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अध्याय तीन: हिरण्यकशिपु की अमर बनने की योजना

7.3श्रीनारद उबाचहिरण्यकशिपू राजन्नजेयमजरामरम्‌ ।

आत्मानमप्रतिद्वन्द्मेकराजं व्यधित्सत ॥

१॥

श्री-नारद: उवाच--नारद मुनि ने कहा; हिरण्यकशिपु:--दैत्यराज हिरण्यकशिपु; राजन्‌--हे राजा युथिष्ठटिर; अजेयम्‌--किसीशत्रु द्वारा न जीता जा सकने योग्य; अजर--जरा या व्याधि से रहित; अमरम्‌--अमर; आत्मानम्‌--स्वयं; अप्रतिद्वन्दम्‌--किसीप्रतिद्वन्द्दी या विरोधी से विहीन; एक-राजम्‌--ब्रह्माण्ड का एकछत्र राजा, चक्रवर्ती; व्यधित्सत--बनना चाहता था।

नारद मुनि ने महाराज युथिष्ठिर से कहा : दैत्यराज हिरण्यकशिपु अजेय तथा वृद्धावस्था एवंशरीर की जर्जरता से मुक्त होना चाहता था।

वह अणिमा तथा लघिमा जैसी समस्त योग-सिद्ध्ियों को प्राप्त करना, मृत्युरहित होना और ब्रह्मलोक समेत अखिल विश्व का एकछत्र राजाबनना चाहता था।

"

स तेपे मन्दरद्रोण्यां तप: परमदारुणम्‌ ।

ऊर्ध्वबाहर्नभोदृष्टि: पादाडुष्ठाश्रितावनि: ॥

२॥

सः--उसने ( हिरण्यकशिपु ने ); तेपे--सम्पन्न किया; मन्दर-द्रोण्याम्‌--मन्दर पर्वत की घाटी में; तपः--तपस्या; परम--अत्यधिक; दारुणम्‌--कठिन; ऊर्ध्व--ऊपर उठाये; बाहु:--बाहें; नभ:--आकाश की ओर; दृष्टि: --अपनी दृष्टि; पाद-अद्जुष्ठ--अपने पाँव के अँगूठे से; आश्रित--सहारा लेकर; अवनि:--पृथ्वी पर।

हिरण्यकशिपु ने मन्दर पर्वत की घाटी में अपने पाँव के अँगूठे के बल भूमि में खड़े होकर,अपनी भुजाएँ ऊपर किये तथा आकाश की ओर देखते हुए अपनी तपस्या प्रारम्भ की।

यहअवस्था अतीव कठिन थी, किन्तु सिद्धि प्राप्त करने के लिए उसने इसे स्वीकार किया।

"

जटादीधितिभी रेजे संवर्तार्क इवांशुभि: ।

तस्मिस्तपस्तप्यमाने देवा: स्थानानि भेजिरे ॥

३॥

जटा-दीधितिभि:--सिर पर जटा के तेज से; रेजे--चमक रहा था; संवर्त-अर्क:--प्रलयकालीन सूर्य; इब--सद्दश; अंशुभि:--किरणों से; तस्मिनू--जब वह ( हिरण्यकशिपु ); तपः--तपस्या में; तप्यमाने--लगा था; देवा: --सारे देवता जो हिरण्यकशिपुके आसुरी कृत्यों को देखने के लिए सारे ब्रह्माण्ड में घूम रहे थे; स्थानानि--अपने-अपने स्थानों को; भेजिरे--लौट गये।

हिरण्यकशिपु के जटाजूट से प्रलयकालीन सूर्य की किरणों के समान प्रकाशमान तथाअसह्य तेज प्रकट हुआ।

ऐसी तपस्या देखकर सारे देवता, जो अभी तक सारे लोकों में भ्रमणकर रहे थे, अपने-अपने घरों को लौट गये।

"

तस्य मूर्ध्न: समुद्धूतः सधूमोग्निस्तपोमय: ।

तीर्यगूर्ध्वमधो लोकान्प्रातपद्दिष्वगीरित: ॥

४॥

तस्य--उसके ; मूर्ध्न:--सिर से; समुद्धृतः --उत्पन्न हुआ; स-धूम:--धुआँ के साथ; अग्नि:--आग; तपः-मय:--कठिन तपस्याके कारण; तीर्यकू--अगल-बगल ; ऊर्ध्वमू--ऊपर; अध:--नीचे; लोकान्‌--सारे लोक; प्रातपत्‌--गर्म हो उठे; विष्वक्‌ --चारों ओर; ईरितः--फैली हुईं।

हिरण्यकशिपु की कठिन तपस्या के कारण उसके सिर से अग्नि प्रकट हुई और यह अग्नि अपने धुएँ समेत आकाश भर में फैल गई।

उसने ऊर्ध्व तथा अध: लोकों को घेर लिया जिससे वेसभी अत्यन्त गर्म हो उठे।

"

चुक्षुभुर्नद्युदन्वन्तः सद्ठीपाद्रिश्चचाल भू: ।

निपेतु: सग्रहास्तारा जज्वलुश्न दिशो दश ॥

५॥

चुक्षुभ:--विचलित हो उठे; नदी-उदन्वन्तः--सारी नदियाँ तथा समुद्र; स-द्वीप--टद्वीपों समेत; अद्विः--पर्वत; चचाल--हिलनेलगे; भू:--भूमण्डल की सतह; निपेतु:--गिर पड़े; स-ग्रहा:--ग्रहों सहित; तारा:--तारे; जज्वलु: --प्रज्वलित हो उठीं; च--भी; दिशः दश--दसों दिशाएँ |

उसकी कठिन तपस्या के बल से सारी नदियाँ तथा सारे समुद्र क्षुब्ध हो उठे, भूमण्डल कीसतह अपने पर्वतों तथा द्वीपों समेत हिलने लगी और तारे तथा ग्रह टूट कर गिर पड़े।

सारीदिशाएँ प्रज्वलित हो उठीं।

"

तेन तप्ता दिवं त्यक्त्वा ब्रहलोक॑ ययु: सुरा: ।

धात्रे विज्ञापयामासुर्देवदेव जगत्पते ।

दैत्येन्द्रपणसा तप्ता दिवि स्थातुं न शकक्‍नुम: ॥

६॥

तेन--उस ( तपस्या की अग्नि ) के द्वारा; तप्ता:--झुलसे; दिवम्‌--उच्च लोकों में अपने रिहायशी मकान; त्यक्त्वा--छोड़कर;ब्रहा-लोकम्‌--ब्रह्मा के रहने वाले लोक को; ययु:--गये; सुराः:--देवतागण; धात्रे--इस ब्रह्माण्ड के प्रधान ब्रह्मजी तक;विज्ञापयाम्‌ आसु:--निवेदन किया; देव-देव--हे देवताओं में प्रमुख; जगत्‌-पते--हे ब्रह्माण्ड के स्वामी; दैत्य-इन्द्र-तपसा--दैत्यराज हिरण्यकशिपु द्वारा की जा रही कठोर तपस्या के द्वारा; तप्ता:--जले हुए; दिवि--स्वर्गलोक में; स्थातुम्‌--रूकने केलिए; न--नहीं; शक्‍्नुम:--हम सब समर्थ हैं।

हिरण्यकशिपु की कठोर तपस्या से झुलसने तथा अत्यन्त विचलित होने के कारण समस्तदेवताओं ने अपने रहने के लोक छोड़ दिये और ब्रह्मा के लोक को गये जहाँ उन्होंने स्त्रष्टा को इसप्रकार सूचित किया--' हे देवताओं के स्वामी, हे ब्रह्माण्ड के प्रभु, हिरण्यकशिपु की कठोरतपस्या के कारण उसके शिर से निकलने वाली अग्नि के कारण हम लोग इतने उद्दिग्न हैं किहम अपने लोकों में रह नहीं सकते, अतएव हम आपके पास आये हैं।

"

'तस्य चोपशमं भूमन्विधेहि यदि मन्यसे ।

लोका न यावन्नड्छ््यन्ति बलिहारास्तवाभिभू: ॥

७॥

तस्य--उसके ; च--निस्सन्देह; उपशमम्‌--समाप्ति; भूमन्‌ू--हे महापुरुष; विधेहि--कृपया करें; यदि--यदि; मन्यसे--आपसही समझते हैं; लोकाः--विभिन्न लोकों के सारे निवासी; न--नहीं; यावत्‌--तब तक; नद्छ्ष्यन्ति--नष्ट हो जाएँगे; बलि-हारा:--पूजा के प्रति आज्ञाकारी; तब--तुम्हारी; अभिभू:--हे समस्त ब्रह्माण्ड के प्रधान ।

हे महापुरुष, हे ब्रह्माण्ड के प्रधान, यदि आप उचित समझें तो इन सारे उत्पातों को, जो सबकुछ विनष्ट करने के उद्देश्य से हो रहे हैं, कृपा करके रोक दें जिससे आपकी आज्ञाकारी प्रजाका संहार न हो।

"

तस्यायं किल सड्डूल्पश्चरतो दुश्चर तपः ।

श्रूयतां कि न विदितस्तवाथापि निवेदितम्‌ ॥

८ ॥

तस्य--उसका; अयम्‌--यह; किल--निश्चय ही; सड्जूल्प:--हृढ़ निश्चय; चरत:--सम्पन्न करने वाला; दुश्चरम्‌--अत्यन्त कठिन;तपः--तपस्या; श्रूयतामू--सुन लें; किम्‌ू--क्या; न--नहीं; विदित:--ज्ञात; तब--तुम्हारा; अथापि-- अब फिर भी;निवेदितम्‌--निवेदन किया गया।

हिरण्यकशिपु ने अत्यन्त कठिन तपस्या का ब्रत ले रखा है।

यद्यपि आपसे उसकी योजनाछिपी नहीं है, तो भी हम जिस रूप में उसके मन्तव्यों का निवेदन कर रहे हैं, कृपा करके उन्हेंसुन लें।

"

सृष्ठा चराचरमिदं तपोयोगसमाधिना ।

अध्यास्ते सर्वधिष्ण्येभ्य: परमेष्ठी निजासनम्‌ ॥

९॥

तदहं वर्धमानेन तपोयोगसमाधिना ।

कालात्मनोश्व नित्यत्वात्साधयिष्ये तथात्मन: ॥

१०॥

सृष्टा--सृजन करके; चर--चल; अचरम्‌--तथा अचल; इृदम्‌--यह; तपः--तपस्या का; योग--तथा योग शक्ति का;समाधिना--समाधि के अभ्यास द्वारा; अध्यास्ते--स्थित है; सर्व-धिष्ण्ये भ्यः--स्वर्गलोक समेत समस्त लोकों की अपेक्षा;परमेष्ठी --ब्रह्माजी ने; निज-आसनम्‌--अपना सिंहासन; तत्‌--अतएव; अहमू--मैं; वर्धभानेन--वृद्धि के कारण; तप:--तपस्या; योग--योग शक्ति; समाधिना--तथा समाधि से; काल--समय का; आत्मनो:--तथा आत्मा का; च--तथा;नित्यत्वात्‌--नित्यता से; साधयिष्ये -- प्राप्त करेगा; तथा--इतना; आत्मन:--अपने लिए

इस ब्रह्माण्ड में परमपुरुष ब्रह्माजी ने अपना उच्च पद कठिन तपस्या, योगशक्ति तथासमाधि द्वारा प्राप्त किया है।

फलस्वरूप इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि करने के बाद वे इसके सर्वाधिकपूज्य देवता बने हैं।

चूँकि मैं शाश्वत हूँ और काल भी शाश्रत है, अतएव मैं ऐसी ही तपस्या,योगशक्ति तथा समाधि के लिए अनेक जन्मों तक प्रयास करूँगा और वह स्थान ग्रहण करूँगाजो ब्रह्माजी ने प्राप्त किया है।

"

अन्यथेदं विधास्येडहमयथा पूर्वमोजसा ।

किमन्यै: कालनिर्धूतिः कल्पान्ते वैष्णवादिभि: ॥

११॥

अन्यथा--बिल्कुल उल्टा; इृदम्‌--यह ब्रह्माण्ड; विधास्ये--बना दूँगा; अहम्‌--मैं; अयथा--अनुपयुक्त; पूर्वम्‌ू--पहले जैसा;ओजसा--अपनी तपस्या के बल से; किम्‌ू--क्या लाभ; अन्यैः--दूसरे के साथ; काल-निर्धूतिः--काल के साथ समाप्त होनेवाला; कल्प-अन्ते--युग के अन्त में; वैष्णब-आदिभि:--ध्रुवलोक या बैकुण्ठ लोक जैसे लोकों से |

अपनी कठोर तपस्या से मैं पुण्य तथा पाप कर्मों के फलों को उलट दूँगा।

मैं इस संसारकी समस्त स्थापित प्रथाओं को पलट दूँगा।

कल्प के अन्त में श्रुवलोक भी मिट जाएगा।

अतएवइसका क्‍या लाभ है?

मैं तो ब्रह्मा के पद पर बना रहना अधिक पसन्द करूँगा।

"

इति शुश्रुम निर्बन्धं तप: परममास्थित: ।

विधत्स्वानन्तरं युक्त स्वयं त्रिभुवनेश्वर ॥

१२॥

इति--इस प्रकार; शुश्रुम--हमने सुना है; निर्बन्धम्‌-- प्रबल संकल्प; तप:ः--तपस्या; परमम्‌--अत्यन्त कठोर; आस्थित:--स्थित; विधत्स्व--कृपया कार्यवाही करें; अनन्तरम्‌--जल्दी से जल्दी; युक्तम्‌--उपयुक्त; स्वयम्‌-- अपने से, स्वयं; त्रि-भुवन-ईश्वर--हे तीनों संसारों के स्वामी

हे प्रभु, हमने विश्वस्त सूत्रों से सुना है कि हिरण्यकशिपु आपका पद प्राप्त करने के लिएकठिन तपस्या में जुटा हुआ है।

आप तीनों लोकों के स्वामी हैं।

आप जैसा उचित समझें वैसाअविलम्ब करें।

"

तवासन द्विजगवां पारमेष्ठयं जगत्पते ।

भवाय श्रेयसे भूत्यै क्षेमाय विजयाय च ॥

१३॥

तब--आपका; आसनमू--सिंहासन; द्विज--ब्राह्मण संस्कृति का अथवा ब्राह्मणों का; गवाम्‌--गौवों का; पारमेषछ्यम्‌--सर्वोच्च, परम; जगत्‌ू-पते--हे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी; भवाय--उन्नति के लिए; श्रेयसे--चरम सुख के लिए; भूत्यै--ऐश्वर्यबढ़ाने के लिए; क्षेमाय--पालन तथा सौभाग्य के लिए; विजयाय--विजय तथा बढ़ती प्रतिष्ठा के लिए; च--तथा |

हे ब्रह्माजी, निश्चय ही आपका पद इस ब्रह्माण्ड के सभी लोगों के लिए, विशेष रूप सेब्राह्मणों तथा गायों के लिए, अत्यन्त कल्याणप्रद है।

इससे ब्राह्मण-संस्कृति तथा गौ-सुरक्षा कोअधिकाधिक महिमामंडित किया जा सकता है और इस प्रकार सभी प्रकार के भौतिक सुख,ऐश्वर्य तथा सौभाग्य स्वतः वृद्धि करेंगे।

किन्तु दुर्भाग्यवश यदि हिरण्यकशिपु आपका स्थानग्रहण करता है, तो सब कुछ नष्ट हो जाएगा।

"

इति विज्ञापितो देवैर्भगवानात्मभूनूप ।

परितो भृगुदक्षाद्यैर्ययौ दैत्येश्वराश्रमम्‌ ॥

१४॥

इति--इस प्रकार; विज्ञापित: --सूचित; देवैः --समस्त देवताओं द्वारा; भगवान्‌--अत्यन्त शक्तिशाली; आत्म-भू:--कमल सेउत्पन्न ब्रह्माजी; नृप--हे राजा; परित:--घिरा हुआ; भृगु--भूगु द्वारा; दक्ष--दक्ष से; आद्यै:--तथा अन्‍्यों से; ययौ--गये; दैत्य-ईश्वर--दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु के; आश्रमम्‌--तपस्या स्थल पर।

हे राजा, देवताओं द्वारा इस प्रकार सूचित किये जाने पर अत्यन्त शक्तिशाली ब्रह्माजी भृगु,दक्ष तथा अन्य महर्षियों को साथ लेकर तुरन्त उस स्थान के लिए चल पड़े जहाँ हिरण्यकशिपुतपस्या कर रहा था।

"

न ददर्श प्रतिच्छन्नं वल्मीकतृणकीचकै: ।

पिपीलिकाभिराचीर्ण मेदस्त्वड्मांसशोणितम्‌ ॥

१५॥

तपन्तं तपसा लोकान्यथाभ्रापिहितं रविम्‌ ।

विलक्ष्य विस्मितः प्राह हसंस्तं हंसवाहन: ॥

१६॥

न--नहीं; ददर्श--देखा; प्रतिच्छन्नम्‌ू--आवृत, ढका हुआ; वल्मीक--बांबी; तृण--घास; कीचकै:--तथा बाँस के डंडे से;पिपीलिकाभि:--चींटियों द्वारा; आचीर्णम्‌--चारों ओर से खाया हुआ; मेद:--जिसकी चर्बी; त्वक्‌--चमड़ी; मांस--मांस;शोणितम्‌--तथा रक्त; तपन्तम्‌--तपाता हुआ; तपसा--कठिन तपस्या से; लोकान्‌ू--तीनों लोकों को; यथा--जिस तरह;अभ्र--बादलों से; अपिहितम्‌--आच्छादित; रविम्‌--सूर्य को; विलक्ष्य--देखकर; विस्मित:--आश्चर्य-चकित; प्राह--कहा;हसनू--हँसते हुए; तमू-- उसको; हंस-बवाहन: --हंस यान पर आसीन ब्रह्माजी ने।

हंसयान पर चलने वाले ब्रह्माजी पहले तो यह नहीं देख पाये कि हिरण्यकशिपु कहाँ है,क्योंकि उसका शरीर बाँबी, घास तथा बाँस के ड़ड़ों से आच्छादित था।

चूँकि हिरण्यकशिपुदीर्घकाल से वहाँ था अतएव चीटियाँ उसकी खाल, चर्बी, मांस तथा रक्त चट कर चुकी थीं।

तब ब्रह्माजी तथा देवताओं ने उसे खोज निकाला।

वह बादलों से आच्छादित सूर्य की भाँति सारेसंसार को अपनी तपस्या से तपा रहा था।

आश्चर्यचकित होकर ब्रह्माजी हँस पड़े और उसे इसप्रकार सम्बोधित करने लगे।

"

श्रीब्रह्मोवाचउत्तिष्ठीत्तिष्ठ भद्वं ते तप:सिद्धोइसि काश्यप ।

वरदोहमनुप्राप्तो व्रियतामीप्सितो वर: ॥

१७॥

श्री-ब्रह्म उवाच--ब्रह्माजी ने कहा; उत्तिष्ठट--उठो; उत्तिष्ठ--उठो; भद्रमू--कल्याण हो; ते--तुम्हारा; तपः-सिद्धः--तपस्याकरने में पूर्ण; असि--तुम हो; काश्यप--हे कश्यप पुत्र; वर-दः--वर देने वाला; अहम्‌--मैं; अनुप्राप्त:--आया हूँ;ब्रियताम्‌--माँग लो; ईप्सित:--वांछित; वर:--वरदान |

ब्रह्मजी ने कहा : हे कश्यप मुनि के पुत्र, उठो, उठो, तुम्हारा कल्याण हो।

अब तुम अपनीतपस्या में सिद्ध हो चुके हो, अतएव मैं तुम्हें वरदान देता हूँ।

तुम मुझसे जो चाहे सो माँग सकतेहो और मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करने का प्रयत्न करूँगा।

"

अद्वाक्षमहमेतं ते हत्सारं महदद्भुतम्‌ ।

दंशभक्षितदेहस्य प्राणा ह्ास्थिषु शेरते ॥

१८॥

अद्राक्षम्‌--स्वयं देखा है; अहम्‌-मैंने; एतम्‌--यह; ते--तुम्हारी; हत्‌-सारम्‌--सहन शक्ति; महत्‌--अत्यधिक; अद्भुतम्‌--आश्चर्यजनक; दंश-भक्षित--कीड़ों तथा चीटियों से खायी हुईं; देहस्थ--देह का; प्राणा: --प्राण, प्राणवायु; हि--निस्सन्देह;अस्थिषु--हड्डियों में; शेरते--शरण ले रहा है।

मैं तुम्हारे धर्य को देखकर अत्यन्त विस्मित हूँ।

सभी तरह के कीड़ों तथा चीटियों द्वारा खायेतथा काटे जाने के बावजूद तुम अपनी अस्थियों में प्राणवायु को संचालित किये हुए हो।

निस्सन्देह, यह आश्चर्यजजनक है।

"

नैतत्पूर्वर्षयश्चक्कु्न करिष्यन्ति चापरे ।

निरम्बुर्धारयेत्प्राणान्को वै दिव्यसमा: शतम्‌ ॥

१९॥

न--नहीं; एतत्‌--यह; पूर्व-ऋषय:--तुम्हारे पहले के ऋषि यथा भूगु ने; चक्कु:--सम्पन्न किया; न--न तो; करिष्यन्ति--करेंगे;च--भी; अपरे--अन्य लोग; निरम्बु:--जल पिये बिना; धारयेत्‌--जीवित रख सकते हैं; प्राणान्‌--प्राण वायु को; कः--कौन;बै--निस्सन्देह; दिव्य-समा:--दैवी वर्ष; शतम्‌--एक सौ।

यहाँ तक कि भूगु जैसे साधु पुरुष, जो पहले जन्म ले चुके हैं ऐसी कठिन तपस्या नहीं करसके हैं, न भविष्य में भी कोई ऐसा कर सकेगा।

इस तीनों लोकों में ऐसा कौन होगा जो जलपिये बिना एक सौ दैवी वर्षों तक जीवन धारण कर सके ?

" व्यवसायेन तेनेन दुष्करेण मनस्विनाम्‌ ।

तपोनिष्ठेन भवता जितोहं दितिनन्दन ॥

२०॥

व्यवसायेन--संकल्प से; ते--तुम्हारा; अनेन--इस; दुष्करेण--दुष्कर; मनस्विनाम्‌ू--बड़े-बड़े ऋषियों तथा साथु पुरुषों केलिए भी; तपः-निष्ठेन--तपस्या करने के उद्देश्य से; भवता--तुम्हारे द्वारा; जित:--जीता गया; अहम्‌--मैं; दिति-नन्दन--हेदिति पुत्र

हे दितिपुत्र, तुमने अपने महान्‌ संकल्प से तथा अपनी तपस्या से वह कर दिखाया है, जोबड़े-बड़े साधु पुरुषों के लिए भी दुष्कर है।

इस तरह तुमने मुझे निश्चय ही जीत लिया है।

"

ततस्त आशिष: सर्वा ददाम्यसुरपुड्रव ।

मर्तस्य ते हामर्तस्य दर्शनं नाफलं मम ॥

२१॥

ततः--इसके कारण; ते--तुमको; आशिष: --वरदान; सर्वा:--सभी; ददामि--दूँगा; असुर-पुड्रब--हे असुरों में श्रेष्ठ;मर्तस्थय--मरने वाले का; ते--तुम्हारी तरह; हि--निस्सन्देह; अमर्तस्थ--न मरने वाले का; दर्शनम्‌--दर्शन; न--नहीं;अफलम्‌--बिना फल के; मम--मेरा ।

हे असुरों में श्रेष्ठ, इस कारण मैं तुम्हारी इच्छानुसार तुम्हें सारे वरदान देने के लिए तैयार हूँ।

मैं देवताओं के दैवी संसार से सम्बन्धित हूँ, जहाँ देवतागण मनुष्यों की तरह नहीं मरते।

अतएवयद्यपि तुम मर्त्य हो, किन्तु तुमने मेरा दर्शन किया है, अत: यह व्यर्थ नहीं जाएगा।

"

श्रीनारद उबाचइत्युक्त्वादिभवो देवो भक्षिताड़ंं पिपीलिकै: ।

कमण्डलुजलेनौक्षद्दिव्येनामोघराधसा ॥

२२॥

श्री-नारदः उबाच-- श्री नारद मुनि ने कहा; इति--इस प्रकार; उक्त्वा--कहकर; आदि-भव:--इस ब्रह्माण्ड का पहला जीवितप्राणी, ब्रह्माजी; देव:--प्रधान देवता; भक्षित-अड्डमू--हिरण्यकशिपु का शरीर जो प्रायः खाया जा चुका था; पिपीलिकै: --चींटियों द्वारा; कमण्डलु--ब्रह्माजी के हाथ के जलपात्र से; जलेन--जल से; औक्षत्‌--छिड़का; दिव्येन--आध्यात्मिक,सामान्य नहीं; अमोघ-- अचूक; राधसा--जिसकी शक्ति |

श्री नारद मुनि ने आगे कहा : हिरण्यकशिपु से ये शब्द कहने के बाद इस ब्रह्माण्ड के प्रथमजीव ब्रह्माजी ने, जो अत्यन्त शक्तिमान हैं, उसके शरीर पर अपने कमण्डल से दिव्य अचूकआध्यात्मिक जल छिड़का, जिसे चींटियों तथा कीड़े-मकोड़ों ने खा लिया था।

इस तरह उन्होंनेहिरण्यकशिपु को जीवित किया।

"

स तत्कीचकवल्मीकात्सहओजोबलान्वित: ।

सर्वावयवसम्पन्नो वज़्संहननो युवा ।

उत्थितस्तप्तहेमाभो विभावसुरिवैधस: ॥

२३॥

सः--वह हिरण्यकशिपु; तत्‌--उस; कीचक-वल्मीकात्‌--बाँबी तथा बाँस के कुंज से; सह:ः--मानसिक शक्ति; ओज:--इन्द्रिय शक्ति; बल--तथा पर्याप्त शारीरिक शक्ति से; अन्वित:--युक्त; सर्व--समस्त; अवयव--शरीर के अंग; सम्पन्न: --पूर्णतया फिर से पाकर; वज़-संहनन: --वज् के समान मजबूत शरीर वाला; युवा--तरूण; उत्थित: --उठा हुआ; तप्त-हेम-आभः--जिसके शरीर की कान्ति पिघले सोने के समान थी; विभावसु: --अग्नि; इब--सहश; एधस: --काष्ट से |

ज्योंही ब्रह्म ने अपने कमंडल से उसके शरीर पर जल छिड़का त्योंही हिरण्यकशिपु उठबैठा।

उसके शरीर के अंग-प्रत्यंग इतने बलवान्‌ थे कि वह वज्ञ के आघात को भी सहन करसकता था।

इतनी शारीरिक शक्ति एवं पिघले सोने की सी शारीरिक कान्ति से युक्त वह पूर्णतरुण पुरुष की भाँति बाँबी से उसी तरह प्रकट हुआ जिस तरह काष्ठ से अग्नि उत्पन्न होती है।

"

स निरीक्ष्याम्बरे देव हंसवाहमुपस्थितम्‌ ।

ननाम शिरसा भूमौ तहर्शनमहोत्सव: ॥

२४॥

सः--उसने ( हिरण्यकशिपु ने ); निरीक्ष्य--देखकर; अम्बरे--आकाश में; देवम्‌--परम देवता; हंस-वाहम्‌--हंस-वायुयान परचढ़ने वाला; उपस्थितम्‌--अपने समक्ष स्थित; ननाम--नमस्कार किया; शिरसा--शिर के बल; भूमौ-- भूमि पर; तत्‌-दर्शन--ब्रह्माजी का दर्शन कर के; महा-उत्सव: --अत्यन्त प्रसन्न

आकाश में हंस-वायुयान पर सवार ब्रह्मा को अपने समक्ष देखकर हिरण्यकशिपु अत्यन्तप्रसन्न हुआ।

वह तुरन्त शिर के बल भूमि पर गिर पड़ा और भगवान्‌ के प्रति अपनी कृतज्ञताप्रकट करने लगा।

"

उत्थाय प्राज्जललि: प्रह्न ईक्षमाणो दशा विभुम्‌ ।

हर्षाश्रुपुलकोद्धेदो गिरा गद्गदयागृणात्‌ ॥

२५॥

उत्थाय--उठकर; प्राज्ललि:--हाथ जोड़े; प्रह्ृः--विनीत भाव से; ईक्षमाण:--देखते हुए; दशा--अपनी आँखों से; विभुम्‌ू--इसब्रह्माण्ड के भीतर परम पुरुष को; हर्ष--प्रसन्नता के; अश्रु--आँसुओं से; पुलक--शरीर में रोमांच; उद्धेदः--सजीव; गिरा--शब्दों से; गदगदया--रूक-रूक कर; अगृणात्‌-प्रार्थना की |

तब दैत्यराज भूमि से उठकर एवं ब्रह्माजी को अपने समक्ष देखकर प्रसन्नता से अभिभूत होगया।

वह अअश्रुपूर्ण नेत्रों एवं कम्पित पुलकित शरीर से अपने हाथ जोड़कर तथा अवरुद्ध वाणीसे ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए विनीत मुद्रा में प्रार्थना करने लगा।

"

श्रीहिरण्यकशिपुरुवाचकल्पान्ते कालसूष्टेन योउन्धेन तमसावृतम्‌ ।

अभिव्यनग्जगदिदं स्वयज्ज्योतिः स्वरोचिषा ॥

२६॥

आत्मना त्रिवृता चेदं सृजत्यवति लुम्पति ।

रजःसत्त्वतमोधाम्ने पराय महते नम: ॥

२७॥

श्री-हिरण्यकशिपु: उबाच--हिरण्यकशिपु ने कहा; कल्प-अन्ते--ब्रह्माजी के प्रत्येक दिन के अन्त में; काल-सूष्टेन--काल( समय ) द्वारा सृजित; य:ः--जो; अन्धेन--घने अंधकार से; तमसा--अज्ञान से; आवृतम्‌--ढका हुआ; अभिव्यनक्‌-- प्रकट,व्यक्त; जगत्‌--विराट अभिव्यक्ति; इदम्‌--यह; स्वयम्‌-ज्योति:ः --आत्म-तेज; स्व-रोचिषा--अपने शरीर की किरणों से;आत्मना--अपने से; त्रि-वृता--प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा संचालित; च--भी; इदम्‌--यह भौतिक जगत; सृजति--उत्पन्नकरता है; अवति--पालन करना है; लुम्पति--संहार करता है; रज:--रजोगुण का; सत्त्व--सतोगुण; तम:ः--तथा तमोगुण का;धाम्ने--परम स्वामी को; पराय--परम को; महते--महान्‌ को; नमः--मेरा सादर नमस्कार।

मैं इस ब्रह्माण्ड के परम स्वामी को सादर नमस्कार करता हूँ।

उनके जीवन के प्रत्येक दिनके अन्त में यह ब्रह्माण्ड काल के प्रभाव से घने अंधकार द्वारा आच्छादित हो जाता है और दूसरेदिन पुनः वही आत्म-तेजस्वी स्वामी अपने निजी तेज से अपनी भौतिक शक्ति के माध्यम से, जोप्रकृति के तीन गुणों से युक्त है, सम्पूर्ण जगत का सृजन, पालन तथा संहार करता है।

वे ब्रह्माजीही सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण--इन तीन प्रकृति के गुणों के आधार हैं।

"

नम आद्याय बीजाय ज्ञानविज्ञानमूर्तये ।

प्राणेन्द्रियमनोबुद्धिविकारैर्व्यक्तिमीयुषे ॥

२८ ॥

नमः--मैं सादर नमस्कार करता हूँ; आद्याय--आदि जीव को; बीजाय--विराट विश्व के बीज को; ज्ञान--ज्ञान के; विज्ञान--व्यावहारिक ज्ञान के; मूर्तये--अर्चा विग्रह या स्वरूप को; प्राण--प्राणों के ; इन्द्रिय--इन्द्रिय के; मनः--मन के; बुद्धि--बुद्धिके; विकारैः--रूपान्तरों से; व्यक्तिमू--अभिव्यक्ति; ईयुषे--जिसने प्राप्त कर लिया है।

मैं इस ब्रह्माण्ड के आदि पुरुष ब्रह्मजी को नमस्कार करता हूँ जो ज्ञान विशेष हैं तथा जोइस विराट जगत को उत्पन्न करने में मन तथा अनुभूत बुद्धि का उपयोग कर सकते हैं।

उनकेकार्य-कलापों के ही कारण इस ब्रह्माण्ड में हर वस्तु दृष्टिगोचर हो रही है, अतएव वे समग्रअभिव्यक्तियों के कारण हैं।

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त्वमीशिषे जगतस्तस्थुषश्चप्राणेन मुख्येन पति: प्रजानाम्‌ ।

चित्तस्य चित्तैर्मनइन्द्रियाणांपतिर्महान्भूतगुणाशयेश: ॥

२९॥

त्वमू--तुम; ईशिषे--वास्तविक नियंत्रण करते हो; जगत:--चल प्राणियों का; तस्थुष:--एक स्थान पर स्थिर रहने वालों का;च--तथा; प्राणेन--प्राण से; मुख्येन--समस्त कार्यकलापों का उद्गम; पति:--स्वामी; प्रजानाम्‌ू--समस्त जीवों का;चित्तस्य--मन का; चित्तै:--चेतना से; मनः--मन का; इन्द्रियाणाम्‌--तथा दो प्रकार की इन्द्रियों ( कर्मेन्द्रियाँ तथा ज्ञानेन्द्रियाँ )का; पति:--स्वामी; महान्‌--महान्‌; भूत-- भौतिक तत्त्वों का; गुण--तथा भौतिक तत्त्वों के गुण; आशय--इच्छाओं का;ईशः--परम स्वामी |

आप ही इस भौतिक जगत के जीवन के उद्गम होने से चर तथा अचर दोनों प्रकार केजीवों के स्वामी तथा नियन्ता हैं और उनकी चेतना को प्रेरित करते रहते हैं।

आप मन और कर्म तथा ज्ञान की इन्द्रियों को धारण करते हैं अतएवं आप समस्त भौतिक तत्त्वों तथा उनके गुणों केमहान्‌ नियन्ता हैं।

आप समस्त इच्छाओं के भी नियन्ता हैं।

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'त्वं सप्ततन्तून्वितनोषि तन्‍्वाअय्या चतुहोंत्रकविद्यया च ।

त्वमेक आत्मात्मवतामनादि-रनन्तपार: कविरन्तरात्मा ॥

३०॥

त्वमू--तुम; सप्त-तन्तून्‌ू--सात प्रकार के वैदिक अनुष्ठान, जिनमें पहला है अग्निष्टोम यज्ञ; वितनोषि--फैलाते हो; तन्वा--अपनेशरीर से; त्र्या--तीन वेद; चतुः-होत्रक--चार प्रकार के पुरोहित जो होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा और उद्गाता कहलाते हैं; विद्यया--आवश्यक ज्ञान द्वारा; च-- भी; त्वम्‌--तुम; एक:--एक; आत्मा--परमात्मा; आत्म-वताम्‌--सारे जीवों का; अनादि: --आदिरहित; अनन्त-पार: --अन्तहीन; कवि: --परम प्रेरक; अन्त:-आत्मा--हृदय के भीतर स्थिर परमात्मा ।

हे प्रभु, आप साक्षात्‌ वेदों के रूप में तथा समस्त याज्ञिक ब्राह्मणों के कार्यकलापों सेसम्बन्धित ज्ञान के द्वारा अग्निष्टोम इत्यादि सात प्रकार के यज्ञों के वैदिक अनुष्ठानों का विस्तारकरते हैं।

निस्सन्देह, आप याज्ञिक ब्राह्मणों को तीनों वेदों में उल्लिखित अनुष्ठानों को सम्पन्नकरने के लिए प्रेरित करते हैं।

समस्त जीवों की अन्तरात्मा होने से आप आदिरहित, अन्तरहिततथा सर्वज्ञ हैं, आप काल तथा देश की सीमाओं के परे हैं।

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त्वमेव कालोनिमिषो जनाना-मायुर्लवाद्यवयवै: क्षिणोषि ।

कूटस्थ आत्मा परमेष्ठय्जो महां-स्त्वं जीवलोकस्य च जीव आत्मा ॥

३१॥

त्वमू--तुम, एक ही; एव--निश्चित; काल:--अनन्त समय; अनिमिष:--बिना पलक झाँपे; जनानाम्‌--समस्त जीवों के;आयु:--आयु, उप्र; लव-आदि--सेकंड, पल, मिनट तथा घन्टे आदि; अवयवै:--विभिन्न भागों से; क्षिणोषि-- क्षीण करते हो,घटाते हो; कूट-स्थ:--किसी से प्रभावित हुए बिना; आत्मा--परमात्मा; परमेष्ठी --परमे ्वर; अज: -- अजन्मा; महान्‌--महान;त्वमू--तुम; जीव-लोकस्य--इस भौतिक जगत का; च-- भी; जीव:--जीवन का कारण; आत्मा--परमात्मा |

हे स्वामी, आप नित्य जागते रहते हैं और जो कुछ घटित होता है उसे देखते हैं।

नित्य कालके रूप में आप अपने विभिन्न अंगों तथा क्षण, सेकंड, मिनट तथा घंटे से समस्त जीवों की आयुघटाते हैं फिर भी आप अपरिवर्तनशील हैं, एक ही साथ परमात्मा, साक्षी तथा अजन्मा,सर्वव्यापी नियन्ता हैं, जो समस्त जीवों के जीवन के कारण हैं।

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त्वत्त: पर नापरमप्यनेज-देजच्च किश्ञिद्व्यतिरिक्तमस्ति ।

विद्या: कलास्ते तनवश्च सर्वाहिरण्यगर्भो सि बृहत्रत्रिपृष्ठ: ॥

३२॥

त्वत्त:--तुमसे; परम्‌--उच्चतर; न--नहीं; अपरम्‌--निम्नततर; अपि-- भी; अनेजत्‌-- अचर; एजत्‌--चर; च--तथा;किख्जित्‌--कोई वस्तु; व्यतिरिक्तमू-पृथक्‌; अस्ति-- है; विद्या: --विद्या, ज्ञान; कला:--अंश; ते--तुम्हारे; तनवः--शरीर केलक्षण; च--तथा; सर्वा:--सभी; हिरण्य-गर्भ: --अपने उदर में ब्रह्माण्ड को रखने वाला; असि--तुम हो; बृहत्‌--बड़े से बड़ा;त्रि-पृष्ठ:--प्रकृति के तीन गुणों से परे।

आपसे पृथक्‌ कुछ भी नहीं है चाहे वह अच्छा हो या निम्नतर, अचर या चर।

वैदिकवाड्मय से यथा उपनिषदों से तथा मूल वैदिक ज्ञान के उपायों से प्राप्त ज्ञान आपके बाह्य शरीरकी रचना करने वाले हैं।

आप हिरण्यगर्भ अर्थात्‌ ब्रह्माण्ड के आगार हैं, लेकिन परम नियन्ता केरूप में स्थित होने से आप तीन गुणों से युक्त भौतिक जगत से परे हैं।

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व्यक्त विभो स्थूलमिदं शरीरंयेनेन्द्रियप्राणमनोगुणांस्त्वम्‌ ।

भुड्क्षे स्थितो धामनि पारमेष्ठय्रेअव्यक्त आत्मा पुरुष: पुराण: ॥

३३॥

व्यक्तमू--प्रकट; विभो--हे प्रभु; स्थूलम्‌ू--विराट अभिव्यक्ति; इदम्‌ू--यह; शरीरम्‌--बाह्य शरीर; येन--जिससे; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; प्राण-- प्राण; मन:ः--मन; गुणान्‌--दिव्य गुण; त्वम्‌--तुम; भुद्क्षे-- भोग करते हो; स्थित:--स्थित; धामनि-- अपनेधाम में; पारमेष्ठथे--परम; अव्यक्त:--सामान्य ज्ञान से प्रकट न होने वाला; आत्मा--आत्मा; पुरुष: --परम पुरुष; पुराण: --आदि, सबसे प्राचीन।

हे प्रभु, आप अपने धाम में निरन्तर स्थित रह कर अपने विराट रूप को इस विराट जगत केभीतर से विस्तारित करते हैं और इस तरह आप भौतिक जगत का आस्वादन करते प्रतीत होते हैं।

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आप ब्रह्म, परमात्मा, सबसे प्राचीन ई श्वर हैं।

अनन्ताव्यक्तरूपेण येनेदमखिलं ततम्‌ ।

चिदचिच्छक्तियुक्ताय तस्मै भगवते नमः ॥

३४॥

अनन्त-अव्यक्त-रूपेण-- असीम, अप्रकट रूप द्वारा; येन--जिससे; इदम्‌--यह; अखिलम्‌--सम्पूर्ण; ततम्‌--विस्तारित;चित्‌--आध्यात्मिक; अचित्‌-- भौतिक; शक्ति--शक्ति; युक्ताय--से युक्त; तस्मै--उस; भगवते-- भगवान्‌ को; नमः--मैंसादर नमस्कार करता हूँ।

मैं उन परमब्रह्म को नमस्कार करता हूँ जिन्होंने अपने अनन्त, अव्यक्त रूप को विराट जगतके रूप में ब्रह्माण्ड की समग्रता में विस्तार किया है।

उनमें बहिरंगा शक्ति तथा अन्तरंगा शक्तिऔर समस्त जीवों से समन्वित मिश्रित तटस्था शक्ति पाई जाती है।

यदि दास्यस्यभिमतान्वरान्मे वरदोत्तम ।

भूतेभ्यस्त्वद्विसृष्टे भ्यो मृत्युर्मा भून्मम प्रभो ॥

३५॥

" यदि--यदि; दास्यसि--दोगे; अभिमतान्‌-- वांछित; वरान्‌ू-- वर; मे--मुझको; वरद-उत्तम--हे समस्त वरदायकों में श्रेष्ठ;भूतेभ्य:--जीवों से; त्वत्‌--तुमसे; विसृष्टे भ्यः --उत्पन्न किये गये; मृत्यु:--मृत्यु; मा--नहीं; भूत्‌--हो; मम--मेरे; प्रभो--हेस्वामी

हे प्रभो, हे श्रेष्ठ वरदाता, यदि आप मुझे मेरा मनचाहा वर देना ही चाहते हैं, तो यह वर देंकि मैं आपके द्वारा उत्पन्न किसी भी जीव के द्वारा मृत्यु को प्राप्त न होऊँ।

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नान्तर्बहिर्दिवा नक्तमन्यस्मादपि चायुथे: ।

न भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैन मृगैरपि ॥

३६॥

न--नहीं; अन्तः-- भीतर ( घर या महल ); बहिः--घर के बाहर; दिवा--दिन के समय; नक्तम्‌--रात्रि के समय; अन्यस्मात्‌ --ब्रह्मा के परे अन्य किसी से; अपि-- भी; च-- भी; अयुधे:--इस जगत में प्रयुक्त होने वाले किसी भी हथियार से; न--न तो;भूमौ-- भूमि पर; न--नहीं; अम्बरे-- आकाश में; मृत्यु:--मृत्यु; न--नहीं; नरैः--किसी मनुष्य द्वारा; न--न तो; मृगैः--किसीपशु द्वारा; अपि-- भी ।

मुझे यह वर दें कि मैं न तो घर के अन्दर, न घर के बाहर, न दिन के समय, न रात में, नभूमि पर, न आकाश में मरूँ।

मुझे वर दें कि मेरी मृत्यु न तो आपके द्वारा उत्पन्न जीवों केअतिरिक्त अन्य किसी के द्वारा हो, न किसी हथियार से हो, न किसी मनुष्य या पशु के द्वारा हो।

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व्यसुभिर्वासुमद्धिवा सुरासुरमहोरगै: ।

अप्ररिद्वन्द्वतां युद्धे ऐकपत्यं च देहिनामू ॥

३७॥

सर्वेषां लोकपालानां महिमानं यथात्मन: ।

तपोयोगप्रभावाणां यन्न रिष्यति कहिचित्‌ ॥

३८॥

व्यसुभि:--निर्जीव वस्तुओं द्वारा; वा--अथवा; असुमद्धिः--सजीवों द्वारा; वा--अथवा; सुर--देवताओं द्वारा; असुर--दैत्योंद्वारा; महा-उरगैः--अधोलोक में वास करने वाले बड़े-बड़े सर्पों द्वारा; अप्रतिद्वन्द्वतामू--जिसकी बराबरी करने वाला न हो;युद्धे--युद्ध में; ऐक-पत्यम्‌-- श्रेष्ठठ; च--तथा; देहिनाम्‌ू-- भौतिक शरीरधारियों के ऊपर; सर्वेषाम्‌ू--सभी; लोक-पालानाम्‌ू--समस्त लोकों के प्रधान देवताओं का; महिमानम्‌--यश; यथा--जिस तरह; आत्मन: --आपका; तपः-योग-प्रभावाणाम्‌ू--उन सबों का जिन्हें तपस्या तथा योगाभ्यास द्वारा शक्ति प्राप्त होती है; यत्‌--जो; न--कभी नहीं; रिष्यति--नष्टहोती है; कर्हिचित्‌ू--कभी भी |

आप मुझे वर दें कि किसी सजीव या निर्जीव प्राणी द्वारा मेरी मृत्यु न हो।

मुझे यह भी वर देंकि मैं किसी देवता या असुर द्वारा या अधोलोकों के किसी बड़े सर्प द्वारा न मारा जाऊँ।

चूँकिआपको युद्धभूमि में कोई मार नहीं सकता इसलिए आपका कोई प्रतिद्वन्द्दी भी नहीं है।

इसीप्रकार आप मुझे यह भी वर दें कि मेरा भी कोई प्रतिद्वन्द्दी न हो।

मुझे सारे जीवों तथा लोकपालोंका एकछत्र स्वामित्व प्रदान करें और उस पद से प्राप्त होने वाला समस्त यश दें।

साथ ही मुझेलम्बी तपस्या तथा योगाभ्यास से प्राप्त होने वाली सारी योग शक्तियाँ दें, क्योंकि ये कभी भीविनष्ट नहीं हो सकतीं।

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