← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 6 की सूची
अध्याय आठ: नारायण-कवच ढाल
6.8श्रीराजोबाचयया गुप्तः सहस्त्राक्ष: सवाहात्रिपुसैनिकान् ।
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे अ्ियम् ॥
१॥
भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम् ।
यथाततायिनः शत्रून्येन गुप्तोडजयन्मृथे ॥
२॥
श्री-राजा उवाच--राजा परीक्षित ने कहा; यया--जिससे ( आध्यात्मिक-कवच से ); गुप्त: --सुरक्षित; सहस्त्र-अक्ष:--एकहजार नेत्रों वाला राजा इन्द्र; स-वाहान्ू--अपने वाहनों सहित; रिपु-सैनिकान्--शत्रुओं के सिपाही तथा सेना-नायक;क्रीडन् इब--खेल के समान; विनिर्जित्य--जीतकर; त्रि-लोक्या:--तीनों लोकों ( उच्च, मध्य तथा निम्नलोक ) का;बुभुजे-- भोग किया; थियम्--ऐश्वर्य; भगवन्--हे मुनि; तत्ू--वह; मम--मुझको; आख्याहि--कृपया बताइये; वर्म--मंत्र से निर्मित कवच; नारायण-आत्मकम्--नारायण की कृपा से युक्त; यथा--जिस प्रकार; आततायिन: --जो उसे मारनाचाह रहे थे; शत्रूनू--शत्रु; येन--जिससे; गुप्त:--रक्षित होकर; अजयत्--जीत लिया; मृधे--युद्ध में
राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा--हे प्रभो! कृपा करके मुझे वह विष्णु-मंत्र-कवच बताएँ जिससे राजा इन्द्र की रक्षा हो सकी और वह अपने शत्रुओं को उनके वाहनोंसहित परास्त करके तीनों लोकों के ऐश्वर्य का उपभोग कर सका।
कृपया मुझे वह नारायण-कवच बताएँ जिसके द्वारा इन्द्र ने युद्ध में अपने उन शत्रुओं को हराकर सफलता प्राप्त कीजो उसे मारने का प्रयत्न कर रहे थे।
श्रीबादरायणिरुवाचवबृतः पुरोहितस्त्वाष्टी महेन्द्रायानुपृच्छते ।
नारायणाख्यं वर्माह तदिहिकमना: श्रूणु ॥
३॥
श्री-बादरायणि: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; वृतः--चुना गया; पुरोहित:--पुरोहित; त्वाष्ट:--त्वष्टा का पुत्र;महेन्द्राय--राजा इन्द्र के लिए; अनुपृच्छते--इन्द्र द्वारा पूछे जाने पर; नारायण-आख्यम्--नारायण-कवच नामक; वर्म--मंत्र से निर्मित सुरक्षा कवच; आह--उसने कहा; तत्ू--वह; इह--यह; एक-मना: --ध्यानपूर्वक; श्रुणु--मुझसे सुनो |
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--देवताओं के राजा इन्द्र ने देवताओं के द्वारा पुरोहित के रूप में नियुक्त विश्वरूप से नारायण-कवच के सम्बन्ध में पूछा।
विश्वरूप द्वारा दिये गये उत्तरको तुम ध्यानपूर्वक सुनो।
श्रीविश्वरूप उवाचधौताड्प्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदड्मुख: ।
कृतस्वाड्रकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुच्चि: ॥
४॥
नारायणपरं वर्म सन्नह्रद्धय आगते ।
पादयोर्जानुनोरूवोरूदरे हृद्यथोरसि ॥
५॥
मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंकारादीनि विन्यसेत् ।
नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा ॥
६॥
श्री-विश्वरूप: उबाच-- श्रीविश्वरूप ने कहा; धौत--पूरी तरह धोया हुआ; अड्ध्रि--पाँव; पाणि:--हाथ; आचम्य--आचमन करके ( नियत मंत्र का जप करने के बाद तीन बार जल चूसना ); स-पवित्र:--कुश की बनी पवित्री या पैती( जिह्ें प्रत्येक हाथ की अँगुलियों में पहना जाता है ); उदक्-मुख:--उत्तर की ओर मुख; कृत--करके; स्व-अड्ग-कर-न््यास:--शरीर के आठ भाग तथा हाथों के बारह भागों का मानसिक समर्पण ( न्यास ); मन्त्राभ्याम्--दो मंत्रों ( ३७ नमोभगवते वासुदेवाय तथा ३७ नमो नारायणाय ) के साथ; वाकू-यत:--मौन रहकर; शुच्रि:--पवित्र होकर; नारायण-परमू-- भगवान् नारायणमय; वर्म--कवच; सन्नहत्-- धारण करे; भये--जब डर; आगते--आया है; पादयो:--दोनोंपैरों पर; जानुनो:--दोनों घुटनों पर; ऊर्वो:--दोनों जाँघों पर; उदरे--पेट पर; हदि--हृदय पर; अथ--इस प्रकार; उरसि--छाती पर; मुखे-- मुँह में; शिरसि--सिर पर; आनुपूर्व्यात्-एक के बाद एक, क्रमश:; ओंकार-आदीनि--ऊँकार सेप्रारम्भ करके; विन्यसेत्ू--रखे; ३४-- प्रणव; नम:--नमस्कार; नारायणाय-- भगवान् नारायण को; इति--इस प्रकार;विपर्ययम्--विपरीत क्रम-से, उलटकर; अथ अपि--और भी; वा--अथवाविश्वरूप ने कहा--किसी प्रकार के भय का अवसर उपस्थित होने पर मनुष्य कोचाहिए कि पहले अपने हाथ-पाँव धोये और तब यह मंत्र--& अपवित्र: पवित्रो वासर्वावस्थां गतोपि वा / यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्ष॑ स बाह्याभ्यन्तर: शुच्िः / श्रीविष्णु श्रीविष्णुश्रीविष्पु--जप कर आचमन करे।
तब उसे चाहिए कि कुश को छूकर शान्त भाव से उत्तरकी ओर मुख करके बैठ जाये।
पूर्णतया शुद्ध होने पर उसे चाहिए कि आठ शब्दों वाले मंत्रको अपने शरीर के दाहिनी ओर के आठ भागों में छुवाये और बारह शब्दों वाले मंत्र कोहाथों में छुवाये।
फिर नारायण-कवच से स्वयं को इस प्रकार बाँधे--पहले आठ शब्दों वालेमंत्र ( ३७ नमो नारायणाय ) का जप करते हुए, प्रथम शब्द ३» या प्रणव से प्रारम्भ करकेअपने हाथों से अपने शरीर के आठों अंगों का स्पर्श करे--पहले दोनों पाँव छुए फिर क्रमशःघुटने, जाँघ, पेट, हृदय, छाती, मुँह तथा सिर को छुये।
इसके बाद उलटे क्रम से मंत्र काजप करे अर्थात् अन्तिम शब्द 'य' से प्रारम्भ करे और अपने शरीर के अंगों को भी उलटेक्रम से छुए।
ये दोनों विधियाँ क्रमशः उत्पत्ति-न्यास तथा संहार-न्यास कहलाती हैं।
करन्यासं ततः कुर्यादद्वादशाक्षरविद्यया ।
प्रणवादियकारान्तमड्डुल्यडुष्ठ पर्वसु ॥
७॥
कर-न्यासम्--करन्यास नामक कर्मकाण्ड, जिसमें अँगुलियों के लिए मंत्र के अक्षर होते है; तत:ः--तत्पश्चात्; कुर्यात्--करे; द्वादश-अक्षर--बारह अक्षरों वाला; विद्यया--मंत्र से; प्रणव-आदि--ऊँकार से प्रारम्भ करके; य-कार-अन्तमू-यअक्षर में अन्त होने तक; अड्डुलि--अंगुलियों पर, तर्जनी से प्रारम्भ करके; अद्जुष्ठ-पर्वसु--अँगूठों के पोरों ( गाँठों )
तकतब उसे चाहिए कि बारह अक्षरों वाले मंत्र ( ३७ नमो भगवते वासुदेवाय ) का जप करे।
इस मंत्र के बारह अक्षरों को दाहिने हाथ की तर्जनी से प्रारम्भ करके बाँये हाथ की तर्जनी तक प्रत्येक अँगुली के छोर पर प्रत्येक अक्षर का उच्चारण करते हुए रखे।
शेष चार अक्षरोंको अँगूठों के पोरों पर रखे।
न्यसेद्धूदय ओंकारं विकारमनु मूर्थनि ।
षकार॑ तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया न्यसेत् ॥
८॥
वेकार नेत्रयोर्युड्यान्नकारं सर्वसन्धिषु ।
मकारमस्त्रमुद्िश्य मन्त्रमूर्तिभवेद्रुथ: ॥
९॥
सविसर्ग फडन्तं तत्सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत् ।
३% विष्णवे नम इति ॥
१०॥
न्यसेत्--रखे; हृदये--हृदय पर; ओंकारम्-- प्रणव, ३४कार; वि-कारम्--विष्णवे का 'वि' अक्षर; अनु--तत्पश्चात्;मूर्थनि--शिर के ऊपर; ष-कारम्-- ष' अक्षर; तु--तथा; भ्रुवो: मध्ये--दोनों भौंहों के बीच; ण-कारम्--'ण' अक्षर;शिखया--चोटी ( शिखा ) पर; न्यसेत्--रखे; वेकारम्--' वे ' अक्षर; नेत्रयो: --दोनों नेत्रों के मध्य; युड्ज्यात्--रखा जाये;न-कारमू--नमः शब्द का 'न' अक्षर; सर्व-सन्धिषु--सभी जोड़ों पर; म-कारम्--नमः शब्द का 'म' अक्षर; अस्त्रमू--हथियार; उद्दिश्य-- ध्यान करते हुए; मन्त्र-मूर्ति:--मंत्र का स्वरूप; भवेत्--हो; बुध: --बुद्धिमान मनुष्य; स-विसर्गम्ू--विसर्ग ( अः ) सहित; फट्-अन्तम्-फट् ध्वनि से अन्त होने वाला; तत्--उस; सर्व-दिक्षु--सभी दिशाओं में;विनिर्दिशेत्ू--बाँध दे; ३४-- प्रणव; विष्णवे-- भगवान् विष्णु को; नम: --नमस्कार; इति--इस प्रकार
फिर उसे छः अक्षरों वाला मंत्र ( ३७ विष्णवे नमः ) जपना चाहिए।
उसे ओं को अपनेहृदय पर, 'वि को शिरो भाग पर, 'ष' को भौहों के मध्य, 'ण' को चोटी पर तथा 'वे' कोनेत्रों के मध्य रखना चाहिए।
तब मंत्र जपकर्ता 'न' अक्षर को अपने शरीर के समस्त जोड़ोंपर रखे और 'म' अक्षर को अस्त्र के रूप में ध्यान धरे।
इस प्रकार वह साक्षात् मंत्र होजायेगा।
तत्पश्चात् उसे चाहिए कि अन्तिम शब्द 'म' में विसर्ग लगाकर 'मः अस्त्राय फट्' इसमंत्र का जप पूर्व दिशा से प्रारम्भ करके सभी दिशाओं में करे।
इस तरह सभी दिशाएँ इसमंत्र के सुरक्षा-कवच से बँध जायेंगी।
आत्मानं परम ध्यायेद्धग्रेयं घट्शक्तिभिर्युतम् ।
विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत् ॥
११॥
आत्मानम्--स्वयं; परमम्--परम को; ध्यायेत्-- ध्यान धरे; ध्येयम्-- ध्यान धरने योग्य; घट्ू-शक्तिभि: --छहों ऐश्वर्य से;युतम्--युक्त; विद्या--विद्या; तेज:--प्रभाव; तप:ः--तपस्या; मूर्तिम्--साक्षात्; इमम्--यह; मन्त्रमू--मंत्र को;उदाहरेत्ू--जप करे
इस प्रकार जप कर लेने के पश्चात् मनुष्य को चाहिए कि वह छः ऐश्वर्यों से युक्त तथाध्यातव्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ अपने आपको गुण की दृष्टि से तदाकार समझे।
तब उसे चाहिए कि वह निम्नलिखित नारायण-कवच अर्थात् भगवान् नारायण की सुरक्षास्तुति का जप करे।
हरिरविदध्यान्मम सर्वरक्षांन्यस्ताडूप्रिपद्य: पतगेन्द्रपृष्ठे ।
दरारिचर्मासिगदेषुचाप-पाशान्दधानोडष्टगुणोष्टबाहु:; ॥
१२॥
हरिः-- भगवान्; विदध्यात्--हमें प्रदान करें; मम--मेरा; सर्व-रक्षाम्ू--सभी ओर से सुरक्षा; न्यस्त--रखाहुआ; अड्प्रि-पदा:--जिनके चरणकमल; पतगेन्द्र-पृष्ठे--समस्त पक्षियों के राजा गरुड़ की पीठ पर; दर--शंख; अरि--चक्र; चर्म--ढाल; असि--तलवार; गदा--गदा; इषु--तीर; चाप-- धनुष; पाशान्--पाश, फंदा; दधान: --ग्रहण कियेहुए; अष्ट--आठ; गुण: --सिद्धियों से युक्त; अष्ट--आठ; बाहु:-- भुजाएँ |
परमेश्वर पक्षिराज गरुड़ की पीठ पर आसीन हैं और अपने चरण-कमल से उसका स्पर्शकर रहे हैं।
वे अपने हाथों में शंख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, तीर, धनुष तथा पाश धारणकिये हैं।
ऐसे आठ भुजाओं वाले पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् सभी समय मेरी रक्षा करें।
वेसर्वशक्तिमान हैं, क्योंकि वे आठ योग-शक्तियों ( अणिमा, लघिमा इत्यादि ) से समन्वित हैं।
जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्ति-यादोगणेभ्यो वरुणस्य पाशात् ।
स्थलेषु मायावटुवामनोव्यात्त्रिविक्रमः खेउवतु विश्वरूप: ॥
१३॥
जलेषु--जल में; माम्--मुझको; रक्षतु--बचाएं; मत्स्य-मूर्ति:--मत्स्य रूप में परमेश्वर; याद:-गणेभ्य:--हिंस्त्र जलजन्तुओंसे; वरुणस्थ--वरुण नामक देवता के; पाशात्--बंदी बनाने वाले फंदे से; स्थलेषु--स्थल पर; माया-वटु--वामन केरूप में ईश्वर का कृपामय रूप; वामन:--वामनदेव; अव्यात्--रक्षा करें; त्रिविक्रम: --त्रिविक्रम, जिनके तीन चरणों नेबलि के तीनों लोक नाप लिए; खे--आकाश में; अवतु--ईश्वर रक्षा करें; विश्वरूप:--विराट ब्रह्माण्ड रूप।
जल के भीतर वरुण देवता के पार्षद हिंस्त्र पशुओं से मत्स्यरूप धारण करने वालेभगवान् मेरी रक्षा करें।
उन्होंने अपनी माया का विस्तार करके वामन का रूप धारण किया।
वामन-देव स्थल पर मेरी रक्षा करें।
उनका विराट स्वरूप, विश्वरूप, तीनों लोकों, को जीतनेवाला है, आकाश में मेरी रक्षा करे।
दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभु:पायान्रूसिंहो सुरयूथपारि: ।
विमुज्जतो यस्य महाइहासंदिशो बिनेदुर्न्यपतंश्व गर्भा: ॥
१४॥
दुर्गेषु-दुर्गम स्थानों में; अटवि--घने जंगल में; आजि-मुख-आदिषु--युद्धस्थल इत्यादि में; प्रभु:--परमे श्वर; पायात्--वेरक्षा करें; नूसिंह:-- भगवान् नृसिंह देव; असुर-यूथप--असुरों के नायक, हिरण्यकशिपु का; अरि:--शत्रु; विमुज्ञतः--छोड़ा गया; यस्य--जिसका; महा-अट्ट-हासम्--महान् तथा भयानक अट्टहास; दिशः --समस्त दिशाएँ; विनेदु: --अनुगूँजित; न्यपतन्--गिर पड़े; च--तथा; गर्भा:--असुरों की पत्नियों के गर्भहिरण्यकशिपु के शत्रु रूप में प्रकट होने वाले भगवान् नृसिंह देव समस्त दिशाओं मेंमेरी रक्षा करें।
उनके घोर अट्टहास से समस्त दिशाएँ गूँज उठी थीं और असुरों की पत्नियों केगर्भपात हो गये थे।
भगवान् जंगल तथा युद्धभूमि जैसे विकट स्थानों में कृपा करके मेरी रक्षा करें।
रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पःस्वदंष्टयोन्नीतधरो वराह: ।
रामोउद्विकूटेष्बथ विप्रवासेसलक्ष्मणोडव्याद्धरताग्रजोउस्मान् ॥
१५॥
रक्षतु--ई श्वर रक्षा करें; असौ--वह; मा--मुझको; अध्वनि--मार्ग में; यज्ञ-कल्प:--जिनकी पुष्टि यज्ञों के द्वारा की जातीहै, यज्ञमूर्ति; स्व-दंष्रया--अपनी ही दाढ़ों से; उन्नीत--उठाया जाकर; धर:--पृथ्वी लोक; वराह:-- भगवान् वराह; राम:--भगवान् राम; अद्वि-कूटेषु--पर्वतों की चोटियों पर; अथ--तब; विप्रवासे--विदेशों में; स-लक्ष्मण:--अपने भाई लक्ष्मणसहित; अव्यात्--रक्षा करें; भरत-अग्रज: --महाराज भरत के ज्येष्ठ भ्राता; अस्मान्ू--हमारी |
परम अविनाशी भगवान् को यज्ञों के द्वारा जाना जाता है, इसीलिए वे यज्ञेश्वर कहलातेहैं।
भगवान् वराह के रूप में अवतार लेकर उन्होंने पृथ्वी लोक को ब्रह्माण्ड के गर्त से जलमें से निकालकर अपनी नुकी दाढ़ों में धारण किया।
ऐसे भगवान् मार्ग में दुष्टों से मेरी रक्षाकरें।
परशुराम मेरी पर्वत शिखरों पर रक्षा करें और भरत के अग्रज भगवान् रामचन्द्र अपनेभाई लक्ष्मण सहित विदेशों में मेरी रक्षा करें।
मामुग्रधर्मादरिबिलात्प्रमादान्नारायण: पातु नरश्व हासात् ।
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथ:पायादगुणेश: कपिल: कर्मबन्धात् ॥
१६॥
मामू--मुझको; उमग्र-धर्मात्--अनावश्यक धार्मिक नियमों से; अखिलातू--सभी प्रकार के कार्यो से; प्रमादातू--पागलपनमें किये गये; नारायण: -- भगवान् नारायण; पातु--रक्षा करें; नर: च--तथा नर; हासात्--वृथा गर्व से; दत्त:--दत्तात्रेय;तु--निस्सन्देह; अयोगात्--मिथ्या योग के मार्ग से; अथ--निस्सन्देह; योग-नाथ:--समस्त योगशक्तियों के स्वामी,योगेश्वर; पायात्ू--रक्षा करें; गुण-ईश:ः--समस्त आध्यात्मिक गुणों के स्वामी; कपिल:-- श्रीकपिल; कर्म-बन्धात्ू-कर्मोके बन्धन से।
मिथ्या धर्मों के अनावश्यक पालन तथा प्रमादवश कर्तव्यच्युत होने से भगवान् नारायणमेरी रक्षा करें।
नर-रूप में प्रकट भगवान् मुझे वृथा गर्व से बचाएँ।
भक्तियोग के पालन सेच्युत होने से योगेश्वर दत्तात्रेय मेरी रक्षा करें।
समस्त श्रेष्ठ गुणों के स्वामी कपिल सकाम कर्मके भौतिक बन्धन से मेरी रक्षा करें।
सनत्कुमारोवतु कामदेवा-व्यशीर्षा मां पथि देवहेलनात् ।
देवर्षिवर्य: पुरुषार्चनान्तरात्कूर्मो हरिर्मा निरयादशेषात् ॥
१७॥
सनतू-कुमार:--परम ब्रह्मचारी सनत्कुमार; अवतु--रक्षा करें; काम-देवात्--कामदेव के चंगुल से अर्थात् कामवासनाओंसे; हय-शीर्षा--हयग्रीव ईश्वर का अवतार जिसका मुख घोड़े के समान था; मामू--मुझको; पथि--मार्ग में; देव-हेलनात्--ब्राह्मणों, वैष्णवों तथा परमेश्वर को नमस्कार न करने से; देवर्षि-वर्य:--देवर्षियों में श्रेष्ठ, नारद; पुरुष-अर्चन-अन्तरात्-विग्रह के पूजन में हुए अपराधों से; कूर्म:-- भगवान् कूर्म ( कच्छप ); हरिः-- भगवान् हरि; मामू--मुझको;निरयात्--नरक से; अशेषात्-- असीम |
सनत्कुमार कामवासनाओं से मेरी रक्षा करें।
जैसे ही मैं कोई शुभकार्य शुरू करूँ,श्रीहयग्रीव मेरी रक्षा करें जिससे मैं परमेश्वर को नमस्कार न करने का अपराधी न बनूँ।
श्रीविग्रह की अर्चना में कोई अपराध न हो इसके लिए देवर्षि नारद मेरी रक्षा करें।
भगवान्कूर्म असीम नरकलोक में गिरने से मुझे बचाएँ।
धन्वन्तरिर्भगवान्पात्वपथ्याद्दन्द्ाद्धबाहषभो निर्जितात्मा ।
यज्ञश्व लोकादवताज्नान्ताद्बलो गणात्क्रोधवशादहीन्द्र: ॥
१८॥
धन्वन्तरि:--वैद्यराज धन्वन्तरि; भगवान्-- श्रीभगवान्; पातु--मेरी रक्षा करें; अपथ्यात्--स्वास्थ्य के लिए हानिकरवस्तुओं, यथा मांस तथा मादक ब्र॒व्यों से; द्वन्द्दात्-द्विधा से; भयात्-- भय से; ऋषभ:-- श्रीऋषभदेव; निर्जित-आत्मा--मन तथा स्वयं को वश में रखने वाला; यज्ञ:--यज्ञ; च--तथा; लोकात्ू--जनता के अपयश से; अवतात्--रक्षा करें;जन-अन्तात्--अच्य व्यक्तियों द्वारा उत्पन्न भयानक परिस्थितियों से; बल:-- भगवान् बलराम; गणातू्--गणों से; क्रोध-वशात्-क्रुद्ध सर्पो से; अहीन्द्र:--शेष नाग के रूप में भगवान् बलराम |
श्रीभगवान् अपने धन्वन्तरि अवतार के रूप में मुझे अवांछित खाद्य पदार्थों से दूर रखेंऔर शारीरिक रुग्णता से मेरी रक्षा करें।
अपनी अन्तः तथा बाह् इन्द्रियों को वश में करनेवाले श्रीऋषभदेव सर्दी तथा गर्मी के द्वैत से उत्पन्न भय से मेरी रक्षा करें।
भगवान् यज्ञ जनतासे मिलने वाले अपयश तथा हानि से मेरी रक्षा करें और शेष-रूप भगवान् बलराम मुझेईर्ष्यालु सर्पो से बचायें।
द्वैषायनो भगवानप्रबोधाद बुद्धस्तु पाषण्डगण प्रमादात् ।
कल्किः कले: कालमलात्प्रपातुधर्मावनायोरुकृतावतार: ॥
१९॥
द्वैपायन:--वैदिक ज्ञान के दाता श्रील व्यासदेव; भगवान्--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का सर्वशक्तिमान अवतार;अप्रबोधात्-शास्त्र के अज्ञान से; बुद्ध: तु--तथा भगवान् बुद्ध; पाषण्ड-गण--अबोध व्यक्तियों में मायाजाल फैलानेवाले नास्तिकों का; प्रमादातू--पागलपन से; कल्किः--केशव के अवतार भगवान् कल्कि; कलेः--इस कलियुग के;काल-मलात्--इस युग के अंधकार से; प्रपातु--रक्षा करें; धर्म-अवनाय--धर्म की रक्षा हेतु; उरू--महान्; कृत-अवतार:--जो अवतरित हुए
वैदिक-ज्ञान से विहीन होने के कारण सभी प्रकार की अविद्या से श्रीभगवान् केअवतार व्यासदेव मेरी रक्षा करें।
वेद विरुद्ध कर्मों से तथा आलस्य से, जिसके कारणप्रमादवश वेद ज्ञान तथा अनुष्ठान भूल जाते हैं, भगवान् बुद्धदेव मुझे बचाएँ।
भगवान्कल्कि देव, जिनका अवतार धार्मिक नियमों की रक्षा के लिए हुआ, मुझे कलियुग कीमलिनता से बचायें।
मां केशवो गदया प्रातरव्याद्गोविन्द आसड्डवमात्तवेणु: ।
नारायण: प्राह्न उदात्तशक्तिर्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्रपाणि: ॥
२०॥
मामू--मुझको; केशव: -- भगवान् केशव; गदया--अपनी गदा से; प्रात:ः--प्रातःकाल; अव्यात्--रक्षा करें; गोविन्द:--भगवान् गोविन्द; आसड्भबम्-दिन के चढ़े; आत्त-वेणु:--अपनी बाँसुरी लेकर; नारायण: --चतुर्भुज भगवान् नारायण;प्राह्न--दोपहर के पूर्व; उदात्त-शक्ति:--विभिन्न प्रकार की शक्तियों को वश में रखने वाले; मध्यम्-दिने--दोपहर को;विष्णु:-- भगवान् विष्णु; अरीन्द्र-पाणि: --शत्रुओं को मारने के लिए हाथ में चक्र धारण किये।
भगवान् केशव दिन के पहले चरण में अपनी गदा से तथा दिन के दूसरे चरण में अपनीबाँसुरी से गोविन्द मेरी रक्षा करें।
सर्व शक्तियों से सम्पन्न भगवान् नारायण दिन के तीसरेचरण में और शत्रुओं का वध करने के लिए हाथ में चक्र धारण करनेवाले भगवान् विष्णुदिन के चौथे चरण में मेरी रक्षा करें।
देवोपराद् मधुहोग्रधन्वासायं त्रिधामावतु माधवो माम् ।
दोषे हषीकेश उतार्धरात्रेनिशीथ एकोवतु पदानाभ: ॥
२१॥
देवः--भगवान्; अपराह्ने--दिन के पंचम चरण में; मधु-हा--मधुसूदन; उग्र-धन्वा--शार्ड् नाम के प्रचण्ड धनुष कोधारण करने वाले; सायम्--दिन के छठे चरण में, संध्या समय; त्रि-धामा--ब्रह्मा, विष्णु तथा महे श्वर त्रिमूर्ति; अवतु--रक्षा करें; माधव: --माधव; मामू--मुझको; दोषे--रात के प्रथम भाग में; हृषीकेश:-- श्रीहृषीकेश; उत-- भी; अर्ध-रात्रे--रात्रि के दूसरे भाग अथवा अर्ध रात्रि में; निशीथे--रात्रि के तीसरे चरण में; एक:--अकेले; अवतु--रक्षा करें;पद्ानाभ:--भगवान् पदानाभ।
असुरों के लिए भयावना धनुष धारण करने वाले भगवान् मधुसूदन दिन के पंचम चरणमें मेरी रक्षा करें।
संध्या समय ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर त्रिमूर्ति के रूप में प्रकट होकर भगवान् माधव और रात्रि प्रारम्भ होने पर भगवान् हषीकेश मेरी रक्षा करें।
अर्थ रात्रि में( रात्रि के दूसरे तथा तीसरे चरण में ) केवल भगवान् पद्मानाभ मेरी रक्षा करें।
श्रीवत्सधामापररात्र ईशःप्रत्यूष ईशोसिधरो जनार्दन: ।
दामोदरोव्यादनुसन्ध्यं प्रभातेविश्वेश्वरो भगवान्कालमूर्ति; ॥
२२॥
श्रीवत्स-धामा-- श्रीवत्स चिह्न धारण करने वाले भगवान्; अपर-रात्रे--रात्रि के चतुर्थ भाग में; ईश: --पर मे श्वर; प्रत्यूषे--रात्रि के अन्त में; ईशः--परमे श्वर; असि-धर:--हाथ में तलवार धारण करने वाले; जनार्दन:-- भगवान् जनार्दन;दामोदर:--भगवान् दामोदर; अव्यात्--वे रक्षा करें; अनुसन्ध्यम्-- प्रत्येक संध्या को; प्रभाते--प्रातःकाल ( राति के छठेभाग ); विश्व-ई श्वरः-- समस्त ब्रह्माण्ड के स्वामी; भगवान्-- श्रीभगवान्; काल-मूर्तिः--साक्षात् काल।
वक्ष पर श्रीवत्स धारण करने वाले पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अर्धरात्रि के पश्चात् सेआकाश के गुलाबी होने तक मेरी रक्षा करें।
खड्गधारी भगवान् जनार्दन रात्रि के समाप्तहोने पर ( रात्रि की अंतिम चार घटिकाओं में ) मेरी रक्षा करें।
भगवान् दामोदर बड़े भोर मेंतथा भगवान् विश्वेश्वर दिन तथा रात की संधियों के समय मेरी रक्षा करें।
चक्र युगान्तानलतिग्मनेमिभ्रमत्समन्ताद्धगवत्प्रयुक्तम् ।
दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमाशुकक्ष यथा वातसखो हुताश: ॥
२३॥
चक्रम्--भगवान् का चक्र; युग-अन्त--युग के अन्त में; अनल--विध्वंसक अग्नि सहश; तिग्म-नेमि--ती क्ष्ण किनारे;भ्रमतू--घूमते हुए; समन्तात्--चारों ओर; भगवत्-प्रयुक्तम्ू-- भगवान् द्वारा लगाया गया; दन्दग्धि दन्दग्धि--पूरी तरहजला दें; अरि-सैन्यम्-हमारे शत्रुओं की सेना; आशु--शीघ्रता से; कक्षम्--सूखी घास; यथा--सहृश; वात-सख:--वायु का मित्र; हुताश:-- धधकती आग।
श्रीभगवान् द्वारा चलाया जाने वाला तथा चारों दिशाओं में घूमने वाला तीखे किनारेवाला उनका चक्र युगान्त में प्रलय-अग्नि के समान विनाशकारी है।
जिस प्रकारप्रातःकालीन मन्द पवन के सहयोग से धधकती अग्नि सूखी घास को भस्म कर देती है, उसी प्रकार यह सदुर्शन चक्र हमारे शत्रुओं को जला कर भस्म कर दे।
गदेशनिस्पर्शनविस्फुलिड्रेनिष्पिणिढ निष्पिण्ड्यूजितप्रियासि ।
कुष्माण्डवैनायकयक्षरक्षो-भूतग्रहां श्रूर्णप चूर्णयारीन्ू ॥
२४॥
गदे--श्रीभगवान् के हाथों में स्थित हे गदा; अशनि--वज् के समान; स्पर्शन--जिसका स्पर्श ; विस्फुलिज़े--अग्नि कीचिनगारियाँ छोड़ता हुआ; निष्पिण्डि निष्पिण्डि--कुचल दीजिये, कुचल दीजिये; अजित-प्रिया-- श्रीभगवान् को अत्यन्तप्रिय; असि--हो; कुष्माण्ड--कुष्माण्ड नामक निशाचर; बैनायक--वैनायक नामक प्रेत; यक्ष--यक्ष नामक भूत प्रेत;रक्ष:--राक्षस; भूत-- भूत नामक प्रेत; ग्रहान्ू--तथा ग्रह नामक दुष्ट असुर; चूर्णय--चूर-चूर कर दो; चूर्णय--चूर-चूरकर दो; अरीन्-मेरे शत्रुओं को
हे श्रीभगवान् के हाथ की गदे! तुम वज़ के समान शक्तिशाली अग्नि की चिनगारियाँउत्पन्न करो, तुम भगवान् की अत्यन्त प्रिय हो।
मैं भी उन्हीं का दास हूँ, अतः कुष्माण्ड,वैनायक, यक्ष, राक्षस, भूत तथा ग्रह-गणों को कुचल देने में मेरी सहायता करो।
कृपापूर्वकउन्हें चूर चूर कर दो।
त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृ -पिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन् ।
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितोभीमस्वनो४रेईदयानि कम्पयन् ॥
२५॥
त्वमू--तुम; यातुधान--राक्षस; प्रमथ--प्रमथगण; प्रेत--प्रेतमण; मातृ--माताएँ; पिशाच--पिशाच; विप्र-ग्रह--ब्रह्मराक्षस; घोर-दृष्टीनू-- अत्यन्त भयानक नेत्रों वाले; दरेन्द्र-हे भगवान् के हाथों के शंख, पांचजन्य; विद्रावय--भगा दें;कृष्ण-पूरितः--कृष्ण द्वारा फूँके जाने पर; भीम-स्वन:--अत्यन्त डरावना शब्द करते हुए; ओरेः --शत्रु के; हदयानि--हृदयों को; कम्पयन्--हिलाते हुए |
भगवान् के हाथों में धारण किए हुए हे शंखश्रेष्ठ, हे पांचजन्य! तुम भगवान् श्रीकृष्णकी श्वास से सदैव पूरित हो, अतः तुम ऐसी डरावनी ध्वनि उत्पन्न करो जिससे राक्षस, प्रमथभूत, प्रेत, माताएँ, पिशाच तथा ब्रह्म राक्षस जैसे शत्रुओं के हृदय काँपने लगें।
त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्य-मीशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि ।
चक्षूंषि चर्मज्छतचन्द्र छादयद्विषामघोनां हर पापचश्षुषाम् ॥
२६॥
त्वमू--तुम; तिग्म-धार-असि-वर--हे तीक्ष्ण धारवाली श्रेष्ठ तलवार; अरि-सैन्यम्ू-शत्रु के सैनिकों को; ईश-प्रयुक्त:--श्रीभगवान् द्वारा काम में लाई जाने वाली; मम--मेरा; छिन्धि छिन्धि--खण्ड-खण्ड कर दो, खण्ड-खण्ड कर दो;चक्षूंषि-- आँखें; चर्मन्--हे ढाल; शत-चन्द्र--एक सौ चन्द्रमाओं के समान तेजवान् मण्डल; छादय--ढक दो; द्विषाम्ू--मुझसे विद्वेष करने वालों को; अघोनाम्--पूर्ण पापी; हर--निकाल लो; पाप-चक्षुषाम्-पापपूर्ण आँखों वाले |
हे तलवबारों में श्रेष्ठ तीक्षण धार वाली तलवार! तुम श्रीभगवान् द्वारा काम में लायी जातीहो।
कृपा करके तुम मेरे शत्रुओं के सैनिकों को खण्ड-खण्ड कर दो; कृपया उन्हें खण्ड-खण्ड कर दो।
हे सैकड़ों चन्द्रमण्डल के समान वृत्ताकारों से अंकित तेजमान ढाल! पापीदुश्मनों की आँखें ढक दो और उनकी पापी आँखों को निकाल लो।
यन्नो भयं ग्रहेभ्यो भूत्केतुभ्यो नृभ्य एबच ।
सरीसृपेभ्यो दंष्टिभ्यो भूतेभ्योहो भ्य एव च ॥
२७॥
सर्वाण्येतानि भगवतन्नामरूपानुकीर्तनात् ।
प्रयान्तु सड्क्षयं सद्यो ये न: श्रेय:प्रतीपका: ॥
२८॥
यत्--जो; न:--हमारे; भयम्-- भव ; ग्रहेभ्य: --ग्रह नामक असुर से; अभूत्-- था; केतुभ्य:--गिरने वाले तारों से;नृभ्य:--विद्देषी मनुष्यों से; एव च-- भी; सरीसूपेभ्य:--साँपों या बिच्छुओं से; दंष्टिभ्य:--बाघों, भेड़ियों तथा असुरों जैसेतीक्ष्ण दाँतों वाले पशुओं से; भूतेभ्य:--भूतों से अथवा भौतिक तत्त्वों ( क्षिति, जल, अग्नि आदि ) से ); अंहोभ्य:--पापकर्मो से; एव च-- भी; सर्वाणि एतानि--ये सब; भगवत्-नाम-रूप-अनुकीर्तनात्-- श्रीभगवान् के दिव्य रूप, नाम,लक्षण तथा वैशिष्टय्य के कीर्तन से; प्रयान्तु--प्राप्त होने दो; सड्क्षयम्--पूर्ण विनाश को; सद्यः --तुरन्त; ये--जो; न:--हमारा; श्रेय:-प्रतीपका: --कल्याण में बाधक
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के दिव्य नामरूप, गुण तथा साजसामग्री का कीर्तन हमेंअशुभ नक्षत्रों, केतुओं, विद्वेषी मनुष्यों, सर्पों, बिच्छुओं तथा बाघों-भेड़ियों जैसे पशुओं केप्रभाव से बचाये।
वह प्रेतों से तथा क्षिति, जल, पावक, वायु, जैसे भौतिक तत्त्वों औरतड़ित से तथा पूर्व पापों से हमारी रक्षा करे।
हम अपने शुभ जीवन में इन बाधाओं से सदैवभयभीत रहते हैं, अतः हरे कृष्ण महामंत्र के जप से इन सबका पूर्ण विनाश हो।
गरुडो भगवास्स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमय: प्रभु: ।
रक्षत्वशेषकृच्छे भ्यो विष्वक्सेन: स्वनामभि: ॥
२९॥
गरुड: --भगवान् विष्णु का वाहन, गरुड़; भगवान्-- श्री भगवान् के समान शक्तिशाली; स्तोत्र-स्तोभ: --जिनकी स्तुतिचुने हुए एलोकों एवं गीतों से की जाती है; छनन््द:-मय:--साक्षात् वेद; प्रभु:ः--भगवान्; रक्षतु--रक्षा करें; अशेष-कृच्छेभ्य: -- अनन्त दुखों से; विष्वक्सेन: -- श्रीविष्वक्सेन; स्व-नामभि: ---अपने पवित्र नाम से |
भगवान् विष्णु के वाहन श्रीगरुड़ श्रीभगवान् के समान शक्तिशाली होने के कारणसर्वपूज्य हैं।
वे साक्षात् वेद हैं और चुने हुए एलोकों से उनकी पूजा की जाती है।
वे सभीभयानक स्थितियों में हमारी रक्षा करें।
भगवान् विष्वक्सेन अपने पवित्र नामों के द्वारा हमेंसभी संकटों से बचायें।
सर्वापद्भ्यो हरेनामरूपयानायुधानि नः ।
बुद्धीन्द्रियमनः प्राणान्पान्तु पार्षदभूषणा: ॥
३०॥
सर्व-आपद्भ्य:--सभी प्रकार की विपत्तियों से; हरेः-- श्री भगवान् का; नाम--पवित्र नाम; रूप--दिव्य रूप; यान--वाहन; आयुधानि--तथा सभी श्त्रास्त्र; न:--हमारी; बुद्धि--बुद्धि; इन्द्रिय--इन्द्रिय; मन:--मन; प्राणान्--प्राण वायु;पान्तु--रक्षा तथा पालन करें; पार्षद-भूषणा:--आभूषण तुल्य पार्षद गण
श्रीभगवान् के पवित्र नाम, दिव्य रूप, वाहन तथा आयुध, जो उनके पार्षदों के समानउनकी शोभा बढ़ाने वाले हैं, हमारी बुद्धि, इन्द्रियों, मन तथा प्राण की सभी प्रकार केसंकटों से रक्षा करें।
यथा हि भगवानेव वस्तुत: सदसच्च यत् ।
सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवा: ॥
३१॥
यथा--जिस प्रकार; हि--निस्सन्देह; भगवान्-- श्री भगवान्; एव--निश्चय ही; वस्तुत:--अन्तिम रूप से; सत्--प्रकट;असत्--अप्रकट; च--तथा; यत्--जो भी; सत्येन--सत्य से; अनेन--यह; नः--हमारे; सर्वे--सभी; यान्तु-- चले जाँय,दूर हों; नाशम्--संहार को; उपद्रवा:--उपद्रव |
यह सूक्ष्म तथा स्थूल दृश्य जगत भौतिक है, तो भी यह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् सेअभिन्न है, क्योंकि वस्तुतः वे ही समस्त कारणों के कारण हैं।
कारण तथा कार्य वास्तव मेंएक ही हैं, क्योंकि कार्य में कारण विद्यमान रहता है।
अतः परम सत्य श्रीभगवान् हमारेसमस्त संकटों को अपने किसी भी शक्तिशाली अंग से नष्ट कर सकते हैं।
यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहित: स्वयम् ।
भूषणायुधलिड्डाख्या धत्ते शक्ती: स्वमायया ॥
३२॥
तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान्हरि: ।
पातु सर्वे: स्वरूपैर्न: सदा सर्वत्र सर्वग: ॥
३३॥
यथा--जिस प्रकार; ऐकात्म्य--विभिन्न रूपों में प्रकट एकरूपता; अनुभावानाम्--विचारकों के; विकल्प-रहित:--भेदरहित; स्वयम्-स्वयं; भूषण--अलंकरण; आयुध--श्त्रास्त्र; लिड्र-आख्या:--गुण तथा विभिन्न नाम; धत्ते--धारणकरता है; शक्ती:--ऐश्वर्य, प्रभाव, शक्ति, ज्ञान, सौंदर्य तथा त्याग जैसी शक्तियाँ; स्व-मायया--अपनी आत्मशक्ति केप्रसार से; तेन एब--उसके द्वारा; सत्य-मानेन--वास्तविक ज्ञान; सर्व-ज्ञ:--सर्वज्ञाता; भगवान्-- श्रीभगवान्; हरि: --जीवात्माओं के मोह को हरने वाले; पातु--रक्षा करें; सर्वे:--सभी; स्व-रूपै: --अपने रूपों से; न:--हमको; सदा--सदैव; सर्वत्र--सभी जगहों पर; सर्व-ग:--सर्वव्यापी |
श्रीभगवान्, जीवात्माएँ, भौतिक शक्ति, आध्यात्मिक शक्ति तथा सम्पूर्ण सृष्टि--वे सभीव्यष्टियाँ हैं।
अन्ततोगत्वा ये सब मिलकर परब्रह्म का निर्माण करती हैं।
अतः जो आत्मज्ञानीहैं, वे भिन्नता में एकता देखते हैं।
ऐसे बढ़ेचढ़े पुरुषों के लिए भगवान् के शारीरिकअलंकरण, उनके नाम, उनका यश, उनके लक्षण एवं रूप तथा आयुध उनकी शक्ति की ही अभिव्यक्तियाँ हैं।
उनके समुन्नत आध्यात्मिक ज्ञान के अनुसार विभिन्न रूपों में प्रकट होनेवाले सर्वज्ञ भगवान् सर्वत्र विद्यमान हैं।
वे सदैव सभी विपदाओं से सर्वत्र हमारी रक्षा करें।
विदिदक्षु दिक्षूर्ध्वमध: समन््ता-दन््तर्बहिर्भगवान्नारसिंह: ।
प्रहापयँल्लोक भय स्वनेनस्वतेजसा ग्रस्तसमस्ततेजा: ॥
३४॥
विदिक्षु--सभी कोनों में; दिक्षु--समस्त दिशाओं में ( पूर्व, पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण ) में; ऊर्ध्वम्--ऊपर; अध:--नीचे;समन्तात्ू--चारों ओर; अन्त: -- भीतर; बहि:--बाहर; भगवान्-- श्री भगवान्; नारसिंह:--नृसिंह( आधे सिंह तथा आधेमनुष्य ) देव के रूप में; प्रहापयन्--पूर्णतया विनष्ट करते हुए; लोक-भयम्--पशु, विष, आयुध, जल, वायु, अग्निइत्यादि से उत्पन्न भय; स्वनेन-- अपनी गर्जना से अथवा अपने भक्त प्रह्मद महाराज के स्वर से; स्व-तेजसा-- अपने निजीतेज से; ग्रस्त--आच्छादित; समस्त--अन्य सभी; तेजा: --प्रभाव |
प्रहाद महाराज ने भगवान् नृसिंहदेव के पवित्र नाम का उच्चस्वर से जप किया।
अपनेभक्त प्रह्मद महाराज के लिए गर्जना करने वाले श्रीनूसिंहदेव! आप उन संकटों के भय सेहमारी रक्षा करें जो विष, आयुध, जल, अग्नि, वायु इत्यादि के द्वारा समस्त दिशाओं मेंमहा-भटों के द्वारा फैलाया जा चुका है।
हे भगवान्! आप अपने दिव्य प्रभाव से इनकेप्रभाव को आच्छादित कर लें।
नृसिंहदेव समस्त दिशि-दिशाओं में, ऊपर-नीचे, बाहर-भीतर हमारी रक्षा करें।
मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारायणात्मकम् ।
विजेष्यसेझ्ञसा येन दंशितोसुरयूथपान् ॥
३५॥
मघवनू--हे इन्द्र; इदम्--यह; आख्यातम्--कह सुनाया; वर्म--रहस्यमय कवच; नारायण-आत्मकम्-- नारायण सेसम्बन्धित; विजेष्यसे--तुम जीतोगे; अज्ञसा--सरलतापूर्वक; येन--जिससे; दंशित:--सुरक्षित होकर; असुर-यूथपान् --असुरों के मुखियों को
विश्वरूप ने आगे कहा-हे इन्द्र! मैंने तुमसे नारायण के इस गुप्त कवच को कहसुनाया।
तुम इस सुरक्षात्यक कवच को धारण करके असुरों के नायकों को जीतने में निश्चयही समर्थ होगे।
एतद्धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा ।
पदा वा संस्पृशेत्सद्य: साध्वसात्स विमुच्यते ॥
३६॥
एतत्--यह; धारयमाण:-- धारण करने वाला व्यक्ति; तु--लेकिन; यम् यम्ू--जिस किसी को; पश्यति--देखता है;चक्षुषा--अपनी आँखों से; पदा--अपने पैरों से; वा--अथवा; संस्पृशेत्--छूता है; सद्यः--तुरन्त; साध्वसात्--समस्तभय से; सः--वह; विमुच्यते--मुक्त हो जाता है।
यदि कोई इस कवच को धारण करता है, तो वह जिस किसी को अपने नेत्रों से देखताहै, अथवा पैरों से छू देता है, वह तुरन्त ही उपर्युक्त समस्त संकटों से विमुक्त हो जाता है।
न कुतश्चिद्धयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत् ।
राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याध्यादिभ्यश्चव क्हिंचित् ॥
३७॥
न--नहीं; कुतश्चित्--कहीं से; भयम्-- भय; तस्थ--उसका; विद्याम्--यह रहस्यमय स्तोत्र; धारयत: --प्रयोग करते हुए;भवेत्--प्रकट हो; राज--सरकार से; दस्यु--चोर-उचक्कों से; ग्रह-आदिभ्य: -- असुरों आदि से; व्याधि-आदिभ्य:--रोगोंइत्यादि से; च-- भी; कह्िंचित्--किसी समय।
नारायण-कवच नामक यह स्तोत्र नारायण के दिव्यरूप से सम्बद्ध सूक्ष्म ज्ञान से युक्तहै।
जो इस स्तोत्र का प्रयोग करता है, वह सरकार, लुटेरों, दुष्ट असुरों या किसी प्रकार केरोग द्वारा न तो विचलित किया जाता है न ही सताया जाता है।
इमां विद्यां पुरा कश्चित्कौशिको धारयन्द्रिज: ।
योगधारणया स्वाड्रं जहौ स मरुधन्वनि ॥
३८॥
इमाम्ू--यह; विद्याम्--स्तोत्र; पुरा-- प्राचीन काल में; कश्चित्--कोई; कौशिक: -- कौशिक; धारयन्-- प्रयोग करके;द्विज:--ब्राह्मण; योग-धारणया--योग बल से; स्व-अड्भरम्-- अपना शरीर; जहौ--त्याग दिया; सः--वह; मरू-धन्वनि--मरुस्थल में |
हे देवेन्द्र! प्राचीन काल में कौशिक नाम के एक ब्राह्मण ने इस कवच का प्रयोग कियाऔर उसने अपने योगबल से मरु भूमि में जान बूझ कर अपना शरीर त्याग दिया।
तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरिकदा ।
ययौ चित्ररथः स्त्रीभिर्वृतों यत्र द्विजक्षय: ॥
३९॥
तस्य--उसके मृतशरीर के; उपरि--ऊपर; विमानेन--विमान से; गन्धर्व-पति:--गन्धर्व लोक के राजा चित्ररथ; एकदा--एक बार; ययौ--गया; चित्ररथ: --चित्ररथ; स्त्रीभि:--अनेक सुन्दर स्त्रियों द्वारा; वृत:--घिरा हुआ; यत्र--जहाँ; द्विज-क्षय:--ब्राह्मण कौशिक मरा था।
एक बार अनेक सुन्दरियों से घिरा, गन्धर्वलोक का राजा चित्ररथ अपने विमान से उसस्थान के ऊपर से निकला, जहाँ वह ब्राह्मण मरा था और उसका मृत शरीर पड़ा हुआ था।
गगनाज्ष्यपतत्सद्य: सविमानो हावाक्शिरा: ।
स वालिखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः ।
प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगातू ॥
४०॥
गगनात्ू--आकाश से; न्यपतत्--गिरा; सद्यः--अचानक; स-विमान: --अपने विमान समेत; हि--निश्चय ही; अवाक्-शिरा:--नीचे की ओर सिर किये; सः--वह; वालिखिल्य--वालिखिल्य नामक मुनियों के; वचनात्--उपदेश से;अस्थीनि--सभी अस्थियाँ; आदाय--लाकर; विस्मित:--आश्चर्यचकित; प्रास्य--फेंक कर; प्राची-सरस्वत्याम्--पूर्व कीओर बहने वाली सरस्वती नदी में; स्नात्वा--उस नदी में नहाकर; धाम--धाम को; स्वम्-- अपने; अन्वगात्--लौट गया।
अचानक चित्ररथ सिर के बल अपने विमान सहित नीचे गिरने पर विवश कर दियागया।
उसे आश्चर्य हुआ।
वालिखिल्य मुनियों ने उसे आदेश दिया कि उस ब्राह्मण कीअस्थियाँ वह निकट ही स्थित सरस्वती नदी में प्रवाहित कर दे।
उसे ऐसा ही करना पड़ा तथाअपने धाम लौटने के पूर्व नदी में स्नान करना पड़ा।
श्रीशुक उबाचयडइदं श्रृणुयात्काले यो धारयति चाहत: ।
त॑ नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतोी भयात् ॥
४१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; यः--जो कोई; इृदम्--यह; श्रूणुयात्--सुनेगा; काले--भय के समय;यः--जो कोई; धारयति--इस स्तोत्र का प्रयोग करता है; च--भी; आहतः-- श्रद्धा तथा आदर के साथ; तम्--उसको;नमस्यन्ति--नमस्कार करते हैं; भूतानि--सभी जीव; मुच्यते--छूट जाते हैं; सर्वतः--समस्त; भयात्--भयों से
श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा, हे महाराज परीक्षित! जो कोई इस कवच का उपयोगकरता है अथवा इसके विषय में श्रद्धा तथा सम्मानपूर्वक श्रवण करता है, वह भौतिकसंसार की स्थितियों से उत्पन्न समस्त प्रकार के भयों से तुरन्त मुक्त हो जाता है और सभीजीवों द्वारा पूजा जाता है।
एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतु: ।
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्य मृथेउसुरानू ॥
४२॥
एतामू--यह; विद्याम्--स्तोत्र; अधिगत:--प्राप्त; विश्वरूपात्-विश्वरूप ब्राह्मण से; शत-क्रतु:--स्वर्ग के राजा इन्द्र ने;त्रैलोक्य-लक्ष्मीमू--तीनों लोकों का समस्त ऐश्वर्य; बुभुजे-- भोग किया; विनिर्जित्य--जीतकर; मृधे--युद्ध में;असुरान्--सभी असुरों को
एक सौ यज्ञों को करने वाले राजा इन्द्र ने इस रक्षा-स्तोत्र को विश्वरूप से प्राप्त किया।
असुरों को जीत लेने के बाद उसने तीनों लोकों के सभी ऐश्वर्य का भोग किया।
