधिपतिर्नाम्ना मेधातिथि: सोपि विभज्य सप्त वर्षाणि पुत्रनामानि तेषुस्वात्मजान्पुरोजवमनोजवपवमानधूप्रानीकचित्ररेफबहुरूपविश्वधारसंज्ञान्निधाप्याधिपतीन्स्वयं भगवत्यनन्तआवेशितमतिस्तपोवनं प्रविवेश ॥

२५॥

तस्य अपि--इस द्वीप का भी; प्रैयत्रतः--महाराज प्रियत्रत का पुत्र; एबव--निश्चय ही; अधिपति:--राजा; नाम्ता--नामक; मेधा-तिथि: --मेधातिधि; सः अपि--वह भी; विभज्य--विभाजित करके; सप्त वर्षाणि--द्वीप के सात विभाग; पुत्र-नामानि--पुत्रोंके नाम; तेषु-- उनमें; स्व-आत्मजान्‌--अपने पुत्रों; पुरोजव--पुरोजव; मनोजव--मनोजव; पवमान--पवमान; धूप्रानीक--धूप्रानीक; चित्र-रेफ--चित्ररेफ; बहु-रूप--बहुरूप; विश्वधार--विश्वधार; संज्ञान्‌ू--नाम वाले; निधाप्य--प्रतिष्ठित करके;अधिपतीन्‌--शासक, राजा; स्वयम्‌--स्वयं; भगवति-- श्री भगवान्‌ में; अनन्ते--अनन्त रूप में; आवेशित-मति:-- ध्यानमग्न;तपः-वनमू्‌--तपोवन में; प्रविवेश--प्रवेश किया।

इस द्वीप के स्वामी प्रियत्रत के ही पुत्र मेधातिथि थे।

उन्होंने भी अपने द्वीप को सात भागों मेंविभाजित करके उनका नाम अपने पुत्रों के नाम पर रखा और उन्हें उन द्वीपों का राजा बनादिया।

उनके इन पुत्रों के नाम हैं--पुरोजव, मनोजव, पवमान, धूम्रानीक, चित्ररेफ, बहुरूप तथाविश्वधार।

इस द्वीप को विभाजित करके अपने पुत्रों को उनका राजा बनाकर मेधापति स्वयंविरक्त हो गये और उन्होंने अपने मन को श्रीभगवान्‌ के चरणारविन्दों में लगाने के उद्देश्य सेध्यान-योग्य एक तपोवन में प्रवेश किया।

एतेषां वर्षमर्यादागिरयो नद्यश्न सप्त सप्तैव ईशान उरुश्रुड्'ो बलभद्र: शतकेसरः सहस्त्रसत्रोतो देवपालोमहानस इति अनघायुर्दा उभयस्पृष्टिरपराजिता पञ्ञपदी सहस्त्रस्त्रुतिर्निजधृतिरिति ॥

२६॥

एतेषाम्‌--इन समस्त विभागों की; वर्ष-मर्यादा--सीमा रेखा के रूप में; गिरयः--बड़ी बड़ी पहाड़ियाँ; नद्यः च--तथा नदियाँभी; सप्त--सात; एव--निस्सन्देह; ईशान: --ईशान; उरु श्रृड्र:--उरुश्वृंग; बल-भद्ग: --बलभद्र; शत-केसर: --शतकेसर;सहस्त्र-सत्रोत:--सहस्त्रस्नोत; देव-पाल:--देवपाल; महानस: --महानस; इति--इस प्रकार; अनघा--अनघा; आयुर्दा--आयुर्दा;उभयस्पृष्टि:--उभयस्पृष्टि; अपराजिता--अपराजिता; पञ्ञपदी--पंचपदी; सहस्त्र-स्त्रुतिः--सहस्त्र-स्त्रुति; निज-धृति:--निजधूति;इति--इस प्रकार।

इन द्वीपों में भी सात मर्यादा पर्वत तथा सात ही नदियाँ हैं।

पर्वतों के नाम ईशान, उरुश्रृंग,बलभद्र, शतकेशर, सहस्त्र-स्त्रोन, देवपाल तथा महानस हैं तथा नदियाँ अनघा, आयुर्दा,उभयस्पृष्टि, अपराजिता, पंचपदी, सहस्त्रस्त्रुति तथा निजधृति हैं।

तद्वर्षपुरुषा ऋतत्रतसत्यब्रतदानक्रतानुत्रतनामानो भगवतन्तं वाय्वात्मकं प्राणायामविधूतरजस्तमसः'परमसमाधिना यजन्ते ॥

२७॥

ततू-वर्ष-पुरुषा:--उस वर्ष के निवासी; ऋत-ब्रत--ऋतत्रत; सत्य-ब्रत--सत्यब्रत; दान-ब्रत--दानब्रत; अनुब्रत-- अनुब्रत;नामान:--इन ( चार ) नाम वाले; भगवन्तम्‌-- श्रीभगवान्‌; वायु-आत्मकम्‌--वायु देवता के रूप में ; प्राणायाम --प्राणायामद्वारा; विधूत--निर्मल बनाया; रज:-तमसः --रजोगुण तथा तमोगुण; परम समाधिना-- परम समाधि द्वारा; यजन्ते--उपासनाकरते हैं।

उन द्वीपों के वासी भी ऋतत्रत, सत्यव्रत, दानब्रत तथा अनुव्रत--इन चार वर्णों में विभक्तहैं, जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के समान हैं।

वे प्राणायाम तथा योग साधते हैं औरसमाधि द्वारा वायु रूप में परमेश्वर भगवान्‌ की उपासना करते हैं।

अन्तःप्रविश्य भूतानि यो बिभर्त्यात्मकेतुभि: ।

अन्तर्यामी श्वरः साक्षात्पातु नो यद्वशे स्फुटम्‌ ॥

२८ ॥

अन्तः-प्रविश्य--अन्तःकरण में प्रवेश करके; भूतानि--समस्त प्राणियों का; यः--जो; बिभर्ति-- पालन करता है; आत्म-केतुभि:--अन्तः वायु की क्रियाओं ( प्राण, अपान इत्यदि ) द्वारा ); अन्तर्यामी--अन्तस्थ परमात्मा; ई श्वरः -- परमेश्वर;साक्षात्‌--साक्षात्‌; पातु--पालन करे; न:ः--हमारा; यत्‌-वशे--जिसके वश में; स्फुटमू--विराट जगत[

शाकद्वीप के निवासी वायु रूप में श्रीभगवान्‌ की उपासना निम्नलिखित शब्दों से करतेहैं हे परम पुरुष, देह के भीतर परमात्मा रूप में स्थित आप विभिन्न वायुओं यथा प्राण कीविभिन्न क्रियाओं का संचालन करने वाले तथा समस्त जीवात्माओं का पालन करने वाले हैं।

हे ईश्वर, हे परमात्मा, हे विराट जगत के नियामक, आप सभी प्रकार के संकटों से हमारी रक्षा करें।

एवमेव दधिमण्डोदात्परत: पुष्करद्वीपस्ततो द्विगुणायाम: समन्तत उपकल्पितः समानेन स्वादूदकेनसमुद्रेण बहिरावृतो यस्मिन्बृहत्पुष्करं ज्जलनशिखामलकनकपपत्रायुतायुतं भगवतः कमलासनस्याध्यासनंपरिकल्पितम्‌, ॥

२९॥

एवम्‌ एव--इस प्रकार; दधि-मण्ड-उदातू--मट्टे के सागर से; परत:--परे; पुष्कर-द्वीप: --पुष्कर द्वीप नामक अन्य द्वीप;ततः--उस ( शाकद्दवीप ) की अपेक्षा; द्वि-गुण-आयाम:--जिसका विस्तार दुगुना है; समन्ततः--चारों दिशाओं में;उपकल्पित:--घिरा हुआ; समानेन--समान विस्तार वाला; स्वादु-उदकेन--मधुर जल वाले; समुद्रेण--समुद्र से; बहि:--बाहरसे; आवृतः--घिरा हुआ; यस्मिन्‌ू--जिसमें; बृहत्‌--विशाल; पुष्करम्‌--कमल पुष्प; ज्वलन-शिखा--प्रज्वलित अग्नि कीज्वालाओं सहश; अमल--निर्मल; कनक--स्वर्ण; पत्र--पत्तियाँ; अयुत-अयुतम्‌--लाखों अथवा दस करोड़; भगवत:--अत्यन्त शक्तिमान; कमल आसनस्य--ब्रह्म का, जिनका आसन कमल है; अध्यासनम्‌-- आसन; परिकल्पितम्‌--माना जाताहैदथधि के समुद्र से बाहर पुष्कर नाम का एक अन्य द्वीप है जो इस समुद्र से दुगनी चौड़ाईवाला अर्थात्‌ ६४,००,००० योजन (५,२२,००,००० मील ) है।

यह द्वीप अपने ही समानचौड़ाई वाले मधुर जल के सागर से घिरा हुआ है।

पुष्कर द्वीप में अग्नि की ज्वालाओं के समानदेदीप्यमान दस करोड़ स्वर्णिम पंखुड़ियों वाला विशाल कमल का पुष्प है, जो सर्वशक्तिमानतथा इसी कारण कभी कभी भगवान्‌ कहलाने वाले ब्रह्म का आसन माना जाता है।

तद्दवीपमध्ये मानसोत्तरनामैक एवार्वाचीनपराचीनवर्षयोर्मर्यादाचलोयुतयोजनोच्छायायामो यत्र तुचतसूषु दिक्षु चत्वारि पुराणि लोकपालानामिन्द्रादीनां यदुपरिष्टात्सूर्यरथस्य मेरुं परिभ्रमतः संवत्सरात्मक॑चक्र देवानामहोरात्रा भ्यां परिभ्रमति ॥

३०॥

ततू-द्वीप-मध्ये--उस द्वीप के मध्य में; मानसोत्तर--मानसोत्तर; नाम--नामक; एक:--एक; एव--निस्सन्देह; अर्वाचीन--इसओर; पराचीन--उस ओर; वर्षयो: --वर्षो ( भूभागों ) के; मर्यादा--सीमा सूचक; अचल: --पर्वत; अयुत--दस हजार;योजन--आठ मील तुल्य दूरी; उच्छाय-आयाम:--जिसकी ऊँचाई तथा चौड़ाई; यत्र--जहाँ; तु--लेकिन; चतसूषु--चारों;दिक्षु--दिशाओं में; चत्वारि--चार; पुराणि--नगर; लोक-पालानाम्‌--लोकों के पालकों का; इन्द्र-आदीनाम्‌--इंद्र आदि;यत्‌--जिसका; उपरिष्टात्‌--ऊपर; सूर्य-रथस्य--सूर्य देव के रथ का; मेरुम्‌--मेरु पर्वत; परिभ्रमत:ः--परिक्रमा करते हुए;संवत्सर-आत्मकम्‌--एक संवत्सर वाला; चक्रम्‌-चक्र ; देवानाम्‌ू--देवताओं का; अहः-रात्राभ्यामू-दिन तथा रात्रि से;परिभ्रमति--चक्कर लगाता है।

उस द्वीप के बीचोंबीच, भीतरी तथा बाहरी ओर की सीमा बनाने वाला मानसोत्तर नाम काएक पर्वत है।

यह दस हजार योजन ( ८०,००० मील ) ऊँचा और इतना ही चौड़ा है इसके ऊपरचारों दिशाओं में इन्द्रादि लोकपालों की पुरियाँ हैं।

सूर्यदेव अपने रथ में आरूढ़ होकर इस पर्वतके ऊपर संवस्तर नामक परिधि में, जो मेरु पर्वत का चक्कर लगाती है, यात्रा करते हैं।

उत्तर दिशामें सूर्य का पथ उत्तरायण और दक्षिण दिशा में दक्षिणायन कहलाता है।

देवताओं के लिए एकदिशा में दिन होता है, तो दूसरी में रात्रि।

तद्दवीपस्याप्यधिपति:ः प्रैयत्रतो वीतिहोत्रो नामैतस्थात्मजौ रमणकधातकिनामानौ वर्षपती नियुज्य सस्वयं पूर्वजवद्धगवत्कर्मशील एवास्ते ॥

३१॥

तत्-द्वीपस्थ--उस द्वीप का; अपि-- भी; अधिपति: --राजा; प्रैयत्रतः--महाराज प्रियत्रत का पुत्र; बीतिहोत्र: नाम--वीतिहोत्रनामक; एतस्य--उसके; आत्म-जौ--अपने दो पुत्रों को; रमणक--रमणक; धातकि--तथा धातकि; नामानौ--नाम वाले;वर्ष-पती--दोनों वर्षो के स्वामी; नियुज्य--नियुक्त करके; सः स्वयम्‌--वह स्वयं; पूर्वज-वत्‌-- अपने अन्य भाइयों के समान;भगवत््‌-कर्म-शील:-- श्री भगवान्‌ को प्रसन्न करने में लीन; एब--निस्सन्देह; आस्ते--लगा रहता है।

इस द्वीप का अधिपति महाराज प्रियत्रत का पुत्र बीतिहोत्र था जिसके रमणक तथा धातकीनामक दो पुत्र हुए।

उसने इन दोनों पुत्रों को इस द्वीप के दोनों छोर दे दिये और स्वयं अपने अग्रजमेधातिथि के समान श्रीभगवान्‌ की सेवा में तत्पर रहने लगा।

तद्वर्षपुरुषा भगवन्तं ब्रह्मरूपिणं सकर्मकेण कर्मणाराधयन्तीदं चोदाहरन्ति ॥

३२॥

ततू-वर्ष-पुरुषा:--उस द्वीप के वासी; भगवन्तम्‌-- श्रीभगवान्‌; ब्रह्म-रूपिणम्‌--कमलासीन भगवान्‌ ब्रह्मा के रूप में; स-कर्मकेण-- भौतिक कामनाओं की पूर्ति हेतु; कर्मणा--वेदविहित अनुष्ठान करके; आराधयन्ति--आराधना करते हैं; इदम्‌--यह; च--तथा; उदाहरन्ति--जप करते हैं।

इस द्वीप के वासी अपनी भौतिक कामनाओं की पूर्ति के लिए ब्रह्मा के रूप में श्रीभगवान्‌की आराधना करते हैं।

वे इस प्रकार उनकी स्तुति करते हैं।

यत्तत्कर्ममयं लिड़ं ब्रह्मलिड्रंं जनोर्चयेत्‌ ।

एकान्तमद्दयं शान्तं तस्मै भगवते नम इति ॥

३३॥

यत्‌--जो; तत्‌--वह; कर्म-मयम्‌--वैदिक कृत्यों के द्वारा प्राप्प; लिड्रमू-- स्वरूप को; ब्रह्म-लिड्रमू--जिससे परब्रह्म जाने जातेहैं; जन:ः--व्यक्ति; अर्चयेत्‌ू-- अर्चना करनी चाहिए; एकान्तमू--एक परम ब्रह्म में पूर्ण आस्था रखने वाला; अद्दयम्‌ू-- अभिन्न;शान्तम्‌--शान्त; तस्मै--उन; भगवते--सर्वशक्तिमान को; नम:ः--नमस्कार है; इति--इस प्रकार

भगवान्‌ ब्रह्म कर्ममय कहलाते हैं, क्योंकि अनुष्ठानों को करके कोई भी उनका पद प्राप्तकर सकता है और उन्हीं से वैदिक अनुष्ठान-स्तुतियाँ प्रकट होती हैं।

वे अविचल भाव सेश्रीभगवान्‌ की भक्ति करते हैं, अतः एक प्रकार से वे भगवान्‌ से अभिन्न हैं।

फिर भी उनकीउपासना एकान्तिक भाव से न करके द्वैत भाव से करनी चाहिए।

मनुष्य को चाहिए कि अपनेको दास मानते हुए पर-ब्रह्म को ही परम आराध्य माने।

अतः हम भगवान्‌ ब्रह्मा को साक्षात्‌वेदज्ञान के रूप में नमस्कार करते हैं।

ऋषिरुवाचततः परस्ताल्लोकालोकनामाचलो लोकालोकयोरन्तराले परित उपक्षिप्त: ॥

३४॥

ततः--मधुर जल के सागर से; परस्तात्‌ू--परे, आगे; लोकालोक-नाम--लोकालोक नामक; अचल: --पर्वत; लोक-अलोकयो: अन्तराले-- प्रकाश तथा अंधकार से पूर्ण देशों के मध्य में; परित:--चारों ओर; उपक्षिप्त:--विद्यमान है।

इसके पश्चात्‌ मुदुल जल वाले सागर के आगे तथा इसको पूरी तरह घेरने वाला लोकालोकनामक पर्वत है जो देशों को सूर्य से प्रकाशित तथा अप्रकाशित इन दो भागों में विभाजित करदेता है।

यावन्मानसोत्तरमेर्वो रन्तरं तावती भूमि: काञ्जन्यन्यादर्शतलोपमा यस्यां प्रहितः पदार्थों न कथज्ित्पुनःप्रत्युपलभ्यते तस्मात्सर्वसत्त्वपरिहतासीतू ॥

३५॥

यावत्‌--जहाँ तक; मानसोत्तर-मेवों: अन्तरम्‌--मानसोत्तर तथा मेरु के बीच की भूमि ( सुमेरु पर्वत के मध्य से प्रारम्भ );तावती--वहाँ तक; भूमि:-- भूमि; काझ्ननी--स्वर्णनिर्मित; अन्या-- अन्य; आदर्श-तल-उपमा--जिसका तल दर्पण की तरह है;यस्यामू--जिस पर; प्रहित:--गिराई हुई; पदार्थ:--वस्तु; न--नहीं; कथज्ञित्‌--किसी प्रकार से; पुन:--फिर; प्रत्युपलभ्यते--पाई जाती है; तस्मात्‌ू--अतः; सर्व-सत्त्व--सारे जीवों द्वारा; परिहता--परित्यक्त; आसीतू-- थी |

मृदुल जल के सागर से आगे सुमेरु पर्वत के मध्य से लेकर मानसोत्तर पर्वत की सीमा तकजितना अन्तर है उतनी भूमि है।

उस भूभाग में अनेक प्राणी रहते हैं।

उसके आगे लोकालोकपर्वत तक फैली हुई दूसरी भूमि है जो स्वर्णमय है।

स्वर्णमय सतह के कारण यह दर्पण की तरहसूर्य प्रकाश को परावर्तित कर देती है, अतः इसमें गिरी हुई वस्तु पुनः नहीं दिखाई पड़ती।

'फलत:ः सभी प्राणियों ने इस स्वर्णमयी भूमि का परित्याग कर दिया है।

लोकालोक इति समाख्या यदनेनाचलेन लोकालोक स्यान्तर्वर्तिनावस्थाप्यते ॥

३६॥

लोक--प्रकाश( अथवा वासियों ) से; अलोक:--प्रकाशरहित ( अथवा वासियों से विहीन ); इति--इस प्रकार से; समाख्या--पद; यत्‌--जो; अनेन--इस; अचलेन--पर्वत से; लोक--जीवात्माओं के देश; अलोकस्य--बिना प्राणियों वाले देश का;अन्तर्वर्तिना--मध्य में स्थित; अवस्थाप्यते--स्थित है |

जीवात्माओं से युक्त तथा बिना प्राणियों वाले देशों के मध्य में एक विशाल पर्वत है जो इनदोनों को पृथक्‌ करता हैं, अतः लोकालोक नाम से विख्यात है।

स लोकत्रयान्ते परित ईश्वेरण विहितो यस्मात्सूर्यादीनां श्रुवापवर्गाणां ज्योतिर्गणानांगभस्तयो४र्वाचीनांस्त्रील्लोकानावितन्वाना न कदाचित्पराचीना भवितुमुत्सहन्ते तावदुन्नहनायाम: ॥

३७॥

सः--वह पर्वत; लोक-त्रय-अन्ते--तीनों लोकों ( भूलोक, भुवर्लोक तथा स्वलोक ) के अन्त में; परित:--चारों ओर;ईश्वरण-- भगवान्‌ श्रीकृष्ण द्वारा; विहित:--सृष्टि की; यस्मात्‌--जिससे; सूर्य-आदीनाम्‌--सूर्यलोक का; श्रुव-अपवर्गाणाम्‌--श्रुव तथा अन्य निम्नतर नक्षत्रों तक; ज्योति:-गणानाम्‌--समस्त नक्षत्रों का; गभस्तय:--किरणें; अर्वाचीनान्‌ू--इस दिशा में;आ्रीनू--तीन; लोकानू--लोक; आवितन्वाना: --विस्तीर्ण; न--नहीं; कदाचित्‌--किसी समय; पराचीना:--उस पर्वत की सीमाके परे; भवितुम्-होने के लिए; उत्सहन्ते--समर्थ हैं; तावत्‌--उतना; उन्नहन-आयाम: --पर्वत की ऊँचाई की माप।

श्रीकृष्ण की परमेच्छा से लोकालोक नामक पर्वत तीनों लोकों-- भूलोक, भूवर्लोक तथास्वर्लोक--की बाहरी सीमा के रूप में स्थापित किया गया है, जिससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सूर्यकी किरणों का नियंत्रण किया जा सके।

सूर्य से लेकर श्रुवलोक एवं सारे नक्षत्र इन तीनों लोकोंमें इस पर्वत के द्वारा निर्मित सीमा के अन्तर्गत अपनी किरणें बिखेरते हैं।

चूँकि यह पर्वतश्रुवलोक से भी ऊँचा है, अतः यह नक्षत्रों की किरणों को अवरुद्ध कर लेता है, जिससे वे कभीभी इसके बाहर प्रसारित नहीं हो पातीं।

एतावॉल्लोकविन्यासो मानलक्षणसंस्थाभिर्विचिन्तितः: कविभि: स तु पशञ्चाशत्कोटिगणितस्य भूगोलस्यतुरीयभागोयं लोकालोकाचलः ॥

३८ ॥

एतावान्‌--इतना; लोक-विन्यास: --विभिन्न लोकों का वितरण; मान--परिमाप; लक्षण--लक्षण, चिह्न; संस्थाभि:--तथाउनकी विभिन्न स्थितियाँ; विचिन्तित:--वैज्ञानिक गणनाओं द्वारा निश्चित की गई; कविभि:--दिद्वानों के द्वारा; सः--वह; तु--लेकिन; पञ्ञाशत्‌-कोटि--पचास करोड़ योजन; गणितस्थ--गणना करने पर; भू-गोलस्य-- भूगोलक नामक लोक का;तुरीय-भाग:--चतुर्थाश; अयमू--यह; लोकालोक-अचल:--लोकालोक नामक पर्वत।

त्रुटि, भ्रम तथा वंचना से मुक्त दिद्वानों ने प्रमाण, लक्षण और स्थिति के अनुसार लोकों काइतना ही विस्तार बतलाया है।

उन्होंने विचार-विमर्श के बाद यह स्थापना की है कि सुमेरु तथालोकालोक पर्वत की दूरी ब्रह्माण्ड के व्यास की चतुर्थाश अर्थात्‌ १२,५०,००० ( साढ़े बारहकरोड़ ) योजन ( एक अरब मील ) है।

तदुपरिष्टाच्यतसृष्वाशास्वात्मयोनिनाखिलजगद्गुरुणाधिनिवेशिता ये द्विरदपतय ऋषभ: पुष्करचूडोवामनोपराजित इति सकललोकस्थितिहेतवः ॥

३९॥

ततू-उपरिष्टात्‌--लोकालोक पर्वत की चोटी पर; चतसूषु आशासु--चारों दिशाओं में; आत्म-योनिना-- भगवान्‌ ब्रह्मा द्वारा;अखिल-जगतू-गुरुणा--समस्त ब्रह्माण्ड के गुरु; अधिनिवेशिता:--स्थापित; ये--वे सब; द्विरद-पतयः--हाथियों में श्रेष्ठ;ऋषभ:--ऋषभ; पुष्कर-चूड:--पुष्करचूड; वामन: --वामन; अपराजित:--अपराजित; इति--इस प्रकार; सकल-लोक-स्थिति-हेतवः--विश्व के अन्तर्गत विभिन्न लोकों के पालन के कारण।

लोकालोक पर्वत के ऊपर सम्पूर्ण ब्रह्मण्ड के परम-गुरु भगवान्‌ ब्रह्मा के द्वारा स्थापितगजों में श्रेष्ठ चार गज-पति हैं।

इन गजों के नाम हैं-ऋषभ, पुष्करचूड़, वामन तथा अपराजित।

येब्रह्माण्ड के लोकों को धारण करते हैं।

तेषां स्वविभूतीनां लोकपालानां च विविधवीर्योपबूृंहणाय भगवान्परममहापुरुषोमहाविभूतिपतिरन्तर्याम्यात्मनो विशुद्धसत्त्वं धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्याद्यष्टमहासिद्धद्ुपलक्षणं विष्वक्सेनादिभि:स्वपार्षदप्रवर: परिवारितो निजवरायुधोपशोभितैर्निजभुजदण्डै: सन्धारयमाणस्तस्मिन्गिरिवरेसमन्तात्सकललोकस्वस्तय आस्ते ॥

४०॥

तेषाम्‌--उनमें से; स्व-विभूतीनाम्‌--जो उनके व्यक्तिगत अंश-विस्तार तथा सेवक हैं; लोक-पालानाम्‌--जिन पर विश्व के कार्यव्यापारों की देख-रेख का भार है; च--तथा; विविध--नाना प्रकार; वीर्य-उपबृंहणाय--शक्तियों के प्रसार हेतु; भगवानू--श्रीभगवान्‌; परम-महा-पुरुष:--सभी प्रकार के ऐश्वर्य के आद्य स्वामी, श्रीभगवान्‌; महा-विभूति-पति:--समस्त अकल्पनीयशक्तियों के स्वामी; अन्तर्यामी--परमात्मा; आत्मन: --अपना; विशुद्ध-सच्त्वम्‌-प्रकृति के गुणों से निष्कलुष अस्तित्त्व वाला;धर्म-ज्ञान-वैराग्य-- धर्म, ज्ञान तथा वैराग्य का; ऐश्वर्य-आदि--समस्त प्रकार के ऐश्वर्य का; अष्ट--आठ; महा-सिद्द्धि--तथामहान्‌ सिद्धियाँ; उपलक्षणम्‌--गुणमय; विष्वक्सेन-आदिभि:--विष्वक्सेन आदि अपने अंश-विस्तार द्वारा; स्व-पार्षद-प्रवरै: --अपने श्रेष्ठ सहायकों से; परिवारित:--घिरे हुए; निज--अपना; वर-आयुध--विभिन्न प्रकार के शस्त्र-अस्त्रों द्वारा;उपशोभितै:--सुशोभित; निज--निजी; भुज-दण्डै: --भुजदण्ड द्वारा; सन्धारयमाण:--इस रूप को प्रकट करके; तस्मिनू--उससमस्त लोकों के कल्याण हेतु; गिरि-वरे--महान्‌ पर्वत; समन्तात्‌ू--चारों ओर; सकल-लोक-स्वस्तये--सारे लोकों के लाभहेतु; आस्ते--है

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ समस्त दिव्य ऐश्वर्य तथा चिदाकाश के स्वामी हैं।

वे परम पुरूष हैंअर्थात्‌ भगवान्‌ हैं, वे प्रत्येक प्राणी के परमात्मा हैं।

स्वर्ग लोक के राजा इन्द्र के अधीनदेवतागण इस भौतिक जगत के कार्यों का निरीक्षण करते हैं।

विभिन्न लोकों के प्राणियों केलाभ हेतु तथा उन हाथियों तथा देवताओं की शक्ति को बढ़ाने के लिए भगवान्‌ स्वयं उस पर्वत की चोटी पर प्रकृति के गुणों से अदूषित दिव्य शरीर धारण करके प्रकट होते हैं।

अपने निजीप्रकाश तथा विष्वक्सेन जैसे सहायकों से घिरे रह कर वे अपने पूर्ण ऐश्वर्य ( यथा ज्ञान तथा धर्म )एवं अपनी शक्तियों ( यथा अणिमा, लघिमा तथा महिमा ) को प्रदर्शित करते हैं।

वे सुअलंकृत हैंऔर अपनी चारों भुजाओं में विविध आयुध धारण किये हुए हैं।

आकल्पमेवं वेषं गत एब भगवानात्मयोगमायया विरचितविविधलोकयात्रागोपीयायेत्यर्थ: ॥

४१॥

आ-कल्पम्‌--कल्प के अन्त तक; एवम्‌--इस प्रकार; वेषम्‌ू--वेश; गतः--स्वीकार किया; एब: --यह; भगवान्‌--श्रीभगवान्‌; आत्म-योग-मायया--अपनी योगमाया से; विरचित--सम्पन्न; विविध-लोक-यात्रा--विभिन्न लोकों काजीवनयापन; गोपीयाय--पालन करने भर को; इति--इस प्रकार; अर्थ:--प्रयोजन

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के विविध रूप, यथा नारायण तथा विष्णु, विभिन्न आयुधों सेअलंकृत हैं।

श्रीभगवान्‌ अपनी योगमाया से उत्पन्न समस्त लोकों का पालन करने के लिए इनरूपों को प्रकट करते हैं।

योअन्तर्विस्तार एतेन हालोकपरिमाणं च व्याख्यातं यद्वहिलोकालोकाचलातू; ततः परस्ताद्योगे श्वरगतिंविशुद्धामुदाहरन्ति ॥

४२॥

यः--वह जो; अन्तः-विस्तार:--लोकालोक पर्वत की आन्तरिक दूरी; एतेन--इससे; हि--ही; अलोक-परिमाणम्‌--अलोकवर्ष का विस्तार; च--तथा; व्याख्यातम्‌--वर्णित; यत्‌--जो; बहिः--बाहर की ओर; लोकालोक-अचलात्‌--लोकालोक पर्वतसे आगे; ततः--वह; परस्तात्‌--परे, आगे; योगेश्वर-गतिम्‌--ब्रह्माण्ड के आवरणों को भेदने के लिए योगेश्वर ( कृष्ण ) कामार्ग; विशुद्धामू-- भौतिक कलुष से रहित; उदाहरन्ति--वे कहते हैं

हे राजन, लोकालोक पर्वत के बाहर अलोकवर्ष है जो पर्वत के भीतरी चौड़ाई के विस्तारके बराबर अर्थात्‌ १२,५०,००,००० (साढ़े बारह करोड़ ) योजन (एक अरब मील) तकविस्तीर्ण है।

अलोक वर्ष के परे भौतिक जगत से मुक्ति के इच्छुक व्यक्तियों का गन्तव्य है।

इसको प्रकृति के भौतिक गुण कलुषित नहीं कर पाते, अतः यह पूर्णतया विशुद्ध है।

ब्राह्मण केपुत्रों को वापस लाते समय श्रीकृष्ण अर्जुन को इसी स्थान से होकर ले गये थे।

अण्डमध्यगत:ः सूर्यो द्यावाभूम्योर्यदन्तरम्‌ ।

सूर्याण्डगोलयोर्मध्ये कोट्य: स्युः पञ्ञविंशति: ॥

४३॥

अण्ड-मध्य-गत:--ब्रह्माण्ड के मध्य में स्थित; सूर्य:--सूर्य गोलक ; द्याव्‌ू-आभूम्यो: -- भूलोंक तथा भुवर्लोक नामक दो लोक;यतू्‌--जो; अन्तरम्‌-के मध्य; सूर्य--सूर्य का; अण्ड-गोलयो:--तथा ब्रह्माण्ड के; मध्ये--बीच में; कोट्य:--एक करोड़ केसमूह; स्यु:--हैं; पदञ्ञ-विंशति:--पच्चीस |

सूर्य इस ब्रह्माण्ड के मध्य में, भूलोॉक तथा भुवर्लोक के मध्यवर्ती भाग में स्थित है, जिसेअन्तरिक्ष कहते हैं।

सूर्य तथा ब्रह्माण्ड की परिधि के बीच की दूरी पच्चीस कोटि योजन ( ३अरब मील ) है।

मृतेण्ड एव एतस्मिन्यदभूत्ततो मार्तण्ड इति व्यपदेश: ।

हिरण्यगर्भ इति यद्धिरण्याण्डसमुद्धवः ॥

४४॥

मृते--मृत; अण्डे--गोलक में; एष:--यह; एतस्मिन्‌--इसमें; यत्‌-- जो; अभूत्‌--सृष्टि के समय स्वयं प्रविष्ट हुआ; ततः--उससे; मार्तण्ड--मार्तण्ड; इति--इस प्रकार; व्यपदेश: --नाम; हिरण्य-गर्भ: --हिरण्यगर्भ नाम से विख्यात; इति--इस प्रकार;यत्‌-क्योंकि; हिरण्य-अण्ड-समुद्धव:--उनकी देह हिरण्यगर्भ से उत्पन्न हुई।

सूर्यदेव वैराज अर्थात्‌ समस्त जीवात्माओं के लिए सम्पूर्ण भौतिक शरीर भी कहलाते हैं।

ब्रह्माण्ड की सृष्टि के समय ब्रह्माण्ड के अण्डे के भीतर प्रवेश करने के कारण वे मार्तण्ड भीकहलाते हैं।

हिरण्यगर्भ ( ब्रह्मा ) से भौतिक शरीर प्राप्त करने के कारण वे हिरण्यगर्भ भीकहलाते हैं।

सूर्येण हि विभज्यन्ते दिश: खं द्यौर्मही भिदा ।

स्वर्गापवर्गों नरका रसौकांसि च सर्वशः ॥

४५॥

सूर्यगण--सूर्यदेव द्वारा; हि--ही; विभज्यन्ते--विभाजित हैं; दिश:--दिशाएँ; खम्‌-- आकाश; दयौ: --स्वर्गलोक; मही--पृथ्वीलोक; भिदा--अन्य वर्गीकरण; स्वर्ग--स्वर्गलोक ; अपवर्गौं-- मुक्ति के लिए स्थान; नरकाः--नरकलोक; रसौकांसि--यथा अतल; च- भी; सर्वश:--सभी |

हे राजन, सूर्यदेव तथा सूर्यलोक ब्रह्माण्ड की समस्त दिशाओं को विभाजित करते हैं।

सूर्यकी उपस्थिति के ही कारण हम समझ पाते हैं कि आकाश, स्वर्गलोक, यह संसार तथापाताललोक क्या हैं।

सूर्य के ही कारण हम जान पाते हैं कि भोग या मोक्ष के स्थान कौन-कौनसे हैं और कौन से नरक तथा अतल आदि लोक हैं।

देवतिर्यड्मनुष्याणां सरीसूपसवीरु धाम्‌ ।

सर्वजीवनिकायानां सूर्य आत्मा हगी श्वर: ॥

४६॥

देव--देवताओं; तिर्यक्‌ --निम्न पशुओं; मनुष्याणाम्‌--तथा मनुष्यों का; सरीसूप--कीट तथा सर्प; स-बीरुधाम्‌--तथा पेड़-पौधे; सर्व-जीव-निकायानाम्‌--समस्त जीव समूहों का; सूर्य:--सूर्यदेव; आत्मा--प्राण तथा आत्मा; हक्‌--नेत्र के; ईश्वर: --भगवान्‌

सूर्यलोक से सूर्यदेव द्वारा प्रदान की जा रही उष्मा तथा प्रकाश पर ही समस्त जीवात्माएँ,जिनमें देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, रेंगनेवाले जीव, लताएँ तथा वृक्ष सम्मिलित हैं, निर्भरहैं।

सूर्य की ही उपस्थिति में सभी प्राणी देख सकते हैं, इसीलिए वह हृग्‌-ईश्वर अर्थात्‌ दृष्टि केईश्वर कहलाते हैं।

TO

← पिछला अध्याय · अगला अध्याय →

← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 5 की सूची