← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 6 की सूची
अध्याय सात: इंद्र ने अपने आध्यात्मिक गुरु बृहस्पति का अपमान किया।
6.7श्रीराजोबाचकस्य हेतोः परित्यक्ता आचार्येणात्मन: सुरा: ।
एतदाचक्ष्वभगवडिछष्याणामक्रमं गुरौ ॥
१॥
श्री-राजा उवाच--राजा ने पूछा; कस्य हेतो: --किस कारण से; परित्यक्ता:--त्यागे गये; आचार्येण --अपने गुरु बृहस्पतिद्वारा; आत्मन:--अपने ही; सुरा:--समस्त देवता; एतत्--यह; आचश्ष्व--कृपया वर्णन करें; भगवन्--हे मुनि ( शुकदेवगोस्वामी ); शिष्याणाम्--शिष्यों का; अक्रमम्-- अपराध; गुरौ--गुरु के प्रति।
महाराज परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा--हे महामुनि! देवताओं के गुरु बृहस्पतिने देवताओं का परित्याग क्यों किया जो उनके ही शिष्य थे।
देवताओं ने अपने गुरु के साथऐसा कौन सा अपराध किया ?
कृपया मुझसे इस घटना का वर्णन करें।
श्रीबादरायणिरुवाचइन्द्रस्त्रिभुवनै श्वर्यमदोल्लड्डितसत्पथ: ।
मरुद्धिर्वसुभी रुद्रैरादित्यैरभुभिनृप ॥
२॥
विश्वेदेवैश्व साध्यैश्व नासत्याभ्यां परिश्रितः ।
सिद्धचारणगन्धर्वैर्मुनिभिव्नह्मयवादिभि: ॥
३॥
विद्याधराप्सरोभिश्व किन्नरै: पतगोरगैः ।
निषेव्यमाणो मघवान्स्तूयमानश्च भारत ॥
४॥
उपगीयमानो ललितमास्थानाध्यासनाञितः ।
पाण्डुरेणातपत्रेण चन्द्रमण्डलचारुणा ॥
५॥
युक्तश्नान्यै: पारमेष्ठगैश्वामरव्यजनादिभि: ।
विराजमान: पौलम्या सहार्धासनया भूशम् ॥
६॥
स यदा परमाचार्य देवानामात्मनश्च ह ।
नाभ्यनन्दत सपम्प्रापंत प्रत्युत्थानासनादिभि: ॥
७॥
वाच्स्पतिं मुनिवरं सुरासुरनमस्कृतम् ।
नोच्चचालासनादि-न्द्र: पश्यन्नपि सभागतम् ॥
८॥
श्री-बादरायणि: उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया; इन्द्र:--राजा इन्द्र; त्रि-भुवन-ऐश्वर्य--तीनों लोकों के ऐश्वर्यका स्वामी होने के कारण; मद--घमंड से; उललड्डित--जिसने उल्लंघन किया; सत्-पथ:--वैदिक सभ्यता का मार्ग;मरुद्धि:ः--वायु के देवताओं द्वारा, जो मरुत्गण कहलाते हैं; वसुभि:--आठ वसुओं द्वारा; रुद्रैः --ग्यारह रुद्रों के द्वारा;आदित्यै:--आदित्यों के द्वारा; ऋभुभि: --ऋभुओं के द्वारा; नृप--हे राजन; विश्वेदेवै: च--तथा विश्वदेवों के द्वारा;साध्यै:--साध्यों के द्वारा; च-- भी; नासत्याभ्याम्-दोनों अश्विनीकुमारों द्वारा; परिश्रित:--घिरे हुए; सिद्ध--सिद्धलोकके निवासियों द्वारा; चारण--सभी चारण; गन्धर्वै: --तथा गन्धर्वों से; मुनिभि:--बड़े बड़े साधुओं द्वारा; ब्रह्मवादिभि: --अत्थन्त विद्वान निर्गुणवादियों द्वारा; विद्याधर-अप्सरोभि: च--तथा विद्याधरों और अप्सराओं द्वारा; किन्नरैः--किन्नरों केद्वारा; पतग-उरगै: --पक्षियों तथा सर्पो के द्वारा; निषेव्यमाण:--सेवित होकर; मघवानू--राजा इन्द्र; स्तूयबमान: च--तथास्तुति किये जाने पर; भारत--हे महाराज परीक्षित; उपगीयमान: --कीर्ति का गान होने पर; ललितम्--अत्यन्त मधुर;आस्थान--अपनी सभा में; अध्यासन-आश्रितः --सिंहासन पर विराजमान; पाण्डुरेण-- श्वेत; आतपत्रेण--सिर के ऊपर छत्र सहित; चन्द्र-मण्डल-चारुणा--चन्द्रमा के मंडल के समान सुन्दर; युक्त:--से युक्त; च अन्यै:--तथा अन्य से;पारमेष्ठबै:--महाराजोचित; चामर--चँवर; व्यजन-आदिभि:--पंखे आदि सामग्रियों से; विराजमान:--चमकता हुआ;पौलम्या-- अपनी पत्नी शच्ची के; सह--साथ; अर्ध-आसनया-- आधे सिंहासन पर स्थित; भूशम्-- अत्यधिक; सः--वह( इन्द्र )) यदा--जब; परम-आचार्यम्ू--परमादरणीय गुरु को; देवानाम्--समस्त देवताओं के; आत्मन:--स्वयं का; च--और; ह--निस्सन्देह; न--नहीं; अभ्यनन्दत--सत्कार किया; सम्प्राप्तम्--सभा में प्रकट होकर; प्रत्युत्थान--सिंहासन सेउठकर; आसन-आदिभि:--तथा आसन इत्यादि से; वाचस्पतिम्--देवताओं के पुरोहित, बृहस्पति को; मुनि-वरम्--साथुओं में श्रेष्ठ; सुर-असुर-नमस्कृतम्--देवताओं तथा असुरों के द्वारा समान रूप से सम्मानित; न--नहीं; उच्चचाल--उठकर खड़ा हुआ; आसनातू--सिंहासन से; इन्द्र: --इन्द्र; पश्यन् अपि--देखकर भी; सभा-आगतमू--सभा में आते हुए
शुकदेव गोस्वामी ने कहा--हे राजन्! एक बार तीनों लोकों के ऐश्वर्य से अत्यधिकगर्वित हो जाने के कारण स्वर्ग के राजा इन्द्र ने वैदिक आचार-संहिता का उल्लंघन करदिया।
वे सिंहासन पर आसीन थे और उनके चारों ओर मरूत, वसु, रुद्र, आदित्य, ऋभु,विश्वदेव, साध्य, अश्विनी-कुमार, सिद्ध, चारण, गंधर्व तथा सभी बड़े बड़े ऋषि मुनियों केअतिरिक्त विद्याधर, अप्सराएँ, किन्नर, पतग ( पक्षी ) तथा उरग (सर्प ) भी बैठे थे।
वे सभीइन्द्र की स्तुति और सेवा कर रहे थे और अप्सराएँ तथा गन्धर्व नृत्य कर रहे थे और अपनेमधुर वाद्ययंत्रों के साथ गायन कर रहे थे।
इन्द्र के सर पर पूर्ण चन्द्रमा के समान तेजवान् श्वेतछत्र तना था, चँवर झला जा रहा था और समस्त राजसी ठाठ-बाट सजा था।
इन्द्र अपनीअर्धांगिनी शचीदेवी सहित सिंहासन पर बैठे थे तभी उस सभा में परम साधु बृहस्पति काप्रवेश हुआ।
सर्वश्रेष्ठ साधु बृहस्पति इन्द्र समेत सभी देवताओं के गुरु थे और देवताओं तथाअसुरों के द्वारा समान रूप से सम्मानित थे।
तो भी अपने गुरु को समक्ष देखकर इन्द्र न तोअपने आसन से उठा, न अपने गुरु को बैठने के लिए आसन दिया और न उनका आदरपूर्वक सत्कार ही किया।
ततो निर्गत्य सहसा कविराड्डिरसः प्रभु: ।
आययौ स्वगहं तृष्णीं विद्वान्श्रीमदविक्रियाम् ॥
९॥
ततः--तत्पश्चात्; निर्गत्य--बाहर जाकर; सहसा--अचानक; कवि: --परम विद्वान; आड्रिरस: --बृहस्पति; प्रभु:--देवताओं के स्वामी; आययौ--लौटे; स्व-गृहम्--अपने घर को; तूष्णीम्--मौन; विद्वानू--ज्ञात करके; श्री-मद-विक्रियाम्--ऐ श्वर्य के मद से विकार ग्रस्त |
बृहस्पति को सब कुछ ज्ञात था कि भविष्य में क्या होने वाला है।
इन्द्र द्वारा सारेशिष्टाचार का उल्लंघन देखकर वे पूरी तरह समझ गये कि इन्द्र ऐश्वर्य के मद से फूल उठा है।
वे चाहते तो इन्द्र को शाप दे सकते थे, किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया।
वे उस सभा सेनिकलकर चुपचाप अपने घर चले आये।
तहींव प्रतिबुध्येन्द्रो गुर्हेलनमात्मन: ।
गहयामास सदसि स्वयमात्मानमात्मना ॥
१०॥
तहिं--तब तुरन्त; एव--निस्सन्देह; प्रतिबुध्य--समझकर; इन्द्र: --राजा इन्द्र; गुरु-हेलनम्--गुरु की अवहेलना;आत्मन:--अपने; गहईयाम् आस--पश्चात्ताप करने लगा; सदसि--उस सभा में; स्वयम्--स्वयं; आत्मानम्-- अपनेआपको; आत्मना--अपने द्वारा।
स्वर्ग के राजा इन्द्र ने तुरन्त ही अपनी भूल समझ ली।
यह जानते हुए कि उन्होंने अपनेगुरु का निरादर किया है, उन्होंने उस सभा के समस्त सदस्यों के समक्ष स्वयं ही अपनीभर्सना की।
अहो बत मयासाधु कृत॑ वै दभ्रबुद्धिना ।
यन्मयैश्चर्यमत्तेन गुरु: सदसि कात्कृत: ॥
११॥
अहो--ओह; बत--निस्सन्देह; मया--मेरे द्वारा; असाधु--निरादरपूर्ण; कृतम्-कार्य; बै--निश्चय ही; दक्न-बुद्धिना--मन्द बुद्धि होने से; यत्--क्योंकि; मया--मेरे द्वारा; ऐश्वर्य-मत्तेन--भौतिक एऐ श्वर्य के नशे में चूर होने के कारण; गुरु:--गुरु; सदसि--इस सभा में; कात्-कृत:--दुर्व्यवहार किया गया |
ओह! अपनी अल्प बुद्धि के कारण तथा भौतिक ऐश्वर्य के मद-वश मैंने यह क्या करलिया! जब मेरे गुरु इस सभा में प्रविष्ट हुए तो मैंने उनका सत्कार क्यों नहीं किया ?
सचमुचमैंने उनका अनादर किया है।
को गृध्येत्पण्डितो लक्ष्मीं त्रिपिषप्टपपतेरपि ।
ययाहमासुरं भावं नीतोउद्य विबुधेश्वरः ॥
१२॥
कः--कौन; गृध्येत्--स्वीकार करेगा; पण्डित:--विद्वान मनुष्य; लक्ष्मीम्--ऐश्वर्य; त्रि-पिष्ट-प-पतेः अपि--यद्यपि मैंदेवताओं का स्वामी हूँ; यया--जिससे; अहम्--मैं; आसुरम्--आसुरी; भावम्--विचार; नीत:--लाकर; अद्य-- अब;विबुध--देवताओं के, जो सतोगुण युक्त हैं; ईश्वर:--राजा |
यद्यपि मैं सतोगुणी देवताओं का राजा हूँ, किन्तु थोड़े से ऐश्वर्य से गर्वित और अहंकारसे दूषित था।
भला ऐसी दशा में कौन इस ऐश्वर्य को स्वीकार करेगा जिससे उसका पतनहो?
हाय! मेरे धन एवं ऐश्वर्य को धिक्कार है! यः पारमेष्ठयं धिषणमधितिष्ठन्न कञ्नन ।
प्रत्युत्तिष्ठेदिति ब्रूयुर्धर्म ते न परं विदु: ॥
१३॥
यः--जो भी; पारमेछ्यम्--राजसी; धिषणम्--सिंहासन पर; अधितिष्ठन्-- आसीन; न--नहीं; कञज्लन--कोई भी;प्रत्युत्तिष्ठेत्--पहले उठना चाहिए; इति--इस प्रकार; ब्रूयु:--जो ऐसा कहते हैं; धर्मम्--धर्मादेश; ते--वे; न--नहीं;परम्--अत्यधिक; विदुः:--जानते हैं |
यदि कोई यह कहे कि राजा के उच्च सिंहासन पर आसीन व्यक्ति को दूसरे राजा याब्राह्मण के सत्कार हेतु उठकर खड़ा नहीं होना चाहिए, तो यही समझना चाहिए कि वह श्रेष्ठ धार्मिक नियमों को नहीं जानता।
तेषां कुपथदेष्टणां पततां तमसि हाथ: ।
ये श्रद्दध्युर्वचस्ते वै मज्जन्त्यश्मप्लवा इब ॥
१४॥
तेषाम्--उन ( बुरे नेताओं ) का; कु-पथ-देष्टणाम्--कुमार्ग दिखाने वाले; पतताम्ू--स्वयं गिरकर; तमसि--अंधकार में;हि--निस्सन्देह; अध:--नीचे; ये--जो कोई; श्रद्ृध्यु;-- श्रद्धा रखते हैं; वच: --शब्द; ते--वे; बै--निस्सन्देह; मजजन्ति--डूब जाते हैं; अश्म-प्लवा:--पत्थर की नाव; इब--के समान |
जो नेता अज्ञानी हैं और लोगों को विनाश के कुमार्ग पर ले जाते हैं ( जैसा कि पिछलेइलोक में कहा गया है ) वे वास्तव में पत्थर की नाव पर सवार हैं और उनके पीछे अंधेहोकर चलने वाले भी वैसे हैं।
पत्थर की नाव पानी में नहीं तैर सकती ।
वह तो यात्रियों समेतपानी में डूब जायेगी।
इसी प्रकार जो लोग मनुष्यों को कुमार्ग पर ले जाते हैं, वे अपनेअनुयायियों समेत नरक को जाते हैं।
अथाहममराचार्यमगाधधिषणं द्विजम् ।
प्रसादयिष्ये निशठ: शीर्ष्णा तच्चरणं स्पृशन् ॥
१५॥
अथ--अत:; अहमू--मैं; अमर-आचार्यम्ू--देवताओं के गुरु को; अगाध-धिषणम्--अगाध आतमज्ञान से युक्त; द्विजम्ू--पूर्ण ब्राह्मण को; प्रसादयिष्ये--मैं प्रसन्न करूँगा; निशठ:--बिना कपट के; शीर्ष्णा--अपने शिर से; तत्-चरणम्--उनकेचरणकमल का; स्पृशन्--स्पर्श करके |
राजा इन्द्र ने कहा--अतः अब मैं अत्यन्त खुले मन से तथा निष्कपट भाव से देवताओं के गुरु बृहस्पति के चरणारविन्द में अपना शीश झुकाऊँगा।
सात्त्विक होने के कारण वेसमस्त ज्ञान से पूर्णतया अवगत हैं और ब्राह्मणों में श्रेष्ठ हैं।
अब मैं उनके चरणारविन्द कास्पर्श करके उन्हें प्रसन्न करने के उद्देश्य से प्रणाम करूँगा।
एवं चिन्तयतस्तस्य मघोनो भगवान्गृहात् ।
बृहस्पतिर्गतो हृष्टां गतिमध्यात्ममायया ॥
१६॥
एवम्--इस प्रकार; चिन्तयतः --गम्भीरतापूर्वक सोचते हुए; तस्थय--वह; मघोन: --इन्द्र; भगवान्--परम शक्तिमान;गृहात्--अपने घर से; बृहस्पति: --बृहस्पति; गत: --चले गये; अदृष्टामू--अदृश्य; गतिम्ू--दशा को; अध्यात्म --आत्मचेतना में अत्यधिक उठा हुआ होने के कारण; मायया--अपनी शक्ति से
जिस समय देवताओं के राजा इन्द्र इस प्रकार सोच रहे थे और अपनी ही सभा मेंपश्चात्ताप कर रहे थे, परम शक्तिमान गुरु बृहस्पति उनके भाव को जान गये।
अतः अदृश्यहोकर वे अपने घर से चले गये, क्योंकि राजा इन्द्र की अपेक्षा वे आत्मज्ञान में अत्यधिकआगे थे।
गुरोर्नाधिगतः संज्ञां परीक्षन्भगवान्स्वराट् ।
ध्यायन्धिया सुरैर्युक्त: शर्म नालभतात्मन: ॥
१७॥
गुरो:--अपने गुरु का; न--नहीं; अधिगत:--पाकर; संज्ञामू-चिह्न; परीक्षन्ू--चारों ओर खोजते हुए; भगवान्--महान्शक्तिशाली इन्द्र; स्वराट्--स्वतंत्र; ध्यायन्ू-- ध्यान धरते हुए; धिया--बुद्द्धि से; सुरै:--देवताओं से; युक्त:--घिरे हुए;शर्म--शान्ति; न--नहीं; अलभत-प्राप्त किया; आत्मन:--मानसिक ।
यद्यपि इन्द्र ने अन्य देवताओं की सहायता से गुरु बृहस्पति की काफी खोजबीन की,किन्तु वे उन्हें न पा सके।
तब इन्द्र ने सोचा, 'हाय! मेरे गुरु मुझसे अप्रसन्न हो गये हैं औरअब सौभाग्य प्राप्त करने का मेरे पास कोई अन्य साधन नहीं रह गया है।
यद्यपि इन्द्रदेवताओं से घिरे हुए थे, किन्तु उन्हें मानसिक शान्ति नहीं मिल सकी।
तच्छुत्वैवासुरा: सर्व आश्नित्यौशनसं मतम् ।
देवाय्प्रत्युद्यमं चक्रुर्दुमदा आततायिन: ॥
१८॥
तत् श्रुत्वा--उस समाचार को सुनकर; एव--निस्सन्देह; असुरा:--असुर; सर्वे--सभी; आश्रित्य--शरण जाकर;औशनसम्ू-शुक्राचार्य के; मतम्--आदेश; देवान्ू--देवता; प्रत्युद्यमम्--के विरुद्ध आक्रमण; चक्रु:--किया;दुर्मदा: --मूर्ख; आततायिन:--युद्ध के लिए शस्त्रास्त्रों से सज्जित
इन्द्र की दयनीय दशा का समाचार पाकर असुरों ने अपने गुरु शुक्राचार्य के आदेश सेअपने आपको हथियारों से सज्जित किया और देवताओं के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया।
तैविसूष्टेषुभिस्ती&णर्निभिन्नाड्रोसुबाहव: ।
ब्रह्माणं शरणं जग्मु: सहेन्द्रा नतकन्धरा: ॥
१९॥
तैः--उनके ( असुरों के ) द्वारा; विसृष्ट--फेंके गये; इषुभि:--तीरों के द्वारा; तीक्षणै:--अत्यन्त नुकीले; निर्भिन्न-- भेदकर;अड्ग--शरीर; उरु--जंघा; बाहव:ः--तथा भुजाएँ; ब्रह्मणम्--ब्रह्मजी की; शरणम्--शरण में; जग्मु:--गये; सह-इन्द्रा:--राजा इद्ध के साथ; नत-कन्धरा:--अपने शीश झुकाये हुए
जब असुरों के तीक्ष्ण बाणों से देवताओं के शिर, जंघाएँ, बाँहें तथा शरीर के अन्य अंगक्षत-विक्षत हो गये तो इन्द्र समेत सभी देवता, कोई अन्य उपाय न देखकर नतमस्तक होकरतुरन्त श्रीत्रह्म की शरण लेने तथा उचित आदेश प्राप्त करने के लिए पहुँचे।
तांस्तथाभ्यर्दितान्वीक्ष्य भगवानात्मभूरज: ।
कृपया परया देव उवाच परिसान्त्वयन् ॥
२०॥
तान्--उनको ( देवताओं को ); तथा--उस प्रकार; अभ्यर्दितान्--असुरों के हथियारों से चोट खाकर; वीक्ष्य--देखकर;भगवान्--परम शक्तिमान; आत्म- भू: --ब्रह्मा जी; अज:--जो सामान्य जन की तरह जन्म नहीं लेता; कृपया--अहैतुकीकृपावश; परया--अधिक; देव: -- श्री ब्रह्म ने; उवाच--कहा; परिसान्त्वयन्--उन्हें सान्त्वना देकर |
जब सर्वाधिक शक्तिमान ब्रह्माजी ने असुरों के बाणों से शरीर बुरी तरह घायल हुएदेवताओं को अपनी ओर आते देखा तो उन्होंने अपनी अहैतुकी कृपावश उन्हें ढाढ़स बँधायाऔर इस प्रकार बोले।
श्रीब्रह्मोवाचअहो बत सुरक्रेष्ठा हाभद्रं वः कृतं महत् ।
ब्रहिष्ट ब्राह्मणं दान्तमैश्चर्यान्नाभ्यनन्द्त ॥
२१॥
श्री-ब्रह्मा उवाच-- श्रीब्रह्मा ने कहा; अहो--ओह; बत--बड़ा आश्चर्य है; सुर-श्रेष्ठा:--हे देवताओं में श्रेष्ठ; हि--निस्सन्देह; अभद्रमू--अन्याय; व:--तुम्हारे द्वारा; कृतमू--किया हुआ; महत्--महान्; ब्रहिष्ठटम्--परब्रह्म के प्रतिआज्ञाकारी पुरुष; ब्राह्मणम्--ब्राह्मण का; दान्तम्ू--मन तथा इन्द्रियों को वश में करने वाला; ऐश्वर्यात्--अपने भौतिकऐश्वर्य से; न--नहीं; अभ्यनन्दत--उचित रीति से स्वागत किया।
श्रीब्रह्मा ने कहा, हे श्रेष्ठ देवताओ! तुम लोगों ने अपने ऐश्वर्य-मद के कारण सभा मेंआने पर बृहस्पति का सत्कार नहीं किया।
वे परब्रह्म-ज्ञाता और इन्द्रियों को वश में रखनेवाले हैं, अतः वे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ हैं।
अतः यह अत्यन्त आश्चर्यजनक है कि तुम लोगों नेउनके साथ इस प्रकार दुर्व्यवहार किया है।
तस्यायमनयस्यासीत्परेभ्यो व: पराभव: ।
प्रक्षीणेभ्य: स्ववैरिभ्य: समृद्धानां च यत्सुरा: ॥
२२॥
तस्य--उस; अयम्--यह; अनयस्य--तुम्हारी कृतघ्नता का; आसीत्--था; परेभ्य:--अन्यों के द्वारा; व:--तुम सबों की;पराभव:--पराजय; प्रक्षीणेभ्य:--निर्बल होते हुए भी; स्व-वैरिभ्य:--तुम्हारे अपने शत्रुओं द्वारा जो पहले तुम्हारे द्वारापराजित हुए थे; समृद्धानाम्--तुम्हारे ऐश्वर्यशाली होने से; च--तथा; यत्--जो; सुरा:--हे देवो
हे देवो! तुम लोग बृहस्पति के प्रति किये गये अपने दुराचरण के कारण असुरों के द्वारापराजित हुए हो।
अन्यथा असुर तो अत्यन्त निर्बल थे और तुम लोगों के द्वारा अनेक बारपराजित हो चुके थे।
भला फिर ऐश्वर्य से इतना समृद्ध होते हुए तुम लोग उनसे कैसे हारसकते थे?
मघवन्द्रिषतः पश्य प्रक्नीणान्गुर्वतिक्रमात्सम्प्रत्युपचितान्भूय: काव्यमाराध्य भक्तितः ।
आददीरन्निलयनं ममापि भृगुदेवता: ॥
२३॥
मघवनू--हे इन्द्र; द्विषतः--तुम्हारे शत्रु; पश्य--जरा देखो; प्रक्षीणान्ू--( पहले ) अत्यन्त निर्बल होने से; गुरु-अतिक्रमात्--अपने गुरु शुक्राचार्य का अनादर करने से; सम्प्रति--इस समय; उपचितानू--शक्तिशाली; भूय: -- पुनः ;काव्यम्ू--अपने गुरु, शुक्राचार्य को; आराध्य--पूजा करके; भक्तित:--अत्यन्त भक्ति सहित; आददीरन्--ले सकते हैं;निलयनम्--धाम, सत्यलोक को; मम--मेरा; अपि--भी; भृगु-देवता:-- भूगु के शिष्य शुक्राचार्य के प्रबल भक्त |
हे इन्द्र! तुम्हारे शत्रु असुरगण शुक्राचार्य के प्रति अनादर करने के कारण अत्यन्त निर्बलहो गये थे, किन्तु अब उन्होंने अत्यन्त भक्तिपूर्वक शुक्राचार्य की पूजा की है, अतः वे पुनःबलशाली बन गये हैं।
अपनी भक्ति के द्वारा उन्होंने अपनी शक्ति इतनी बढ़ा ली है, कि वेअब मुझसे मेरा धाम ( सत्यलोक ) तक लेने में समर्थ हो चुके हैं।
त्रिपिष्टपं कि गणयन्त्यभेद्य-मन्त्रा भूगूणामनुशिक्षितार्था: ।
न विप्रगोविन्दगवी श्वराणांभवन्त्यभद्राणि नरेश्वराणाम् ॥
२४॥
त्रि-पिष्ट-पम्--ब्रह्म जी सहित सभी देवतागण; किम्--क्या; गणयन्ति--परवाह करते हैं; अभेद्य-मन्त्रा:--गुरु के आदेशोंके पालन के लिए हृढ़प्रतिज्ञ; भूगूणाम्-- भूगूमुनि के शिष्यों का, यथा शुक्राचार्य; अनुशिक्षित-अर्था:--शिक्षाओं कापालन करने के हेतु; न--नहीं; विप्र--ब्राह्मण; गोविन्द-- भगवान् श्रीकृष्ण; गो--गाएँ; ईश्वराणाम्--पूजनीय व्यक्तियोंका; भवन्ति-- हैं; अभद्राणि--दुर्भाग्य; नर-ईश्वराणाम्-- अथवा उन राजाओं को जो इस नियम का पालन करते हैं
शुक्राचार्य के शिष्य, असुरगण अपने गुरु की शिक्षाओं के पालन में हृढ़प्रतिज्ञ होने केकारण देवताओं की अब तनिक भी परवाह नहीं करते।
सच तो यह है कि जो राजा अथवाअन्य व्यक्ति ब्राह्मणों, गायों तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण की कृपा में अटूट श्रद्धारखते हैं और इन तीनों की सदैव पूजा करते हैं, वे अपनी स्थिति में सदैव बलशाली रहते हैं।
तद्ठिश्वरूपं भजताशु विप्रंतपस्तिनं त्वाष्टमथात्मवन्तम् ।
सभाजितो४र्थान्स विधास्यते वोयदि क्षमिष्यध्वमुतास्य कर्म ॥
२५॥
तत्--अतः; विश्वरूपमू--विश्वरूप; भजत--गुरु रूप में पूजा करो; आशु--शीघ्र ही; विप्रम्ू-पूर्ण ब्राह्मण;तपस्विनम्--तपस्वी; त्वाषप्टम्-्वष्टा के पुत्र; अथ--तथा; आत्म-वन्तम्--अत्यन्त स्वतंत्र; सभाजित:--पूज्य; अर्थानू--स्वार्थ; सः--वह; विधास्यते--पूरा करेगा; व:--तुम सबों का; यदि--यदि; क्षमिष्यध्वम्--तुम सहन करो; उत--निस्सन्देह; अस्य--उसका; कर्म--कार्य ( दैत्यों की सहायता का )
हे देवो! मैं तुम्हें त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप के पास जाने का आदेश देता हूँ।
तुम उन्हें अपनागुरु स्वीकार करो।
वे अत्यन्त शुद्ध एवं शक्तिशाली तपस्वी ब्राह्मण हैं।
तुम्हारी पूजा से प्रसन्नहोकर वे तुम्हारी इच्छाओं को पूर्ण करेंगे, यदि तुम लोग उनके असुरों के प्रति झुकाव कोसहन कर सको।
श्रीशुक उबाचत एवमुदिता राजन्ब्रह्मणा विगतज्वरा: ।
ऋषिं त्वाष्ट्रमुपब्रज्य परिष्वज्येदमब्रुवन् ॥
२६॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; ते--सभी देवता; एवम्--इस प्रकार; उदिता:--शिक्षा पाकर; राजन्ू--हेराजा परीक्षित; ब्रह्मणा-- श्रीत्रह्मा द्वारा; विगत-ज्वरा: --असुरों द्वारा दिये जाने वाले कष्टों से मुक्त होकर; ऋषिम्--परमसाधु; त्वाष्टम्-त्वष्टा के पुत्र के पास; उपब्रज्य--जाकर; परिष्वज्य--हृदय से लगाकर; इृदम्--यह; अन्लुवन्--बोले।
श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा इस प्रकार श्रीब्रह्मा के द्वारा आदेशित एवं अपनीचिन्ता से मुक्त होकर सभी देवता त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप ऋषि के पास गये।
हे राजन! उन्होंनेविश्वरूप को हृदय से लगा लिया और इस प्रकार बोले।
श्रीदेवा ऊचुःबय॑ तेडतिथय: प्राप्ता आश्रमं भद्रमस्तु ते ।
काम: सम्पाद्यतां तात पितृणां समयोचित: ॥
२७॥
श्री-देवा: ऊचु:--देवताओं ने कहा; वयम्--हम सब; ते--तुम्हारे; अतिथय: -- अतिथि, मेहमान; प्राप्ता:--आये हैं;आश्रमम्--तुम्हारे आवास; भद्रमू--कल्याण; अस्तु--हो; ते--तुम्हारा; काम:--कामना; सम्पाद्यताम्--पूरी हो; तात--हेप्रिय; पितृणाम्--तुम्हारे पिता के तुल्य हम सबों का; समयोचित:--इस समय के अनुकूल, सामयिक।
देवताओं ने कहा, हे विश्वरूप! तुम्हारा कल्याण हो।
हम सभी देवता तुम्हारे अतिथि होकर तुम्हारे आश्रम में आये हैं।
चूँकि हम तुम्हारे पिता तुल्य हैं इसलिए समयानुसार हमारीइच्छाओं को पूरा करो।
पुत्राणां हि परो धर्म: पितृशुश्रूषणं सताम् ।
अपि पुत्रवतां ब्रह्मन्किमुत ब्रह्मचारिणाम् ॥
२८ ॥
पुत्राणाम्--पुत्रों का; हि--निस्सन्देह; पर: -- श्रेष्ठ; धर्म: --धर्म; पितृ-शुश्रूषणम्--पितरों की सेवा; सताम्ू--उत्तम;अपि- भी; पुत्र-वताम्--पुत्रवानों का; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; किम् उत--क्या कहना; ब्रह्मचारिणाम्--ब्रह्मचारियों का
हे ब्राह्मण! पुत्र का परम धर्म है कि वह अपने माता-पिता की सेवा करेभले ही उसकेभी अपने पुत्र क्यों न हों और फिर उस पुत्र का क्या कहना जो ब्रह्मचारी हो ?
आचार्यो ब्रह्मणो मूर्ति: पिता मूर्ति: प्रजापते: ।
भ्राता मरुत्पतेमूर्तिमाता साक्षात्क्षितेस्तनु; ॥
२९॥
दयाया भगिनी मूर्तिर्धर्मस्यात्मातिथि: स्वयम् ।
अग्नेरभ्यागतो मूर्ति: सर्वभूतानि चात्मन:ः ॥
३०॥
आचार्य:--अपने आचरण द्वारा वैदिक ज्ञान प्रदान करने वाला शिक्षक या गुरु; ब्रह्मण: --समस्त वेदों की; मूर्ति: --साक्षात्; पिता--पिता; मूर्ति:--साक्षात्; प्रजापते:-- श्रीज्रह्मा की; भ्राता-- भाई; मरुतू-पतेः मूर्ति:--साक्षात् इन्द्र; माता--माता; साक्षात्--साक्षात्; क्षिते:--पृथ्वी का; तनु:--शरीर; दयाया:--कृपा की; भगिनी--बहन; मूर्ति:--साक्षात्;धर्मस्थ-- धर्म का; आत्म--स्वयं; अतिथि:--अतिथि; स्वयम्--स्वयं; अग्ने:--अग्निदेव का; अभ्यागत:--आमंत्रितमेहमान; मूर्तिः--साक्षात्; सर्व-भूतानि--समस्त जीव; च--तथा; आत्मन:--परमे श्वर विष्णु का |
आचार्य अर्थात् गुरु, जो समस्त वैदिक ज्ञान की शिक्षा देता है और यज्ञोपवीत प्रदानकरके दीक्षित करता है साक्षात् वेद है।
इसी प्रकार पिता ब्रह्मा का रूप, भाई राजा इन्द्र का,माता पृथ्वीलोक तथा बहन कृपा की, अतिथि धर्म का, आमंत्रित मेहमान अग्निदिव का औरसमस्त जीव भगवान् विष्णु का साक्षात् रूप होते हैं।
तस्मात्पितृणामार्तानामार्ति परपराभवम् ।
तपसापनयंस्तात सन्देशं कर्तुमहसि ॥
३१॥
तस्मात्ू--अतः ; पितृणाम्--पितरों का; आर्तानाम्ू--जो संकट ग्रस्त हैं; आर्तिमू--शोक; पर-पराभवम्--शत्रुओं द्वारापराजित होकर; तपसा--तुम्हारे तपोबल से; अपनयन्--हटाकर; तात--हे पुत्र; सन्देशम्--हमारी इच्छा; कर्तुम् अहसि--पूरा करने में समर्थ हो।
हे पुत्र! हम अपने शत्रुओं से पराजित होने के कारण अत्यन्त शोकमग्न हैं।
तुम अपनेतपोबल से हमारे कष्टों को दूर करके हमारी इच्छाओं को पूरा करो।
हमारी प्रार्थनाओं कोपूरा करो।
वृणीमहे त्वोपाध्यायं ब्रहविष्ठ॑ ब्राह्मणं गुरुम् ।
यथाझ्जसा विजेष्याम: सपत्नांस्तव तेजसा ॥
३२॥
वृणीमहे--हम चुनते हैं; त्वा--तुमको; उपाध्यायमू-शिक्षक तथा गुरु; ब्रहिष्टम्-परब्रह्म को पूरी तरह जानने के कारण;ब्राह्मणम्--योग्य ब्राह्मण; गुरुम्-पूर्ण गुरु; यथा--जिससे; अज्ञसा--सरलता से; विजेष्याम:--हम पराजित कर सकें;सपत्नान्ू--अपने प्रतिद्वन्द्दी को; तब--तुम्हारे; तेजसा--तपोबल से
चूँकि तुम परब्रह्म से पूर्णतया परिचित हो और पूर्ण ब्राह्मण हो, अतः तुम जीवन केसभी आश्रमों के गुरु हो।
हम तुम्हें अपना गुरु तथा अध्यक्ष स्वीकार करते हैं जिससे तुम्हारेतपोबल से हम अपने उन शत्रुओं को, जिन्होंने हमें परास्त किया है, सरलता से जीत सकें।
न गर्हयन्ति ह्ार्थेषु यविष्ठाइट्यभिवादनम् ।
छन्दोभ्योउन्यत्र न ब्रह्मन्वयो ज्यैप्यस्य कारणम् ॥
३३॥
न--नहीं; गहयन्ति--मना करते हैं; हि--निस्सन्देह; अर्थेषु--स्वार्थ के लिए; यविष्ठ-अड्घ्रि--अपने से छोटे केचरणकमलों पर; अभिवादनम्--नमस्कार; छन्दोभ्य:--वैदिक मंत्रों से; अन्यत्र--छोड़कर; न--नहीं; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण;वयः--आयु; ज्यैछ्यस्य--गुरुता का; कारणम्--कारण
देवताओं ने आगे कहा हमसे छोटे होने के कारण अपनी आलोचना से मत डरो।
ऐसाशिष्टाचार वैदिक मंत्रों पर लागू नहीं होता।
वैदिक मंत्रों को छोड़कर, सर्वत्र गुरुता आयु सेनिर्धारित होती है, किन्तु यदि कोई वैदिक मंत्रों के उच्चारण में बढ़ाचढ़ा हो तो ऐसे कमआयु वाले व्यक्ति को भी नमस्कार किया जा सकता है।
अतः तुम भले ही सम्बन्ध में हमसेछोटे हो, किन्तु तुम बिना किसी हिचक के हमारे पुरोहित हो सकते हो।
श्रीऋषिरुवाचअभ्यर्थितः सुरगणै: पौरहित्ये महातपा: ।
स विश्वरूपस्तानाह प्रसन्न: श्लक्ष्णया गिरा ॥
३४॥
श्री-ऋषि: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अभ्यर्थित: --प्रार्थना किये जाने पर; सुर-गणै:--देवताओं द्वारा;पौरहित्ये--पुरोहिती स्वीकार करने के लिए; महा-तपा:--परम तपस्वी; सः--वह; विश्वरूप:--विश्वरूप; तान्ू--देवताओंसे; आह--बोला; प्रसन्न:--प्रसन्न होकर; श्लक्ष्णया--मृदु; गिरा--वाणी से
शुकदेव गोस्वामी ने कहा जब सब देवताओं ने महान् विश्वरूप से पुरोहित बनने के लिएप्रार्थना की तो महातपस्वी विश्वरूप अत्यन्त प्रसन्न हुए।
उन्होंने उन्हे इस प्रकार उत्तर दिया।
श्रीविश्वरूप उवाचविगर्तितं धर्मशीलैब्रहावर्चउपव्ययम् ।
कर्थ॑ नु मद्विधो नाथा लोकेशैरभियाचितम्प्रत्याख्यास्यति तच्छिष्य: स एव स्वार्थ उच्यते ॥
३५॥
श्री-विश्वरूप: उबाच-- श्री विश्वरूप ने कहा; विगर्हितम्--निन्दनीय; धर्म-शीलै:-- धर्म में आस्था रखने वाले; ब्रह्म-वर्च:--ब्राह्मण के तेज का; उपव्ययम्-- क्षीण करता है; कथम्--कैसे; नु--निस्सन्देह; मत्ू-विध:--मुझ जैसा पुरुष;नाथा:--हे स्वामीगण; लोक-ईशै:--विभिन्न लोकों के शासकों द्वारा; अभियाचितम्--विनय; प्रत्याख्यास्यति--मनाकरेगा; तत्-शिष्य: --उनका शिष्य; स:--वह; एव--निस्सन्देह; स्व-अर्थ:--वास्तविक हित, स्वार्थ; उच्यते--कहलाताहै।
श्री विश्वरूप ने कहा, हे देवो! यद्यपि पुरोहिती स्वीकारने की निन््दा की जाती है, किइसकी स्वीकृति से पूर्ब-अर्जित ब्रह्मतेज घटता है, किन्तु मुझ जैसा व्यक्ति आपकी व्यक्तिगतप्रार्थना को कैसे ठुकरा सकता है?
आप सभी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के महान् आदेशक हैं।
मैं तोआपका शिष्य हूँ और मुझे तो आपसे अनेक शिक्षाएँ ग्रहण करनी चाहिए।
अतः मैं आपको'न' नहीं कर सकता।
मैं अपने ही स्वार्थ के लिए इसे स्वीकार करता हूँ।
अकिझ्जनानां हि धनं शिलोउ्छनंतेनेह निर्वर्तितसाधुसत्क्रिय: ।
कथ॑ विगर् नु करोम्यधी श्वरा:पौरोधसं हृष्यति येन दुर्मति: ॥
३६॥
अकिद्ञनानाम्--उन पुरुषों का जिन्होंने संसार से विरक्त होने के लिए तपस्या करनी स्वीकार की है; हि--निश्चय ही;धनमू--सम्पत्ति; शिल--खेत में गिरे हुए अन्न का संग्रह; उब्छनम्--थोक बाजार में गिरे हुए अन्न का संग्रह; तेन--उसउपाय के द्वारा; हह--यहाँ; निर्वर्तित--प्राप्त करके; साधु--महान् साधुओं के; सत्-क्रिय:ः--समस्त पुण्य कर्म; कथम्--कैसे; विगर्ईम्--निन्दनीय; नु--निस्सन्देह; करोमि-- करूँगा; अधीश्वरा:--हे लोकों के महान् अधीक्षको; पौरोधसम्--पुरोहिती कर्म; हृष्यति--प्रसन्न होता है; येन--जिससे; दुर्मतिः:--अल्पज्ञानी
है लोकपालो! सच्चा ब्राह्मण वह है, जिसके कोई भौतिक सम्पत्ति नहीं होती है, वहशिलोच्छन वृत्ति से ही अपना उदर-पोषण करता है।
दूसरे शब्दों में, वह खेतों में गिरे हुएऔर बड़े-बड़े हाट-स्थलों पर गिरे हुए अन्न को बीनता है।
इस प्रकार गृहस्थ ब्राह्मण जोवास्तव में तपस्या के सिद्धान्त का पालन करते हुए स्वयं का तथा अपने परिवार का भरणकरता है और आवश्यक पुण्य कर्म करता रहता है।
जो ब्राह्मण पुरोहिती कर्म द्वारा धनअर्जित करके सुखी बनना चाहता है, वह अत्यन्त तुच्छ मन वाला होता है।
बताओ, मैं इसपुरोहिती को कैसे स्वीकार करूँ ?
तथापि न प्रतिब्रूयां गुरुभिः प्रार्थितं कियत् ।
भवतां प्रार्थितं सर्व प्राणैरथैश्व साधये ॥
३७॥
तथा अपि--तो भी; न--नहीं; प्रतिब्रूयाम्--मैं अस्वीकार कर सकता हूँ; गुरुभि:--अपने गुरु तुल्य व्यक्तियों के द्वारा;प्रार्थितम्--प्रार्थना; कियत्--तुच्छ; भवताम्--आप सबों की; प्रार्थितम्--इच्छा; सर्वम्--पूर्ण ; प्राणै:--अपने जीवन से;अर्थै:--अपने धन से; च-- भी; साधये--मैं पूरा करूँगाआप सभी मुझसे बड़े हैं।
अतः भले ही पुरोहिती को स्वीकार करना निन्दनीय है, मैंआप लोगों की छोटी-से-छोटी प्रार्थना को नकार नहीं सकता।
मैं आपका पुरोहित बननास्वीकार करता हूँ।
मैं अपना जीवन तथा धन अर्पित करके आपकी प्रार्थना पूरी करूँगा।
श्रीबादरायणिरुवाचतेभ्य एवं प्रतिश्रुत्य विश्वरूपो महातपा: ।
पौरहित्यं वृतश्चक्रे परमेण समाधिना ॥
३८॥
श्री-बादरायणि: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; तेभ्य:--उन ( देवताओं ) को; एवम्--इस प्रकार; प्रति श्रुत्य--वचन देकर; विश्वरूप:--विश्वरूप; महा-तपा:--महापुरुष; पौरहित्यम्ू--पुरोहिती कार्य; वृत:--उनके द्वारा घिरा; चक्रे --करने लगे; परमेण--- परम; समाधिना--मनोयोग से
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा हे राजन्! देवताओं को यह वचन देकर, चारों ओरसे देवताओं से घिरे हुए महान् विश्वरूप अत्यन्त उत्साह एवं मनोयोग से आवश्यक पुरोहितीकर्म करने लगा।
सुरद्विषां थ्रियं गुप्तामौशनस्यापि विद्यया ।
आच्चिद्यादान्महेन्द्राय वैष्णव्या विद्यया विभु: ॥
३९॥
सुर-द्विषामू-देवों के शत्रु; अयम्--ऐश्वर्य; गुप्तामू--सुरक्षित; औशनस्य--शुक्राचार्य की; अपि--यद्यपि; विद्यया--प्रतिभा से; आच्छिद्य--संग्रह करके; अदात्--दिया है; महा-इन्द्राय--राजा इन्द्र को; वैष्णव्या-- भगवान् विष्णु की;विद्यया-प्रार्थना से; विभु:--अत्यन्त शक्तिमान विश्वरूप
यद्यपि शुक्राचार्य ने अपनी प्रतिभा एवं नीति-बल से देवताओं के शत्रुओं के नाम से विख्यात असुरों के ऐश्वर्य को सुरक्षित कर दिया था, किन्तु अत्यन्त शक्तिमान विश्वरूप नेनारायण कवच नामक एक सुरक्षात्मक स्तोत्र की रचना की।
इस बुद्ध्रिमत्तापूर्ण मंत्र सेउन्होंने असुरों का ऐश्वर्य छीन कर स्वर्ग के राजा इन्द्र को दे दिया।
यया गुप्त: सहस्त्राक्षो जिग्येउसुरचमूर्विभु: ।
तां प्राह स महेन्द्राय विश्वरूप उदारधी: ॥
४०॥
यया--जिससे; गुप्त:--सुरक्षित; सहस्त्र-अक्ष: --एक हजार नेत्रों वाले इन्द्र देवता ने; जिग्ये--जीता; असुर--असुरों की;चमू:--सैन्यशक्ति; विभु:--अत्यन्त शक्तिशाली होकर; ताम्--उससे; प्राह--बोला; स: महेन्द्राय--स्वर्ग के राजा महेन्द्रको; विश्वरूप: --विश्वरूप; उदार-धी: --अत्यन्त उदार चित्त वाला।
अत्यन्त उदारचित्त वाले विश्वरूप ने राजा इन्द्र ( सहस्त्राक्ष ) को वह गुप्त स्तोत्र बता दियाजिससे इन्द्र की रक्षा हो सकी और असुरों की सैन्यशक्ति जीत ली गई।
