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अध्याय तीन: ऋषभदेव का राजा नाभि की पत्नी मेरुदेवी के गर्भ से प्रकट होना

5.3श्रीशुक उबाचनाभिरपत्यकामोप्रजया मेरुदेव्या भगवन्तं यज्ञपुरुषमवहितात्मायजत ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी बोले; नाभि:--महाराज आग्नीश्च के पुत्र ने; अपत्य-कामः --पुत्रेच्छा से; अप्रजया--जिसेकोई सन्तान उत्पन्न नहीं हुईं थी; मेरुदेव्या--मेरुदेवी से; भगवन्तम्‌-- भगवान्‌; यज्ञ-पुरुषम्‌--समस्त यज्ञों के भोक्ता तथा स्वामी,भगवान्‌ विष्णु को; अवहित-आत्मा--अत्यन्त ध्यानपूर्वक; अयजत--स्तुति और आराधना की |

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--आग्नीक्ष के पुत्र महाराज नाभि ने सन्‍्तान की इच्छा की,इसलिए उन्होंने समस्त यज्ञों के भोक्ता एवं स्वामी भगवान्‌ विष्णु की अत्यन्त मनोयोग से स्तुतिएवं आराधना प्रारम्भ की।

उस समय तक महाराज नाभि की पतली मेरुदेवी ने किसी सन्‍्तान कोजन्म नहीं दिया था, अतः वह भी अपने पति के साथ भगवान्‌ विष्णु की आराधना करने लगी।

तस्य ह वाव श्रद्धया विशुद्धभावेन यजतः प्रवर्ग्येषु प्रचरत्सुद्रव्यदेशकालमन्त्र्त्विग्दक्षिणाविधानयोगोपपत्त्या दुरधिगमो पि भगवान्भागवतवात्सल्यतया सुप्रतीकआत्मानमपराजितं निजजनाभिप्रेतार्थविधित्सया गृहीतहदयो हृदयड्मंमनोनयनानन्दनावयवाभिराममाविश्चवकार ॥

२॥

तस्य--जब वह ( नाभि ); ह वाव--निश्चय ही; श्रद्धया--अत्यन्त श्रद्धा तथा भक्तिपूर्वक; विशुद्ध-भावेन--शुद्ध, निष्कलुष मनसे; यजतः--आराधना कर रहा था; प्रवर्ग्येषु--जबकि प्रवर्ग्य नामक कर्म; प्रचरत्सु--पालन किये जा रहे थे; द्रव्य--सामग्री;देश--स्थान; काल--समय; मन्त्र--स्तुति, मंत्र; ऋत्विक्‌ु--पुरोहित; दक्षिणा--पुरोहितों को मिलने वाली भेंटें; विधान--विधि; योग--तथा साधनों का; उपपत्त्या--करने से; दुरधिगम:--अप्राप्य; अपि--यद्यपि; भगवान्‌-- भगवान्‌; भागवत-वात्सल्यतया-- भक्त पर वत्सलता के कारण; सु-प्रतीक:--अत्यन्त सुन्दर रूप धारण किये; आत्मानम्‌--अपने आपको;अपराजितम्‌--दुर्जेय; निज-जन--भक्त की; अभिप्रेत-अर्थ--कामना; विधित्सबा--पूर्ण करने; गृहीत-हृदय:ः--जिनका मनआकृष्ट हो गया हो; हृदयड्रमम्‌--मोहक; मन:-नयन-आनन्दन--मन तथा नेत्रों को आनन्द प्रदान करने वाले; अवयवब--अंगोंसे; अभिरामम्‌--सुन्दर; आविश्वकार--प्रकट किया |

यज्ञ में भगवान्‌ का अनुग्रह प्राप्त करने के सात दिव्य साधन हैं--( १ ) बहुमूल्य सामग्रियोंया खाद्य पदार्थों का अर्पण ( द्रव्य ); (२) देश-अनुरूप कार्य करना, (३ ) काल-अनुरूपकार्य करना, (४) स्तुति अर्पण (मंत्र ) (५) पुरोहित लगाना ( ऋत्विक ), (६) पुरोहितों कोदान देना ( दक्षिणा ) तथा ( ७ ) विधि-नियमों का पालन करना।

किन्तु सदैव ही इन सामग्रियोंसे भगवान्‌ को प्राप्त नहीं किया जा सकता।

तो भी ईश्वर अपने भक्त पर वत्सल रहते हैं।

अतःजब भक्त महाराज नाभि ने शुद्ध मन से अत्यन्त श्रद्धा तथा भक्ति सहित प्रवर्ग्य यज्ञ करते हुएईश्वर की आराधना और प्रार्थना की तो अपने भक्तों पर वत्सलता के कारण परम कृपालु भगवान्‌राजा नाभि के समक्ष अपने दुर्जेय तथा चतुर्भुजी आकर्षक रूप में प्रकट हुए।

इस प्रकार सेभगवान्‌ ने अपने भक्त की मनोकामना पूर्ण करने के लिए अपने भक्त के समक्ष अपना मनोहररूप प्रकट किया।

यह रूप भक्तों के मन तथा नेत्रों को प्रमुदित करने वाला है।

अथ ह तमाविष्कृतभुजयुगलद्ठयं हिरण्मयं पुरुषविशेषं कपिशकौशेयाम्बरधरमुरसिविलसच्छीवत्सललामं दरवरवनरूहवनमालाच्छूर्यमृतमणिगदादिभिरुपलक्षितंस्फुटकिरणप्रवरमुकुटकुण्डलकटककटिसूत्रहारकेयूरनूपुराद्यड्रभूषणविभूषितमृत्विक्सदस्यगृहपतयो धना इवोत्तमधनमुपलभ्य सबहुमानमर्हणेनावनतशीर्षाण उपतस्थु:, ॥

३॥

अथ-तत्पश्चात्‌; ह--निश्चय ही; तम्‌--उसको; आविष्कृत-भुज-युगल-द्वयम्‌--जो चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए; हिरण्मयम्‌--अत्यन्त चमकीला; पुरुष-विशेषम्‌--समस्त जीवों में सर्वश्रेष्ठ, पुरुषोत्तम; कपिश-कौशेय-अम्बर-धरम्‌--रेशमी पीताम्बर धारणकिये; उरसि--वक्षस्थल पर; विलसत्‌---सुन्दर; श्रीवत्स-- श्रीवत्स नामक; ललामम्‌--चिह्युक्त; दर-वर--शंख से; वन-रुह--कमल पुष्प; बन-माला--वन पुष्पों की माला; अच्छूरि--चक्र; अमृत-मणि--कौस्तुभ मणि; गदा-आदिभि:--गदा तथा अन्यचिह्नों से; उपलक्षितम्‌--लक्षणों से युक्त होकर; स्फुट-किरण--तेजस्वी, किरण-मण्डित; प्रवर-- श्रेष्ठ; मुकुट--मुकुट, किरीट;कुण्डल--कर्णाभूषण, बालियाँ; कटक--कंकण; कटि-सूत्र--करधनी; हार--हार; केयूर--बाजूबंद; नूपुर--पाँवों में पहनाजाने वाला आभूषण, पायल; आदि--इत्यादि; अड़--शरीर के; भूषण--आभूषणों से; विभूषितम्‌-- अलंकृत; ऋत्विक्‌ --पुरोहितगण; सदस्य--पार्षद; गृह-पतय: --( तथा ) राजा नाभि; अधना:--निर्धन व्यक्ति; इब--सहृश; उत्तम-धनमू-- प्रचुरधनराशि; उपलभ्य--पाकर; स-बहु-मानम्‌--अत्यन्त सत्कार सहित; अर्हणेन--पूजा सामग्री से; अवनत--झुका कर;शीर्षाण:--अपने शिर ( मस्तकों ); उपतस्थु:--स्तुति की ।

भगवान्‌ विष्णु राजा नाभि के समक्ष चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए।

वे अत्यन्त तेजोमय थे औरसमस्त महापुरुषों में सर्वोत्तम प्रतीत होते थे।

वे अधोभाग में रेशमी पीताम्बर धारण किये हुए थे;उनके वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिह्न था, जो सदैव शोभा देता है।

उनके चारों हाथों में शंख, कमल,चक्र तथा गदा थे उनके गले में वनपुष्पों की माला तथा कौस्तुभमणि थी।

वे मुकुट, कुण्डल,कंकण, करधनी, मुक्ताहार, बाजूबंद, नूपुर तथा अन्य रत्नजटित आभूषणों से शोभित थे।

भगवान्‌ को अपने समक्ष देखकर राजा नाभि, उनके पुरोहित तथा पार्षद वैसा ही अनुभव कर रहेथे जिस प्रकार किसी निर्धन को सहसा अथाह धनराशि प्राप्त हुई हो जाए।

उन्होंने भगवान्‌ कास्वागत किया, आदरपूर्वक प्रणाम किया तथा स्तुति करके वस्तुएँ भेंट कीं।

ऋत्विज ऊचुःअर्हसि मुहुर्त्तमाईहणमस्माकमनुपथानां नमो नम इत्येतावत्सदुपशिक्षितं कोहईतिपुमान्प्रकृतिगुणव्यतिकरमतिरनीश ई श्वरस्य परस्य प्रकृतिपुरुषयोरगाक्तिनाभिर्नामरूपाकृतिभीरूपनिरूपणम्‌; सकलजननिकायवृजिननिरसनशिवतमप्रवरगुणगणैकदेशकथनाहते ॥

४-५॥

ऋत्विज: ऊचु:--ऋत्विजों ने कहा; अहंसि--( स्वीकार ) करें; मुहुः--पुनः पुनः; अहत्‌-तम-हे श्रेष्ठ पूज्य पुरुष; अर्हणम्‌--पूजा; अस्माकम्‌ू--हम सब की; अनुपथानाम्‌--जो आपके दास हैं; नमः--नमस्कार है; नम:ः--नमस्कार; इति--इस प्रकार;एतावत्‌--यहाँ तक; सतू- श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा; उपशिक्षितम्‌--सिखाये गये; क:ः--कौन; अर्हति--समर्थ है; पुमान्‌ू-- मनुष्य;प्रकृति-- भौतिक प्रकृति के; गुण--गुणों के; व्यतिकर--रूपान्तरों में; मतिः--जिसका मन ( मग्न है ); अनीश:--असमर्थ;ईश्वरस्थ-- भगवान्‌ के ; परस्थ--परम; प्रकृति-पुरुषयो:--तीनों गुणों के अन्तर्गत; अर्वाक्तनाभि:--जो वहाँ तक नहीं पहुँचतेअथवा जो इसी संसार के हैं; नाम-रूप-आकृतिभि:--नामों, रूपों तथा गुणों से; रूप--आपकी प्रकृति या स्थिति का;निरूपणम्‌--निश्चय करना; सकल--समस्त; जन-निकाय--मानव जाति का; वृजिन--पाप कर्म; निरसन--मिटाने वाले;शिवतम--अत्यन्त मंगलमय; प्रवर-- श्रेष्ठठम; गुण-गण--दिव्य गुणों का; एक-देश--एक अंश; कथनात्‌--कथन से; ऋते--केवल।

ऋत्विजगण इस प्रकार ईश्वर की स्तुति करने लगे--हे परम पूज्य, हम आपके दास मात्र हैं।

यद्यपि आप पूर्ण हैं, किन्तु अहैतुकी कृपावश ही सही, हम दासों की यत्किचित सेवा स्वीकारकरें।

हम आपके दिव्य रूप से परिचित नहीं हैं, किन्तु जैसा वेदों तथा प्रामाणिक आचार्यों ने हमेंशिक्षा दी है, उसके अनुसार हम आपको बारम्बार नमस्कार करते हैं।

जीवात्माएँ प्रकृति के गुणों के प्रति अत्यधिक आकर्षित होती हैं, अत: वे कभी भी पूर्ण नहीं हैं, किन्तु आप समस्त भौतिकअवधारणाओं से परे हैं।

आपके नाम, रूप तथा गुण सभी दिव्य हैं और व्यावहारिक बुद्धि कीकल्पना के परे हैं।

भला आपकी कल्पना कौन कर सकता है ? इस भौतिक जगत में हम केवलनाम तथा गुण देख पाते हैं।

हम आपको अपना नमस्कार तथा स्तुति अर्पित करने के अतिरिक्तऔर कुछ भी करने में समर्थ नहीं हैं।

आपके शुभ दिव्य गुणों के कीर्तन से समस्त मानव जातिके पाप धुल जाते हैं।

यही हमारा परम कर्तव्य है और इस प्रकार हम आपकी अलौकिक स्थितिको अंशमात्र ही जान सकते हैं।

'परिजनानुरागविरचितशबलसंशब्दसलिलसितकिसलयतुलसिकादूर्वाद्लू रैरपि सम्भूतया सपर्यया किलपरम परितुष्यसि ॥

६॥

परिजन--आपके सेवकों द्वारा; अनुराग--अत्यन्त आह्ाद से; विरचित--की गई; शबल--गदगद्‌ वाणी से; संशब्द--स्तुति से;सलिल--जल; सित-किसलय--नव कोपलों से युक्त वृंत्त ( पल्‍लव ); तुलसिका--तुलसीदल; दूर्वा-अड्डु रैः --( तथा ) नई उगीदूब से; अपि-- भी; सम्भूतया--किया गया; सपर्यया--पूजा द्वारा; किल--निस्सन्देह; परम--हे परमे श्वर; परितुष्यसि--संतुष्टहो जाते हो |

हे परमेश्वर, आप सभी प्रकार से पूर्ण हैं।

जब आपके भक्त गदगद्‌ वाणी से आपकी स्तुतिकरते हैं तथा आह्वादवश तुलसीदल, जल, पल्‍लव तथा दूब के अंकुर चढ़ाते हैं, तो आप निश्चयही परम सन्तुष्ट होते हैं।

अथानयापि न भवत इज्ययोरु भारभरया समुचितमर्थमिहोपलभामहे ॥

७॥

अथ--अन्यथा; अनया--यह; अपि-- भी; न--नहीं; भवत:-- आपका; इज्यया--यज्ञ द्वारा; उठ भार-भरया--तमाम सामग्री केभार से बोझिल; समुचितम्‌--वांछित, आवश्यक; अर्थम्‌--उपयोग; इह--यहाँ; उपलभामहे--हम देखते हैं|हमने आपकी पूजा में आपको अनेक वस्तुएँ अर्पित की हैं और आपके लिए अनेक यज्ञकिये हैं, किन्तु हम सोचते हैं कि आपको प्रसन्न करने के लिए इतने सारे आयोजनों की कोईआवश्यकता नहीं है।

आत्मन एवानुसवनमञ्जसाव्यतिरिकेण बोभूयमानाशेषपुरुषार्थस्वरूपस्य किन्तु नाथाशिषआशासानानामेतदभिसंराधनमात्रं भवितुमहति ॥

८ ॥

आत्मन:--अपने आप; एव--निश्चय ही; अनुसवनम्‌-- प्रत्येक क्षण; अज्जसा- प्रत्यक्ष; अव्यतिरिकेण--बिना व्यवधान के;बोभूयमान--वर्धमान; अशेष-- असीम; पुरुष-अर्थ --जीवन-लक्ष्य; स्व-रूपस्थ--आपका वास्तविक रूप; किन्तु--लेकिन;नाथ--हे ईश्व:; आशिष:--भौतिक सुख हेतु आशीर्वाद; आशासानानाम्‌--हम सबका जिन्हें सदैव कामना रहती है; एतत्‌--यह; अभिसंराधन-- आपका अनुग्रह प्राप्त करने के लिए; मात्रमू--केवल; भवितुम्‌ अहंति--हो सकता है।

आप में प्रतिक्षण प्रत्यक्षतया, स्वयमेव, निरन्तर एवं असीमतः जीवन के समस्त लक्ष्यों एवं ऐश्वर्यों की वृद्धि हो रही है।

दरअसल, आप स्वयं ही असीम सुख तथा आनन्द से युक्त हैं।

हेईश्वर, हम तो सदा ही भौतिक सुखों के फेर में रहते हैं।

आपको इन समस्त याज्ञिक आयोजनोंकी आवश्यकता नहीं है।

ये तो हमारे लिए हैं जिससे हम आपका आशीर्वाद पा सकें।

ये सारेयज्ञ हमारे अपने कर्म-फल के लिए किये जाते हैं और वास्तव में आपको इनकी कोईअवश्यकता ही नहीं है।

तद्यथा बालिशानां स्वयमात्मन: श्रेयः परमविदुषां परमपरमपुरुष प्रकर्षकरुणया स्वमहिमानंचापवर्गाख्यमुपकल्पयिष्यन्स्वयं नापचित एवेतरवदिहोपलक्षितः ॥

९॥

तत्‌--वह; यथा--जिस प्रकार; बालिशानामू--मूर्खो का; स्वयम्‌--स्वयं; आत्मन:--अपना; श्रेय:--कल्याण; परम्‌--परम;अविदुषाम्‌--अज्ञानियों का; परम-परम-पुरुष--हे ईश्वरों के भी ईश, इशाधीश; प्रकर्ष-करुणया--प्रभूत अहैतुक करुणावश;स्व-महिमानम्‌--अपनी व्यक्तिगत महिमा; च--तथा; अपवर्ग-आख्यम्‌--- अपवर्ग ( मुक्ति ) कहलाने वाली; उपकल्पयिष्यन्‌ --देने की इच्छा से; स्वयम्‌--स्वयं; न अपचित:--समुचित रीति से पूजा न होने से; एब--यद्यपि; इतर-वत्‌--सामान्य पुरुष कीभाँति; हह--यहाँ; उपलक्षित:--( आप ) हैं और ( हमारे द्वारा ) देखे जा रहे हैं।

हे ईशाधश, हम धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष से पूर्णतया अनजान हैं क्योंकि हमें जीवन-लक्ष्य का ठीक से पता नहीं है।

आप यहाँ हमारे समक्ष साक्षात्‌ इस प्रकार प्रकट हुए हैं जिसप्रकार कोई व्यक्ति जानबूझ कर अपनी पूजा कराने के लिए आया हो।

किन्तु ऐसा नहीं है, आपतो इसलिए प्रकट हुए हैं जिससे हम आपके दर्शन कर सकें।

आप अपनी अगाध तथा अहैतुकीकरुणावश हमारा उद्देश्य पूरा करने, हमारा हित करने तथा अपवर्ग का लाभ प्रदान करने हेतुप्रकट हुए हैं।

हम अपनी अज्ञानता के कारण आपकी ठीक से उपासना भी नहीं कर पा रहे हैं, तोभी आप पधरे हैं।

अथायमेव वरो ह्ईत्तम यर्हि बर्हिषि राजर्षेवरदर्षभो भवान्निजपुरुषेक्षणविषय आसीतू ॥

१०॥

अथ--तब; अयम्‌--यह; एब--निश्चय ही; वर:--आशीर्वाद; हि--निस्सन्देह; अर्हत्‌ू-तम--पूज्यतम; यहिं-- क्योंकि;बर्हिषि--यज्ञ में; राज-ऋषे: --राजा नाभि का; वरद-ऋषभ: --वरदायकों में श्रेष्ठ; भवान्‌--आप; निज-पुरुष--अपने भक्तोंके; ईक्षण-विषय:--देखने योग्य वस्तु; आसीत्‌--हो गई है?

हे पूज्यतम, आप समस्त वरदायकों में श्रेष्ठ हैं और राजर्षि नाभि की यज्ञशाला में आपकाप्राकट्य हमें आशीर्वाद देने के लिए हुआ है।

चूँकि हम आपको देख पाये हैं इसलिए आपने हमेंसर्वाधिक मूल्यवान वर प्रदान किया है।

असड्डनिशितज्ञानानलविधूताशेषमलानां भवत्स्वभावानामात्मारामाणां मुनीनामनवरतपरिगुणितगुणगण'परममडुलायनगुणगणकथनोसि ॥

११॥

असड्ग--वैराग्य से; निशित--हढ़ किया है; ज्ञान--ज्ञान की; अनल--अग्नि से; विधूत--हटाया गया; अशेष--असीम;मलानाम्‌--जिनकी मलिन वस्तुएँ; भवत्‌-स्वभावानाम्‌ू--जिन्होंने आपके गुण प्राप्त कर लिए हैं; आत्म-आरामाणाम्‌--जोआत्म-तुष्ट है, आत्माराम; मुनीनाम्‌--मुनियों का; अनवरत--लगातार, निरन्तर; परिगुणित--स्मरण करते; गुण-गण--जिसकेसदगुण समूह; परम-मड्भगल--परम-आनन्द; आयन--उत्पन्न करता है; गुण-गण-कथन:--जिसके लक्षणों का जप; असि--तुमहो?

हे ईश्वर, समस्त विचारवान मुनि तथा साधु पुरुष निरन्तर आपके दिव्य गुणों का गान करते रहते हैं।

इन मुनियों ने अपनी ज्ञान-अग्नि से अपार मलराशि को पहले ही दग्ध कर दिया है औरइस संसार से अपने वैराग्य को सुदृढ़ किया है।

इस प्रकार वे आपके गुणों को ग्रहण कर आत्म-तुष्ट हैं।

तो भी जिन्हें आपके गुणों के गान में परम-आनन्द आता है उनके लिए भी आपका दर्शनदुर्लभ है।

अथ कथशज्ञित्स्खलनक्षुत्पतनजुृम्भणदुरवस्थानादिषु विवशानां न: स्मरणाय ज्वरमरणद्शायामपिसकलकश्मलनिरसनानि तव गुणकृतनामधेयानि वचनगोचराणि भवन्तु ॥

१२॥

अथ--अब भी; कथश्ञित्‌--किसी प्रकार से; स्खलन--ठोकर खाने; क्षुत्‌ू-- भूख; पतन--गिरने; जुम्भण--जम्हाई लेने;दुरवस्थान--प्रतिकूल स्थिति में रहने के कारण; आदिषु--इत्यादि; विवशानाम्‌-- असमर्थ; न:--हम सबका; स्मरणाय--यादरखने; ज्वर-मरण-दशायाम्‌--मृत्यु के समय तेज ज्वर की दशा में; अपि-- भी; सकल--समस्त; कश्मल--पाप; निरसनानि--दूर करने वाले; तब--तुम्हारे; गुण--गुण; कृत--कर्म; नामधेयानि--नाम; वचन-गोचराणि---उच्चरित हो सकने वाले;भवन्तु--हो सकें?

हे ईश्वर, सम्भव है कि हम कँपकँपाने, भूखे रहने, गिरने, जम्हाई लेने या ज्वर के कारणमृत्यु के समय शोचनीय रुग्ण अवस्था में रहने के कारण आपके नाम का स्मरण न कर पाएँ।

अतः हे ईश्वर, हम आपकी स्तुति करते हैं क्योंकि आप भक्तों पर वत्सल रहते हैं।

आप हमें अपनेपवित्र नाम, गुण तथा कर्म को स्मरण कराने में सहायक हों जिससे हमारे पापी जीवन के सभीपाप दूर हो जाँय।

किश्ञायं राजर्षिरपत्यकाम: प्रजां भवाहशीमाशासान ई श्वरमाशिषां स्वर्गापवर्गयोरपि भवन्तमुपधावतिप्रजायामर्थप्रत्ययो धनदरमिवाधन: फलीकरणम्‌ ॥

१३॥

किज्ञ--इसके अतिरिक्त; अयम्‌--यह; राज-ऋषि:--पवित्र राजा ( नाभि ); अपत्य-काम:--सन्तान का इच्छुक; प्रजामू--एकपुत्र; भवाहशीम्‌-- आपके ही सहश; आशासान:--आश्ा युक्त; ईश्वरम्‌--परम नियन्ता; आशिषाम्‌--आशीर्वादों का; स्वर्ग-अपवर्गयो:--स्वर्ग लोक तथा मुक्ति का; अपि--यद्यपि; भवन्तम्‌-- आपको; उपधावति--उपासना करता है; प्रजायाम्‌--लड़के-बच्चे, सन्तान; अर्थ-प्रत्यय:--जीवन का परम लक्ष्य मानते हुए; धन-दम्‌--दानी को; इब--सदह्ृश; अधन:--निर्धनपुरुष; फलीकरणम्‌-- थोड़ी सी भूसी?

हे ईश्वर, आपके समक्ष ये महाराज नाभि, हैं जिनके जीवन का परम लक्ष्य आपके ही समानपुत्र प्राप्त करना है।

हे भगवन्‌, उसकी स्थिति उस व्यक्ति जैसी है, जो एक अत्यन्त धनवान पुरुषके पास थोड़ा सा अन्न माँगने के लिए जाता है।

पुत्रेच्छा से ही वे आपकी उपासना कर रहे हैंयहायपि आप उन्हें कोई भी उच्चस्थ पद प्रदान कर सकने में समर्थ हैं--चाहे वह स्वर्ग हो याभगवद्धाम का मुक्ति-लाभ ॥

को वा इह तेडपराजितोपराजितयामाययानवसितपदव्यानावृतमतिर्विषयविषरयानावृतप्रकृतिरनुपासितमहच्चरण: ॥

१४॥

'कः वा--ऐसा कौन पुरुष है; इह--संसार में; ते--तुम्हारा ( श्रीभगवान्‌ का ); अपराजित:--न पराजित हो सकने वाला;अपराजितया--अपराजित द्वारा; मायया--माया के द्वारा; अनवसित-पदव्य--जिसका पथ निर्दिष्ट न किया जा सके; अनावृत-मतिः--जिसकी बुद्धि मोहग्रस्त नहीं है; विषय-विष--विष तुल्य भौतिक सुख का; रय--पथ से होकर; अनावृत--खुला हुआ;प्रकृतिः--जिसका स्वभाव; अनुपासित--विना उपासना किये; महत्‌-चरण:--परम भक्तों के चरणकमल।

हे ईश्वर, जब तक मनुष्य परम भक्तों के चरणकमलों की उपासना नहीं करता, तब तक उसेमाया परास्त करती रहेगी और उसकी बुद्धि मोहग्रस्त बनी रहेगी।

दरअसल, ऐसा कौन है जोविष तुल्य भौतिक सुख की तरंगों में न बहा हो! आपकी माया दुर्जेय है।

न तो इस माया के पथको कोई देख सकता है, न इसकी कार्य-प्रणाली को ही कोई बता सकता है।

यदु ह वाव तव पुनरदश्रकर्तरिह समाहूतस्तत्रार्थधियां मन्दानां नस्तद्यद्देवहेलनं देवदेवाहसि साम्येनसर्वान्प्रतिवोढुमविदुषाम्‌ ॥

१५॥

यत्‌--क्योंकि; उ ह वाव--निस्संदेह; तब--तुम्हारा; पुन:--फिर; अद्न-कर्त:--हे ईश्वर, जो अनेक कर्म करता है; इह--यहाँ,इस-स्थल में; समाहूत:--आमंत्रित; तत्र--अतः; अर्थ-धियाम्‌-- भौतिक कामनाओं को पूरा करने के लिए इच्छुक;मन्दानाम्‌ू--कम बुद्धि वाले, मूढ़; नः--हम सबका; तत्‌--वह; यत्‌--जो; देव-हेलनम्‌-- भगवान्‌ की अवहेलना; देव-देव--परम देव; अर्हसि--जो पसन्द आए; साम्येन--समभाव के कारण; सर्वान्‌ू--सब कुछ; प्रतिवोढुम्‌--सहने करते हैं;अविदुषाम्‌--हम अल्प ज्ञानियों का।

हे ईश्वर, आप अनेक अद्भुत कार्य कर सकने में समर्थ हैं।

इस यज्ञ के करने का हमाराएकमात्र लक्ष्य पुत्र प्राप्त करना था, अतः हमारी बुद्धि अधिक प्रखर नहीं है।

हमें जीवन-लक्ष्यनिर्धारित करने का कोई अनुभव नहीं है।

निसन्देह भौतिक लक्ष्य की प्राप्ति हेतु किये गये इसतुच्छ यज्ञ में आपको आमंत्रित करके हमने आपके चरण कमलों में महान्‌ पाप किया है।

अतः हेसर्वेश, आप अपनी अहैतुकी कृपा तथा समद्ृष्टि के कारण हमें क्षमा करें।

श्रीशुक उबाचइति निगदेनाभिष्टूयमानो भगवाननिमिषर्षभो वर्षधराभिवादिताभिवन्दितचरण: सदयमिदमाह ॥

१६॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; निगदेन--गद्य स्तुति द्वारा; अभिष्टयमान: --आराधितहोकर; भगवान्‌-- भगवान्‌; अनिमिष-ऋषभ: -- समस्त देवताओं में प्रमुख; वर्ष-धर-- भारतवर्ष के सम्राट्‌ राजा नाभिद्वारा;अभिवादित--पूजित होकर; अभिवन्दित--झुककर; चरण:--जिनके पाँव; सदयम्‌--कृपापूर्वक; इदम्‌--यह; आह--कहा।

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--भारतवर्ष के सम्राट, राजा नाभि द्वारा पूजित ऋत्विजों ने गद्यमें ( सामान्यतः पद्य में ) ईश्वर की स्तुति की और वे सभी उनके चरणकमलों पर झुक गये।

देवताओं के अधिपति, परमेश्वर उनसे अत्यन्त प्रसन्न हुए और वे इस प्रकार बोले।

श्रीभगवानुवाचअहो बताहमृषयो भवद्धिरवितथगीर्भिर्वरमसुलभमभियाचितो यदमुष्यात्मजो मया सहृशो भूयादितिममाहमेवाभिरूप: कैवल्यादथापि ब्रह्मवादो न मृषा भवितुमहति ममैव हि मुखं यद्द््‌वजदेवकुलम्‌, ॥

१७॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; अहो--ओह; बत--सचमुच प्रसन्न हूँ; अहम्‌--मैं; ऋषय:--हे ऋषियो; भवद्धि:--आपलोगों के द्वारा; अवितथ-गीर्भि:--जिनके वचन सत्य हैं; वरम्‌ू--वर पाने के लिए; असुलभम्‌-प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है;अभियाचितः--याचना किया हुआ; यत्‌--वह; अमुष्य--राजा नाभि का; आत्म-जः--पुत्र; मया सहश:--मेरे समान;भूयात्‌--हो; इति--इस प्रकार; मम--मेरा; अहम्‌--मैं; एबव--केवल; अभिरूप:--समान; कैवल्यात्‌--अद्वितीय; अथापि--तो भी; ब्रह्म-वाद: --ब्राह्मणों के वचन; न--नहीं; मृषा--झूठे; भवितुम्‌--होना; अहति--चाहिए; मम--मेरा; एब--निश्चयही; हि--चूँकि; मुखम्‌--मुख; यत्‌--वह; द्विज-देव-कुलम्‌-शुद्ध ब्राह्मणों का कुल।

भगवान्‌ बोले--हे ऋषियो, मैं आपकी स्तुतियों से परम प्रसन्न हुआ हूँ।

आप सभी सत्यवादीहैं।

आप लोगों ने राजा नाभि के लिए मेरे समान पुत्र की प्राप्ति के लिए स्तुति की है, किन्तु ऐसापाना अति दुर्लभ है।

चूँकि मैं अद्वितीय परम पुरुष हूँ और मेरे समान अन्य कोई नहीं है, अतःमुझ जैसा पुरुष पाना सम्भव नहीं है।

तो भी आप सभी सयोग्य ब्राह्मण हैं, आपका वचन मिथ्यासिद्ध नहीं होना चाहिए।

मैं सुयोग्य ब्राह्मणों को अपने मुख के समान उत्तम मानता हूँ।

तत आग्नीश्चीयेडंशकलयावतरिष्याम्यात्मतुल्यमनुपलभमानः ॥

१८॥

ततः--अतः; आग्नीक्षीये--आग्नीश्र के पुत्र नाभि की स्त्री में; अंश-कलया--अपने रूप के एक अंश द्वारा; अवतरिष्यामि--मैंस्वयं अवतार लूँगा; आत्म-तुल्यम्‌--अपने ही समान; अनुपलभमान:--न पाकर।

चूँकि मुझे अपने तुल्य और कोई नहीं मिल पा रहा, इसलिए मैं स्वयं ही अंश रूप मेंआग्नीक्ष के पुत्र महाराज नाभि की पत्नी मेरुदेवी के गर्भ से अवतार लूँगा।

श्रीशुक उबाचइति निशामयन्त्या मेरुदेव्या: पतिमभिधायान्तर्दधे भगवान्‌, ॥

१९॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; निशामयन्त्या: --सुनते हुए; मेरुदेव्या:--मेरुदेवी के समक्ष;पतिम्‌--उसके पति को; अभिधाय--कहकर; अन्तर्दधे--अन्‍्तर्धान हो गये; भगवान्‌ू-- भगवान्‌ |

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--ऐसा कहकर भगवान्‌ अदृश्य हो गये।

राजा नाभि कीपली मेरुदेवी अपने पति के पास में ही बैठी थीं, फलस्वरूप परमेश्वर ने जो कुछ कहा था उसे वेसुन रही थीं।

बर्हिषि तस्मिन्नेव विष्णुदत्त भगवान्परमर्षिभि: प्रसादितो नाभे: प्रियचिकीर्षया तदवरोधायने मेरुदेव्यांधर्मान्दर्शयितुकामो वातरशनानां श्रमणानामृषीणामूर्ध्वमन्थिनां शुक्लया तनुवावततार ॥

२०॥

बर्हिषि--यज्ञ स्थल में; तस्मिन्‌ू--उस; एव--इस प्रकार; विष्णु-दत्त--हे महाराज परीक्षित; भगवान्‌-- भगवान्‌; परम-ऋषिभि:--महर्षियों द्वारा; प्रसादित:--प्रसन्न किये जाने पर; नाभे: प्रिय-चिकीर्षया--राजा नाभि को प्रसन्न करने के लिए; ततू-अवरोधायने--अपनी पत्नी में; मेरुदेव्यामू--मेरुदेवी में; धर्मानू-- धार्मिक नियम; दर्शायितु-काम:--यह दिखाने के लिए किकिस प्रकार करना चाहिए; वात-रशनानामू--संन्यासियों का ( जो वस्त्र नहीं धारण करते ); श्रमणानाम्‌ू--वानपप्रस्थियों का;ऋषीणाम्‌--ऋषियों का; ऊर्ध्व-मन्थिनामू--ब्रह्मचचारियों का; शुक्लया तनुवा--उनके आद्य सत्‌ स्वरूप में, जो गुणों के परे है;अवततार--अवतार लिया?

हे विष्णुदत्त परीक्षित महाराज, उस यज्ञ के ऋषियों से भगवान्‌ अत्यन्त प्रसन्न हुए।

फलस्वरूप उन्होंने स्वयं धर्माचरण करके दिखलाने ( जैसा कि ब्रह्मचारी, संन्‍्यासी, वानप्रस्थ तथा गृहस्थ करते हैं) और महाराज नाभि की मनोकामना को पूरा करने का निश्चय किया।

अतःवे अपने गुणातीत आद्य सत्व रूप में मेरुदेवी के पुत्र के रूप में प्रकट हुए।

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