← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 7 की सूची

अध्याय बारह: उत्तम समाज: चार आध्यात्मिक वर्ग

7.12श्रीनारद उवाचब्रह्मचारी गुरुकुले वसन्दान्तो गुरोहितम्‌ ।

आचरन्दासवन्नीचो गुरौ सुदहहसौहद: ॥

१॥

श्री-नारदः उबाच-- श्री नारद मुनि ने कहा; ब्रह्मचारी--गुरु के घर पर रहने वाला विद्यार्थी, ब्रह्मचारी; गुरु-कुले--गुरु केनिवासस्थान पर; वसन्‌--रहते हुए; दान्तः--निरन्तर इन्द्रिय संयम करते हुए; गुरो: हितम्‌ू--केवल गुरु के लाभ के लिए ( अपनेलाभ के लिए नहीं ); आचरन्‌--अभ्यास करते हुए; दास-वत्‌--दास के समान अत्यन्त विनीत होकर; नीच:--विनप्र; गुरौ--गुरु में; सु-हढ--इहढ़तापूर्वक; सौहद:--मित्रता में या शुभकामना में |

नारद मुनि ने कहा : विद्यार्थी को चाहिए कि वह अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण संयम रखने काअभ्यास करे।

उसे विनीत होना चाहिए और गुरु के साथ हृढ़ मित्रता की प्रवृत्ति रखनी चाहिए।

ब्रह्मचारी को चाहिए कि वह महान्‌ ब्रत लेकर गुरुकुल में केवल अपने गुरु के लाभ ही रहे।

"

सायं प्रातरुपासीत गुर्वग्न्यर्कसुरोत्तमान्‌ ।

सन्ध्ये उभे च यतवाग्जपन्ब्रह् समाहित: ॥

२॥

सायमू--संध्या समय; प्रातः--प्रातः काल; उपासीत--पूजा करे; गुरु--गुरु; अग्नि--आग ( अग्नि यज्ञ द्वारा ); अर्क--सूर्य ;सुर-उत्तमानू--तथा पुरुषों में श्रेष्ठ ( पुरुषोत्तम ) भगवान्‌ विष्णु को; सन्ध्ये--प्रातः: तथा सायंकाल; उभे--दोनों; च-- भी; यत-वाक्‌--बिना बोले, मौन रहकर; जपन्‌--मन ही मन गुनगुनाते हुए; ब्रह्म-- गायत्री मंत्र में; समाहित:--पूर्णतया लीन

दिन तथा रात्रि के संधिकाल में अर्थात्‌ प्रातःकाल तथा संध्या समय उसे गुरु, अग्नि, सूर्यदेवतथा भगवान्‌ विष्णु के विचारों में लीन रहना चाहिए और गायत्री मंत्र को जपते हुए उनकी पूजाकरनी चाहिए।

"

छन्दांस्यधीयीत गुरोराहूतश्ेत्सुयन्त्रितः ।

उपक्रमेउवसाने च चरणौ शिरसा नमेत्‌ ॥

३॥

छन्दांसि--वेदों के मंत्र यथा हरे कृष्ण महामंत्र तथा गायत्री मंत्र; अधीयीत--उच्चारण करे या नियम से पढ़े; गुरो:--गुरु से;आहूत:--बुलाया जाकर; चेत्‌--यदि; सु-यन्त्रितः:-- आज्ञाकारी, सभ्य; उपक्रमे--प्रारम्भ में; अवसाने--अन्त में ( वेद मंत्रों केपढ़ने में ); च-- भी; चरणौ--चरणकमलों पर; शिरसा--सिर के बल; नमेत्‌--नमस्कार करे

गुरु द्वारा बताए जाने पर विद्यार्थी को चाहिए कि वह उनसे नियमपूर्वक वैदिक मंत्रों काअध्ययन करे।

शिष्य को प्रतिदिन अपना अध्ययन प्रारम्भ करने के पूर्व तथा अध्ययन के अन्त मेंअपने गुरु को सादर नमस्कार करना चाहिए।

"

मेखलाजिनवासांसि जटादण्डकमण्डलून्‌ ।

बिभूयादुपवीतं च दर्भपाणिर्यथोदितम्‌ ॥

४॥

मेखला--मूँज की मेखला; अजिन-वासांसि--मृगचर्म से बने वस्त्र; जटा--बालों की जटा; दण्ड--डण्डा; कमण्डलूनू--'कमण्डल या जलपात्र; बिभूयात्‌-- उसे ( ब्रह्मचारी को ) सदैव पहनना या लिये रहना चाहिए; उपवीतम्‌ च--तथा जनेऊ; दर्भ-पाणि:--शुद्ध कुश हाथ में लिये; यथा उदितम्‌--शास्त्रों में बताई विधि से

अपने हाथ में शुद्ध कुश घास लिए हुए ब्रह्मचारी को मूँज की मेखला तथा मृगछाला कावस्त्र पहनना चाहिए।

उसे शास्त्रोक्त विधि से जटा रखना चाहिए, दण्ड धारण करना चाहिए,कमण्डल लेना चाहिए और यज्ञोपवीत धारण करना चाहिए।

"

सायं प्रातश्चरेद्धैक्ष्यं गुरवे तन्निवेदयेत्‌ ।

भुझ्जीत यद्यनुज्ञातो नो चेदुपवसेत्क्वचित्‌ ॥

५॥

सायम्‌--संध्या समय; प्रात:--प्रातःकाल; चरेत्‌--बाहर जाना चाहिए; भेक्ष्यमू-भिक्षा माँगने; गुरबे--गुरु को; तत्‌--वहजितना एकत्र करता है; निवेदयेत्‌--अर्पित करे; भुञ्जीत-- खाए; यदि--यदि; अनुज्ञात:--( गुरु द्वारा ) आज्ञा दिये जाने पर;नो--अन्यथा; चेत्‌--यदि; उपवसेत्‌--उपवास रखे; क्वचित्‌ू--कभी |

ब्रह्मचारी को सुबह-शाम भिक्षा माँगने के लिए बाहर जाना चाहिए और जो कुछ भी भिक्षामें मिले उसे लाकर गुरु को दे दे।

वह तभी भोजन करे जब गुरु उसे भोजन करने का आदेश दे,अन्यथा यदि कभी गुरु आदेश न दे, तो वह कभी कभी उपवास करे।

"

सुशीलो मितभुग्दक्ष: श्रददधानो जितेन्द्रिय: ।

यावदर्थ व्यवहरेत्सत्रीषु स्त्रीनिर्जितेषु च ॥

६॥

सु-शील:--अत्यन्त नम्न तथा सभ्य; मित-भुक्‌ू--आवश्यकता से न तो कम और न अधिक भोजन करना; दक्ष:--पटु, आलस्यसे रहित, सदैव कार्यरत; श्रदधान:--शास्त्र तथा गुरु के आदेशों में पूर्ण श्रद्धा रखने वाला; जित-इन्द्रियः--इन्द्रियों पर पूर्णसंयम रखने वाला; यावत्‌-अर्थम्‌--जितना आवश्यक हो; व्यवहरेत्‌--बाह्यरूप से आचरण करे; स्त्रीषु--स्त्रियों से; स्त्री-निर्जितेषु--पुरुष जो स्त्री के वश में होते हैं; च-- भी |

बहाचारी को सदाचारी तथा भद्र होना चाहिए।

उसे न तो आवश्यकता से अधिक खानाचाहिए न एकत्र करना चाहिए।

उसे सदैव क्रियाशील तथा पटु होना चाहिए और गुरु तथाशास्त्रों के आदेशों में पूर्ण विश्वास रखना चाहिए।

उसे अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण संयम रखते हुएस्त्रियों से या स्त्रियों के वशीभूत पुरुषों से उतनी ही संगति करनी चाहिए जितनी कि आवश्यकहो।

"

वर्जयेत्प्रमदागाथामगृहस्थो बृहद्व्गतः ।

इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्त्यपि यतेर्मन: ॥

७॥

वर्जयेत्‌--त्याग दे; प्रमदा-गाथाम्‌--स्त्रियों से बातें करना; अगृहस्थ: --जिसने गृहस्थ आश्रम नहीं स्वीकार किया ( ब्रह्मचारी यासंन्यासी ); बृहत्‌-ब्रत:--ब्रह्मचर्य व्रत का पालन; इन्द्रियाणि--इन्द्रियों को; प्रमाथीनि-- प्रायः अजेय; हरन्ति--चुरा लेती हैं;अपि--भी; यतेः -- संन्यासी का; मन:ः--मन

ब्रह्मचारी या अगृहस्थ को स्त्रियों से बातें करने या उनके विषय में बातें करने से हृढ़तापूर्वकबचना चाहिए, क्योंकि इन्द्रियाँ इतनी प्रबल होती हैं कि वे संन्यासी के मन को भी विचलित करसकती हैं।

"

केशप्रसाधनोन्मर्दस्नपना भ्यज्ञनादिकम्‌ ।

गुरुस्त्रीभिर्युवतिभि: कारयेन्नात्मनो युवा ॥

८॥

केश-प्रसाधन--बाल काढ़ना; उन्मर्द--शरीर की मालिश; स्नपन--स्नान; अभ्यज्ञन-आदिकम्‌--तैल मर्दन आदि; गुरु-स्त्रीभि:--गुरु की पतली से; युवतिभि:--युवती; कारयेत्‌ू--करवाए; न--नहीं; आत्मन:--निज सेवा के लिए; युवा--यदिविद्यार्थी युवक हो |

यदि गुरुपत्नी युवती हो तो युवा ब्रह्मचारी को चाहिए कि वह न तो उससे अपने बालकढ़वाए, न शरीर में तेल मालिश करवाए और न उसे माता तुल्य प्यार से स्नान कराने दे।

"

नन्वग्निः प्रमदा नाम घृतकुम्भसम: पुमान्‌ ।

सुतामपि रहो जह्यादन्यदा यावदर्थकृत्‌ ॥

९॥

ननु--निश्चय ही; अग्नि:--अग्नि; प्रमदा--स्त्री ( पुरुष के मन को मोहने वाली ); नाम--नाम ही; घृत-कुम्भ--धघी के बर्तन के;समः--समान; पुमान्‌ू--मनुष्य; सुताम्‌ अपि--अपनी पुत्री के भी; रहः--एकान्त स्थान में; जह्यात्‌-साथ न रहे; अन्यदा--किसी अन्य स्त्री के साथ भी; यावत्‌--जितना; अर्थ-कृतू--आवश्यक हो |

स्त्री अग्नि के तुल्य है और पुरुष घी के घड़े के समान होता है।

अतएव पुरुष को चाहिए किअपनी पुत्री के साथ भी एकान्त में न रहे।

इसी प्रकार उसे अन्य स्त्रियों की संगति से बचनाचाहिए स्त्रियों से आवश्यक कार्य के लिए ही मिलना चाहिए, अन्यथा नहीं।

"

'कल्पयित्वात्मना यावदाभासमिदमी श्वर: ।

द्वैत॑ तावन्न विरमेत्ततो हास्य विपर्यय: ॥

१०॥

कल्पयित्वा--निश्चय करके; आत्मना--आत्म-साक्षात्कार द्वारा; यावतू--जब तक; आभासम्‌--प्रतिबिम्ब ( मूल शरीर तथाइन्द्रियों का ); इदम्‌--यह ( शरीर इन्द्रियाँ ); ईश्वरः--मोह से पूर्णतया मुक्त; द्वैतम्‌--द्वन्द् तावत्‌--तब तक; न--नहीं;विरमेत्‌--देखता है; ततः--ऐसे द्वैत से; हि--निश्चय ही; अस्थ--पुरुष का; विपर्यय:--प्रतिक्रिया, जवाबी कार्यवाही |

जब तक जीव पूर्णरूपेण स्वरूपसिद्ध नहीं है--जब तक वह देहात्मबुद्धि की भ्रान्त धारणासे मुक्त नहीं हो लेता जो कि मूल शरीर तथा इन्द्रियों का प्रतिबिम्ब मात्र है तब तक वह उस द्वैतभाव से छुटकारा नहीं पा सकता जो स्त्री तथा पुरुष के मध्य द्वैत का सूचक है।

इस तरह हरइसकी हर सम्भावना रहती है कि वह नीचे गिर जाए, क्योंकि उसकी बुद्धि मोहित होती है।

"

एतत्सर्व गृहस्थस्य समाम्नातं यतेरपि ।

गुरुवृत्तिविकल्पेन गृहस्थस्य्तुगामिन: ॥

११॥

एतत्‌--यह; सर्वम्‌--सारे; गृहस्थस्य--गृहस्थ का; समाम्नातम्‌--वर्णित; यते: अपि--यहाँ तक कि संन्यासी का; गुरु-वृत्तिःविकल्पेन--गुरु के आदेशों का पालन करने के लिए; गृहस्थस्य--गृहस्थ का; ऋतु-गामिन:-- प्रजनन के लिए ऋतुकाल केसमय ही मैथुन करना।

सारे नियम तथा विधान गृहस्थ तथा संन्यासी दोनों पर समान रूप से लागू होते हैं।

किन्तुगृहस्थ को उपयुक्त अवसर पर प्रजनन के लिए मैथुन करने के लिए गुरु अनुमति प्रदान करता है।

"

अद्भनाभ्यञ्जनोन्मर्दस्त्यवलेखामिषं मधु ।

स््रग्गन्धलेपालड्डारांस्त्यजेयुयें बृहद्व्रता: ॥

१२॥

अज्जन--आँख में लगाया जाने वाला सुरमा; अभ्यज्ञन--शिर की मालिश; उन्मर्द--शरीर की मालिश; स्त्री-अवलेख--स्त्री परइृष्टि डालना या स्त्री का चित्र बनाना; आमिषम्‌-मांसाहार; मधु--शराब या शहद पीना; सत्रकू--शरीर को फूलों के हारों सेसजाना; गन्ध-लेप--शरीर पर सुगन्धित लेप लगाना; अलड्डारानू--शरीर को आभूषणों से अलंकृत करना; त्यजेयु:--त्याग देनाचाहिए; ये--जिन्होंने; बृहत्‌-ब्रताः:--ब्रह्मचर्य का व्रत धारण कर रखा है।

ब्रह्मचारियों या उन गृहस्थों को जिन्होंने उपर्युक्त विधि से वर्णित ब्रह्मचर्य ब्रत धारण कररखा है उनके लिए आँखों में सुरमा या अंजन लगाना, सिर में तेल मलना, हाथ से शरीर कीमालिश करना, स्त्री को देखना या उसका चित्र बनाना, मांस खाना, शराब पीना, शरीर कोफूलों के हार से सजाना, शरीर में इत्र-फुलेल लगाना या शरीर को आभूषणों से अलंकृत करनामना है।

उन्हें इन सबका परित्याग करना चाहिए।

"

उपित्वैवं गुरुकुले द्विजोधीत्यावबुध्य च ।

त्रयीं साज्ञेपनिषदं यावदर्थ यथाबलम्‌ ॥

१३॥

दत्त्वा वरमनुज्ञातो गुरो: काम॑ यदीश्वरः ।

गृहं बन वा प्रविशेत्प्रत्नजेत्तत्र वा वसेतू ॥

१४॥

उषित्वा--रहते हुए; एवम्‌--इस प्रकार; गुरु-कुले--गुरु के संरक्षण में; द्वि-ज:--ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य, जिनका दो बारजन्म होता है; अधीत्य--वैदिक साहित्य पढ़कर; अवबुध्य--इसे ठीक से समझकर; च--तथा; त्रयीमू--वैदिक वाड्मय; स-अड़--सहायक अंशों सहित; उपनिषदम्‌--तथा उपनिषदों को; यावत्‌-अर्थम्‌--जहाँ तक सम्भव हो; यथा-बलम्‌--यथाशक्ति;दत्त्वा--देकर; वरम्‌--पारिश्रमिक ( दक्षिणा ); अनुज्ञात:-- पूछे जाने पर; गुरो:--गुरु की; कामम्‌--इच्छाएँ; यदि--यदि;ईश्वर: --समर्थ; गृहम्‌--गृहस्थ जीवन; वनम्‌--विरक्त जीवन; वा--अथवा; प्रविशेत्‌--प्रवेश करना चाहिए; प्रव्रजेत्‌--याबाहर जाना चाहिए; तत्र--वहाँ; वा--या तो; वसेत्‌-- रहना चाहिए

उपर्युक्त विधि-विधानों के अनुसार द्विज को--ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य को-गुरु केसंरक्षण में गुरुकुल में निवास करना चाहिए।

वहाँ उसे वेद, वेदाड़ तथा उपनिषदों का अध्ययनअपनी शक्ति तथा सामर्थ्य भर करना चाहिए।

यदि सम्भव हो तो शिष्य को चाहिए कि वह तबगुरु द्वारा माँगी गई दक्षिणा दे और तब गुरु के आदेशानुसार गुरुकुल छोड़ दे और अपनी इच्छासे किसी अन्य आश्रम को--यथा गृहस्थ, वानप्रस्थ या संन्यास आश्रम--को स्वीकार करे।

"

अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेष्वधोक्षजम्‌ ।

भूतेः स्वधामभि: पश्येदप्रविष्ट प्रविष्टठत्‌ ॥

१५॥

अग्नौ--अग्नि में; गुरौ--गुरु में; आत्मनि--अपने में, आत्मा में; च--भी; सर्व-भूतेषु--प्रत्येक जीव में; अधोक्षजम्‌-- भगवान्‌को, जो न तो भौतिक आँखों से देखे जा सकते हैं और न ही अन्य भौतिक इन्द्रियों द्वारा अनुभवगम्य हैं; भूतिः--सारे जीवों केसाथ; स्व-धामभि:--भगवान्‌ के सामान के साथ-साथ; पश्येत्‌--देखना चाहिए; अप्रविष्टम्‌ू--बिना प्रविष्ट हुए; प्रविष्ट-बत्‌--प्रविष्ट हुए की भाँति

मनुष्य को इसकी अनुभूति करनी चाहिए कि भगवान्‌ विष्णु एक ही साथ अग्नि, गुरु,आत्मा तथा समस्त जीवों में सभी परिस्थितियों में प्रविष्ट हैं और नहीं भी हैं।

वे प्रत्येक वस्तु केपूर्ण नियामक के रूप में बाह्य तथा आन्तरिक रूप से स्थित हैं।

"

एवं विधो ब्रह्मचारी वानप्रस्थो यति्गृही ।

चरन्विदितविज्ञान: परं ब्रह्माधिगच्छति ॥

१६॥

एवम्‌ विध: --इस विधि से; ब्रह्मचारी --चाहे ब्रह्मचारी हो; वानप्रस्थ: --चाहे कोई वानप्रस्थ आ भ्रम का हो; यतिः--या किसंन्यास आश्रम में हो; गृही--या गृहस्था श्रम में हो; चरन्‌--आत्म-साक्षात्कार के अभ्यास तथा परम सत्य के ज्ञान द्वारा; विदित-विज्ञान:--परम सत्य विषयक विज्ञान से पूर्णतया अवगत; परमू-- परम; ब्रह्म--परम सत्य; अधिगच्छति--समझ सकता है।

इस प्रकार से अभ्यास करते हुए चाहे कोई ब्रह्मचारी आश्रम में हो, गृहस्थ आश्रम में होअथवा वानप्रस्थ या संन्यास आश्रम में हो, उसे परम सत्य ( ब्रह्म ) की सर्वव्यापकता की सदैवअनुभूति होनी चाहिए, क्योंकि इस विधि से ब्रह्म को समझा जा सकता है।

"

वानप्रस्थस्य वक्ष्यामि नियमान्मुनिसम्मतान्‌ ।

यानास्थाय मुनिर्गच्छेहषिलोकमुहाज्लसा ॥

१७॥

वानप्रस्थस्य--वानप्रस्थ आ श्रम वाले व्यक्ति के ( अवकाश प्राप्त जीवन ); वक्ष्यामि--अब मैं बतलाऊँगा; नियमान्‌ू--नियमों याविधि-विधानों को; मुनि-सम्मतान्‌--बड़े-बड़े मुनियों, दार्शनिकों तथा साधु पुरुषों द्वारा मान्य; यानू--जिनको; आस्थाय--अभ्यास करके या स्थापित करके; मुनि:--साधु व्यक्ति; गच्छेत्‌--प्रोन्नत कर दिया जाता है; ऋषि-लोकम्‌--ऋषियों, मुनियोंवाले लोक ( महलोंक ) को; उह--हे राजा; अज्खसा--बिना कठिनाई के।

हे राजा, अब मैं वानप्रस्थ की योग्यताओं का वर्णन करूँगा, जो कि पारिवारिक जीवन सेविरक्ति है।

वानप्रस्थ के विधि-विधानों का कठोरता से पालन करते हुए वह महलोंक नामकउच्चतर लोक को सरलता से भेजा जा सकता है।

"

न कृष्टपच्यमएनीयादकृष्टं चाप्यकालतः ।

अग्निपक्वमथामं वा अर्कपक्वमुताहरेत्‌ ॥

१८॥

न--नहीं; कृष्ट-पच्यम्‌ू-- भूमि को जोतकर उगाये गये अन्न; अश्नीयात्‌ू--खाना चाहिए; अकृष्टम्‌--बिना भूमि जोते उगे; च--तथा; अपि-- भी; अकालत:-- समय से पहले पका हुआ; अग्नि-पक्वम्‌-- अग्नि में पकाया हुआ अन्न; अथ-- भी; आमम्‌--आम; वा--अथवा; अर्क-पक्वम्‌--सूर्य के प्रकाश से अपने आप पका भोजन; उत--ऐसा आदेश है; आहरेत्‌--वानप्रस्थखाए

वानप्रस्थ आश्रम में रहने वाले व्यक्ति को जुती हुई जमीन में उगा अन्न नहीं खाना चाहिए।

उसे बिना जुती जमीन में उगे उन अन्नों को भी नहीं खाना चाहिए जो पूरी तरह पके न हों।

न हीवानप्रस्थ को अग्नि में पका अन्न खाना चाहिए निस्सन्देह, उसे सूर्य प्रकाश में पके फल ही खानेचाहिए।

"

वन्यैश्चरुपुरोडाशान्निर्वपेत्कालचोदितान्‌ ।

लब्धे नवे नवेन्नाद्ये पुराणं च परित्यजेतू ॥

१९॥

वन्यैः--बिना जोते जंगल में उत्पन्न फलों तथा अन्नों से; चरू--अग्नि-यज्ञ में आहुति में डाले जाने वाले अन्न; पुरोडाशान्‌ू--चरुसे तैयार किए गए पिंड; निर्वपेत्‌--सम्पन्न करना चाहिए; काल-चोदितान्‌ू-- अपने आप उगा; लब्धे--प्राप्त होने पर; नवे--नवीन; नवे अन्न-आद्ये--नया उत्पन्न किया गया अन्न; पुराणम्‌ू-पुराने अन्न का संग्रह; च--तथा; परित्यजेत्‌--छोड़ दे

वानप्रस्थ को चाहिए कि जंगल में अपने आप उगे फलों तथा अन्नों से पुरोडाश को यज्ञ मेंडालने के लिए तैयार करे।

जब उसे थोड़ा सा नया अन्न प्राप्त हो जाए तो वह अन्न के पुराने संग्रहको त्याग दे।

"

अग्न्यर्थमेव शरणमुटजं वाद्रिकन्दरम्‌ ।

श्रयेत हिमवाय्वग्निवर्षार्कातपषाट्स्वयम्‌ ॥

२०॥

अग्नि--अग्नि; अर्थम्‌--रखने के लिए; एब--केवल; शरणम्‌--झोपड़ी; उट-जम्‌--फूस की बनी; वा--अथवा; अद्वि-कन्दरम्‌--पर्वत की कन्दरा में; श्रयेत--वानप्रस्थी शरण ले; हिम--बर्फ; वायु--तेज हवा; अग्नि-- आग; वर्ष --वर्षा; अर्क --सूर्य का; आतप--चमकना; षाटू--सहन करते हुए; स्वयम्‌--स्वयं |

वानप्रस्थ को चाहिए कि पवित्र अग्नि को रखने के लिए वह या तो फूस की झोपड़ी बनाएया केवल पर्वत की कन्दरा में शरण ले, किन्तु वह स्वयं हिमपात, प्रभंजन, अग्नि, वर्षा तथासूर्य के ताप को सहन करने का अभ्यास करे।

"

केशरोमनखश्मश्रुमलानि जटिलो दधत्‌ ।

'कमण्डल्वजिने दण्डवल्कलाग्निपरिच्छदान्‌ ॥

२१॥

केश--सिर के बाल; रोम--शरीर पर उगे रोएँ; नख--नाखून; श्मश्रु--मूँछें; मलानि--तथा शरीर का मैल; जटिल:--बाल कीजटा; दधत्‌--रखे; कमण्डलु--जलपात्र; अजिने-- तथा मृगचर्म; दण्ड--डण्डा; वल्कल--पेड़ की छाल; अग्नि--आग;परिच्छदान्‌--वस्त्रों को

वानप्रस्थ को चाहिए कि सिर पर जटा रखे और अपने शरीर के बाल, नाखून तथा मूँछेंबढ़ने दे।

वह अपने शरीर की धूल साफ न करे।

वह कमण्डल, मृगछाला तथा दण्ड रखे, पेड़की छाल का आवरण पहने और अग्नि जैसे ( गेरुवे ) रंग के वस्त्रों का प्रयोग करे।

"

चरेद्वने द्वादशाब्दानष्टी वा चतुरो मुनि: ।

द्वावेक॑ वा यथा बुद्धिर्न विपद्येत कृच्छूतः: ॥

२२॥

चरेत्‌--रहता रहे; वने--जंगल में; द्वादश-अब्दानू--बारह वर्षो तक; अष्टौ--आठ वर्ष तक; वा--अथवा; चतुर: --चार वर्ष;मुनि:--सन्त विचारवान्‌ व्यक्ति; द्वौ--दो; एकम्‌--एक; वा--अथवा; यथा--जिससे; बुद्धि: --बुद्धि; न--नहीं; विपद्येत--मोहग्रस्त; कृच्छृतः:--कठिन तपस्या के कारण

अत्यधिक विचारवान्‌ होने के कारण वानप्रस्थी को बारह वर्ष, आठ वर्ष, चार वर्ष, दो वर्षया कम से कम एक वर्ष तक जंगल में रहना चाहिए।

उसे इस तरह व्यवहार करना चाहिए किवह अत्यधिक तपस्या के कारण विचलित या त्रस्त न हो उठे।

"

यदाकल्पः स्वक्रियायां व्याधिभिर्जरयाथवा ।

आन्वीक्षिक्यां वा विद्यायां कुर्यादनशनादिकम्‌ ॥

२३॥

यदा--जब; अकल्प:ः--कार्य करने में अक्षम; स्व-क्रियायाम्‌--अपने नियत कार्यों में; व्याधिभि: --रोग के कारण; जरया--यावृद्धावस्था के कारण; अथवा--या; आन्वीक्षिक्याम्‌--आध्यात्मिक प्रगति में; वा--अथवा; विद्यायाम्‌--ज्ञान की प्रगति में;कुर्यात्‌--करे; अनशन-आदिकम्‌--पर्याप्त भोजन न ग्रहण करना।

जब वह रोग या वृद्धावस्था के कारण आध्यात्मिक चेतना में प्रगति करने या वेदाध्ययन मेंअपने निमत कार्य करने में असमर्थ हो जाये तब उसे अन्न न खाने के व्रत का अभ्यास करनाचाहिए।

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आत्मन्यग्नीन्समारोप्य सन्न्यस्याहं ममात्मताम्‌ ।

कारणेषु न्यसेत्सम्यक्सड्ञातं तु यथाहतः ॥

२४॥

आत्मनि--अपने में ही; अग्नीन्‌ू--शरीर के भीतर की अग्नि-तत्त्वयों को; समारोप्प--ठीक से रखकर; सन्न्यस्य--त्याग कर;अहमू--मिथ्या पहचान; मम--मिथ्या धारणा; आत्मताम्‌--अपने ही शरीर की; कारणेषु--पाँचों तत्त्वों में जो भौतिक शरीर केकारण हैं; न्यसेत्‌--लीन कर दे; सम्यक्‌--पूर्णतया; सट्ठातम्‌--संयोग, मेल; तु--लेकिन; यथा-अर्हतः--जैसा अनुकूल हो

उसे अग्नि को अपने में ( आत्मा में ) भलीभाँति रख लेना चाहिए और इस तरह शारीरिकममत्व को छोड़ दे जिसके कारण वह शरीर को निजी या आत्मा मानता है।

वह धीरे-धीरेभौतिक शरीर को पाँच तत्त्वों ( पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश ) में लीन कर दे।

"

खे खानि वायौ निश्चवासांस्तेज:सूष्माणमात्मवान्‌ ।

अप्स्वसूकश्लेष्मपूयानि क्षितौ शेषं यथोद्धवम्‌ ॥

२५॥

खे--आकाश में; खानि--शरीर के सारे छिद्रों को; वायौ--वायु में; निश्चासान्‌ू--शरीर के भीतर चक्कर लगाने वाली विभिन्नवायु को ( प्राण, अपान इत्यादि ); तेज:सु--अग्नि में; उष्माणम्‌--शरीर की गर्मी को; आत्म-वान्‌--आत्मा को जानने वालाव्यक्ति; अप्सु--जल में; असृक्‌ू--रक्त; एलेष्प--कफ; पूयानि--तथा मूत्र; क्षितौ--पृथ्वी में; शेषम्‌--शेष या बचे हुए को( चमड़ी, हड्डी तथा शरीर के अन्य कठोर अंग ); यथा-उद्धवम्‌--जिससे सभी उत्पन्न |

गम्भीर, स्वरूपसिद्ध, ज्ञानवान व्यक्ति को चाहिए कि वह शरीर के विभिन्न अंगों को उनकेमूल स्त्रोतों में लीन कर दे।

शरीर के छिद्र आकाश द्वारा उत्पन्न हैं, श्वास की क्रिया वायु से उत्पन्नहै, शरीर की ऊष्मा अग्नि द्वारा जनित है और वीर्य, रक्त तथा कफ जल द्वारा उत्पन्न हैं।

त्वचा, पेशी तथा अस्थि जैसी कठोर वस्तुएँ पृथ्वी द्वारा उत्पन्न हैं।

इस प्रकार शरीर के सारे अवयवविभिन्न तत्त्वों द्वारा उत्पन्न होते हैं।

अतएव इन सबों को पुनः उन्हीं तत्त्वों में लीन कर देना चाहिए।

"

वाचमग्नौ सवक्तव्यामिन्द्रे शिल्पं करावषि ।

पदानि गत्या वयसि रत्योपस्थं प्रजापतोौ ॥

२६॥

मृत्यौ पायुं विसर्ग च यथास्थानं विनिर्दिशेत्‌ ।

दिक्षु श्रोत्रं सनादेन स्पर्शेनाध्यात्मनि त्वचम्‌ ॥

२७॥

रूपाणि चकश्षुषा राजन्ज्योतिष्यभिनिवेशयेत्‌ ।

अप्सु प्रचेतसा जिह्लां प्रेयैप्नाणं क्षितौ न्‍्यसेत्‌ ॥

२८ ॥

वाचम्‌--वाणी; अग्नौ-- अग्नि देव में; स-वक्तव्याम्‌--वाणी के कर्म को; इन्द्रे--इन्द्र में; शिल्पमू--हाथ से कर्म करने कीसामर्थ्य या कला-कौशल को; करौ--तथा हाथ में; अपि--निस्सन्देह; पदानि--पाँवों को; गत्या--चलने की शक्ति सहित;वयसि--भगवान्‌ विष्णु में; रत्या--कामेच्छा; उपस्थम्‌--यौनेन्द्रियों समेत; प्रजापतौ--प्रजापति में; मृत्यौ--मृत्युदेव में;पायुम्‌--गुदा को; विसर्गम्‌--इसकी क्रिया सहित, मलोतसर्ग करना; च--भी; यथा-स्थानम्‌ --सही स्थान में; बिनिर्दिशेत्‌--सूचित करे; दिश्षु--विभिन्न दिशाओं में; श्रोत्रमू-- श्रवेणन्द्रिय; स-नादेन--कम्पन समेत; स्पर्शेन--स्पर्श से; अध्यात्मनि--वायुदेव में; त्वचम्‌--स्पर्शेन्द्रिय को; रूपाणि--स्वरूप; चक्षुषा--आँखों की ज्योति समेत; राजन्‌--हे राजा; ज्योतिषि--सूर्य में;अभिनिवेशयेत्‌--लीन करे; अप्सु--जल में; प्रचेतसा--वरुण देव समेत; जिह्माम्‌ू--जी भ को; प्रेये:--सुगन्ध विषय के साथ;घ्राणम्‌ू--सूँघने की शक्ति; क्षितौ--पृथ्वी में; न्‍्यसेत्‌--लीन कर दे।

तत्पश्चात्‌ वाणी-विषय को वाक्‌ इन्द्रिय (जीभ ) सहित अग्नि को समर्पित कर दे।

कला-कौशल तथा दोनों हाथ इन्द्रदेव को दे दे।

गति करने की शक्ति तथा पाँव भगवान्‌ विष्णु को देदे।

उपस्थ सहित इन्द्रियसुख प्रजापति को सौंप दे।

गुदा को मलोत्सर्ग क्रिया सहित उसके असलीस्थान मृत्यु को सौंप दे।

ध्वनि-कम्पन समेत श्रवणेन्द्रिय को दिशाओं के अधिपति को दे दे।

स्पर्श समेत स्पर्शेन्द्रिय वायु को समर्पित कर दे।

दृष्टि समेत रूप को सूर्य को सौंप दे।

वरुण देवसमेत जीभ जल को दे दे तथा दोनों अश्विनी कुमार देवों सहित प्राणशक्ति पृथ्वी को अर्पित करदे।

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मनो मनोरथेश्चन्द्रे बुद्धि बोध्यै: कवौ परे ।

कर्माण्यध्यात्मना रुद्रे यदहं ममताक्रिया ।

सत्त्वेन चित्त क्षेत्रज्ञे गुणैवैकारिकं परे ॥

२९॥

अप्सु क्षितिमपो ज्योतिष्यदो वायौ नभस्यमुम्‌ ।

कूटस्थे तच्च महति तदव्यक्तेक्षेर च तत्‌ ॥

३०॥

मनः--मन को; मनोरथे:-- भौतिक इच्छाओं समेत; चन्द्रे--चन्द्रमा में जो मनोदशा के देवता हैं; बुद्धिम्‌--बुद्धि को; बोध्यै:--बुद्धि के विषय समेत; कवौ परे--परम बुद्धिमान व्यक्ति ब्रह्माजी में; कर्माणि--- भौतिक कार्यो को; अध्यात्मना--मिथ्याअहंकार समेत; रुद्रे--शिव ( रूद्र ) में; यत्‌--जहाँ; अहम्‌--मैं शरीर हूँ; ममता--शरीर सम्बन्धी प्रत्येक वस्तु मेरी है; क्रिया--ऐसा कार्य; सत्त्वेन--जगत की धारणा सहित; चित्तम्‌--चेतना को; क्षेत्र-ज्ञे--आत्मा में; गुणैः-- भौतिक गुणों के द्वारासंचालित भौतिक कार्यकलापों समेत; वैकारिकम्‌-- भौतिक गुणों के अधीन जीवों को; परे--परमात्मा में; अप्सु--जल में;क्षितिमू--पृथ्वी; अप:--जल; ज्योतिषि-- ज्योतिष्कों में, विशेषतया सूर्य में; अदः--चमक; वायौ--वायु में; नभसि---आकाशमें; अमुम्‌--वह; कूटस्थे--देहात्मबुद्धि में; तत्‌--वह; च-- भी; महति--महत्तत्व में; तत्‌ू--वह; अव्यक्ते--अप्रकट में;अक्षरे--परमात्मा में; च-- भी; तत्‌--उस |

मन को मनोरथों समेत चन्द्रदेव में लीन कर दे।

बुद्धि के सारे विषयों को बुद्धि समेतब्रह्माजी में स्थापित कर दे।

मिथ्या अहंकार, जो प्रकृति के गुणों के अधीन रहता है और मनुष्यको यह सोचने के लिए प्रेरित करता है 'मैं यह शरीर हूँ और इस शरीर से सम्बन्धित प्रत्येक वस्तुमेरी है' उसे भौतिक कार्यकलापों समेत मिथ्या अहंकार के अधिपति रुद्र में लीन कर दे।

भौतिक चेतना को विचार के लक्ष्य समेत प्रत्येक जीवात्मा में और भौतिक प्रकृति गुणों केअधीन कर्म करने वाले देवताओं को विकारयुक्त जीव समेत परब्रह्म में लीन कर दे।

पृथ्वी कोजल में, जल को सूर्य की ज्योति में, इस ज्योति को वायु में, वायु को आकाश में, आकाश कोमिथ्या अहंकार में, मिथ्या अहंकार को समस्त भौतिक शक्ति ( महत्तत्व ) में, फिर इस महत्तत्वको अप्रकट अवयवों ( भौतिक शक्ति का प्रधान स्वरूप ) में तथा इस अप्रकट अवयव कोपरमात्मा में लीन कर दे।

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इत्यक्षरतयात्मानं चिन्मात्रमवशेषितम्‌ ।

ज्ञात्वाद्ययोथ विरमेहग्धयोनिरिवानलः ॥

३१॥

इति--इस प्रकार; अक्षरतया-- आध्यात्मिक होने से; आत्मानम्‌--स्वयं ( जीवात्मा ); चितू-मात्रम्‌--पूर्णतया आध्यात्मिक;अवशेषितम्‌--शेषलब्धि ( तत्त्वों के एक-एक करके परमात्मा में लीन हो जाने पर ); ज्ञात्वा--जानकर; अद्दय:--बिना अन्तरके या परमात्मा के ही गुण वाला; अथ--इस प्रकार; विरमेत्‌ू-- भौतिक जगत से अलग हो जाए; दग्ध-योनि:--जिसका स्रोत( काष्ठ ) जल चुका है; इब--सहृश; अनलः--लपडटें

जब इस तरह सारी भौतिक उपाधियाँ अपने-अपने तत्त्वों में मिल जाँय तो जीव अन्ततोगत्वापूर्णतया आध्यात्मिक हो जाता है और गुण में परब्रह्म जैसा।

इस संसार से वह उसी तरहअवकाश ले ले जिस प्रकार काठ के जल जाने पर उससे उठने वाली लपडटें शान्त हो जाती हैं।

जब भौतिक शरीर विविध भौतिक तत्त्वों में लौट जाता है, तो केवल आध्यात्मिक जीव बचताहै।

यही ब्रह्म है और यह गुण में परब्रह्म के तुल्य है।

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