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अध्याय चौदह: आदर्श पारिवारिक जीवन
7.14श्रीयुधिष्ठटिर उवाचगृहस्थ एतां पदवीं विधिना येन चा्जसा ।
यायाद्देवऋषेब्रूहि माहशो गृहमूढधीः ॥
१॥
श्री-युधिष्ठटिरः उबाच--युथिष्टिर महाराज ने कहा; गृहस्थ:--अपने परिवार के साथ रहने वाला व्यक्ति; एताम्--इस ( पिछलेअध्याय में वर्णित विधि ); पदवीम्--मुक्ति पद को; विधिना--वैदिक शास्त्र के आदेशानुसार; येन--जिससे; च-- भी;अज्ञसा--सरलता से; यायात्--पा सके; देव-ऋषे--हे देवताओं में श्रेष्ठ साधु; ब्रूहि--कृपा करके बताएँ; माहशः --मेरे समान;गृह-मूढ-धी: --जीवन लक्ष्य से पूर्णतया अनजान
महाराज युधिष्टिर ने नारद मुनि से पूछा : हे स्वामी, हे महर्षि, कृपा करके यह बतलाएँ किजीवन-लक्ष्य के ज्ञान से रहित, घर पर रहने वाले हम लोग किस तरह वेदों के आदेशानुसारसरलता से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं ?
" श्रीनारद उवाचगृहेष्ववस्थितो राजन्क्रिया: कुर्वन्यथोचिता: ।
बासुदेवार्पणं साक्षादुपासीत महामुनीन् ॥
२॥
श्री-नारदः उबाच-- श्री नारद मुनि ने उत्तर दिया; गृहेषु--घर पर; अवस्थित:--रुककर ( गृहस्थ सामान्यतया अपनी पतली तथाबच्चों के साथ घर पर रहा करता है ); राजनू--हे राजा; क्रिया: --कार्य; कुर्वन्--करते हुए; यथोचिता: --उपयुक्त ( गुरु तथाशास्त्र द्वारा आदिष्ट ); वासुदेव-- भगवान् वासुदेव को; अर्पणम्--अर्पित करना; साक्षात्-- प्रत्यक्ष; उपासीत--पूजा करे; महा-मुनीन्ू-महान् भक्तों को
नारद मुनि ने उत्तर दिया: हे राजन, जो लोग घर पर गृहस्थ बन कर रहते हैं उन्हें अपनीजीविका अर्जित करने के लिए कार्य करना चाहिए और अपने कर्मो का फल स्वयं भोगने काप्रयास न करके इन फलों को वासुदेव कृष्ण को अर्पित करना चाहिए।
इस जीवन में वासुदेवको किस तरह प्रसन्न किया जाये इसे भगवद्धक्तों की संगति के माध्यम से भलीभाँति सीख जासकता है।
"
श्रुण्वन्भगवतोभीक्ष्णमवतारकथामृतम् ।
श्रद्धानो यथाकालमुपशान्तजनावृत: ॥
३॥
सत्सड्राच्छनकै: सड्भमात्मजायात्मजादिषु ।
विमुज्जेन्मुच्यमानेषु स्वयं स्वप्नवदुत्थित: ॥
४॥
श्रृण्बन्ू--सुनते हुए; भगवत:-- भगवान् की; अभीक्ष्णम्--सदैव; अवतार--अवतारों की; कथा--कथाएँ; अमृतम्ू-- अमृत;अ्रद्दान:-- भगवान् के विषय में सुनने में अत्यन्त श्रद्धालु; यथा-कालम्--समय के अनुसार ( सामान्यतया गृहस्थ को सायंकालया दोपहर में अवकाश मिलता है ); उपशान्त-- भौतिक कार्यो से पूर्णतया छुटकारा पाकर; जन--लोगों के द्वारा; आवृत:ः--धघिरकर; सत्-सड़ात्--ऐसी अच्छी संगति से; शनकै:-- धीरे-धीरे; सड्रम्--संगति; आत्म--शरीर में; जाया--पती में; आत्म-ज-आदिषु--तथा सन्तानों में भी; विमुझ्लेत्--ऐसी संगति से छुटकारा पा ले; मुच्यमानेषु--विलग होकर; स्वयम्--स्वयं; स्वप्नबत्--सपने की तरह; उत्थित:--जाग्रत ।
गृहस्थ व्यक्ति को चाहिए कि वह साधु पुरुषों की संगति बारम्बार करे और अत्यन्तश्रद्धापूर्वक भगवान् तथा उनके अवतारों के कार्यकलापों के अमृत का उस रूप में श्रवण करेजिस रूप में वे श्रीमद्धागवत तथा अन्य पुराणों में वर्णित हैं।
इस प्रकार मनुष्य को चाहिए किवह धीरे-धीरे अपनी पत्नी तथा सन््तानों के स्नेह से उसी तरह विरक्त होता रहे जिस प्रकार जागजाने पर मनुष्य स्वप्न से विरक्त हो जाता है।
"
यावदर्थमुपासीनो देहे गेहे च पण्डित: ।
विरक्तो रक्तवत्तत्र नुलोके नरतां न््यसेत् ॥
५॥
यावत््-अर्थम्--जीविका के लिए जितने प्रयास की आवश्यकता हो उतना ही; उपासीन: --कमाते हुए; देहे--शरीर में; गेहे--घरेलू मामलों में; च-- भी; पण्डित:ः--विद्वान; विरक्त:--अनासक्त; रक्त-वत्--अत्यधिक आसक्त की भाँति; तत्र--उसमें; नू-लोके--मानव समाज में; नरताम्--मानव जीवन में ; न््यसेत्--चित्रित करे |
वास्तविक विद्वान को चाहिए कि वह शरीर पालन के लिए जितना आवश्यक हो उतना हीअर्जित करने के लिए कार्य करे और पारिवारिक मामलों से अनासक्त होकर मानव समाज मेंरहे, यद्यपि बाहर से वह उसमें अत्यधिक आसक्त प्रतीत हो।
"
ज्ञातयः पितरौ पुत्रा भ्रातरः सुहृदोपरे ।
यद्वदन्ति यदिच्छन्ति चानुमोदेत निर्मम: ॥
६॥
ज्ञातय: --सम्बन्धी, पारिवारिक सदस्य; पितरौ--माता तथा पिता; पुत्रा:--सन्तानें; भ्रातर: -- भाई; सुहृदः--मित्र; अपरे--तथाअन्य लोग; यत्--जो भी; वदन्ति--सुझाते हैं ( जीविका के साधन के लिए ); यत्--जो भी; इच्छन्ति--चाहते हैं; च--तथा;अनुमोदेत--उसे मानना चाहिए; निर्मम:ः--गम्भीरता से न ग्रहण करते हुए।
मानव समाज में बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि अपने कार्यकलापों की योजना को अत्यन्तसहज बनाए।
यदि उसका मित्र, पुत्र, माता-पिता, भाई या अन्य कोई कुछ सुझाव देता है, तोउसे ऊपर से मानते हुए यह कहना चाहिए 'हाँ, यह ठीक है' किन्तु भीतर से उसे हृढ़संकल्पहोना चाहिए कि कहीं वह अपने जीवन को दूभर न बना ले जिससे जीवन का प्रयोजन पूरा न होसके।
"
दिव्यं भौम॑ चान्तरीक्षं वित्तमच्युतनिर्मितम् ।
तत्सर्वमुपयुझ्जान एतत्कुर्यात्स्वतो बुध: ॥
७॥
दिव्यमू--आकाश से वर्षा होने के कारण सरलता से प्राप्प; भौमम्--खानों तथा समुद्र से प्राप्त; च--तथा; आन्तरीक्षम्-- भाग्यसे प्राप्त; वित्तमू--सारी सम्पत्ति; अच्युत-निर्मितम्-- भगवान् द्वारा बनायी गयी; तत्--वस्तुएँ; सर्वम्--सारी; उपयुज्ञान--(मानव समाज या सारे जीवों के लिए ) उपयोग में लाते हुए; एतत्--यह ( शरीर पालन ); कुर्यात्--करे; स्वतः--अतिरिक्त श्रमकिये बिना, स्वतः प्राप्त; बुध:--बुद्धिमान व्यक्ति |
भगवान् द्वारा उत्पन्न प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग जीवों के शरीरों तथा आत्माओं का पालनकरने के लिए किया जाना चाहिए।
जीवन की आवश्यकताएँ तीन प्रकार की हैं--वे जो आकाश से (वर्षा से ) उत्पन्न हैं, वे जो पृथ्वी से ( खानों, समुद्रों या खेतों से ) उत्पन्न हैं तथा वेजो वायुमण्डल से ( जो अचानक तथा अनपेक्षित रूप से ) उत्पन्न होती हैं।
"
यावदि्भ्रियेत जठरं तावत्स्वत्वं हि देहिनाम् ।
अधिक योभिमन्येत स स्तेनो दण्डमरईति ॥
८॥
यावत्--जितना; प्रियेत-- भरा जा सकता है; जठरम्--पेट; तावत्ू--उतना; स्वत्वम्--स्वामित्व; हि--निश्चय ही; देहिनामू--जीवों का; अधिकम्--इससे अधिक; य:--जो; अभिमन्येत--स्वीकार कर सकता है; सः--वह; स्तेन:--चोर; दण्डमू--दण्डके; अहति--योग्य है |
शरीर के पालन के लिए जितने धन की आवश्यकता हो उतने के स्वामित्व का ही अधिकाररखना चाहिए, किन्तु जो इससे अधिक का स्वामी बनने की कामना करता है उसे चोर माननाचाहिए और प्रकृति के नियमों द्वारा दण्डनीय है।
"
मृगोष्टखरमकाखुसरीसूप्खगमक्षिका: ।
आत्मनः पुत्रवत्पश्येत्तेरेषामन्तरं कियत् ॥
९॥
मृग--हिरन; उष्ट-- ऊँट; खर--गदहा; मर्क --बन्दर; आखु--चूहा; सरीसूपू--साँप; खग--पक्षी; मक्षिका:--मक्खियाँ;आत्मन:--अपने; पुत्र-वत्--पुत्र के समान; पश्येत्--देखे; तैः--उन पुत्रों से; एघामू--इन पशुओं का; अन्तरम्--अन्तर;कियत्--कितना कम
मनुष्य को चाहिए कि हिरन, ऊँट, गधा, बन्दर, चूहा, साँप, पक्षी तथा मक्खी जैसे पशुओंके साथ अपने पुत्र के ही समान बर्ताव करे।
इन निर्दोष पशुओं तथा पुत्रों के बीच वास्तव मेंअन्तर ही कितना है?
" त्रिवर्ग नातिकृच्छेण भजेत गृहमेध्यपि ।
यथादेशं यथाकालं यावद्दैवोपपादितम् ॥
१०॥
ब्रि-वर्गमू--तीन सिद्धान्त, धर्म, अर्थ तथा काम; न--नहीं; अति-कृच्छेण--कठिन प्रयत्न के द्वारा; भजेत--सम्पन्न करे; गृह-मेधी--गृहस्थ जीवन में ही रुचि रखने वाला व्यक्ति; अपि--यद्यपि; यथा-देशम्--स्थान के अनुसार; यथा-कालम्--समय केअनुसार; यावत्--जो भी; दैव-- भगवत्कृपा से; उपपादितम्--प्राप्त |
यदि कोई ब्रह्मचारी, संन्यासी या वानप्रस्थ न होकर मात्र गृहस्थ हो तो भी उसे धर्म, अर्थ याकाम के लिए अधिक श्रम नहीं करना चाहिए।
यहाँ तक कि गृहस्थ जीवन में भी स्थान तथाकाल के अनुसार न्यूनतम प्रयास से जो कुछ भगवत्कृपा से उपलब्ध हो जाये, उसी से अपनाजीवन-यापन करते हुए सन्तुष्ट रहना चाहिए।
मनुष्य को अपने आपको उग्र कर्म में नहीं लगानाचाहिए।
"
आश्राघान्तेडवसायिभ्यः कामान्संविभजेद्यथा ।
अप्येकामात्मनो दारां नृणां स्वत्वग्रहो यतः ॥
११॥
आ--यहाँ तक कि; श्व--कुत्ता; अध--पापपूर्ण पशु या जीव; अन्ते अवसायिभ्य:--सबसे नीच चाण्डाल को; कामान्--जीवन की आवश्यकताएँ; संविभजेत्--विभाजित करे; यथा--जितना; अपि-- भी; एकाम्--एक; आत्मन:--अपनी;दाराम्--स्त्री को; नृणाम्--सामान्य लोगों का; स्वत्व-ग्रह:ः--स्त्री को अपना ही समझ कर स्वीकार किया जाता है; यत:--जिसके कारण।
कुत्तों, पतित पुरुषों तथा चाण्डाल समेत अछूतों को उनकी समुचित आवश्यकताएँ प्रदानकरके उनका पालन करना चाहिए।
आवश्यकताएँ गृहस्थों द्वारा पूरी की जानी चाहिए।
यहाँ तककि घर की अपनी उस पत्नी को भी, जिससे मनुष्य घनिष्ठतापूर्वक आसक्त होता है, अतिथियोंतथा सामान्य जनों के स्वागत में नियुक्त करना चाहिए।
"
जह्याद्यदर्थ स्वान्प्राणान्हन्याद्वा पितरं गुरुम् ।
तस्यां स्वत्वं स्त्रियां जह्याद्यस्तेन ह्जितो जित: ॥
१२॥
जह्यात्--छोड़ दे; यत्-अर्थ--जिसके लिए; स्वानू--अपना; प्राणानू--जीवन को; हन्यात्--मार डाले; वा--अथवा;पितरम्--पिता को; गुरुम्--गुरु या शिक्षक को; तस्याम्--उसमें; स्वत्वम्-- अधिकार, स्वामित्व; स्त्रियाम्--पत्नी में;जह्यात्-त्याग दे; यः--जो ( भगवान् ); तेन--उसके द्वारा; हि--निस्सन्देह; अजितः--जो जीता नहीं जा सकता; जित:--जीता गया।
मनुष्य अपनी पत्नी को इतनी गम्भीरतापूर्वक अपना मानता है कि वह कभी-कभी उसकेलिए स्वयं को या अन्यों को यथा अपने माता-पिता या गुरु अथवा शिक्षक को मार डालता है।
अतएव यदि कोई ऐसी पत्नी के प्रति अपनी आसक्ति का परित्याग कर सकता है, तो वह उनभगवान् को जीत लेता है, जो अजेय हैं।
"
कृमिविड्भस्मनिष्ठान्तं क्वेदं तुच्छं कलेवरम् ।
क्व तदीयरतिर्भार्या क्वायमात्मा नभश्छदि: ॥
१३॥
कृमि--कीड़े-मकोड़े; विटू--विष्ठा, मल; भस्म--राख; निष्ठ--आसक्ति; अन्तमू--अन्त में; क्व--क््या है; इदम्--यह( शरीर ); तुच्छम्--अत्यन्त नगण्य; कलेवरम्-- भौतिक शरीर; क्व--क््या है; तदीय-रति:ः--उस शरीर के प्रति आकर्षण;भार्या--पली; क्व अयमू्--इस शरीर का क्या लाभ; आत्मा--परमात्मा; नभ:-छदि:-- आकाश के समान सर्वव्यापी |
समुचित विचार-विमर्श करके मनुष्य को अपनी पत्नी के शरीर के प्रति आकर्षण त्याग देनाचाहिए, क्योंकि यह शरीर अन्ततोगत्वा छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़ों, मल या राख में परिणत होजाएगा।
तो भला इस तुच्छ शरीर का क्या महत्त्व है ?
परम पुरुष कितना महान् है, जो आकाशके समान सर्वव्यापी है?
" सिद्धैर्यज्ञावशिष्टार्थ: कल्पयेद्वुत्तिमात्मनः ।
शेषे स्वत्वं त्यजन्प्राज्ञ: पदवीं महतामियात् ॥
१४॥
सिद्धैः:--भगवान् की दया से प्राप्त वस्तुएँ; यज्ञा-अवशिष्ट-अर्थै:-- पञ्ञ महायज्ञ सम्पन्न करने के बाद या भगवान् को यज्ञ अर्पितकरने के बाद प्राप्त वस्तुएँ; कल्पयेत्--विचार करे; वृत्तिमू--जीविका का साधन; आत्मन:--अपने लिए; शेषे--अन्त में;स्वत्वमू--अपनी पत्नी, बच्चों, घर, व्यापार इत्यादि का तथाकथित स्वामित्व; त्यजन्--त्यागते हुए; प्राज्ञ:--बुद्धिमान लोग;पदवीम्--पद; महताम्--आध्यात्मिक चेतना में पूर्णतया सन्तुष्ट महापुरुषों का; इयात्ू--प्राप्त करना चाहिए।
बुद्धिमान व्यक्ति को प्रसाद खाकर या पाँच विभिन्न प्रकार के यज्ञ सम्पन्न करके तुष्ट रहनाचाहिए।
ऐसे कार्यों से मनुष्य शरीर तथा शरीर के तथाकथित स्वामित्व के प्रति अपनी अनुरक्ति को त्याग सकता है।
जब वह ऐसा करने में समर्थ होता है, तो वह महात्मा के पद पर दृढ़ स्थितहो जाता है।
"
देवानृषीत्रृभूतानि पितृनात्मानमन्वहम् ।
स्ववृत्त्यागतवित्तेन यजेत पुरुषं पृथक् ॥
१५॥
देवानू--देवताओं को; ऋषीन्--ऋषियों को; नृ--मानव समाज को; भूतानि--जीवों को; पितृन्ू--पुरखों को; आत्मानम्ू--अपने को या परमात्मा को; अन्वहम्--नित्यप्रति; स्व-वृत््या--अपनी जीविका के साधन से; आगत-वित्तेन--स्वतः आने वालेधन से; यजेत--पूजा करे; पुरुषम्--प्रत्येक के हृदय स्थित व्यक्ति को; पृथक्--अलग से |
मनुष्य को चाहिए कि प्रतिदिन वह उन परम पुरुष की पूजा करे जो हर एक के हृदय मेंस्थित हैं और इसी आधार पर उसे देवताओं, साधु पुरुषों, सामान्य मनुष्यों तथा जीवों, अपनेपुरखों तथा स्वयं की अलग-अलग पूजा करनी चाहिए।
इस प्रकार वह प्रत्येक व्यक्ति के हृदय मेंस्थित परम पुरुष की पूजा कर सकता है।
"
यह्ाात्मनोधिकाराद्या: सर्वा: स्युर्यज्ञसम्पदः ।
वैतानिकेन विधिना अग्निहोत्रादिना यजेत् ॥
१६॥
यहि--जब; आत्मन:-- अपना; अधिकार-आद्या:--पूर्ण अधिकार के अन्तर्गत उसके पास की वस्तुएँ; सर्वा:--सारी; स्युः--होजाता है; यज्ञ-सम्पदः --यज्ञ सम्पन्न करने की सामग्री या भगवान् को प्रसन्न करने के साधन; बैतानिकेन--यज्ञ करने को बतानेवाली प्रामाणिक पुस्तकों से; विधिना--विधानों के अनुसार; अग्नि-होत्र-आदिना--अग्नि में यज्ञ करने से; यजेत्-- भगवान्की पूजा करे।
जब कोई व्यक्ति सम्पत्ति तथा ज्ञान से समृद्ध हो, जो उसके पूर्ण नियंत्रण में हों और जिनसेवह यज्ञ सम्पन्न कर सके या भगवान् को प्रसन्न कर सके तो उसे शास्त्रों के निर्देशानुसार अग्नि मेंआहुतियाँ डालकर यज्ञ करना चाहिए।
इस तरह उसे भगवान् की पूजा करनी चाहिए।
"
न हाग्निमुखतोयं वै भगवान्सर्वयज्ञभुक् ।
इज्येत हविषा राजन्यथा विप्रमुखे हुतेः ॥
१७॥
न--नहीं; हि--निस्सन्देह; अग्नि--आग; मुखतः--मुख से, ज्वाला से; अयम्ू--यह; बै--निश्चय ही; भगवान्-- भगवान्श्रीकृष्ण; सर्व-यज्ञ-भुक्ू--सभी प्रकार के यज्ञों के फलों का भोक्ता; इज्येत--पूजा जाता है; हविषा--घी की आहुति से;राजन्--हे राजा; यथा--जिस प्रकार; विप्र-मुखे--ब्राह्मण के मुँह से होकर; हुतैः--उत्तम भोजन की भेंट करके |
भगवान् श्री कृष्ण सारी यज्ञ-आहुतियों के भोक्ता हैं।
यद्यपि वे अग्नि में डाली गई आहुतियाँखाते हैं फिर भी हे राजा, जब उन्हें अन्न तथा घी से बना व्यंजन योग्य ब्राह्मणों के मुख से होकरअर्पित किया जाता है, तो वे और भी प्रसन्न होते हैं।
"
तस्माद्वाह्मणदेवेषु मर्त्यादिषु यथाईत: ।
तैस्तैः कामर्यजस्वैन क्षेत्रज्ञ ब्राह्मणाननु ॥
१८ ॥
तस्मात्ू--अतएव; ब्राह्मण-देवेषु--ब्राह्मणों तथा देवताओं के माध्यम से; मर्त्य-आदिषु--सामान्य मनुष्यों तथा अन्य जीवों केमाध्यम से; यथा-अहतः--अपनी सामर्थ्य के अनुसार; तैः तैः--उन सभी; कामैः-- भोग की विविध वस्तुओं से, यथाभव्यभोजन, पुष्पों की माला, चन्दन आदि से; यजस्व--पूजा करे; एनम्--इस; क्षेत्र-ज्ञमू--सभी प्राणियों के हृदय में वास करनेवाले परमेश्वर को; ब्राह्मणान्ू--ब्राह्मणों को; अनु--बाद में |
अतएबव हे राजा, सर्वप्रथम ब्राह्मणों तथा देवताओं को प्रसाद प्रदान करो और जब वेभलीभाँति खा चुकें तो तुम अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्य जीवों को प्रसाद बाँटो।
इस प्रकारतुम सारे जीवों की अर्थात् प्रत्येक जीव के भीतर के परम पुरुष की पूजा कर सकोगे।
"
कुर्यादपरपश्षीयं मासि प्रौष्ठपदे द्विज: ।
श्राद्धं पित्रोर्यथावित्तं तद्वन्धूनां च वित्तवान् ॥
१९॥
कुर्यात्ू-करना चाहिए; अपर-पक्षीयम्--कृष्ण पक्ष में; मासि--आश्चिन ( अक्टूबर-नवम्बर ) महीने में; प्रौष्ठ-पदे-- भाद्र( अगस्त-सितम्बर ) माह में; द्विज:--दो बार उत्पन्न; श्राद्धमू--आहुतियाँ; पित्रो:--पितरों के लिए; यथा-वित्तमू--अपनी आयके अनुसार; तत्-बन्धूनाम् च--तथा पूर्वजों के सम्बन्धियों को भी; वित्त-वान्--जो पर्याप्त धनी है।
काफी धनवान ब्राह्मण को भाद्र मास के कृष्ण पक्ष में पितरों को आहुति देनी चाहिए।
इसीप्रकार पूर्वजों के सम्बन्धियों को आश्विन मास में महालया पर्व के अवसर पर आहुति देनीचाहिए।
"
अयने विषुवे कुर्याद्व्यतीपाते दिनक्षये ।
अन्द्रादित्योपरागे च द्वादश्यां भ्रवणेषु चच ॥
२०॥
तृतीयायां शुक्लपक्षे नवम्यामथ कार्तिके ।
अतसृष्वप्यष्टकासु हेमन्ते शिशिरि तथा ॥
२१॥
माघे च सितसप्तम्यां मघाराकासमागमे ।
राकया चानुमत्या च मासक्श्नाणि युतान्यपि ॥
२२॥
द्वादश्यामनुराधा स्याच्छुवणस्तिस्त्र उत्तरा: ।
तिसृष्वेकादशी वासु जन्मर्क्ष ओऋरोणयोगयुक्ू ॥
२३॥
अयने--मकर संक्राति के दिन, जब सूर्य उत्तरायण दिशा में जाने लगता है तथा कार्तिक संक्रान्ति के दिन जब सूर्य दक्षिणायनकी ओर जाने लगता है; विषुवे--मेष संक्रान्ति तथा तुला संक्रान्ति पर; कुर्यातू--करे; व्यतीपाते--व्यतीपात योग में; दिन-क्षये--उस दिन जब तीनों तिथियाँ मिलती हैं; चन्द्र-आदित्य-उपरागे--सूर्य अथवा चन्द्र ग्रहण के समय; च--तथा; द्वादश्याम्श्रवणेषु-- श्रावण नक्षत्र में तथा द्वादशी के दिन; च--तथा; तृतीयायाम्--अक्षय तृतीया के दिन; शुक्ल-पक्षे--शुक्ल पक्ष में;नवम्यामू--नवमी के दिन; अथ--भी; कार्तिके--कार्तिक ( अक्टूबर, नवम्बर ) मास में; चतसूषु--चतुर्थी को; अपि-- भी;अष्टकासु--अष्टका के दिन; हेमन्ते--शीत ऋतु के पूर्व; शिशिरे--शीत ऋतु में; तथा-- भी और; माघे--माघ ( जनवरीफरवरी ) मास में; च--तथा; सित-सप्तम्याम्ू--शुक्ल पक्ष की सप्तमी के दिन; मघा-राका-समागमे--मघा नक्षत्र तथा पूर्णिमाके संयोग के समय; राकया--पूर्ण चन्द्रमा के दिन; च--तथा; अनुमत्या--शुक्ल पक्ष में पूर्ण चन्द्रमा से थोड़ा पहले; च--तथा;मास-ऋक्षाणि--नक्षत्र जो विभिन्न नामों के स्रोत हैं; युतानि--परस्पर मिल जाते हैं; अपि-- भी; द्वादश्यामू-द्वादशी के दिन;अनुराधा--अनुराधा नक्षत्र; स्थातू--हो सकता है; श्रवण:-- श्रावण नक्षत्र; तिस्त्र:ः--तीन ( नक्षत्र ); उत्तरा:--उत्तरा नामक नक्षत्र( उत्तर-फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तर-भाद्रपद ); तिसूषु--तीनों पर; एकादशी--एकादशी; वा--अथवा; आसु--इन पर; जन्म-ऋक्ष--अपने जन्म नक्षत्र का; श्रोण-- श्रवण नक्षत्र के; योग--संयोग से; युक्--युक्त |
महालया पर्व आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाता है और वैदिकचान्द्र वर्ष के अन्तिम दिन का सूचक है।
मनुष्य को चाहिए कि मकर संक्रान्ति ( जब सूर्य उत्तरायण की ओर जाने लगता है ) के दिनया कर्कट संक्रान्ति ( जब सूर्य दक्षिणायन की ओर जाने लगता है ) के दिन श्राद्धकर्म करे; वहइस श्राद्धकर्म को मेष संक्रान्ति के दिन तथा तुला संक्रान्ति के दिन, जब तीनों चन्द्र तिथियाँएकसाथ मिलती हैं, व्यतीपात नामक योग में, चन्द्र या सूर्यग्रहण के समय द्वादशी के दिन तथाश्रवण नक्षत्र में करे।
मनुष्य को चाहिए कि अक्षय तृतीया को, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष कीनवमी को, शीतऋतु में चारों अष्टकाओं के दिन, माघ मास की शुक्ला सप्तमी के दिन, मघानक्षत्र तथा पूर्णिमा के योग के समय तथा जब चन्द्रमा पूर्ण हो या लगभग पूर्ण हो, उन दिनों मेंजब ये दिन उन नक्षत्रों के साथ योग करें जिनसे महीनों के नाम प्राप्त हुए हैं श्राद्धकर्म करे।
श्राद्धकर्म द्वादशी को भी किया जाये जब वह अनुराधा, श्रवण, उत्तर फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा याउत्तर भाद्रपद नामक नक्षत्रों में से किसी के साथ योग करे।
यही नहीं, एकादशी को भी श्राद्धकिया जाये जब यह उत्तर फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा या उत्तर भाद्रपद के योग में हो।
अन्त में, मनुष्यको चाहिए अपने जन्म नक्षत्र या श्रवण नक्षत्र के योग वाले दिनों में श्राद्धकर्म करे।
"
त एते श्रेयसः काला नृणां श्रेयोविवर्धना: ।
कुर्यात्सवत्मनैतेषु श्रेयोडमोघं तदायुष: ॥
२४॥
ते--इसलिए; एते--ये सब ( ज्योतिष सम्बन्धी गणनाएँ ); श्रेयसः--कल्याण के; कालाः:--समय; नृणाम्ू--मनुष्यों का;श्रेय:--कल्याण; विवर्धना: --बढ़ाते हैं; कुर्यातू--करे; सर्व-आत्मना--अन्य कार्यों से ( केवल श्राद्ध कर्म ही नहीं ); एतेषु--इन ( ऋतुओं ) में; श्रेय:--कल्याण ( करने वाले ); अमोघम्--तथा सफलता; तत्--मनुष्य की; आयुष: --आयु का।
ऋतुओं के सारे अवसर मानवता के लिए अत्यन्त शुभ माने जाते हैं।
ऐसे अवसरों पर सारेकल्याण (शुभ ) कार्य किये जाने चाहिए, क्योंकि ऐसे कार्यों से मनुष्य अपने छोटे सेजीवनकाल में सफलता प्राप्त कर लेता है।
"
एषु स्नान जपो होमो ब्रतं देवद्विजार्चनम् ।
पितृदेवनृभूते भ्यो यद्दत्तं तद्धयनश्वरम् ॥
२५॥
एषु--इन सारी ( ऋतुओं ) में; स्नानम्ू--गंगा, यमुना में स्नान या किसी अन्य पुण्य स्थल में स्नान; जप: --कीर्तन; होम:-- अग्नियज्ञ; ब्रतमू--ब्रत रखना; देव-- भगवान्; द्विज-अर्चनम्--ब्राह्मणों या वैष्णवों की पूजा करना; पितृ--पितर; देव--देवता;नू--मनुष्य; भूतेभ्य:--तथा अन्य सारे जीवों को; यत्--जो भी; दत्तम्-प्रदान किया हुआ; तत्--वह; हि--निस्सन्देह;अनश्वरम्--स्थायी रूप से लाभप्रद।
ऋतु-परिवर्तन के इन अवसरों पर यदि कोई गंगा या यमुना में या किसी तीर्थस्थान में स्नानकरता है, यदि कोई कीर्तन करता है, अग्नि यज्ञ करता है, व्रत रखता है या यदि कोई भगवान्की, ब्राह्मणों की, पितरों की, देवताओं की तथा सामान्य जीवों की पूजा करता है या जो कुछदान देता है, तो उसका स्थायी लाभप्रद फल मिलता है।
"
संस्कारकालो जायाया अपत्यस्यात्मनस्तथा ।
प्रेतसंस्था मृताहश्च कर्मण्यभ्युदये नूप ॥
२६॥
संस्कार-काल:--वैदिक संस्कारों को संम्पन्न करने के लिए बताये गये उचित समय पर; जायाया:--पत्नी के लिए; अपत्यस्थ--सन््तानों के लिए; आत्मन:--तथा अपने लिए; तथा--और; प्रेत-संस्था--दाह संस्कार; मृत-अह:--बरसी या वार्षिक श्राद्धदिन; च--तथा; कर्मणि--सकाम कर्म का; अभ्युदये--बढ़ोत्तरी के लिए; नृप--हे राजा |
हे राजा युधिष्ठटिर, अपने, अपनी पत्नी या अपनी सन्तान के संस्कार अनुष्ठानों के लिए नियतसमय पर या अच्त्येष्टि संस्कार तथा बरसी के अवसर पर मनुष्य को सकाम कर्मों में आगे बढ़नेके लिए उपर्युक्त शुभ उत्सव सम्पन्न करने चाहिए।
"
अथ देशान्प्रवक्ष्यामि धर्मादिश्रेयआवहान् ।
सबै पुण्यतमो देश: सत्पात्रं यत्र लभ्यते ॥
२७॥
बिम्बं भगवतो यत्र सर्वमेतच्चराचरम् ।
यत्र ह ब्राह्मणकुलं तपोविद्यादयान्वितम् ॥
२८ ॥
अथ-त्पश्चात्; देशान्--स्थानों का; प्रवक््यामि--वर्णन करूँगा; धर्म-आदि--धार्मिक कृत्य आदि; श्रेय--कल्याण;आवहानू--जो ला सकता है; सः--वह; वै--निस्सन्देह; पुण्य-तम:--सर्वाधिक पवित्र; देश:--स्थान; सतू-पात्रमू--वैष्णव;यत्र--जहाँ; लभ्यते-- उपलब्ध होता है; बिम्बम्--अर्चाविग्रह ( मन्दिर में )) भगवत:ः-- भगवान् का ( जो आश्रय हैं ); यत्र--जहाँ; सर्वम् एतत्--इस समग्र विराट जगत का; चर-अचरम्--सारे जड़ तथा चेतन प्राणियों सहित; यत्र--जहाँ; ह--निस्सन्देह;ब्राह्मण-कुलमू--ब्राह्मणों की संगति; तपः--तपस्या; विद्या--शिक्षा; दया--कृपा; अन्वितम्--से युक्त
नारद मुनि ने आगे कहा : अब मैं उन स्थानों का वर्णन करूँगा जहाँ धार्मिक अनुष्ठान अच्छीतरह सम्पन्न किये जा सकते हैं।
जिस किसी स्थान में वैष्णव हो वह स्थान समस्त कल्याणकारीकृत्यों के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
भगवान् समस्त चर तथा अचर प्राणियों समेत इस समग्र विराट जगतके आश्रय हैं और वह मन्दिर जहाँ भगवान् का अर्चाविग्रह स्थापित किया जाता है सर्वाधिकपवित्र स्थान होता है।
यही नहीं, जिन स्थानों में विद्वान ब्राह्मण तपस्या, विद्या तथा दया के द्वारावैदिक नियमों का पालन करते हैं, वे भी अत्यन्त शुभ तथा पवित्र होते हैं।
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यत्र यत्र हरेरर्चा स देश: श्रेयसां पदम् ।
यत्र गड़ादयो नद्यः पुराणेषु च विश्रुता: ॥
२९॥
यत्र यत्र--जहाँ कहीं; हरेः-- भगवान् कृष्ण की; अर्चा--अर्चाविग्रह पूजा जाता है; सः--वह; देश:--स्थान, देश या पड़ोस;श्रेयसाम्--समस्त कल्याण का; पदमू--स्थान; यत्र--जहाँ; गड्ढा-आदय:--गंगा, यमुना, नर्मदा, कावेरी जैसी; नद्य: --पवित्रनदियाँ; पुराणेषु--पुराणों में; च-- भी; विश्रुता:--प्रसिद्ध हैं
निस्सन्देह, वे स्थान कल्याणकारी हैं जहाँ भगवान् कृष्ण का मन्दिर हो जिसमें उनकीविधिवत् पूजा होती हो।
वे स्थान भी कल्याणकारी हैं जहाँ पुराणों जैसे अनुपूरक वैदिक शास्त्रोंमें उल्लिखित गंगा सहश प्रसिद्ध पवित्र नदियाँ बहती हैं।
निश्चय ही वहाँ जो भी आध्यात्मिककार्य किया जाता है, वह अत्यन्त प्रभावशाली होता है।
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सरांसि पुष्करादीनि क्षेत्राण्यर्हाश्रितान्युत ।
कुरुक्षेत्र गयशिरः प्रयाग: पुलहाश्रम: ।
नैमिषं फाल्गुन॑ सेतु: प्रभासोथ कुशस्थली ॥
३०॥
वाराणसी मधुपुरी पम्पा बिन्दुसरस्तथा ।
नारायणाश्रमो नन्दा सीतारामाश्रमादय: ॥
३१॥
सर्वे कुलाचला राजन्महेन्रमलयादय: ।
एते पुण्यतमा देशा हरेरचाश्रिताश्व ये ॥
३२॥
एतान्देशात्रिषेवेत श्रेयस्कामो हाभीक्षणश: ।
धर्मो ह्त्रेहितः पुंसां सहस्त्राधिफलोदय: ॥
३३॥
सरांसि--झीलें; पुष्कर-आदीनि--यथा पुष्कर; क्षेत्राणि--पवित्र स्थान ( यथा कुरुक्षेत्र, गया क्षेत्र तथा जगन्नाथपुरी ); अ्ह--पूज्य साधु पुरुषों के लिए; आश्रितानि--आश्रय; उत--विख्यात; कुरुक्षेत्रमू--विशेष पवित्र स्थान ( धर्मक्षेत्र )।
गय-शिरः--गया नामक स्थान जहाँ गयासुर ने भगवान् विष्णु के चरणकमलों में शरण ग्रहण की; प्रयाग: --गंगा तथा यमुना नामक दोपवित्र नदियों के संगम पर स्थित इलाहाबाद; पुलह-आश्रम:--पुलह मुनि का निवास स्थान; नैमिषम्--नैमिषारण्य ( लखनऊ केपास ); फाल्गुनम्--वह स्थान जहाँ फाल्गु नदी बहती है; सेतु:--सेतुबन्ध जहाँ भगवान् रामचन्द्र ने भारत तथा लंका के मध्यपुल बनाया था; प्रभास: --प्रभास क्षेत्र; अथ--तथा; कुश-स्थली--द्वारावती या द्वारका; वाराणसी--बनारस; मधु-पुरी --मथुरा; पम्पा--वह स्थान जहाँ पम्पा सरोवर है; बिन्दु-सर:ः--वह स्थान जहाँ विन्दु सरोवर है; तथा--वहाँ; नारायण-आश्रम:--बदरिका श्रम; नन्दा--वह स्थान जहाँ नन््दा नदी बहती है; सीता-राम-- भगवान् रामचन्द्र तथा माता सीता का; आश्रम-आदयः--शरण स्थलियाँ तथा चित्रकूट; सर्वे--सभी ( स्थान ); कुलाचला:--पहाड़ी स्थल; राजन्--हे राजा; महेन्द्र-महेन्द्र;मलय-आदय: --तथा मलयाचल आदि; एते--ये सभी; पुण्य-तमा:--अत्यन्त पवित्र; देशा:--स्थान; हरेः-- भगवान् के; अर्च-आश्चिता:--जहाँ राधाकृष्ण का अर्चाविग्रह पूजा जाता है ( यथा अमरीका के न्यूयार्क, लास ऐंजिलिस तथा सैनफ्रांसिस्को जैसेबड़े-बड़े शहर और लन्दन, पेरिस जैसे यूरोपीय शहर या जहाँ भी कृष्णभावनामृत के केन्द्र हैं); च-- भी; ये--जो; एतान्देशान्ू--इन देशों को; निषेबेत--पूजा करे या देखने जाए; श्रेय:-काम:--कल्याणकामी; हि--निस्सन्देह; अभीक्षणश:--पुनःपुनः; धर्म:--धार्मिक कार्य; हि--जिससे; अत्र--इन स्थानों में; ईहितः--सम्पन्न किया गया; पुंसाम्--पुरुषों का; सहस्त्र-अधि--एक हजार गुणा से अधिक; फल-उदयः--प्रभावशाली |
पुष्कर जैसे पवित्र सरोवर तथा वे स्थान जहाँ साधु पुरुष रहते हैं यथा कुरुक्षेत्र, गया, प्रयाग,पुलहाभ्रम, नैमिषारण्य, फाल्गु नदी का तट, सेतुबन्ध, प्रभास, द्वारका, वाराणसी, मथुरा, पम्पा,बिन्दु सरोवर, बदरिकाश्रम ( नारायणाश्रम ), वे स्थान जहाँ से होकर नन्दा नदी बहती है, वेस्थल जहाँ भगवान् रामचन्द्र तथा माता सीता ने शरण ली, यथा चित्रकूट तथा महेन्द्र और मलयनामक पहाड़ी क्षेत्र भी--इन सभी स्थानों को अत्यन्त पवित्र एवं पुण्य माना जाता है।
इसी प्रकारभारत के बाहर के स्थान जहाँ कृष्णभावनामृत आन्दोलन के केन्द्र हैं और जहाँ राधाकृष्णअर्चाविग्रह पूजे जाते हैं, उन स्थानों में आध्यात्मिक रूप से बढ़ने-चढ़ने की इच्छा रखने वालेव्यक्तियों को जाना चाहिए और उनकी पूजा करनी चाहिए।
जो आध्यात्मिक जीवन में आगेबढ़ना चाहता है, वह इन सारे स्थानों की यात्रा कर सकता है और अनुष्ठान कर सकता है,जिससे अन्य स्थानों में सम्पन्न किये गये उन्हीं कृत्यों से हजार गुना अच्छे फल प्राप्त हो सकते हैं।
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पात्र त्वत्र निरुक्त वै कविभिः पात्रवित्तमै: ।
हरिरिवैक उर्वीश यन्मयं वै चराचरम् ॥
३४॥
पात्रमू--सही व्यक्ति जिसे दान दिया जा सके; तु--लेकिन; अत्र--इस संसार में; निरुक्तम्ू--निश्चित; वै--निस्सन्देह;कविभिः--विद्वानों द्वारा; पात्र-वित्तमैः--दान के सुयोग्य पात्र को खोज निकालने में दक्ष; हरिः-- भगवान्; एव--निस्सन्देह;एकः--एकमात्र; उर्वी-ईश--हे पृथ्वी के राजा; यत्-मयम्--जिस पर हर वस्तु टिकी है; बै--जिससे हर वस्तु उत्पन्न है; चर-अचरमू--इस ब्रह्माण्ड के जड़ या चेतन प्राणी
हे पृथ्वीपति, पटु तथा विद्वान अध्येताओं ने यह तय किया है कि भगवान् कृष्ण ही सर्वश्रेष्ठपुरुष हैं जिन्हें प्रत्येक वस्तु प्रदान की जानी चाहिए, जिन पर ब्रह्माण्ड के सारे जड़ या चेतनटिके हैं और सारी वस्तुएँ उन्हीं से उत्पन्न होती हैं।
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देवर्ष्यहत्सु वै सत्सु तत्र ब्रह्मात्मजादिषु ।
राजन्यदग्रपूजायां मतः पात्रतयाच्युत: ॥
३५॥
देव-ऋषि--देवताओं तथा महान् सन्त पुरुषों में से, जिनमें नारद मुनि आते हैं; अर्हत्सु--अत्यन्त आदरणीय तथा पूजनीय व्यक्ति;बै--निस्सन्देह; सत्सु--महान् भक्तों में से; तत्र--वहाँ ( राजसूय यज्ञ में ); ब्रह्य-आत्म-जादिषु--तथा ब्रह्मा के पुत्र ( सनक,सनन्दन, सनत तथा सनातन ); राजन्--हे राजा; यत्--जिससे; अग्र-पूजायाम्--जिसकी पूजा सबसे पहले होनी हो; मतः--निर्णय; पात्रतया--राजसूय यज्ञ की अध्यक्षता के लिए चुना गया सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति; अच्युतः--कृष्ण
हे राजा युधिष्ठिर, तुम्हारे राजसूय यज्ञ उत्सव में मेरे सहित देवता, मुनि तथा साधुओं केअतिरिक्त ब्रह्माजी के चारों पुत्र उपस्थित थे, किन्तु जब यह प्रश्न उठा कि किस व्यक्ति कीसर्वप्रथम पूजा की जाये तो सबों ने परम पुरुष कृष्ण को ही चुना।
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जीवराशिभिराकीर्ण अण्डकोशाड्प्रिपो महान् ।
तन्मूलत्वादच्युतेज्या सर्वजीवात्मतर्पणम् ॥
३६॥
जीव-राशिभि: --करोड़ों जीवों द्वारा; आकीर्ण:--भरा हुआ या विस्तीर्ण; अण्ड-कोश--समग्र ब्रह्माण्ड; अद्धघ्रिप:--वृक्ष केसमान; महान्--अत्यन्त विशाल; तत्-मूलत्वात्--इस वृक्ष की जड़ होने से; अच्युत-इज्या-- भगवान् की पूजा; सर्व--सबों की;जीव-आत्म--जीव; तर्पणम्-तुष्टि |
जीवों से भरा हुआ समग्र ब्रह्माण्ड एक वृक्ष के समान है, जिसकी जड़ भगवान् अच्युत( कृष्ण ) हैं।
इसलिए भगवान् कृष्ण की पूजा करने से समस्त जीवों की पूजा हो सकती है।
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पुराण्यनेन सृष्टानि नृतिर्यगृषिदेवता: ।
शेते जीवेन रूपेण पुरेषु पुरुषो हासौ ॥
३७॥
पुराणि--रहने के स्थान या शरीर; अनेन--उनके ( भगवान् ) द्वारा; सृष्टानि--इन सृष्टियों में; नू--मनुष्य; तिर्यक्--मनुष्यों केअतिरिक्त ( पशु, पक्षी आदि ); ऋषि--साधु पुरुष; देवता:--तथा देवगण; शेते--लेट जाता है; जीवेन--जीवों से; रूपेण --परमात्मा के रूप में; पुरेषु--इन रहने के स्थानों या शरिरों में; पुरुष: --परमे श्वर; हि--निस्सन्देह; असौ--वह ( भगवान् )॥
भगवान् ने अनेक पुर अर्थात् रहने के स्थान बनाये हैं, यथा मनुष्यों के शरीर, पशु, पक्षी,ऋषि तथा देवता।
इन असंख्या-शरीर रूपों में भगवान् परमात्मा रूप में जीव के साथ निवासकरते हैं।
इस प्रकार वे पुरुषावतार कहलाते हैं।
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तेष्वेव भगवान्नाजंस्तारतम्येन वर्तते ।
तस्मात्पात्रं हि पुरुषो यावानात्मा यथेयते ॥
३८॥
तेषु--विभिन्न प्रकार के शरीरों ( देव, मनुष्य, पशु, पक्षी के ) से ); एव--निस्सन्देह; भगवान्--परमात्मा रूप में भगवान्;राजनू--हे राजा; तारतम्येन--अपेक्षतया, कम या ज्यादा; वर्तते--स्थित है; तस्मात्--इसलिये; पात्रमू--परम पुरुष; हि--निस्सन्देह; पुरुष: --परमात्मा; यावान्ू--जहाँ तक; आत्मा--ज्ञान की सीमा; यथा--तपस्या का विकास; ईयते--प्रकट है।
हे राजा युथिष्टिर, प्रत्येक जीव में परमात्मा उसकी समझने की क्षमता के अनुसार बुद्धिप्रदान करता है।
अतएव शरीर के भीतर परमात्मा प्रमुख होता है।
परमात्मा जीव में उसके ज्ञान केसापेक्ष विकास, तपस्या आदि के अनुसार जीव के समक्ष प्रकट होता है।
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इष्ठा तेषां मिथो नृणामवज्ञानात्मतां नूप ।
त्रेतादिषु हरेरर्चा क्रियाये कविभि: कृता ॥
३९॥
इृष्ठा--देखकर; तेषाम्--ब्राह्मणों तथा वैष्णवों में; मिथ: --पारस्परिक; नृणाम्--मानव समाज का; अवज्ञान-आत्मताम्--परस्पर अनादरपूर्ण व्यवहार ( अपमान ); नृष--हे राजा; त्रेता-आदिषु--त्रेतायुग तथा अन्यों में; हरे: -- भगवान् का; अर्चा--देवपूजा ( मन्दिर में ); क्रियायै--पूजाविधि चालू करने के लिए; कविभि:--विद्वान पुरुषों द्वारा; कृता--किया गया।
हे राजनू, जब ऋषियों-मुनियों ने देखा कि त्रेतायुग के प्रारम्भ में ही परस्पर अनादारपूर्णव्यवहार चालू हो गया तो मन्दिर में अर्चाविग्रह की साज-सामग्री सहित पूजा का सूत्रपात हुआ।
"
ततोडर्चायां हरिं केचिस्सं श्रद्धाय सपर्यया ।
उपासत उपास्तापि नार्थदा पुरुषद्विषाम् ॥
४०॥
ततः--तत्पश्चात्; अर्चायामू--अर्चाविग्रह; हरिमू--जो भगवान् है; केचित्--कोई ; संश्रद्धाय-- श्रद्धा सहित; सपर्यया--आवश्यक साज-सामान सहित; उपासते--पूजा करता है; उपास्ता अपि--यद्यपि श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा करते रहने पर भी;न--नहीं; अर्थ-दा--लाभप्रद; पुरुष-द्विषाम्-- भगवान् विष्णु तथा उनके भक्तों से ईर्ष्या करने वालों के लिए।
कभी-कभी नवदीक्षित भक्त भगवान् की पूजा में सारी साज-सामग्री अर्पित करता है औरवह वास्तव में भगवान् की पूजा अर्चाविग्रह के रूप में करता है लेकिन भगवान् विष्णु केअधिकृत भक्तों से ईर्ष्यालु होने के कारण भगवान् उसकी भक्ति से कभी प्रसन्न नहीं होते।
पुरुषेष्वपि राजेन्द्र सुपात्र॑ ब्राह्मणं विदु: ।
"
'पुरुषेष्वपि राजेन्द्र सुपात्रं ब्राह्मणं विदु: ।
तपसा विद्यया तुष्ठया धत्ते वेदं हरेस्तनुम् ॥
४१॥
पुरुषेषु-- पुरुषों में; अपि--निस्सन्देह; राज-इन्द्र--हे नृपश्रेष्ठ; सु-पात्रम्ू-- श्रेष्ठ पुरुष; ब्राह्मणम्--योग्य ब्राह्मण को; विदुः--जानना चाहिए; तपसा--तपस्या से; विद्यया--विद्या से; तुष्ठया--तथा तुष्टि से; धत्ते--धारण करता है; बेदम्ू--वेद नामक दिव्यज्ञान; हरेः-- भगवान् का; तनुमू--शरीर या अभिव्यक्ति
हे राजन, सभी पुरुषों में सुयोग्य ब्राह्मण को इस संसार में सर्वोत्तम मानना चाहिए क्योंकिवह तपस्या, वैदिक अध्ययन तथा संतुष्टि द्वारा भगवान् का प्रतिरूप बन जाता है।
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नन्वस्य ब्राह्मणा राजन्कृष्णस्य जगदात्मन: ।
पुनन्तः पादरजसा त्रिलोकीं दैवतं महत् ॥
४२॥
ननु--लेकिन; अस्य--उसका; ब्राह्मणा: --योग्य ब्राह्मण; राजन्--हे राजा; कृष्णस्य-- भगवान् कृष्ण द्वारा; जगत्-आत्मन:--जो सारी सृष्टि के जीवन तथा आत्मा हैं; पुनन््तः--पवित्र करते हुए; पाद-रजसा--चरणकमलों की धूल से; त्रि-लोकीम््--तीनोंलोक को; दैवतम्--पूज्य; महत्--अत्यन्त महान् |
हे राजा युधिष्ठटिर, ऐसे ब्राह्मण जो विशेषत: पूरे विश्व में भगवान् की महिमा के प्रचार में लगेरहते हैं, सारी सृष्टि के आत्मा भगवान् द्वारा मान्य और पूजित होते हैं।
ब्राह्मण अपने प्रचार द्वारातीनों लोकों को अपने चरणकमलों की धूलि से पवित्र बनाते हैं और इस तरह वे कृष्ण के भीपूज्य हैं।
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