← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 7 की सूची
अध्याय पन्द्रह: सभ्य मनुष्यों के लिए निर्देश
7.15श्रीनारद उवाचकर्मनिष्ठा द्विजा: केचित्तपोनिष्ठा नृपापरे।
स्वाध्यायेउन्ये प्रवचचने केचन ज्ञानयोगयो; ॥
१॥
श्री-नारदः उवाच--नारद मुनि ने कहा; कर्म-निष्ठा:--अनुष्ठानों के प्रति आसक्त ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र होने केअनुसार ); द्वि-जा:--दो बार जन्म लेने वाले ( विशेषतया ब्राह्मण ); केचित्--कुछ; तपः-निष्ठा:--तपस्या में आसक्त; नृप--हेराजा; अपरे--अन्य; स्वाध्याये--वैदिक वाडमय का अध्ययन करने में; अन्ये-- अन्य लोग; प्रवचने--वैदिक वाड्मय पर भाषणदेते हुए; केचन--कुछ; ज्ञान-योगयो:--ज्ञान का अनुशीलन करने तथा भक्तियोग का अभ्यास करने में |
नारद मुनि ने कहा : हे राजन, कुछ ब्राह्मण सकाम कर्मों में अत्यधिक आसक्त रहते हैं, कुछतपस्या में और कुछ वैदिक साहित्य का अध्ययन करने में तो कुछ ( भले ही कम क्यों न हों )ज्ञान का अनुशीलन करते हैं और विभिन्न योगों का, विशेष रूप से भक्ति योग का अभ्यास करतेहैं।
"
ज्ञाननिष्ठाय देयानि कव्यान्यानन्त्यमिच्छता ।
दैवे च तदभावे स्यादितरेभ्यो यथाईहईत: ॥
२॥
ज्ञान-निष्ठाय--निर्विशेषवादी या ब्रह्म में लीन होने के इच्छुक अध्यात्मवादी को; देयानि--दान में दिया जाने वाला; कव्यानि--पितरों को तर्पण में दी गई सामग्री; आनन्त्यम्-- भव बन्धन से मुक्ति; इच्छता--इच्छुक व्यक्ति को; दैवे--देवताओं को दी जानेवाली सामग्री; च--भी; तत्-अभावे --ऐसे प्रगत अध्यात्मवादियों के न रहने पर; स्थात्ू--किया जाय; इतरेभ्य:--अन्यों को(यथा सकाम कर्मियों को ); यथा-अ्हत:--योग्यता अनुसारविवेक सेजो व्यक्ति अपने पितरों या स्वयं की मुक्ति का इच्छुक हो उसे चाहिए कि ऐसे ब्राह्मण कोदान दे जो निर्विशेष-अद्वैतवाद में निष्ठा ( ज्ञान निष्ठा ) रखता हो।
ऐसे उच्च ब्राह्मण के अभाव में,सकाम कर्मों ( कर्मकाण्ड ) में अनुरक्त ब्राह्मण को दान दिया जाय।
"
द्वै दैवे पितृकार्ये त्रीनेकेकमुभयत्र वा ।
भोजयेत्सुसमृद्धोउपि श्राद्धे कुर्यान्न विस्तरम् ॥
३॥
द्वै--दो; दैवे--देवताओं को आहुति देते समय; पितृ-कार्ये-- श्राद्ध कर्म करते समय, जिसमें पितरों को आहुति दी जाती है;त्रीनू-तीन; एक--एक; एकम्--एक; उभयत्र--दोनों अवसरों पर; वा--अथवा; भोजयेत्-- भोजन दे; सु-समृद्धः अपि--भले ही वह अत्यन्त धनी हो; श्राद्धे--पितरों को आहुतियाँ देते समय; कुर्यात्ू--करे; न--नहीं; विस्तरम्--विशद व्यवस्था
मनुष्य को चाहिए कि देवताओं को आहुति देते समय केवल दो ब्राह्मणों को और पितरोंको आहुति देते समय तीन ब्राह्मणों को आमंत्रित करे।
अथवा इन दोनों में केवल एक-एकब्राह्मण काफी होगा।
कोई कितना ही ऐश्वर्यवान क्यों न हो, उसे अधिक ब्राह्मण नहीं आमंत्रितकरने चाहिए या इन अवसरों पर अत्यन्त खर्चीली व्यवस्था नहीं करनी चाहिए।
"
देशकालोचितश्रद्धाद्र॒व्यपात्राईणानि च ।
सम्यग्भवन्ति नैतानि विस्तरात्स्वजनार्पणात् ॥
४॥
देश--स्थान; काल--समय; उचित--उचित; श्रद्धा--आदर; द्र॒व्य--अवयव; पात्र--उपयुक्त व्यक्ति; अर्हणानि--पूजा सामग्री;च--तथा; सम्यक्ू--उचित; भवन्ति--हैं; न--नहीं; एतानि--ये सब; विस्तरातू--विस्तार के कारण; स्व-जन-अर्पणात्--अथवा सम्बन्धियों को आमंत्रित करने से |
यदि कोई श्राद्ध कर्म के समय अनेक ब्राह्मणों या सम्बन्धियों को भोजन कराने कीव्यवस्था करता है, तो काल, देश, श्राद्ध, पदार्थ, पात्र और पूजन विधि में त्रुटियाँ होंगी।
"
देशे काले च सम्प्राप्ते मुन्यन्नं हरिदेवतम् ।
श्रद्धया विधिवत्पात्रे न्यस्तं कामधुगक्षयम् ॥
५॥
देशे--उचित स्थान पर यथा तीर्थस्थान पर; काले--शुभ समय पर; च--भी; सम्प्राप्ते--प्राप्त होने पर; मुनि-अन्नम्ू--घी सेतैयार भोजन जो बड़े-बड़े मुनियों के खाने के योग्य हो; हरि-दैवतम्-- भगवान् हरि को; श्रद्धया--प्रेम तथा स्नेह से; विधि-बत्--गुरु तथा शास्त्रों के आदेशानुसार; पात्रे--उपयुक्त व्यक्ति में; न््यस्तम्ू--अर्पित किया गया; कामधुक्--सम्पन्नता कासाधन बन जाता है; अक्षयम्--अक्षय, अविनाशी |
जब उपयुक्त शुभ अवसर तथा स्थान प्राप्त हो तो मनुष्य को चाहिए कि अत्यन्त प्रेमपूर्वकभगवान् के अर्चाविग्रह को घी में बना भोजन अर्पित करे और फिर उपयुक्त व्यक्ति अर्थात् वैष्णवया ब्राह्मण को प्रसाद दे।
इससे अक्षय समृद्द्धि आएगी।
"
देवर्षिपितृभूते भ्य आत्मने स्वजनाय च ।
अन्न संविभजन्पश्येत्सर्व तत्पुरुषात्मकम् ॥
६॥
देव--देवता; ऋषि--साधु पुरुष; पितृ--पितरगण; भूतेभ्य:--सामान्य जीवों को; आत्मने--सम्बन्धियों; स्व-जनाय--पारिवारिक सदस्यों तथा मित्रों को; च--तथा; अन्नमू-- भोजन ( प्रसाद ); संविभजन्--अर्पित करते हुए; पश्येत्--देखे ;सर्वम्--सबों को; तत्--उस; पुरुष-आत्मकम्-- भगवान् से सम्बन्धित |
मनुष्य को चाहिए कि देवताओं, साधु पुरुषों, अपने पितरों, लोगों, अपने पारिवारिकसदस्यों, अपने सम्बन्धियों तथा मित्रों को भगवान् के भक्तों के रूप में देखते हुए प्रसाद प्रदानकरे।
"
नदद्यादामिषं श्राद्धे न चाद्याद्धर्मतत्त्ववित् ।
मुन्यन्नैः स्यात्परा प्रीतिर्यथा न पशुहिंसया ॥
७॥
न--कभी नहीं; दद्यात्--प्रदान करे; आमिषम्--मांस, मछली, अंडा इत्यादि; श्राद्धे-- श्राद्ध कर्म में; न--न तो; च-- भी;अद्यातू--स्वयं खाए; धर्म-तत्त्व-वित्--धधार्मिक कृत्यों का वास्तविक विद्वान; मुनि-अन्नै:--सन्त पुरुषों के लिए घी से बनायेगये व्यंजनों से; स्थात्ू--हो; परा--उच्चकोटि की; प्रीतिः:--तुष्टि; यथा-- भगवान् तथा पितरों के लिए; न--न; पशु-हिंसया--व्यर्थ ही पशुओं की बलि द्वारा।
धार्मिक सिद्धान्तों से भली-भाँति अवगत मनुष्य को चाहिए कि वह श्राद्ध कर्म में मांस,अंडे या मछली जैसी कोई वस्तु अर्पित न करे और न ही स्वयं भी ऐसी वस्तु खाए, चाहे वहक्षत्रिय ही क्यों न हो।
जब घी से बना उपयुक्त भोजन सन्त जनों को दिया जाता है, तो यह कृत्य पितरों तथा भगवान् को अत्यन्त प्रिय लगता है, क्योंकि वे यज्ञ के नाम पर पशुओं का वध कियेजाने पर कभी प्रसन्न नहीं होते।
"
नैताहशः परो धर्मो नृणां सद्धर्ममिच्छताम् ।
न्यासो दण्डस्य भूतेषु मनोवाक्कायजस्य यः ॥
८॥
न--कभी नहीं; एताहश:ः--इस तरह का; पर:--परम या श्रेष्ठ; धर्म: --धर्म; नृणाम्--मनुष्यों का; सत्-धर्मम्- श्रेष्ठ धर्म;इच्छताम्--के लिए इच्छुक; न्यास:--त्याग कर; दण्डस्य--ईर्ष्या के कारण कष्ट देते हुए; भूतेषु--जीवों में; मन: --मन;वाक्--शब्द; काय-जस्य--तथा शरीर से; यः--जो |
जो लोग श्रेष्ठ धर्म में प्रगति करना चाहते हैं उन्हें सलाह दी जाती है कि वे अन्य जीवों सेशरीर, वाणी या मन सम्बन्धी सारी ईर्ष्या छोड़ दें।
इससे बढ़कर कोई अन्य धर्म नहीं है।
"
एके कर्ममयान्यज्ञान्ज्नानिनो यज्वित्तमा: ।
आत्मसंयमनेनीहा जुह्ृति ज्ञानदीपिते ॥
९॥
एके --कोई-कोई, कुछ; कर्म-मयान्--कर्मफल से युक्त ( यथा पशु-वध ); यज्ञान्ू--यज्ञ; ज्ञानिन:--ज्ञान में अग्रसर लोग;यज्ञ-वित्-तमा:--यज्ञ के उद्देश्य को भलीभाँति जानने वाला; आत्म-संयमने--आत्म संयम द्वारा; अनीहा: --निष्काम; जुह्मति--यज्ञ करता है; ज्ञान-दीपिते--पूर्ण ज्ञान से प्रकाशित |
आध्यात्मिक ज्ञान से जागृत होने से यज्ञ के विषय में बुद्धिमान व्यक्ति, धार्मिक नियमों केवास्तविक ज्ञाता तथा निष्काम व्यक्ति अपने को आध्यात्मिक ज्ञान की अथवा परम सत्य विषयकज्ञान की अग्नि में संयमित बनाते हैं।
वे कर्मकाण्डीय अनुष्ठान विधि को त्याग सकते हैं।
"
द्रव्ययज्ञैर्यक्ष्यमाणं इृष्ठा भूतानि बिभ्यति ।
एष माकरुणो हन्यादतज्ज्ञो हासुतृप्श्रुवम् ॥
१०॥
द्रव्य-यज्जै:--पशुओं तथा अन्य खाद्य वस्तुओं से; यक्ष्यमाणम्--ऐसे यज्ञों में व्यस्त व्यक्ति; दृष्टा--देख कर; भूतानि--जीवों( पशु ) को; बिभ्यति--डर जाता है; एष:--यह व्यक्ति ( यज्ञकर्ता )।
मा--मुझको; अकरुण:--निर्दयी; हन्यात्--मार डालेगा;अ-तत्-ज्ञ:--अत्यन्त अज्ञानी; हि--निस्सन्देह; असु-तृप्--अन्यों को मार कर सन्तुष्ट रहने वाला; श्रुवम्--निश्चय ही |
यज्ञ सम्पन्न करने वाले व्यक्ति को देखकर बलि दिये जाने वाले सारे पशु यह सोचकरअत्यन्त डरे रहते हैं कि 'यह निर्दय यज्ञकर्ता यज्ञ के उद्देश्य से अनजान होने तथा अन्यों का वधकरके परम सनन््तुष्ट होने के कारण हमें निश्चित रूप से मार डालेगा।
"
'तस्माहैवोपपन्नेन मुन्यन्नेनापि धर्मवित् ।
सन्तुष्टोहरहः कुर्यान्नित्यनैमित्तिकी: क्रिया: ॥
११॥
तस्मात्--अतएव; दैव-उपपन्नेन-- भगवत्कृपा से सरलता से प्राप्य; मुनि-अन्नेन--( घी से तैयार तथा भगवान् को अर्पित )भोजन से; अपि--निस्सन्देह; धर्म-वित्--धर्म में बढ़ा-चढ़ा; सन्तुष्ट:--अत्यन्त सुखपूर्वक; अह: अहः--दिन प्रति दिन;कुर्यातू-करे; नित्य-नैमित्तिकी:--नियमित तथा कभी-कभी; क्रिया:--कर्तव्य
अतएव जो वास्तव में धर्म के सिद्धान्तों से अभिज्ञ है और बेचारे पशुओं से अत्यधिक ईर्ष्यानहीं करता उसे दिन-प्रति-दिन प्रसन्नतापूर्वक नैत्यिक तथा किन्हीं विशेष अवसरों पर किये जानेवाले यज्ञों को भगवत्कृपा से जो भी भोजन सरलता से उपलब्ध हो जाये उसी से सम्पन्न करनाचाहिए।
"
विधर्म: परधर्म श्र आभास उपमा छल: ।
अधर्मशाखा: पश्ञेमा धर्मज्ञोउधर्मवत्त्यजेत्ू ॥
१२॥
विधर्म: --अधर्म ; पर-धर्म:--अमन्यों द्वारा अभ्यास किये जाने वाला धर्म; च--तथा; आभास: --दिखावटी धर्म; उपमा--सिद्धान्त जो धार्मिक लगते हैं किन्तु होते नहीं; छल:--ठगने वाला धर्म; अधर्म-शाखा:--जो अधर्म की विभिन्न शाखाएँ हैं;पश्च--पाँच; इमाः--ये; धर्म-ज्ञ:--धर्म को जानने वाला; अधर्म-वत्--उन्हें अधार्मिक के रूप में स्वीकार करते हुए; त्यजेतू--त्याग दे।
अधर्म की पाँच शाखाएँ हैं, जो विधर्म, परधर्म, आभास, उपधर्म तथा छल धर्म के नाम सेउचित रूप में विख्यात हैं।
जो असली धार्मिक जीवन से अवगत हो उसे इन पाँचों को अधर्ममानकर इनका परित्याग कर देना चाहिए।
"
धर्मबाधो विधर्म: स्यात्परधर्मो उन््यचोदित: ।
उपधर्मस्तु पाखण्डो दम्भो वा शब्दभिच्छल: ॥
१३॥
धर्म-बाध:--अपने धर्म को लागू होने से रोकता है; विधर्म:-- धर्म के विरुद्ध; स्थात्--हो; पर-धर्म:--ऐसे धर्म का अनुकरणजिसके लिए वह अनुपयुक्त हो; अन्य-चोदित:--किसी अन्य के द्वारा चालू किया गया; उपधर्म:--मनगढंत धर्म; तु--निस्सन्देह;'पाखण्ड:--जो वेदों के नियमों, प्रामाणिक शास्त्रों के विरुद्ध है; दम्भ:--जो मिथ्या ही गर्वित है; वा--अथवा; शब्द-भित्--शब्द जाल से; छल:--ठगने वाला धर्म ।
जो धार्मिक नियम किसी को अपना धर्म पालन करने से रोकते हैं विधर्म कहलाते हैं।
अन्योंद्वारा चालू किये गये धार्मिक नियम पर-धर्म कहलाते हैं।
जो मिथ्या गर्व करता है और वेदों केनियमों का विरोध करता है उसके द्वारा सृजित नये प्रकार का धर्म उपधर्म कहलाता है।
शब्दजाल द्वारा विवेचना छल धर्म है।
"
यस्त्विच्छया कृतः पुम्भिराभासो हा श्रमात्पृथक् ।
स्वभावविहितो धर्म: कस्य नेष्ट: प्रशान्तये ॥
१४॥
यः--जो; तु--निस्सन्देह; इच्छबया--मनमाने ढंग से; कृत:ः--किया गया; पुम्भि:--मनुष्यों द्वारा; आभास:--धुँधली छाया;हि--निस्सन्देह; आश्रमात्--जीवन के आश्रम से; पृथछ्--भिन्न; स्व-भाव--अपने स्वभाव के अनुसार; विहित:--संयमित;धर्म:--धार्मिक नियम; कस्य--किस बात में; न--नहीं; इष्ट: --समर्थ; प्रशान्तये--सभी प्रकार के कष्ट से छुटकारे के लिए
ऐसी कोई भी बनावटी धार्मिक प्रणाली, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा बनाई गई हो जो जानबूझ करअपने आश्रम के नियत कर्तव्यों की उपेक्षा करता है, आभास कहलाती है।
किन्तु यदि कोईअपने किसी आश्रम विशेष या वर्ण के अनुसार अपने नियत कर्तव्य करता है, तो फिर वे सारेभौतिक कष्टों को भगाने के लिए पर्याप्त क्यों नहीं हैं ?
" धर्मार्थमपि नेहेत यात्रार्थ वाधनो धनम् ।
अनीहानीहमानस्य महाहेरिव वृत्तिदा ॥
१५॥
धर्म-अर्थम्--धर्म तथा आर्थिक विकास में; अपि--निस्सन्देह; न--नहीं; ईहेत--प्राप्त करने का प्रयत्न करे; यात्रा-अर्थम्--एकसाथ शरीर और आत्मा के जीवननिर्वाह के लिए; वा--अथवा; अधन:ः--निर्धन; धनम्-- धन; अनीहा--अनिच्छा;अनीहमानस्य--ऐसे व्यक्ति का, जो अपनी जीविका कमाने के लिए प्रयास नहीं करता; महा-अहे:-- अजगर; इब--सहृश;वृत्ति-दा--जो प्रयास किये बिना जीविका प्राप्त करता है।
निर्धन होकर भी मनुष्य को अपने शरीर-निर्वाह के लिए या विख्यात धर्मज्ञ बनने के लिएअपनी आर्थिक दशा सुधारने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
जिस प्रकार एक अजगर एक हीस्थान पर पड़ा रहकर तथा अपनी जीविका के लिए कोई प्रयास ( चेष्टा ) न करते हुए भी शरीर-निर्वाह के लिए भोजन प्राप्त कर लेता है उसी प्रकार निष्काम व्यक्ति बिना किसी चेष्टा के अपनीजीविका कमा लेता है।
"
सन्तुष्टस्य निरीहस्य स्वात्मारामस्य यत्सुखम् ।
कुतस्तत्कामलोभेन धावतो<र्थेहया दिशः ॥
१६॥
सन्तुष्टस्य--कृष्णभावनामृत से संतुष्ट व्यक्ति का; निरीहस्य--अपनी जीविका के लिए चेष्टा न करने वाले का; स्व--निज;आत्म-आरामस्य--आत्मतुष्ट का; यत्--जो; सुखम्--सुख; कुतः--कहाँ; तत्--ऐसा सुख; काम-लोभेन--विषय तथा लोभसे प्रेरित; धावतः--इधर-उधर दौने वाले का; अर्थ-ईहया-- धन संग्रह करने की इच्छा से; दिशः--सभी दिशाओं में
जो आत्मतुष्ट है और अपने कर्मो को प्रत्येक हृदय में निवास करने वाले भगवान् से जोड़ताहै, वह अपनी जीविका के लिए चेष्टा किये बिना दिव्य सुख भोगता है।
भला उस भौतिकतावादीके लिए ऐसा सुख कहाँ जो विषय तथा लोभ से प्रेरित रहता है और जो धन जोड़ने की इच्छा सेसभी दिशाओं में भागता रहता है?
" सदा सन्तुष्टमनस: सर्वा: शिवमया दिश:ः ।
शर्कराकण्टकादिभ्यो यथोपानत्पदः शिवम् ॥
१७॥
सदा--सदैव; सन्तुष्ट-मनसः--आत्मतुष्ट व्यक्ति के लिए; सर्वा:--हर वस्तु; शिव-मया:--शुभ; दिश:--सभी दिशाओं में;शर्करा--कंकड़ों पत्थरों; कण्टक-आदिभ्य:--तथा काँटा आदि से; यथा--जिस तरह; उपानत्-पदः--ऐसे व्यक्ति के लिए जोपाँवों में जूते पहने हो; शिवम्--कोई भय नहीं है ( शुभ )
जिसके पाँवों में उचित जूते हों उसे कंकड़-पत्थरों तथा काँटों पर चलने में कोई भय नहींलगता।
उसके लिए सभी कुछ कल्याणमय ( शुभ ) है।
इसी प्रकार जो सदैव आत्मतुष्ट रहता हैउसे दुख नहीं सताते; वह सर्वत्र सुख का अनुभव करता है।
"
सन्तुष्ट: केन वा राजन्न वर्तेतापि वारिणा ।
औपस्थ्यजैह्व्यकार्पण्याद्गृहपणालायते जन: ॥
१८॥
सन््तुष्ट:--सदैव आत्मतुष्ट रहने वाला व्यक्ति; केन--क्यों; वा--अथवा; राजन्ू--हे राजा; न--नहीं; वर्तेत--( सुखपूर्वक ) रहनाचाहिए; अपि-- भी; वारिणा-- जल पीकर; औपस्थ्य--विषयेन्द्रियों के कारण; जैह्व्य--तथा जीभ के कारण; कार्पण्यात्--बुरी दशा होने से; गृह-पालायते--घरेलू कुत्ते की तरह बन जाता है; जनः--ऐसा व्यक्ति
हे राजन, आत्मतुष्ट व्यक्ति केवल जल पीकर भी सुखी रह सकता है।
किन्तु जो व्यक्तिइन्द्रियों द्वारा चालित है, विशेष रूप से जो जीभ और जननेन्द्रियों के वश में होता है उसे अपनीइन्द्रियों की तुष्टि के लिए घरेलू कुत्ते का पद स्वीकार करना पड़ता है।
"
असन्तुष्टस्य विप्रस्थ तेजो विद्या तपो यशः ।
स््रवन्तीन्द्रियलौल्येन ज्ञानं चैवावकीर्यते ॥
१९॥
असन्तुष्टस्थ--आत्मतुष्ट न होने वाले; विप्रस्थ--ब्राह्मण का; तेज:--बल; विद्या--शिक्षा; तप:ः--तपस्या; यश:--कीर्ति;स्त्रवन्ति--चुक जाते हैं; इन्द्रिय--इन्द्रियों के; लौल्येन--लालच से; ज्ञानमू--ज्ञान; च--तथा; एब--निश्चय ही; अवकीर्यते--धीरे-धीरे लुप्त हो जाता है।
भक्त या ब्राह्मण जो आत्म-तुष्ट नहीं होता, उसका आध्यात्मिक ज्ञान, विद्या, तपस्या तथाकीर्ति उसकी इन्द्रियलोलुपता के कारण क्षीण हो जाते हैं और उसका ज्ञान शनैः शने: लुप्त होजाता है।
"
कामस्यान्त हि क्षुत्तड्भ्यां क्रोधस्यैतत्फलोदयात् ।
जनो याति न लोभस्य जित्वा भुक्त्वा दिशो भुवः ॥
२०॥
कामस्य--इन्द्रियतृप्ति या शरीर की किसी अविलम्ब आवश्यकता के लिए इच्छा का; अन्तम्--अन्त; हि--निस्सन्देह; क्षुत्-तृड्भ्याम्ू- भूखे या प्यासे के द्वारा; क्रोधस्य--क्रोध का; एतत्--यह; फल-उदयात्--प्रताड़न का उदय होने तथा उसके फल से; जन:ः--मनुष्य; याति--पार कर लेता है; न--नहीं; लोभस्य--लालच का; जित्वा--जीतकर; भुक्त्वा-- भोगकर; दिश:--सारी दिशाएँ; भुवः--भूमण्डल की।
भूख तथा प्यास से पीड़ित मनुष्य की प्रबल शारीरिक इच्छाएँ तथा आवश्यकताएँ भोजनकरने के बाद निश्चित रूप से तुष्ट हो जाती हैं।
इसी प्रकार यदि कोई क्रोध करता है, तो प्रताड़नातथा उसके फल द्वारा क्रोध तुष्ट हो जाता है।
लेकिन जहाँ तक लालच की बात है, यदि लालचीव्यक्ति संसार की सारी दिशाओं को जीत ले या संसार की प्रत्येक वस्तु का भोग कर ले तो भीवह तुष्ट नहीं होगा।
"
पण्डिता बहवो राजन्बहुज्ञा: संशयच्छिद: ।
सदसस्पतयोउप्येके असन्तोषात्पतन्त्यध: ॥
२१॥
'पण्डिता:--पण्डित; बहव:-- अनेक; राजन्--हे राजा ( युथिष्टिर ); बहु-ज्ञाः--अनुभवी व्यक्ति; संशय-च्छिद: --कानूनी सलाहदेने में पटु; सदसः पतय:--विद्वत् सभाओं का सभापति चुने जाने योग्य व्यक्ति; अपि-- भी; एके--एक अवगुण से;असन्तोषात्--केवल असन्तोष या लालसा के कारण; पतन्ति--नीचे गिरते हैं; अध:--जीवन के नरक में।
हे राजा युथ्चिष्ठि, अनेक अनुभवी व्यक्ति, अनेक विधि सलाहकार, अनेक विद्वान तथाविद्वत्सभाओं के सभापति बनने योग्य अनेक व्यक्ति अपने-अपने पदों से सन्तुष्ट न होने के कारणनारकीय जीवन में जा गिरते हैं।
"
असड्डूल्पाज्येत्कामं क्रोधं कामविवर्जनात् ।
अर्थानर्थेक्षया लोभ॑ भयं तत्त्वावमर्शनात् ॥
२२॥
असडजल्पात्ू--संकल्प से; जयेत्--जीते; कामम्--कामेच्छाओं को; क्रोधम्--क्रोध को; काम-विवर्जनात्--इन्द्रिय इच्छा केविषय को त्याग देने से; अर्थ--धन संग्रह; अनर्थ--दुख का कारण; ईक्षया--मानने से; लोभमू--लोभ को; भयम्-- भय को;तत्त्व--सत्य; अवमर्शनात्ू--विचार करने सेदृढ़ता-पूर्वक योजनाएँ बनाकर
मनुष्य को इन्द्रियतृप्ति की कामपूर्ण इच्छाएँ त्याग देनीचाहिए इस प्रकार ईर्ष्या त्यागकर क्रोध पर विजय प्राप्त करनी चाहिए, धन संग्रह करने के दोषों'पर विचार-विमर्श करके लोभ का परित्याग करना चाहिए और सत्य की विवेचना करके भयका त्याग करना चाहिए ।
"
आन्वीक्षिक्या शोकमोहौ दम्भं महदुपासया ।
योगान्तरायान्मौनेन हिंसां कामाद्यनीहया ॥
२३॥
आन्वीक्षिक्या-- भौतिक तथा आध्यात्मिक विषयों में विचार-विमर्श करके; शोक--शोक ; मोहौ--तथा मोह; दम्भम्--मिथ्याअभिमान को; महत्--वैष्णव; उपासया--सेवा द्वारा; योग-अन्तरायान्--योग के मार्ग में अवरोधों पर; मौनेन--मौन से;हिंसाम्--ईर्ष्या; काम-आदि--इन्द्रिय तृप्ति के लिए; अनीहया--बिना चेष्टा के |
आध्यात्मिक ज्ञान के विवेचन से शोक तथा मोह पर विजय प्राप्त की जा सकती है, महान्भक्त की सेवा करके अहंकाररहित बना जा सकता है, मौन रह कर योग मार्ग के अवरोधों सेबचा जा सकता है और इन्द्रियतृष्ति को रोक देने से ही ईर्ष्या पर विजय पाई जा सकती है।
"
कृपया भूतजं दुःखं दैव॑ जह्यात्सममाधिना ।
आत्मजं योगवीर्येण निद्रां सत्त्निषिवया ॥
२४॥
'कृपया--अन्य जीवों पर दयालु होने से; भूत-जम्ू--अन्य जीवों के कारण; दुःखम्--दुख; दैवम्-- भाग्य द्वारा प्रदत्त दुख;जह्यात्-त्याग दे; समाधिना--समाधि या ध्यान द्वारा; आत्म-जम्--शरीर तथा मन के कारण दुख; योग-वीर्येणग--हठयोग,प्राणायाम इत्यादि के अभ्यास से; निद्रामू--नींद को; सत्त्व-निषेबया--सतोगुण या ब्राह्मण-गुणों का विकास करके |
मनुष्य को चाहिए कि अन्य जीवों के कारण होने वाले दुखों का प्रतिकार अच्छे आचरण(सदाचार ) तथा ईर्ष्या से रहित होकर करे, भाग्य द्वारा प्रदत्त कष्टों का सामना समाधि में ध्यानकरके करे और शरीर तथा मन से उत्पन्न दुखों का प्रतिकार हठ योग, प्राणायाम आदि केअभ्यास द्वारा करे।
इसी प्रकार विशेष रूप से सतोगुण का विकास करके खाने के मामले में,निद्रा पर विजय पाई जाये।
"
रजस्तमश्च सत्त्वेन सत्त्वं चोपशमेन च ।
एतसत्सर्व गुरौ भक्त्या पुरुषो हाज्खलसा जयेत् ॥
२५॥
रज: तम:ः--रजो तथा तमो गुण; च--तथा; सत्त्वेन--सतोगुण विकसित करने से; सत्त्वमू--सतोगुण; च--भी; उपशमेन--आसक्ति त्यागने से; च--तथा; एतत्--ये; सर्वम्--सभी; गुरौ--गुरु में; भकत्या--भक्तिपूर्वक सेवा करने से; पुरुष: --पुरुष;हि--निस्सन्देह; अज्लसा--सरलता से; जयेत्--विजय पा सकता है।
मनुष्य को सतोगुण विकसित करके रजोगुण तथा तमोगुण को जीतना चाहिए और तबशुद्ध सत्त के पद तक उठ कर सतोगुण से विरक्त हो लेना चाहिए।
यदि कोई श्रद्धा तथा भक्तिपूर्वक गुरु की सेवा में लगा रहे तो यह सब कुछ स्वतः हो सकता है।
इस प्रकार प्रकृति केगुणों के प्रभाव पर विजय पाई जा सकती है।
"
यस्य साक्षाद्धगवति ज्ञानदीपप्रदे गुरौ ।
मर्त्यासद्धी: श्रुतं तस्य सर्व कुझ्शौचवत् ॥
२६॥
यस्य--जो; साक्षात्-- प्रत्यक्ष; भगवति-- भगवान् में; ज्ञान-दीप-प्रदे--जो ज्ञान रूपी दीप से प्रकाशित करता है; गुरौ--गुरु में;मर्त्य-असत्-धी:--गुरु को सामान्य मनुष्य मानता है और ऐसी प्रतिकूल मनोवृत्ति रखता है; श्रुतम्--वैदिक ज्ञान; तस्थ--उसका; सर्वम्-प्रत्येक वस्तु; कुझ्ओर-शौच-वत्--झील में हाथी के स्नान के समान।
गुरु को साक्षात् भगवान् मानना चाहिए, क्योंकि वह प्रकाश के लिए दिव्य ज्ञान प्रदानकरता है।
फलस्वरूप जो यह भौतिक धारणा रखता है कि गुरु सामान्य मनुष्य होता है उसकेलिए हर वस्तु निराशाजनक रहती है।
उसका प्रकाश, उसका वैदिक अध्ययन तथा ज्ञान झील मेंहाथी के स्नान के समान होता है।
"
एष वै भगवान्साक्षात्प्रधानपुरुषेश्वर: ।
योगेश्वरैविमृग्याड्प्रिलोको यं मन्यते नरम् ॥
२७॥
एषः--यह; वै--निस्सन्देह; भगवान्-- भगवान्; साक्षात्-- प्रत्यक्ष; प्रधान-- प्रकृति के मुख्य कारण; पुरुष--पुरुषावतारभगवान् विष्णु का या समस्त जीवों का; ईश्वर:--परम नियन्ता; योग-ईश्वरै:--बड़े-बड़े साधु पुरुषों या योगियों द्वारा; विमृग्य-अदूप्रि:-- भगवान् कृष्ण के चरणकमल, जिनकी खोज की जाती है; लोक:--सामान्य जन; यम्--उसको; मन्यते--मानते हैं;नरमू--मनुष्य |
भगवान् कृष्ण अन्य समस्त जीवों के तथा भौतिक प्रकृति के स्वामी हैं।
व्यास जैसे महर्षिउनके चरणकमलों की तलाश करते और उन्हें पूजते हैं।
तो भी कुछ ऐसे मूर्ख हैं, जो कृष्ण कोसामान्य मनुष्य मानते हैं।
"
घड्वर्गसंयमैकान्ता: सर्वा नियमचोदना: ।
तदन्ता यदि नो योगानावहेयु: श्रमावहा: ॥
२८॥
घट््-वर्ग--छः तत्त्व, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा छठा मन; संयम-एकान्ता:--इन्द्रिय-दमन का चरम लक्ष्य; सर्वा:--ऐसे सारेकार्यकलाप; नियम-चोदना: --इन्द्रियों तथा मन को वश में करने के लिए अन्य विधान; तत्ू-अन्ता:--ऐसे कार्यकलापों काचरमलक्ष्य; यदि--यदि; नो--नहीं; योगान्ू--ब्रह्म के साथ जुड़ने की कड़ी; आवहेयु:--ले जाती है; श्रम-आवहा:--समयतथा श्रम का अपव्यय।
अनुष्ठान ( कर्मकाण्ड ), विधि-विधान, तपस्या तथा योगाभ्यास--ये सभी इन्द्रियों तथा मनको वश में करने के लिए हैं, किन्तु इन्द्रियों तथा मन को वश में कर लेने के बाद भी यदि वहभगवान् का ध्यान नहीं करता तो ये सारे कार्यकलाप श्रम के अपव्यय मात्र हैं।
"
यथा वार्तादयो हार्था योगस्यार्थ न बिभ्रति ।
अनर्थाय भवेयु: स्म पूर्तमिष्ट तथासतः ॥
२९॥
यथा--जिस प्रकार; वार्ता-आदय: --वृत्तिपरक कर्तव्य आदि कार्यकलाप; हि--निश्चय ही; अर्था:--आय ( ऐसे वृत्तिपरककार्यों से )) योगस्थ--आत्म-साक्षात्कार के लिए योग का; अर्थम्--लाभ; न--नहीं; बिभ्रति-- सहायता करते हैं; अनर्थाय--अर्थहीन ( जन्म-मरण के चक्र में बाँधते हुए ); भवेयु:--वे हैं; स्म--सभी काल में; पूर्तम् इष्टम्--वैदिक कर्मकाण्ड; तथा--उसी तरह; असत:--अभक्त का।
जिस तरह वृत्तिपरक कार्यकलाप या व्यापार के लाभ किसी की आध्यात्मिक उन्नति मेंसहायक नहीं बन सकते, अपितु वे भौतिक बन्धन के कारण बन जाते हैं उसी तरह वैदिककर्मकाण्ड ऐसे किसी व्यक्ति की सहायता नहीं कर सकते जो भगवान् का भक्त नहीं है।
"
यश्वित्तविजये यत्त: स्यान्निःसड़ो परिग्रह: ।
एको विविक्तशरणो भिक्षुभैक्ष्यमिताशन: ॥
३०॥
यः--जो; चित्त-विजये--मन को जीतकर; यत्त:--लगा रहता है; स्थात्--हो; निःसड्भरः--दूषित संगति से रहित; अपरिग्रह:--आश्ित न रहकर ( परिवार पर ); एक:--अकेले; विविक्त-शरण:--एकान्त स्थान की शरण लेकर; भिक्षु:--संन्यासी;भैक्ष्य--केवल शरीर पालन के लिए भीख माँग कर; मित-अशन:--कम खाने वाला।
जो मन पर विजय पाने का इच्छुक हो उसे अपने परिवार का साथ छोड़ते हुए दूषित संगितसे मुक्त एकान्त स्थान में रहना चाहिए।
अपने शरीर-पोषण के लिए उसे उतना ही माँगना चाहिएजितने से जीवन की न्यूनतम आवश्यकताएँ पूरी हो जायूँ।
"
देशे शुच्ौ समे राजन्संस्थाप्यासनमात्मन: ।
स्थिरं सुखं सम॑ तस्मिन्नासीतर्ज्वड़ ओमिति ॥
३१॥
देशे--स्थान पर; शुचौ--अत्यन्त पवित्र; समे--समतल; राजन्--हे राजा; संस्थाप्य--रखकर; आसनमू्-- आसन पर;आत्मन:--स्वयं को; स्थिरम्--अत्यन्त स्थिर; सुखम्--सुखपूर्वक; समम्--समतल; तस्मिनू--उस आसन पर; आसीत--बैठजाये; ऋजु-अड्रः--शरीर को सीधा करके; ३४--वैदिक मंत्र प्रणव; इति--इस प्रकार।
हे राजा, योग सम्पन्न करने के लिए पवित्र तथा पुण्य तीर्थस्थल में किसी एक स्थान कोचुने।
यह स्थान समतल हो--न तो अधिक ऊँचा और न नीचा।
तब वहाँ सुखपूर्वक स्थिर तथासमभाव से बैठकर शरीर को सीधा रखकर वैदिक प्रणव का उच्चारण प्रारम्भ करे।
"
प्राणापानौ सन्निरुन्ध्यात्पूरकुम्भकरेचकै: ।
यावन्मनस्त्यजेत्कामान्स्वनासाग्रनिरीक्षण: ॥
३२॥
यतो यतो निःसरति मन: कामहतं भ्रमत् ।
ततस्तत उपाहत्य हृदि रुन्ध्याच्छनैर्बुध: ॥
३३॥
प्राण-- भीतर जाने वाली श्वास; अपानौ--बाहर निकलने वाली श्वास; सन्निरुन्ध्यात्--रोके रहे; पूर-कुम्भक-रेचकै:-- श्वासभीतर खींचना, बाहर निकालना तथा रोकना, इन तीनों को क्रमशः पूरक, कुम्भक तथा रेचक कहा जाता है; यावत्--जब तक;मनः--मन; त्यजेत्ू--छोड़ दे; कामानू--सारी भौतिक इच्छाएँ; स्व-- अपनी; नास-अग्र--नाक का अग्रभाग; निरीक्षण:--देखना; यतः यतः--जहाँ कहीं से जे कुछ; निःसरति--निकलती है; मनः--मन; काम-हतम्--कामेच्छाओं से पराजित होकर;भ्रमत्ू--घूमते हुए; ततः ततः--यहाँ-वहाँ से; उपाहत्य--वापस लाकर; हृदि--हृदय के भीतर; रुन्ध्यात्ू-रोके ( मन को );शनैः--अभ्यास से, धीरे-धीरे; बुध:--विद्वान योगी |
विद्वान योगी अपनी नाक के अग्रभाग पर निरन्तर दृष्टि लगाकर पूरक, कुम्भक तथा रेचकनामक श्वास लेने के आसन का--अर्थात् वह श्वास भीतर ले जाने, बाहर निकालने और फिरदोनों को रोक देने का--अभ्यास करता है।
इस प्रकार योगी अपने मन को भौतिक आसक्तियोंसे रोकता है और सारी मानसिक इच्छाएँ त्याग देता है।
ज्योंही मन कामेच्छाओं के वशीभूतहोकर इन्द्रियतृप्ति की भावनाओं की ओर हटे त्योंही योगी को उसे तुरन्त वापस लाकर हृदय केभीतर बाँध लेना चाहिए।
"
एवमशभ्यस्यतश्ित्तं कालेनाल्पीयसा यते: ।
अनिश् तस्य निर्वाणं यात्यनिन्धनवह्विवत् ॥
३४॥
एवम्--इस प्रकार से; अभ्यस्यत:--इस योग पद्धति का अभ्यास करने वाले व्यक्ति का; चित्तमू--हृदय; कालेन--कालान्तरमें; अल्पीयसा--तुरन्त ही; यतेः--योगाभ्यासी व्यक्ति का; अनिशम्--बिना रुके, निरन्तर; तस्य--उसका; निर्वाणम्--समस्तकल्मष से शुद्धि; याति--प्राप्त करता है; अनिन्धन--बिना लपट या धुँआ के; वह्िवत्--आग के समान
जब योगी इस तरह नियमित रूप से अभ्यास करता है, तो अल्प काल में उसका हृदय स्थिरहो जाता है और विचलित नहीं होता जिस प्रकार लपट या धूम से रहित अग्नि स्थिर हो जाती है।
"
कामादिभिरनादविद्ध॑ं प्रशान्ताखिलवृत्ति यत् ।
चित्तं ब्रह्मसुखस्पृष्टे नेवोत्तिष्ठत कर्हिचित् ॥
३५॥
काम-आदिभिः:--विभिन्न कामेच्छाओं से; अनाविद्धम्--अप्रभावित; प्रशान्त--शान्त; अखिल-वृत्ति--हर तरह से अथवा सारेकार्यो में; यत्ू--जो; चित्तम्--चेतना; ब्रह्म-सुख-स्पृष्टमू--शाश्रवत आनन्द के दिव्य पद पर स्थित; न--नहीं; एव--निस्सन्देह;उत्तिष्ठत--बाहर आ सकता है; कर्हिचित्ू--किसी समय ।
जब मनुष्य की चेतना भौतिक कामेच्छाओं से अदूषित होती है, तो वह सभी कार्यो में शान्तहो जाती है, क्योंकि मनुष्य नित्य आनन्दमय जीवन को प्राप्त होता है।
एक बार इस पद पर स्थितहो जाने पर मनुष्य फिर भौतिक कार्यकलापों की ओर वापस नहीं जाता।
"
यः प्रव्नज्य गृहात्पूर्व त्रिवर्गावपनात्पुन: ।
यदि सेवेत तान्भिक्षु: स वै वान्ताश्यपत्रप: ॥
३६॥
यः--जो; प्रव्रज्य--वन जाकर ( दिव्य सुख में स्थिर होकर ); गृहात्--घर से; पूर्वम्--सर्वप्रथम; त्रि-वर्ग--धर्म, अर्थ तथाकाम, ये तीन सिद्धान्त; आवपनातू्--बोये गये खेत में से; पुनः --फिर; यदि--यदि; सेवेत--स्वीकार करना चाहिए; तानू--भौतिकतावादी कार्यकलापों को; भिक्षु:--संन्यासी; सः--वह पुरुष; वै--निस्सन्देह; वान्त-आशी--वमन करके खाने वाला;अपत्रप: --लज्जारहित, निर्लज्ज |
जो संन्यास आश्रम स्वीकार करता है, वह धर्म, अर्थ तथा काम इन तीन भौतिकतावादीकार्यकलापों के सिद्धान्तों को छोड़ देता है, जिनमें मनुष्य गृहस्थ जीवन में लिप्त रहता है।
जोव्यक्ति पहले संन्यास स्वीकार करता है, किन्तु बाद में ऐसी भौतिकतावादी क्रियाओं में लौटआता है, वह वान्ताशी अर्थात् अपनी ही वमन को खाने वाला कहलाता है।
निस्सन्देह, वहनिर्लज्न व्यक्ति है।
"
यैः स्वदेहः स्मृतोनात्मा मर्त्यों विट्कृमिभस्मवत् ।
त एनमात्मसात्कृत्वा झएलाघयन्ति हासत्तमा: ॥
३७॥
यैः--जिन संन्यासियों द्वारा; स्व-देह:--अपना शरीर; स्मृतः--मानते हैं; अनात्मा-- आत्मा से भिन्न; मर्त्य:--पमृत्यु से प्रभावित;विट्ू--मल या विष्ठा बन कर; कृमि--कीड़े-मकोड़े; भस्म-वत्--या राख के सहश; ते--ऐसे लोग; एनम्--इस शरीर को;आत्मसात् कृत्वा--फिर से अपने साथ पहचान करके; श्लाघयन्ति--अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कह कर महिमा गाते हैं; हि--निस्सन्देह;असतू-तमाः--सबसे बड़े धूर्त ॥
जो संन््यासी पहले यह समझते हैं कि शरीर मर्त्य है और यह विष्ठा, कृमि या राख में परिणतहो जाएगा किन्तु जो पुनः शरीर को महत्त्व प्रदान करते हैं तथा आत्मा कहकर उसका गुणगानकरते हैं उन्हें सबसे बड़ा धूर्त मानना चाहिए।
"
गृहस्थस्य क्रियात्यागो ब्रतत्यागो वटोरपि ।
तपस्विनो ग्रामसेवा भिक्षोरिन्द्रियलोलता ॥
३८ ॥
आश्रमापसदा होते खल्वाश्रमविडम्बना: ।
देवमायाविमूढांस्तानुपेक्षेतानुकम्पया ॥
३९॥
गृहस्थस्य--गृहस्थ जीवन में स्थित व्यक्ति का; क्रिया-त्याग:--गृहस्थ के कर्तव्य को छोड़ना; ब्रत-त्याग:--ब्रतों तथा तपस्याका त्याग; वटोः--ब्रह्मचारी के लिए; अपि-- भी; तपस्विन:--वानप्रस्थ के लिए, वह जिसने तप युक्त जीवन स्वीकार किया है;ग्राम-सेवा--गाँव में रहकर लोगों की सेवा करना; भिक्षो:-- भीख माँग कर रहने वाले संन््यासी के लिए; इन्द्रिय-लोलता--इन्द्रियभोग में अनुरक्ति; आश्रम--आश्रम का; अपसदा:--अत्यन्त गहित; हि--निस्सन्देह; एते--ये सब; खलु--निस्सन्देह;आश्रम-विडम्बना:--विभिन्न आश्रमों का अनुसरण करते और धोखा देते; देव-माया-विमूढान्ू-- भगवान् की बहिरंगा शक्ति केद्वारा मोहग्रस्तों को; तानू--उन; उपेक्षेत--उपेक्षा करे और प्रमाणित न माने; अनुकम्पया-- अथवा दया द्वारा ( उन्हें असली जीवनकी शिक्षा दे )
गृहस्थ आश्रम में रहने वाले व्यक्ति के लिए विधि-विधानों का परित्याग करना, गुरु केसंरक्षण में रहते हुए ब्रह्मचारी के लिए ब्रह्मचर्य ब्रत का पालन न करना, वानप्रस्थ के लिए गाँवमें रहना और तथाकथित सामाजिक कार्यों में व्यस्त रहना अथवा संन्यासी के लिए इन्द्रियतृप्ति मेंअनुरक्त रहना निन्दनीय हैं।
जो ऐसा करता है, वह अत्यन्त निम्न श्रेणी का माना जाता है।
ऐसादिखावटी व्यक्ति भगवान् की बहिरंगा शक्ति द्वारा मोहग्रस्त रहता है।
मनुष्य को चाहिए कि वहऐसे व्यक्ति को किसी भी पद से निकाल दे या हो सके तो उस पर दया करके उसे शिक्षा देजिससे वह अपने मूल पद पर वापस चला जाए।
"
आत्मानं चेद्विजानीयात्परं ज्ञानधुताशयः ।
किमिच्छन्कस्य वा हेतोर्देहं पुष्णाति लम्पट: ॥
४०॥
आत्मानम्--आत्मा तथा परमात्मा को; चेत्--यदि; विजानीयात्--समझ सकता है; परमू--दिव्य, इस जगत से परे; ज्ञान--ज्ञानसे; धुत-आशय: --जिसने अपनी चेतना विमल कर ली है; किम्--क्या; इच्छन्-- भौतिक सुविधाओं की इच्छा करते हुए;कस्य--किसके लिए; वा--अथवा; हेतो: --किस कारण से; देहम्-- भौतिक शरीर को; पुष्णाति--पालन-पोषण करता है;लम्पट:--अवैध रूप से इन्द्रियतृप्ति में अनुरक्त रहकर।
मनुष्य का शरीर आत्मा तथा परमात्मा को जानने के निमित्त होता है और ये दोनोंआध्यात्मिक पद पर स्थित हैं।
यदि उच्च ज्ञान से परिष्कृत हुए व्यक्ति द्वारा इन दोनों को जाना जासकता है, तो फिर मूर्ख तथा लालची व्यक्ति किसके लिए और किस कारण से इस शरीर कापालन इन्द्रियतृप्ति के लिए करता है ?
" आहुः शरीर रथमिन्द्रियाणिहयानभीषून्मन इन्द्रियेशम् ।
वर्त्मानि मात्रा धिषणां च सूतंसत्त्वं बृहद्वन्धुरमीशसृष्टम् ॥
४१॥
आहुः--कहा गया है; शरीरमू--शरीर को; रथम्--रथ; इन्द्रियाणि--इन्द्रियों को; हयान्ू--घोड़े; अभीषूनू-- लगाम; मन: --मन; इन्द्रिय--इन्द्रियों का; ईशम्--स्वामी; वर्त्मानि--लक्ष्य; मात्रा:--इन्द्रियविषय; धिषणाम्--बुद्धि को; च--तथा; सूतम्--सारथी, रथ हाँकने वाला; सत्त्वम्--चेतना को; बृहत्--महान; बन्धुरम्--बन्धन; ईश--परमे श्वर द्वारा; सृष्टम्ू--रचा गया |
ज्ञान में बढ़े-चढ़े अध्यात्मवादी भगवान् के आदेश से बने शरीर की तुलना रथ से करते हैं;इन्द्रियाँ घोड़ों के तुल्य हैं; इन्द्रियों का स्वामी मन लगाम सहश है, इन्द्रियविषय गन्तव्य हैं, बुद्द्धसारथी है और सारे शरीर में व्याप्त चेतना इस भौतिक जगत के बन्धन का कारण है।
"
अक्ष॑ दशप्राणमधर्म धर्मोअक्रेभिमानं रथिनं च जीवम् ।
धनुर्हि तस्य प्रणवं पठन्तिशरं तु जीवं परमेव लक्ष्यम् ॥
४२॥
अक्षम्--अरा ( रथ के पहिये के ); दश--दस; प्राणम्--शरीर के भीतर प्रवाहित होने वाली दस प्रकार की वायु; अधर्म--अधर्म; धर्मा--तथा धर्म ( पहिए के ऊपरी तथा निचले भाग ); चक्रे--पहिए में; अभिमानम्--मिथ्या पहचान; रथिनम्--रथ कास्वामी या शरीर का स्वामी; च--भी; जीवम्--जीव; धनुः-- धनुष; हि--निस्सन्देह; तस्य--उसका; प्रणबम्--वैदिक ओड्ड्ारमंत्र; पठन्ति--कहा जाता है; शरम्--तीर; तु--लेकिन; जीवमू--जीव; परम्--परमे श्वर; एव--निस्सन्देह; लक्ष्यम्--लक्ष्य |
शरीर के भीतर कार्यशील दस प्रकार की वायुओं की तुलना रथ के पहिए के आरों(तीलियों ) से की गई है और इस पहिए के ऊपरी तथा निचले भाग धर्म तथा अधर्म कहलाते हैं।
देहात्मबुद्धि में रहने वाला जीव रथ का स्वामी है।
वैदिक प्रणव मंत्र ही धनुष है, साक्षात् शुद्धजीव तीर है और परम पुरुष उसका लक्ष्य है।
"
रागो द्वेषश्च लोभश्व शोकमोहौ भयं॑ मदः ।
मानोवमानोसूया च माया हिंसा च मत्सर: ॥
४३॥
रजः प्रमाद: क्षुत्निद्रा शत्रवस्त्वेवमादय: ॥
रजस्तमःप्रकृतयः सत्त्वप्रकृतयः क्वचित् ॥
४४॥
राग:--आसक्ति; द्वेष:--शत्रुता;।
च-- भी; लोभ:--लालच; च-- भी; शोक --सन्ताप; मोहौ--मोह; भयम्-- भय; मद: --'पागलपन; मान:--प्रतिष्ठा; अवमान:-- अपमान; असूया--छिद्रान्वेषण, दूसरों के कार्यों में से दोष ढूँढ़ना; च-- भी; माया--छलावा; हिंसा--ईर्ष्या; च-- भी; मत्सर: --असहिष्णुता; रज: --रजोगुण ( कामेच्छा ); प्रमाद: --मोह; क्षुत्-- भूख; निद्रा--नींद; शत्रवः --शत्रु; तु--निस्सन्देह; एवम् आदय:--जीव की अन्य ऐसी ही धारणाएँ तक; रज:-तम:--रजो तथा तमोगुण;प्रकृतवः--कारण; सत्त्व--सतो गुण से; प्रकृतब:ः--कारण; क्वचित्ू--कभी-कभी |
बद्ध-अवस्था में मनुष्य की जीवन सम्बन्धी धारणाएँ कभी कभी कामेच्छा तथा अज्ञान(रजो तथा तमो गुण ) के कारण दूषित हो जाती हैं, जो आसक्ति, शत्रुता, लोभ, शोक, मोह,भय, मद, झूठी प्रतिष्ठा, अपमान, छिद्रान्वेषण, छलावा, ईर्ष्या, असहिष्णुता, कामेच्छा, मोह,भूख तथा निद्रा के रूप में प्रकट होती हैं।
ये सभी शत्रु हैं।
कभी-कभी सतोगुण के द्वारा भीमनुष्य की धारणाएँ दूषित हो जाती हैं।
"
यावन्नकायरथमात्मवशोपकल्पंधत्ते गरिष्ठतचरणार्चनया निशातम् ।
ज्ञानासिमच्युतबलो दधदस्तशत्रुःस्वानन्दतुष्ट उपशान्त ड्दं विजह्मात् ॥
४५ ॥
यावत्--जब तक; नू-काय--यह मनुष्य शरीर; रथम्ू--रथ रूप; आत्म-वश--अपने नियंत्रण पर आश्रित; उपकल्पम्--जिसमेंअनेक अधीन अंग हैं; धत्ते-- धारण करता है; गरिष्ठ-चरण-- श्रेष्ठ गुरूजनों के चरणकमल; अर्चनया--सेवा करके; निशातम्--तेज की हुई; ज्ञान-असिमू--ज्ञान रूपी तलवार या हथियार; अच्युत-बल:--कृष्ण की दिव्य शक्ति से; दधत्ू--पकड़ कर;अस्त-शत्रु:ः--जब तक शत्रु पराजित न हो जाये; स्व-आनन्द-तुष्ट:--दिव्य आनन्द से पूर्णतया सन्तुष्ट; उपशान्त:--समस्तभौतिक कल्मष से शुद्ध चेतना; इृदम्--इस शरीर को; विजद्यातू-त्याग दे।
जब तक मनुष्य को इस शरीर को इसके विभिन्न अंगों तथा साज-सामान सहित जो पूर्णतयाअपने वषश में नहीं हैं स्वीकार करना है, तब तक उसे अपने श्रेष्ठ जनों--अपने गुरु तथा गुरु केपूर्ववर्तियों व्यक्तियों के चरणकमलों को धारण करना चाहिए।
उनकी कृपा से वह ज्ञान कीतलवार को तेज कर सकता है और भगवत् कृपा के बल पर तब वह उपर्युक्त शत्रुओं कोपराजित कर सकता है।
इस प्रकार भक्त को अपने ही दिव्य आनन्द में लीन रहने में समर्थ होनाचाहिए और तब वह अपना शरीर त्याग कर अपनी आध्यात्मिक पहचान फिर से पा सकता है।
"
नोचेत्प्रमत्तमसदिन्द्रियवाजिसूतानीत्वोत्पथं विषयदस्युषु निश्चिपन्ति ।
ते दस्यव: सहयसूतममुं तमो उन्धेसंसारकूप उसमृत्युभये क्षिपन्ति ॥
४६॥
नोचेत्--यदि हम अच्युत कृष्ण के उपदेशों का पालन नहीं करते तथा बलराम की शरण नहीं ग्रहण करते; प्रमत्तमू--लापरवाह;असत्--जो सदैव भौतिक चेतना की ओर उन्मुख रहती हैं; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; वाजि--घोड़े की तरह कार्य करते हुए; सूता:--रथ हाँकने वाला ( बुद्धि ); नीत्वा--लाकर; उत्पथम्-- भौतिक इच्छा रूपी पथ पर; विषय--इन्द्रिय विषय; दस्युषु--लुटेरों केहाथों में; निक्षिपन्ति--फेंकते हैं; ते--वे; दस्थव:--लुटेरों; स--सहित; हय-सूतम्--घोड़े तथा सारथी को; अमुमू--वे सब;तमः--अंधकार; अन्धे--अंधा; संसार-कूपे--संसार रूपी कुएँ में; उरू--विशाल; मृत्यु-भये--मृत्यु का डर; क्षिपन्ति--फेंकतेहैं।
अन्यथा यदि मनुष्य अच्युत कृष्ण तथा बलदेव की शरण ग्रहण नहीं कर लेता तो इन्द्रियाँरूपी घोड़े तथा बुद्धि रूपी सारथी दोनों ही भौतिक कल्मष के प्रति उन्मुख होने से अनजाने हीशरीर रूपी रथ को इन्द्रियतृप्ति के मार्ग पर ला खड़ा करते हैं।
इस प्रकार जब विषय के धूरत्तों--खाना, सोना तथा मैथुन--के द्वारा वह आकृष्ट होता है, तो घोड़े तथा सारथी संसार के अन्धकूपमें गिरा दिए जाते हैं और मनुष्य पुन: जन्म-मृत्यु की घातक तथा अत्यन्त भयावह स्थिति में आपड़ता है।
"
प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम् ।
आवतते प्रवृत्तेन निवृत्तेनाशनुतेडमृतम् ॥
४७॥
प्रवृत्तर्-- भौतिक भोग के लिए झुकाव; च--तथा; निवृत्तम्ू-- भौतिक भोग का अन्त; च--तथा; द्वि-विधम्--इन दो प्रकारों;कर्म--कर्मों का; वैदिकम्--वेदों द्वारा संस्तुत; आवर्तते--संसार के चक्र में ऊपर-नीचे घूमता है; प्रवृत्तेन-- भौतिककार्यकलापों के भोग की प्रवृत्ति द्वारा; निवृत्तेन--ऐसे कार्यों को बन्द करने से; अश्नुते-- भोग करता है; अमृतम्ू--शा श्रतजीवन।
वेदों के अनुसार प्रवृत्ति तथा निवृत्ति दो प्रकार के कार्यकलाप होते हैं--प्रवृत्ति कार्यो काअर्थ है अपने को भौतिकतावादी जीवन की निम्नतर अवस्था से उच्चतर अवस्था तक उठानाजबकि निवृत्ति का अर्थ है भौतिक इच्छा का अन्त।
प्रवृत्ति कार्यों से मनुष्य भौतिक बन्धन मेंकष्ट उठाता है, किन्तु निवृत्ति कार्यो से वह शुद्ध हो जाता है और नित्य आनन्दमय जीवन कोभोगने के योग्य बनता है।
"
हिंस्त्र॑ द्रव्यमयं काम्यमग्निहोत्राद्मशान्तिदम् ।
दर्शश्न पूर्णमासश्च चातुर्मास्यं पशु: सुतः ॥
४८ ॥
एतदिष्टं प्रवृत्ताख्यं हुत॑ प्रहुतमेव च ।
पूर्त सुरालयारामकूपाजीव्यादिलक्षणम् ॥
४९॥
हिंस्रमू--पशुओं की बलि की पद्धति; द्रव्य-मयम्--जिसमें तमाम साज-सामग्री की आवश्यकता हो; काम्यम्--असीमइच्छाओं से पूरित; अग्नि-होत्र-आदि--अग्नि होम यज्ञ जैसे अनुष्ठान; अशान्ति-दमू--चिन्ता उत्पन्न करने वाले; दर्शः--दर्शनामक अनुष्ठान; च--तथा; पूर्णमास:--पूर्णमास अनुष्ठान; च--भी; चातुर्मास्थम्--चार मास पर होने वाला विधान; पशु:--पशु यज्ञ; सुत:--सोम यज्ञ; एतत्--ये सारे; इष्टम्--लक्ष्य; प्रवृत्त-आख्यम्-- भौतिक आसक्ति नाम से ज्ञात; हुतम्--वैश्व देव,जो भगवान् के अवतार हैं; प्रहुतमू--बलिहरण नाम का उत्सव; एव--निस्सन्देह; च--भी; पूर्तम्--जनता के लाभ के हेतु; सुर-आलय--देवताओं के लिए मन्दिर बनवाना; आराम--विश्रामालय तथा बगीचे; कूप--कुँआ खुदवाना; आजीव्य-आदि--भोजन तथा जल वितरण जैसे कार्य; लक्षणम्--लक्षण |
अग्निहोत्र-यज्ञ, दर्श-यज्ञ, पूर्णमास-यज्ञ, चातुर्मास्य-यज्ञ, पशु-यज्ञ तथा सोम-यज्ञ नामकसारे अनुष्ठानों तथा यज्ञों की विशेषता पशुओं का वध करना तथा अनेक अमूल्य पदार्थों को,विशेष रूप से अन्नों को, जलाना है।
ये सब भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए सम्पन्न किये जातेहैं तथा ये चिन्ता ( अशान्ति ) उत्पन्न करते हैं।
ऐसे यज्ञ करना, वैश्वदेव का पूजन तथा बलिहरणउत्सव सम्पन्न करना जो सभी सम्भवतः जीवन लक्ष्य माने जाते हैं तथा देवताओं के लिए मन्दिरबनवाना, विश्रमागृह तथा बगीचे बनवाना, जल वितरण के लिए कुएँ खुदवाना, भोजन वितरणके लिए केन्द्रों की स्थापना करना तथा जन-कल्याण के कार्य करना--ये सब लक्षण भौतिकइच्छाओं के प्रति आसक्ति से अभिव्यक्त होते है।
"
द्रव्यसूक्ष्मविपाक श्व धूमो रात्रिरपक्षय: ।
अयनं दक्षिणं सोमो दर्श ओषधिवीरुध: ॥
५०॥
अन्नं रेत इति क्ष्मेश पितृयान॑ पुनर्भवः ।
एकैकश्येनानुपूर्व भूत्वा भूत्वेह जायते ॥
५१॥
द्रव्य-सूक्ष्म-विपाक:--अग्नि की आहुति दी जाने वाली सामग्री यथा अन्न तथा घी; च--तथा; धूम:--धुएँ में परिणत या धुएँका अधिष्ठाता देवता; रात्रि:--रात्रि का अधिष्ठाता; अपक्षय:--अंधेरे पाख में; अयनम्--सूर्य के पार करने का अधिष्ठाता देवता;दक्षिणम्--दक्षिणी मंडल में; सोम:--चन्द्रमा; दर्शः--लौटते हुए; ओषधि--पौधे ( पृथ्वी पर ); वीरुध:--सामान्य वनस्पति(शोक का जन्म ); अन्नम्--अन्न; रेत: --वीर्य; इति--इस प्रकार से; क्ष्म-ईश--हे पृथ्वी के राजा, युधिष्ठटिर; पितृ-यानम्--पिताके वीर्य से जन्म ग्रहण करने का मार्ग; पुन:-भव:--फिर-फिर; एक-एकश्येन--एक के बाद एक, क्रमशः; अनुपूर्वम्--क्रमवार, क्रमानुसार; भूत्वा--जन्म लेकर; भूत्वा--पुनः जन्म लेकर; इह--इस भौतिक जगत में; जायते-- भौतिक जीवनबिताता है।
हे राजा युधिष्ठटिर, जब यज्ञ में घी, अन्न (यथा जौ एवं तिल ) की आहुतियाँ दी जाती हैं, तोवे दिव्य धुएँ में परिणत हो जाती हैं, जो मनुष्य को क्रमश: उच्च से उच्चतर लोकों को या धूम,रात्रि, कृष्ण पक्ष, दक्षिणम् तथा अन्त में चन्द्र लोक को ले जाता हैं।
किन्तु यज्ञकर्ता फिर पृथ्वीपर उतर कर औषधियाँ, लताएँ, वनस्पतियाँ तथा अन्न बन जाते हैं।
तब वे विभिन्न जीवों द्वाराखाये जाते हैं और वीर्य में परिणत होते हैं जिसे मादा शरीर में प्रविष्ठ किया जाता है।
इस प्रकारमनुष्य पुन:-पुनः जन्म लेता है।
"
निषेकादिश्मशानान्तै: संस्कार: संस्कृतो द्विज: ।
इन्द्रियेषु क्रियायज्ञान्ल्ञानदीपेषु जुह्डति ॥
५२॥
निषेक-आदि--जीवन का प्रारम्भ ( गर्भाधान संस्कार ); श्मशान-अन्तैः --तथा मृत्यु के समय, जब शरीर को एमशान घाट परजला कर राख कर दिया जाता है; संस्कारैः--संस्कार द्वारा; संस्कृत:ः--शुद्ध किया गया; द्विज:--दो बार जन्म लेने वालाब्राह्मण; इन्द्रियेषु--इन्द्रियों में; क्रिया-यज्ञान्--कर्म तथा यज्ञ ( जिनसे उच्च लोक में जाया जाता है ); ज्ञान-दीपेषु-- असली ज्ञानके प्रकाश से; जुह्ति--अर्पित करता है
द्विज ( द्वि-जन्मा ब्राह्मण ) को गर्भाधान संस्कार के द्वारा अपने माता-पिता की अनुकम्पा सेअपना जीवत्व प्राप्त होता है।
जीवन के अन्त में अन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न की जाती है।
और तबतक अन्य संस्कार भी संपन्न किए जाते हैं।
इस तरह योग्य ब्राह्मण को कुछ समय के बादभौतिकतावादी कार्यों तथा यज्ञों में अरुचि हो जाती है, किन्तु वह ऐन्द्रिय यज्ञों को पूर्ण ज्ञान केसाथ कर्मेन्द्रियों को अर्पित कर देता है, जो ज्ञान की अग्नि से प्रकाशित रहती हैं।
"
इन्द्रियाणि मनस्यूमों वाचि वैकारिक मन: ।
बाचं वर्णसमाम्नाये तमोड्डारे स्वरे न्यसेत् ।
ओड्डारं बिन्दौ नादे तं तं तु प्राणे महत्यमुम् ॥
५३॥
इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ ( कर्म तथा ज्ञान सम्बन्धी ); मनसि--मन में; ऊर्मों --स्वीकृति-अस्वीकृति की तरंगों में; वाचि--शब्दों में;वैकारिकम्--परिवर्तनों से दूषित; मनः--मन को; वाचम्--शब्द को; वर्ण-समाम्नाये--सभी अक्षरों का समूह; तमू--उस;ओड्डरे--ओड्लार के संक्षिप्त रूप में; स्वरे--कम्पन में; न्यसेत्--छोड़ दे; ओड्लारम्--संक्षिप्त शब्द ध्वनि को; बिन्दौ --ओ्लारबिन्दु में; नादे--ध्वनि स्पन्दन में; तमू--उसको; तम्--उस ( नाद ); तु--निस्सन्देह; प्राणे--प्राणवायु में; महति--परम में;अमुम्--जीव।
मन स्वीकृति तथा अस्वीकृति की तरंगों से सदैव विश्षुब्ध होता रहता है।
अतएव इन्द्रियों केसारे कार्यकलाप मन को अर्पित कर देना चाहिए और मन को अपने शब्दों में अर्पित कर देनाचाहिए; फिर इन शब्दों को समस्त वर्णो के समूह में अर्पित करना चाहिए जिसे ओड्ढार केसंक्षिप्त रूप को अर्पित कर दिया जाना चाहिए।
ओड्डार को बिन्दु में, बिन्दु को नाद में और उसनाद को प्राणवायु में समर्पित करना चाहिए।
जो शेष रूप में जीव बचे उसे परम ब्रह्म में स्थापितकरे।
यही यज्ञ की विधि है।
"
अग्नि: सूर्यो दिवा प्राह्मः शुक्लो राकोत्तरं स्वराट् ।
विश्वोथ तैजसः प्राज्ञस्तुर्य आत्मा समन्वयात् ॥
५४॥
अग्निः--अग्नि; सूर्य:--सूर्य; दिवा--दिन; प्राह्मः--संध्या; शुक्ल:--शुक्ल पक्ष; राक--पूर्णमासी; उत्तरमू--वह अवधि जबसूर्य उत्तर दिशा से होकर जाता है; स्व-राट्--परम् ब्रह्म या ब्रह्माजी; विश्व: --स्थूल उपाधि; अथ--ब्रह्मलोक, सर्वोच्च भौतिकआनन्द; तैजस:--सूक्ष्म उपाधि; प्राज्ञ:--कारण रूप उपाधि का साक्षी; तुर्य:--दिव्य; आत्मा--आत्मा; समन्वयात्-- प्राकृतिकपरिणाम के रूप में।
ऊपर जाते हुए जीव अग्नि, सूर्य, दिन, सायं, शुक्ल पक्ष, पूर्ण चन्द्रमा तथा सूर्य के उत्तरदिशा जाने की अवधि ( उत्तरम् ) एवं इनके अधिष्ठाता देवताओं के विभिन्न लोकों में प्रवेशकरता है।
जब वह ब्रह्मलोक में प्रविष्ट होता है, तो वहाँ लाखों वर्षो तक जीवन भोग करने केबाद अन्त में उसकी भौतिक उपाधि समाप्त हो जाती है।
तब वह सूक्ष्म उपाधि प्राप्त करता है,जिससे उसे कारण रूप उपाधि प्राप्त होती है, जो समस्त पूर्ववर्ती अवस्थाओं की साक्षी होती है।
इस अवस्था के विनष्ट होने पर उसे शुद्ध अवस्था प्राप्त होती है, जिसमें वह परमात्मा के साथअपनी पहचान करता है।
इस प्रकार से जीव दिव्य बन जाता है।
"
देवयानमिदं प्राहुर्भूत्वा भूत्वानुपूर्वशः ।
आत्मयाज्युपशान्तात्मा ह्यात्मस्थो न निवर्तते ॥
५५॥
देव-यानम्--देवयान नाम ऊपर उठने की विधि को; इृदम्--इस; प्राहु:--कहा गया है; भूत्वा भूत्वा--बारम्बार जन्म लेकर;अनुपूर्वश:--लगातार; आत्म-याजी--आत्म-साक्षात्कार का इच्छुक; उपशान्त-आत्मा--समस्त भौतिक इच्छाओं से पूर्णतयामुक्त; हि--निस्सन्देह; आत्म-स्थ:--अपने में स्थित; न--नहीं; निवर्तते--लौटता है ।
आत्म-साक्षात्कार तक उठने की यह क्रमिक विधि उन लोगों के लिए है, जो सचमुच परमसत्य से अवगत हैं।
इस देवयान नामक मार्ग पर बारम्बार जन्म लेने से ये क्रमिक अवस्थाएँ प्राप्तहोती हैं।
जो आत्मा में स्थित है और समस्त भौतिक इच्छाओं से पूर्णतया मुक्त है उसे इस बारम्बारजन्म-मृत्यु के मार्ग से गुजरने की आवश्यकता नहीं होती।
"
य एते पितृदेवानामयने वेदनिर्मिते ।
शास्त्रेण चक्षुषा वेद जनस्थोपि न मुह्ाति ॥
५६॥
यः--जो; एते--इस मार्ग पर ( जो ऊपर बताया गया है ); पितृ-देवानामू--पितृयान तथा देवयान नामक; अयने--इस मार्ग पर;वबेद-निर्मिते--वेदों में बताये गये; शास्त्रेण--शास्त्रों के नियमित अध्ययन से; चक्षुषा--जाग्रत आँखों से; वेद--पूर्णतया अवगतहै; जन-स्थः--शरीर में स्थित व्यक्ति; अपि--यद्यपि; न--कभी नहीं; मुह्मोति--मोहग्रस्त होता है।
इस भौतिक शरीर में स्थित रहते हुए भी जो पितृयान तथा देवयान मार्गों से पूर्णतया अवगतरहता है और जिसकी आँखें वैदिक ज्ञान की दृष्टि से इस प्रकार खुली रहती हैं वह भौतिक जगतमें कभी मोहग्रस्त नहीं होता।
"
आदावन्ते जनानां सद्बहिरन्त: परावरम् ।
ज्ञानं ज्ञेयं बचो वाच्यं तमो ज्योतिस्त्वयं स््वयम् ॥
५७॥
आदौ-प्रारम्भ में; अन्ते--अन्त में; जनानामू--सभी जीवों का; सत्--सदैव विद्यमान; बहिः--बाहर; अन्तः-- भीतर से; पर--दिव्य; अवरम्--पदार्थ; ज्ञाम्--ज्ञान; ज्ञेयमू-- लक्ष्य; वच:ः--वाणी, अभिव्यक्ति; वाच्यमू--चरम लक्ष्य; तम:--अँधेरा;ज्योति:-- प्रकाश; तु--निस्सन्देह; अयम्--यह ( भगवान् ); स्वयम्--स्वयं
जो भीतर बाहर, सभी वस्तुओं तथा जीवों के प्रारम्भ तथा अन्त में, भोग्य तथा भोक्ता केरूप में, उच्च तथा नीच के रूप में विद्यमान है, वह परम सत्य है।
वह सदैव ज्ञान तथा ज्ञेय,अभिव्यक्ति तथा अभिज्ञेय, अंधकार तथा प्रकाश के रूप में रहता है।
इस तरह वे परमेश्वर सर्वस्वहैं।
"
आबाधितोपि ह्याभासो यथा वस्तुतया स्मृतः ।
दुर्घटत्वादैन्द्रियकं तद्गदर्थविकल्पितम् ॥
५८ ॥
आबाधित:--अस्वीकृति; अपि--यद्यपि; हि--निश्चय ही; आभास: --प्रतिबिम्ब; यथा--जिस तरह; वस्तुतया--वास्तविकताके रूप में; स्मृत:ः --स्वीकृत; दुर्घटत्वात्ू--वास्तविकता को सिद्ध करना कठिन होने के कारण; ऐन्द्रियकम्--इन्द्रियों से प्राप्तज्ञान; तद्बत्ू--उसी तरह; अर्थ--वास्तविकता; विकल्पितम्--कल्पित या संदेहास्पद
दर्पण से प्राप्त सूर्य के प्रतिबिम्ब को मिथ्या माना जा सकता है, किन्तु इसका वास्तविकअस्तित्व तो होता ही है।
उसी तरह कल्पना (ज्ञान) द्वारा यह सिद्ध करना कि तत्त्व का कोईअस्तित्व नहीं होता अत्यन्त कठिन होगा।
"
क्षित्यादीनामिहार्थानां छाया न कतमापि हि ।
न सद्जातो विकारोपि न पृथड्नान्वितो मृषा ॥
५९॥
क्षिति-आदीनाम्--पृथ्वी आदि पाँच तत्त्वों का; इह--इस संसार में; अर्थानाम्--उन पाँचों तत्त्वों का; छाया--प्रतिबिम्ब; न--नतो; कतमा--इनमें से कौन; अपि--निस्सन्देह; हि--निश्चय ही; न--न तो; सट्जात:-- संयोग; विकार:--रूपान्तर; अपि--यद्यपि; न पृथक्-भिन्न नहीं; न अन्वित:--न तो निहित; मृषा--ये सब सिद्धान्त निरर्थक हैं।
"
इस जगत में पाँच तत्त्व हैं--पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश।
किन्तु शरीर न तोउनका प्रतिबिम्ब है, न उनका संयोग या उनका रूपान्तर।
चूँकि शरीर तथा इसके अवयव न तोपृथक्-पृथक् हैं, न मिश्रित अतएवं ऐसे सारे सिद्धान्त निराधार हैं।
"
धातवोवयवित्वाच्च तन्मात्रावयवैर्विना ।
न स्युर्हासत्यवयविन्यसन्नवयवो उन््तत: ॥
६०॥
धातवः:--पाँचों तत्त्व; अवयवित्वात्ू--देहात्मबुद्धि का कारण होने से; च--तथा; तत्-मात्र--इन्द्रियविषय ( ध्वनि, स्वाद, स्पर्शआदि ); अवयवबै: --अंगों से; विना--रहित; न--नहीं; स्यु:--विद्यमान रह सकता है; हि--निस्सन्देह; असति--मिथ्या, झूठा;अवयविनि--शरीर के निर्माण में; असन्ू--न रहते हुए; अवयव:ः--शरीर का अंग; अन्ततः--अन्त में |
चूँकि शरीर पाँच तत्त्वों से बना है अतएव यह सूक्ष्म इन्द्रियविषयों के बिना अस्तित्व में नहींरह सकता।
चूँकि शरीर मिथ्या है, अतएव इन्द्रियविषय भी स्वभावतः मिथ्या या क्षणिक हैं।
"
स्यात्साइश्यभ्रमस्तावद्विकल्पे सति वस्तुनः ।
जाग्रत्स्वापौ यथा स्वप्ने तथा विधिनिषेधता ॥
६१॥
स्थातू--हो; साहश्य--समानता; भ्रम:--भूल, त्रुटि; तावत्--तब तक; विकल्पे--अलग से; सति--अंश; वस्तुन:ः--वस्तु से;जाग्रतू--जगा हुआ; स्वापौ--सोता हुआ; यथा--जिस तरह; स्वप्ने-- स्वण में; तथा--उसी तरह; विधि-निषेधता-- आदेशोंतथा निषेधों से युक्त विधान |
जब किसी वस्तु को उसके अंशों से पृथक्् कर दिया जाता है, तो उनमें समानता ( साहश्य )मानना भ्रम ( मोह ) कहलाता है।
स्व देखते समय मनुष्य जागने तथा सोने की स्थितिओं मेंअन्तर उत्पन्न कर देता है।
ऐसी मानसिक अवस्था में शास्त्रों के विधानों की, जो आदेशों तथानिषेधों के रूप में होते हैं, संस्तुति की जाती है।
"
भावद्वैतं क्रियाद्वैतं द्रव्याद्वैतं तथात्मन: ।
वर्तयन्स्वानुभूत्येह त्रीन्स्वप्नान्धुनुते मुनि: ॥
६२॥
भाव-अद्वैतम्--देहात्म-बुद्धि में एकत्व; क्रिया-अद्वैतम्--कर्म में एकत्व; द्रव्य-अद्बैतम्--विभिन्न सामग्री में एकत्व; तथा--और; आत्मन:--आत्मा का; वर्तयन्--विचार करते हुए; स्व--अपना; अनुभूत्या--अनुभूति के अनुसार; इह--इस भौतिकजगत में; त्रीन्--तीन; स्वप्नानू--जीवित दशाएँ ( जाग्रत, स्वप्न, सुषुष्ति ); धुनुते--त्याग देता है; मुनिः--दार्शनिक याचिन्तकहा
भाव, क्रिया तथा द्रव्य की अद्बैतता ( एकत्व ) पर विचार करने के बाद तथा आत्मा कोसमस्त कार्य-कारणों से पृथक् मानते हुए मुनि अपनी ही अनुभूति से जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्तिइन तीन अवस्थाओं को त्याग देता है।
"
कार्यकारणवस्त्वैक्यदर्शनं पटतन्तुवत् ।
अक्स्तुत्वाद्विकल्पस्य भावाद्वैतं तदुच्यते ॥
६३॥
कार्य--फल या प्रभाव; कारण--कारण; वस्तु--वस्तु; ऐक्य--एकत्व; दर्शनम्--देखना; पट--वस्त्र; तन्तु--डोरा, सूत;बत्--सदृश; अव्स्तुत्वात्ू--अवास्तविक होने से; विकल्पस्थ--विकल्प का; भाव-अद्वैतम्--एकत्व का भाव; तत् उच्यते--वह कहलाता है।
जब मनुष्य यह समझता है कि फल तथा कारण एक हैं और द्वैत अन्ततः इस विचार कीभाँति अवास्तविक है कि वस्त्र के धागे वस्त्र से भिन्न हैं, तो वह एकत्व के मान को प्राप्त होताहै, जिसे भावाद्वैत कहते हैं।
"
यद्वह्मणि परे साक्षात्सर्वकर्मसमर्पणम् ।
मनोवाक्तनुभिः पार्थ क्रियाद्वैतं तदुच्यते ॥
६४॥
यत्--जो; ब्रह्मणि--परब्रह्म में; परे--दिव्य; साक्षात्- प्रत्यक्ष; सर्व--समस्त; कर्म--कर्म; समर्पणम्--निवेदन, समर्पण;मनः--मन से; वाक्ू--वाणी से; तनुभि:--तथा शरीर से; पार्थ--हे महाराज युधिष्ठिर; क्रिया-अद्वैतम्--कर्म का एकत्व; तत्उच्यते--वह कहलाता है।
हे युधिष्ठिर ( पार्थ ), जब मनुष्य के मन, वाणी तथा शरीर द्वारा किये गये सारे कार्य साक्षात्भगवान् की सेवा में समर्पित किये जाते हैं, तो उसे क्रियाद्वैत नामक कर्मों का एकत्व प्राप्त होताहै।
"
आत्मजायासुतादीनामन्येषां सर्वदेहिनाम् ।
यत्स्ार्थकामयोरैक्यं द्रव्याद्वैतं तदुच्यते ॥
६५॥
आत्म--अपनी; जाया--पली; सुत-आदीनाम्--तथा सनन््तानों का; अन्येषाम्-- अपने सम्बन्धियों का; सर्व-देहिनाम्ू-- समस्तजीवों का; यत्--जो भी; स्व-अर्थ-कामयो:--अपने चरम लक्ष्य तथा लाभ का; ऐक्यम्--एकत्व, अद्ठैत; द्रव्य-अद्दैतम्--स्वार्थ का एकत्व; तत् उच्यते--कहा जाता है।
जब किसी मनुष्य का चरम लक्ष्य अपना तथा अपनी पत्नी का, अपनी सनन््तानों का, अपनेसम्बन्धियों का तथा अन्य समस्त देहधारियों का स्वार्थ एक ही हो तो यह द्रव्याद्वैत कहलाता है।
"
यद्यस्य वानिषिद्धं स्याद्येन यत्र यतो नूप ।
स तेनेहेत कार्याणि नरो नान्यैरनापदि ॥
६६॥
यत्--जो भी; यस्य--मनुष्य का; वा--या तो; अनिषिद्धम्--जिसकी मनाही न हो; स्थात्--ऐसा हो; येन--जिससे; यत्र--स्थान तथा समय में; यत:ः--जिससे; नृप--हे राजा; सः--ऐसा व्यक्ति; तेन--ऐसी विधि से; ईहेत--सम्पन्न करे; कार्याणि--नियत कार्यकलाप; नरः:--मनुष्य; न--नहीं; अन्यै:-- दूसरी विधियों से; अनापदि--संकट की अनुपस्थिति में |
हे राजा युथ्चिष्ठिर, संकट न रहने पर सामान्य परिस्थितियों में मनुष्य को चाहिए कि वह अपनेजीवन-स्तर के अनुसार नियत कार्यकलापों को ऐसी वस्तुओं, प्रयासों तथा विधियों से सम्पन्नकरे तथा ऐसे स्थानों पर निवास करे जो उसके लिए निषिद्ध न हों ।
वह अन्य विधियों काउपयोग न करे।
"
एतैरन्यैश् वेदोक्तेवर्तमान: स्वकर्मभि: ।
गृहेप्यस्य गतिं यायाद्राजंस्तद्धक्तिभाड़नर: ॥
६७॥
एतै:--इन विधियों से; अन्यै:--अन्य विधियों से; च--तथा; वेद-उक्तै:--जैसा वैदिक वाड्मय में निर्देश है; वर्तमान:--पालनकरते हुए; स्व-कर्मभि: --अपने वृत्तिपरक कर्तव्य से; गृहे अपि--घर पर भी; अस्य-- भगवान् कृष्ण के; गतिम्ू--गन्तव्य;यायात्--पहुँच सकता है; राजन्ू--हे राजा; तत्-भक्ति-भाक् -- भगवान् की भक्ति करने वाला; नरः--व्यक्ति |
हे राजा, मनुष्य को अपने वृत्तिपरक कर्तव्य इन निर्देशों तथा बैदिक ग्रन्थों में दिए गये अन्यनिर्देशों के अनुसार सम्पन्न करने चाहिए जिससे वह भगवान् कृष्ण का भक्त बना रहे।
इस प्रकारघर पर रहकर भी मनुष्य अपने गन्तव्य तक पहुँच सकता है।
"
यथा हि यूय॑ नृपदेव दुस्त्यजा-दापद्गणादुत्तरतात्मन: प्रभो: ।
यत्पादपड्जेरूहसेवया भवा-नहारषीन्निर्जितदिग्गज: क्रतूनू ॥
६८॥
यथा--जिस तरह; हि--निस्सन्देह; यूयम्--तुम सभी ( पाण्डव ); नृप-देव--हे राजाओं, मनुष्यों तथा देवताओं के स्वामी;दुस्त्वजात्ू--अजेय; आपत्--सड्डूटपूर्ण स्थितियाँ; गणात्--सबों से; उत्तरत--बच निकले; आत्मन:--अपना; प्रभो:-- भगवान्का; यत्-पाद-पड्लेरू-- जिनके चरणकमल; सेवया--सेवा करने से; भवान्--आपने; अहारषीत्--सम्पन्न किया; निर्जित--हराकर; दिक्ू-गज:--हाथियों जैसे अत्यन्त शक्तिशाली शत्रु; क्रतून्ू-- अनुष्ठान |
हे राजा युथिष्ठिर, तुम सभी पाण्डवों ने परमेश्वर की सेवा के कारण अनेक राजाओं तथादेवताओं द्वारा उत्पन्न बड़े से बड़े संकटों पर विजय प्राप्त कर ली।
तुमने कृष्ण के चरणकमलोंकी सेवा करके हाथियों के समान बड़े-बड़े शत्रुओं को जीत लिया है और अपने यज्ञ के लिएसामग्री एकत्र की है।
भगवत्कृपा से तुम भव-बन्धन से छूट जाओगे।
"
अहं पुराभवं कश्चिद्गन्धर्व उपबहण: ।
नाम्नातीते महाकल्पे गन्धर्वाणां सुसम्मतः ॥
६९॥
अहम्-ैं; पुरा--पूर्वजन्म में; अभवम्-- था; कश्ित् गन्धर्व:--गर्न्धलोक के निवासी के रूप में; उपबर्हण:--उपबर्हण;नाम्ना--नाम से; अतीते--बहुत काल पूर्व; महा-कल्पे--ब्रह्म के जीवन में जो महाकल्प कहलाता है; गन्धर्वाणाम्-गन्धर्वोंमें; सु-सम्मतः --अत्यन्त सम्मानित व्यक्ति |
बहुत समय पूर्व, एक अन्य महाकल्प ( ब्रह्मा का युग ) में मैं उपबहण नामक गन्धर्व के रूपमें था।
अन्य गन्धर्वों में मेरा अत्यधिक सम्मान था।
"
रूपपेशलमाधुर्यसौगन्ध्यप्रियदर्शन: ।
स्त्रीणां प्रियतमो नित्य मत्त: स्वपुरलम्पट: ॥
७०॥
रूप--सौन्दर्य; पेशल--शरीर की बनावट; माधुर्य--आकर्षण; सौगन्ध्य--फूलों की मालाओं तथा चन्दन लेप से अलंकृत होनेसे अत्यन्त सुगन्धित; प्रिय-दर्शन:--देखने में अत्यन्त सुन्दर; स्त्रीणाम्--स्त्रियों का; प्रिय-तम:--सहज भाव से आकृष्ट;नित्यमू-- प्रतिदिन; मत्त:--पागल की तरह गर्वित; स्व-पुर--अपने शहर में; लम्पट: --कामेच्छा के कारण स्त्रियों के प्रतिअत्यधिक आसक्त।
मेरा मुखमण्डल सुन्दर था और मेरी शारीरिक रचना आकर्षक तथा सुहावनी थी।
फूल केहारों से तथा चन्दन लेप से अलंकृत होने से मैं अपने नगर की स्त्रियों को अत्यन्त मोहक लगताथा।
इस तरह मैं मोहग्रस्त था और विषय-वासनाओं से सदैव पूर्ण रहता था।
"
एकदा देवसत्रे तु गन्धर्वाप्सरसां गणा: ।
उपहूता विश्वसृग्भिहरिगाथोपगायने ॥
७१॥
एकदा--एक बार; देव-सत्रे--देवताओं की सभा में; तु--निस्सन्देह; गन्धर्व--गन्धर्व लोक के वासी; अप्सरसाम्--तथाअप्सरलोक के वासियों के; गणा:--सभी; उपहूता:--बुलाये गये थे; विश्व-सृग्भि:--प्रजापति नामक बड़े-बड़े देवताओं द्वारा;हरि-गाथ-उपगायने -- भगवान् की महिमा गायन के कीर्तन के समय ।
एक बार देवताओं की सभा में भगवान् की महिमा के गायन के लिए एक संकीर्तन कियागया जिसमें गन्धर्वों तथा अप्सराओं को भाग लेने के लिए प्रजापतियों ने आमंत्रित किया।
"
अहं च गायंस्तद्विद्वान्स्नीभि: परिवृतो गतः ।
ज्ञात्वा विश्वसृजस्तन्मे हेलनं शेपुरोजसा ।
याहि त्वं शूद्रतामाशु नष्टश्री: कृतहेलनः ॥
७२॥
अहम्--मैं; च--तथा; गायन्-- भगवान् की महिमा का गायन न करके अन्य देवताओं का गायन करते हुए; ततू-विद्वानू-- गानेकी कला में निपुण; स्त्रीभि:--स्त्रियों द्वारा; परिवृत:--घिरा हुआ; गत:ः--वहाँ गया; ज्ञात्वा--अच्छी तरह जानते हुए; विश्व-सृज:ः--प्रजापति, जिन्हें ब्रह्माण्ड की व्यवस्था सौंपी गई है; तत्--मेंरे गायन की प्रवृत्ति; मे--मेरी; हेलनम्--उपेक्षा; शेपु: --शाप दे दिया; ओजसा--बड़े वेग से; याहि--बन जाओ; त्वमू--तुम; शूद्रतामू-शूद्र; आशु--शीघ्र; नष्ट--रहित; श्री: --सौन्दर्य; कृत-हेलनः--शिष्टाचार भंग करने के कारण
नारद मुनि ने आगे कहा : उत्सव में बुलाये जाने पर मैं भी वहां गया।
स्त्रियों से घिर कर मैंनेदेवताओं की महिमा का संगीतात्मक गायन प्रारम्भ किया।
इसके कारण प्रजापितयों ने मुझे इनशब्दों में बलात् शाप दे डाला 'चूँकि तुमने अपराध किया है अतएव तुम तुरन्त सौन्दर्य से विहीनशूद्र बन जाओ।
"
तावह्दास्यामहं जज्ञे तत्रापि ब्रह्मवादिनाम् ।
शुश्रूषयानुषड्जेण प्राप्तोहं ब्रह्मपुत्रताम्ू ॥
७३॥
तावत्--शाप दिये जाने के समय से; दास्याम्--दासी के गर्भ में; अहम्ू--मैंने; जज्ञे--जन्म लिया; तत्रापि--यद्यपि ( शूद्रहोकर ); ब्रह्म-बादिनाम्--वैदिक ज्ञान में पारंगत लोगों की; शुश्रूषया--सेवा करके; अनुषड़ेण--एक ही समय; प्राप्त:--प्राप्तकिया; अहमू--मैंने; ब्रह्म-पुत्रताम्--ब्रह्मा के पुत्र के रूप में जन्म ( इस जन्म में )
यद्यपि मैंने एक दासी के गर्भ से शूद्र के रूप में जन्म लिया किन्तु मैं वैदिक ज्ञान में पारंगतवैष्णवों की सेवा में लग गया।
फलस्वरूप इस जीवन में मुझे ब्रह्माजी के पुत्र रूप में जन्म लेनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ।
"
धर्मस्ते गृहमेधीयो वर्णित: पापनाशनः ।
गृहस्थो येन पदवीमझ्जसा न््यासिनामियात् ॥
७४॥
धर्म:--वह धार्मिक विधि; ते--तुम्हें; गृह-मेधीय:--गृहस्थ जीवन में अनुरक्त रहकर; वर्णित:--( जैसा मैंने ) बताया; पाप-नाशन:--पापकर्मों का विनाश; गृहस्थ: --गृहस्थ जीवन बिताने वाला; येन--जिससे; पदवीम्--पद; अज्ञसा--सरलता से;न्यासिनाम्ू--संन्यासियों का; इयात्--प्राप्त कर सकता है।
भगवान् के पवित्र नाम का संकीर्तन इतना शक्तिशाली है कि इससे गृहस्थ भी उसी चरम'फल को सरलता से प्राप्त कर लेते हैं, जो संन्यासियों को प्राप्त होता है।
हे महाराज युधिष्टिर, मैंनेतुम्हें धर्म की वह विधि बतला दी है।
यूयं नूलोके बत भूरिभागालोकं पुनाना मुनयोउभियन्ति ।
येषां गृहानावसतीति साक्षाद्गूढं परं ब्रह्म मनुष्यलिड्रमू ॥
७५॥
यूयम्--तुम सभी पाण्डव; नृ-लोके--इस जगत में; बत--निस्सन्देह; भूरि-भागा: --अत्यन्त भाग्यशाली; लोकम्-ब्रह्माण्ड केसारे लोक; पुनाना:--शुद्ध कर सकते हो; मुनय:--बड़े-बड़े साधु पुरुष; अभियन्ति--( सामान्य पुरुष की भाँति ) देखने आतेहैं; येघामू--जिसके ; गृहान्ू--पाण्डवों के घर को; आवसति--रहता है; इति--इस प्रकार; साक्षात्- प्रत्यक्ष; गूढम्-- अत्यन्तगोपनीय; परम्--दिव्य; ब्रह्म--परब्रह्म, कृष्ण; मनुष्य-लिड्रम्--मानो सामान्य व्यक्ति हों।
हे महाराज युथ्रिष्ठिर, तुम सभी पाण्डव इस संसार में इतने भाग्यशाली हो कि ब्रह्माण्ड केसमस्त लोकों को पवित्र करने वाले अनेकानेक सन्तजन तुम्हारे घर में सामान्य दर्शक के रूप मेंआते हैं।
साथ ही, भगवान् कृष्ण तुम्हारे घर में गोपनीय ढंग से तुम्हारे भाई के समान रह रहे हैं।
"
स वा अयं ब्रह्म महद्विमृग्यकैवल्यनिर्वाणसुखानुभूति: ।
प्रिय: सुहृद्द: खलु मातुलेयआत्माईणीयो विधिकृद्गुरुश्च ॥
७६॥
सः--भगवान्; वा--या तो; अयम्--कृष्ण; ब्रह्म--परब्रह्म ; महत्-विमृग्य--बड़े-बड़े सन्त पुरुष ( कृष्ण भक्त ) द्वारा खोजेजाने वाले; कैवल्य-निर्वाण-सुख--मोक्ष तथा दिव्य आनन्द के; अनुभूतिः--साक्षात्कार के लिए; प्रिय:--प्रिय; सुहत्ू--शुभचिन्तक; वः--तुम सारे पाण्डवों; खलु--के रूप में प्रसिद्ध; मातुलेय:--मामा का पुत्र, ममेरा भाई; आत्मा--हृदय तथा आत्मा;अर्हणीय:--अत्यन्त पूजनीय; विधि-कृत्--निर्देश देते; गुरु:--तुम्हारा गुरु; च--और।
यह कितना आश्चर्यजनक है कि वे परब्रह्म कृष्ण जिन्हें बड़े-बड़े मुनि अपनी मुक्ति तथाशाश्वत आनन्द प्राप्ति के लिए ढूँढते रहते हैं तुम्हारे श्रेष्ठ शुभचिन्तक, मित्र, ममेरे भाई, आत्मा,पूज्य निर्देशक तथा गुरु की भाँति कार्य कर रहे हैं।
"
न यस्य साक्षाद्धवपद्यजादिभीरूप॑ धिया वस्तुतयोपवर्णितम् ।
मौनेन भक्त्योपशमेन पूजितःप्रसीदतामेष स सात्वतां पति: ॥
७७॥
न--नहीं; यस्य--जिसका ( श्रीकृष्ण का ); साक्षात्--प्रत्यक्ष; भव--शिवजी; पद्य-ज-आदिभि:--ब्रह्मा आदि के द्वारा;रूपमू--रूप को; धिया--ध्यान से; वस्तुतया--वस्तुत:ः ; उपवर्णितम्--बताया जा सकता है; मौनेन--मौन से; भक्त्या-- भक्तिसे; उपशमेन--सारे भौतिक कार्यकलापों को पूरा करके; पूजित:--जिनकी इस तरह पूजा की जाती है; प्रसीदताम्--हम परप्रसन्न हों; एषच:--यह; सः--वही भगवान्; सात्वताम्-- भक्तों का; पति:--पालक, स्वामी तथा मार्गदर्शक |
यहाँ अब वही भगवान् उपस्थित हैं जिनका असली रूप ब्रह्मा तथा शिव जी जैसे महापुरुषोंकी भी समझ में नहीं आता।
उनके भक्त अपने निष्ठापूर्ण आत्मसमर्पण द्वारा उनका साक्षात्कारकरते हैं।
ऐसे भगवान् जो अपने भक्तों के पालनकर्ता हैं और जिनकी पूजा मौन, भक्ति तथाउपश्म द्वारा की जाती है हम पर प्रसन्न हों।
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श्रीशुक उबाचइति देवर्षिणा प्रोक्ते निशम्य भरतर्षभ: ।
'पूजयामास सुप्रीत: कृष्णं च प्रेमविहल: ॥
७८ ॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; देव-ऋषिणा--देवर्षि ( नारद ) द्वारा; प्रोक्तम्--वर्णित;निशम्य--सुनकर; भरत-ऋषभ: -- भरत महाराज के श्रेष्ठ वंशज, महाराज युधिष्ठटिर; पूजयाम् आस--पूजा की; सु-प्रीत:--अत्यधिक प्रसन्न होकर; कृष्णम्--कृष्ण की; च-- भी; प्रेम-विह्लः--कृष्ण के प्रेम में विभोर।
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : श्रेष्ठ भरतवंशी युधिष्ठिर ने नारद मुनि के वर्णन से सब कुछजान लिया।
इन उपदेशों को सुनने के बाद उन्हें अपने हृदय में अत्यन्त आनन्द का अनुभव हुआऔर उन्होंने अत्यन्त प्रेमविह्लल होकर भगवान् कृष्ण की पूजा की।
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कृष्णपार्थावुपामन्त्रय पूजित: प्रययौ मुनि: ।
श्र॒त्वा कृष्णं परं ब्रह्म पार्थ: परमविस्मित: ॥
७९॥
कृष्ण--कृष्ण; पार्थी --तथा महाराज युथिष्टिर; उपामत्य--विदा होकर; पूजित:--उनके द्वारा पूजित होकर; प्रययौ--चले गये;मुनि:--नारद मुनि; श्रुत्वा--सुनकर; कृष्णम्--कृष्ण के विषय में; परम् ब्रह्म-- भगवान् के रूप में; पार्थ:--महाराज युधिष्ठिर;'परम-विस्मित:--अत्यधिक चकित ।
कृष्ण तथा महाराज युधिष्टिर द्वारा पूजे जाकर नारद मुनि उनसे विदा लेकर चले गये।
युधिष्ठिर महाराज अपने ममेरे भाई कृष्ण को भगवान् के रूप में सुनकर अत्यधिक चकित हुए।
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इति दाक्षायणीनां ते पृथग्वंशा: प्रकीर्तिता: ।
देवासुरमनुष्याद्या लोका यत्र चराचरा: ॥
८०॥
इति--इस प्रकार; दाक्षायणीनामू--महाराज दक्ष की कन्याओं के, जैसे अदिति तथा दिति; ते--तुम्हारा; पृथक्-- अलग;वंशा:--वंश; प्रकीर्तिता:--( मेरे द्वारा ) वर्णित किये गये; देब--देवता; असुर--असुरगण; मनुष्य--मनुष्य; आद्या: --इत्यादि;लोकाः--इस ब्रह्माण्ड के सारे लोक; यत्र--जिसमें ; चर-अचरा: -- जड़ तथा चेतन प्राणी |
इस ब्रह्माण्ड के भीतर समस्त लोकों में सारे जड़ तथा चेतन प्राणी जिनमें देवता, असुर तथामनुष्य सम्मिलित हैं महाराज दक्ष की पुत्रियों से उत्पन्न हुए।
इस तरह मैंने उन सबों का तथा उनकेविभिन्न वंशों का वर्णन कर दिया है।
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