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अध्याय दो: हिरण्यकशिपु, राक्षसों का राजा
7.2श्रीनारद उवाचभ्रायेंवं विनिहते हरिणा क्रोडमूर्तिना ।
हिरण्यकशिपपूराजन्पर्यतप्यद्रुषा शुच्चा ॥
१॥
श्री-नारद: उबाच-- श्री नारद मुनि ने कहा; भ्रातरि--जब उसका भाई ( हिरण्याक्ष ); एवम्--इस प्रकार; विनिहते--मार डालागया; हरिणा--हरि द्वारा; क्रोड-मूर्तिना--वराह के रूप में; हिरण्यकशिपु:--हिरण्यकशिपु ने; राजन्--हे राजा; पर्यतप्यत्--पीड़ित; रुषा--क्रोध से; शुच्चा--शोक से |
श्री नारद मुनि ने कहा : हे राजा युधिष्ठिर, जब भगवान् विष्णु ने वराह रूप धारण करकेहिरण्याक्ष को मार डाला, तो हिरण्याक्ष का भाई हिरण्यकशिपु अत्यधिक क्रुद्ध हुआ औरविलाप करने लगा।
"
आह चेदं रुषा पूर्ण: सन्दष्टदशनच्छद: ।
कोपोज्वलद॒भ्यां चक्षुर्भ्या निरीक्षन्धूप्रमम्बरम् ॥
२॥
आह--कहा; च--तथा; इदम्ू--यह; रुषा--क्रो ध; पूर्ण:-- भरा हुआ; सन्दष्ट--काट दिया गया; दशन-छद: --जिसके होठ;कोप-उज्वलद्भ्याम्ू-क्रोध से जलता हुआ; चश्षुभभ्याम्-आँखों से; निरीक्षन्--देखते हुए; धूप्रमू-- धूमिल; अम्बरम्--आकाश को।
क्रोध से भरकर तथा अपने होठ काटते हुए हिरण्यकशिपु ने क्रोध से जलती हुई आँखों सेआकाश को देखा तो वह सारा आकाश धूमिल हो गया।
इस प्रकार वह बोलने लगा।
"
करालदूंष्टोग्रदृष्टया दुष्प्रेक्ष्यश्रुकुटीमुख: ।
शूलमुद्यम्य सदसि दानवानिदमब्रवीत् ॥
३॥
'कराल-दंष्ट-- भयानक दाँतों से; उग्र-दृष्य्या--तथा भयानक दृष्टि से; दुष्प्रेक्ष्--देखने में भयावह; भ्रु-कुटी--रोषपूर्ण भौहों से;मुखः--जिसका मुँह; शूलम्-त्रिशूल को; उद्यम्य--उठाते हुए; सदसि--सभा में; दानवान्-- असुरों से; इदम्--यह;अब्रवीत्ू-कहा |
अपने भयानक दाँत, उग्र दृष्टि तथा रोषपूर्ण भौहों को दिखाते हुए, देखने में भयानक उसनेअपना त्रिशूल धारण किया और अपने एकत्र असुर संगियों से इस प्रकार कहा।
"
भो भो दानवदैतेया द्विमूर्धस्त्यक्ष शम्बर ।
शतबाहो हयग्रीव नमुचे पाक इल्बल ॥
४॥
विप्रचित्ते मम वच: पुलोमन्शकुनादय:ः ।
श्रुणुतानन्तरं सर्वे क्रियतामाशु मा चिरम् ॥
५॥
भो:--अरे; भोः--अरे; दानव-दैतेया: --दानवों तथा दैत्यों; द्वि-मूर्थन्ू-द्विमूर्थ ( दो सिर वाला ); त्रि-अक्ष--त्रयक्ष ( तीन नेत्रोंवाला ); शम्बर--शम्बर; शत-बाहो--शतबाहु ( सौ भुजाओं वाला ); हयग्रीव--हयग्रीव ( घोड़ेका सिर वाला ); नमुचे--नमुचि; पाक--पाक; इल्वल--इल्वल; विप्रचित्ते --विप्रचित्ति; मम--मेरे; वच:--शब्द; पुलोमन्--पुलोम; शकुन--शकुन;आदयः--इत्यादि; श्रुणुत--सुनो तो; अनन्तरम्-तत्पश्चात्; सर्वे--सभी; क्रियताम्ू--किया जाये; आशु--शीघ्र; मा--मत;चिरम्--देर करो |
ओरे दानवो और दैत्यो, ओरे द्विमूर्थ, त्यक्ष, शम्बर तथा शतबाहु, ओरे हयग्रीव, नमुचि, पाकतथा इल्वल, आरे विप्रचित्ति, पुलोमन, शकुन तथा अन्य असुरों, तुम सब जरा मेरी बात कोध्यानपूर्वक सुनो और तब अविलम्ब मेरे बचनों के अनुसार कार्य करो।
"
सपलैर्घातित: क्षुद्रैश्नांता मे दयितः सुहृत् ।
पार्णिणग्राहेण हरिणा समेनाप्युपधावनै: ॥
६॥
सपत्नैः:--शत्रुओं * द्वारा; घातित:--मारा गया; क्षुद्रै:--शक्ति में नगण्य; भ्राता-- भाई; मे--मेरा; दयित:--अत्यन्त प्रिय;सुहत--शुभेच्छु; पार्णिणि-ग्राहेण-- पीछे से आक्रमण करके; हरिणा-- भगवान् द्वारा; समेन--समान, ( देवता तथा असुर दोनों );अपि--यद्यपि; उपधावनै:ः--पूजकों या देवताओं द्वारा |
मेरे क्षुद्र शत्रु सारे देवता मेरे परम प्रिय तथा आज्ञाकारी शुभेच्छु भ्राता हिरण्याक्ष को मारने केलिए एक हो गये हैं।
यद्यपि परमेश्वर विष्णु हम दोनों के लिए अर्थात् देवताओं तथा असुरों केलिए सदैव समान हैं किन्तु इस बार देवताओं द्वारा अत्यधिक पूजित होने से उन्होंने उनका पक्षलिया और हिरण्याक्ष को मारने में उनकी सहायता की।
"
तस्य त्यक्तस्वभावस्य घृणेमायावनौकसः ।
भजन्तं भजमानस्य बालस्येवास्थिरात्मनः ॥
७॥
मच्छूलभिन्नग्रीवस्य भूरिणा रुधिरेण वै ।
असृविप्रियं तर्पयिष्ये भ्रातरं मे गतव्यथ: ॥
८॥
तस्यथ--उसका ( भगवान् का ); त्यक्त-स्वभावस्य-- अपने स्वभाव ( समदर्शिता ) को जिसने त्याग दिया है; घृणेः--अत्यन्तगर्हित; माया-- भ्रामक शक्ति के प्रभाव से; बन-ओकसः:--जंगल में पशु के समान आचरण करते हुए; भजन्तम्--भक्ति में लगेभक्त को; भजमानस्थ--पूजित होकर; बालस्य-- लड़के के; इब--सहृश; अस्थिर-आत्मन:--सदैव अशान्त तथा परिवर्तित होनेवाला; मत्--मेरा; शूल--ब्रिशूल से; भिन्न-- अलग किया गया, छिन्न; ग्रीवस्थ--जिसकी गर्दन; भूरिणा--अत्यधिक;रुधिरिण--रक्त से; बै--निस्सन्देह; असृक्-प्रियम्--रक्त का प्यासा; तर्पयिष्ये-- प्रसन्न करूँगा; भ्रातरमू-- भाई को; मे--अपने;गत-व्यथ:--अपने को शान्त बनाकर।
भगवान् ने असुरों तथा देवताओं के प्रति समानता की अपनी सहज प्रवृत्ति त्याग दी है।
यद्यपि वे परम पुरुष हैं, किन्तु अब माया के वशीभूत होकर उन्होंने अपने भक्तों अर्थात् देवताओंको प्रसन्न करने के लिए वराह का रूप धारण किया है, जिस तरह एक अशान्त बालक किस की ओर उन्मुख हो जाये।
अतएव मैं अपने त्रिशूल से भगवान् विष्णु के सिर को उनके धड़ सेअलग कर दूँगा और उनके शरीर से निकले प्रचुर रक्त से अपने भाई हिरण्याक्ष को प्रसन्न करूँगाजो उनके रक्त को चूसने का शौकीन था।
इस प्रकार मैं भी शान्त हो सकूँगा।
"
तस्मिन्कूटेहिते नष्टे कृत्तमूले वनस्पतौ ।
विटपा इव शुष्यन्ति विष्णुप्राणा दिवौकस: ॥
९॥
तस्मिनू--जब वह; कूटे--अत्यन्त मायावी; अहिते--शत्रु; नष्टे--नष्ट हो जाता है; कृत्त-मूले--जड़ें कट जाने पर; वनसू-पतौ--वृक्ष; विटपा:--डालें तथा पत्तियाँ; इब--सहृश; शुष्यन्ति--सूख जाती हैं; विष्णु-प्राणा:--जिनका प्राण विष्णु है;दिव-ओकसः--देवतागण।
जब वृक्ष की जड़ काट दी जाती है, तो वह गिर पड़ता है और उसकी शाखायें एवं पत्तियाँस्वयमेव सूख जाती हैं।
उसी तरह जब मैं इस मायावी विष्णु को मार डालूँगा तो सारे देवता,जिनके लिए भगवान् विष्णु प्राण तथा आत्मा हैं, अपना जीवन-स्त्रोत खो देंगे और मुरझाजाएँगे।
"
तावचद्यात भुव॑ यूय॑ ब्रह्मक्षत्रसममेधिताम् ।
सूदयध्वं तपोयज्ञस्वाध्यायत्रतदानिन: ॥
१०॥
तावत्ू--जब तक ( मैं विष्णु के मारने में व्यस्त हूँ ); यात--जाओ; भुवम्--पृथ्वी लोक में; यूयम्--तुम सब; ब्रह्म-क्षत्र--ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों का; समेधिताम्--कर्मो ( ब्राह्मण संस्कृति तथा वैदिक शासन ) द्वारा सम्पन्न बने हुए; सूदयध्वम्--विनष्टकर दो; तपः--तपस्या करने वालों को; यज्ञ--यज्ञ; स्वाध्याय--वैदिक ज्ञान का अध्ययन; ब्रत--अनुष्ठान सम्बन्धी प्रतिज्ञाएँ;दानिनः--तथा दान देने वालों का।
जब तक मैं भगवान् विष्णु के मारने के कार्य में लगा हूँ, तब तक तुम लोग पृथ्वी लोक मेंजाओ जो ब्राह्मण संस्कृति तथा क्षत्रिय शासन के कारण फल-फूल रहा है।
ये लोग तपस्या,यज्ञ, वैदिक अध्ययन, आनुष्ठानिक व्रत तथा दान में लगे रहते हैं।
ऐसे सारे लोगों को जाकरविनष्ट कर दो।
"
विष्णुद्विजक्रियामूलो यज्ञो धर्ममयः पुमान् ।
देवर्षिपितृभूतानां धर्मस्य च परायणम् ॥
११॥
विष्णु;:--भगवान् विष्णु; द्विज--ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों का; क्रिया-मूल:--जिसका मूल है यज्ञों एवं बेदों में वर्णित अनुष्ठानों कोसम्पन्न करना; यज्ञ:--साक्षात् यज्ञ ( भगवान् विष्णु जो यज्ञ पुरुष कहलाते हैं ); धर्म-मय:--धार्मिक सिद्धान्तों से पूर्ण; पुमानू--परम पुरुष; देव-ऋषि--देवताओं तथा व्यासदेव एवं नारद जैसे महान् ऋषियों का; पितृ--पूर्वजों का; भूतानामू--तथा समस्तजीवों का; धर्मस्य--धार्मिक सिद्धान्तों का; च-- भी; परायणम्--आश्रय |
ब्राह्मण-संस्कृति का मूल सिद्धान्त यज्ञों तथा अनुष्ठानों के साक्षात् स्वरूप भगवान् विष्णुको प्रसन्न करना है।
भगवान् विष्णु समस्त धार्मिक सिद्धान्तों के साक्षात् आगार हैं और वे समस्तदेवताओं, महान् पितरों तथा सामान्य जनता के आश्रय हैं।
यदि ब्राह्मणों का वध कर दिया जायेतो क्षत्रियों को यज्ञ सम्पन्न करने के लिए प्रेरित करने वाला कोई नहीं रहेगा और इस तरह सारेदेवता यज्ञों द्वारा प्रसन्न न किये जाने पर स्वतः मर जायेंगे।
"
यत्र यत्र द्विजा गावो वेदा वर्णाश्रमक्रिया: ।
त॑ं त॑ं जनपदं यात सन्दीपयत वृश्चत ॥
१२॥
यत्र यत्र--जहाँ जहाँ; द्विजा:--ब्राह्मण गण; गाव:--सुरक्षित गाएँ; वेदा:ः--वैदिक संस्कृति; वर्ण-आश्रम--चार वर्णों तथाचार आश्रमों वाली आर्यसभ्यता के; क्रिया:--कार्यकलाप; तम् तम्--उनको; जन-पदम्--नगर या शहर में; यात--जाओ;सन्दीपयत--अग्नि लगा दो; वृश्चत--( सारे वृक्षों को ) काट डालो।
जहाँ कहीं भी गौवों तथा ब्राह्मणों को सुरक्षा प्राप्त है तथा जहाँ-जहाँ वर्णाश्रम नियमों केअनुसार वेदों का अध्ययन होता है, वहाँ-वहाँ तुरन्त जाओ।
तुम लोग उन स्थानों में अग्नि लगादो और जीवन के स्त्रोत वृक्षों को जड़ से काट कर गिरा दो।
"
इति ते भर्तुनिर्देशभादाय शिरसाहता: ।
तथा प्रजानां कदनं विदधु: कदनप्रिया: ॥
१३॥
इति--इस प्रकार; ते--वे; भर्तृ--स्वामी की; निर्देशम्--आज्ञा; आदाय--प्राप्त कर; शिरसा--सिर के बल; आहता:--आदरकरते हुए; तथा-- और ; प्रजानाम्ू--सारे नागरिकों का; कदनम्--दण्ड; विदधु: --दिया; कदन-प्रिया:--अन्यों को दण्ड देने मेंपटु
इस तरह जघन्य कर्मों के इच्छुक असुरों ने हिरण्यकशिपु की आज्ञा को अत्यन्त आदरपूर्वकलिया और उसे नमस्कार किया।
उसके निर्देशानुसार वे सारे जीवों के विरुद्ध ईर्ष्यापूर्णकार्यकलाप में जुट गये।
"
पुरग्रामब्रजोद्यानक्षेत्रारामा भ्रमाकरान् ।
खेटखर्वटघोषां श्र ददहुः पत्तनानि च ॥
१४॥
पुर--नगर तथा कस्बे; ग्राम--गाँव; ब्रज--चारागाहें; उद्यान--बगीचे; क्षेत्र--खेत; आराम--प्राकृतिक जंगल; आश्रम--सन्तजनों की कुटिया; आकरान्--खानें ( जिनसे ब्राह्मण-संस्कृति को बनाये रखने के लिए मूल्यवान धातुएं निकलती हैं ); खेट--गाँव; खर्वट--पहाड़ी गाँव; घोषानू-ग्वालों के छोटे-छोटे गाँव; च--तथा; ददहुः--जला दिया; पत्तनानि--राजधानियों को;च-भी |
असुरों ने नगरों, गावों, चारागाहों, उद्यानों, खेतों तथा जंगलों में आग लगा दी।
उन्होंने साधुपुरुषों के घरों, मूल्यवान धातु उत्पन्न करने वाली महत्त्वपूर्ण खानों, कृषकों के आवासों, पर्वतीयग्रामों, अहीरों की बस्तियों को जला दिया।
उन्होंने सरकारी राजधानियाँ भी जला दीं।
"
केचित्खनित्रैषिभिदु: सेतुप्राकारगोपुरान् ।
आजीग्यांश्रिच्छिदुर्वृक्षान्केचित्पशुपाणय: ।
प्रादहज्शरणान्येके प्रजानां ज्वलितोल्मुकै: ॥
१५॥
केचित्--कुछ असुर; खनित्रै:--फावड़ों से; बिभिदु:--खण्ड-खण्ड कर दिया; सेतु--पुल; प्राकार--रक्षा करने वली दीवालें,परकोटे; गोपुरान्ू--नगर के द्वारों को; आजीव्यान्--जीविका के साधन; चिच्छिदु;--काट डाला; वृक्षान्--वृक्षों को;केचित्--कुछ ने; परशु-पाणय:--हाथ में कुल्हाड़ी लेकर; प्रादहन्ू--जला डाला; शरणानि--आवास; एके --अन्य असुरों ने;प्रजानामू--नागरिकों के; ज्वलित--जलते हुए; उल्मुकै:--लुकाठों से |
कुछ असुरों ने फावड़े लेकर पुल, परकोटे तथा नगरों के द्वारों ( गोपुरों ) को तोड़ डाला।
कुछ ने कुल्हाड़े लेकर आम, कटहल के महत्त्वपूर्ण वृक्षों तथा अन्य भोज्य सामग्री वाले वृक्षोंको काट डाला।
कुछ असुरों ने हाथ में जलते लुकाठे लेकर नागरिकों के रिहायशी मकानों मेंआग लगा दी।
"
एवं विप्रकृते लोके दैत्येन्द्रानुचरैर्मुहु: ।
दिवं देवा: परित्यज्य भुवि चेरुरलक्षिता: ॥
१६॥
एवम्--इस प्रकार; विप्रकृते--सताये जाकर; लोके --जब सारे लोग; दैत्य-इन्द्र-अनुचरै:ः --दैत्यराज हिरण्यकशिपु केअनुयायियों द्वारा; मुहुः--पुनः पुनः; दिवम्--स्वर्ग लोक को; देवा:--देवतागण; परित्यज्य--त्याग कर; भुवि--पृथ्वी लोकपर; चेरु:--घूमने लगे ( उपद्रव का विस्तार देखने के लिये ); अलक्षिता:--असुरों से छिप कर।
इस प्रकार हिरण्यकशिपु के अनुयायियों द्वारा बारम्बार अप्राकृतिक घटनाओं के रूप मेंसताये जाने पर सभी लोगों ने बाध्य होकर वैदिक संस्कृति की सारी गतिविधियाँ बन्द कर दीं।
देवतागण भी यज्ञों का फल न पाने के कारण विचलित हो उठे।
उन्होंने स्वर्गलोक के अपने-अपने आवास त्याग दिये और असुरों से अलक्षित होकर विनाश का अवलोकन करने के लिए वेपृथ्वीलोक में इधर-उधर विचरण करने लगे।
"
हिरण्यकशिपुर्भ्रातु: सम्परेतस्य दुःखितः ।
कृत्वा कटोदकादीनि क्षातृपुत्रानसान्त्वचत् ॥
१७॥
हिरण्यकशिपु:--हिरण्यकशिपु ने; भ्रातु:-- भाई का; सम्परेतस्थय--मृत; दुःखितः --अत्यन्त दुखी; कृत्वा--करके; कटोदक-आदीनि- मृत्यु के पश्चात् के कृत्य, अन्त्येष्टि क्रिया; भ्रातृ-पुत्रानू--अपने भाई के लड़कों को; असान्त्ववत्--सान्त्वना दी।
अपने भाई की अन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न कर लेने के बाद हिरण्यकशिपु ने अत्यन्त दुखितहोकर अपने भतीजों को सान्त्वना प्रदान करने का प्रयास किया।
"
शकुनिं शम्बरं धृष्टिं भूतसन्तापनं वृकम् ।
कालनाभं महानाभं हरिश्मश्रुमथोत्कचम् ॥
१८ ॥
तन्मातरं रुषाभानुं दितिं च जननीं गिरा ।
श्लक्ष्णया देशकालज्ञ इदमाह जनेश्वर ॥
१९॥
शकुनिम्-शकुनि को; शम्बरम्--शम्बर को; धृष्टिम्-- धृष्टि को; भूतसन्तापनम्-- भूतसंतापन को; वृकम्--वृक को;कालनाभम्--कालनाभ को; महानाभम्--महानाभ को; हरिश्म श्रुमू--हरिश्मश्रु को; अथ--तथा; उत्कचम्--उत्कच को; ततू-मातरम्--उनकी माता; रुषाभानुम्--रुषाभानु को; दितिमू--दिति को; च--तथा; जननीम्--अपनी माता; गिरा--शब्दों से;एलक्ष्णया--अत्यन्त मधुर; देश-काल-ज्ञ:--जो काल तथा परिस्थिति को समझने में दक्ष हो; इदम्--यह; आह--कहा; जन-ईश्वर--हे राजा!
हे राजा, हिरण्यकशिपु अत्यन्त क्रुद्ध था, किन्तु महान् राजनीतिज्ञ होने के कारण वह देशतथा काल के अनुसार कर्म करना जानता था।
अतएवं वह अपने भतीजों को मधुर वाणी सेसान्त्वना देने लगा।
इनके नाम थे शकुनि, शम्बर, धृष्टि, भूतसन्तापन, वृक, कालनाभ, महानाभ,हरिश्मश्रु तथा उत्कच।
उसने उनकी माता अर्थात् अपनी अनुजवधू रुषाभानु एवं अपनी मातादिति को भी ढाढस बँधाया।
वह उनसे इस प्रकार बोला।
"
श्रीहिरण्यकशिपुरुवाचअम्बाम्ब हे वधू: पुत्रा वीरं माईथ शोचितुम् ।
रिपोरभिमुखे एलाघ्य: शूराणां वध ईप्सित: ॥
२०॥
श्री-हिरण्यकशिपु: उबाच--हिरण्यकशिपु ने कहा; अम्ब अम्ब--मेरी माता, मेरी माता; हे--हे, ओ; वधू:--मेरी बहू; पुत्रा:--मेरे भाई के पुत्रों; वीरमू--वीर; मा--मत; अर्हथ--तुम्हें चाहिये; शोचितुम्--शोक करना; रिपो:--शत्रु के; अभिमुखे--समक्ष;इलाघ्य:--प्रशंसनीय; शूराणाम्--वास्तविक महान् पुरुषों का; बध:--वध; ईप्सित:--वांछित |
हिरण्यकशिपु ने कहा : हे माता, हे वधू तथा हे भतीजो, तुम लोगों को महान् वीर की मृत्युके लिए शोक नहीं करना चाहिए, क्योंकि अपने शत्रु के समक्ष वीर की मृत्यु अत्यन्त प्रशंसनीयतथा वांछनीय होती है।
"
भूतानामिह संवासः प्रपायामिव सुत्रते ।
दैवेनैकत्र नीतानामुन्नीतानां स्वकर्मभि: ॥
२१॥
भूतानाम्--समस्त जीवों का; इह--इस संसार में; संवास:--साथ-साथ रहना; प्रपायाम्ू--ठंडा जल पीने के स्थान, प्याऊ;इब--सहश; सु-ब्रते-हे भद्रे; दैवेन-- भाग्य द्वारा; एकत्र--एक स्थान पर; नीतानाम्--लाये गये; उन्नीतानाम्--दूर-दूर ले जानेवालों का; स्व-कर्मभि:-- अपने-अपने कर्मो से |
हे माता, किसी भोजनालय या प्याऊ में अनेक राहगीर पास-पास आते हैं, किन्तु जल पीने के बाद अपने-अपने गन्तव्यों को चले जाते हैं।
इसी प्रकार जीव भी किसी परिवार में आकरमिलते हैं किन्तु बाद में अपने-अपने कर्मों के अनुसार वे अपने-अपने गन्तव्यों को चले जाते हैं।
"
नित्य आत्माव्यय: शुद्धः सर्वग: सर्ववित्पर: ।
धत्तेडउसावात्मनो लिड् मायया विसृजन्गुणान् ॥
२२॥
नित्य:--शाश्वत; आत्मा--आत्मा; अव्यय:--न चुकने वाला; शुद्ध: -- भौतिक कल्मष से रहित; सर्व-ग:--भौतिक याआध्यात्मिक जगतों में कहीं भी जाने के योग्य; सर्व-वित्--ज्ञान से पूर्ण; पर:-- भौतिक दशाओं से परे; धत्ते--स्वीकार करताहै; असौ--वह आत्मा या जीव; आत्मन:--अपना; लिड्रमू--शरीर; मायया-- भौतिक शक्ति के द्वारा; विसृजन्--उत्पन्न करतेहुए; गुणान्ू--विविध भौतिक गुणों को
आत्मा या जीव की मृत्यु नहीं होती, क्योंकि वह नित्य तथा अव्यय है।
भौतिक कल्मष सेमुक्त होने के कारण वह भौतिक या आध्यात्मिक जगतों में कहीं भी जा सकता है।
वह भौतिकशरीर से पूरी तरह अवगत होते हुए भी उससे सर्वथा भिन्न है, किन्तु अपनी किंचित स्वतंत्रता केदुरुपयोग के कारण उसे भौतिक शक्ति द्वारा उत्पन्न सूक्ष्म तथा स्थूल शरीर धारण करने होते हैंऔर इस तरह उसे तथाकथित भौतिक सुख तथा दुख सहने होते हैं।
अतएव किसी भी मनुष्य कोशरीर में से आत्मा के निकलने पर शोक नहीं करना चाहिए।
"
यथाम्भसा प्रचलता तरवोपि चला इब ।
चक्षुषा भ्राम्यमाणेन हृश्यते चलतीव भू: ॥
२३॥
यथा--जिस तरह; अम्भसा--जल द्वारा; प्रचलता--गतिमान; तरव:--वृक्ष ( नदी के तट के ); अपि-- भी; चला:--गतिमान;इब--मानो; चक्षुषा--आँख से; भ्राम्यमाणेन--गतिमान; दृश्यते--देखा जाता है; चलती--चलती हुई, गतिमान; इब--मानो;भू:--धरती।
जल की गति के कारण नदी के तटवर्ती वृक्ष जल में प्रतिबिम्बित होकर चलते प्रतीत होतेहैं।
इसी प्रकार जब आँखें किसी मानसिक असंतुलन के कारण चलती रहती हैं, तो धरती( स्थल ) भी घूमती प्रतीत होती है।
"
एवं गुणैर्भ्राम्यमाणे मनस्यविकलः पुमान् ।
याति तत्साम्यतां भद्दे ह्लिझे लिड्रवानिव ॥
२४॥
एवम्--इस प्रकार; गुणैः--प्रकृति के गुणों द्वारा; भ्राम्यमाणे--विचलित होने पर; मनसि--मन में; अविकलः --परिवर्तन केबिना; पुमानू--जीव; याति--पास जाता है; ततू-साम्यताम्ू--मन की विक्षोभ जैसी दशा; भद्वे--हे भद्र माता; हि--निश्चय ही;अलिड्डु--सूक्ष्म या स्थूल शरीर से रहित; लिड्र-वान्-- भौतिक शरीर से युक्त; इब--मानो |
इसी तरह से हे मेरी भद्र माता, जब प्रकृति के गुणों की गति द्वारा यह मन विचलित होता( भटकता ) है तब जीव, चाहे वह कितना ही सूक्ष्म तथा स्थूल शरीरों की विभिन्न अवस्थाओं सेमुक्त क्यों न हो, यही सोचता है कि वह एक स्थिति से दूसरी में परिवर्तित हो गया है।
"
एष आत्मविपर्यासो हालिड़े लिड्रभावना ।
एष प्रियाप्रियैयोंगो वियोग: कर्मसंसृति: ॥
२५॥
सम्भवश्च विनाशश्व शोकश्न विविध: स्मृतः ।
अविवेकश्च चिन्ता च विवेकास्मृतिरिव च ॥
२६॥
एष:--यह; आत्म-विपर्यास:--जीवन का मोह; हि--निस्सन्देह; अलिड्ले-- भौतिक शरीरविहीन में; लिड्र-भावना--भौतिकशरीर को ही आत्मा मानना; एष:--यह; प्रिय--अत्यन्त प्रियों के साथ; अप्रियैः--तथा अप्रियों के साथ ( शत्रुओं, परिवार केबाहर वालों के साथ ); योग:--सम्बन्ध; वियोग:--वियोग; कर्म--कर्मफल; संसृति:--जीवन की भौतिक दशा; सम्भव:--जन्म स्वीकार करते हुए; च--तथा; विनाश: -- मृत्यु स्वीकार करते हुए; च--तथा; शोक:--शोक; च--तथा; विविध:--अनेक प्रकार के; स्मृत:--शास्त्रवर्णित; अविवेक:--विवेक-शक्ति का अभाव; च--तथा; चिन्ता--चिन्ता; च-- भी;विवेक--समुचित विवेक शक्ति का; अस्मृतिः --विस्मरण होना; एबव--निस्संदेह; च-- भी |
मोहावस्था में जीव अपने शरीर तथा मन को आत्मा स्वीकार करके कुछ व्यक्तियों कोअपना सगा सम्बन्धी और अन्यों को बाहरी लोग मानने लगता है।
इस भ्रान्ति के कारण उसे कष्टभोगना पड़ता है।
निस्सन्देह, ऐसे मनोभावों का संचय ही सांसारिक दुख और तथाकथित सुखका कारण बनता है।
इस प्रकार स्थित होकर बद्धजीव को विभिन्न योनियों में जन्म लेना होता हैऔर विभिन्न चेतनाओं में कर्म करना पड़ता है, जिससे नवीन शरीरों की उत्पत्ति होती है।
यहसतत भौतिक जीवन संसार कहलाता है।
जन्म, मृत्यु, शोक, मूर्खता तथा चिन्ता--ये सब ऐसेभौतिक विचारों के कारण होते हैं।
इस तरह हम कभी उचित ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो कभीजीवन की भ्रान्त धारणा के पुनः शिकार बनते हैं।
"
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यमस्य प्रेतबन्धूनां संवादं तं निबोधत ॥
२७॥
अत्र--इस प्रसंग में; अपि--निस्सन्देह; उदाहरन्ति--उदाहरण देते हैं; इमम्--यह; इतिहासम्ू--इतिहास; पुरातनम्-- अत्यन्तप्राचीन; यमस्य--यमराज का, जो मृत्यु का अधीक्षक है और मृत्यु के पश्चात् निर्णय सुनाता है; प्रेत-बन्धूनामू--मृत मनुष्य केमित्रों की; संवादम्--बातचीत; तम्--उसको; निबोधत--समझने का प्रयास करो
इस प्रसंग में प्राचीन इतिहास से एक उदाहरण दिया गया है।
इसमें यमराज तथा मृत व्यक्तिके मित्रों के मध्य की वार्ता निहित है।
कृपया इसे ध्यानपूर्वक सुनिये।
"
उशीनरेष्वभूद्राजा सुयज्ञ इति विश्रुतः ।
सपलेीनिहतो युद्धे ज्ञातयस्तमुपासत ॥
२८॥
उशीनरेषु--उशीनर नामक राज्य में; अभूत्-- था; राजा--एक राजा; सुयज्ञ:--सुयज्ञ; इति--इस प्रकार; विश्रुत:-- प्रसिद्ध;सपत्नैः--शत्रुओं द्वारा; निहत:--मारा गया; युद्धे--युद्ध में; ज्ञातयः--सम्बन्धी जन; तम्--उसके; उपासत--चारों ओर बैठगए।
उशीनर नामक राज्य में सुयज्ञ नाम का एक विख्यात राजा था।
जब यह राजा युद्ध में शत्रुओंद्वारा मार डाला गया तो उसके सम्बन्धी मृत शरीर को घेर कर बैठ गये और उस मित्र की मृत्यु परशोक प्रकट करने लगे।
"
विशीर्णरलकवचं विश्रष्टाभरणस्त्रजम् ।
शरनिर्भिन्नहददयं शयानमसूृगाविलम् ॥
२९॥
प्रकीर्णकेशं ध्वस्ताक्ष॑ं रभसा दष्टदच्छदम् ।
रजःकुण्ठमुखाम्भोजं छिन्नायुधभुजं मृथे ॥
३०॥
उशीनरेन्द्रं विधिना तथा कृतंपतिं महिष्य: प्रसमीक्ष्य दु:खिता: ।
हताः सम नाथेति करैरुरो भूशंघ्नन्त्यो मुहुस्तत्पदयोरुपापतन् ॥
३१॥
विशीर्ण--इधर-उधर बिखरे; रत्न--रत्नों से बना; कवचम्--सुरक्षा कवच; विशभ्रष्ट--गिरा हुआ; आभरण-- आभूषण;सत्रजमू--मालाएँ; शर-निर्भिन्न--बाणों से बिंधा; हदयम्ू--हृदय को; शयानम्--लेटा हुआ; असृक्ू-आविलम्--रक्तरंजित;प्रकीर्ण-केशम्--बिखरे हुए बाल को; ध्वस्त-अक्षम्--धँसी हुई आँख को; रभसा--क्रोध से; दष्ट--काटा हुआ; दच्छदम्--उसके होंठ को; रज:-कुण्ठ-- धूल से ढका; मुख-अम्भोजम्--उसके कमल जैसे मुख को; छिन्न--कटे हुए; आयुध-भुजम्--उसके हथियार तथा बाहों को; मृधे--युद्धस्थल में; उशीनर-इन्द्रमू--उशीनर राज्य के स्वामी को; विधिना--विधाता से; तथा--इस तरह; कृतम्--इस दशा को प्राप्त; पतिम्ू--पति को; महिष्य:--रानियाँ; प्रसमी क्ष्य--देखकर; दुःखिता:--अत्यन्त दुखी;हताः--मारी गयी; स्म--निश्चय ही; नाथ--हे स्वामी; इति--इस प्रकार; करैः--हाथों से; उरः--वक्षस्थल; भूशम्--निरन्तर;घ्नन्त्य:--पीटती हुई; मुहुः--बारम्बार; तत्-पदयो: --राजा के चरणों पर; उपापतन्--गिर पड़ीं |
वध किया हुआ राजा युद्धस्थल में लेटा था।
उसका सुनहला रलजटित कवच छिन्न-भिन्न होगया था, उसके आभूषण तथा वस्त्र अपने-अपने स्थान से विलग हो चुके थे, उसके बाल बिखरगये थे और उसकी आँखें कान्तिहीन हो चुकी थीं, उसका सारा शरीर रक्त से सना था औरउसका हृदय शत्रु के बाणों से बिंधा था।
उसने मरते समय अपना शौर्य दिखाना चाहा, अतएवउसके होंठ दाँतों से भिच गये थे और दाँत उस स्थिति में थे।
उसका कमल सदृश सुन्दर मुख अबकाला पड़ गया था और युद्धभूमि की धूल से भरा था।
तलवार तथा अन्य हथियारों से युक्तउसकी भुजाएं कटकर टूट चुकी थी।
जब उशीनर के राजा की रानियों ने अपने पति को इसस्थिति में पड़े देखा तो वे रोने लगीं--' हे नाथ, तुम्हारे मारे जाने से हम भी मारी जा चुकी हैं।
इन शब्दों को टेर-टेर कर वे अपनी छाती पीट-पीट कर मृत राजा के चरणों पर गिर पड़ीं।
"
रुदत्य उच्चैर्दयिताड्प्रिपड्डजसिद्ञन्त्य अस््रै: कुचकुड्डु मारुणै: ।
विस्त्रस्तकेशाभरणा: शुचं नृणांसृजन्त्य आक्रन्दनया विलेपिरि ॥
३२॥
रुदत्य: --रोती हुई; उच्चै:--जोर-जोर से; दयित--अपने प्रिय पति के; अद्धप्रि-पड्रजम्ू--चरणकमलों को; सिद्धन्त्य:--भिगोती हुई; अस्नै:--आँसुओं से; कुच-कुड्डू म-अरुणै:--जो उसके वक्षस्थलों में लगे कुमकुम के कारण लाल हो रहे थे;विस््रस्त--बिखरे; केश--बाल; आभरणा:--तथा आभूषण; शुचम्--शोक; नृणाम्--सामान्य लोगों का; सृजन्त्य:--उत्पन्नकरते हुए; आक्रन्दनया--अत्यन्त करुणापूर्वक रो करके; विलेपिरि--शोक करने लगीं।
रानियों के उच्च स्वर में रोने पर उनके आँसू वक्षस्थल पर लुढ़क आये जहाँ वे कुमकुम चूर्णसे लाल होकर फिर उनके पति के चरणकमलों पर गिर पड़े।
उनके केश बिखर गये, उनकेआभूषण गिर गये और अन्यों के हृदय से सहानुभूति जगाती हुई रानियाँ अपने पति की मृत्यु परशोक करने लगीं।
"
अहो विधात्राकरुणेन नः प्रभोभवान्प्रणीतो हृगगोचरां दशाम् ।
उशीनराणामसि वृत्तिदः पुराकृतोधुना येन शुचां विवर्धन: ॥
३३॥
अहो--ओह; विधात्रा--विधाता द्वारा; अकरुणेन-- अत्यन्त निर्दय; न:--हमारा; प्रभो--हे स्वामी; भवान्-- आप; प्रणीत: --छीना गया; हक्--दृष्टि की; अगोचराम्--सीमा के बाहर; दशाम्-- अवस्था को; उशीनराणाम्--उशीनर राज्य के वासियों को;असि--था; वृत्ति-द:--जीविका देने वाला; पुरा--पहले; कृत:--समाप्त; अधुना--अब; येन--जिससे; शुच्यामू--शोक को;विवर्धन:--बढ़ाते हुए
हे नाथ, अब आप क्रूर विधाता द्वारा हमारी दृष्टि से ओझल कर लिये गये हैं।
इसके पूर्व आपउशीनर के निवासियों को जीविका प्रदान करते थे जिससे वे सुखी थे, किन्तु अब आपकी दशाउनके दुख का कारण बनी है।
"
त्वया कृतज्ञेन वय॑ं महीपतेकथं विना स्याम सुहृत्तमेन ते ।
तत्रानुयानं तब बीर पादयो:शुश्रूषतीनां दिश यत्र यास्यसि ॥
३४॥
त्ववा--तुम; कृतज्ञेन--अत्यन्त कृतज्ञ व्यक्ति के; बयम्--हम; मही-पते--हे राजा; कथम्--कैसे; विना--बिना; स्थाम--रहेंगी; सुहत्-तमेन--हमारे मित्रों में श्रेष्ठ; ते--तुम्हारे; तत्र--वहाँ; अनुयानम्-- अनुगमन करते हुए; तब--तुम्हारा; वीर--हे वीरपुरुष; पादयो:--चरणकमलों की; शुश्रूषतीनाम्ू-- सेवा में लगे रहने वालों का; दिश--कृपया आज्ञा दें; यत्र--कहाँ;यास्यसि--जाओगे।
हे राजा, हे वीर, आप अत्यन्त कृतज्ञ पति थे और हम सबों के अत्यन्त निष्ठावान् मित्र थे।
आपके बिना हम कैसे रह सकेंगी?
हे वीर, आप जहाँ भी जा रहे हैं, कृपा करके हमारा निर्देशनकरें जिससे हम आपके पदचिन्हों का अनुसरण कर सकें और पुनः आपकी सेवा कर सकें।
हमें भी अपने साथ ले चलें।
"
एवं विलपतीनां वै परिगृह्य मृतं पतिम् ।
अनिच्छतीनां निर्हारमको स्तं सन्न्यवर्तत ॥
३५॥
एवम्--इस प्रकार से; विलपतीनाम्--विलाप करती रानियों का; बै--निस्सन्देह; परिगृह्य-- अपनी गोद में लेकर; मृतम्--मृत;पतिम्--पति को; अनिच्छतीनामू--न चाहती हुए; निर्हारमू--दाह संस्कार के लिए शव को ले जाते हुए; अर्क:--सूर्य;अस्तमू--डूबने के स्थान में; सन्न्यवर्तत--चला गया |
यद्यपि शव-दाह के लिए समय उपयुक्त था लेकिन रानियाँ शव को अपनी गोद में लिए हुएविलाप करती रहीं और उन्होंने शव को ले जाने की अनुमति नहीं दी।
तभी सूर्य पश्चिम दिशा मेंअस्त हो गया।
"
तत्र ह प्रेतबन्धूनामा श्रुत्य परिदेवितम् ।
आह तान्बालको भूत्वा यम: स्वयमुपागतः ॥
३६॥
तत्र--वहाँ; ह--निश्चय ही; प्रेत-बन्धूनामू--मृत राजा के मित्रों तथा सम्बन्धियों के; आश्रुत्य--सुनकर; परिदेवितम्--तीत्रविलाप ( जो यमराज के लोक से भी सुना जा सकता था ); आह--कहा; तान्--उनसे ( शोकसन्तप्त रानियों से ); बालक:--एक लड़का; भूत्वा--बन कर; यम:--मृत्यु के अधीक्षक यमराज ने; स्वयम्--साक्षात्; उपागत:--आकर।
जब रानियाँ राजा के मृत शरीर के लिए विलाप कर रही थीं तो उनका तीव्र विलाप यमलोकतक में सुनाई पड़ रहा था।
अतएव बालक का रूप धारण करके यमराज मृतक के सम्बन्धियोंश़ के निकट पहुँचे और उन्हें इस प्रकार से उपदेश दिया।
"
श्रीयम उबाचअहो अमीषां वयसाधिकानांविपश्यतां लोकविधि विमोहः ।
यत्रागतस्तत्र गतं मनुष्यस्वयं सधर्मा अपि शोचन्त्यपार्थम् ॥
३७॥
श्री-यमः उवाच-- श्री यमराज ने कहा; अहो--ओह; अमीषाम्--इनका; वयसा--उम्र से; अधिकानाम्ू--जिनकी आयु अधिकहै, उनका; विपश्यताम्-- प्रति दिन देखते हुए; लोक-विधिम्-- प्रकृति के नियम को ( कि हर कोई मरता है ); विमोह: --मोह;यत्र--जहाँ से; आगत:--आया हुआ; तत्र--वहाँ; गतमू--लौटा हुआ; मनुष्यम्--मनुष्य; स्वयम्--स्वयं; स-धर्मा:--स्वभावमें समान ( मरने के लिए उद्यत ); अपि--यद्यपि; शोचन्ति--विलाप करते हैं; अपार्थम्-व्यर्थ ही |
श्री यमराज ने कहा--ओह! यह कितना आश्चर्यजनक है।
ये लोग, जो मुझसे वय में बड़े हैंउन्हें अच्छी तरह अनुभव है कि सैकड़ों हजारों जीव जन्म लेते और मरते हैं।
इस तरह उन्हेंसमझना चाहिए कि उन्हें भी मरना है, तो भी वे मोहग्रस्त रहते हैं।
बद्धजीव अज्ञात स्थान से आतेहैं और मृत्यु के बाद उसी अज्ञात स्थान को लौट जाते हैं।
इस नियम का कोई अपवाद नहींमिलता तो यह जानते हुए भी वे व्यर्थ शोक क्यों करते हैं ?
" अहो वयं धन्यतमा यदत्रत्यक्ता: पितृभ्यां न विचिन्तयामः ।
अभश्ष्यमाणा अबला वृकादिभि:स रक्षिता रक्षति यो हि गर्भ ॥
३८ ॥
अहो--ओह; वयम्--हम सब; धन्य-तमा:--अत्यन्त भाग्यशाली; यत्--क्योंकि; अत्र--इस समय; त्यक्ता:--असुरक्षित,अकेले छोड़ी हुई; पितृभ्याम्ू--पिता तथा माता दोनों के द्वारा; न--नहीं; विचिन्तयाम: --चिन्ता करते; अभक्ष्यमाणा:--न खाईजाकर; अबला:--अत्यन्त निर्बल; वृक-आदिभिः--भेड़िया तथा अन्य हिंस्त्र पशुओं द्वारा; स:--वह ( भगवान् ); रक्षिता--रक्षाकरेगा; रक्षति--रक्षा कर चुका है; यः--जो; हि--निश्चय ही; गर्भे--गर्भ के भीतर |
यह कितना आश्चर्यजनक है कि इन वयोवृद्ध महिलाओं को हमारे जैसा भी उच्चतर जीवन-बोध नहीं है! निस्सन्देह, हम अत्यन्त भाग्यशाली हैं, क्योंकि यद्यपि हम बालक हैं और अपनेमाता-पिता के द्वारा जीवन-संघर्ष करने के लिए असुरक्षित छोड़ दिये गये हैं और यद्यपि हमअत्यन्त निर्बल हैं, तो भी हिंस्त्र पशुओं ने न तो हमें खाया, न विनष्ट किया।
इस तरह हमें दृढ़विश्वास है कि जिस भगवान् ने हमें माता के गर्भ में भी सुरक्षा प्रदान की है वे ही हमारी सर्वत्ररक्षा करते रहेंगे।
"
य इच्छयेश: सृजतीदमव्ययोय एव रक्षत्यवलुम्पते च यः ।
तस्याबला: क्रीडनमाहुरीशितु-श्वराचरं निग्रहसड़ग्रहे प्रभु; ॥
३९॥
यः--जो; इच्छया--उसकी इच्छा से ( किसी के द्वारा बाध्य होकर नहीं ); ईशः--परम नियन्ता; सृजति--उत्पन्न करता है;इदम्--इस ( भौतिक जगत ) को; अव्यय:--यथारूप में रहकर ( इतनी सारी भौतिक सृष्टियों को उत्पन्न करने के कारण अपनेअस्तित्व को खोये बिना ); यः--जो; एव--निस्सन्देह; रक्षति--पालन करता है; अवलुम्पते--संहार करता है; च-- भी; यः--जो; तस्थ--उसका; अबलाः: --हे दीन स्त्रियों; क्रीडनम्--खेल; आहु: --वे कहते हैं; ईशितु:-- भगवान् का; चर-अचरम्--चरतथा अचर; निग्रह--विनाश में; सड्ग्रहे--या रक्षा में; प्रभु; --पूर्ण समर्थ |
उस बालक ने स्त्रियों को सम्बोधित किया: हे अबलाओ, उस अविनाशी भगवान् की इच्छासे सम्पूर्ण जगत का सृजन, पालन और संहार होता है।
यह वेदों का निर्णय है।
चर तथा अचर सेयुक्त यह भौतिक सृष्टि उनके खिलौने के समान है।
परमेश्वर होने के कारण वे इसको विनष्टकरने तथा इसकी रक्षा करने में पूर्ण समर्थ हैं।
"
पथि च्युतं तिष्ठति दिष्टरक्षितंगृहे स्थितं तद्विहतं विनश्यति ।
जीवत्यनाथोपि तदीक्षितो वनेगृहेउभिगुप्तोस्थ हतो न जीवति ॥
४०॥
'पथि--रास्ते में; च्युतम्ू--गिरा हुआ, अधिकार से वंचित; तिष्ठति--बना रहता है; दिष्ट-रक्षितम्-- भाग्य द्वारा रक्षित; गृहे--घरमें; स्थितम्--यद्यपि स्थित; तत्-विहतम्--परमेश्वर की इच्छा से मारा गया; विनश्यति--नष्ट हो जाता है; जीवति--जीवित रहताहै; अनाथ: अपि--बिना रक्षक के भी; तत्-ईक्षित:-- भगवान् द्वारा रक्षित होकर; वने--जगंल में; गृहे--घर में; अभिगुप्त:--पूरी तरह गुप्त तथा रक्षित; अस्य--इसका; हत:--मारा गया; न--नहीं; जीवति--बचता है।
कभी-कभी मनुष्य अपना धन सड़क पर खो देता है जहाँ सभी उसे देख सकते हैं; फिर भीयह धन भाग्यवश सुरक्षित पड़ा रहता है और इसे कोई नहीं देख पाता।
इस तरह जिस व्यक्ति नेइस धन को खोया था, उसे यह वापस मिल जाता है।
दूसरी ओर, यदि भगवान् सुरक्षा प्रदान नहींकरते तो घर में अत्यन्त सुरक्षित ढंग से रखा होने पर भी यह धन खो जाता है।
यदि भगवान्किसी की रक्षा करते हैं, तो उसका कोई रक्षक न होते हुए भी तथा जंगल में रहते हुए भी वहजीवित रहता है जब कि घर पर सम्बन्धियों तथा अन्यों से रक्षित होते हुए भी मनुष्य कभी-कभीमर जाता है; कोई उसकी रक्षा नहीं कर पाता।
"
भूतानि तैस्तैर्निजयोनिकर्मभि-भवन्ति काले न भवन्ति सर्वशः ।
न तत्र हात्मा प्रकृतावषि स्थित-स्तस्या गुणैरन्यतमो हि बध्यते ॥
४१॥
भूतानि--जीवों के समस्त शरीर; तैः तैः--अपने अपने; निज-योनि--अपने शरीर उत्पन्न करके; कर्मभि:--पूर्व कर्मों के द्वारा;भवन्ति-- प्रकट होते हैं; काले--काल क्रम से; न भवन्ति--अहृश्य होते हैं; सर्वशः --सभी तरह से; न--नहीं; तत्र--वहाँ; ह--निस्सन्देह; आत्मा--आत्मा; प्रकृता--इस भौतिक जगत के भीतर; अपि--यद्यपि; स्थित:--स्थित; तस्या:--उस ( भौतिकशक्ति ) के; गुणैः--विभिन्न गुणों के द्वारा; अन्य-तम:--अत्यन्त भिन्न; हि--निस्सन्देह; बध्यते--बाँधा जाता है
प्रत्येक बद्धजीव अपने कर्म के अनुसार भिन्न प्रकार का शरीर पाता है और जब उसकाकार्य समाप्त हो जाता है, तो शरीर भी नष्ट हो जाता है।
यद्यपि आत्मा विभिन्न योनियों में विभिन्नप्रकार के सूक्ष्म तथा स्थूल शरीरों में स्थित रहता है, किन्तु वह उनसे बँधा नहीं रहता, क्योंकि वहव्यक्त शरीर से सदा-सदा पूर्णतया भिन्न माना जाता है।
"
इदं शरीर पुरुषस्य मोहजंयथा पृथर्भौतिकमीयते गृहम् ।
यथौदके: पार्थिवतैजसैर्जन:कालेन जातो विकृतो विनश्यति ॥
४२॥
इदम्--इस; शरीरम्--शरीर को; पुरुषस्य--बद्धजीव का; मोह-जम्--अविद्या से उत्पन्न; यथा--जिस तरह; पृथक्-भिन्न;भौतिकम्-- भौतिक; ईयते--देखा जाता है; गृहम्ू--घर को; यथा--जिस तरह; उदकैः--जल से; पार्थिव-- पृथ्वी से;तैजसैः--तथा अग्नि से; जनः--बद्धजीव; कालेन--काल द्वारा; जातः--उत्पन्न; विकृत:--रूपान्तरित; विनश्यति--नष्ट होजाता है।
जिस प्रकार एक गृहस्वामी अपने घर से पृथक् होते हुए भी अपने घर को अपने से अभिन्नमानता है उसी प्रकार अज्ञानवश बद्धजीव इस शरीर को आत्मा मान बैठता है, यद्यपि शरीरआत्मा से वास्तव में भिन्न है।
यह शरीर पृथ्वी, जल तथा अग्नि के अंशों के संयोग से प्राप्त होताहै और जब वे कालक्रम में रूपान्तरित हो जाते हैं, तो शरीर विनष्ट हो जाता है।
आत्मा को शरीरके इस सृजन तथा विलय से कुछ भी लेना-देना नहीं रहता।
"
यथानलो दारुषु भिन्न ईयतेयथानिलो देहगतः पृथक्स्थित: ।
यथा नभः सर्वगतं न सज्जतेतथा पुमान्सर्वगुणा श्रयः परः ॥
४३॥
यथा--जिस तरह; अनलः--आग; दारुषु--काष्ट में; भिन्न:--पृथक्; ईयते-- देखी जाती है; यथा--जिस प्रकार; अनिल:--वायु; देह-गत:--शरीर के भीतर; पृथक्--विलग; स्थित:--स्थित; यथा--जिस तरह; नभ:--आकाश; सर्व-गतम्--सर्वव्यापक; न--नहीं; सजते--मिलता है, लिप्त होता है; तथा--उसी प्रकार; पुमानू--जीव; सर्व-गुण-आश्रय: --यद्यपिप्रकृति के सभी गुणों का आश्रय; पर:ः--भौतिक कल्मष से परे।
जिस तरह अगिन क्राष्ट में स्थित रहती है, किन्तु वह काष्ठ से भिन्न समझी जाती है, जिस तरहवायु मुँह तथा नथुनों के भीतर स्थित रहती है, किन्तु उनसे पृथक् मानी जाती है और जिस तरहआकाश सर्वत्र व्याप्त होकर भी किसी वस्तु से लिप्त नहीं होता उसी तरह जीव भी, जो भले हीइस समय भौतिक शरीर में बन्दी है, उस शरीर का स्त्रोत होते हुए भी उससे पृथक् है।
"
सुयज्ञो नन्वयं शेते मूढा यमनुशोचथ ।
यः श्रोता योउनुवक्तेह स न दृश्येत कहिचित् ॥
४४॥
सुयज्ञ:--सुयज्ञ नामक राजा; ननु--निस्सन्देह; अयम्--यह; शेते--लेटा है; मूढा:--हे मूर्ख जनो; यम्--जिसको;अनुशोचथ--रोदन करते हो; यः--जो; श्रोता--सुनने वाला; य:--जो; अनुवक्ता --बोलने वाला; इह--इस संसार में; सः--वह; न--नहीं; दृश्येत--दृष्टिगोचर है; कहिंचित्ू--किसी भी समय
यमराज ने आगे कहा : हे शोक करने वालो, तुम सारे के सारे मूर्ख हो।
तुम जिस सुयज्ञ नामव्यक्ति के लिए शोक कर रहे हो वह तुम्हारे समक्ष अब भी लेटा है।
वह कहीं नहीं गया।
तो फिरतुम्हारे शोक का क्या कारण है?
पहले वह तुम्हारी बातें सुनता था और उत्तर देता था, किन्तु तुमलोग अब उसे न पाकर शोक कर रहे हो।
यह विरोधमूलक आचरण है, क्योंकि तुमने वास्तव मेंउस व्यक्ति को शरीर के भीतर कभी नहीं देखा था, जो तुम्हें सुनता था और उत्तर देता था।
तुम्हेंशोक करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि तुम जिस शरीर को हमेशा देखते आये हो वहतुम्हारे सामने पड़ा हुआ है।
"
न श्रोता नानुवक्तायं मुख्योउप्यत्र महानसु: ।
यस्त्विहेन्द्रियवानात्मा स चान्य: प्राणदेहयो: ॥
४५ ॥
न--नहीं; श्रोता--सुनने वाला; न--नहीं; अनुवक्ता--बोलने वाला; अयमू--यह; मुख्य:--मुख्य, प्रधान; अपि--यद्यपि;अतन्न--इस शरीर में; महानू--महान्; असुः--प्राणवायु; यः--जो; तु--लेकिन; इह--इस शरीर में; इन्द्रिय-वान्ू--समस्तइन्द्रियों से युक्त; आत्मा--आत्मा; सः--वह; च--तथा; अन्यः--भिन्न; प्राण-देहयो:--प्राणवायु तथा भौतिक शरीर से |
शरीर में सबसे महत्वपूर्ण वस्तु प्राण है, किन्तु वह भी न तो श्रोता है और न वक्ता।
यहाँ तककि प्राण से परे आत्मा भी कुछ नहीं कर सकता, क्योंकि वास्तविक निदेशक तो परमात्मा है,जो जीवात्मा के साथ सहयोग करता है।
शरीर की गतिविधियों को संचालित करने वालापरमात्मा शरीर तथा प्राण से भिन्न है।
"
भूतेन्द्रियमनोलिड्जन्देहानुच्चावचान्विभु: ।
भजत्युत्सृजति हान्यस्तच्चापि स्वेन तेजसा ॥
४६॥
भूत--पाँच भौतिक तत्त्वों से; इन्द्रिय--दस इन्द्रियाँ; मन:--तथा मन; लिझ्ञन्--लक्षणयुक्त; देहान्--स्थूल शरीरों को; उच्च-अवचानू--उच्च वर्ग तथा निम्न वर्ग को; विभु:--जीवात्मा, जो शरीर तथा इन्द्रियों का स्वामी है; भजति--प्राप्त करता है;उत्सूजति--त्याग देता है; हि--निस्सन्देह; अन्यः--पृथक् होने से; तत्ू--उस; च-- भी; अपि--निस्सन्देह; स्वेन-- अपने;तेजसा--उच्च ज्ञान की शक्ति से।
पाँच भौतिक तत्त्व, दस इन्द्रियाँ तथा मन--ये सभी मिलकर स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरों केविभिन्न अंगों का निर्माण करते हैं।
जीव अपने भौतिक शरीरों के सम्पर्क में आता है, चाहे येउच्च हों या निम्न और बाद में अपनी निजी शक्ति से उन्हें त्याग देता है।
यह शक्ति जीव की उसनिजी शक्ति में देखी जा सकती है, जिससे वह विभिन्न प्रकार के शरीर धारण कर सकता है।
"
यावल्लिड्डान्वितो ह्यात्मा तावत्कर्मनिबन्धनम् ।
ततो विपर्ययः क्लेशो मायायोगो<नुवर्तते ॥
४७॥
यावत्--जब तक; लिड्ड-अन्वित: --सूक्ष्म शरीर द्वारा आवृत; हि--निस्सन्देह; आत्मा--आत्मा; तावत्--तब तक; कर्म--सकाम कर्मों का; निबन्धनम्--बन्धन; ततः--उससे; विपर्यय:--उल्टा ( धोखे से शरीर को आत्मा मानते हुए ); क्लेश:--कष्ट;माया-योग:--बहिरंगा भ्रामक शक्ति के साथ प्रबल सम्बन्ध; अनुवर्तते--पीछा करता है।
जब तक आत्मा मन, बुद्धि तथा मिथ्या अहंकार से युक्त सूक्ष्म शरीर द्वारा आवृत रहता हैतब तक वह अपने सकाम-कर्मों के फल से बाँधा रहता है।
इस आवरण के कारण आत्माभौतिक शक्ति से जुड़ा रहता है।
अतएवं उसे उसी के अनुसार जन्म-जन्मांतर भौतिक दशाओं एवंविपर्ययों को भोगना पड़ता है।
"
वितथाभिनिवेशोयं यदगुणेष्वर्थवग्वच: ।
यथा मनोरथः स्वप्न: सर्वमैन्द्रियकं मृषा ॥
४८॥
वितथ--व्यर्थ; अभिनिवेश:-- धारणा; अयम्--यह; यत्--जो; गुणेषु-- प्रकृति के गुणों में; अर्थ--तथ्य के रूप में; हक्-वचः--देखना तथा बोलना; यथा--जिस तरह; मनोरथ:--मानसिक कल्पना ( दिवास्वण ); स्वप्न: --स्वण; सर्वम्--सबकुछ; ऐन्द्रियकम्--इन्द्रियों से उत्पन्न; मृषा--झूठ ।
प्रकृति के गुणों तथा उनसे उत्पन्न तथाकथित सुख तथा दुख को वास्तविक रूप से देखनातथा उनके विषय में बातें करना व्यर्थ है।
जब दिन में मन विचरता रहता है और मनुष्य अपने कोअत्यन्त महत्वपूर्ण समझने लगता है या जब वह रात में सपने देखता है और अपने को किसीसुन्दरी के साथ रमण करते देखता है, तो ये मात्र मिथ्या स्वप्न होते हैं।
इसी प्रकार से भौतिकइन्द्रियों द्वारा उत्पन्न सुखों तथा दुखों को व्यर्थ समझना चाहिए।
"
अथ नित्यमनित्यं वा नेह शोचन्ति तद्ठिदः ।
नान्यथा शक्यते कर्तु स्वभाव: शोचतामिति ॥
४९॥
अथ--अतएव; नित्यमू--शाश्वत आत्मा; अनित्यमू--नश्वर भौतिक शरीर; वा--अथवा; न--नहीं; इह--इस संसार में;शोचन्ति--शोक करते हैं; तत्ू-विदः--जो शरीर तथा आत्मा के ज्ञान में बढ़े-चढ़े हैं; न--नहीं; अन्यथा-- अन्यथा; शकक््यते--समर्थ है; कर्तुमु--करने के लिए; स्व-भाव:--प्रकृति; शोचताम्--शोक करने वालों का; इति--इस प्रकार।
जिन्हें आत्म-साक्षात्कार का पूरा-पूरा ज्ञान है, जो यह भलीभाँति जानते हैं कि आत्मा नित्यहै किन्तु शरीर नश्वर है, वे शोक द्वारा अभिभूत नहीं होते।
किन्तु जिन्हें आत्म-साक्षात्कार काज्ञान नहीं होता वे शोक करते हैं।
अतएव मोह-ग्रस्त व्यक्ति को शिक्षित कर पाना कठिन है।
"
लुब्धको विपिने कश्ित्पक्षिणां निर्मितोउन्तक:ः ।
वितत्य जाल॑ विदथे तत्र तत्र प्रलोभयन् ॥
५०॥
लुब्धक:--बहेलिया; विपिने--जंगल में; कश्चित्--किसी; पक्षिणाम्--पक्षियों का; निर्मित:--नियुक्त; अन्तक: --मारने वाला;वितत्य--फैलाकर; जालम्--जाल; विदधे--पकड़ लिया; तत्र तत्र--यहाँ वहाँ; प्रलोभवन्-- अनाज का लालच देकर।
एक बहेलिया था, जो पक्षियों को दानों का लालच देता था और तब एक जाल फैलाकरउन्हें पकड़ लेता था।
वह इस तरह रह रहा था मानो साक्षात् मृत्यु ने उसे पक्षियों का वधिकनियुक्त किया हो।
"
कुलिड्डमिथुनं तत्र विचरत्समदृश्यत ।
तयो: कुलिड़ी सहसा लुब्धकेन प्रलोभिता ॥
५१॥
कुलिड्र-मिथुनम्--कुलिंग नामक पक्षियों का जोड़ा ( नर तथा मादा ); तत्र--वहाँ ( जहाँ बहेलिया शिकार करता था );विचरत्--घूमते हुए; समहश्यत--उसने देखा; तयो:--जोड़े को; कुलिड्री--मादा पक्षी; सहसा--एकाएक; लुब्धकेन--बहेलिया द्वारा; प्रलोभिता--लालच में आ गई ।
जंगल में घूमते हुए उस बहेलिया ने कुलिंग पक्षियों का एक जोड़ा देखा।
इन दोनों में सेमादा पक्षी बहेलिया के प्रलोभन में आ गई।
"
सासज्जत सिच्स्तन्त्रयां महिष्य: कालयन्त्रिता ।
कुलिड्डस्तां तथापत्नां निरीक्ष्य भूशदु:खितः ।
स्नेहादकल्प: कृपण: कृपणां पर्यदेवयत् ॥
५२॥
सा--वह मादा पक्षी; असज॒त--फँस गई; सिच:--जाल की; तन्त्रयामू--रस्सी में; महिष्य:--हे रानियो; काल-यन्त्रिता--कालके वशीभूत होकर; कुलिड्ड:--नर कुलिंग पक्षी; तामू--उसको; तथा--उस अवस्था में; आपन्नाम्ू--पकड़ा हुआ; निरीक्ष्य--देखकर; भृूश-दुःखितः --अत्यन्त दुखी; स्नेहात्ू--स्नेहवश; अकल्प:--कुछ करने में असमर्थ; कृपण:--बेचारा पक्षी;कृपणाम्--बेचारी पत्नी के लिए; पर्यदेवयत्--शोक करने लगा।
हे सुयज्ञ की रानियो, नर कुलिंग पक्षी अपनी पत्नी को विधाता के अत्यन्त स्वणपूर्ण चंगुलमें पड़ी देखकर अत्यन्त दुखी हुआ।
स्नेहवश बेचारा पक्षी अपनी पत्नी को छुड़ा न सकने केकारण उसके लिए शोक करने लगा।
"
अहो अकरुणो देव: स्त्रियाकरुणया विभु: ।
कृपणं मामनुशोचन्त्या दीनया कि करिष्यति ॥
५३॥
अहो--ओह; अकरुण: --अत्यन्त क्रूर; देव:--विधाता; स्त्रिया--मेरी पत्ती से; आकरुणया--जो अत्यन्त करुणापूर्ण;विभु:--परमे श्वर; कृपणम्--बेचारा; माम्--मेरे लिये; अनुशोचन्त्या--शोक करती; दीनया--बेचारी; किम्--क्या;करिष्यति--करेगा।
ओह! विधाता कितना क्रूर है।
मेरी पत्ती असहाय होने से ही ऐसी विषम स्थिति में है--औरमेरे लिए विलाप कर रही है।
भला विधाता इस बेचारे मादा पक्षी को लेकर क्या पाएगा ?
उसेक्या लाभ होगा।
"
काम नयतु मां देवः किमर्धेनात्मनो हि मे ।
दीनेन जीवता दुःखमनेन विधुरायुषा ॥
५४॥
काममू--जैसा वह चाहता है; नयतु--ले जाए; माम्--मुझको; देव:-- भगवान्; किमू-- क्या लाभ; अर्धेन-- आधे से;आत्मन:--शरीर के; हि--निस्सन्देह; मे--मेरा; दीनेन--बेचारे द्वारा; जीवता--जीवित; दुःखम्--दुख में; अनेन--इस; विधुर-आयुषा--कष्टमय जीवन वाला।
यदि निर्दय विधाता मेरी अर्धांगिनी, मेरी पली, को लिए जा रहा है, तो वह मुझे भी क्योंनहीं ले जाता ?
आधा शरीर लेकर और अपनी पत्नी की क्षति से विरहित होकर मेरे जीने से क्यालाभ ?
मुझे इस तरह से कया मिलेगा ?
" कथं त्वजातपक्षांस्तान्मातृहीनान्बिभर्म्यहम् ।
मन्दभाग्या: प्रतीक्षन्ते नीडे मे मातरं प्रजा: ॥
५५॥
कथम्-कैसे; तु--लेकिन; अजात-पक्षान्ू--जिनके उड़ने के पंख अभी नहीं उगे; तानू--उन; मातृ-हीनान्ू--माता से बिछुड़ेहुओं को; बिभर्मि-- पालन करूँगा; अहम्--मैं; मन्द-भाग्या:--अत्यन्त अभागे; प्रतीक्षन्ते--वे प्रतीक्षा करते हैं; नीडे--घोंसलेमें; मे--मेरे; मातरम्--अपनी माता की; प्रजा:--पक्षी के बच्चे
पक्षी के अभागे बच्चे मातृविहीन होकर अपने घोंसले में उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं कि वहआए तो उन्हें खिलाए।
वे अब भी बहुत छोटे हैं और उनके पंख तक नहीं उगे हैं।
मैं उनका किसप्रकार पालन कर सकूँगा " एवं कुलिड्डं विलपन्तमारात्प्रियावियोगातुरम श्रुकण्ठम् ।
स एवं तं शाकुनिकः शरेणविव्याध कालप्रहितो विलीन: ॥
५६॥
एवम्--इस प्रकार; कुलिड्ल्रमू--पक्षी को; विलपन्तमू--विलाप करता; आरातू--दूरी से; प्रिया-वियोग--अपनी पत्नी की क्षतिके कारण; आतुरम्--अत्यन्त दुखी; अश्रु-कण्ठम्--आँखों में आँसू भर कर; सः--उसने ( बहेलिया ने ); एब--निस्सन्देह;तम्--उसको ( नर पक्षी को ); शाकुनिक:--जो गिद्ध तक को मार सके; शरेण--तीर से; विव्याध--बेध दिया; काल-प्रहित:ः--काल द्वारा प्रेरित होकर; विलीन:--छिपा, गुप्त।
अपनी पत्नी की क्षति के कारण कुलिंग पक्षी आँखों में आँसू भर कर विलाप कर रहा था।
तभी काल के आदेशों का पालन करते हुए अत्यन्त सावधानी से दूर छिपे बहेलिये ने अपना तीरछोड़ा जिसने कुलिंग पक्षी के शरीर को बेध कर उसे मार डाला।
"
एवं यूयमपश्यन्त्य आत्मापायमबुद्धय: ।
नैनं प्राप्स्यथ शोचन्त्यः पतिं वर्षशतैरपि ॥
५७॥
एवम्--इस प्रकार; यूयम्ू--तुम सब; अपश्यन्त्य:--न देखकर; आत्म-अपायम्-- अपनी मृत्यु को; अबुद्धयः--हे मूर्खों; न--नहीं; एनम्ू--उसको; प्राप्स्थथ--प्राप्त करोगी; शोचन्त्य:--शोक करती हुईं; पतिम्ू--अपने पति के लिए; वर्ष-शतैः--सैकड़ोंवर्षों तक; अपि-- भी |
इस प्रकार छोटे बालक के वेष में यमराज ने सभी रानियों को बताया : तुम सब इतनी मूर्खहो तुम शोक तो कर रही हो किन्तु तुम शोक तो कर रही हो किन्तु अपनी मृत्यु को भी नहीं देखरही हो।
अल्प ज्ञान के वशीभूत होकर तुम यह नहीं जानती हो कि यदि तुम सैकड़ों वर्षों तक भीअपने मृत पति के लिए शोक करो तो भी तुम उसे जीवित नहीं कर सकती और तब तक तुम्हाराजीवन समाप्त हो जाएगा।
"
श्रीहिरण्यकशिपुरुवाचबाल एवं प्रवदति सर्वे विस्मितचेतसः ।
ज्ञातयो मेनिरे सर्वमनित्यमयथोत्थितम् ॥
५८ ॥
श्री-हिरण्यकशिपु: उबाच-- श्री हिरण्यकशिपु ने कहा; बाले--बालक रूप में यमराज; एवम्--इस प्रकार; प्रवदति--दार्शनिकरूप में बोल रहा था; सर्वे--समस्त; विस्मित-- आश्वर्यचकित; चेतस:--हृदय वाले; ज्ञातय:ः --सम्बन्धीगण; मेनिरे-- उन्होंनेसोचा; सर्वम्--समस्त भौतिक वस्तुएँ; अनित्यम्ू--नाशवान्; अयथा-उत्थितम्--अस्थायी घटना से उदित।
हिरण्यकशिपु ने कहा : जब यमराज इस तरह छोटे से बालक के वेष में सुयज्ञ के मृत शरीरको घेरे हुए समस्त सम्बन्धियों को उपदेश दे रहे थे तो सभी लोग उनके दार्शनिक बचनों कोसुनकर दंग थे।
वे समझ सके कि प्रत्येक भौतिक वस्तु नाशवान् है, वह सदा विद्यमान नहीं रहसकती।
"
यम एतदुपाख्याय तत्रैवान्तरधीयत ।
ज्ञातयो हि सुयज्ञस्य चक्रुर्यत्साम्पपायिकम् ॥
५९॥
यमः--बालक रूप में यमराज; एतत्--यह; उपाख्याय--उपदेश देकर; तत्र--वहाँ; एव--निस्सन्देह; अन्तरधीयत--अन्तर्धानहो गया; ज्ञातव:ः --सम्बन्धियों ने; हि--निस्सन्देह; सुयज्ञस्थ--राजा सुयज्ञ के; चक्रुः--सम्पन्न किया; यत्--जो हैं;साम्परायिकम्--अन्येष्टि संस्कार।
बालक रूप में यमराज सुयज्ञ के समस्त मूर्ख सम्बन्धियों को उपदेश देकर उनकी दृष्टि सेओझल हो गया।
तब राजा सुयज्ञ के सम्बन्धियों ने अन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न की।
"
अतः शोचत मा यूय॑ परं चात्मानमेव वा ।
क आत्मा कः परो वात्र स्वीयः: पारक्य एव वा ।
स्वपराभिनिवेशेन विनाज्ञानेन देहिनाम् ॥
६०॥
अतः--अतएव; शोचत--शोक करो; मा--मत; यूयम्--तुम सब; परम्-- अन्य; च--तथा; आत्मानम्--अपने आप; एव--निश्चय ही; वा--अथवा; कः--कौन; आत्मा--अपना; क:--कौन; पर: --दूसरा; वा--अथवा; अत्र--इस भौतिक जगत में;स्वीय:--अपना; पारक्य:--अन्यों के लिए; एव--निस्सन्देह; वा--अथवा; स्व-पर-अभिनिवेशेन-- अपने तथा औरों केदेहात्मबुद्धि में लीन होने से; विना--अलावा; अज्ञानेन--ज्ञान का अभाव; देहिनाम्ू--समस्त जीवधारियों का।
अतएव तुममें से किसी को भी शरीर-क्षति के लिए, चाहे तुम्हारा अपना शरीर हो या अन्योंका हो, शोकसंतप्त नहीं होना चाहिए।
यह तो केवल अज्ञान है, जिससे मनुष्य यह सोचकरशारीरिक भेदभाव बरतता है कि मैं कौन हूँ?
अन्य लोग कौन हैं?
मेरा क्या है ?
उनका क्या है?
" श्रीनारद उवाचइति दैत्यपतेर्वाक्यं दितिराकर्ण्य सस्नुषा ।
पुत्रशोकं क्षणात्त्यक्त्वा तत्त्वे चित्तमधारयत् ॥
६१॥
श्री-नारद: उवाच-- श्री नारद मुनि ने कहा; इति--ईस प्रकार; दैत्य-पतेः--असुरों के राजा का; वाक्यम्--वाणी; दिति:--दिति, हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष की माता ने; आकर्ण्य--सुनकर; स-स्नुषा--हिरण्याक्ष की पत्नी सहित; पुत्र-शोकम्--अपने पुत्र हिरण्याक्ष का महान् वियोग; क्षणात्--तुरन्त; त्यक्त्वा--छोड़कर; तत्त्वे--जीवन के असली दर्शन में; चित्तमू--हृदयको; अधारयत्--लगाया।
श्री नारद ने आगे कहा : हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष की माता दिति ने अपनी पुत्रवधूहिरण्याक्ष की पत्नी रुषाभानु सहित हिरण्यकशिपु के उपदेशों को सुना।
तब उसने अपने पुत्र कीमृत्यु के शोक को भुला दिया और उसने अपने मन तथा ध्यान को जीवन का असली दर्शनसमझने में लगा दिया।
"
