← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 6 की सूची

अध्याय छह: दक्ष की बेटियों की संतान

6.6श्रीशुक उबाचततः प्राचेतसोउसिक्न्यामनुनीतः स्वयम्भुवा ।

षष्टिं सञ्लनयामास दुहितृ: पितृवत्सला: ॥

१॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; तत:ः--इस घटना के बाद; प्राचेतस:--दक्ष; असिक्न्याम्‌--असिक्नीनामक पत्नी से; अनुनीत:--शान्त किये गये; स्वयम्भुवा-- श्री ब्रह्मा के द्वारा; षष्टिमू--साठ; सज्लनयाम्‌ आस--उत्पन्नकिया; दुहितृ:--कन्याएँ; पितृ-वत्सला:--अपने पिता की परम प्यारी |

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा, हे राजन्‌! तदनन्तर ब्रह्माजी की प्रार्थना पर प्रजापति दक्षने, जिन्हें प्राचेतस कहा जाता है, अपनी पत्नी असिक्नी के गर्भ से साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं।

सभी कन्याएँ अपने पिता को अत्यधिक स्नेह करती थीं।

दश धर्माय कायादादि्द्वषदट्त्रिणव चेन्दवे ।

भूताड्रिरःकृशा श्रेभ्यो द्वे द्वे ताक्ष्याय चापरा: ॥

२॥

दश--दस; धर्माय--राजा धर्म अर्थात्‌ यमराज को; काय--कश्यप को; अदातू--दे दिया; द्वि-षट्‌--छह की दूनी तथाएक ( तेरह ); त्रि-नव--नौ का तिगुना ( सत्ताईंस ); च--भी; इन्दवे--चन्द्रदेव को; भूत-अड्डिर:-कृशाश्रेभ्य: -- भूत,अंगिरा तथा कृशाश्व को; द्वे द्वे--दो दो; ताक्ष्याय--पुन: कश्यप को; च--तथा; अपरा:--शेष |

उन्होंने धर्ममाज ( यमराज ) को दस, कश्यप को तेरह, चन्द्रमा को सत्ताईस तथा अंगिरा,कृशाश्व एवं भूत को दो-दो कन्याएँ दान स्वरूप दे दीं।

शेष चार कन्याएँ कश्यप को दे दीगईं ( इस प्रकार कश्यप को कुल सत्रह कन्याएँ प्राप्त हुईं )।

नामथधेयान्यमूषां त्वं सापत्यानां च मे श्रूणु ।

यासां प्रसूतिप्रसवैलोका आपूरितास्त्रयः ॥

३॥

नामधेयानि--विभिन्न नाम; अमूषाम्‌--उनको; त्वम्‌--तुम; स-अपत्यानाम्‌-- अपनी संतानों सहित; च--तथा; मे--मुझसे;श्रुणु--कृपया सुनिये; यासाम्‌ू--उन सबों के; प्रसूति-प्रसवैः--अनेक सन्तानों तथा वंशजों के द्वारा; लोका:--समस्तलोक; आपूरिता:--बसे हुए हैं; त्रय:--तीन ( ऊपरी, बीच के तथा निम्न लोक )

अब मुझसे इन समस्त कन्याओं तथा उनके वंशजों के नाम सुनो, जिनसे ये तीनों लोकपूरित हैं।

भानुर्लम्बा ककुद्यामिरविश्वा साध्या मरुत्वती ।

वसुर्मुहूर्ता सड्डूल्पा धर्मपत्य: सुताउश्रूणु ॥

४॥

भानु:--भानु; लम्बा-- लम्बा; ककुत्‌ू--ककुद; यामि:--यामि; विश्वा--विश्वा; साध्या--साध्या; मरुत्वती --मरुत्वती;वसुः--वसु; मुहूर्ता--मुहूर्ता; सड्डूल्पा--संकल्पा; धर्म-पत्य:--यमराज की पत्नियाँ; सुतान्‌ू--उनके पुत्र; श्रुणु--सुनो |

यमराज को प्रदत्त दस कन्याओं के नाम थे भानु, लम्बा, ककुद, यामि, विश्वा, साध्या,मरुत्वती, बसु, मुहूर्ता तथा संकल्पा।

अब उनके पुत्रों के नाम सुनो।

भानोस्तु देवऋषभ इन्द्रसेनस्ततो नूप ।

विद्योत आसील्लम्बायास्ततश्च स्तनयित्वव: ॥

५॥

भानो:- भानु के गर्भ से; तु--निस्सन्देह; देव-ऋषभ:--देव-ऋषभ; इन्द्रसेन:--इन्द्रसेन; ततः--उस ( देवऋषभ ) से;नृप--हे राजन्‌; विद्योत:--विद्योत; आसीतू--उत्पन्न हुआ; लम्बाया: --लम्बा के गर्भ से; तत:ः--उससे; च--तथा;स्तनयित्तव:--समस्त बादल।

हे राजन! भानु के गर्भ से देव-ऋषभ नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसके इन्द्रसेन नामका एक पुत्र हुआ।

लम्बा के गर्भ से विद्योत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसने समस्त बादलोंको जन्म दिया।

ककुदः सड्जूटस्तस्थ कीकटस्तनयो यतः ।

भुवो दुर्गाणि यामेय: स्वर्गो नन्दिस्ततोभवत्‌ ॥

६॥

ककुदः--ककुद के गर्भ से; सड्डूट:ः--संकट; तस्थ--उसके; कीकट:--कीकट; तनय: --पुत्र; यतः--जिससे; भुव:--पृथ्वी के; दुर्गाण--अनेक देवता, इस ब्रह्माण्ड के रक्षक ( जिनका नाम दुर्गा है ); यामेय:--यमी के; स्वर्ग:--स्वर्ग;नन्दि:--नन्दि; ततः--उस ( स्वर्ग ) से; अभवत्‌--उत्पन्न हुआ।

ककुद के गर्भ से संकट नाम का पुत्र हुआ जिसके पुत्र का नाम कीकट था।

कीकट सेदुर्गा नामक देवतागण हुए।

यामी के पुत्र का नाम स्वर्ग था जिससे नन्दि नाम का पुत्र उत्पन्नहुआ।

विश्वेदेवास्तु विश्वाया अप्रजांस्तान्प्रचक्षते ।

साध्योगणश्च साध्याया अर्थसिद्धिस्तु तत्सुतः: ॥

७॥

विश्वे-देवा:--विश्वदेव नाम के देवता; तु--लेकिन; विश्वाया:--विश्वा से; अप्रजान्‌ू--पुत्ररहित; तान्‌-- उनको; प्रचक्षते--कहा जाता है; साध्य:-गण:--साध्य नाम के देवतागण; च--तथा; साध्याया: --साध्या के गर्भ से; अर्थसिर्द्धिः --अर्थसिद्धि; तु--लेकिन; तत्‌-सुतः--साध्यों का पुत्र |

विश्वा के पुत्र विश्वदेव हुए, जिनके कोई सन्‍्तान नहीं थी।

साध्या के गर्भ से साध्यगणहुए जिनके पुत्र का नाम अर्थसिद्धि था।

मरुत्वांश्व जयन्तश्न मरुत्वत्या बभूवतु: ।

जयन्तो वासुदेवांश उपेन्द्र इति यं विदु: ॥

८ ॥

मरुत्वानू--मरुत्वान; च-- भी; जयन्त:--जयन्त; च--तथा; मरुत्वत्या:--मरुत्वती से; बभूवतु:--जन्म लिया; जयन्त:--जयन्त; वासुदेव-अंश:--वासुदेव के अंश स्वरूप; उपेन्द्र:--उपेन्द्र; इति--इस प्रकार; यम्‌--जिसको; विदु: --जानते हैं

मरुत्वती के गर्भ से मरुत्वान तथा जयन्त नामक दो पुत्रों ने जन्म लिया।

जयन्त भगवान्‌वासुदेव के अंश हैं और उपेन्द्र कहे जाते हैं।

मौहूर्तिका देवगणा मुहूर्तायाश्व जज्ञिरे ।

ये वै फलं प्रयच्छन्ति भूतानां स्वस्वकालजम्‌ ॥

९॥

मौहूर्तिका:--मौहूर्तिक गण; देव-गणा:--देवता; मुहूर्ताया: --मुहूर्ता के गर्भ से; च--तथा; जज्ञिरि--जन्म ग्रहण किया;ये--जिन सबों ने; बै--निस्सन्देह; फलम्‌--फल, परिणाम; प्रयच्छन्ति--प्रदान करते हैं; भूतानाम्‌--समस्त जीवात्माओंका; स्व-स्व--अपना-अपना; काल-जम्‌--काल से उत्पन्न

मुहूर्ता के गर्भ से मौहूर्तिकगण नामक देवताओं ने जन्म ग्रहण किया।

ये देवता अपने-अपने कालों में जीवात्माओं को उनके कर्मों का फल प्रदान करने वाले हैं।

सड्डल्पायास्तु सट्डूल्प:ः काम: सट्डूल्पजः स्पृतः ।

वसवोछष्टौ बसोः पुत्रास्तेषां नामानि मे श्रूणु ॥

१०॥

द्रोण: प्राणो श्रुवोको उग्निर्दोषो वास्तुर्विभावसु: ।

द्रोणस्यथाभिमते: पत्या हर्षशोकभयादय: ॥

११॥

सड्जलुल्पाया:--संकल्पा के गर्भ से; तु--लेकिन; सड्जूल्प: --संकल्प; काम:--काम; सड्लडूल्प-ज:--संकल्प का पुत्र;स्मृत:--विख्यात; वसव: अष्टौ--आठों वसु; वसो:--वसु के; पुत्रा:--पुत्र; तेषामू--उनके ; नामानि-- नाम; मे--मुझसे;श्रुणु--सुनो; द्रोण:--द्रोण; प्राण: --प्राण; ध्रुव:--ध्रुव; अर्क:--अर्क; अग्नि: --अग्नि; दोष:--दोष; वास्तु:--वास्तु;विभावसु:--विभावसु; द्रोणस्थ--द्रोण के; अभिमते: --अभिमति से; पल्या:--पत्ली; हर्ष-शोक-भय-आदय:--हर्ष,शोक, भय आदि नाम वाले पुत्र।

संकल्पा का पुत्र संकल्प कहलाया जिससे काम की उत्पत्ति हुईं।

बसु के पुत्र अष्ट बसुकहलाये।

उनके नाम सुनो--द्रोण, प्राण, श्रुव, अर्क, अग्नि, दोष, वास्तु तथा विभावसु।

द्रोण नामक बसु की पत्नी अभिमति से हर्ष, शोक, भय इत्यादि पुत्रों का जन्म हुआ।

प्राणस्योर्जस्वती भार्या सह आयु: पुरोजवः ।

ध्रुवस्य भार्या धरणिरसूत विविधा: पुर: ॥

१२॥

प्राणस्य--प्राण की; ऊर्जस्वती--ऊर्जस्वती; भार्या--पतली; सह:--सह; आयु:--आयुस; पुरोजव: --पुरोजव; ध्रुवस्थ--ध्रुव की; भार्या--पत्नी; धरणि:-- धरणि; असूत--उत्पन्न किया; विविधा:-- अनेक; पुर:--नगरप्राण की पत्नी ऊर्जस्वती के गर्भ से सह, आयुस तथा पुरोजब नामक तीन पुत्र उत्पन्नहुए।

ध्रुव की पत्नी का नाम धरणी था जिसके गर्भ से विभिन्न नगरों की उत्पत्ति हुई।

अर्कस्य वासना भार्या पुत्रास्तर्षादय: स्मृता: ।

अग्नेर्भार्या वसोर्धारा पुत्रा द्रविणगकादय: ॥

१३॥

अर्कस्य--अर्क की; वासना--वासना; भार्या--पली; पुत्रा:--कई पुत्र; तर्ष-आदय:--तर्ष इत्यादि; स्मृता:--विख्यात;अग्ने:--अग्नि की; भार्या--पली; वसो:--वसु की; धारा--धारा; पुत्रा:--पुत्र; द्रविणक-आदय:--द्रविणक इत्यादि

अर्क की पत्नी वासना के गर्भ से कई पुत्र उत्पन्न हुए जिनमें तर्ष प्रमुख था।

अग्नि नामकवसु की पत्नी धारा से द्रविणक इत्यादि कई पुत्र उत्पन्न हुए।

स्कन्दश्न कृत्तिकापुत्रो ये विशाखादयस्तत: ।

दोषस्य शर्वरीपुत्र: शिशुमारो हरे: कला ॥

१४॥

स्कन्दः--स्कन्द; च--भी; कृत्तिका-पुत्र:--कृत्तिका का पुत्र; ये--जो; विशाख-आदय: --विशाख इत्यादि; तत:--उस( स्कन्द ) से; दोषस्थ--दोष का; शर्वरी-पुत्र:--उसकी पत्नी शर्वरी का पुत्र; शिशुमार: --शिशुमार; हरे: कला--भगवान्‌का अंश।

अग्नि की दूसरी पत्नी कृत्तिका से स्कन्द ( कार्तिकेय ) नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ जिसकेपुत्रों में विशाख प्रमुख था।

दोष नामक वसु की पत्नी शर्वरी से शिशुमार नाम का पुत्र उत्पन्नहुआ जो श्रीभगवान्‌ का अंश था।

वास्तोराड्डिरसीपुत्रो विश्वकर्माकृतीपतिः ।

ततो मनुश्चाक्षुषोभूद्िश्वे साध्या मनो: सुता: ॥

१५॥

वास्तो:--वास्तु; आड्लिसी--आंगिरसी नामक पतली से; पुत्र:--पुत्र; विश्वकर्मा--विश्वकर्मा; आकृती-पति:--आकूती कापति; ततः--उससे; मनु: चाक्षुष:--मनु जिनका नाम चाक्षुष है; अभूत्‌--उत्पन्न हुआ; विश्वे--विश्वदेवणण; साध्या: --साध्यगण; मनो:--मनु के; सुता:--पुत्र |

वास्तु नामक वसु की पत्नी आंगिरसी से महान्‌ शिल्पी विश्वकर्मा का जन्म हुआ।

विश्वकर्मा आकृती के पति बने जिनसे चाश्लुष मनु ने जन्म ग्रहण किया।

मनु के पुत्र विश्वदेवतथा साध्यगण कहलाये।

विभावसोरसूतोषा व्युष्ट रोचिषमातपम्‌ ।

पञ्ञयामोथ भूतानि येन जाग्रति कर्मसु ॥

१६॥

विभावसो: --विभावसु के; असूत--उत्पन्न हुए; ऊषा--उषा; व्युष्टम्‌--्युष्ट; रोचिषम्‌--रोचिष; आतपम्‌--आतप;पञ्ञयाम:--पंचयाम; अथ--तत्पश्चात्‌; भूतानि--जीवात्माएँ; येन--जिसके द्वारा; जाग्रति--जाग्रित होते हैं; कर्मसु--भौतिक कार्यों में |

विभावसु की पत्नी ऊषा के तीन पुत्र उत्पन्न हुए--व्युष्ट, रोचिष तथा आतप।

इनमें सेआतप के पशञ्ञयाम ( दिन ) उत्पन्न हुआ जो समस्त जीवात्माओं को भौतिक कार्यों के लिएप्रेरित करता है।

सरूपासूत भूतस्य भार्या रुद्रांश्व कोटिशः ।

रैवतोजो भवो भीमो वाम उग्रो वृषाकपि: ॥

१७॥

अजैकपादहिर््रध्नो बहुरूपो महानिति ।

रुद्रस्य पार्षदाश्वान्ये घोरा: प्रेतविनायका: ॥

१८॥

सरूपा--सरूपा ने; असूत--उत्पन्न किया; भूतस्य-- भूत की; भार्या--पली; रुद्रानू--रुद्रों को; च--तथा; कोटिश: --एक करोड़; रैवत:--रैवत; अज:--अज; भव: --भव; भीम: -- भीम; वाम:--वाम ; उग्र:--उग्र; वृषाकपि: --वृषाकपि;अजैकपात्‌-- अजैकपात्‌; अहिर्ब्रध्न:--अहिर्ब्रध्न; बहुरूप:--बहुरूप; महान्‌--महान्‌; इति--इस प्रकार; रुद्रस्थ--इनरुद्रों के; पार्षदा:--उनके पार्षद; च--तथा; अन्ये-- अन्य; घोरा:--अत्यन्त भयानक; प्रेत-- भूत; विनायका:--तथाविनायक।

भूत की पत्नी सरूपा ने एक करोड़ रुद्रों को जन्म दिया, जिनमें से प्रमुख ग्यारह रुद्र येहैं--रैवत, अज, भव, भीम, वाम, उग्र, वृषाकपि, अजैकपात्‌, अहिर््रध्न, बहुरूप तथामहान्‌।

भूत की दूसरी पत्नी भूता से उनके साथी भयंकर भूतों तथा विनायकादि का जन्महुआ।

प्रजापतेरड्डिरस: स्वधा पत्नी पितृनथ ।

अथर्वाड्टिस्सं वेदं पुत्रत्वे चाकरोत्सती ॥

१९॥

प्रजापते: अड्धिरस:--अंगिरा नामक अन्य प्रजापति को; स्वधा--स्वधा; पत्नी--पत्नी; पितृन्‌ू--पितरगण; अथ--तत्पश्चात्‌; अथर्व-आड्रिरसम्‌-- अथर्वांगिरस; वेदम्‌--साक्षात्‌ वेद; पुत्रत्वे--पुत्र के रूप में; च--तथा; अकरोत्‌--स्वीकारकिया; सती--सती ने।

प्रजापति अंगिरा के दो पत्लियाँ थीं--स्वधा तथा सती।

स्वधा ने समस्त पितरों को पुत्ररूप में स्वीकार किया और सती ने अथर्वागिरस वेद को ही पुत्र रूप में स्वीकार कर लिया।

कृशाश्रो चिंषि भार्यायां धूमकेतुमजीजनतू ।

धिषणायां वेदशिरो देवलं वयुनं मनुम्‌ ॥

२०॥

कृशाश्च: --कृशाश्व; अर्चिषि--अर्चिस; भार्यायाम्‌ू-- अपनी पत्नी से; धूमकेतुम्‌-- धूमकेतु को; अजीजनत्‌--जन्म दिया;धिषणायाम्‌--धिषणा नामक पतली से; वेदशिर: --वेदशिरा; देवलमू--देवल; वयुनम्‌--वयुन; मनुम्‌--मनु।

कृश्चाश्च के अर्चिस्‌ तथा धिषणा नामक दो पत्रियाँ थीं।

अर्चथिस्‌ से धूमकेतु और धिषणासे वेदशिरा, देवल, वयुन तथा मनु नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए।

ताक्ष्यस्य विनता कद्भू: पतड़ी यामिनीति च ।

पतड़्ग्यसूत पतगान्यामिनी शलभानथ ॥

२१॥

सुपर्णासूत गरुडं साक्षाद्यज्लेशवाहनम्‌ ॥

सूर्यसूतमनूरुं च कद्ू्नागाननेकशः ॥

२२॥

ताश््यस्य--तारक्ष्य अर्थात्‌ कश्यप की; विनता--विनता; कद्गूः--कढ्गू; पतड़ी--पतंगी; यामिनी--यामिनी; इति--इसप्रकार; च--तथा; पतड़ी--पतंगी ने; असूत--जन्म दिया; पतगान्‌--विभिन्न प्रकार के पक्षी; यामिनी--यामिनी ने;शलभानू--टिड्डियों को ( जन्म दिया ); अथ--तत्पश्चात्‌; सुपर्णा--विनता नामक पत्नी ने; असूत--जन्म दिया; गरुडम्‌--विख्यात पक्षिराज गरुड़ को; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; यज्ञेश-वाहनम्‌-- भगवान्‌ विष्णु का वाहन; सूर्य-सूतम्‌--सूर्यदेव कासारथी; अनूरुम्‌-- अनुरु; च--तथा; कद्गू: --कद्ू ने; नागान्‌--सर्पों को; अनेकश: --अनेक प्रकार के |

कश्यप अर्थात्‌ ताक्ष्य की चार पत्नियाँ थीं--बिनता (सुपर्णा ), कद्गू, पतंगी तथायामिनी।

पतंगी ने नाना प्रकार के पक्षियों को जन्म दिया और यामिनी ने टिड्डियों को।

विनता ( सुपर्णा ) ने भगवान्‌ विष्णु के वाहन गरुड़ तथा सूर्यदेव के सारथी अनूरु अथवाअरुण को जन्म दिया।

कढद्गू के गर्भ से अनेक प्रकार के नाग उत्पन्न हुए।

कृत्तिकादीनि नक्षत्राणीन्दो: पत्यस्तु भारत ।

दक्षशापात्सो नपत्यस्तासु यक्ष्मग्रहार्दित: ॥

२३॥

कृत्तिका-आदीनि--कृत्तिका इत्यादि; नक्षत्राणि--नक्षत्रगण; इन्दो:--चन्द्रदेव की; पत्य:--पत्नियाँ; तु--लेकिन;भारत--हे महाराज परीक्षित, भारत के वंशधर; दक्ष-शापात्‌-दक्ष के शाप से; सः--चन्धदेव; अनपत्य:--सन्तानरहित;तासु--अनेक पलियों में ; यक्ष्म-ग्रह-अर्दित:--क्षय रोग से पीड़ित ।

हे भारतश्रेष्ठ महाराज परीक्षित! कृत्तिका नामक राशियाँ चन्द्रदेव की पत्ियाँ थीं।

चूँकिप्रजापति दक्ष ने चन्द्रदेव को शाप दिया था कि उसे क्षय रोग हो जाये, अतः किसी भी पत्नीसे कोई सन्‍्तान नहीं हुई।

पुनः प्रसाद्य तं सोम: कला लेभे क्षये दिता: ।

श्रृणु नामानि लोकानां मातृणां शट्डाराणि च ॥

२४॥

अथ कश्यपपलीनां यत्प्रसूतमिदं जगत्‌ ।

अदितिर्दितिर्दनु: काष्ठा अरिष्टा सुससा इला ॥

२५॥

मुनि: क्रोधवशा ताम्रा सुरभि: सरमा तिमि: ।

तिमेर्यादोगणा आसन्श्रापदा: सरमासुता: ॥

२६॥

पुनः--फिर; प्रसाद्य-प्रसन्न करके; तम्‌--उसको ( प्रजापति दक्ष को ); सोम:--चन्द्रदेव; कला:--प्रकाश के अंश;लेभे--प्राप्त किया; क्षये--क्रमिक ह्वास में ( कृष्ण पक्ष ); दिता:--हटा दिया; श्रेणु--सुनो; नामानि--सभी नामों;लोकानाम्‌--लोकों के; मातृणाम्‌--माताओं के; शट्भूराणि--मंगलकारी; च--तथा; अथ-- अब; कश्यप-पतीनाम्‌ --कश्यप की पत्नियों के; यत्‌-प्रसूतम्‌ू--जिनसे उत्पन्न; इदम्‌--यह; जगत्‌--सारा ब्रह्माण्ड; अदिति: --अदिति; दिति:--दिति; दनुः--दनु; काष्ठा--काष्ठा; अरिष्टा--अरिष्टा; सुरसा--सुरसा; इला--इला; मुनि:--मुनि; क्रोधवशा--क्रो धवशा;ताम्रा--ताम्रा; सुरभि: --सुरभि; सरमा--सरमा; तिमि:--तिमि; तिमेः --तिमि से; याद:-गणा:--जलचर; आसनू--प्रकटहुए; श्रापदा:--सिंह तथा बाघ जैसे हिंसक पशु; सरमा-सुता:--सरमा के पुत्र |

तत्पश्चात्‌ चन्द्रदेव ने प्रजापति को विनीत बचनों के द्वारा प्रसन्न करके रुग्णावस्था मेंक्षीण हुए प्रकाश को फिर से प्राप्त कर लिया, किन्तु तो भी उनके कोई सन्‍्तान नहीं हुई।

चन्द्रमा कृष्णपक्ष में अपना प्रकाश खो देता है, किन्तु शुक्ल पश्च में उसे पुन: प्राप्त कर लेता है।

हे राजा परीक्षित! अब मुझसे कश्यप की पत्नियों के नाम सुनो, जिनके गर्भ से इससमस्त ब्रह्माण्ड के प्राणी उत्पन्न हुए हैं।

वे लगभग समस्त ब्रह्माण्ड के सचराचर की माताएँहैं और उनके नामों को सुनना शुभ है।

उनके नाम हैं--अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा,सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताप्रा, सुरभि, सरमा तथा तिमि।

तिमि के गर्भ से समस्तजलचर उत्पन्न हुए और सरमा से सिंह तथा बाघ जैसे क्रूर पशु उत्पन्न हुए।

सुरभेर्महिषा गावो ये चान्ये द्विशफा नृप ।

ताम्राया: इयेनगृश्चाद्या मुनेरप्सरसां गणा;: ॥

२७॥

सुरभे: --सुरभि के गर्भ से; महिषा:-- भेंस; गाव: --गाएँ; ये-- जो; च--तथा; अन्ये--अन्य; द्वि-शफा:--फटे खुरोंवाले, खुरदार; नृप--हे राजा; ताप्राया:--ताम्रा से; श्येन--बाज, चील्ह; गृश्च-आद्या: --गीध इत्यादि; मुने: --मुनि से;अप्सरसाम्‌--अप्सराओं के; गणा:--समूह

हे राजा परीक्षित! सुरभि के गर्भ से भेंस, गाय तथा अन्य फटे खुरों वाले पशु उत्पन्न हुए,जब कि ताम्रा के गर्भ से बाज, गीध तथा अन्य बड़े शिकारी पक्षियों ने जन्म लिया।

मुनि सेअप्सराएँ उत्पन्न हुईंदन्दशूकादय: सर्पा राजन्क्रोधवशात्मजा: ।

इलाया भूरुहाः सर्वे यातुधानाश्व सौरसा: ॥

२८॥

दन्दशूक-आदय: --दंदशूक तथा अन्य सर्प; सर्पा:-रेंगने वाले प्राणी; राजन्‌--हे राजन्‌; क्रोधवशा-आत्म-जा: --क्रोधवशा से उत्पन्न; इलाया:--इला के गर्भ से; भूरूहा:--लताएँ तथा वृक्ष; सर्वे--समस्त; यातुधाना:--मानवभक्षी,राक्षस; च--भी; सौरसा:--सुरसा के गर्भ से।

क्रोधवशा से दंदशूक नामक सर्प, रेंगने वाले अन्य प्राणी तथा मच्छर उत्पन्न हुए।

इलाके गर्भ से समस्त लताएँ तथा वृक्ष उत्पन्न हुए।

सुरसा के गर्भ से राक्षसों ने जन्म लिया।

अरिष्टायास्तु गन्धर्वा: काष्ठाया द्विशफेतरा: ।

सुता दनोरेकषष्टिस्तेषां प्राधानिकाउशूूणु ॥

२९॥

द्विमूर्धा शम्बरोरिष्टो हयग्रीवो विभावसु: ।

अयोमुख: शड्डु शिरा: स्वर्भानु: कपिलोरुण: ॥

३०॥

पुलोमा वृषपर्वा च एकचक्रोनुतापन: ।

धूप्रकेशो विरूपाक्षो विप्रचित्तिश्च दुर्जय: ॥

३१॥

अरिष्टाया:--अरिष्टा के गर्भ से; तु--लेकिन; गन्धर्वा: --सारे गन्धर्व; काष्ठाया: --काष्टा से; ट्वि-शफ-इतरा:--दो खुरोंवाले पशुओं से इतर पशु यथा घोड़े इत्यादि, जिनके खुर विभाजित नहीं हैं; सुता:--पुत्र; दनो:--दनु के गर्भ से; एक-षष्टि:--इकसठ; तेषाम्‌--उनके ; प्राधानिकान्‌-- प्रमुख प्रमुख; श्रूणु--सुनो; द्विमूर्धा--द्विमूर्धा; शम्बर: --शम्बर;अरिष्ट:--अरिष्ट; हयग्रीव:--हयग्रीव; विभावसु:--विभावसु; अयोमुख:--अयोमुख; शड्डू शिरा:--शंकुशिरा;स्वर्भानु:--स्वर्भानु; कपिल:--कपिल; अरुण: --अरुण; पुलोमा--पुलोमा; वृषपर्वा--वृषपर्वा; च--भी; एकचक्र: --एकचक्र; अनुतापन:--अनुतापन; धूप्रकेश: -- धूम्रकेश; विरूपाक्ष:--विरूपाक्ष; विप्रचित्ति:--विप्रचित्ति; च--तथा;दुर्जय:--दुर्जय |

अरिष्टा के गर्भ गश्धर्व उत्पन्न हुए और काष्टठा से घोड़े इत्यादि एक खुर वाले पशु।

हेराजन! दनु के इकसठ पुत्र उत्पन्न हुए जिनमें से अठारह प्रमुख हैं।

इनके नाम इस प्रकार हैं--द्विमूर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अयोमुख, शंकुशिरा, स्वर्भानु, कपिल, अरुण,पुलोमा, वृषपर्वा, एकचक्र, अनुतापन, धूम्रकेश, विरूपाक्ष, विप्रचित्ति तथा दुर्जय ।

स्वर्भानो: सुप्रभां कन्यामुवाह नमुचि: किल ।

वृषपर्वणस्तु शर्मिष्ठां ययातिर्नाहुषो बली ॥

३२॥

स्वर्भानो: --स्वर्भानु की; सुप्रभाम्‌--सुप्रभा; कन्याम्‌--कन्या, पुत्री; उवाह--ब्याह किया; नमुचि:--नमुचि ने; किल--निस्सन्देह; वृषपर्वण:--वृषपर्व का; तु--लेकिन; शर्मिष्ठाम्‌--शर्मिष्ठा; ययाति:--राजा ययाति; नाहुष:--नहुष का पुत्र;बली--अत्यन्त बलवानस्वर्भानु की कन्या सुप्रभा से नमुच्ि ने विवाह किया।

वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा नहुष केपुत्र महाबली राजा ययाति को दी गई।

वैश्वानरसुता याश्व चतस्त्रश्नारुदर्शना: ।

उपदानवी हयशिरा पुलोमा कालका तथा ॥

३३॥

उपदानवीं हिरण्याक्ष: क्रतुर्दयशिरां नृप ।

पुलोमां कालकां च द्वे वैश्वानरसुते तु कः ॥

३४॥

उपयेमेथ भगवान्कश्यपो ब्रह्मचोदितः ।

पौलोमा: कालकेयाश्व दानवा युद्धशालिन: ॥

३५॥

तयोः षष्टिसहस्त्राणि यज्ञघ्नांस्ते पितु: पिता ।

जघान स्वार्गतो राजन्नेक इन्द्रप्रियड्रः ॥

३६॥

वैश्वानर-सुता:--वैश्वानर की पुत्रियाँ; या:--जो; च--तथा; चतस्त्र:--चार; चारु-दर्शना: --अत्यन्त सुन्दरी; उपदानवी--उपदानवी; हयशिरा--हयशिरा; पुलोमा--पुलोमा; कालका--कालका; तथा--और ; उपदानवीम्‌--उपदानवीसे;हिरण्याक्ष:--असुर हिरण्याक्षने; क्रतु:--क्रतु ने; हयशिराम्‌ू--हयशिरा ने; नृप--हे राजन; पुलोमाम्‌ कालकाम्‌ च--पुलोमा तथा कालका ने; द्वे--दोनों; वैश्वानर-सुते--वैश्वानर की कन्याएँ; तु--लेकिन; कः--प्रजापति ने; उपयेमे--ब्याहकिया; अथ--तब; भगवान्‌--परम शक्तिमान; कश्यप: --कश्यप मुनि; ब्रह्म-चोदित:--ब्रह्मा के अनुनय-विनय से;पौलोमा: कालकेया: च--पौलोम तथा कालकेय नामक; दानवा:--दानव; युद्ध-शालिन:--युद्धप्रिय, योद्धा; तयो: --उनमें से; षष्टि-सहस्त्राणि--साठ हजार; यज्ञ-घ्नानू--यज्ञ को विध्वंस करने वाले; ते--तुम्हारे; पितु:--पिता का; पिता--पिता; जघान--मार डाला; स्व:-गत:--स्वर्गलोक में; राजन्‌ू--हे राजन्‌; एक:--अकेले; इन्द्र-प्रियम्‌ू-कर:--राजा इन्द्रको प्रसन्न करने के लिए

दनु के पुत्र वैश्वानर के चार सुन्दर कन्याएँ थीं जिनके नाम थे--उपदानवी, हयशिरा,पुलोमा तथा कालका।

इनमें से उपदानवी के साथ हिरण्याक्ष का तथा हयशिरा के साथ क्रतुका विवाह हुआ।

तत्पश्चात्‌ श्रीत्रह्ा के अनुनय-विनय पर प्रजापति कश्यप ने वैश्वानर कीअन्य दो कन्याओं, पुलोमा तथा कालका के साथ विवाह कर लिया।

कश्यप की इन दोनोंपत्नियों के गर्भ से साठ हजार पुत्र हुए जो पौलोम तथा कालकेय के नाम से विख्यात हुए,जिनमें से निवातकवच प्रमुख था।

वे सब अत्यन्त वीर तथा युद्ध कुशल थे और उनका लक्ष्यमुनियों के द्वारा सम्पन्न यज्ञों में विध्न डालना था।

हे राजन्‌! जब तुम्हारे पितामह अर्जुन स्वर्गलोक गये तो उन्होंने अकेले ही इन असुरों का वध किया था जिससे राजा इन्द्र उनका परमप्रिय बन गया।

विप्रचित्ति: सिंहिकायां शतं चैकमजीजनत्‌ ।

राहुज्येष्ठ केतुशतं ग्रहत्वं य उपागता: ॥

३७॥

विप्रचित्ति:--विप्रचित्तिने; सिंहिकायाम्‌-- अपनी पत्नी सिंहिका के गर्भ से; शतम्‌--एक सौ; च--तथा; एकम्‌--एक;अजीजनतू--जन्म दिया; राहु-ज्येष्ठमू--जिनमें से राहु सबसे बड़ा है; केतु-शतम्‌--एक सौ केतु; ग्रहत्वम्‌-ग्रह होने का;ये--सबके सब; उपागता:--प्राप्त किया |

विप्रच्ित्ति को अपनी पत्नी सिंहिका से एक सौ एक पुत्र प्राप्त हुए जिनमें राहु सबसे ज्येष्ठ था और अन्य एक सौ केतु थे।

इन सबों को प्रभावशाली ग्रहों ( लोकों ) में स्थान प्राप्तहुआ।

अथातः श्रूयतां बंशो योउदितेरनुपूर्वश: ।

यत्र नारायणो देव: स्वांशेनावातरद्विभु: ॥

३८॥

विवस्वानर्यमा पूषा त्वष्टाथ सविता भग: ।

धाता विधाता वरुणो मित्र: शत्रु उरुक्रम: ॥

३९॥

अथ--त्पश्चात्‌: अत:--अब; श्रूयताम्‌--सुनो; वंश: --वंश; य:--जो; अदिते: --अदिति से; अनुपूर्वश:--तिथिवार क्रममें; यत्र--जिसमें; नारायण:-- भगवान्‌; देव:--ई श्वर; स्व-अंशेन-- अपने अंश से; अवातरत्‌--अवतार लिया; विभु:--परमेश्वर; विवस्वान्‌ू--विवस्वान्‌; अर्यमा--अर्यमा; पूषा--पूषा; त्वष्टा--त्वष्टा; अथ--तत्पश्चात्‌;: सविता--सविता;भगः--भग; धाता-- धाता; विधाता--विधाता; वरुण: --वरूण; मित्र:--मित्र; शत्रु; --शत्रु; उरुक्रम: --उरुक्रम |

अब सुनो, मैं अदिति की वंश-परम्परा का तिथि-क्रमानुसार वर्णन कर रहा हूँ।

इस वंशमें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ नारायण ने स्वांश रूप में अवतार लिया।

अदिति के पुत्रों के नामइस प्रकार हैं--विवस्वान्‌, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र,शत्रु तथा उरुक्रम ।

विवस्वतः श्राद्धदेवं संज्ञासूयत वै मनुम्‌मिथुन च महाभागा यम॑ देव यरमीं तथा ।

सैव भूत्वाथ वडवा नासत्यौ सुषुवे भुवि ॥

४०॥

विवस्वत: --सूर्यदेव की; श्राद्धदेवम्‌-- श्राद्धदेव नामक; संज्ञा--संज्ञा ने; असूयत--जन्म दिया; बै--निस्सन्देह; मनुम्‌--मनु को; मिथुनम्‌--युगल; च--तथा; महा-भागा--परमभाग्यवती संज्ञा; यमम्‌ू--यमराज को; देवम्‌--देवता; यमीम्‌--उनकी बहन यमी को; तथा--और; सा--वह; एव-- भी; भूत्वा--होकर; अथ--तब; वडवा--घोड़ी; नासत्यौ--अश्विनीकुमारों को; सुषुबे--जन्म दिया; भुवि--पृथ्वी पर

सूर्यदेव विवस्वान्‌ की भाग्यवती पत्नी संज्ञा से श्राद्धदेव मनु तथा यमराज और यमुनानदी ( यमी ) का जोड़ा उत्पन्न हुआ।

तब यमी ने घोड़ी का रूप धारण करके इस पृथ्वी परविचरण करते हुए अश्विनी कुमारों को जन्म दिया।

छाया शनैश्वरं लेभे सावर्णि च मनुं ततः ।

कन्यां च तपतीं या वै वत्रे संवरणं पतिम्‌ ॥

४१॥

छाया--सूर्यदेव की अन्य पत्नी छाया ने; शनैश्वरम्‌--शनि को; लेभे--उत्पन्न किया; सावर्णिम्‌--सावर्णि; च--तथा;मनुम्‌-मनु को; तत:ः--उस ( विवस्वान्‌ ) से; कन्याम्‌--एक पुत्री; च-- भी; तपतीम्‌--तपती नाम की; या--जो; बै--निस्सन्देह; वब्रे--ब्याह किया; संवरणम्‌--संवरण को; पतिम्‌--पति।

सूर्य की अन्य पतली छाया से शनैश्वर तथा सावर्णि मनु नामक दो पुत्र तथा तपती नामकएक पुत्री उत्पन्न हई जिसने संवरण के साथ विवाह कर लिया।

अर्यम्णो मातृका पती तयोश्रर्षणय: सुता: ।

यत्र वै मानुषी जातिब्रह्वणा चोपकल्पिता ॥

४२॥

अर्यम्ण:--अर्यमा की; मातृका--मातृका; पत्नी--पत्ली; तयो:--उनके संयोग से; चर्षणय: सुता:--अनेक विद्वान पुत्र;यत्र--जिनमें; बै--निस्सन्देह; मानुषी--मनुष्य की; जाति: --जाति; ब्रह्मणा-- श्रीज्रह्मा के द्वारा; च--तथा;उपकल्पिता--सृष्टि की गई

अर्यमा की पत्नी मातृका की कुक्षि से कई विद्वान पुत्र उत्पन्न हुए।

श्रीत्रह्मा ने उन्हीं में सेमनुष्य की जातियों की सृष्टि की जो आत्म-निरीक्षण की प्रवृत्ति से सम्पन्न हैं।

पूषानपत्य: पिष्टादो भग्नदन्तोभवत्पुरा ।

योउसौ दक्षाय कुपितं जहास विवृतद्विज: ॥

४३॥

पूषा--पूषा; अनपत्य:--संतानरहित; पिष्ट-अदः--आटा खाकर निर्वाह करने वाला; भग्न-दन्तः--टूटे दाँतों वाला;अभवत््‌-हो गया; पुरा--प्राचीन काल में; यः--जो; असौ--वह; दक्षाय--दक्ष पर; कुपितम्‌--अत्यन्त क्रुद्ध; जहास--हँसा; विवृत-द्विजः --दाँत निकालकर।

पूषा के कोई सन्‍्तान नहीं हुईं।

जब भगवान्‌ शिव दक्ष पर क्रुद्ध हुए तो पूषा दाँतनिकाल कर हँसा था।

अतः उसके दाँत जाते रहे और तब से वह पिसा हुआ अन्न खाकरजीवन-निर्वाह करता रहा।

त्वष्टुदेत्यात्मजा भार्या रचना नाम कन्यका ।

सन्निवेशस्तयोर्जज्ञे विश्वरूपश्च वीर्यवान्‌ ॥

४४॥

त्वष्ठ:--त्वष्टा की; दैत्य-आत्म-जा--असुर की कन्या; भार्या--पत्नी; रचना--रचना; नाम--नाम की; कन्यका--कुमारी;सन्निवेश:--सन्निवेश; तयो: --उन दोनों के; जज्ञे--उत्पन्न हुआ; विश्वरूप: --विश्वरूप; च--तथा; वीर्यवान्‌--अत्यन्तबलशाली।

दैत्यों की पुत्री रचना प्रजापति त्वष्टा की पली बनी।

उसके गर्भ से सन्निवेश तथाविश्वरूप नामक दो अत्यन्त पराक्रमी पुत्र हुए।

त॑ बक्रिरे सुरगणा स्वस्त्रीयं द्विषतामपि ।

विमतेन परित्यक्ता गुरुणाड़िरसेन यत्‌ ॥

४५॥

तम्‌--उस ( विश्वरूप ) को; वक्रिरि--पुरोहित के रूप में स्वीकार किया; सुर-गणा:--देवताओं ने; स्वस्त्रीयम्‌--पुत्री कापुत्र; द्विषताम्‌ू--शत्रु असुरों की; अपि--यद्यपि; विमतेन-- अपमानित होकर; परित्यक्ता:--छोड़े हुए; गुरुणा--अपने गुरु;आड्िरसेन--बृहस्पति द्वारा; यत्‌ू-क्योंकि

यद्यपि विश्वरूप देवताओं के कट्टर शत्रु असुरों की पुत्री का पुत्र था, किन्तु उन्होंने ब्रह्माकी आज्ञा से उसे अपना पुरोहित बनाना स्वीकार किया।

देवताओं द्वारा अपमान किये जानेपर गुरु बृहस्पति ने इनका परित्याग कर दिया था, इसीलिए इन्हें पुरोहित की आवश्यकतापड़ी।

TO

← पिछला अध्याय · अगला अध्याय →

← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 6 की सूची