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अध्याय दो: महाराज आग्नीध्र की गतिविधियाँ
5.2श्रीशुक उबाचएवं पितरि सम्प्रवृत्ते तदनुशासने वर्तमान आग्नीक्नो जम्बूद्वीपौकस:प्रजा औरसवद्धर्मावेक्षमाण:पर्यगोपायत्, ॥
१॥
श्री-शुक:-- श्रीशुकदेव गोस्वामी; उबाच--बोले; एवम्--इस प्रकार; पितरि--जब उसके पिता ने; सम्प्रवृत्ते--मुक्ति मार्गग्रहण किया; तत्-अनुशासने -- उसकी आज्ञानुसार; वर्तमान: --वर्तमान, उपस्थित; आग्नीक्च:--राजा आग्नी्ष; जम्बू-द्वीप-ओकसः:--जम्बूदीप के वासी; प्रजा:--नागरिक; औरस-वत्--अपने पुत्रों के समान; धर्म--धार्मिक नियम; अवेक्षमाण: --कठोरता से पालन करते हुए; पर्यगोपायत्--पूर्णतया सुरक्षित ?
श्री शुकदेव गोस्वामी आगे बोले--अपने पिता महाराज प्रियत्रत के इस प्रकार आध्यात्मिकजीवन पथ अपनाने के लिए तपस्या में संलग्न हो जाने पर राजा आग्नीक्ष ने उनकी आज्ञा का पूरीतरह पालन किया और धार्मिक नियमों के अनुसार उन्होंने जम्बूद्यीप के वासियों को अपने हीपुत्रों के समान सुरक्षा प्रदान की।
स च कदाचित्पितृलोककामः सुरवरवनिताक्रीडाचलद्रोण्यां भगवन्तं विश्वसूजां'पतिमाभूतपरिचर्योपकरण आत्मैकाछयेण तपस्व्याराधयां बभूव ॥
२॥
सः--वह ( राजा आग्नीश्न ); च--भी; कदाचित्--एक बार; पितूुलोक--पितृलोक की; काम:ः--इच्छा करते हुए; सुर-वर--श्रेष्ठ देवताओं में से; बनिता--स्त्री जाति; आक्रीडा--विहार-स्थली; अचल-द्रोण्यामू--मन्दराचल की एक घाटी में;भगवन्तम्--सर्व शक्तिमान ( भगवान् ब्रह्मा ) को; विश्व-सृजाम्--जिन विभूतियों ने इस ब्रह्माण्ड की रचना की; पतिम्--स्वामीको; आभूत--संग्रह करके; परिचर्या-उपकरण:--पूजा की सामग्री; आत्म--मन का; एक-अछयेण--पूरे मनोयोग से;तपस्वी--तप करने वाला; आराधयाम् बभूब--आराधना में लग गया।
एक बार महाराज आग्नीक्ष ने सुयोग्य पुत्र प्राप्त करने तथा पितुलोक का वासी बनने कीकामना से भौतिक सृष्टि के स्वामी भगवान् ब्रह्मा की आराधना की।
वे मंदराचल की घाटी मेंगये जहाँ स्वर्गलोक की सुन्दरियाँ विहार करने आती हैं।
वहाँ उन्होंने वाटिका से फूल तथा अन्यआवश्यक सामग्री एकत्र की और फिर कठिन तप तथा उपासना में लग गये।
तदुपलभ्य भगवानादिपुरुष: सदसि गायन्तीं पूर्वचित्ति नामाप्सरसमभियापयामास ॥
३॥
ततू--वह; उपलभ्य--समझकर; भगवान्--सर्वशक्तिमान; आदि-पुरुष: --इस ब्रह्माण्ड में उत्पन्न पहले जीव; सदसि--सभा में;गायन्तीम्--नर्तकी; पूर्वचित्तिम्-पूर्वचित्ति; नाम--नामक; अप्सरसम्--स्वर्ग की नर्तकी, अप्सरा को; अभियापयाम् आस--नीचे भेजा।
इस ब्रह्माण्ड के सर्वशक्तिमान तथा आदि पुरुष भगवान् ब्रह्म ने राजा आग्नीक्ष कीअभिलाषा जानकर अपनी सभा की श्रेष्ठ अप्सरा को, जिसका नाम पूर्वचित्ति था, चुनकर राजाके पास भेजा।
सा च तदाभ्रमोपवनमतिरमणीयंविविधनिबिडविटपिविटपनिकरसंश्लिष्टपुरटलतारूढस्थलविहडुममिथुनै: प्रोच्यमानश्रुतिभि:प्रतिबोध्यमानसलिलकुक्कुटकारण्डवकलहंसादिभिर्विचित्रमुपकूजितामलजलाशयकमलाकरमुपब भ्राम॥
४॥
सा--वह ( पूर्वचित्ति ); च-- भी; तत्ू--महाराज आग्नीश्व को; आश्रम--ध ध्यान-स्थल के; उपवनम्--छोटा उद्यान, पार्क;अति--अ त्यन्त; रमणीयम्--सुन्दर; विविध--अनेक प्रकार के; निबिड--घना; विटपि--वृक्ष; विटप--डालों के; निकर--समूह; संश्लिप्ट--संलग्न; पुरट--स्वर्णिम; लता--लताओं सहित; आरूढ--ऊपर चढ़ी हुई; स्थल-विहड्रम--स्थल के पक्षियोंके; मिथुनै:--जोड़ों सहित; प्रोच्यमान--कूजन करते हुए; श्रुतिभि:--सुहावने शब्दों से; प्रतिबोध्यमान--प्रतिध्वनित; सलिल-कुकुट--जल-कुक्कुट; कारण्डब--बत्तख; कल-हंस--अनेक प्रकार के हंसों; आदिभि:--इत्यादि, सहित; विचित्रम्--नानाप्रकार के; उपकूजित--शब्द से प्रतिध्वनित; अमल--निर्मल; जल-आशय--सरोवर या झील में; कमल-आकरम्--कमलपुष्पों की खान; उपबध्राम--में चलने लगी।
श्री ब्रह्मा द्वारा भेजी गई अप्सरा उस उपवन के निकट विचरने लगी जहाँ राजा ध्यान में'लगकर आराधना कर रहा था।
वह उपवन सघन वृक्षों तथा स्वर्णिम लताओं के कारण अत्यन्तरमणीय था।
वहाँ स्थल पर मयूर जैसे अनेक पक्षियों के जोड़े और सरोवर में बत्तख तथा हंससुमधुर कूजन कर रहे थे।
इस प्रकार वह उपवन वृक्षों, निर्मल जल, कमल पुष्प तथा सुमधुरकूजन करते विविध पक्षियों के कारण अत्यन्त सुन्दर लग रहा था।
तस्या: सुललितगमनपदविन्यासगतिविलासायाश्चानुपदं खणखणायमानरुचिरचरणाभरणस्वनमुपाकर्णय्यनरदेवकुमार: समाधियोगेनामीलितनयननलिनमुकुलयुगलमीषद्विकचय्य व्यचष्ट ॥
५॥
तस्या:--उस ( पूर्वचित्ति ) के; सुललित--अत्यन्त सुन्दर; गमन--चाल; पद-विन्यास--चलने की शैली से; गति--आगे आगे;विलासाया:--जिनकी लीला; च--भी; अनुपदम्-- प्रत्येक पग से; खण-खणायमान--झंकार करते हुए; रुचिर--अत्यन्तमनोहर; चरण-आभरण--चरणों के आभूषण; स्वनम्ू--ध्वनि को; उपाकर्ण्य --सुनकर; नरदेव-कुमार:--राजकुमार ने;समाधि--समाधि दशा; योगेन--इन्द्रियों को नियंत्रित करके; आमीलित--अधखुले; नयन--नेत्र; नलिन--कमल की;मुकुल--कलियाँ; युगलम्--एक जोड़े के समान; ईषत्ू--कुछ-कुछ; विकचय्य--खोलकर; व्यचष्ट--देखा।
ज्योंही अत्यन्त मनोहर गति तथा हावभाव से युक्त पूर्वचित्ति उस पथ से निकली त्योंहीप्रत्येक पग पर उसके चरण-नूपुरों की झंकार निकलने लगी।
यद्यपि राजकुमार आग्नीक्षअथध्खुले नेत्रों से योग साध कर इन्द्रियों को वश में कर रहे थे, किन्तु अपने कमल सहश नेत्रों सेवे उसे देख सकते थे।
तभी उन्हें उसके कंगनों की मधुर झंकार सुनाई दी।
उन्होंने अपने नेत्रों कोकुछ और खोला, तो देखा कि वह उनके बिल्कुल निकट थी।
तामेवाविदूरे मधुकरीमिव सुमनस उपजिद्रन्तींदिविजमनुजमनोनयनाहाददुधैर्गतिविहारतब्रीडाविनयावलोकसुस्वराक्षरावयवैर्मनसि नृणां कुसुमायुधस्यविदधतीं विवरं निजमुखविगलितामृतासवसहासभाषणामोदमदान्धमधुकरनिकरोपरोधेन द्रुतपदविन्यासेनवल्गुस्पन्दनस्तनकलशकबरभाररशनां देवीं तदवलोकनेन विवृतावसरस्य भगवतो मकरध्वजस्यवशमुपनीतो जडवदिति होवाच ॥
६॥
तामू--उसको; एव--निस्संदेह; अविदूरे--निकट ही; मधुकरीम् इव--मधुमक्खी के समान; सुमनस:--सुन्दर फूल;उपजिप्रन्तीमू--सूँघती हुई; दिवि-ज--स्वर्गलोक में उत्पन्न होने वालों का; मनु-ज--मर्त्यलोक में जन्म लेने वालों का; मनः--मन; नयन--नेत्रों के लिए; आह्ाद- प्रसन्नता; दुघैः--उत्पन्न करती हुई; गति--अपनी चाल से; विहार--आमोद-प्रमोद से;ब्रीडा--लज्जा से; विनय--विनयशीलता से; अवलोक--चितवन से; सु-स्वर-अक्षर-- अपनी मधुर वाणी से; अवयबै:--शरीरके अंगों से; मनसि--मन में; नृणाम्ू--मनुष्यों के; कुसुम-आयुधस्य--हाथ में पुष्प-धनुष धारण करने वाले कामदेव का;विदधतीम्--करती हुई; विवरम्--कर्णगत; निज-मुख--अपने मुँह से; विगलित--उड़ेलती हुईं; अमृत-आसब--मधु सहशअमृत; स-हास--अपने हँसी में; भाषण--तथा बोलने में; आमोद--प्रसन्नता से; मद-अन्ध--नशे में अन्धा हुआ; मधुकर--मधुमक्खियों का; निकर--समूह; उपरोधेन--उसके चारों ओर से घिरे होने से; द्रुत--शीघ्रगामी; पद--पाँव का; विन्यासेन--भावपूर्ण पद चाप से; वबल्गु--कुछ; स्पन्दन--गति; स्तन--उरोज; कलश--जल पात्र सहश; कबर--बालों की चोटी; भार--भार; रशनाम्ू--करधनी; देवीम्--देवी को; तत्ू-अवलोकनेन--उसकी दृष्टि मात्र से; विवृत-अवसरस्य--अवसर पाकर;भगवत:ः: --सर्वशक्तिमान का; मकर-ध्वजस्य--कामदेव का; वशम्--वश में; उपनीत:--लाया जाकर; जड-वत्--जड़ केसमान; इति--इस प्रकार; ह--निश्चय ही; उबाच--वह बोला।
वह अप्सरा सुन्दर तथा आकर्षक फूलों को मधुमक्खी के समान सूँघ रही थी।
वह अपनीचपल गति, लज्जा, विनय, चितवन तथा मुख से निकलने वाली मधुर ध्वनि और अपने अंगों कीगति से मनुष्यों तथा देवताओं के मन तथा ध्यान को आकर्षित करने वाली थी।
इन सब गुणों केकारण उसने मनुष्यों के मनों में कुसुम धनुषधारी कामदेव के स्वागतार्थ कानों के मार्ग खोल दिये थे।
जब वह बोलती, तो उसके मुख से अमृत झरता था।
उसके श्वास लेने पर श्वास कास्वाद लेने के लिए भौरे मदान्ध होकर उसके कमलवत् नेत्रों के चारों ओर मँडराने लगते।
इनभौंरों से विचलित होकर वह जल्दी-जल्दी चलने का प्रयत्त करने लगी, किन्तु जल्दी चलने केलिए पैर उठाते ही उसके केश, उसकी करधनी तथा उसके जलकलश तुल्य स्तन इस प्रकार गतिकर रहे थे, जिससे वह अत्यन्त मनोहर एवं आकर्षक लग रही थी।
दरअसल ऐसा प्रतीत होता थामानो वह अत्यन्त बलशाली कामदेव के लिए प्रवेश-मार्ग बना रही हो।
अतः राजकुमार उसेदेखकर पूर्णतया वशी भूत हो गया और उससे इस प्रकार बोला।
का त्वं चिकीर्षसि च किं मुनिवर्य शैलेमायासि कापि भगवत्परदेवताया: ।
विज्ये बिभर्षि धनुषी सुहृदात्मनोर्थेकि वा मृगान्मृगयसे विपिने प्रमत्तानू ॥
७॥
का--कौन; त्वम्--तुम हो; चिकीर्षसि--क्या करना चाहते हो; च-- भी; किम्--क्या; मुनि-वर्य--हे मुनिश्रेष्ठ; शैले--इसपर्वत पर; माया--माया; असि--हो; कापि-- कुछ; भगवत्-- भगवान्; पर-देवताया: --दिव्य ईश्वर का; विज्ये--बिना डोरीके; बिभर्षि-- धारण किये हुए; धनुषी--दो धनुष; सुहृत्--मित्र का; आत्मन:--अपने; अर्थ--हेतु; किम् बा--अथवा;मृगान्ू--जंगली पशु; मृगयसे-- आखेट करने का प्रयत्न कर रहे हो; विपिने--इस बन में; प्रमत्तान्ू--धन से मतवालों का।
राजकुमार ने भूल से अप्सरा को सम्बोधित किया--हे मुनिवर्य, तुम कौन हो ? इस पर्वत परक्यों आये हो और कया करना चाहते हो ? क्या तुम भगवान् की कोई माया हो ? तुम बिना डोरीवाले इन दो धनुषों को क्यों धारण किये हो ? क्या इनसे कोई तुम्हारा प्रयोजन है या अपने मित्रके लिए इन्हें धारण किये हुए हो ? सम्भवत: तुम इन्हें इस वन के मतवाले ( पागल ) पशुओं कोमारने के लिए धारण किये हो।
बाणाविमौ भगवतः शतपत्रपत्रौशान्तावपुद्भरुचिरावतितिग्मदन्तौ ।
कस्मै युयुड्क्षसि बने विचरन्न विदा:क्षेमाय नो जडधियां तव विक्रमोउस्तु ॥
८॥
बाणौ--दो बाण; इमौ--ये; भगवतः--आपके, सर्वशक्तिमान के; शत-पत्र-पत्रौ--कमल की पंखुडियों जैसे पंखों वाले;शान्तौ--शान्त; अपुद्ड--पंखरहित; रुचिरौ--अत्यन्त सुन्दर; अति-तिग्म-दन्तौ--अत्यन्त तीक्ष्ण नोक वाले; कस्मै--किसको;युयुद्क्षंसि--बेध देना चाहते हो; बने--वन में; विचरन्--इधर-उधर घूमते हुए; न विद्य:--हम समझ नहीं सकते; क्षेमाय--कल्याण के लिए; न:ः--हमारे; जड-धियाम्--जड़-बुद्धि वालों को; तब--तुम्हारा; विक्रम:--शौर्य; अस्तु--हो?
तब आगम्नीक्ष ने पूर्वचित्ति के बाँके नेत्रों को देखा और कहा--हे मित्र, तुम्हारे बाँके नेत्र दोअत्यन्त शक्तिशाली बाण हैं।
इन बाणों में कमल पुष्प की पंखुड़ियों जैसे पंख हैं।
मूठरहित होनेपर भी वे अत्यन्त सुन्दर हैं और उनके सिरे नुकीले तथा भेदने वाले हैं।
वे अत्यन्त शान्त लगते हैंजिससे ऐसा प्रतीत होता है कि वे किसी पर नहीं छोड़े जाएँगे।
तुम इस वन में किसी न किसी कोइन बाणों से बेधने के लिए विचरण कर रहे होगे, किन्तु किसे ? यह मैं नहीं जानता।
मेरी बुद्धिभी मन्द पड़ गई है और मैं तुम्हारा सामना नहीं कर सकता।
दरअसल, पराक्रम में कोई भीतुम्हारी बराबरी नहीं कर सकता; इसीलिए, मेरी प्रार्थना है कि तुम्हारा पराक्रम मेरे लिएकल्याणकारी हो।
शिष्या इमे भगवत: परित: पठन्तिगायन्ति साम सरहस्यमजस्त्रमीशम् ।
युष्मच्छिखाविलुलिता: सुमनोभिवृष्टी:सर्वे भजन्त्यूषिगणा इब वेदशाखा: ॥
९॥
शिष्या:--शिष्य; इमे--ये; भगवतः -- पूज्य के; परित:--चारों ओर से घेरे हुए; पठन्ति--सुना रहे हैं; गायन्ति--गायन कर रहेहैं; साम--सामवेद; स-रहस्यम्--रहस्ययुक्त; अजस्त्रमू--निरन्तर; ईशम्--ई श्वर को; युष्मत्-- तुम्हारी; शिखा--चोटी से;विलुलिता:--गिरे हुए; सुमन: --पुष्पों की; अभिवृष्टी: --वृष्टि; सर्वे--समस्त; भजन्ति-- भोगते हैं; ऋषि-गणा:--ऋषि, मुनि;इब--सहश; वेद-शाखा:--वैदिक शास्त्रों की शाखाएँ।
पूर्वच्ित्ति का अनुगमन करने वाले भौरों को देखकर महाराज आग्नीक्ष बोले--भगवन्,ऐसा प्रतीत होता है मानो तुम्हारे शरीर को घेरे हुए ये भौरे अपने पूज्य गुरु को घेरे हुए शिष्य हैं।
वे सामवेद तथा उपनिषद् के मंत्रों का निरन्तर गायन कर रहे हैं और इस प्रकार तुम्हारी स्तुति कररहे हैं।
जैसे ऋषिगण वैदिक शास्त्रों की शाखाओं का अनुसरण करते हैं, ये भौरें तुम्हारी चोटीसे झड़ने वाले पुष्पों का आनन्द ले रहे हैं।
वाचं परं चरणपद्रतित्तिरीणांब्रह्मन्नरूपमुखरां श्रुणवाम तुभ्यम् ।
लब्धा कदम्बरुचिरड्डृविटड्डूबिम्बेयस्यामलातपरिधि: क्व च वल्कलं ते ॥
१०॥
वाचम्--गुंजरित ध्वनि; परम्--एकमात्र; चरण-पञ्धर--नूपुरों की; तित्तिरीणाम्--तीतरों की; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; अरूप--बिना रूप के; मुखराम्--स्पष्ट सुनाई पड़ने वाला; श्रूणवाम--मैं सुनता हूँ; तुभ्यम्--तुम्हारा; लब्धा--प्राप्त; कदम्ब--कदम्बपुष्प सहश; रुचि: --मनोहर रंग; अड्जू-विटड्जू-बिम्बे--सुन्दर गोल नितम्बों पर; यस्याम्ू--जिस पर; अलात-परिधि:--ज्वलितअंगारों का घेरा; क्व--कहाँ; च-- भी; वल्कलम्--ढकने के लिए वस्त्र; ते--तुम्हारा |
हे ब्राह्मण, मुझे तो तुम्हारे नूपुरों की झंकार ही सुनाई पड़ती है।
ऐसा लगता है उनके भीतरतीतर पक्षी चहक रहे हैं।
मैं उनके रूपों को नहीं देख रहा, किन्तु मैं सुन रहा हूँ कि वे किसप्रकार चहक रहे हैं।
जब मैं तुम्हारे सुन्दर गोल नितम्बों को देखता हूँ, तो मुझे लगता है कि मानोवे कदम्ब के पुष्पों का सुन्दर रंग लिए हों।
तुम्हारी कमर में जाज्वल्यमान अंगारों की मेखला पड़ीहुई है।
दरअसल, ऐसा लगता है कि तुम वस्त्र धारण करना भूल गये हो।
कि सम्भूतं रुचिरयोद्धिज श्रड़रयोस्तेमध्ये कृशो वहसि यत्र दशिः भ्रिता मे ।
पड्लोरुण: सुरभीरात्मविषाण ईहग्येनाशअ्रमं सुभग मे सुरभीकरोषि ॥
११॥
किम्--क्या; सम्भृतम्-- भरा हुआ; रुचिरयो: --अत्यन्त सुन्दर; द्विज--हे ब्राह्मण; श्रृड़यो:--दो सींगों के भीतर; ते--तुम्हारा;मध्ये--बीच में; कृशः--पतली; वहसि-- धारण करते हो; यत्र--जिसमें; इशि:--आँखें; भ्रिता--टिकी हुई; मे--मेरी;पड्डू:--चूर्ण; अरुण:--लाल; सुरभि:--सुगंधित; आत्म-विषाणे--दो सींगों पर; ईंहक्--ऐसा; येन--जिसके द्वारा;आश्रमम्ू--आश्रम; सु-भग--हे भाग्यवान्; मे--मेरा; सुरभी-करोषि--सुगन्धित बना रहे हो |
तब आग्नीश्च ने पूर्वचित्ति के उभरे हुए उरोजों की प्रशंसा की।
उन्होंने कहा--हे ब्राह्मण,तुम्हारी कमर अत्यन्त पतली है, किन्तु फिर भी तुम कष्ट सह कर इन दो सींगों को धारण कर रहेहो जिन पर मेरे नेत्र अटक गये हैं।
इन दोनों सुन्दर सीगों के भीतर कया भरा है? तुमने इनकेऊपर सुगन्धित लाल-लाल चूर्ण छिड़क रखा है मानो अरुणोदय का सूर्य हो।
हे भाग्यवान्, क्यामैं पूछ सकता हूँ कि तुम्हें ऐसा सुगन्धित चूर्ण कहाँ से मिला जो मेरे आश्रम को सुरभित कर रहाहै?
लोकं प्रदर्शय सुहृत्तम तावकं मेयत्रत्य इत्थमुरसावयवावपूर्बों ।
अस्मद्विधस्य मनउन्नयनौ बिभर्तिबहद्धुतं सरसराससुधादि वक्त ॥
१२॥
लोकम्--आवास स्थान, देश; प्रदर्शय--दिखा दो; सुहृत्-तम-हे श्रेष्ठ मित्र, मित्रवर; तावकम्--इस प्रकार; मे--मुझको;यत्रत्यः--जिसमें उत्पन्न पुरुष; इत्थम्--इस तरह; उरसा--वक्षस्थल से; अवयवौ--दो अंग ( उरोज ); अपूर्वो --अपूर्ब; अस्मत्-विधस्य--मुझ जैसे व्यक्ति को; मन:-उन्नयनौ--चित्त को क्षुब्ध करने वाला; बिभर्ति--बना हुआ है; बहु--अनेक; अद्भुतम्--अदभुत; सरस--मृदुबचन; रास--मुस्कान जैसा हावभाव; सुधा-आदि--अमृत के तुल्य; वक््त्रे--मुख में ।
मित्रवर, क्या तुम मुझे अपना निवास स्थान दिखा सकते हो? मैं कल्पना भी नहीं करसकता कि उस स्थान के वासियों को तुम्हारे उन्नत उरोजों के समान अद्भुत् शारीरिक अंग किसतरह प्राप्त हुए हैं, जो मुझ जैसे देखने वाले के मन तथा नेत्रों को उद्देलित कर रहे हैं।
उनकी मधुरवाणी तथा मृदु मुस्कान से इस निर्णय पर पहुँचा हूँ कि उनके मुख में अमृत बसता होगा।
का वात्मवृत्तिरदनाद्धविरड़ वातिविष्णो: कलास्यनिमिषोन्मकरौ च कर्णों ।
उद्विग्नमीनयुगलं द्विजपड़ि शोचि-रासबन्नभूड़निकरं सर इन्मुखं ते ॥
१३॥
का-क्या; वा--तथा; आत्म-वृत्तिः:--शरीर के पालन हेतु भोजन; अदनात्--पान के चबाने से; हविः--यज्ञ की हवन सामग्री;अड्ग-+मेरे प्रिय मित्र; वाति--फैल रही है; विष्णो: -- भगवान् विष्णु के; कला--शरीर का अंश; असि--हो; अनिमिष--अपलक; उन्मकरौ--दो उज्वल मगर; च--भी; कर्णौं--दो कान; उद्विग्ग--परेशान, अस्थिर; मीन-युगलम्--दो मछलियोंसहित; द्विज-पड्डि --दाँतों की पाँत; शोचि: --सुन्दरता; आसन्न--सन्निकट; भूड़-निकरम्--भौंरों का समूह; सर: इत्--सरोवरके सहृश; मुखम्--मुँह; ते--तुम्हारा |
मित्रवर, शरीर पालने के लिए तुम कया खाते हो ? ताम्बूल चबाने से तुम्हारे मुख से सुगन्धफैल रही है।
इससे यह सिद्ध होता है कि तुम सदैव विष्णु का प्रसाद खाते हो।
निश्चय ही तुमभगवान् विष्णु के अंश स्वरूप हो।
तुम्हारा मुख मनोहर सरोवर के समान सुन्दर है।
तुम्हारेरत्जटित कुंडल उन दो उज्वल मकरों के तुल्य हैं जिनके नेत्र विष्णु के समान अपलक रहनेवाले हैं।
तुम्हारे दोनों नेत्र दो चंचल मछलियों के सद्ृश हैं।
इस प्रकार तुम्हारे मुख-सरोवर में दोमकर तथा दो चंचल मछलियाँ एक साथ तैर रही हैं।
इनके अतिरिक्त तुम्हारे दाँतों की धवलपंक्ति जल में श्वेत हंसों की पंक्ति के सहश प्रतीत होती है और तुम्हारे बिखरे बाल तुम्हारे मुख कीशोभा का पीछा करने वाले भौंरों के झुंड के समान हैं।
योउसौ त्वया करसरोजहतः पतड़ेदिक्षु भ्रमन्भ्रमत एजयतेक्षिणी मे ।
मुक्त न ते स्मरसि वक़््जटावरूथंकष्टोडनिलो हरति लम्पट एष नीवीम् ॥
१४॥
यः--जो; असौ--वह; त्वया--तुम्हारे द्वारा; कर-सरोज--कमल के समान हथेली वाला; हत:--आहत; पतड्ु:--गेंद; दिक्षु--समस्त दिशाओं में; भ्रमन्ू--घूमते हुए; भ्रमतः--चल, अस्थिर; एजयते--विश्लुब्ध करता है; अक्षिणी--नेत्रों को; मे--मेरे;मुक्तम्--बिखरे हुए; न--नहीं; ते--तुम्हारा; स्मरसि-- क्या तुम्हें सुधि है; वक्र--घुँघराले; जटा--बालों का; वरूथम्--समूह,लटें; कष्ट:--कष्टदायी; अनिल: --वायु; हरति--बहा ले जाता है; लम्पट:-- धूर्त, परस्त्री पर आसक्त सहश; एष:--यह;नीवीम्-- अधोवस्त्र |
मेरा मन पहले ही से चंचल है और तुम इस गेंद को अपनी कमल सहश हथेली से इधर-उधरफेंक कर मेरे नेत्रों को विश्षुब्ध कर रहे हो।
तुम्हारे घुँधराले केश अब बिखरे हुए हैं, किन्तु तुम्हेंउनको सँभालने की सुधि नहीं है।
तुम इन्हें सँभाल क्यों नहीं लेते? यह धूर्त वायु स्त्रियों मेंआसक्त लम्पट पुरुष के समान तुम्हारे अधोवस्त्र को उठाने का प्रयल कर रहा है।
क्या तुम्हेंइसकी खबर नहीं है ?
रूपं तपोधन तपश्चरतां तपोध्न॑ह्ोतत्तु केन तपसा भवतोपलब्धम् ।
चर्तु तपोहसि मया सह मित्र महांकि वा प्रसीदति स वै भवभावनो मे ॥
१५॥
रूपम्--सुन्दरता; तपः-धन-हे श्रेष्ठ तपस्वी; तप: चरताम्--तपस्या में संलग्न पुरुषों का; तपः-घ्नमू-तपों को विनष्ट करनेवाला; हि--निश्चय ही; एतत्--यह; तु--निस्सन्देह; केन--किस; तपसा--तपस्या के द्वारा; भवता--तुम्हारे द्वारा;उपलब्धम्--प्राप्त किया; चर्तुमू--करने के लिए; तप:--तप; अर्हसि--तुम्हें चाहिए; मया सह--मेरे साथ; मित्र--हे मित्र;महाम्--मुझको; किम् वा--अथवा सम्भव है; प्रसीदति--प्रसन्न होता है; सः--वह; बै--निश्चय ही; भव-भावन:--इसब्रह्माण्ड का सृजनकर्ता; मे--मेरे साथ ।
हे श्रेष्ठ तपस्वी, तुम्हें दूसरों की तपस्या को भंग करने वाला यह अदभुत् रूप कहाँ से प्राप्तहुआ? तुमने यह कला कहाँ से सीखी ? हे मित्र, तुमने इस सुन्दरता को प्राप्त करने के लिए कौनसा तप किया है? मेरी इच्छा है कि तुम मेरे साथ तपस्या में सम्मिलित हो जाओ, क्योंकि होसकता है कि इस ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा भगवान् ब्रह्मा ने मुझ पर प्रसन्न होकर तुम्हें मेरी पत्नी बननेके लिए भेजा हो।
नत्वां त्यजामि दयितं द्विजदेवदत्तंयस्मिन्मनो हगपि नो न वियाति लग्नम् ।
मां चारुश्रृड्ग्यहसि नेतुमनुत्रतं तेचित्तं यतः प्रतिसरन्तु शिवा: सचिव्य: ॥
१६॥
न--नहीं; त्वाम्-तुमको; त्यजामि--छोड़ूँगा; दयितम्-- अत्यन्त प्रिय; द्विज-देव--ब्राह्मणों के उपास्य देवता, भगवान् ब्रह्मा से;दत्तमू--दिया हुआ; यस्मिनू--जिसको; मन:--मन; हक्--आँखें; अपि-- भी; नः--मेरा; न वियाति--दूर नहीं जाता है;लग्नमू-हढ़तापूर्वक लगा हुआ; मामू--मुझको; चारु-श्रृद्धि--हे सुन्दर उन्नत उरोजों वाली स्त्री; अहंसि--तुम्हे चाहिए; नेतुम्--पथ प्रदर्शन करना; अनुव्रतम्-- अनुयायी; ते--तुम्हारा; चित्तमू--आकांक्षा; यतः--जहाँ कहीं भी; प्रतिसरन्तु--साथ चलें;शिवाः--अनुकूल; सचिव्य: --मित्रगण, सखियाँ |
ब्राह्मणों के द्वारा पूजित भगवान् ब्रह्मा ने मुझपर अत्यन्त अनुग्रह करके तुमको मुझे दिया है;इसलिए मैं तुमसे मिल पाया हूँ।
मैं तुम्हारा साथ नहीं छोड़ना चाहता, क्योंकि मेरे मन तथा नेत्रतुम्हीं पर टिके हुए हैं और वे किसी तरह दूर नहीं किये जा सकते।
हे सुन्दर उन्नत उरोजों वालीबाला, मैं तुम्हारा अनुचर हूँ।
तुम मुझे जहाँ भी चाहे ले जा सकती हो और तुम्हारी सखियाँ भीमेरे साथ चल सकती हैं।
श्रीशुक उबाचइति ललनानुनयातिविशारदो ग्राम्यवैदग्ध्यया परिभाषया तां विबुधवधूं विबुधमतिरधिसभाजयामास ॥
१७॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; ललना--स्त्रियाँ; अनुनय--जीतने में; अति-विशारद: --अत्यन्त पटु; ग्राम्य-वैदग्ध्यया-- अपनी इच्छाओं को पूरा करने में पठु; परिभाषया--चुने शब्दों से; ताम्--उस;विबुध-वधूम्--देव-कन्या को; विबुध-मति:--देवताओं के तुल्य बुद्धि वाले आग्नीश्व ने; अधिसभाजयाम् आस- प्रसन्न करलिया।
श्रील शुकदेव गोस्वामी आगे बोले--महाराज आग्नीक्ष देवताओं के समान बुद्धिमान औरस्त्रियों को रिझा करके अपने पक्ष में कर लेने की कला में अत्यन्त निपुण थे।
अतः उन्होंने उसस्वर्गकन्या को अपनी कामपूर्ण वाणी से प्रसन्न करके उसको अपने पक्ष में कर लिया।
सा च ततस्तस्य वीरयूथपतेर्बुद््विशीलरूपवय:श्रियौदार्येण पराक्षिप्तमनास्तेनसहायुतायुतपरिवत्सरोपलक्षणं कालं जम्बूद्वीपपतिना भौमस्वर्गभोगान्बुभुजे ॥
१८॥
सा--वह स्त्री; च-- भी; ततः--तत्पश्चात्; तस्य--उस; वीर-यूथ-पते: --वीरों के स्वामी की; बुद्धि--बुद्धि; शील--आचरण;रूप--सुन्दरता; वयः--अवस्था ( तरुण ); थ्रिया--ऐश्वर्य; औदार्येण--( तथा ) उदारता से; पराक्षिप्त--आकर्षित; मना:--मनवाली; तेन सह--उसके साथ; अयुत--दस हजार; अयुत--दस हजार; परिवत्सर--वर्ष ; उपलक्षणम्--विस्तृत; कालमू--काल, समय; जम्बूद्वीप-पतिना--जम्बूद्वीप के राजा के साथ; भौम--पृथ्वी का; स्वर्ग--स्वर्गिक; भोगान्ू--सुख, भोग;बुभुजे--भोग किया।
आग्नीघ्र की बुद्धि, तरुणाई, सौन्दर्य, आचरण, ऐश्वर्य तथा उदारता से आकर्षित होकरपूर्वचित्ति जम्बूढ्लीप के राजा तथा समस्त वीरों के स्वामी आग्नीश्र के साथ कई हजार वर्षों तकरही और उसने भौतिक तथा स्वर्गिक दोनों प्रकार के सुखों का भरपूर भोग किया।
तस्यामु ह वा आत्मजान्स राजवर आग्नीक्नोनाभिकिम्पुरुषहरिवर्षेलावृतरम्यकहिरण्मयकुरुभद्गाश्वकेतुमालसंज्ञान्रव पुत्रानजनयत्: ॥
१९॥
तस्याम्--उससे; उ ह वा--निश्चय ही; आत्म-जानू--पुत्र; सः--उसने; राज-वर:--राजाओं में श्रेष्ठ; आग्नीध्र: -- आग्नीष्ष ने;नाभि--नाभि; किंपुरुष--किम्पुरुष; हरि-वर्ष--हरिवर्ष, इलावृत--इलावृत; रम्थक--रम्यक; हिरण्मय--हिरण्यमय; कुरु--कुरु; भद्गाश्व-- भद्गा श्र; केतु-माल--केतुमाल; संज्ञानू--नामक; नव--नौ; पुत्रान्--पुत्रों को; अजनयत्--उत्पन्न किया |
राजाओं में श्रेष्ठ महाराज आग्नीश्व को पूर्वचित्ति के गर्भ से नौ पुत्र प्राप्त हुए जिनके नामनाभि, किम्पुरुष, हरिवर्ष, इलावृत, रम्यक, हिरण्मय, कुरु, भद्गाश्व तथा केतुमाल थे।
सा सूत्वाथ सुतान्नवानुवत्सरं गृह एवापहाय पूर्वचित्तिर्भूय एवाज॑ देवमुपतस्थे ॥
२०॥
सा--वह; सूत्वा--जन्म देकर; अथ--तत्पश्चात्; सुतान्--पुत्रों को; नव--नौ; अनुवत्सरम्--प्रति वर्ष; गृहे--घर पर; एब--निश्चय ही; अपहाय--छोड़कर; पूर्वचित्ति: --पूर्वचित्ति; भूय:--पुन: ; एब--निश्चय ही; अजम्-- भगवान् ब्रह्मा के; देवम्--देवता; उपतस्थे--पास गई, उपस्थित हुई ॥
पूर्वचित्ति ने प्रति वर्ष एक-एक करके इन नौ पुत्रों को जन्म दिया, किन्तु जब वे बड़े हो गये, तो वह उन्हें घर पर छोड़कर ब्रह्मा की उपासना करने के लिए उनके पास उपस्थित हुई।
आग्नीक्चसुतास्ते मातुरनुग्रहादौत्पत्तिकेनेव संहननबलोपेता: पित्रा विभक्ता आत्मतुल्यनामानि यथाभागंजम्बूद्वीपवर्षाणि बुभुजु: ॥
२१॥
आग्नीश्च-सुता:--महाराज आग्नीश्न के सब पुत्र; ते--वे; मातु:--माता के; अनुग्रहात्--अनुग्रह से अथवा माँ का दूध पीकर;औत्पत्तिकन--सहज; एव--ही; संहनन--सुगठित शरीर; बल--शक्ति; उपेता: --प्राप्त; पित्रा--पिता द्वारा; विभक्ता:--विभाजित; आत्म-तुल्य-- अपने ही समान; नामानि--नाम वाले; यथा-भागम्--ठीक से विभक्त; जम्बूद्वीप-वर्षाणि --जम्बूद्वीपके विभिन्न भागों ( सम्भवतः एशिया तथा यूरोप दोनों ); बुभुजु:--राज्य किया।
अपनी माँ का दूध पीने के कारण आग्नीश्न के नवों पुत्र अत्यन्त बलिष्ठ एवं सुगठित शरीरवाले हुए।
उनके पिता ने प्रत्येक को जम्बूद्यीप का एक-एक भाग दे दिया।
इन राज्यों के नामपुत्रों के नामों के अनुसार पड़े।
इस प्रकार आग्नीक्ष के सभी पुत्र पिता से प्राप्त राज्यों पर राज्यकरने लगे।
आग्नीक्षो राजातृप्त: कामानामप्सरसमेवानुदिनमधिमन्यमानस्तस्या: सलोकतां श्रुतिभिरवारुन्ध यत्रपितरो मादयन्ते ॥
२२॥
आम्नीक्ष:--आग्नीक्ष; राजा--राजा; अतृप्त:--असम्तुष्ट; कामानाम्--इन्द्रियभोग से; अप्सरसम्--स्वर्ग सुन्दरी ( पूर्वचित्ति ) केविषय में; एव--निश्चय ही; अनुदिनम्--दिनोंदिन; अधि--अत्यधिक; मन्यमान: --सोचते हुए; तस्या: --उसका; स-लोकताम्--उसी लोक को; श्रुतिभिः--वेदों से; अवारुन्ध--प्राप्त किया; यत्र--जहाँ; पितर:--पूर्वज, पितृगण; मादयन्ते--आनन्द लेते हैं।
पूर्वचचित्ति के चले जाने पर, अतृप्त वासना के कारण राजा आग्नीश्व उसी के विषय में सोचतेरहते।
अतः वैदिक आज्ञाओं के अनुसार राजा मृत्यु के पश्चात् उसी लोक में गये जहाँ उनकी पत्नीथी।
यह लोक पितृलोक कहलाता है जहाँ कि पितरगण अत्यन्त आनन्द से रहते हैं।
सम्परेते पितरि नव भ्रातरो मेरुदुहितृमेंरुदेवीं प्रतिरूपामुग्रदंष्टीं लतां रम्यां श्यामां नारीं भद्रां देववीतिमितिसंज्ञा नवोदवहन्, ॥
२३॥
सम्परेते पितरि--अपने पिता के प्रयाण के पश्चात्; नव--नौ; भ्रातरः-- भाई; मेरू-दुहितृ:--मेरु की पुत्रियाँ; मेरुदेवीम्--मेरुदेवी; प्रति-रूपाम्--प्रतिरूपा; उग्र-दंष्ठीम्--उग्रदंष्टी; लताम्-- लता; रम्याम्--रम्या; श्यामाम्ू--श्यामा; नारीम्--नारी;भद्राम्--भद्रा; देव-वीतिम्ू--देववीति को; इति--इस प्रकार; संज्ञा:--नाम; नव--नौ; उदवहन्--विवाह कर लिया।
अपने पिता के प्रयाण के पश्चात् नवों भाइयों ने मेरु की नौ पुत्रियों के साथ विवाह करलिया, जिनके नाम मेरुदेवी, प्रतिरूपा, उग्रदंष्ठी, लता, रम्या, श्यामा, नारी, भद्रा तथा देववीतिथे।
