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अध्याय नौ: राक्षस वृत्रासुर की उपस्थिति
6.9तस्यासन्विश्वरूपस्य शिरांसि त्रीणि भारत ।
सोमपीथं सुरापीथमन्नादमिति शुश्रुम ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; तस्थ--उसका; आसनू--थे; विश्वरूपस्थ--देवताओं के पुरोहितविश्वरूप को; शिरांसि--शिर; त्रीणि--तीन; भारत--हे महाराज परीक्षित; सोम-पीथम्--सोम पान के लिए; सुरा-पीथम्--मदिरा पान के लिए; अन्न-अदम्-खाने के लिए; इति--इस प्रकार; शुश्रुम--परम्परा प्रणाली से मैंने सुन रखाहै।
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--देवताओं के पुरोहित विश्वरूप के तीन सिर थे।
इनमें सेएक से वह सोमपान करता था, तो दूसरे से मदिरा पान और तीसरे से भोजन ग्रहण करताथा।
हे राजा परीक्षित! ऐसा मैंने विद्वानों से सुना है।
सवै बर्दिषि देवेभ्यो भागं प्रत्यक्षमुच्चकै: ।
अददद्यस्य पितरो देवा: सप्रश्नयं नृप ॥
२॥
सः--वह ( विश्वरूप ); बै--निस्सन्देह; बर्हिषि--यज्ञ की अग्नि में; देवेभ्य:--विशिष्ट देवताओं के लिए; भागम्--उचितहिस्सा; प्रत्यक्षम्ू-- आँखों के सामने; उच्चकै:--मंत्रों के तेज उच्चारण से; अददत्--दिया गया; यस्य--जिसके; पितर: --पितृगण; देवा:--देवता; स-प्रश्रयम्--विनीत स्वर से; नृप--हे राजा परीक्षित।
है महाराज परीक्षित! देवतागण विश्वरूप के पितापक्ष से सम्बन्धित थे, अतः विश्वरूप सबों के समक्ष अग्नि में घी की आहुति इन मंत्रों का उच्चारण करके दे रहा था--'इन्द्रायइदं स्वाहा ' ( 'यह राजा इन्द्र के लिए है' ) तथा 'इदम् अग्नये' ( यह अग्नि देव के लिएहै )।
वह मंत्र का उच्चारण उच्च स्वर से कर रहा था और प्रत्येक देवता को उसका उचितभाग प्रदान करता जा रहा था।
स एव हि ददौ भागं परोक्षमसुरान्प्रति ।
यजमानोवहद्धागं मातृस्नेहवशानुग: ॥
३॥
सः--वह ( विश्वरूप ); एब--निस्सन्देह; हि--निश्चय ही; ददौ--प्रदान किया; भागम्--हिस्सा; परोक्षम्--देवताओं सेछिपाकर; असुरान्-- असुरगण; प्रति--को; यजमान:--यज्ञ करते हुए; अवहत्-- प्रदान किया; भागम्--हिस्सा; मातृ-स्नेह--अपनी माता के स्नेह वश; वश-अनुग:--बाध्य होकर
वह यद्यपि देवताओं के नाम से यज्ञ की अग्नि में घी आहुति डाल रहा था, किन्तुदेवताओं के बिना जताये वह असुरों के नाम की भी आहुति डालता जाता था, क्योंकि वेउसकी माता के पक्ष के सम्बंधी थे।
तद्देवहेलनं तस्य धर्मालीकं सुरेश्वर: ।
आलक्ष्य तरसा भीतस्तच्छीर्षाण्यच्छिनद्रुषा ॥
४॥
तत्--वह; देव-हेलनमू--देवताओं के प्रति अपराध; तस्य--उस ( विश्वरूप ) का; धर्म-अलीकम्ू--धर्म के नाम परधोखा; सुर-ई श्वरः --देवताओं का राजा; आलक्ष्य--देखकर; तरसा--शीघ्र; भीत:--डरा हुआ ( कि विश्वरूप केआशीर्वाद से असुर शक्ति प्राप्त कर लेंगे ); तत्--उसका ( विश्वरूप का ); शीर्षाणि--सिर; अच्छिनत्--काट दिया;रुषा--क्रोध से
किन्तु एक बार स्वर्ग के राजा इन्द्र को पता चल गया कि विश्वरूप देवताओं को धोखादेकर असुरों की आहुतियाँ दे रहा है।
अतः वह असुरों द्वारा पराजित किये जाने से अत्यधिक भयभीत हो उठा और अतीव क्रोध में उसने विश्वरूप के तीनों सिरों को उसके कंधों से अलगकर दिया।
सोमपीथं तु यत्तस्य शिर आसीत्कपिश्जल: ।
कलविड्जू: सुरापीथमन्नादं यत्स तित्तिरि: ॥
५॥
सोम-पीथम्--सोमरस पीने वाले; तु--लेकिन; यत्--जो; तस्थ--उस ( विश्वरूप ) का; शिर:--सिर; आसीतू--हो गया;कपिझ्जल:--पपीहा; कलविड्डू: --गौरैया; सुरा-पीथम्--मदिरा पीने वाला; अन्न-अदम्--भोजन करने वाला; यत्--जो;सः--वह; तित्तिरि:--तीतर।
तत्पश्चात् सोमरस पीनेवाला सिर पपीहे में, सुरापान करने वाला सिर गौरैया में औरभोजन करने वाला सिर तीतर में बदल गया।
ब्रह्महत्यामञ्जञलिना जग्राह यदपी श्वरः ।
संवत्सरान्ते तदघं भूतानां स विशुद्धये ।
भूम्यम्बुद्रमयोषिद्भ्यक्षतुर्धा व्यभजद्धरि: ॥
६॥
ब्रह्म-हत्याम्--ब्राह्मण को मारने से लगने वाला पाप; अद्लिना--हाथ जोड़कर; जग्राह--स्वीकार कर लिया; यत्अपि--यद्यपि; ईश्वर:--अत्यन्त शक्तिमान; संवत्सर-अन्ते--एक वर्ष बाद; तत् अधम्--वह पाप; भूतानाम्ू-- भौतिकतत्त्वों का; सः--वह; विशुद्धये-शुर्द्धि के लिए; भूमि--पृथ्वी के लिए; अम्बु--जल; द्रुम--वृक्ष; योषिद्भ्यः--तथास्त्रियों के लिए; चतुर्धा--चार भागों में; व्यभजत्--बाँट दिया; हरि: --राजा इन्द्र ने।
इन्द्र इतना शक्तिशाली था कि यदि चाहता तो ब्रह्महत्या के पापफल को निरस्त करसकता था, किन्तु उसने हाथ जोड़ कर पछताते हुए पाप-भार को स्वीकार कर लिया।
उसनेएक वर्ष तक यातना भोगी और तब अपनी शुद्धि के लिए हत्या के पाप को पृथ्वी, जल,वृक्ष तथा स्त्रियों में बाँट दिया।
भूमिस्तुरीयं जग्राह खातपूरवरेण वे ।
ईरिणं ब्रह्महत्याया रूपं भूमौ प्रहश्यते ॥
७॥
भूमि:--पृथ्वी; तुरीयम्--चतुर्थाश; जग्राह--स्वीकार कर लिया; खात-पूर-गटड्टों को भरने का; वरेण--आशीर्वाद केकारण; बै--निस्सन्देह; ईरिणम्--मरुस्थल; ब्रह्म-हत्याया:--ब्राह्मण की हत्या से लगे पाप का; रूपम्ू--रूप; भूमौ--पृथ्वी पर; प्रहश्यते--दिखाई पड़ता है |
पृथ्वी ने, राजा इन्द्र से बदले में यह वरदान लेकर कि जहाँ कहीं भी गड्ढे होंगे वे समयपर अपने आप भर जायेंगे, ब्रह्महत्या के पापों का चतुर्थाश स्वीकार कर लिया।
उन पापों केकारण ही हमें पृथ्वी पर अनेक मरुस्थल दिखाई पढ़ते हैं।
तुर्य छेदविरोहेण बरेण जगृहुर्द्रमा: ।
तेषां निर्यासरूपेण ब्रह्महत्या प्रहश्यते ॥
८ ॥
तुर्यमू--चतुर्थाश; छेद--काटे जाने पर; विरोहेण--फिर से बढ़ने का; वरेण--आशीर्वाद से; जगृहुः--स्वीकार करलिया; द्वुमा:--वृक्षों ने; तेषामू--उनका; निर्यास-रूपेण--वृज्षों से निकलने वाले द्रव ( गोंद ) से; ब्रह्म-हत्या--ब्राह्मण कोमारने का पाप; प्रहश्यते--दिखाई पड़ता है।
वृक्षों ने, इन्द्र से बदले में यह वरदान लिया कि काटे जाने पर भी उनकी शाखाएँ फिरसे उग आयेंगी, ब्रह्महत्या के पापफल का चतुर्थाश ले लिया।
ये पापफल वृक्षों से निकलनेवाले रस के रूप में दिखाई पड़ते हैं ( इसलिए इस रस को पीना वर्जित है )।
शश्वत्कामवरेणांहस्तुरीयं जगृहुः स्त्रियः ।
रजोरूपेण तास्वंहो मासि मासि प्रहश्यते ॥
९॥
शश्वत्--निरन्तर; काम--कामेच्छा के; वरेण--वर से; अंह:--ब्रह्महत्या पाप; तुरीयम्--चुतर्थाश; जगृहु:--स्वीकार करलिया; स्त्रियः--स्त्रियाँ; रज:-रूपेण--रजोकाल के रूप में; तासु--उनमें; अंह:ः --पाप बन्धन; मासि मासि-प्रत्येकमहीने; प्रहश्यते--दिखाई पड़ता है|
स्त्रियों ने, इन्द्र से बदले में यह वरदान प्राप्त करके कि वे अपनी काम-वासनाओं को,जब तक वे भ्रूण के लिए हानिकर न हों, गर्भकाल में भी निरन्तर पूरी कर सकेंगी, पापफलों का चतुर्थाश स्वीकार कर लिया।
फलस्वरूप स्त्रियों में प्रत्येक मास रजोदर्शन होता है।
द्रव्यभूयोवरेणापस्तुरीयं जगृहुर्मलम् ।
तासु बुह्दुदफेनाभ्यां दृष्टे तद्धरति क्षिपन् ॥
१०॥
द्रव्य--अन्य वस्तुएँ; भूय:--बढ़ने को; वरेण--वरण से; आप:--जल; तुरीयम्--चतुर्थाश; जगृहुः --स्वीकार कर लिया;मलम्ू--पाप; तासु--जल में; बुद्दुद-फेनाभ्याम्ू--बुलबुलों तथा फेन से; दृष्टमू--हश्य; तत्--वह; हरति-- भरता है;क्षिपनू--फेंककर, हटाकर।
जल ने इन्द्र से बदले में यह वर प्राप्त करके कि किसी अन्य वस्तु में जल मिलाने सेउसका आयतन बढ़ जायेगा, पापफलों का चतुर्थाश स्वीकार कर लिया।
इसीलिए जल मेंबुलबुले तथा फेन उठते हैं।
मनुष्य को चाहिए कि इन्हें हटाकर के ही जल भरे।
हतपुत्रस्ततस्त्वष्टा जुहावेन्द्राय शत्रवे ।
इन्द्रशत्रो विवर्धस्व मा चिरं जहि विद्विषम् ॥
११॥
हत-पुत्र:--जिसका पुत्र मर चुका है; तत:ः--तत्पश्चात्; त्वष्टा--त्वष्टा ने; जुहाव--यज्ञ किया; इन्द्राय--इन्द्र के लिए;शत्रवे--एक शत्रु उत्पन्न करने के लिए; इन्द्र-शत्रो--हे इन्द्र के शत्रु; विवर्धस्व--बढ़ो; मा--मत; चिरम्--दीर्घकाल केबाद; जहि--मारो; विद्विषम्ू-- अपना शत्रु
विश्वरूप के वध के पश्चात् उसके पिता त्वष्टा ने इन्द्र को मारने के लिए अनुष्ठान किये।
उसने अग्नि में यह उच्चारण करके आहुति डाली, 'हे इन्द्र के शत्रु! तुम्हारी अभिवृद्धि हो,तुम अविलम्ब अपने शत्रु का वध करो।
'अथान्वाहार्यपचनादुत्थितो घोरदर्शन:ः ।
कृतान्त इब लोकानां युगान्तसमये यथा ॥
१२॥
अथ--तदनन्तर; अन्वाहार्य-पचनात्--अन्वाहार्य नामक अग्नि से; उत्थितः--निकला; घोर-दर्शन:--अत्यन्त भयानकलगने वाला; कृतान्त:--साक्षात् प्रलय; इब--सहृश; लोकानाम्--समस्त लोकों का; युग-अन्त--कल्पान्त; समये--समय पर; यथा--जिस प्रकार।
तत्पश्चात् अन्वाहार्य नामक यज्ञ अग्नि के दक्षिणी कोने से एक भयावना व्यक्ति प्रकटहुआ जो युगान्त में समग्र ब्रह्माण्ड का विनाश करने वाले के समान प्रतीत हो रहा था।
विष्वग्विवर्धमानं तमिषुमात्र दिने दिने ।
दग्धशैलप्रतीकाशं सन्ध्याभ्रानीकवर्चसम् ॥
१३॥
तप्तताग्रशिखाशमश्रुं मध्याह्वार्को ग्रलोचनम् ॥
१४॥
देदीप्यमाने त्रिशिखे शूल आरोप्य रोदसी ।
नृत्यन्तमुन्नदन््तं च चालयन्तं पदा महीम् ॥
१५॥
दरीगम्भीरवक्तरेण पिबता च नभस्तलम् ।
लिहता जिहयर्श्नाणि ग्रसता भुवनत्रयम् ॥
१६॥
महता रौद्रदंष्टेण जृम्भमाणं मुहुर्मुहु: ।
वित्रस्ता दुद्ुवुर्लोका वीक्ष्य सर्वे दिशो दश ॥
१७॥
विष्वक्--चारों ओर; विवर्धमानम्--बढ़ता हुआ; तम्--उसको; इषु-मात्रमू--बाण की उड़ान; दिने दिने-- प्रतिदिन;दग्ध--जला हुआ; शैल--पर्वत; प्रतीकाशम्--सहश; सन्ध्या--शाम को; अभ्र-अनीक --बादलों के समूह की तरह;वर्चसम्ू--तेजमय; तप्त--पिघला हुआ; ताप्र--ताँबे के समान; शिखा--बाल; इमश्रुम्--मूछें तथा दाढ़ी; मध्याह--दोपहर; अर्क--सूर्य के समान; उग्र-लोचनम्--प्रचण्ड नेत्र वाला; देदीप्यमाने--प्रकाशमान; त्रि-शिखे--तीन नोंक वाले;शूले--अपने भाले में; आरोप्य--रखकर; रोदसी--पृथ्वी तथा स्वर्ग; नृत्यन्तम्--नाचते हुए; उन्नदन्तम्--उच्चस्वर करतेहुए; च--तथा; चालयन्तम्--चलते हुए; पदा--अपने पाँव से; महीम्--पृथ्वी को; दरी-गम्भीर--गुफा के समान गहरी;वक््टेण--मुख से; पिबता--पीता हुआ; च-- भी; नभस्तलम्--आकाश को; लिहता--चाटते हुए; जिहया--जीभ से;ऋक्षाणि--तारों को; ग्रसता--निगल कर; भुवन-त्रयम्--तीनों लोकों को; महता--महान्; रौद्र-दंष्टेण-- भयानक दाँतोंसे; जृम्भभाणम्--जम्हाई लेते हुए; मुहुः मुहुः--पुनः पुनः; वित्रस्ता:--भयानक; दुद्ग॒वु:;--दौड़ा; लोका: --लोग; वीक्ष्य--देखकर; सर्वे--समस्त; दिश: दश--दशों दिशाओं में |
उस असुर का शरीर चारों दिशाओं में छोड़े हुए बाण के समान प्रतिदिन बढ़ने लगा।
वहलम्बा और काला था, मानो कोई जला हुआ पर्वत हो।
वह संध्याकालीन बादलों के समूहकी भाँति दीप्ति से युक्त था।
असुर के शरीर के बाल तथा उसकी दाढ़ी-मूछें पिघले ताँबे केरंग की थीं।
उसके नेत्र मध्यान्हकालीन सूर्य की भाँति भेदने वाले थे।
वह दुर्जय था औरऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अपने प्रज्वलित त्रिशूल पर तीनों लोकों को धारण किये हो।
उच्चस्वर करके उसके नाचने और गाने से सारी पृथ्वी हिल उठी मानो भूकम्प आया हो।
वहपुनः पुनः जम्हाई ले रहा था, मानो कन्दरा के समान अपने विशाल मुख में वह सारे आकाशको निगल जाना चाहत हो।
ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह आकाश के सभी तारों कोअपनी जीभ से चाट रहा हो और अपने लम्बे पैने दाँतों से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को खाने जा रहाहो।
उस विराट असुर को देखकर सभी व्यक्ति डर के मारे इधर-उधर चारों दिशाओं में भागनेलगे।
येनावृता इमे लोकास्तपसा त्वाष्टरमूर्तिना ।
स वै वृत्र इति प्रोक्त: पाप: परमदारुण: ॥
१८॥
येन--जिसके द्वारा; आवृता:--प्रच्छून्न; इमे--ये सब; लोका:--लोक; तपसा--तपस्या से; त्वाष्ट-मूर्तिना--त्वष्टा के पुत्रके रूप में; सः--वह; बै--निस्सन्देह; वृत्र:--वृत्र; इति--इस प्रकार; प्रोक्त:--कहलाया; पाप:--साक्षात् पाप; परम-दारुण:--अत्यन्त भयानक
उस अत्यन्त भयानक असुर ने, जो वास्तव में त्वष्टा का ही पुत्र था, अपने तप बल सेसभी लोकों को आच्छादित कर लिया था।
इसलिए वह वृत्र अर्थात् प्रत्येक वस्तु कोआच्छादित करने वाला कहलाया।
त॑ निजध्नुरभिद्गुत्य सगणा विबुधर्षभा: ।
स्वैः स्वैर्दिव्यास्त्रशस्त्रौधै: सोग्रसत्तानि कृत्सनशः ॥
१९॥
तम्--उसको; निजषघ्नु:--टूट पड़े; अभिद्गुत्य--दौड़कर; स-गणा: --सैनिकों सहित; विबुध-ऋषभा:--सभी बड़े-बड़ेदेवता; स्वै: स्वै:-- अपने -अपने; दिव्य--दिव्य; अस्त्र-- धनुष-बाण; शस्त्र-ओघै:--विभिन्न प्रकार के आयुध से युक्त;सः--वह ( वृत्र ); अग्रसत्ू--निगल गया; तानि--उन ( आयुधों ) को; कृत्सनश:--एकसाथ |
इन्द्र इत्यादि सभी देवता अपने सैनिकों सहित उस असुर पर टूट पड़े।
वे अपने दिव्यधनुष-बाणों तथा अन्य हथियारों से उसे मारने लगे, किन्तु वृत्रासुर उनके सभी हथियारनिगलता गया।
ततस्ते विस्मिता: सर्वे विषण्णा ग्रस्ततेजस: ।
प्रत्यज्ञमादिपुरुषमुपतस्थु: समाहिता: ॥
२०॥
ततः--तत्पश्चात्; ते--वे ( देवता ); विस्मिता:--आश्चर्यचकित; सर्वे --सभी; विषण्णा: --अत्यन्त दुखी; ग्रस्त-तेजस: --अपनी शक्ति खोकर; प्रत्यज्ञम्--परमात्मा को; आदि-पुरुषम्--आदि पुरुष की; उपतस्थु: --प्रार्थना की; समाहिता: --सभी एकत्र होकर।
उस असुर की शक्ति देखकर सभी देवता अत्यन्त आश्चर्यचकित तथा निराश हो गये औरउनकी सारी शक्ति जाती रही।
अतः वे सभी परमात्मा अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्नारायण की पूजा करके उन्हें प्रसन्न करने के निमित्त एकत्र हुए।
श्रीदेवा ऊचुःवाय्वम्बराग्न्यप्क्षितयस्त्रिलोकाब्रह्मादयो ये वयमुद्ठिजन्तः ।
हराम यस्मै बलिमन्तकोसौबिभेति यस्मादरणं ततो न: ॥
२१॥
श्री-देवा: ऊचु:--देवताओं ने कहा; वायु--वायु; अम्बर--आकाश; अग्नि--अग्नि; अपू--जल ; क्षितय: --तथा पृथ्वीसे निर्मित; त्रि-लोकाः--तीनों लोक; ब्रह्य-आदय:--ब्रह्मा इत्यादि; ये--जो; वयम्--हम सब; उद्विजन्तः--अत्यन्तउद्विग्न; हराम--प्रदान करते हैं; यस्मै--जिसको; बलिम्--भेंट; अन्तक:--संहर्ता, मृत्यु; असौ--वह; बिभेति--डरता है;यस्मात्--जिससे; अरणम्--शरण; ततः--इसलिए; न: -- हमारा |
देवताओं ने कहा--तीनों लोकों की सृष्टि पंचतत्त्वों--क्षिति, जल, पावक, गगन तथासमीर--से हुईं हैं, जिनको ब्रह्मा आदि विभिन्न देवता अपने वश में रखते हैं।
हम काल सेअत्यन्त भयभीत है कि वह हमारे अस्तित्व का अन्त कर देगा, इसलिए वह जैसा चाहता हैहम वैसा कार्य करके उसको अपनी भेंट चढ़ाते हैं।
किन्तु काल श्रीभगवान् से स्वयं डरताहै।
अत: हम उसी एकमात्र परमेश्वर की आराधना करें जो हमारी पूरी तरह से रक्षा कर सकताहै।
अविस्तमितं त॑ परिपूर्णकामंस्वेनेव लाभेन सम॑ प्रशान्तम् ।
विनोपसर्पत्यपरं हि बालिशःश्वलाडुलेनातितितर्ति सिन्धुम् ॥
२२॥
अविस्मितमू--जो कभी विस्मित नहीं होता; तम्ू--उस ( ईश्वर ) को; परिपूर्ण-कामम्--परम संतुष्ट; स्वेन--अपने आप से;एव--निस्सन्देह; लाभेन--लाभ; समम्--सम- दृष्टि; प्रशान्तम्-- अत्यन्त स्थिर; विना--बिना; उपसर्पति--पास जाता है;अपरम्ू--अन्य; हि--निस्सन्देह; बालिश:--मूढ़; श्व--कुत्ते की; लाडुलेन--पूँछ से; अतितितर्ति--पार करना चाहता है;सिन्धुम्-समुद्र को |
भगवान् समस्त सांसारिक कल्पना से रहित और सदैव विस्मयविहीन हैं, वे सदेवप्रसन्नचित्त एवं अपनी स्वरूप-सिद्धि से परम संतुष्ट रहने वाले हैं।
उनकी कोई सांसारिकउपाधि नहीं होती, अतः वे स्थिर एवं विरक्त रहते हैं।
वही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् सबों केएकमात्र आश्रय हैं।
अतः जो मनुष्य किसी अन्य से अपनी रक्षा की कामना करता है, वहअवश्य ही बड़ा मूर्ख है और कुत्ते की पूँछ पकड़ कर समुद्र को पार करना चाहता है।
यस्योरुश्रुद्धे जगतीं स्वनावंमनुर्यथाबध्य ततार दुर्गम् ।
स एव नस्त्वाप्टभयाहुरन्तात्त्राताअितान्वारिचरोपि नूनम् ॥
२३॥
यस्य--जिसके; उरु--अत्यधिक बलवान् तथा ऊँचे; श्रृड़्े--सींग पर; जगतीम्--संसार के रूप में; स्व-नावम्--अपनीनाव; मनु:--मनु, राजा सत्यव्रत; यथा--जिस प्रकार; आबध्य--बाँधकर; ततार--पार किया; दुर्गम्--दुर्लघ्य; सः--वह( श्रीभगवान् ); एबव--निश्चय ही; न:ः--हमको; त्वाष्ट-भयात्--्वष्टा के पुत्र के भय से; दुरन्तात्ू--अन्तहीन; त्राता--रक्षक; आश्रितान्--( हम जैसे ) आश्रितों को; वारि-चर: अपि--यद्यपि मछली का रूप धारण करके; नूनम्--निस्सन्देह
पहले राजा सत्यव्रत नामक मनु ने मत्स्य अवतार के सींग में समग्र ब्रह्माण्ड रूपी छोटीनौका को बाँधकर आत्मरक्षा की थी।
उनकी कृपा से मनु ने बाढ़ के महान् संकट से अपनेको बचाया था।
वे ही मत्स्यावतार त्वष्टा के पुत्र से उत्पन्न इस गम्भीर संकट से हमारी रक्षाकरें।
पुरा स्वयम्भूरपि संयमाम्भ-स्युदीर्णवातोर्मिरवै: कराले ।
एको<रविन्दात्पतितस्ततारतस्माद्धयाद्येन स नोउस्तु पार: ॥
२४॥
पुरा--पहले ( सृष्टि के समय ); स्वयम्भू: --ब्रह्माजी; अपि-- भी; संयम-अम्भसि--बाढ़ के जल में; उदीर्ण--अत्युच्च;वबात--वायु के; ऊर्मि--तथा लहरों के; रवैः --शोर से; कराले--अत्यन्त भयावना; एक:--अकेले; अरविन्दातू--कमलआसन से; पतित:--गिरा हुआ; ततार--बच गये; तस्मात्--उस; भयात्-- भयानक स्थिति से; येन--जिसके ( ईश्वर )द्वारा; सः--वह; न:ः--हम सबका; अस्तु--हो; पार:--मोक्ष, उद्धार |
सृष्टि के प्रारम्भ में प्रचणड वायु से बाढ़ के जल में भयानक लहरें उठने लगीं।
इनसे ऐसाभयावना शोर हुआ कि ब्रह्माजी अपने कमल-आसन से प्रलय जल में प्रायः गिर ही पड़े,किन्तु भगवान् की सहायता से वे बच गये।
उसी प्रकार हम भी भगवान् से इस भयावहस्थिति से अपनी रक्षा की आशा करते हैं।
य एक ईशो निजमायया नःससर्ज येनानुसृजाम विश्वम् ।
बयं न यस्यापि पुर: समीहतःपश्याम लिड्डं पृथगीशमानिन: ॥
२५॥
यः--वह जो; एक: -- एक; ईशः -- नियन्ता; निज-मायया-- अपनी दिव्य शक्ति से; नः--हमको; ससर्ज--उत्पन्न किया;येन--जिसके द्वारा ( जिनकी कृपा से ); अनुसूजाम--हम भी सृष्टि करते हैं; विश्वम्--ब्रह्माण्ड; वयम्--हम; न--नहीं;यस्य--जिसका; अपि--यद्यपि; पुरः--हमारे समक्ष; समीहत:--कार्य करने वाले को; पश्याम--देखते; लिड्रमू--रूप;पृथक्-भिन्न; ईश--नियन्ता रूप में; मानिन:--अपने बारे में सोचते हुए |
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् जिन्होंने अपनी बहिरंगा शक्ति से हमारी सृष्टि की और जिनकीकृपा से हम इस विश्व की सृष्टि का विस्तार करते हैं, वे निरन्तर हमारे समक्ष परमात्मा रूप मेंविद्यमान हैं, किन्तु हम उनके रूप को नहीं देख पाते।
हम इसीलिए देखने में असमर्थ हैं,क्योंकि हम सभी अपने आपको पृथक् तथा स्वतंत्र ईश्वर के रूप में मानते हैं।
यो नः सपलैर्भूशमर्चमानान्देवर्षितिर्यडनूषु नित्य एवं ।
कृतावतारस्तनुभिः स्वमाययाकृत्वात्मसात्पाति युगे युगे च ॥
२६॥
तमेव देव॑ वयमात्मदैवतंपरं प्रधान पुरुषं विश्वमन्यम् ।
ब्रजाम सर्वे शरणं शरण्यंस्वानां स नो धास्यति शं महात्मा ॥
२७॥
यः--जो; नः--हमको; सपत्नैः--हमारे शत्रुओं, असुरों से; भूशम्--प्राय:; अर्द्यमानानू--पीड़ित; देव--देवताओं केबीच; ऋषि--साधु पुरुष; तिर्यक्--पशु; नूषु--तथा मनुष्य; नित्य:--सदैव; एब--अवश्य; कृत-अवतार: -- अवतार रुपमें प्रकट होते हैं; तनुभि:--विभिन्न रुपों में; स्व-मायया--अपनी अन्तरंगा शक्ति से; कृत्वा आत्मसात्--अपने को उनकाअत्वन्त प्रिय मानकर; पाति--रक्षा करता है; युगे युगे--प्रत्येक कल्प ( युग ) में; च--तथा; तम्--उसको; एव--निस्सन्देह; देवम्--परमे श्वर; वयम्--हम सभी; आत्म-दैवतम्--समस्त जीवात्माओं के स्वामी; परम्--दिव्य; प्रधानम्--सम्पूर्ण भौतिक शक्ति के मूल कारण; पुरुषम्--परम भोक्ता; विश्वम्ू--जिसकी शक्ति से यह ब्रह्माण्ड बना; अन्यम्--पृथक् स्थित; ब्रजाम--हम चलें; सर्वे--सभी; शरणम्--शरण; शरण्यम्--शरण के उपुयक्त; स्वानाम्ू--अपने भक्तों को;सः--वह; नः--हमको; धास्यति--प्रदान करेगा; शम्--कल्याण; महात्मा--परमात्मा |
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अपनी अचिन्त्य अन्तरंगा शक्ति से अनेक दिव्य शरीरों में विस्तारकरते हैं, यथा देवताओं की शक्ति के अवतार वामनदेव, ऋषियों के अवतार परशुराम,पशुओं के अवतार नरसिंह देव एवं बराह और जलचरों के अवतार मत्स्य तथा कूर्म।
वे सभीप्रकार की जीवात्माओं के बीच विभिन्न दिव्य देह धारण करते हैं और मनुष्यों के बीचविशेष रूप से भगवान् कृष्ण तथा राम के रुप में प्रकट होते हैं।
अपनी अहैतुकी कृपा से वेअसुरों द्वारा सदा सताये गये देवताओं की रक्षा करते हैं।
वे समस्त जीवात्माओं के पूज्यश्रीविग्रह हैं।
वे परम कारण हैं और स्त्री तथा पुरुष की सृजन शक्तियों के रूप में प्रकट होतेहैं।
यद्यपि वे इस ब्रह्माण्ड से पृथक् हैं, वे विराट रूप में विद्यमान रहते हैं।
अतः अपनीइसभयभीत अवस्था में हमें चाहिए कि उनकी शरण ग्रहण करें क्योंकि हमें विश्वास है किपरमात्मा हमें अपना संरक्षण प्रदान करेंगे।
श्रीशुक उबाचइति तेषां महाराज सुराणामुपतिष्ठताम् ।
प्रतीच्यां दिश्यभूदावि: शद्भुच्क्रगदाधर: ॥
२८॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; तेषामू--उनका; महाराज--हे राजन्; सुराणाम्--देवताओं का; उपतिष्ठताम्-- प्रार्थना करते हुए; प्रतीच्यामू-- अन्तःकरण में; दिशि--दिशा में; अभूत्--हो गया; आवि: --इृष्टिगोचर; शट्बगु-चक्र-गदा-धर:--दिव्यायु
ध्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--हे राजन्! जब समस्त देवताओं ने उनकी प्रार्थना की तो श्रीभगवान् हरि शंख, चक्र तथा गदा धारण किये हुए पहले उनके अन्तःकरण में और तबउनके सम्मुख प्रकट हुए।
आत्मतुल्यै: घोडशभिर्विना श्रीवत्सकौस्तुभौ ।
पर्युपासितमुन्निद्रशरदम्बुरुहेक्षणम् ॥
२९॥
इृष्ठा तमवनौ सर्व ईक्षणाह्नादविक्लवा: ।
दण्डवत्पतिता राजज्छनैरुत्थाय तुष्ठुवु: ॥
३०॥
आत्म-तुल्यैः --अपने समान; षोडशभि: --सोलहों ( पार्षदों ) से; विना--रहित; श्रीवत्स-कौस्तुभौ-- श्रीवत्स चिह्न तथाकौस्तुभ-मणि: ; पर्युपासितम्--सभी दिशाओं से सेवित; उन्निद्र--उनींदा; शरत्ू--शरद् ऋतु का; अम्बुरुह--कमल केसमान; ईक्षणम्--नेत्र युक्त; दृघ्टा--देखकर; तम्--उस ( परमेश्वर, नारायण ) को; अवनौ-- भूमि पर; सर्वे--वे सभी; ईक्षण--देखने से; आह्ाद--प्रसन्नतापूर्वक ; विक्लवा:--विकल होकर; दण्ड-वत्--डण्डे के समान; पतिता:--गिर पड़े;राजनू--हे राजा; शनै:--धीरे-धीरे; उत्थाय--उठ कर; तुष्ठवु:--प्रार्थना की ॥
श्रीभगवान् को घेरे हुए उनके सोलह पार्षद उनकी सेवा कर रहे थे।
वे आभूषणों सेअलंकृत थे और भगवान् के ही समान लग रहे थे, किन्तु श्रीवत्स चिन्ह तथा कौस्तुभमणि सेरहित थे।
हे राजन्! जब देवताओं ने उस मुद्रा में शरत्कालीन कमल की पंखड़ियों के समाननेत्रों वाले स्मित हास से युक्त श्रीभगवान् को देखा तो बे प्रसन्नता से अभिभूत हो गये औरउन्होंने तुरन्त पृथ्वी पर गिर कर दण्डवत् प्रणाम किया।
फिर वे धीरे-धीरे उठे और अपनीस्तुतियों द्वारा उन्होंने भगवान् को प्रसन्न किया।
श्रीदेवा ऊचुःनमस्ते यज्ञवीर्याय वयसे उत ते नमः ।
नमस्ते हास्तचक्राय नमः सुपुरुहूतये ॥
३१॥
श्री-देवा: ऊचु:--देवताओं ने कहा; नम:--नमस्कार; ते--आपको; यज्ञ-वीर्याय--यज्ञों के फलदाता श्रीभगवान् को;वयसे--काल, जो यज्ञों के फलों का अन्त करने वाला है; उत--यद्यपि; ते--आपको; नम:--नमस्कार; नमः--नमस्कार;ते--आपको; हि--निस्सन्देह; अस्त-चक्राय--जो अपना चक्र चलाता है; नम:--नमस्कार; सुपुरु-हूतये -- अनेक प्रकारके दिव्य नामों से युक्तदेवताओं ने कहा--हे भगवन्! आप यज्ञ फल को देने में समर्थ हैं।
आप ही वह कालहैं, जो इन फलों को कालान्तर में नष्ट कर देता है।
आप असुरों को मारने के लिए चक्र कोचलाते हैं।
हे अनेक नामधारण करनेवाले भगवान्! हम लोग आपको सादर नमस्कार करतेहैं।
चयत्ते गतीनां तिसृणामीशितु: परमं पदम् ।
नार्वाचीनो विसर्गस्य धातर्वेदितुमहति ॥
३२॥
यत्--जो; ते--तुम्हारी; गतीनाम् तिसणाम्--तीन प्रकार के गन्तव्य ( स्वर्ग लोक, मर्त्य लोक तथा नरक ); ईशितु:--नियामक; परमम् पदम्--परम धाम, वैकुण्ठलोक; न--नहीं ; अर्वाचीन:--बाद में आने वाला पुरुष; विसर्गस्य--सृष्टि;धातः--हे परम नियामक; वेदितुम्--जानने हेतु; अहति--सक्षम है
है परम नियामक! आप तीनों गन्तव्यों [ स्वर्ग लोक में पहुँचना, मनुष्य के रूप में जन्मतथा नरक में यातना को वश में रखने वाले हैं, फिर भी आपका परम धाम वैकुण्ठलोकहै।
चूँकि आपके द्वारा इस दृश्य जगत की उत्पत्ति के बाद हम प्रकट हुए हैं, अतः हम आपकेकार्यकलापों को समझने में असमर्थ हैं।
अतः हमारे पास आपको अर्पित करने के लिएनमस्कार करने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।
नमस्तेस्तु भगवन्नारायण वासुदेवादिपुरुष महापुरुष महानुभाव परममड्ल परमकल्याणपरमकारुणिक केवल जगदाधार लोकैकनाथ सर्वेश्वर लक्ष्मीनाथ परमहंसपरिव्राजकै:परमेणात्मयोगसमाधिना परिभावितपरिस्फुटपारमहंस्यधर्मेणोद्धाटिततम:कपाठटद्वारे चित्तेडपावृतआत्मलोके स्वयमुपलब्धनिजसुखानुभवो भवान् ॥
३३॥
नम: -- नमस्कार; ते--आपको; अस्तु--हो; भगवन्--हे भगवन्; नारायण--समस्त जीवात्माओं के वास,नारायण; वासुदेव-- भगवान् वासुदेव, श्रीकृष्ण; आदि-पुरुष--आदि पुरुष; महा-पुरुष--महा पुरुष; महा-अनुभाव--परम ऐ श्वर्यवान्; परम-मड्गल--परम शुभ; परम-कल्याण--परम आशीर्वाद; परम-कारुणिक--परम करुणामय(दयालु ); केवल--परिवर्तनरहित; जगत्-आधार--हृश्य जगत के अवलम्बन्; लोक-एक-नाथ--समस्त लोकों केएकमात्र स्वामी; सर्व-ईश्वर--परम नियामक; लक्ष्मी-नाथ-- भाग्य की देवी के पति; परमहंस-परिव्राजकै:--समस्त संसारमें भ्रमण करने वाले सर्वोच्च संन्यासी के द्वारा; परमेण-- अत्यन्त; आत्म-योग-समाधिना-- भक्तियोग में मग्न;परिभावित--अत्यन्त शुद्ध; परिस्फुट--तथा पूर्ण प्रकट; पारमहंस्य-धर्मेण-- भक्ति की दिव्य विधि को सम्पन्न करके;उद्धाटित--खोला हुआ; तम:--अज्ञान का; कपाट--जिसमें किवाड़; द्वारे--द्वार पर स्थित; चित्ते--मन में; अपावृते--कल्मषहीन; आत्म-लोके -- आत्म जगत में ; स्वयम्--अपने आप; उपलब्ध-- अनुभव करके; निज--स्वयं के, अपने;सुख-अनुभव:--सुख का अनुभव; भवान्ू--आप |
हे भगवन्, हे नारायण, हे वासुदेव, हे आदि पुरुष, परम अनुभव, साक्षात् मंगल! हे परमवरदान स्वरूप अत्यन्त कृपालु तथा अपरिवर्तनीय! हे हश्य जगत के आधार, हे समस्त लोकोंतथा प्रत्येक पदार्थ के स्वामी तथा लक्ष्मी देवी के पति! आपका साक्षात्कार श्रेष्ठ संन््यासी हीकर पाते हैं, जो भक्तियोग में पूर्णतया समाधिमग्न होकर सारे विश्व में कृष्णभावनामृत काउपदेश देते हैं।
वे अपने ध्यान को आप में ही केन्द्रीभूत रखते हैं, अतः अपने शुद्धअन्तःकरण में आपके स्वरूप को ग्रहण करते हैं।
जब उनके हृदयों का अंधकार पूर्णतयाहट जाता है और आपका साक्षात्कार होता है तब उन्हें आपके दिव्य स्वरूप का दिव्य आनन्दप्राप्त होता है।
ऐसे व्यक्तियों के सिवाय और कोई आप का अनुभव नहीं कर पाता, अत: हमआपको सादर नमस्कार करते हैं।
दुरवबोध इव तवायं विहारयोगो यदशरणोशरीर इदमनवेक्षितास्मत्समवाय आत्मनैवाविक्रियमाणेनसगुणमगुणः सृजसि पासि हरसि ॥
३४॥
दुरवबोध: --दुर्बोध; इब--अत्यन्त; तब--आपका; अयम्--यह; विहार-योग:--सृष्टि, पालन तथा संहार की लीलाओं मेंव्यस्तता; यत्ू--जो; अशरण: --किसी अन्य पर आश्रित न होना; अशरीर:ः --शरीररहित; इृदम्--यह; अनवेक्षित--बिनाप्रतीक्षा किये; अस्मत्--हम सबसे; समवाय:--सहयोग; आत्मना--आपके द्वारा; एब--निस्सन्देह; अविक्रियमाणेन--बिना परिवर्तित हुए; स-गुणम्-प्रकृति के तीन गुण; अगुण:--ऐसे भौतिक गुणों से दिव्य; सृजसि--आप सृष्टि करते हैं;पासि--पालन करते हैं; हरसि--संहार करते हैं।
हे भगवन्! आपको किसी आश्रय की आवश्यकता नहीं है।
भौतिक शरीर से रहित होनेपर भी आपको हमारे सहयोग की अपेक्षा नहीं रहती।
चूँकि आप इस दृश्य जगत के कारणहैं और अपरिवर्तित रूप में ही इसके भौतिक अवयवों की पूर्ति करते हैं, अतः आप स्वतःइसकी सृष्टि, पालन तथा संहार करते हैं।
तो भी भौतिक कार्यों में व्यस्त प्रतीत होते हुए भीआप समस्त भौतिक गुणों से परे हैं।
अतः आपके दिव्य कार्य कलापों को समझ पानाकठिन है।
अथ तत्र भवान्कि देवदत्तवदिह गुणविसर्गपतित: पारतन्येण स्वकृतकुशलाकुशलंफफलमुपाददात्याहोस्विदात्माराम उपशमशील: समझसदर्शन उदास्त इति ह वाव न विदामः ॥
३५॥
अथ--अत:; तत्र--उसमें; भवान्--आप; किम्-- क्या; देव-दत्त-वत्--अपने कर्मफल से अधीन सामान्य मनुष्य कीभाँति; हह--इस भौतिक जगत में; गुण-विसर्ग-पतित:-- भौतिक प्रकृति के गुणों से बाध्य होकर भौतिक शरीर मेंगिरकर; पारतन््येण--काल, स्थान, कर्म तथा प्रकृति के आश्रित होने से; स्व-कृत--अपने से किया गया; कुशल--शुभ;अकुशलम्--अशुभ; फलम्--कर्मफल; उपाददाति--स्वीकार करता है; आहोस्वित्ू--अथवा; आत्माराम:--पूर्णतयाआत्म-तृष्ट; उपशम-शील:--आत्मसंयमी; समझस-दर्शन:--पूर्ण आध्यात्मिक शक्तियों से विहीन न होकर; उदास्ते--साक्षी रूप में उदासीन रहता है; इति--इस प्रकार; ह वाव--निश्चय ही; न विदाम:--हम समझ नहीं पाते |
ये ही हमारी जिज्ञासाएँ हैं।
सामान्य बद्धजीव भौतिक नियमों के अधीन है और उसेअपने कर्मों का फल मिलता है।
क्या आप भौतिक गुणों से उत्पन्न शरीर में सामान्य मनुष्योंकी भाँति इस संसार में उपस्थित रहते हैं?
क्या आप काल, पूर्व कर्म आदि के वशीभूतहोकर अच्छे या बुरे कर्मों को भोगते हैं?
अथवा, इसके विपरीत क्या आप ऐसे उदासीनसाक्षी के रूप में यहाँ उपस्थित हैं, जो आत्मनिर्भर, समस्त भौतिक इच्छाओं से रहित तथाआध्यात्मिक शक्ति से सदैव परिपूर्ण रहता है ?
हम निश्चित रूप से आपकी वास्तविक स्थितिको नहीं समझ सकते।
न हि विरोध उभयं भगवत्यपरिमितगुणगणईश्वरेडनवगाह्ममाहात्म्येडर्वांचीनविकल्पवितर्कविचारप्रमाणा भासकुतर्कशास्त्रकलिलान्त:करणा श्रयदुरवग्रहवादिनां विवादानवसर उपरत [समस्तमायामये केवल एवात्ममायामन्तर्धाय को न्वर्थों दुर्घटड्व भवति स्वरूपट्ठयाभावातू, ॥
३६॥
न--नहीं; हि--निश्चय ही; विरोध: --विरोध; उभयम्--दोनों; भगवति-- भगवान् में; अपरिमित-- असीम; गुण-गणे --जिसके दिव्य गुण; ईश्वर--परम नियन्ता में; अनवगाह्य --से युक्त; माहात्म्ये--अथाह शक्ति तथा महिमा; अर्वाचीन--आधुनिक; विकल्प--विकल्प; वितर्क--विरोधी तर्क; विचार--विचार; प्रमाण-आभास--अपूर्ण प्रमाण; कुतर्क --बेकार के तर्क; शास्त्र--अवैध धर्मग्रंथों के द्वारा; कलिल--विश्लुब्ध; अन्तःकरण--मन; आश्रय--जिसकी शरण;दुरवग्रह--दुराग्रहों से; वादिनाम्ू--सिद्धान्तवादियों का; विवाद--झगड़ों का; अनवसरे--सीमा से बाहर; उपरत--हटाकर; समस्त--जिनसे सब; माया-मये--माया; केवले--अकेला, अद्वितीय; एब--निस्सन्देह; आत्म-मायाम्ू--माया,जो सब कुछ बना-बिगाड़ सकती है; अन्तर्धाय--बीच में रखकर; कः--क्या; नु--निस्सन््देह; अर्थ: --अर्थ; दुर्घट:--असम्भव; इब--मानो; भवति--है; स्व-रूप--प्रकृतियाँ; द्य--दो के; अभावात्--कमी सेहै
भगवन्! सभी विरोधों का आप में तिरोधान होता है।
हे ईश्वर! चूँकि आप परम पुरुष,अनन्त दिव्य गुणों के आगार, परम नियन्ता हैं, अतः आपकी असीम महिमा बद्धजीवों कीकल्पना के परे है।
अनेक सिद्धान्तवादी बिना जाने कि वास्तव में सच क्या है, सत्य तथामिथ्या के विषय में तर्क करते हैं।
उनके तर्क झूठे होते हैं और फैसले अनिर्णीत, क्योंकिउनके पास आपको जानने का कोई बैध प्रमाण नहीं है।
चूँकि उनके मन धर्म ग्रंथों के झूठेनिष्कर्षों से विक्षुब्ध रहते हैं, अत: वे यह नहीं समझ पाते कि सत्य कया है।
यही नहीं, सही-सही निष्कर्ष प्राप्त करते समय उनकी उत्कण्ठा दूषित रहती है, जिससे उनके सिद्धान्तआपका वर्णन करने में असमर्थ रहते हैं, क्योंकि आप उनकी भौतिक बुद्धि से परे हैं।
आपअद्वितीय हैं, अतः आप में करणीय तथा अकरणीय, सुख तथा दुख जैसे विरोध नहीं हैं।
आपकी उस शक्ति के द्वारा आपके लिए क्या असम्भव है ?
आपकी स्वाभाविक स्थिति द्वैतसे रहित है, अतः आप अपनी शक्ति के प्रभाव से सब कुछ कर सकते हैं।
समविषममतीनां मतमनुसरसि यथा रज्जुखण्ड: सर्पादिधियाम्, ॥
३७॥
सम--समान या उचित; विषम--तथा असमान या अनुचित; मतीनाम्--बुद्धिमानों का; मतम्--निष्कर्ष; अनुसरसि--पालन करते हो; यथा--जिस प्रकार; रज्जु-खण्ड:--रस्सी का टुकड़ा; सर्प-आदि--साँप इत्यादि ; धियाम्-देखने वालोंका
मोहग्रस्त पुरुष रस्सी को सर्प मान बैठता है, अतः उसे रस्सी भय उत्पन्न करती है, किन्तुसमुचित बुद्धि वाले मनुष्य में रस्सी ऐसा नहीं कर पाती क्योंकि वह इसे केवल रस्सी हीजानता है।
इसी प्रकार सबों के हृदयों में उनकी बुद्धि के ही अनुसार परमात्मा-स्वरूप आपभय या निर्भीकता का भाव उत्पन्न करने वाले हैं, किन्तु आप स्वयं अद्ठैत हैं।
स एव हि पुनः सर्ववस्तुनि वस्तुस्वरूप: सर्वे श्वर:ः सकलजगत्कारणकारणभूत:सर्व प्रत्यगात्मत्वात्सर्वगुणाभासोपलक्षित एक एव पर्यवशेषित:, ॥
३८ ॥
सः--वे ( श्रीभगवान् ); एव--निस्सन्देह; हि--निश्चय ही; पुनः--फिर; सर्व-वस्तुनि--भौतिक तथा आध्यात्मिक सभीवस्तुओं में; वस्तु-स्वरूप:--वस्तु; सर्व-ई श्वरः --सभी वस्तुओं के नियन्ता; सकल-जगत्--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में; कारण--कारणों का; कारण-भूतः--कारण बनकर; सर्व-प्रत्यक्-आत्मत्वात्-- प्रत्येक वस्तु का परमात्मा होने अथवा प्रत्येक वस्तुमें, यहाँ तक कि परमाणु में भी उपस्थित होने के कारण; सर्व-गुण--प्रकृति के सभी गुणों के प्रभावों का ( यथा बुद्धितथा इन्द्रियाँ ); आभास--प्रकाश से; उपलक्षित:--देखा गया; एक:--अकेला; एव--निस्सन्देह; पर्यवशेषित:--शेषछूटा हुआ।
विचार-विमर्श से यह देखा जा सकता है कि परमात्मा यद्यपि विभिन्न प्रकार से प्रकटहोते हैं, किन्तु प्रत्येक वस्तु के मूल तत्त्व वे ही हैं।
सम्पूर्ण भौतिक शक्ति इस संसार काकारण है, किन्तु यह शक्ति उन्हीं से उद्भूत है, अतः वे ही समस्त कारणों के कारण हैं औरबुद्धि तथा इन्द्रियों के प्रकाशक हैं।
वे प्रत्येक वस्तु में परमात्मा रूप में देखे जाते हैं।
उनके बिना प्रत्येक वस्तु मृत हो जायेगी।
परमात्मा रूप में आप परम नियन्ता ही एकमात्र शेष बचेहैं।
अथ ह वाव तब महिमामृतरससमुद्रविप्रुषा सकृदवलीढया स्वमनसि निष्यन्दमानानवरतसुखेनविस्मारितदृष्ठश्रुत॒विषयसुखलेशा भासा: परमभागवता एकान्तिनो भगवति सर्वभूत (प्रियसुहृदिसर्वात्मनि नितरां निरन्तरं निर्वृतमनस: कथमु ह वा एते मधुमथन पुनः स्वार्थकुशला ह्ात्मप्रियसुहदःसाधव्स्त्वच्चरणाम्बुजानुसेवां विसृजन्ति न यत्र पुनरयं संसारपर्यावर्त: ॥
३९॥
अथ ह--अत:; वाव--निस्सन्देह; तब--तुम्हारी; महिम--महिमा का; अमृत-- अमृत का; रस--रस का; समुद्र--समुद्रकी; विप्रुषा--एक बूँद से; सकृत्ू--केवल एक बार; अवलीढया--चखा जाकर; स्व-मनसि--अपने मन में;निष्यन्दमान-- प्रवाहित; अनवरत--निरन्तर; सुखेन--दिव्य आनन्द से; विस्मारित--विस्मृत; दृष्ट-- भौतिक दृष्टि से; श्रुत--तथा ध्वनि; विषय-सुख--भौतिक सुख का; लेश-आभासा:--झलक मात्र; परम-भागवता:--महान् भक्तगण;एकान्तिन:--एकनिष्ठ श्रद्धा रखने वाले; भगवति-- श्री भगवान् में; सर्व-भूत--समस्त जीवात्माओं को; प्रिय-- अत्यन्तप्रिय; सुहदि--मित्र; सर्व-आत्मनि--सबों का परमात्मा; नितराम्--पूर्णतः ; निरन्तरम्--सतत; निर्वृत--सुख से; मनस:--जिनके मन; कथम्--किस प्रकार; उ ह--तब; वा--अथवा; एते--ये; मधु-मथन--हे मधु नामक असुर के मारने वाले;पुन:--फिर; स्व-अर्थ-कुशला:--जो स्वार्थ में कुशल हैं; हि--निस्सन्देह; आत्म-प्रिय-सुहृदः --जिन्होंने आपकोपरमात्मा, परमप्रिय तथा मित्र रूप में अंगीकार किया है; साधव:--भक्तगण; त्वत्-चरण-अम्बुज-अनुसेवाम्--आपकेचरणारविन्द की सेवा; विसृजन्ति--छोड़ सकते हैं; न--नहीं; यत्र--जिसमें; पुन:--फिर; अयम्--यह; संसार-पर्यावर्त: --इस संसार में जन्म-मरण का चक्कर।
अतः हे मधुसूदन! जिन्होंने आपकी महिमा के समुद्र की एक भी अमृतमयी बूँद कोचख लिया है, उनके मन में निरन्तर आनन्द की धारा प्रवाहित होती रहती है।
ऐसे महात्माभक्त दृश्य तथा श्रवणेन्द्रियों से उत्पन्न होने वाले तथाकथित भौतिक सुख की झलक कोभूल जाते हैं।
ऐसे भक्त समस्त इच्छाओं से मुक्त होकर सभी जीवात्माओं के वास्तविक मित्रहोते हैं।
वे अपने मन को आप में समर्पित करके दिव्य आनन्द उठाते हुए जीवन के असलीउद्देश्य को प्राप्त करने में कुशल होते हैं।
हे भगवन्) आप ऐसे भक्तों के, जिन्हें इस भौतिकजगत में कभी वापस नहीं आना पड़ता, प्रिय मित्र एवं आत्मा हैं।
भला वे आपकी भक्ति कोकिस प्रकार त्याग सकते हैं ?
त्रिभुवनात्मभवन त्रिविक्रम त्रिनयन त्रिलोकमनोहरानुभाव तबैव विभूतयो दितिजदनुजादयश्चापितेषामुपक्रमसमयोयमिति स्वात्ममायया सुरनरमृगमिश्रित ।
जलचराकृतिभिर्यथापराध॑ दण्डं दण्डधरदधर्थ एवमेनमपि भगवद्धहि त्वाष्टमुत यदि मन्यसे ॥
४०॥
त्रि-भुवन-आत्म-भवन--हे भगवान्, आप लोकों के आश्रय हैं क्योंकि आप तीनों लोकों के परमात्मा हैं; त्रि-विक्रम--हेवामनरूप धारी भगवान्, आपकी शक्ति तथा ऐश्वर्य तीनों लोकों में फैले हैं; त्रि-नयन--तीनों लोकों के पालक तथा दूत;त्रि-लोक-मनोहर-अनुभाव--हे तीन लोकों में परम सुन्दर दिखाई पड़ने वाले; तब--तुम्हारा; एब--निश्चय ही;विभूतय: --शक्ति के अंश; दिति-ज-दनु-ज-आदय: --दिति के असुर पुत्र तथा दानव, जो अन्य प्रकार के असुर हैं; च--तथा; अपि--( मनुष्य ) भी; तेषाम्--उन सबों में से; उपक्रम-समय:--उन्नति का अवसर; अयम्--यह; इति--इस प्रकार;स्व-आत्म-मायया--आपकी स्वयं की शक्ति से; सुर-नर-मृग-मिश्रित-जलचर-आकृतिभि:--विभिन्न रूपों से यथादेवता, मनुष्य, पशु, मिश्रित तथा जलचर ( वामन, भगवान् रामचन्द्र, कृष्ण, वराह, हयग्रीव, नूसिंह, मत्स्य तथा कूर्मअवतार ); यथा-अपराधम्-- अपने अपने अपराधों के अनुसार; दण्डम्--दंड, सजा; दण्ड-धर--हे परम दण्डदाता;दधर्थ--आपने फल दिया; एवम्--इस प्रकार; एनम्--यह एक ( वृत्रासुर ); अपि-- भी; भगवन्--हे भगवन्; जहि--मारडालिये; त्वाष्टम्-त्वष्टा के पुत्र; उत--निस्सन्देह; यदि मन्यसे--यदि उचित समझते हैं, तो
हे भगवन्, हे साक्षात् त्रिलोकी, तीनों लोकों के जनक! हे वामन अवतार के रूप मेंतीनों लोकों के पराक्रम! हे नृसिंहदेव के त्रि-नेत्र रूप, हे तीनों लोकों में परम सुन्दर पुरुष!प्रत्येक वस्तु तथा प्रत्येक प्राणी जिसमें मनुष्य तथा दैत्य और दानव भी सम्मिलित हैं, आपकेही शक्ति के अंश हैं।
हे परम शक्तिमान! जब-जब असुर शक्तिशाली हुए हैं तब-तब आपउन्हें दण्ड देने के लिए विभिन्न अवतारों के रूप में प्रकट हुए हैं।
आप भगवान् वामनदेव,राम और कृष्ण के रूप में प्रकट हुए हैं।
कभी आप पशु के रूप में प्रकट होते हैं यथाभगवान् वराह, तो कभी मिश्रित अवतार के रूप में यथा भगवान् नृसिंहदेव तथा भगवान्हयग्रीव और कभी जलचर रूप में यथा भगवान् मस्य तथा भगवान् कूर्म।
आपने ऐसे अनेकरूप धारण करके सदैव असुरों तथा दानवों को दण्ड दिया है।
अतः हम आपसे प्रार्थना करतेहैं कि आप यदि आवश्यक समझें तो महा असुर वृत्रासुर को मारने के लिए आज किसीअन्य अवतार के रूप में प्रकट हों।
अस्माक॑ तावकानां तततत नतानां हरे तब चरणनलिनयुगलध्यानानुबद्धहदयनिगडानांस्वलिड्रविवरणेनात्मसात्कृतानामनुकम्पानुरज्लितविशदरुचिरशिशिरस्मितावलोकेनविगलित मधुरमुखरसामृतकलया चान्तस्तापमनघाईसि शमयितुम्, ॥
४१॥
अस्माकम्--हमारा; तावकानाम्--जो आप पर पूर्णतया आश्रित हैं, निज जन; तत-तत--हे पिता के पिता अर्थात्पितामह; नतानाम्--जिन्होंने पूर्णतया आपको आत्मसमर्पण कर दिया है; हरे--हे हरि; तव--तुम्हारे; चरण--पाँवों पर;नलिन-युगल--दो नील कमलों के समान; ध्यान--मनन से; अनुबद्ध--बँधे हुए; हृदय--हृदय में; निगडानाम्ू--जिसकीजंजीरें ( बंधन ); स्व-लिड्र-विवरणेन-- अपना रूप प्रकट करके; आत्मसात्-कृतानाम्--जिन्होंने आपको अपना लिया है;अनुकम्पा--दयाभाव से; अनुरज्चित--रंजित होकर; विशद्--चमकीला; रुचिर--अत्यन्त मनोहर; शिशिर--शीतल;स्मित--मंद हँसी से युक्त; अवलोकेन--अपनी चितवन से; विगलित--दयाभाव से पिघला हुआ; मधुर-मुख-रस--आपके मुख से अत्यन्त मीठे शब्द; अमृत-कलया--अमृत की बूँदों से; च--तथा; अन्तः--अन्तःकरण में; तापम्--अधिक जलन; अनघ--हे परम पवित्र; अहंसि--आपको चाहिए; शमयितुम्-शान्त करनाहै परम रक्षक
हे पितामह, हे परम पवित्र, हे परमेश्वर! हम सभी आपके चरणकमलों परसमर्पित हैं।
दरअसल, हमारे मन ध्यान में प्रेम-पाश द्वारा आपके चरणाविन्द से बँधे हुए हैं।
अब आप अपना अवतार-रूप प्रकट कीजिये।
हमें आप अपना शाश्वत दास तथा भक्तमानकर हम पर प्रसन्न हों और हमारे ऊपर दया करें।
आप अपनी प्रेमपूर्ण चितवन, शीतलतथा दयापूर्ण मममोहक हँसी तथा सुन्दर मुख से झरने वाले अमृत शब्दों से हम सबों की उसचिन्ता को दूर करें जो वृत्रासुर के कारण उत्पन्न हुई है और सदैव हमारे हृदयों को कष्ट देतीहै।
अथ भगवंस्तवास्माभिरखिलजगदुत्पत्तिस्थितिलयनिमित्तायमानदिव्यमायाविनोदस्यसकलजीवनिकायानामन्तईदयेषु बहिरपि च॒ ब्रह्मप्रत्यगात्मस्वरूपेण प्रधानरूपेण चयथादेशकालदेहावस्थानविशेषं तदुपादानोपलम्भकतयानुभवत: सर्वप्रत्ययसाक्षशरीरस्य साक्षात्परब्रह्मण: परमात्मनः कियानिह वार्थविशेषो विज्ञापनीय:स्याद्विस्फुलिड्रादिभिरिव हिरण्यरेतस: ॥
४२॥
अथ--अत:; भगवनू--हे भगवन्; तब--तुम्हारा; अस्माभि:--हम सबों के द्वारा; अखिल--सम्पूर्ण; जगत्-- भौतिकसंसार की; उत्पत्ति--उत्पत्ति का; स्थिति--पालन; लय--तथा संहार; निमित्तायमान--कारण होने से; दिव्य-माया--आध्यात्मिक शक्ति से; विनोदस्य--आपका, जो स्वयं ही विनोद करने वाले हैं; सकल--समस्त; जीव-निकायानाम्--जीवात्माओं के समूहों का; अन्तः-हृदयेषु--हृदयों के भीतर; बहि: अपि--बाहर से भी; च--तथा; ब्रह्म--निर्गुण ब्रह्मअथवा परम सत्य; प्रत्यक्-आत्म--परमात्मा का; स्व-रूपेण-- अपने रूपों के द्वारा; प्रधान-रूपेण--बाह्य अवयवों केरूप में अपने स्वरूप द्वारा; च--तथा; यथा--के अनुसार; देश-काल-देह-अवस्थान--देश, काल, शरीर तथा अवस्थाका; विशेषम्--विशेष; तत्ू--उन सबका; उपादान-- भौतिक कारणों का; उपलम्भकतया--प्रकाशक के रूप में;अनुभवतः --साक्षी बनकर; सर्व-प्रत्यय-साक्षिण:--विभिन्न कार्यो का साक्षी; आकाश-शरीरस्य--समस्त ब्रह्माण्ड कापरमात्मा; साक्षात्--प्रकट रूप में; पर-ब्रह्मण:--परब्रह्म, परम सत्य; परमात्मन:--परमात्मा; कियानू--किस हद तक;इह--यहाँ; वा-- अथवा; अर्थ-विशेष:--विशेष आवश्यकता; विज्ञापनीय:--सूचित करने योग्य; स्थात्--हो सकता है;विस्फुलिड्ड-आदिभि: --अग्नि की चिनगारियों के द्वारा; इब--सहृश; हिरण्य-रेतस:--आदि अग्नि को।
है भगवान्! जिस प्रकार अग्नि की छोटी-छोटी चिनगारियाँ पूर्ण ( आदि ) अग्नि काकार्य करने में असमर्थ हैं, वैसे ही आपकी चिनगारी रूप हम सभी अपने जीवन कीआवश्यकता बता पाने में अक्षम हैं।
आप पूर्ण ब्रह्म हैं, अतः हमें आपको बताने की क्याआवश्यकता ?
आप सब कुछ जानने वाले हैं क्योंकि आप दृश्य जगत के आदि कारण,इसके पालक तथा सम्पूर्ण सृष्टि के संहर्ता हैं।
आप अपनी दिव्य तथा भौतिक शक्तियों सेलीलाएँ करते रहते हैं क्योंकि आप ही इन समस्त शक्तियों के नियामक हैं।
आप इन विभिन्नशक्तियों के नियामक हैं।
आप सभी जीवों के भीतर दृश्य सृष्टि में और उस से परे भी रहतेहैं।
आप अन्तःकरणों में परब्रह्म के रुप में और बाह्मत: भौतिक सृष्टि के अवयवों के रूप मेंस्थित हैं।
अत: यद्यपि आप विभिन्न अवस्थाओं, विभिन्न कालों तथा स्थानों और विभिन्न देहोंमें प्रकट होते रहते हैं, तो भी हे भगवन्! आप ही समस्त कारणों के आदि कारण हैं।
वास्तवमें आप ही मूल तत्त्व हैं।
आप समस्त गतिविधियों के साक्षी हैं, किन्तु आकाश के समानमहान् होने के कारण किसी के द्वारा स्पृश्य नहीं हैं।
आप परब्रह्म तथा परमात्मा के रूप मेंप्रत्येक वस्तु के साक्षी हैं।
हे भगवान्! आपसे कुछ भी छिपा नहीं है।
चरणकमलों की शरण में क्यों आये हैं, जिनकी छाया समस्त भौतिक अशान्तियों सेछुटकारा दिलाने वाली है।
चूँकि आप परम गुरु हैं और सब कुछ जानते हैं, अतः हमनेआदेश प्राप्त करने के लिए आपके चरणकमलों का आश्रय लिया है।
कृपया हमारे वर्तमानदुखों को दूर करके हमें शरण दीजिये।
आपके चरणकमल ही पूर्ण समर्पित भक्त केएकमात्र आश्रय हैं और इस भौतिक जगत के संतापों को शमित करने के एकमात्र साधनहैं।
अत एव स्वयं तदुपकल्पयास्माकं भगवतः परमगुरोस्तव चरणशतपलाशच्छायांविविधवृजिन [संसारपरिश्रमोपशमनीमुपसूतानां बयं यत्कामेनोपसादिता:. ॥
४३॥
अत एव--अत:; स्वयम्-- अपने आप; तत्--वह; उपकल्पय--कृपया प्रबन्ध करें; अस्माकम्--हमारा; भगवत:--श्रीभगवान् का; परम-गुरो:--सबसे बड़ा गुरु; तब--तुम्हारा; चरण--पाँवों का; शत-पलाशत्--एक सौ पंखड़ियों वालेकमल पुष्प की भाँति; छायाम्--छाया; विविध-- अनेक; वृजिन--घातक स्थितियों से; संसार--इस बद्ध जीवन का;परिश्रम--कष्ट; उपशमनीम्--छुटकारा दिला कर; उपसृतानामू--आपके चरणकमलों में शरण लेने वाले भक्त; वयम्--हम; यत्--जिसके लिए; कामेन--इच्छाओं से; उपसादिता:--( आपके चरणकमलों की शरण में ) आने को बाध्य ।
है भगवान्! आप सर्वज्ञाता हैं, अतः आप अच्छी तरह जानते हैं कि हम आपके चरणकमलों की शरण में क्यों आये हैं, जिनकी छाया समस्त भौतिक अशान्तियों से छुटकारा दिलाने वाली है।
चूँकि आप परम गुरु हैं और सब कुछ जानते हैं, अतः हमने आदेश प्राप्त करने के लिए आपके चरणकमलों का आश्रय लिया है।
कृपया हमारे वर्तमान दुखों को दूर करके हमें शरण दीजिये।
आपके चरणकमल ही पूर्ण समर्पित भक्त के एकमात्र आश्रय हैं और इस भौतिक जगत के संतापों को शमित करने के एकमात्र साधन हैं।
अथो ईश जहि त्वाष्ट्र ग्रसन््तं भुवनत्रयम् ।
ग्रस्तानि येन नः कृष्ण तेजांस्यस्त्रायुधानि च ॥
४४॥
अथो--अत:; ईश--हे परम नियन्ता; जहि--मारिये; त्वाष्टम्--त्वष्टा के पुत्र, वृत्रासुर को; ग्रसन््तम्--जो निगले जा रहा है;भुवन-त्रयम्--तीनों लोक; ग्रस्तानि--निगले हुए; येन--जिसके द्वारा; न:--हमारा; कृष्ण--हे भगवान् श्रीकृष्ण;तेजांसि--समस्त शक्ति तथा तेज; अस्त्र--तीर; आयुधानि--तथा अन्य हथियार; च--भी
अतः हे परम नियन्ता, हे भगवान् श्रीकृष्ण! त्वष्टा के पुत्र इस घातक असुर वृत्रासुर कासंहार कीजिये।
जिसने हमारे समस्त शस्त्रास्त्र, युद्ध की सारी सामग्री तथा हमारे बल औरतेज को निगल रखा है।
हंसाय दहनिलयाय निरीक्षकायकृष्णाय मृष्ठयशसे निरुपक्रमाय ।
सत्सड्ूग्रहाय भवपान्थनिजा श्रमाप्ता-वबन्ते परीष्टगतये हरये नमस्ते ॥
४५॥
हंसाय--महान् तथा शुद्ध को ( पवित्र॑ परमम्, परम शुद्ध ); दह--अन्तःस्थल में; निलयाय--जिसका धाम; निरीक्षकाय--प्रत्येक आत्मा की गतिविधियों का निरीक्षण करने के लिए; कृष्णाय--परमात्मा को, जो श्रीकृष्ण के अंश रूप हैं; मृष्ट-यशसे--जिनका यश अत्यन्त प्रकाशमान् है; निरुपक्रमाय--जिसका आदि नहीं है, अनादि; सत्-सड्ग्रहाय--शुद्ध भक्तोंद्वारा ज्ञेय; भव-पान्थ-निज-आश्रम-आप्तौ--इस भौतिक जगत में प्राणियों के लिए श्रीकृष्ण की शरण प्राप्त करके;अन्ते--अन्त में; परीष्ट-गतये--जीवन की सबसे बड़ी सफलता, उन श्रीभगवान् को जो परम-लक्ष्य हैं; हरये-- श्री भगवान्को; नमः--सादर नमस्कार; ते--तुम्हें ( आपको )
हे भगवान्! हे परम शुद्ध! आप सबों के अन्तःस्थल में रहते हैं और बद्धजीवों की समस्तआकांक्षाओं तथा गतिविधियों का निरीक्षण करते हैं।
श्रीकृष्ण के रूप में विख्यात हेभगवान्! आपका यश अत्यन्त प्रकाशमान है।
आपका आदि नहीं है क्योंकि आप प्रत्येकवस्तु के उद्गम हैं।
शुद्ध भक्त इससे परिचित हैं क्योंकि आप शुद्ध तथा सत्यनिष्ठ के लिएसुगम हैं।
जब करोड़ों वर्षो तक भौतिक जगत में भटकने के बाद बद्धात्माएँ आपकेचरणकमलों पर मुक्त होकर शरण पाती हैं, तो उन्हें जीवन का परम लक्ष्य प्राप्त हो जाता है।
अतः हे भगवान्! हम आपके चरणारविन्द को सादर नमस्कार करते हैं।
श्रीशुक उबाचअथैवमीडितो राजन्सादरं त्रिदशैर्हरि: ।
स्वमुपस्थानमाकर्णय्य प्राह तानभिनन्दितः ॥
४६॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ--तत्पश्चात्;: एवम्--इस प्रकार; ईंडित:--पूजा तथा नमस्कार कियेजाने पर; राजन्--हे राजन्; स-आदरम्--आदरपूर्वक; त्रि-दशै:--स्वर्ग के समस्त देवताओं के द्वारा; हरिः-- श्री भगवान्;स्वम् उपस्थानम्--अपना यशोगान; आकर्णर्य--सुनकर; प्राह--उत्तर दिया; तानू--उन ( देवताओं ) को; अभिनन्दित:--प्रसन्न होकर।
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--हे राजा परीक्षित! जब देवताओं ने इस प्रकार सेभगवान् की सच्ची स्तुति की तो उसे उन्होंने कृपापूर्वक सुना और प्रसन्न होकर देवताओं कोउत्तर दिया।
श्रीभगवानुवाचप्रीतोहं वः सुरभ्रेष्ठा मदुपस्थानविद्यया ।
आत्मैश्वर्यस्मृति: पुंसां भक्तिश्चेव यया मयि ॥
४७॥
श्री-भगवान् उबाच-- श्री भगवान् ने कहा; प्रीत:--प्रसन्न; अहम्--मैं; व:--तुमसे; सुर-श्रेष्ठा:--हे देवताओं में श्रेष्ठ; मत्-उपस्थान-विद्यया--महान् ज्ञान तथा स्तुतियों से; आत्म-ऐश्वर्य-स्मृति:--अपनी परम दिव्य स्थिति की स्मृति; पुंसाम्--मनुष्यों की; भक्ति:-- भक्ति; च--तथा; एव--निश्चय ही; यया--जिससे; मयि--मुझको |
श्रीभगवान् ने कहा--हे प्यारे देवो! तुम लोगों ने अत्यन्त ज्ञानपूर्वक मेरी स्तुति की है,जिससे मैं तुम लोगों से अत्यन्त प्रसन्न हूँ।
मनुष्य ऐसे ज्ञान के कारण मुक्त हो जाता है और मेरेउच्च पद को स्मरण करता रहता है, जो भौतिक जीवन की स्थितियों के ऊपर है।
ऐसा भक्तपूर्ण ज्ञान में रहकर स्तुति करने पर शुद्ध हो जाता है।
मेरी भक्ति करने का यही स्त्रोत है।
किं दुरापं मयि प्रीते तथापि विबुधर्षभा: ।
मय्येकान्तमतिर्नान्यन्मत्तो वाउ्छति तत्त्ववित् ॥
४८ ॥
किम्-क्या; दुरापम्ू-दुर्लभ; मयि--जब मैं; प्रीते--प्रसन्न; तथापि--फिर भी; विबुध-ऋषभा:--हे बुद्धिमान देवताओंमें श्रेष्ठ मयि--मुझमें; एकान्त-- अनन्य; मति:--जिसका ध्यान; न अन्यत्--और कहीं नहीं; मत्त:--मेरी अपेक्षा;वाउ्छति--चाहता है; तत्त्व-वित्--जो सत्य को जानता है |
हे बुद्धिमान देवताओं में श्रेष्ठ) यद्यपि यह सत्य है कि मेरे प्रसन्न हो जाने पर किसी केलिए कुछ भी प्राप्त कर लेना कठिन नहीं है, तो भी शुद्ध भक्त, जिसका मन विशिष्ठ भाव सेमुझ पर स्थिर है, वह मेरी भक्ति में निरत रहने के अवसर के अतिरिक्त मुझसे और कुछ भीनहीं माँगता।
न वेद कृपण: श्रेय आत्मनो गुणवस्तुटक् ।
तस्य तानिच्छतो यच्छेद्यदि सोडपि तथाविध: ॥
४९॥
न--नहीं; वेद--जानता है; कृपण:--कंजूस जीवात्मा; श्रेय:--परम आवश्यकता, हित; आत्मन:--आत्मा की; गुण-वस्तु-हक्--जो त्रिगुण की सृष्टि से मोहित है; तस्थ--उसका; तानू--माया द्वारा उत्पन्न वस्तुएँ; इच्छत:--इच्छा करते हुए;यच्छेत्-- प्रदान करता; यदि--यदि; सः अपि--वह भी; तथा-विध: --उसी प्रकार का ( मूर्ख कृपण जो अपने असली हितको नहीं पहचानता )
जो लोग भौतिक सम्पत्ति को ही सब कुछ या जीवन का परम ध्येय मानते हैं, वे कृपणकहलाते हैं।
वे आत्मा की परम आवश्यकता (हित ) को नहीं जानते।
यही नहीं, यदि कोईऐसे मूर्खों की इच्छा की पूर्ति करता है, उसे भी मूर्ख समझना चाहिए।
स्वयं निःश्रेयसं विद्वान्न वक्त्यज्ञाय कर्म हि ।
न राति रोगिणोपथ्यं वाउ्छतोपि भिषक्तम: ॥
५०॥
स्वयम्--स्वतः ; नि: श्रेयसम्ू--जीवन का परम लक्ष्य अर्थात् भगवान् का आह्वादकारी प्रेम प्राप्त करने के साधन; वित्ू-वान्--जिसने भक्ति में पूर्णता प्राप्त कर ली है; न--नहीं; वक्ति--शिक्षा देता है; अज्ञाय--मूर्ख को जो जीवन के चरमलक्ष्य से परिचित नहीं है; कर्म--सकाम कर्म; हि--निस्सन्देह; न--नहीं; राति--पिलाता है; रोगिण:--रोगी को;अपथध्यम्-- अखाद्य; वाउ्छत:--इच्छुक; अपि--यद्यपि; भिषक्-तम: --अनुभवी वैद्य |
भक्तियोग में दक्ष शुद्ध भक्त कभी भी मूर्ख पुरुष को भौतिक सुख के लिए सकाम कर्मकरने का उपदेश नहीं देगा, ऐसे कार्यों में सहायता करना तो दूर रहा।
ऐसा भक्त उसअनुभवी वैद्य के समान है, जो रोगी के चाहने पर भी उसे ऐसा पशथ्य ग्रहण करने के लिएप्रोत्साहित नहीं करता जो उसे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो।
मघवन्यात भद्गं वो दध्यज्लमृषिसत्तमम् ।
विद्या्रततपःसारं गात्रं याचत मा चिरम् ॥
५१॥
मघवनू--हे इन्द्र; यात--जाओ; भद्रमू--कल्याण; व:--तुम सबों का; दध्यजञ्ञम्--दध्यञ्ञ के पास; ऋषि-सत्-तमम्--सर्वश्रेष्ठ साधु पुरुष; विद्या--विद्या का; ब्रत--ब्रत; तपः--तथा तपस्या; सारम्--निष्कर्ष; गात्रम्ू--उसका शरीर;याचत--माँगो; मा चिरम्--बिना देरी किये |
हे मघवा ( इन्द्र )! तुम्हारा कल्याण हो।
मैं तुम्हें महान् साधु दध्यज्ञ ( दधीचि ) के पासजाने की राय देता हूँ।
वे ज्ञान, ब्रत तथा तपस्या में अत्यन्त सिद्ध हैं और उनका शरीर अत्यन्तसुदृढ़ है।
अब देर न लगाओ।
उनके पास जाकर उनका शरीर माँगो।
स वा अधिगतो दध्यड्डाश्रिभ्यां ब्रह्म निष्कलम् ।
यद्वा अश्वशिरो नाम तयोरमरतां व्यधात् ॥
५२॥
सः--वह; वा--निश्चय ही; अधिगत:--प्राप्त करके; दध्यड्--दध्यञ्ञ; अश्विभ्याम्ू-दोनों अश्विनीकुमारों को; ब्रह्म--आध्यात्मिक ज्ञान; निष्कलम्--शुद्ध; यत् वा--जिससे; अश्वशिर: -- अश्वशिर; नाम--नामक; तयो:--दोनों का;अमरताम्--जीवन से मुक्ति; व्यधात्--प्रदान किया |
ऋषि दध्यञ्ञ ने जो दधीचि के नाम से भी विख्यात हैं ब्रह्मज्षान को आत्मसात् किया थाऔर फिर उसे अश्विनीकुमारों को दिया।
कहा जाता है कि दध्यञ्ञ ने उनको अश्वमुख ( घोड़ेके मुँह ) से मंत्र दिये इसलिए वे मंत्र अश्वशिर कहलाते हैं।
ऋषि दधीचि से ये मंत्र प्राप्त करअश्विनीकुमार जीवनमुक्त हो गये।
दध्यड्डाथर्वणस्त्वष्टे वर्माभेद्य मदात्मकम् ।
विश्वरूपाय यत्प्रादात्त्वष्टा यत्त्मधास्तत: ॥
५३॥
दध्यड्--दध्यञ्ञ; आथर्वण: --अथर्वा का पुत्र; त्वष्टे--त्वष्टा के लिए; वर्म--कवच, नारायण कवच; अभेद्यम्ू--जो भेदान जा सके; मत्-आत्मकम्--मुझसे युक्त; विश्वरूपाय--विश्वरूप के लिए; यत्--जो; प्रादात्-प्रदत्त; त्वष्टा-्वष्टा;यतू--जो; त्वम्--तुम; अधा: --प्राप्त; तत:ः--उससे |
दध्यज्ञ का नारायण-कवच नामक अभेद्य कवच त्वष्टा को मिला जिसने इसे अपने पुत्रविश्वरूप को दिया और जिससे तुमने इसे प्राप्त किया है।
इस नारायण-कवच के कारणदधीचि का शरीर अब अत्यन्त पुष्ठ है।
अतः तुम जाकर उनसे उनका शरीर माँग लो।
युष्मभ्यं याचितोउश्विभ्यां धर्मज्ञोडड्डरानि दास्यति ।
ततस्तैरायुधश्रेष्ठो विश्वकर्मविनिर्मित: ।
येन वृत्रशिरो हर्ता मत्तेजउपबृंहित: ॥
५४॥
युष्मभ्यम्ू--तुम सबों के लिए; याचित:--माँगा जाकर; अश्विभ्याम्--अश्विनीकुमारों द्वारा; धर्म-ज्ञ:--धर्म के ज्ञाता,दधीचि; अड्ञानि-- अपने अंग; दास्यति--देगा; तत:--तत्पश्चात्; तैः--उन हड्डियों से; आयुध--हथियारों का; श्रेष्ठ: --अत्यन्त शक्तिशाली ( वज्ज ); विश्वकर्म-विनिर्मित:--विश्वकर्मा द्वारा तैयार किया गया; येन--जिससे ; वृत्र-शिर:--वृत्रासुरका सिर; हर्ता--काट लिया जाऐगा; मत्-तेज:--मेरे बल से; उपबूंहित: --बढ़े हुए।
जब तुम्हारी ओर से अश्विनीकुमार दधीचि का शरीर माँगेंगे, तो वे स्नेहवश अवश्य देदेंगे।
इसमें सन्देह मत करो, क्योंकि दधीचि धर्म के ज्ञानी हैं।
जब दधीचि तुम्हें अपना शरीरदे देंगे तो विश्वकर्मा उनकी हड्डियों ( अस्थियों ) से एक वज्ज तैयार कर देगा।
यह वज् मेरीशक्ति से युक्त होने के कारण निश्चित रूप से वृत्रासुर का वध करेगा।
तस्मिन्विनिहते यूयं तेजो स्त्रायुधसम्पदः ।
भूय: प्राप्स्थथ भद्गं वो न हिंसन्ति च मत्परान् ॥
५५॥
तस्मिनू--जब वह ( वृत्रासुर ); विनिहते--मारा जाता है; यूयम्ू--तुम सभी; तेज: --तेज; अस्त्र--तीर; आयुध--अन्यहथियार; सम्पदः--तथा ऐश्वर्य; भूय:--फिर; प्राप्स्थथ--प्राप्त करोगे; भद्रमू--समस्त कल्याण; व: --तुमको; न--नहीं ;हिंसन्ति--पीड़ा पहुँचाएँगे; च--तथा; मत्-परान्--मेरे भक्त |
जब वृत्रासुर मेरे आत्मबल ( ब्रह्मतेज ) से मर जायेगा, तो तुम्हें पुन अपना तेज आयुधतथा सम्पत्ति प्राप्त हो जायेगी।
इस प्रकार तुम सबका कल्याण होगा।
यद्यपि वृत्रासुर तीनों लोकों को विनष्ट कर सकता हैं, किन्तु तुम मत डरो कि वह तुम्हें हानि पहुँचायेगा।
वह भीभक्त है और तुमसे कभी भी विद्वेष नहीं करेगा।
