← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 7 की सूची

अध्याय तेरह: एक आदर्श व्यक्ति का व्यवहार

7.13श्रीनारद उवाचकल्पस्त्वेवं परिव्रज्य देहमात्रावशेषितः।

ग्रामैकरात्रविधिना निरपेक्षश्नरेन्महीम्‌ ॥

१॥

श्री-नारद: उबाच--नारद मुनि ने कहा; कल्प:--वह व्यक्ति जो संन्यास आश्रम की तपस्या करने या दिव्य ज्ञान का अनुशीलनकरने के लिए दक्ष है; तु--लेकिन; एवम्‌--इस प्रकार ( जैसाकि पहले कहा गया है ); परिव्रज्य--अपनी आत्मिक पहचान कोसमझते हुए तथा एक स्थान से दूसरे स्थान का विचरण करते हुए; देह-मात्र--केवल शरीर का पालन करते हुए; अवशेषित:--अन्ततः; ग्राम--गाँव में; एक--केवल एक; रात्र--रात गुजारने का; विधिना--विधि से; निरपेक्ष:--किसी वस्तु पर आश्रित नरहते हुए; चरेत्‌--एक स्थान से दूसरे की यात्रा करे; महीम्‌--पृथ्वी पर।

श्री नारद मुनि ने कहा : जो व्यक्ति आध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन कर सकता है उसे सारेभौतिक सम्बन्धों का परित्याग कर देना चाहिए और शरीर को सक्षम बनाये रखकर उसे प्रत्येक गाँव में केवल एक रात बिताते हुए एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करनी चाहिए।

इस प्रकारसंन्‍्यासी को शरीर की आवश्यकताओं के लिए किसी पर निर्भर रहे बिना सारे संसार में विचरणकरना चाहिए।

"

बिभूयाद्यद्यसौ वास: कौपीनाच्छादनं परम्‌ ।

त्यक्त न लिझ्जहण्डादेरन्यत्किज्निदनापदि ॥

२॥

बिभूयात्‌-- प्रयोग करे; यदि--यदि; असौ--संन्यास आश्रम का व्यक्ति; वास:--वस्त्र या अंगोछा; कौपीन--लंगोटा ( गुप्तांगोंको ढकने के लिए ); आच्छादनम्‌ू--ढकने के लिए; परम्‌--केवल, इतना ही; त्यक्तम्‌--छोड़ा गया; न--नहीं; लिड्रात्‌--संन्यासी के लक्षणों की अपेक्षा; दण्ड-आदे:--डंडा जैसा ( त्रिदण्ड ); अन्यतू--दूसरा; किश्लित्‌--कुछ भी; अनापदि-- सामान्यआपत्तिरहित समय में |

संन्यास आश्रम के व्यक्ति को अपना शरीर ढकने के लिए वस्त्र तक का भी उपयोग नहींकरना चाहिए।

यदि उसे कुछ पहनना हो तो उसे कौपीन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं पहननाचाहिए और यदि आवश्यकता न हो तो संनन्‍्यासी को दण्ड भी नहीं धारण करना चाहिए।

संन्यासी को दण्ड तथा कमण्डल के अतिरिक्त कुछ भी साथ में नहीं रखना चाहिए।

"

एक एव चरेद्धिक्षुरात्मारामोउनपा श्रयः ।

सर्वभूतसुहच्छान्तो नारायणपरायण: ॥

३॥

एकः--अकेला; एव--केवल; चरेत्‌--घूम सकता है; भिक्षु;--भिक्षा माँगने वाला संन्यासी; आत्म-आराम:--आत्तमतुष्ट;अनपाश्रय:ः--किसी वस्तु पर आश्रित न रहकर; सर्व-भूत-सुहृत्‌--सभी जीवों का शुभचिन्तक बनकर; शान्त:--पूर्णतयाशान्त; नारायण-परायण: --नारायण पर आश्वित होकर एवं उनका भक्त बनकर।

आत्मतुष्ट संन्यासी को चाहिए कि वह द्वार-द्वार से भीख माँगकर जीवन-यापन करे।

किसीव्यक्ति या स्थान पर आश्रित न रहकर उसे समस्त जीवों का सुहृद्‌ होना चाहिए।

उसे नारायण काशान्त अनन्य भक्त होना चाहिए।

इस प्रकार उसे एक स्थान से दूसरे स्थान में घूमते रहना चाहिए।

"

पश्येदात्मन्यदो विश्व परे सदसतोउव्यये ।

आत्मानं च परं ब्रह्म सर्वत्र सदसन्मये ॥

४॥

पश्येतू--देखे; आत्मनि--परमात्मा में; अद:--इस; विश्वम्‌--ब्रह्माण्ड को; परे--परे; सत्‌-असतः--सृष्टि या सृष्टि का कारण;अव्यये--अव्यय ब्रह्म में; आत्मानम्‌--स्वयं; च-- भी; परम्‌--सर्वश्रेष्ठ; ब्रह्म--ब्रह्म में; सर्वत्र--सभी जगह; सत्‌-असत्‌ू --'कारण-कार्य में; मये--सर्वव्यापी

संन्यासी को चाहिए कि वह परब्रह्म को प्रत्येक वस्तु में सदा व्याप्त देखने का प्रयास करेऔर ब्रह्माणु समेत प्रत्येक वस्तु को जिसमें यह ब्रह्माण्ड भी है, जो परब्रह्म पर टिका देखे ।

"

सुप्तिप्रबोधयो: सन्धावात्मनो गतिमात्महक्‌ ।

पश्यन्बन्ध॑ च मोक्ष च मायामात्र न वस्तुत: ॥

५॥

सुप्ति--अचेतनावस्था में; प्रबोधयो: --चेतना अवस्था में; सन्धौ--सन्धि अवस्था में; आत्मन:--अपनी आत्मा में; गतिम्‌--गति;आत्म-हक्‌--जो आत्मा को देख सकता है; पश्यन्‌ू--देखने या समझने का प्रयास करते हुए; बन्धम्‌--जीवन की बद्ध अवस्था;च--तथा; मोक्षम्‌--जीवन की मुक्त अवस्था; च--भी; माया-मात्रम्‌--मात्र मोह; न--नहीं; वस्तुतः--वास्तव में |

उसे अचेतना तथा चेतना अवस्थाओं में इन दोनों के बीच की अवस्था में अपने आपकोसमझने का प्रयत्त करना चाहिए और आत्म-स्थित होना चाहिए।

इस प्रकार उसे यह अनुभवकरना चाहिए कि जीवन की बद्ध तथा मुक्त अवस्थाएँ मात्र भ्रम हैं, वे वास्तविक नहीं हैं।

ऐसेउच्च ज्ञान से उसे सर्वव्यापी परम सत्य का दर्शन करना चाहिए।

"

नाभिनन्देद्ध्सवं मृत्युमश्रुवं वास्य जीवितम्‌ ।

काल परं प्रतीक्षेत भूतानां प्रभवाप्ययम्‌ ॥

६॥

न--नहीं; अभिनन्देत्‌--प्रशंसा करे; ध्रुवम्‌--निश्चित्‌, श्लुव; मृत्युम्‌ू-मृत्यु; अध्ुवम्‌--अनिश्चित; वा--अथवा; अस्य--इसशरीर की; जीवितम्‌--उप्र; कालमू--शाश्वत समय; परम्‌--परम; प्रतीक्षेत--अवलोकन करे; भूतानामू--जीवों का; प्रभव--प्राकट्य; अप्ययम्‌-- अन्तर्धान होना |

चूँकि भौतिक शरीर का विनाश निश्चित है और मनुष्य की आयु स्थिर नहीं है अतएव न तोमृत्यु की, न ही जीवन की प्रशंसा की जानी चाहिए प्रत्युत मनुष्य को नित्य काल काअवलोकन करना चाहिए जिसमें जीव अपने आपको प्रकट करता है और अन्तर्धान होता है।

"

नासच्छास्त्रेषु सज्जेत नोपजीवेत जीविकाम्‌ ।

वादवादांस्त्यजेत्तर्कान्पक्ष॑ कंच न संश्रयेत्‌ ॥

७॥

न--नहीं; असत्-शास्त्रेषु--समाचार पत्र, उपन्यास, नाटक, कल्पित-कथा जैसा साहित्य; सजेत--पढ़े या आसक्त हो; न--नतो; उपजीवेत--रहने का प्रयास करे; जीविकाम्‌--किसी व्यावसायिक साहित्यिक वृत्तिपरक ; वाद-वादान्‌--दर्शन के विविधपक्षों पर वृथा के तर्क वितर्क; त्यजेत्‌ू--छोड़ दे; तर्कानू--तर्को को; पक्षम्‌--पक्ष, दल; कंच--कोई; न--नहीं; संश्रयेत्‌--शरण ग्रहण करे |

समय का व्यर्थ अपव्यय कराने वाले अर्थात्‌ आध्यात्मिक लाभ से विहीन साहित्य कातिरस्कार करना चाहिए।

न तो कोई अपनी जीविका कमाने के लिए वृत्तिपरक शिक्षक बने, नवाद-विवाद में भाग ले।

न ही वह किसी कारण या पक्ष की शरण ले।

"

न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान्रैवाभ्यसेद्वहून्‌ ।

न व्याख्यामुपयुद्धीत नारम्भानारभेत्क्वचित्‌ ॥

८॥

न--नहीं; शिष्यान्‌--शिष्यों को; अनुबध्नीत-- भौतिक लाभ के लिए प्रेरित करे; ग्रन्थान्‌ू--व्यर्थ का साहित्य; न--नहीं; एब--निश्चय ही; अभ्यसेत्‌--समझने या अनुशीलन करने का प्रयास करे; बहूनू--अनेक; न--नहीं; व्याख्याम्‌-व्याख्यान को;उपयुद्भीत--जीविका का साधन बनाए; न--न तो; आरम्भान्‌-- अनावश्यक ऐश्वर्य; आरभेत्‌--बढ़ाने का यत्न करे; क्वचित्‌--कभी भी।

संन्यासी को चाहिए कि वह न तो अनेक शिष्य एकत्र करने के लिए भौतिक लाभों काप्रलोभन दे, न व्यर्थ ही अनेक पुस्तकें पढ़े, न जीविका के साधन के रूप में व्याख्यान दे।

न व्यर्थही भौतिक ऐश्वर्य बढ़ाने का कभी कोई प्रयास करे।

"

न यतेराश्रम: प्रायो धर्महेतुर्महात्मन: ।

शान्तस्य समचित्तस्य बिभूयादुत वा त्यजेत्‌ ॥

९॥

न--नहीं; यतेः --संन्यासी का; आश्रम:--प्रतीकात्मक वेश ( दण्ड तथा कमण्डलु ); प्राय:--लगभग सदैव; धर्म-हेतु:--आध्यात्मिक जीवन में प्रगति का कारण; महा-आत्मन:--जो वास्तव में महान्‌ है; शान्तस्थ--जो शान्त है; सम-चित्तस्य--समदर्शी का; बिभूयात्‌--( ऐसे प्रतीक ) स्वीकार कर ले; उत--निस्सन्देह; वा--अथवा; त्यजेतू-त्याग दे |

ऐसे शानन्‍्त समदर्शी व्यक्ति को जो आध्यात्मिक चेतना में सचमुच बढ़ा-चढ़ा है, संन्यासी केप्रतीकों--यथा त्रिदण्ड तथा कमण्डल--को स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं रह जाती।

वह आवश्यकतानुसार इन प्रतीकों को कभी धारण कर सकता है, तो कभी छोड़ सकता है।

"

अव्यक्तलिड्रे व्यक्तार्थों मनीष्युन्मत्तनबालवत्‌ ।

कविर्मूकवदात्मानं स दृष्टय्या दर्शयेत्रणाम्‌ ॥

१०॥

अव्यक्त-लिड्र:--जिसमें संन्यास के लक्षण नहीं हैं; व्यक्त-अर्थ:--जिसका अभिप्राय प्रकट हो; मनीषी--ऐसा महान्‌ सन्तपुरुष; उन्मत्त--बेचैन; बाल-वत्‌--बच्चे के समान; कवि:--महान्‌ कवि या वक्ता; मूक-वत्‌--गूँगे व्यक्ति के समान;आत्मानमू्‌-- स्वयं; सः--वह; दृष्ठयया--उदाहरण से; दर्शयेत्‌-- प्रस्तुत करे; नृणाम्‌ू--मानव समाज को

साधु पुरुष भले ही मानव समाज के समक्ष अपने आपको प्रकट न करे, किन्तु उस केआचरण से उसका उद्देश्य प्रकट हो जाता है।

उसे मानव समाज के समक्ष अपने को एक चंचलबालक की भाँति प्रस्तुत करना चाहिए और सर्वश्रेष्ठ विचारवान्‌ वक्ता होकर भी उसे अपने कोमूक व्यक्ति की तरह प्रदर्शित करना चाहिए।

"

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ ।

प्रह्मदस्थ च संवादं मुनेराजगरस्यथ च ॥

११॥

अत्र--यहाँ पर; अपि--यद्यपि सामान्य लोगों के समक्ष प्रकट नहीं होता; उदाहरन्ति--विद्वान साधु उदाहरण देते हैं; इमम्‌--इस;इतिहासमू--ऐतिहासिक घटना को; पुरातनम्‌--अत्यन्त प्राचीन; प्रह्मदस्थ--प्रह्द महाराज की; च-- भी; संवादम्‌--वार्तालाप;मुनेः--महान्‌ सन्त पुरुष का; आजगरस्य-- अजगर की वृत्ति धारण किये; च--भी |

इसके ऐतिहासिक उदाहरण के रूप में विद्वान मुनिजन एक प्राचीन वार्तालाप की कथासुनाते हैं, जो प्रह्दाद महाराज तथा अजगर वृत्ति धारण किये एक महामुनि के मध्य हुआ था।

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तं॑ शयानं धरोपस्थे कावेर्या सह्यसानुनि ।

रजस्वलैस्तनूदेशैर्निंगूहामलतेजसम्‌ ॥

१२॥

ददर्श लोकान्विचरन्लोकतत्त्वविवित्सया ।

वृतोमात्यै: कतिपयै: प्रह्मदो भगवत्प्रियः ॥

१३॥

तम्‌--उसको ( साधु पुरुष ); शयानम्‌--लेटे हुए; धरा-उपस्थे--पृथ्वी पर; कावे्याम्‌--कावेरी नदी के तट पर; सहा-सानुनि--सहाय नामक पर्वत की तलहटी पर; रज:-वलैः -- धूल-धूसरित; तनू-देशै:--शरीर के सारे अंगों से; निगूढ--अत्यन्त गहरा;अमल--निर्मल, स्वच्छ; तेजसम्‌--आध्यात्मिक शक्ति; दरदर्श--देखा; लोकान्‌--विभिन्न लोकों में; विचरन्‌--घूमते हुए;लोक-तत्त्व--जीवों की प्रकृति ( विशेषतया उनकी जो कृष्णभावनामृत में आगे बढ़ना चाहते हैं ); विवित्सया--समझने काप्रयास करने के लिए; बृत:--घिरा हुआ; अमात्यै:--राजसी पार्षदों से; कतिपयैः --कुछ; प्रह्मद: --महाराज प्रह्माद; भगवत्‌-प्रियः:--जो भगवान्‌ को अत्यन्त प्रिय है।

एकबार भगवान्‌ के सर्वाधिक प्रिय सेवक प्रह्मद महाराज अपने कतिपय विश्वस्त पार्षदों केसाथ संत पुरुषों की प्रकृति का अध्ययन करने के लिए विश्व का भ्रमण करने निकले।

वे कावेरीतट पर पहुँचे जहाँ सहा नामक एक पर्वत है।

वहाँ पर उन्हें एक महान्‌ साधु पुरुष मिला जो भूमिपर लेटा था और धूल-धूसरित था, किन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से वह अत्यन्त बढ़ा-चढ़ा था।

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कर्मणाकृतिभिर्वाचा लिड्लैर्वर्णा अमादिभि: ।

न विदन्ति जना यं वै सोइसाविति न वेति च ॥

१४॥

कर्मणा--कर्म से; आकृतिभि:--शारीरिक बनावट से; वाचा--शब्दों से; लिड्रै:--लक्षणों से; वर्ण-आश्रम--वर्णा श्रम के चारभौतिक और जार आध्यात्मिक विभागों से सम्बन्धित; आदिभि:--अन्य लक्षणों से; न विदन्ति--नहीं समझ सके; जना:--सामान्य लोग; यम्‌--जिसको; बै--निस्सन्देह; सः--कि वह; असौ--यही व्यक्ति था; इति--इस प्रकार; न--नहीं; वा--अथवा; इति--इस प्रकार; च-- भी |

लोग न तो उस साधु पुरुष के कर्मों से, न शारीरिक लक्षणों से, न उसके शब्दों से, न उसकेवर्णाश्रम धर्म के लक्षणों से यह समझ पाये कि यह वही पुरुष है, जिसे वे जानते थे।

"

त॑ नत्वाभ्यर्च्य विधिवत्पादयो: शिरसा स्पृशन्‌ ।

विवित्सुरिदमप्राक्षीन्‍्महाभागवतोउसुर: ॥

१५॥

तम्‌--उसको ( साधु पुरुष को ); नत्वा--प्रणाम करके ; अभ्यर्च्य--तथा पूजा करके; विधि-वत्‌--शिष्टाचार के नियमानुसार;'पादयो:--साधु पुरुष के चरणकमलों को; शिरसा--सिर के बल; स्पृशन्‌--स्पर्श करते हुए; विवित्सु:--उसके विषय में जाननेके इच्छुक; इृदम्‌--यह; अप्राक्षीत्‌--पूछा; महा- भागवत: -- भगवान्‌ के महान्‌ भक्त ने; असुर:ः--यद्यपि असुर कुल में उत्पन्न ॥

महाभागवत प्रह्नमाद महाराज ने उस साधु पुरुष की विधिवत्‌ पूजा की और प्रणाम कियाजिसने अजगर-वृत्ति धारण कर रखी थी।

इस प्रकार उस साधु पुरुष की पूजा करके तथा उसकेचरणकमलों को अपने सिर से स्पर्श करके प्रह्माद महाराज ने उसे समझने के उद्देश्य से विनीतभाव से इस प्रकार पूछा।

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बिभर्षि कायं पीवानं सोद्यममो भोगवान्यथा ॥

१६॥

वित्तं चैवोद्यमवतां भोगो वित्तवतामिह ।

भोगिनां खलु देहोयं पीवा भवति नान्यथा ॥

१७॥

बिभर्षि--पालन कर रहे हो; कायम्‌--शरीर; पीवानम्‌--स्थूल; स-उद्यम: --उद्यम करने वाला; भोगवान्‌-- भोग करने वाला;यथा--जिस तरह; वित्तमू-- धन; च--भी; एब--निश्चय ही; उद्यम-वताम्‌--सदा आर्थिक विकास में लगे रहने वाले पुरुषोंका; भोग: --इन्द्रिय तृप्ति; वित्त-वताम्‌-- प्रचुर धनी व्यक्तियों का; इह--इस संसार में; भोगिनाम्‌-- भोक्ताओं का, कर्मियों का;खलु--निस्सन्देह; देह:--शरीर; अयम्‌--यह; पीवा--अत्यन्त स्थूल; भवति--हो जाता है; न--नहीं; अन्यथा--अन्य कुछ उस साधु पुरुष को अत्यन्त स्थूल ( मोटा ) देखकर

प्रह्माद महाराज ने कहा : महोदय, आपअपनी जीविका अर्जित करने के लिए कोई उद्यम नहीं करते तो भी आपका शरीर उसी तरह हष्ट-पुष्ट है जैसाकि भौतिकतावादी कर्मी ( भोगी ) का होता है।

मुझे ज्ञात है कि यदि कोई अत्यन्तधनी हो और उसके पास कुछ भी काम करने को नहीं हो तो वह खाकर, सोकर और कोई कामन करके अत्यधिक स्थूल ( मोटा ) हो जाता है।

"

न ते शयानस्य निरुद्यमस्यब्रह्मन्नु हार्थो यत एव भोग: ।

अभोगिनो<यं तब विप्र देहःपीवा यतस्तद्वद नः क्षमं चेत्‌ ॥

१८॥

न--नहीं; ते--तुम्हारा; शयानस्य--लेटे हुए; निरुद्यमस्थ--बिना काम-काज के; ब्रह्मनू--हे साधु पुरुष; नु--निस्सन्देह; ह--स्पष्ट है; अर्थ:-- धन; यत:ः--जिससे; एव--निस्सन्देह; भोग:--इन्द्रियभोग; अभोगिन:--इन्द्रिय भोग में न लगे हुए का;अयम्‌--यह; तव--तुम्हारा; विप्र--हे विद्वान ब्राह्मण; देह:--शरीर; पीवा--स्थूल; यत:--जिस तरह; तत्‌--वह तथ्य; बद--कृपा करके कहो; नः--हमको; क्षमम्‌-- क्षमा करो; चेत्‌--यदि मैंने धृष्टता की हो |

हे अध्यात्मज्ञानी ब्राह्मण, आपको कुछ नहीं करना पड़ता जिसके कारण आप लेटे हुए हैं।

यह भी माना जा सकता है कि इन्द्रियभोग के लिए आपके पास धन नहीं है।

तो फिर आपकाशरीर इतना स्थूल कैसे हो गया है?

ऐसी परिस्थिति में यदि आप मेरे प्रश्न को प्रमादपूर्ण नहींमानते तो कृपा करके बतलाएँ कि यह किस तरह से हुआ है ?

" कवि: कल्पो निपुणदक्त्न्रप्रियकथः समः ।

लोकस्य कुर्वतः कर्म शेषे तद्वीक्षितापि वा ॥

१९॥

कविः--अत्यन्त विद्वान; कल्प: --दक्ष; निपुण-हक्‌ --बुद्द्धिमान; चित्र-प्रिय-कथ:--मन को भाने वाले मधुर शब्द बोलने मेंसमर्थ; सम:--समदर्शी; लोकस्य--सामान्य लोगों का; कुर्बत:--लगे हुए; कर्म--सकाम कर्म; शेषे--तुम लेटे रहते हो; तत्‌ू-वीक्षिता--उन सब को देखते हुए; अपि--यद्यपि; वा--अथवा |

आप विद्वान, दक्ष तथा सभी प्रकार से बुद्धिमान प्रतीत होते हैं।

आप बहुत अच्छा बोलसकते हैं और हृदय को भाने वाली बातें कर सकते हैं।

आप देख रहे हैं कि सामान्य लोग सकामकर्मों में लगे हुए हैं फिर भी आप यहाँ पर निष्क्रिय लेटे हैं।

"

श्रीनारद उवाचस इत्थं दैत्यपतिना परिपृष्टो महामुनि: ।

स्मयमानस्तमभ्याह तद्बागमृतयन्दत्रितः ॥

२०॥

श्री-नारदः उवाच--नारद मुनि ने कहा; सः--वह साधु ( लेटा हुआ ); इत्थम्‌--इस प्रकार से; दैत्य-पतिना--दैत्यों के राजा( प्र्माद ) द्वारा; परिपृष्ट:--पूछा जाने पर; महा-मुनि:--महान्‌ साधु पुरुष ने; स्मथमान:--मुसकाते हुए; तम्‌--उसको ९ प्रह्मादको ); अभ्याह--उत्तर देने को तैयार हुआ; तत्‌ू-वाक्‌--उसके शब्दों का; अमृत-यन्त्रित:--अमृत के द्वारा मुग्ध होकर

नारद मुनि ने आगे कहा : जब दैत्यराज प्रह्मद महाराज इस तरह से साधु पुरुष से प्रश्न कररहे थे तो वह शब्दों की अमृत वर्षा से मुग्ध हो गया और उसने मुसकाते हुए प्रह्माद महाराज कीउत्सुकता का इस प्रकार जवाब दिया।

"

श्रीत्राह्मण उबाचवेदेदमसुरश्रेष्ठ भवान्नन्वार्यसम्मतः ।

ईहोपरमयोर्नुृणां पदान्यध्यात्मचक्षुषा ॥

२१॥

श्री-ब्राह्मण: उवाच--ब्राह्मण ने उत्तर दिया; वेद--ठीक से जान लो; इदम्‌--ये सारी चीजें; असुर-श्रेष्ठ--हे असुरों में श्रेष्ठ;भवान्‌ू--आप; ननु--निस्सन्देह; आर्य-सम्मतः--जिनके कार्य सभ्य मनुष्यों द्वारा अनुमोदित होते हैं; ईहा-- प्रवृत्ति का;उपरमयो: --हास का; नृणाम्‌--सामान्य लोगों की; पदानि--विभिन्न अवस्थाएँ; अध्यात्म-चक्षुषा--दिव्य आँखों के द्वारा

साधु ब्राह्मण ने कहा : हे असुरश्रेष्ठ, हे महान्‌ तथा सभ्य पुरुष द्वारा सम्मान्य प्रह्मद महाराज,आप जीवन की विभिन्न अवस्थाओं से अवगत हैं, क्योंकि आप मनुष्य के चरित्र को अपनीस्वाभाविक दिव्य दृष्टि से देख सकते हैं और इस तरह आप कर्मों की स्वीकृति तथा अस्वीकृतिके परिणामों से भलीभाँति परिचित हैं।

"

यस्य नारायणो देवो भगवान्हद्गतः सदा ।

भक्‍्त्या केवलयाज्ञानं धुनोति ध्वान्तमर्कवत्‌ ॥

२२॥

यस्य--जिसका; नारायण: देव:-- भगवान्‌ नारायण; भगवान्‌-- भगवान्‌; हत्‌-गत:--हृदय के अन्दर; सदा--सदैव; भक्‍्त्या--भक्ति द्वारा; केवलया--अकेली; अज्ञानमू--अज्ञान को; धुनोति--स्वच्छ करता है; ध्वान्तम्‌--अंधकार को; अर्क-वत्‌--सूर्यके समान।

भगवान्‌ नारायण, जो समस्त ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं आपके हृदय में अग्रणी हैं क्योंकि आप शुद्धभक्त हैं।

वे सदैव अज्ञान के अंधकार को उसी तरह दूर करते हैं जिस प्रकार सूर्य ब्रह्माण्ड सेअंधकार को दूर कर देता है।

"

तथापि बरूमहे प्रश्नांस्तव राजन्यथा श्रुतम्‌ ।

सम्भाषणीयो हि भवानात्मनः शुद्द्धमिच्छता ॥

२३॥

तथापि--फिर भी; ब्रूमहे --मैं उत्तर दूँगा; प्रश्नान्‌--सारे प्रश्नों का; तब--तुम्हारे; राजन्‌--हे राजा; यथा- श्रुतम्‌-- जैसा मैंनेअधिकारियों से सुनकर सीखा है; सम्भाषणीय:--सम्बोधित किये जाने योग्य; हि--निस्सन्देह; भवानू--आप; आत्मन: --आत्मा की; शुद्धिम्‌-शुद्धि; इच्छता--इच्छा करने वाले के द्वारा।

हे राजन, आप सब कुछ जानते हैं किन्तु आपने कुछ प्रश्न किये हैं, अतएव जैसा मैंनेअधिकारियों से सुनकर सीखा है उसी के अनुसार उनका उत्तर देने का प्रयास करूँगा।

मैं इसमामले में मौन नहीं रह सकता, क्योंकि जो आत्मशुद्धि का इच्छुक है उसके द्वारा आप जैसेव्यक्ति से वार्तालाप करना उपयुक्त होगा।

"

तृष्णया भववाहिन्या योग्यै: कामैरपूर्यया ।

कर्माणि कार्यमाणोहं नानायोनिषु योजित: ॥

२४॥

तृष्णया--इच्छाओं के कारण; भव-वाहिन्या-- प्रकृति के भौतिक नियमों की चपेट में; योग्यै:--क्योंकि यह; कामैः-- भौतिकइच्छाओं से; अपूर्यया--अन्तहीन, एक के बाद एक; कर्माणि--कार्यकलाप; कार्यमाण:--कार्य करने के लिए बाध्य;अहम्‌--ैं; नाना-योनिषु--जीवन के विभिन्न रूपों में; योजित:--जीवन-संघर्ष में लगा हुआ।

अतृप्त भौतिक इच्छाओं के कारण मैं प्राकृतिक नियमों की तरंगों द्वारा बहा या लिए जा रहाथा और जीवन की विभिन्न योनियों में जीवन-संघर्ष करते हुए विभिन्न कार्यकलापों में लगा रहा।

"

यहच्छया लोकमिमं प्रापित: कर्मभिर्भ्रमन्‌ ।

स्वर्गापवर्गयोद्दारिं तिरश्नां पुनरस्य च ॥

२५॥

यहच्छया--भौतिक प्रकृति की तरंगों द्वारा ले जाया जाकर; लोकम्‌--मनुष्य रूप; इमम्‌--यह; प्रापित: --प्राप्त किया हुआ;कर्मभि:--विभिन्न सकाम कर्मों के प्रभाव द्वारा; भ्रमन्‌ू--एक जीवन से दूसरे जीवन में घूमते हुए; स्वर्ग--स्वर्गलोक;अपवर्गयो:--मुक्ति के; द्वारमू--द्वार तक; तिरश्चाम्‌ू--निम्न योनियों तक; पुनः--फिर; अस्य--मनुष्यों की; च--तथा |

मैंने विकास प्रक्रिया के दौरान जो अवांछित भौतिक इन्द्रियतृप्ति के कारण सकाम कर्मो सेउत्पन्न होती है यह मनुष्य रूप प्राप्त किया है, जो हमें स्वर्गलोकों तक, मुक्ति तक, निम्न योनियोंतक या मनुष्य के बीच पुनर्जन्म लेने तक पहुँचा सकता है।

"

तत्रापि दम्पतीनां च सुखायान्यापनुत्तये ।

कर्माणि कुर्वतां दृष्ठा निवृत्तोडस्मि विपर्ययम्‌ ॥

२६॥

तत्र--वहाँ; अपि-- भी; दम्‌-पतीनाम्‌--विवाह द्वारा जुड़े पुरुषों तथा स्त्रियों के; च--तथा; सुखाय--आनन्द के लिए,विशेषतया विषयी जीवन के आनन्द हेतु; अन्य-अपनुत्तये--दुख से बचने के लिए; कर्माणि--सकाम कर्मो को; कुर्वताम्‌--सदैव करते हुए; दृध्ठा--देखकर; निवृत्त: अस्मि--( ऐसे कार्यो से ) अब मैं निवृत्त हूँ; विपर्ययम्‌--उल्टा |

इस मनुष्य-जीवन में पुरुष तथा स्त्री का मिलन मैथुन-सुख के लिए होता है, किन्तु हमनेवास्तविक अनुभव से देखा है कि उनमें से कोई भी सुखी नहीं है।

इसीलिए विपरीत परिणामोंको देखकर मैंने भौतिकतावादी कार्यों में भाग लेना बन्द कर दिया है।

"

सुखमस्यात्मनो रूप॑ सर्वेहोपरतिस्तनु: ।

मनःसंस्पर्शजान्दष्ठा भोगान्स्वप्स्थामि संविशन्‌ ॥

२७॥

सुखम्‌--सुख; अस्य--उसका; आत्मन:--जीव का; रूपमू्‌--प्राकृतिक स्थिति; सर्व--समस्त; ईह--भौतिक कर्म; उपरति:--पूर्णतया स्थगित करके; तनु;--अभिव्यक्ति का माध्यम; मन:-संस्पर्श-जानू--इन्द्रियतृप्ति के लिए माँगों से उत्पन्न; दृष्ठा--देखकर; भोगान्‌--इन्द्रियभोगों को; स्वप्स्थामि--चुप बैठा हूँ और इन भौतिक कार्यों के विषय में गहराई से सोच रहा हूँ;संविशन्‌--ऐसे कार्यो में पैठकर |

जीवों के लिए जीवन का वास्तविक स्वरूप आध्यात्मिक सुख का है और यही असली सुखहै।

यह सुख तभी प्राप्त किया जा सकता है जब मनुष्य सारे भौतिकतावादी कार्यकलापों कोबन्द कर दे।

भौतिक इन्द्रियभोग कोरी कल्पना है, अतएवं इस विषय पर विचार कर मैंने सारेभौतिक कार्यकलाप बन्द कर दिये हैं और अब यहाँ लेटा हुआ हूँ।

"

इत्येतदात्मन: स्वार्थ सन्तं विस्मृत्य वै पुमान्‌ ।

विचित्रामसति द्वैते घोरामाप्नोति संसृतिम्‌ ॥

२८ ॥

इति--इस प्रकार; एतत्‌--बद्ध पुरुष; आत्मन:--अपना; स्व-अर्थम्‌--निजी हित; सन्तमू--अपने भीतर स्थित होकर;विस्मृत्य-- भुलाकर; बै--निस्सन्देह; पुमान्‌ू--जीव; विचित्रामू-- आकर्षक मिथ्या वस्तुएँ; असति-- भौतिक जगत में; द्वैते--आत्मा के अतिरिक्त; घोराम्‌--अत्यन्त भयावह ( जन्म-मृत्यु को बारबार स्वीकार करने से )) आणोति--फँस जाता है;संसृतिम्‌--संसृति में |

इस प्रकार बद्ध आत्मा शरीर के भीतर रहकर अपने हित को भूल जाता है, क्योंकि वहअपनी पहचान शरीर के रूप में करने लगता है।

चूँकि, शरीर भौतिक होता है अतएवं उसकीसहज प्रवृत्ति भौतिक जगत की विविधताओं की ओर आकृष्ट होने की रहती है।

इस तरह जीवइस संसार के कष्टों को भोगता है।

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जल तदुद्धवैश्छन्नं हित्वाज्ो जलकाम्यया ।

मृगतृष्णामुपाधावेत्तथान्यत्रार्थडक्स्वत: ॥

२९॥

जलम्‌--जल; ततू-उद्धवै:--उस जल से उत्पन्न घास द्वारा; छन्नम्‌ू--ढका; हित्वा--छोड़कर; अज्ञ:--मूर्ख पशु; जल-काम्यया--जल पीने की अभिलाषा से; मृगतृष्णाम्‌-- मृगतृष्णा के; उपाधावेत्‌ू--पीछे दौड़ता है; तथा--उसी प्रकार; अन्यत्र--कहीं दूसरी जगह; अर्थ-हक्‌--स्वार्थरत; स्वतः--अपने में |

जिस प्रकार एक हिरन अज्ञानतावश घास से ढके कुएँ के जल को न देख कर जल के लिएअन्यत्र दौड़ता फिरता रहता है उसी प्रकार भौतिक शरीर से आवृत यह जीव अपने भीतर के सुखको नहीं देख पाता और भौतिक जगत में सुख के पीछे दौड़ता रहता है।

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देहादिभिदेवतन्त्रैरात्मनः सुखमीहतः ।

दुःखात्ययं चानीशस्य क्रिया मोघा: कृता: कृता: ॥

३०॥

देह-आदिभि:ः--शरीर, मन, अहंकार तथा बुद्धि से; दैव-तन्त्रै:--परम शक्ति के अधीन; आत्मन:ः--आत्मा का; सुखम्‌--सुख;ईहतः--खोज करते हुए; दुःख-अत्ययम्‌--दुखों की कमी; च-- भी; अनीशस्य--प्रकृति के अधीन जीव; क्रिया: --कार्यकलाप तथा योजनाएँ; मोघा: कृताः कृता:--पुनः-पुनः व्यर्थ हो जाती हैं |

जीव सुख प्राप्त करना चाहता है और दुख के कारणों से छूटना चाहता है, लेकिन चूँकीजीवों के शरीर प्रकृति के पूर्ण नियंत्रण में होते हैं, अतएव जीव एक के बाद एक विभिन्न शरीरोंको पाकर जितनी भी योजनाएँ बनाता है वे अन्ततोगत्वा व्यर्थ हो जाती हैं।

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आध्यात्मिकादिभिर्दु:खैरविमुक्तस्य कर्हिचित्‌ ।

मर्त्यस्य कृच्छोपनतैरथें: कामै: क्रियेत किम्‌ू ॥

३१॥

आध्यात्मिक-आदिभि:--अध्यात्मिक, अधिदैविक तथा अधिभौतिक; दुःखैः-- भौतिक जीवन के तीन प्रकार के दुखों से;अविमुक्तस्थ--ऐसी दुखी अवस्थाओं से मुक्त न होने वाले का; कहिंचित्‌ू--क भी-कभी; मर्त्यस्थ--मरणशील जीव का; कृच्छू-उपनतैः--दारुण दुखों के कारण प्राप्त वस्तुएँ; अर्थै:--यदि कुछ लाभ भी प्राप्त हो सके; कामैः--भौतिक इच्छाओं से पूरित;क्रियेत--जो वे करते हैं; किमू--और ऐसे सुख का क्या महत्त्व है।

भौतिकतावादी कार्यकलाप सदैव तीन प्रकार के दुखों--अध्यात्मिक, अधिदैविक तथाअधिभौतिक--से मिले-जुले होते हैं।

अतएवं यदि कोई ऐसे कार्य सम्पन्न करके कुछ सफलताप्राप्त भी कर ले तो उससे क्‍या लाभ है?

उसे फिर भी जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि तथा अपनेकर्मफलों को भोगना होगा।

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पश्यामि धनिनां कलेशं लुब्धानामजितात्मनाम्‌ ।

भयादलब्धनिद्राणां सर्वतोडभिविशद्धिनाम्‌ ॥

३२॥

पश्यामि--देखता हूँ; धनिनाम्‌--अत्यन्त धनी व्यक्तियों में; क्लेशम्‌--कष्ट; लुब्धानाम्‌ू-- अत्यन्त लालची; अजित-आत्मनाम्‌ू--अपनी इन्द्रियों के शिकार बनने वाले; भयात्‌--डर के कारण; अलब्ध-निद्राणाम्‌--जिन्‍्हें अनिद्रा का रोग है; सर्वतः--चारोंओर से; अभिविशड्डिनाम्‌--विशेष रूप से भयभीत

ब्राह्मण ने आगे कहा : मैं सचमुच देख रहा हूँ कि अपनी इन्द्रियों के वशीभूत हुआ एक धनीव्यक्ति किस तरह धन संचित करने का अत्यन्त लोभी होता है।

अतएव सम्पत्ति तथा ऐश्वर्य होतेहुए भी चारों ओर से भय के कारण वह अनिद्र रोग का शिकार बन जाता है।

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राजतश्लौरतः शत्रो: स्वजनात्पशुपक्षित: ।

अर्धिभ्य: कालतः स्वस्मान्नित्यं प्राणार्थवद्धयम्‌ ॥

३३॥

राजतः--राज्य से; चौरत:--चोरों तथा ठगों से; शत्रो: --शत्रुओं से; स्व-जनात्‌--सम्बन्धियों से; पशु-पक्षित:--पशुओं तथापक्षियों से; अर्थिभ्य:--भिखारियों तथा दान लेने वालों से; कालतः--समय से; स्वस्मात्‌--तथा अपने आप से; नित्यम्‌ू--नित्य;प्राण-अर्थ-बत्‌--जीवन या धन वाले के लिए; भयम्‌ू--डर

जिन्हें भौतिक दृष्टि से शक्तिशाली तथा धनी माना जाता है वे सामान्यतः सरकारी नियमों,चोर-उचक्रों, शत्रुओं, स्वजनों, पशुओं, पक्षियों, दान लेने वालों, काल, यहाँ तक कि अपनेआप से चिन्तित रहते हैं।

इस प्रकार वे अनिवार्यतः भयभीत रहते हैं।

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शोकमोहभयक्रोधरागक्लैब्यश्रमादय: ।

यन्मूला: स्युर्नुणां जह्मात्स्पूहां प्राणार्थयोर्बुध: ॥

३४॥

शोक--शोक; मोह-- मोह; भय-- डर; क्रोध--क्रोध; राग-- आसक्ति; क्लैब्य--दरिद्रता; श्रम--वृथा मेहनत; आदय: --इत्यादि; यत्‌-मूला:--इन सबों का मूल कारण; स्यु:ः--हो जाँए; नृणाम्‌--मनुष्यों का; जह्यात्‌--छोड़ देना चाहिए; स्पृहाम्‌--इच्छा; प्राण--शारीरिक शक्ति या प्रतिष्ठा; अर्थयो:--तथा धन संग्रह करने के लिए; बुध:--बुद्धिमान |

मानव समाज के बुद्धिमान लोगों को चाहिए कि वे शोक, लोभ, भय, क्रोध, अनुराग,दरिद्रता तथा अनावश्यक श्रम के मूल कारण को त्याग दें।

इन सबों का मूल कारण अनावश्यकप्रतिष्ठा तथा धन की लालसा है।

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मधुकारमहासर्पो लोके स्मिन्नो गुरूत्तमौ ।

वैराग्यं परितोषं च प्राप्ता यच्छिक्षया वयम्‌ ॥

३५॥

मधुकार--मधुमक्खियाँ जो शहद एकत्र करने के लिए एक फूल से दूसरे फूल पर जाती हैं; महा-सर्पौं--बड़ा साँप ( अजगर,अन्यत्र नहीं जाता ); लोके --संसार में; अस्मिन्‌ू--इस; न:ः--हमारा; गुरु--गुरु; उत्तमौ--उच्चकोटि का; वैराग्यम्‌ू--वैराग्य,त्याग; परितोषम्‌ च--तथा संतोष; प्राप्ता:--प्राप्त किया हुआ; यत्‌-शिक्षया--जिसके आदेश से; वयम्‌--हम |

मधुमक्खी तथा अजगर दो श्रेष्ठ गुरु हैं, जो हमें इस सम्बन्ध में आदर्श उपदेश देते हैं किकिस तरह थोड़ा-थोड़ा संग्रह करके सन्‍्तुष्ट रहा जाये और किस तरह एक ही स्थान में ठरहाजाये--हिला न जाये।

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विराग: सर्वकामेभ्य: शिक्षितो मे मधुव्रतात्‌ ।

कृच्छाप्तं मधुवद्वित्तं हत्वाप्यन्यो हरेत्पतिमू ॥

३६॥

विराग: --विर॑क्ति; सर्व-कामेभ्य:--समस्त भौतिक इच्छाओं से; शिक्षित:--पढ़ाया गया; मे--मुझको; मधु-ब्रतातू--मधुमक्खीसे; कृच्छ--अत्यन्त कठिनाई से; आप्तमू--अर्जित; मधु-वत्‌--शहद के समान ( धन ही शहद है ); वित्तम्‌-- धन; हत्वा--मारकर; अपि-- भी; अन्य:--दूसरा; हरेतू--ले लेता है; पतिम्‌--स्वामी को

मधुमक्खी से मैंने सीखा है कि धन संग्रह करने से किस तरह विरक्त रहना चाहिए, क्योंकियद्यपि धन शहद जैसा है, किन्तु कोई भी धन के स्वामी को मार कर धन को ले जा सकता है।

"

अनीहः परितुष्टात्मा यहच्छोपनतादहम्‌ ।

नो चेच्छये बह्हानि महाहिरिव सत्त्ववान्‌ ॥

३७॥

अनीह:--और अधिक रखने की इच्छा का होना; परितुष्ट-- अत्यन्त सन्तुष्ट; आत्मा--आत्मा; यहच्छा--अपने आप, बिना यतललके; उपनतात्‌--मिली हुई वस्तुओं से; अहम्‌--मैं; नो--नहीं; चेत्‌--यदि ऐसा; शये-- लेटा रहता हूँ; बहु-- अनेक; अहानि--दिन; महा-अहि:ः--अजगर; इब--सहश; सत्त्व-वानू-- धैर्यवान्‌ |

मैं किसी भी वस्तु को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न नहीं करता, अपितु जो कुछ भी अपनेआप मिल जाता है उसी से सन्तुष्ट रहता हूँ।

यदि मुझे कुछ भी नहीं मिलता तो अजगर की तरह मैंअविक्षिप्त रहते हुए धैर्यपूर्ण रहता हूँ और कई-कई दिनों तक पड़ा रहता हूँ।

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क्वचिदल्पं क्‍्वचिद्धूरि भुझ्लेउन्न॑ स्वाद्वस्वादु वाक्वचिद्धूरि गुणोपेतं गुणहीनमुत क्वचित्‌ ।

श्रद्धयोपहतं क्वापि कदाचिन्मानवर्जितम्‌भुझ्ले भुक्त्वाथ कसिमिश्रविद्दिवा नक्ते यहच्छया ॥

३८॥

क्वचित्‌--कभी; अल्पम्‌--अत्यन्त थोड़ा; क्वचित्‌--कभी; भूरि--काफी मात्रा; भुझ्जे--खाता हूँ; अन्नम्‌ू-- भोजन; स्वादु--स्वादिष्ट; अस्वादु--बासी; वा--अथवा; क्वचित्‌--कभी; भूरि--अधिक; गुण-उपेतम्‌--सुगंधित; गुण-हीनम्‌--गंधरहित;उत--चाहे; क्वचित्‌--कभी; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक; उपहतम्‌--किसी के द्वारा लाया गया; क्वापि--कभी; कदाचित्‌--कभी;मान-वर्जितम्‌--बिना सम्मान के प्रदत्त; भुझे--खाता हूँ; भुक्त्वा--खाकर; अथ--इस तरह; कस्मिन्‌ चितू--कभी किसीस्थान पर; दिवा--दिन; नक्तम्‌--अथवा रात्रि में; यहच्छया--जैसा भी मिल जाय

कभी मैं थोड़ा खाता हूँ और कभी अधिक ।

कभी भोजन स्वादिष्ट होता है, तो कभी बासी।

कभी बड़े आदर के साथ मुझे प्रसाद दिया जाता है और कभी अत्यन्त उपेक्षा से भोजन मिलताहै।

कभी मैं दिन में खाता हूँ तो कभी रात में।

इस प्रकार मुझे जो कुछ आसानी से मिल जाता हैउसे ही खाता हूँ।

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क्षौमं दुकूलमजिनं चीर॑ वल्कलमेव वा ।

वसेउन्यदपि सम्प्राप्तं दिष्टभुक्तुष्टधीरहम्‌ ॥

३९॥

क्षौममू--लिनन का कपड़ा; दुकूलमू--रेशमी या सूती; अजिनम्‌--मृगचर्म; चीरम्‌ू--चिरकुट, लंगोट; वल्कलम्‌--छाल;एव--जैसा हो; वा--अथवा; वसे-- धारण करता हूँ; अन्यत्‌-- अन्य कुछ; अपि--यद्यपि; सम्प्राप्तम्‌--उपलब्ध; दिष्ट-भुक्‌ --भाग्यवश; तुष्ट--संतुष्ट; धी:--मन; अहमू--मैं हूँ।

शरीर ढकने के लिए मेरे भाग्य से मुझे जो कुछ भी मिल जाता है, चाहे क्षौम वस्त्र हो यारेशमी या सूती कपड़ा, चाहे पेड़ की छाल हो या मृगछाला, उसे मैं काम में लाता हूँ।

मैं पूर्णसंतुष्ट रहता हूँ तथा विचलित नहीं होता।

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क्वचिच्छये धरोपस्थे तृणपर्णाश्मभस्मसु ।

क्वचित्प्रासादपर्यड्जे कशिपौ वा परेच्छया ॥

४०॥

क्वचित्‌--कभी; शये--लेटता हूँ; धर-उपस्थे--पृथ्वी की सतह पर; तृण--घास पर; पर्ण--पत्तियाँ; अश्म--पत्थर;भस्मसु--या राख के ढेर पर; क्वचित्‌--कभी; प्रासाद--महल में; पर्यज्ले--उच्चकोटि के बिस्तर पर; कशिपौ--तकिया पर;वा--अथवा; पर--दूसरे की; इच्छया--इच्छा से |

कभी मैं पृथ्वी पर, कभी पत्तियों पर, घास या पत्थर पर तो कभी राख के ढेर पर अथवाकभी-कभी अनन्‍्यों की इच्छा से महल के उच्च कोटि के बिस्तर तथा तकिये पर सोता हूँ।

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क्वचित्स्नातोनुलिप्ताड़ु: सुवासा: स्त्रग्व्यलड्डू तः ।

रथेभाश्चैश्वेरे क्वापि दिग्वासा ग्रहवद्धिभो ॥

४१॥

क्वचित्‌--कभी; स्नात:--ठीक से नहाया; अनुलिप्त-अड्ग:--सारे शरीर में चन्दन का लेप लगा; सु-वासा:--सुन्दर उस्त्रों सेसज्जित; स्रग्वी--पुष्प हारों से सजा; अलड्डू तः--विभिन्न प्रकार के आभूषणों से सुशोभित; रथ--रथ; इभ--हाथी; अश्वैः:--याघोड़े की पीठ पर; चरे--मैं विचरण करता हूँ; क्वापि--कभी; दिक्‌-वासा:--पूर्णतया नग्न; ग्रह-वत्‌--मानो भूत-प्रेत पीछाकिये हों; विभो--हे स्वामी |

हे स्वामी, कभी मैं ठीक से स्नान करके सारे शरीर में चन्दन का लेप करता हूँ, फूलों कीमाला पहनता हूँ और सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण धारण करता हूँ।

फिर मैं राजा की तरह हाथी कीपीठ पर या रथ या घोड़े पर सवार होकर विचरण करता हूँ।

किन्तु कभी-कभी मैं भूत-प्रेत द्वारासताये व्यक्ति की तरह नंग-धड़ंग घूमता हूँ।

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नाहं निन्दे न च स्तौमि स्वभावविषमं जनम्‌ ।

एतेषां श्रेय आशासे उतैकात्म्यं महात्मनि ॥

४२॥

न--नहीं; अहम्‌--मैं; निनन्‍्दे--निन्‍्दा करता हूँ; न--न तो; च-- भी; स्तौमि-- प्रशंसा करता हूँ; स्व-भाव--जिसका स्वभाव;विषमम्‌--विपरीत; जनम्‌--जीव या मनुष्य; एतेषाम्‌--उन सबों का; श्रेय:--चरम लाभ; आशासे--चाहता हूँ, मनाता हूँ;उत--निस्सन्देह; ऐकात्म्यम्‌--एकात्मता; महा-आत्मनि--परमात्मा या परब्रह्म ( कृष्ण ) में |

विभिन्न लोग विभिन्न स्वभाव के होते हैं; अतएवं उनकी प्रशंसा करना या उनकी निन्दाकरना मेरा कार्य नहीं है।

मैं तो इस आशा से उनके कल्याण की कामना करता हूँ कि वेपरमात्मा, भगवान्‌ श्रीकृष्ण के साथ एकात्मता स्वीकार करेंगे।

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विकल्पं जुहुयाच्चित्तौ तां मनस्यर्थविश्रमे ।

मनो वैकारिके हुत्वा तं मायायां जुहोत्यनु ॥

४३॥

विकल्पम्‌-- भेदभाव ( अच्छे-बुरे, एक दूसरे व्यक्ति, एक दूसरे राष्ट्र में ); जुहुयात्‌ू--आहुति डाले; चित्तौ--चेतना रूपी अग्निमें; तामू--उस चेतना को; मनसि--मन में; अर्थ-विभ्रमे--समस्त स्वीकृति तथा अस्वीकृति की जड़; मनः--उस मन को;वैकारिके--पदार्थ के साथ अपनी पहचान के मिथ्या अहंकार में; हुत्वा--आहुति देकर ; तम्‌--इस मिथ्या अहंकार को;मायायाम्‌--माया में; जुहोति--आहुति डालता है; अनु--इस सिद्धान्त का पालन करते हुए।

अच्छे तथा बुरे के भेदभाव की जो मानसिक कल्पना ( मनोरथ ) है उसे इकाई रूप मेंस्वीकार करके उसे मन में लगाना चाहिए और तब मन को मिथ्या अहंकार में लगाना चाहिए।

इस मिथ्या अहंकार को माया में लगाना चाहिए।

मिथ्या भेदभाव से लड़ने की विधि यही है।

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आत्मानुभूतौ तां मायां जुहुयात्सत्यहड्सुनि: ।

ततो निरीहो विरमेत्स्वानुभूत्यात्मनि स्थित: ॥

४४॥

आत्म-अनुभूतौ--आत्म-साक्षात्कार में; तामू--उस; मायाम्‌ू--शरीर के मिथ्या अहंकार को; जुहुयात्‌ू-- आहुति कर देना चाहिए;सत्य-हक्‌--परम सत्य की वास्तविक अनुभूति करने वाले का; मुनि:--विचारवान्‌ व्यक्ति; ततः--इस आत्म-साक्षात्कार केकारण; निरीह:-- भौतिक इच्छाओं से रहित; विरमेत्‌-- भौतिक कार्यो से अवकाश ले लेना चाहिए; स्व-अनुभूति-आत्मनि--आत्म-साक्षात्कार में; स्थित: --स्थित |

विद्वान विचारवान्‌ व्यक्ति को इसकी अनुभूति होनी चाहिए कि यह भौतिक जगत मोह हैकिन्तु ऐसा आत्म-साक्षात्कार द्वारा ही सम्भव है।

ऐसे स्वरूपसिद्ध व्यक्ति को, जिसने सत्य का वास्तविक साक्षात्कार किया है, आत्म-साक्षात्कार होने के कारण समस्त भौतिक कार्यकलापोंसे अवकाश ले लेना चाहिए।

"

स्वात्मवृत्तं मयेत्थं ते सुगुप्तमपि वर्णितम्‌ ।

व्यपेतं लोकशास्त्राभ्यां भवानिहि भगवत्पर: ॥

४५॥

स्व-आत्म-वृत्तम्‌ू-- आत्म-साक्षात्कार के इतिहास की सूचना; मया--मेरे द्वारा; इत्थम्‌--इस प्रकार; ते--तुम्हें; सु-गुप्तम्‌--अत्यन्त गोपनीय; अपि--यद्यपि; वर्णितम्‌--बतलाई गई; व्यपेतम्‌--के बिना; लोक-शास्त्राभ्याम्‌--सामान्य व्यक्ति या सामान्यग्रंथों का मत; भवान्‌ू--आप; हि--निस्सन्देह; भगवत्‌-परः -- भगवान्‌ का भलीभाँति साक्षात्कार करके |

प्रह्माद महाराज, आप निश्चय ही स्वरूपसिद्ध आत्मा तथा भगवद्धक्त हैं।

आप न तो जन-मतकी परवाह करते हैं, न ही तथाकथित शास्त्रों की।

इस कारण मैंने आपसे निःसंकोच भाव सेअपने आत्म-साक्षात्कार का इतिहास कह सुनाया।

"

श्रीनारद उवाचधर्म पारमहंस्यं वै मुनेः श्रुत्वासुरे श्वरः ।

'पूजयित्वा ततः प्रीत आमन्त्रय प्रययौ गृहम्‌ ॥

४६॥

श्री-नारद: उबाच--नारद मुनि ने कहा; धर्मम्‌--वृत्तिपरक कर्तव्य; पारमहंस्यम्‌-परमहंसों अर्थात्‌ अत्यन्त पूर्ण मनुष्यों का;बै--निस्सन्देह; मुनेः--साधु पुरुष से; श्रुत्वा--सुनकर; असुर-ईश्वरः --असुरों के राजा प्रह्ाद महाराज ने; पूजयित्वा--साधुपुरुष की पूजा करके; ततः--तत्पश्चात्‌; प्रीत:--अत्यन्त प्रसन्न होकर; आमन्त्रय-- अनुमति लेकर; प्रययौ--उस स्थान को छोड़दिया; गृहम्‌--अपने घर जाने के लिए

नारद मुनि ने आगे कहा : साधु से ये उपदेश सुन कर असुरराज प्रह्लाद महाराज पूर्ण पुरुष( परमहंस ) के वृत्तिपरक कर्तव्य समझ गये।

इस प्रकार उन्होंने उस सन्त की विधिपूर्वक पूजाकी और उससे अनुमति लेकर अपने घर के लिए विदा हुए।

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