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अध्याय चार: भगवान ऋषभदेव के लक्षण

5.4श्रीशुक उवाचअथ ह ततमुत्पत्त्यवाभिव्यज्यमानभगवल्लक्षणंसाम्योपशमवैराग्यै श्वरर्यमहाविभूतिभिरनुदिनमेधमानानु भावंप्रकृतयः प्रजा ब्राह्मणा देवताश्नावनितलसमवनायातितरां जगृधु: ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ ह--इस प्रकार ( भगवान्‌ के प्रकट होने के अनन्तर ); तम्‌--उसको;उत्पत्त्या--आविर्भाव काल से; एव--ही; अभिव्यज्यमान-- प्रकट रूप में; भगवत्‌-लक्षणम्‌--भगवान्‌ जैसे लक्षणों से युक्त;साम्य--समभाव वाला; उपशम--इन्द्रियों तथा मन को वश में करते समय पूर्णतया शान्त; वैराग्य--गृहत्याग; ऐश्वर्य--ऐश्वर्य;महा-विभूतिभि:--महान्‌ गुणों के कारण; अनुदिनम्‌--दिन-प्रतिदिन; एधमान--बढ़ता हुआ; अनुभावम्‌--उसकी शक्ति;प्रकृतथः--मंत्रीगण; प्रजा:-- प्रजा, नागरिक; ब्राह्मणा:--ब्रह्म को जानने वाले विद्वान; देवता:--देवतागण; च--तथा;अवनि-तल--पृथ्वी पर; समवनाय--शासन करने के लिए; अतितराम्‌--उत्कट; जगृधु:--अभिलाषा होने लगी।

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--जन्म से ही महाराज नाभि के पुत्र में भगवान्‌ के लक्षणप्रकट थे, यथा चरणतल के चिह्न ( ध्वज, वज्ञ इत्यादि )।

यह पुत्र सबों के साथ समभावरखनेवाला और अत्यन्त शान्त स्वभाव का था।

यह अपनी इन्द्रियों तथा मन को वश में करसकता था और परम ऐश्वर्यवान होने के कारण उसे भौतिक सुख की लिप्सा नहीं थी।

इन समस्तगुणों से सम्पन्न होने के कारण महाराज नाभि का पुत्र दिनोंदिन शक्तिशाली बनता गया।

फलतःसमस्त नागरिकों, दिद्वान ब्राह्मणों, देवताओं तथा मंत्रियों ने चाहा कि ऋषभदेव पृथ्वी के शासकबनें।

तस्य ह वा इत्थं वर्ष्षणा वरीयसा बृहच्छूलोकेन चौजसा बलेन थ्रिया यशसा वीर्यशौर्या भ्यां च पिताऋषभ इतीदं नाम चकार ॥

२॥

तस्य--उसके ; ह वा--निश्चय ही; इत्थम्‌--इस प्रकार; वर्ष्षणा--रंग-रूप से; वरीयसा-- श्रेष्ठ; बृहत्‌ू-श्लोकेन--कवियों द्वारावर्णित समस्त उत्तम गुणों से अलंकृत; च-- भी; ओजसा--शौर्य से; बलेन--बल से; भ्रिया--सुन्दरता से; यशसा--यश से;वीर्य-शौर्याभ्याम्‌-- प्रभाव तथा वीरता से; च--तथा; पिता--महाराज नाभि ने; ऋषभ: -- श्रेष्ठ; इति--इस प्रकार; इदम्‌--यह;नाम--नाम; चकार--रखा।

जब महाराज नाभि का पुत्र प्रकट हुआ, तो उसमें महाकवियों द्वारा वर्णित समस्त उत्तम गुणदिखाई पड़े यथा ईश्वर के लक्षणों से युक्त सुगठित शरीर, शौर्य, बल, सुन्दरता, नाम, यश,प्रभाव तथा उत्साह ।

जब उसके पिता महाराज नाभि ने इन समस्त गुणों को देखा, तो उसे मनुष्योंमें श्रेष्ठठम अथवा सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति मान कर उसका नाम ऋषभ रख दिया।

यस्य हीन्द्र: स्पर्धभानो भगवान्वर्षे न बवर्ष तदवधार्य भगवानृषभदेवो योगेश्वर: प्रहस्थात्मयोगमाययास्ववर्षमजनाभं नामाभ्यवर्षतू, ॥

३॥

यस्य--जिसका; हि--निस्संदेह; इन्द्र: --स्वर्ग का राजा इन्द्र; स्पर्धभान: --ईर्ष्या के कारण; भगवान्‌--परम ऐश्वर्यवान; वर्षे--भारतवर्ष में; न बवर्ष--वर्षा नहीं की; तत्‌--वह; अवधार्य--जानते हुए; भगवान्‌-- भगवान; ऋषभदेव: --ऋषभदेव; योग-ईश्वरः--समस्त योग के स्वामी; प्रहस्थ--हँसते हुए; आत्म-योग-मायया--अपने आत्मबल से; स्व-वर्षम्‌--अपने देश पर;अजनाभम्‌--अजनाभ; नाम--नामक; अभ्यवर्षत्‌--जल की वर्षा की |

भौतिक रूप से महान्‌ ऐश्वर्यशाली स्वर्ग का राजा इन्द्र राजा ऋषभदेव से ईर्ष्या करने लगा।

अतः उसने भारतवर्ष नामक लोक पर जल बरसाना बन्द कर दिया।

उस समय समस्त योगों केस्वामी भगवान्‌ ऋषभदेव इन्द्र का प्रयोजन समझ गये और थोड़ा मुस्काये।

तब उन्होंने अपने शौर्य तथा योगमाया से अजनाभ नाम से विख्यात अपने देश में अत्यधिक वर्षा की।

नाभिस्तु यथाभिलषितं सुप्रजस्त्वमवरु ध्यातिप्रमोदभरविह्नलो गद्गदाक्षरया गिरा स्वैरंगृहीतनरलोकसधर्म भगवन्तं पुराणपुरुषं मायाविलसितमतिर्वत्स तातेति सानुरागमुपलालयन्परांनिर्वृतिमुपगत: ॥

४॥

नाभिः--राजा नाभि; तु--निश्चय ही; यथा-अभिलषितम्‌--इच्छानुसार; सु-प्रजस्त्वम्‌-- अत्यन्त सुन्दर पुत्र; अवरुध्य--पाकर;अति-प्रमोद--अत्यधिक प्रसन्नता; भर--की अति से; विह्लः--विभोर होकर; गद्गद-अक्षरया--आह्ाद में शब्द न निकलनेसे; गिरा--वाणी से; स्वैरम्‌--स्वेच्छा से; गृहीत--स्वीकार किया; नर-लोक-सधर्मम्‌--मनुष्य की भाँति आचरण करके;भगवन्तमू-- श्री भगवान्‌ को; पुराण-पुरुषम्‌--जीवों में सर्वाधिक वय वाले; माया--योगमाया से; विलसित--मोह ग्रस्त;मति:--उसकी मति; वत्स--प्रिय पुत्र; तात--मेरे प्रिय; इति--इस प्रकार; स-अनुरागम्‌--अत्यन्त प्यार सहित; उपलालयनू--लालन-पालन करते हुए; पराम्‌--दिव्य; निर्वृतिमू--आनन्द; उपगत:--प्राप्त किया |

अपनी इच्छानुसार श्रेष्ठ पुत्र पाकर राजा नाभि दिव्य आनन्द के कारण विहल और पुत्र केप्रति अत्यन्त वत्सल हो उठे।

उन्होंने गद्गद्‌ वाणी से उसे 'मेरे प्रिय पुत्र! मेरे प्यारे!' शब्दों सेसम्बोधित किया।

ऐसी बुद्धि योगमाया से उत्पन्न हुई जिसके कारण उन्होंने परम पिता भगवान्‌को अपने पुत्र रूप में स्वीकार किया।

ईश्वर भी अपनी परमेच्छा के कारण उनके पुत्र बने औरसबों के साथ ऐसा व्यवहार किया जैसे वे कोई सामान्य मनुष्य हो।

इस प्रकार वे अपने दिव्य पुत्रका बड़े ही लाड़-प्यार से लालन-पालन करने लगे और वे दिव्य आनन्द, हर्ष तथा भक्ति सेभावविभोर हो गये।

विदितानुरागमापौरप्रकृति जनपदो राजा नाभिरात्मजं समयसेतुरक्षायामभिषिच्य ब्राह्मणेषूपनिधाय सहमेरुदेव्या विशालायां प्रसन्ननिपुणेन तपसा समाधियोगेन नरनारायणाख्यं भगवन्तं वासुदेवमुपासीनःकालेन तन्महिमानमवाप ॥

५॥

विदित--भलीभाँति ज्ञात; अनुरागमू--लोकप्रियता; आपौर-प्रकृति--समस्त नागरिकों तथा प्रशासकों के बीच; जन-पदः--सामान्य जनों की सेवा की इच्छा से; राजा--राजा; नाभि:--नाभि; आत्मजम्‌-- अपने पुत्र को; समय-सेतु-रक्षायाम्-- धार्मिकजीवन के वैदिक नियमों के अनुसार जनता की रक्षा करते हुए; अभिषिच्य--राज्याभिषेक करके; ब्राह्मणेषु--ब्राह्मणों को;उपनिधाय--सौंप कर; सह--साथ; मेरुदेव्या--अपनी पत्नी मेरुदेवी के साथ मेरुदेवी; विशालायाम्‌--बदरिका श्रम में; प्रसन्न-निपुणेन--अत्यन्त संतोष एवं निपुणता के साथ रहते हुए; तपसा--तपस्या से; समाधि-योगेन--पूर्ण समाधि से; नर-नारायण-आख्यम्‌--नर-नारायण नामक; भगवन्तम्‌-- भगवान्‌; वासुदेवम्‌-- श्रीकृष्ण को; उपासीन: --उपासना करते हुए; कालेन--'कालक्रम से; तत्‌-महिमानम्‌--महिमामय धाम, वैकुण्ठ लोक को; अवाप--प्राप्त किया ?

राजा नाभि ने समझ लिया था कि उनका पुत्र ऋषभदेव नागरिकों, प्रशासकों तथा मंत्रियों मेंअत्यन्त लोकप्रिय है।

अतः उन्होंने वैदिक धर्म-पद्धति अनुसार जनता की रक्षा के उद्देश्य से अपने पुत्र को संसार के सप्राट के रूप में अभिषिक्त कर दिया और उसे विद्वान ब्राह्मणों के हाथों मेंसौप दिया जो शासन चलाने में उसका मार्ग-दर्शन कर सकें।

फिर महाराज नाभि अपनी पत्नीमेरुदेवी के साथ हिमालय पर्वत स्थित बदरिका श्रम में गये और वहाँ पर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वकएवं निपुणता के साथ तपस्या में लग गये।

पूर्ण समाधि में उन्होंने कृष्ण के ही अंश रूप भगवान्‌नर-नारायण की उपासना की, अतः कालक्रम में महाराज नाभि को वबैकुण्ठ प्राप्त हुआ।

यस्य ह पाण्डवेय श्लोकाबुदाहरन्ति--को नु तत्कर्म राजर्षेनाभिेरन्वाचरेत्पुमान्‌ ।

अपत्यतामगाद्यस्य हरिः शुद्धेन कर्मणा ॥

६॥

यस्य--जिसके; ह--निस्सन्देह; पाण्डवेय--वह महाराज परीक्षित; शलोकौ--दो श्लोक; उदाहरन्ति--सुनाते हैं; कः--कौन;नु--तब; तत्‌--वह; कर्म--कार्य; राज-ऋषे: --पवित्र राजा; नाभेः--नाभि का; अनु--अनुगमन करते हुए; आचरेत्‌--आचरण कर सकता था; पुमान्‌--मनुष्य; अपत्यताम्‌--पृत्रत्व, पुत्र बनना; अगात्‌--स्वीकार किया; यस्य--जिसका; हरि: --भगवान्‌ ने; शुद्धेन--पवित्र; कर्मणा--कर्म से?

हे महाराज परीक्षित, महाराज नाभि के यशोगान में प्राचीन मुनियों ने दो एलोक रचे।

उनमेंसे एक यह है, 'महाराज नाभि जैसी सिद्धि अन्य कौन प्राप्त कर सकता है? उनके कर्मों तककौन पहुँच सकता है ? उनकी भक्ति के कारण भगवान्‌ ने उनका पुत्र बनना स्वीकार किया।

'ब्रह्मण्याउन्य: कुता नाभावप्रा मड्लपूजता: ।

यस्य बर्हिषि यज्ञेशं दर्शयामासुरोजसा ॥

७॥

ब्रह्मण्य:--ब्राह्मण-भक्त; अन्य: --कोई दूसरा; कुत:ः--कहाँ है; नाभेः--महाराज नाभि के अतिरिक्त; विप्रा:--ब्राह्मण समुदाय;मड्डल-पूजिता:-- भली भाँति उपासित एवं तुष्ट; यस्थ--जिसका; बर्हिषि--यज्ञ-स्थल में; यज्ञ-ईशम्‌--समस्त यज्ञों के भोक्ता,श्रीभगवान्‌; दर्शयाम्‌ आसु:--दर्शन कराया; ओजसा--अपनी ब्राह्म शक्ति से |

[दूसरी स्तुति इस प्रकार है 'महाराज नाभि से बढ़कर ब्राह्मणों का उपासक ( भक्त ) कौनहो सकता है? चूँकि राजा ने योग्य ब्राह्मणों को पूजा से पूर्णतया सन्तुष्ट कर दिया था, इसलिएअपने ब्राह्म-तेज से उन्होंने महाराज नाभि को भगवान्‌ नारायण का साक्षात्‌ दर्शन करा दिया।

अथ ह भगवानृषभदेव: स्ववर्ष कर्मक्षेत्रमनुमन्यमान: प्रदर्शितगुरुकुलवासो लब्धवरैर्गुरुभिरनुज्ञातोगृहमेधिनां धर्माननुशिक्षमाणो जयन्त्यामिन्द्रदत्तायामुभयलक्षणं कर्मसमाम्नायाम्नातमभियुज्न्नात्मजानामात्मसमानानां शतं जनयामास ॥

८॥

अथ--ततक्‍्पश्चात्‌ ( अपने पिता के प्रयाण के पश्चात्‌ ); ह--निस्संदेह; भगवान्‌ू-- भगवान्‌; ऋषभ-देव: --ऋषभदेव; स्व--अपना; वर्षम्‌--राज्य; कर्म-द्षेत्रमू--कार्य-क्षेत्र; अनुमन्यमान:--के रूप में स्वीकार करते हुए; प्रदर्शित--उदाहरणस्वरूपदिखाया गया; गुरु-कुल-वास:--गुरुकुल में रहते हुए; लब्ध--प्राप्त करके; वरैः--वरदान; गुरुभि: --गुरुओं से; अनुज्ञात:--आदेशित होकर; गृह-मेधिनाम्‌--गृहस्थों के; धर्मान्‌--कर्तव्य; अनुशिक्षमाण:--उदाहरण द्वारा शिक्षा प्रदत्त; जयन्त्याम्‌ू--अपनीपती जयन्ती से; इन्द्र-दत्तायाम्‌-- भगवान्‌ इन्द्र द्वारा प्रदत्त; उभय-लक्षणम्‌--दोनों प्रकार के; कर्म--कर्म; समाम्नायाम्नातम्‌--शान्त्तरों में वर्णित; अभियुद्धन्‌ू--करते हुए; आत्मजानाम्‌--पुत्रों को; आत्म-समानानाम्‌--अपने ही समान; शतम्‌--एक सौ;जनयाम्‌ आस--उत्पन्न किया?

महाराज नाभि के बदरिकाश्रम प्रस्थान के पश्चात्‌ परम ईश ऋषभदेव ने अपने राज्य को हीअपना कर्मक्षेत्र समझा।

अतः उन्‍होंने सर्वप्रथम गुरुओं के निर्देश में ब्रह्मचर्य स्वीकार करकेअपना दृष्टान्त प्रस्तुत करते हुए गृहस्थ के कर्तव्यों की शिक्षा दी।

वे गुरुकुल में वास करने भीगये।

शिक्षा पूरी होने पर उन्होंने गुरु-दक्षिणा दी और तब गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट हुए।

उन्होंनेजयन्ती नामक पतली ग्रहण की और उससे एक सौ पुत्र उत्पन्न किये जो उनके ही समान बलवानतथा योग्य थे।

उनकी पत्नी जयन्ती स्वर्ग के राजा इन्द्र द्वारा उन्हें भेंट में दी गई थी।

ऋषभदेव तथा जयन्ती ने श्रुति तथा स्मृति शास्त्र द्वारा निर्दिष्ट अनुष्ठानों का पालन करते हुए गृहस्थ जीवनका आदर्श प्रस्तुत किया।

येषां खलु महायोगी भरतो ज्येष्ठ: श्रेष्टणगुण आसीद्येनेदं वर्ष भारतमिति व्यपदिशन्ति ॥

९॥

येषाम्‌--जिनमें से; खलु--निश्चय ही; महा-योगी--ईश्वर का महान्‌ भक्त; भरत:-- भरत; ज्येष्ठ:--सब से बड़ा; श्रेष्ठ-गुण:--उत्तम गुणों से सम्पन्न; आसीत्‌-- था; येन--जिसके द्वारा; इदम्‌--यह; वर्षम्‌--लोक, देश; भारतम्‌-- भारत; इति--इस प्रकार;व्यपदिशन्ति--लोग कहते हैं।

ऋषभदेव के सौ पुत्रों में से सबसे बड़े पुत्र का नाम भरत था, जो श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न महान्‌भक्त था।

उसी के सम्मान में इस लोक को भारतवर्ष कहते हैं।

तमनु कुशावर्त इलावर्तो ब्रह्मावर्तो मलय: केतुर्भद्रसेन इन्द्रस्पृग्विदर्भ: कीकट इति नव नवतिप्रधाना: ॥

१०॥

तम्‌--उसको; अनु-- अनुसरण करते हुए; कुशावर्त--कुशावर्त; इलावर्त:--इलावर्त; ब्रह्मावर्त:--ब्रह्मावर्त; मलय:--मलय;केतु:ः--केतु; भद्ग-सेन: -- भद्ग सेन; इन्द्र-स्पूकू--इन्द्रस्पृक; विदर्भ:--विदर्भ; कीकट:--कीकट; इति--इस प्रकार; नव--नौ;नवति--नब्बे; प्रधाना:--से बड़े |

भरत के अतिरिक्त उनके निन्यानवे पुत्र और भी थे।

इनमें से नौ बड़े पुत्रों के नाम कुशावर्त,इलावर्त, ब्रह्मावर्त, मलय, केतु, भद्गसेन, इन्द्रस्पूकू, विदर्भ तथा कीकट थे।

कविर्दविरन्तरिक्ष: प्रबुद्ध: पिप्पलायन: ।

आविदोंत्रोथ द्रुमिलश्षमस: करभाजन: ॥

११॥

इति भागवतधर्मदर्शना नव महाभागवतास्तेषां सुचरितं भगवन्महिमोपबुंहितंवसुदेवनारदसंवादमुपशमायनमुपरिष्टाद्वर्णयिष्याम: ॥

१२॥

कवि:--कवि; हवि:--हवि; अन्तरिक्ष:--अन्तरिक्ष; प्रबुद्ध:--प्रबुद्ध पिप्पलायन:--पिप्पलायन; आविद्वोंत्र: --आविदोंत्र;अथ- भी; द्रुमिल: --द्रुमिल; चमस:--चमस; करभाजन:--करभाजन ; इति--इस प्रकार; भागवत- धर्म-दर्शना: --श्रीमद्भागवत के प्रामाणिक उपदेशक; नव--नौ; महा-भागवता:--परम भक्त; तेषाम्‌--उनमें से; सुचरितम्‌ू-- अच्छे लक्षण;भगवत्ू-महिमा-उपबुृंहितम्‌-- भगवान्‌ की महिमा से युक्त; वसुदेव-नारद-संवादम्‌-- वसुदेव तथा नारद की वार्ता के अन्तर्गत;उपशमायनम्‌--मन को परम सन्‍्तोष देने वाली; उपरिष्टात्‌--इसके बाद के, परवर्ती ( ग्यारहवें स्कंध में ); वर्णयिष्याम: --मैंविस्तार से व्याख्या करूँगा।

इन पुत्रों के अतिरिक्त कवि, हवि, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविदोंत्र, द्रमिल, चमसतथा करभाजन भी हुए।

ये सभी परम भक्त एवं श्रीमद्भागवत के प्रामाणिक उपदेशक थे।

येभक्त भगवान्‌ वासुदेव के प्रति अपनी उत्कट भक्ति के कारण महिमा-मण्डित थे।

मन की पूर्णतुष्टि के लिए मैं ( शुकदेव गोस्वामी ) इन नौ भक्तों के चरित्रों का वर्णन आगे चलकर नारद-वसुदेव संवाद प्रसंग के अन्तर्गत करूँगा।

यवीयांस एकाशीतिर्जायन्तेया: पितुरादेशकरा महाशालीना महाश्रोत्रिया यज्ञशीला: कर्मविशुद्धाब्राह्मणा बभूवु: ॥

१३॥

यवीयांस: --इनसे छोटे; एकाशीति:--इक्यासी; जायन्तेया: --ऋषभदेव की पत्नी जयन्ती के पुत्र; पितु:--अपने पिता के;आदेशकरा:--आदेशानुसार; महा-शालीना: -- परम विनीत; महा-श्रोत्रिया:--वैदिक ज्ञान में पारंगत; यज्ञ-शीला: --अनुष्ठानोंको करने में निपुण; कर्म-विशुद्धा: --अत्यन्त शुद्ध कर्मो वाले; ब्राह्मणा: --योग्य ब्राह्मण; बभूवु:--हुए?

उपर्युक्त उन्नीस पुत्रों के अतिरिक्त ऋषभदेव तथा जयन्ती से इक्यासी पुत्र और थे।

ये अपनेपिता की आज्ञानुसार अति सुसंस्कृत, शालीन, उज्वल कर्मों वाले तथा वैदिक ज्ञान तथाअनुष्ठानिक कार्यों में निपुण हुए।

इस प्रकार ये सभी पूर्ण रूप से योग्य ब्राह्मण बन गये।

भगवानृषभसंज्ञ आत्मतन्त्र: स्वयं नित्यनिवृत्तानर्थपरम्पर: केवलानन्दानुभव ईश्वर एवविपरीतवत्कर्माण्यारभमाण: कालेनानुगतं धर्ममाचरणेनोपशिक्षयन्नतद्विदां सम उपशान्तो मैत्र:कारुणिको धर्मार्थयश:प्रजानन्दामृतावरोधेन गृहेषु लोक॑ नियमयत्‌ ॥

१४॥

भगवानू-- भगवान्‌; ऋषभ--ऋषभ; संज्ञ:--नाम वाले; आत्म-तन्त्र:--पूर्णतया स्वतंत्र; स्ववम्‌--स्वयं; नित्य--शाश्वत;निवृत्त--विरक्त, मुक्त; अनर्थ--अनिच्छित वस्तुओं ( जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधि ) की; परम्पर:--परम्परा; केवल--केवल;आनन्द-अनुभव:--दिव्य आनन्द से परिपूरित; ईश्वरः-- परमेश्वर, नियन्ता; एबव--निस्सन्देह; विपरीत-वत्‌--विरुद्ध जैसे;कर्माणि--कर्मों को; आरभमाण: --करते हुए; कालेन--कालक्रम से; अनुगतम्‌--उपेक्षित; धर्मम्‌--वर्णा श्रम धर्म;आचरणेन--करने से; उपशिक्षयन्‌--उपदेश देकर; अ-ततू-विदाम्‌--अज्ञानी पुरुष; सम:--समान; उपशान्तः --इन्द्रियों द्वाराअविचलित; मैत्र:--प्रत्येक व्यक्ति से मैत्री भाव; कारुणिक:--सबों पर सदय; धर्म--धार्मिक नियम; अर्थ--आर्थिक उन्नति;यशः--यश, कीर्ति; प्रजा--पुत्र तथा पुत्रियाँ; आनन्द-- भौतिक सुख; अमृत--अमर जीवन; अवरोधेन--प्राप्त करने के लिए;गृहेषु--गृहस्थ जीवन में; लोकम्‌--सामान्य लोगों को; नियमयत्‌--नियमित किया।

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के अवतार होने से भगवान्‌ ऋषभदेव पूर्ण स्वतंत्र थे क्योंकि उनकायह स्वरूप शाश्रत तथा दिव्य आनन्दमय था।

उन्हें भौतिक तापों के चार नियमों ( जन्म, मृत्यु,जरा तथा व्याधि ) से कोई सरोकार न था, न ही वे भौतिक दृष्टि से आसक्त थे।

वे समानदर्शी थे।

अन्यों को दुखी देखकर दुखी होते थे।

वे समस्त जीवात्माओं के शुभचिन्तक थे।

यद्यपि वे महान्‌पुरुष, परमेश्वर तथा सर्व-नियन्ता थे, तो भी वे ऐसा आचरण कर रहे थे, मानो कोई सामान्यबद्धजीव हो।

अतः उन्होंने हृढ़तापूर्वक वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हुए तदनुसार कर्म किया।

कालान्तर में वर्णाश्रम धर्म के नियम उपेक्षित हो चुके थे, फलतः अपने निजी गुणों तथाआचरण से उन्होंने अज्ञानी जनता को वर्णाश्रम धर्म के अन्तर्गत कर्तव्य करना सिखाया।

इसप्रकार उन्होंने सामान्य लोगों को गृहस्थाश्रम में प्रशिक्षित किया जिससे वे धार्मिक तथा आर्थिकउत्थान कर सकें और यश, सन्‍्तान, आनन्द तथा अन्त में शाश्वत जीवन प्राप्त कर सकें।

अपनेउपदेशों से उन्होंने लोगों को गृहस्था श्रम में रहते हुए वर्णाश्रम धर्म के नियमों का पालन करते हुएपरिपूर्ण बनने की शिक्षा दी।

यदायच्छीर्षण्याचरितं तत्तदनुवर्तते लोक: ॥

१५॥

यत्‌ यत्‌--जो भी; शीर्षण्य--शीर्ष स्थ महापुरुषों द्वारा; आचरितम्‌--आचरण किया जाता है; तत्‌ तत्‌--वही; अनुवर्तते--अनुकरण करते हैं; लोक:--सामान्य जन।

महापुरुष जैसा जैसा आचरण करते हैं, सामान्यजन उसी का अनुकरण करते हैं।

यद्यपि स्वविदितं सकलधर्म ब्राह्मं गुह्मं ब्राह्मणैर्दशितमार्गेण सामादिभिरुपायैर्जनतामनुशशास ॥

१६॥

यद्यपि--यद्यपि; स्व-विदितम्‌--स्वतः ज्ञात; सकल-धर्मम्‌ू--विभिन्न प्रकार के कर्म; ब्राह्ममू--वैदिक उपदेश; गुह्मम्‌-- अत्यन्तगोपनीय; ब्राह्मणैः--ब्राह्मणों के द्वारा; दर्शित-मार्गुंण--दिखलाये गये मार्ग द्वारा; साम-आदिभि:--साम, दम, तितिक्षा इत्यादि;उपायैः--साधनों से; जनताम्‌ू--सामान्य जन पर; अनुशशास--राज्य किया |

यद्यपि भगवान्‌ ऋषभदेव समस्त गुह्य वैदिक ज्ञान से परिचित थे, जिसमें सभी करणीयकर्मों से सम्बन्धित जानकारी सम्मिलित है, तो भी वे अपने को क्षत्रिय मान कर ब्राह्मणों के उनउपदेशों का अनुकरण करते थे, जिनका सम्बन्ध साम ( मन पर नियंत्रण ), दम ( इन्द्रियों परनियंत्रण ), तितिक्षा ( सहनशीलता ) इत्यादि से था।

इस प्रकार उन्होंने वर्णाश्रम-धर्म पद्धति सेजनता पर शासन किया।

इसके अनुसार ब्राह्मण क्षत्रियों को शिक्षा देता है और क्षत्रिय वैश्योंतथा शूद्रों के माध्यम से राज्य चलाता है।

द्रव्यदेशकालवय: श्रद्धर्त्विग्विविधोद्देशोपचितै: सर्वरपि क्रतुभिर्यथोपदेशं शतकृत्व इयाज ॥

१७॥

द्रव्य--यज्ञ की साम्रगी; देश--विशिष्ट स्थान, तीर्थ या मन्दिर; काल--उपयुक्त समय, यथा वसन्‍्त; वय:--आयु, विशेषतयायुवावस्था; श्रद्धा--अच्छाई में विश्वास; ऋत्विक्‌--पुरोहितगण; विविध-उद्देश --विभिन्न प्रयोजनों से विभिन्न देवताओं की पूजाकरके; उपचितै:--समृद्ध होकर; सर्वै:--सभी प्रकार के; अपि--निश्चय ही; क्रतुभि:ः--याज्ञिक अनुष्ठानों द्वारा; यथा-उपदेशम्‌--उपदेश के अनुसार; शत-कृत्व:--एक सौ बार; इयाज--आराधना की |

भगवान्‌ ऋषभदेव ने शास्त्रों के अनुसार सभी यज्ञों को सौ सौ बार सम्पन्न किया और इसप्रकार से भगवान्‌ विष्णु को सभी प्रकार से तुष्ट किया।

सभी अनुष्ठान उत्तम कोटि की सामग्री सेतथा उचित समय में और पवित्र स्थानों पर युवा तथा श्रद्धालु पुरोहितों द्वारा सम्पन्न हुए।

इसप्रकार भगवान्‌ विष्णु की पूजा की गई और समस्त देवताओं को प्रसाद वितरित किया गया।

सारे अनुष्ठान तथा उत्सव सफल हुए।

कर हर हि नभगवतर्षभेण परिरक्ष्यमाण एतस्मिन्वर्षे न कश्चन पुरुषो वाउछत्यविद्यमानमिवात्मनोन्यस्मात्कथज्ञनकिमपि कर्हिचिदवेक्षते भर्तर्यनुसवनं विजृम्भितस्नेहातिशयमन्तरेण ॥

१८ ॥

भगवता-- भगवान्‌; ऋषभेण--ऋषभदेव द्वारा; परिरक्ष्यमाणे --परिरक्षित होकर; एतस्मिनू--इस; वर्षे -- भूखण्ड ( लोक ) में;न--नहीं; कश्चनन--कोई भी; पुरुष: --सामान्यजन; वाउछति-- आकांक्षा करता है; अविद्यमानम्‌--उपस्थित न रहकर; इब--केसमान; आत्मन:--अपने लिए; अन्यस्मात्‌--अन्य किसी से; कथञ्ञन--किसी प्रकार से; किमपि--कुछ भी; कर्हिंचित्‌ू--किसीसमय; अवेक्षते--देखने का साहस करता है; भर्तरि--स्वामी के प्रति; अनुसवनम्‌--सदैव; विजृम्भित--बढ़ने वाले; स्नेह-अतिशयम्‌--अत्यन्त स्नेह; अन्तरेण--अपनी आत्मा में |

कोई भी व्यक्ति 'आकाश-कुसुम ' जैसी वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा नहीं करता क्योंकिउसे पता रहता है कि ऐसी वस्तुएँ विद्यमान नहीं हैं।

जब भगवान्‌ ऋषभदेव इस भारतवर्ष-भूमि मेंराज्य कर रहे थे तो सामान्य जनता को भी किसी समय या किसी प्रकार से किसी वस्तु कीइच्छा नहीं रह गई थी।

कोई भी 'आकाश कुसुम ' नहीं चाहता है।

कहने का अभिप्राय यह है कि सभी लोग पूर्णतया सन्तुष्ट थे, अतः किसी को किसी भी प्रकार की वस्तु माँगने की आवश्यकतानहीं थी।

सभी लोग राजा के अतीव स्नेह में मग्न थे।

चूँकि यह स्नेह निरन्तर बढ़ता गया इसलिएवे किसी भी वस्तु की याचना करने के इच्छुक नहीं थे।

हल चओऋचआ हब स कदाचिदटमानो भगवानृषभो ब्रह्मावर्तगतो ब्रह्मर्षिप्रवरसभायां प्रजानांनिशामयन्तीनामात्मजानवहितात्मन: प्रश्रयप्रणयभरसुयन्त्रितानप्युपशिक्षयन्रिति होवाच ॥

१९॥

सः--वह; कदाचित्‌--एक बार; अटमान:--घूमते-घूमते; भगवान्‌-- भगवान्‌; ऋषभ: -- ऋषभदेव; ब्रह्मावर्त-गत:--जब वेब्रह्मावर्त नामक देश में [ जिसे कुछ लोग बर्मा ( ब्रह्म ) देश और कुछ कानपुर के निकट ( बिदूर ) कहते हैं पहुँचे; ब्रह्म-ऋषि-प्रवर-सभायाम्‌--उच्चकोटि के ब्राह्मणों की सभा में; प्रजानामू--जबकि नागरिक; निशामयन्तीनामू--सुन रहे थे; आत्मजानू--अपने पुत्रों; अवहित-आत्मन:--सावधान; प्रश्रय--अच्छे आचरण वाले; प्रणय--भक्ति वाले; भर--अधिकता से; सु-यन्त्रितानू--सुनियंत्रित; अपि--यद्यपि; उपशिक्षयन्‌-- शिक्षा देकर; इति--इस प्रकार; ह--ही; उबाच--कहा |

एक बार भगवान्‌ ऋषभदेव घूमते-घूमते ब्रह्मावर्त नामक देश में पहुँचे।

वहाँ पर विद्वानब्राह्मणों की एक बड़ी सभा हो रही थी और राजा के सभी पुत्र बड़े ही मनोयोग से ब्राह्मणों काउपेद्श सुन रहे थे।

उस सभा में, समस्त नागरिकों के समक्ष ऋषभदेव ने अपने पुत्रों को शिक्षादी, यद्यपि वे पहले से ही अच्छे आचरण वाले, भक्त और योग्य थे।

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