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अध्याय चार: हिरण्यकशिपु ब्रह्मांड को आतंकित करता है

7.4श्रीनारद उवाचएवं वृतः शतधृतिर्हिरण्यकशिपोरथ ।

प्रादात्तत्तपसा प्रीतो वरांस्तस्य सुदुर्लभान्‌ ॥

१॥

श्री-नारदः उबाच-- श्री नारद मुनि ने आगे कहा; एवम्‌--इस प्रकार; वृत:--याचना की; शत-धृति: --ब्रह्माजी ने;हिरण्यकशिपो:--हिरण्यकशिपु की; अथ--तब; प्रादात्‌ू--प्रदान किया; तत्‌--उसकी; तपसा--कठिन तपस्या से; प्रीत:--प्रसन्न होकर; बरान्‌--वरों को; तस्य--हिरण्यकशिपु को; सु-दुर्लभान्‌ू--अत्यन्त अप्राप्य ।

नारद मुनि ने कहा : ब्रह्माजी हिरण्यकशिपु की दुष्कर तपस्या से अत्यन्त प्रसन्न थे।

अतएवजब उसने उनसे वर माँगे तो उन्होंने निस्सन्देह वे दुर्लभ वर प्रदान कर दिये।

"

श्रीब्रह्मोवाचतातेमे दुर्लभा: पुंसां यान्वृणीषे वरान्मम ।

तथापि वितराम्यड़ वरान्यद्यपि दुर्लभान्‌ ॥

२॥

श्री-ब्रह्मा उबाच--ब्रह्माजी ने कहा; तात-हहे पुत्र; इमे--ये सभी; दुर्लभा:--बहुत कम प्राप्त होने वाले; पुंसाम्‌ू--मनुष्यों को;यानू--जो; वृणीषे--तुम माँगते हो; वरान्‌--वरों को; मम--मुझसे; तथापि--फिर भी; वितरामि--मैं तुम्हें प्रदान करूँगा;अड्ग-हे हिरण्यकशिपु; वरान्‌--वरों को; यद्यपि--यद्यपि; दुर्लभान्‌ू--सामान्यतया प्राप्त न होने वाले |

ब्रह्मजी ने कहा : हे हिरण्यकशिपु, तुमने जो वर माँगे हैं, वे अधिकांश मनुष्यों को बड़ीकठिनाई से प्राप्त हो पाते हैं।

हे पुत्र, यद्यपि ये वर सामान्यतया उपलब्ध नहीं हो पाते, तथापि मैंतुम्हें प्रदान करूँगा।

"

ततो जगाम भगवानमोधानुग्रहो विभु: ।

'पूजितोसुरवर्येण स्तूयमान:ः प्रजे श्र: ॥

३॥

ततः--तत्पश्चात्‌; जगाम--चले गये; भगवान्‌--अत्यन्त शक्तिमान, ब्रह्म जी; अमोघ--न चूकने वाले; अनुग्रह:--जिसका वर;विभुः--इस ब्रह्माण्ड में सर्वश्रेष्ठ; पूजित:--पूजित होकर; असुर-वर्येण--अत्यन्त सम्माननीय असुर हिरण्यकशिपु द्वारा;स्तूयमान:-- प्रशंसित होकर; प्रजा-ईश्ररः:--अनेक देवताओं द्वारा, जो विभिन्न क्षेत्रों के स्वामी हैं।

तब अमोध वर देने वाले ब्रह्माजी दैत्यों में श्रेष्ठ हिरण्यकशिपु द्वारा पूजित तथा महर्षियों एवंसाधु पुरुषों द्वारा प्रशंसित होकर वहाँ से विदा हो गये।

"

एवं लब्धवरो दैत्यो बिभ्रद्धेममयं वपु: ।

भगवत्यकरोदददवेषं भ्रातुर्वधमनुस्मरन्‌ ॥

४॥

एवम्‌--इस प्रकार; लब्ध-वरः--वांछित वरदान पाकर; दैत्य:--हिरण्यकशिपु; बिभ्रत्‌ू--प्राप्त करके; हेम-मयम्‌--सोने कीकान्ति वाला; वपु:--शरीर; भगवति-- भगवान्‌ विष्णु के प्रति; अकरोत्‌--निभाया; द्वेषम्‌--ईर्ष्या; भ्रातुः वधम्‌--अपने भाई केवध को; अनुस्मरनू--सदैव सोचते हुए।

इस प्रकार बह्म जी से आशीष पाकर तथा कान्तियुक्त स्वर्णिम देह पाकर असुरहिरण्यकशिपु अपने भाई के वध का स्मरण करता रहा जिससे वह भगवान्‌ विष्णु का ईर्ष्यालुबना रहा।

"

स विजित्य दिश:ः सर्वा लोकां श्व त्रीन्‍्महासुरः ।

देवासुरमनुष्येन्द्रगन्धर्वगरुडोरगान्‌ ॥

५॥

सिद्धचारणविद्याश्रानृषीन्पितृपतीन्मनून्‌ ।

यक्षरक्ष:पिशाचेशान्प्रेतभूतपतीनपि ॥

६॥

सर्वसत्त्वपतीज्ित्वा वशमानीय विश्वजित्‌ ।

जहार लोकपालानां स्थानानि सह तेजसा ॥

७॥

सः--वह ( हिरण्यकशिपु ); विजित्य--जीतकर; दिशः--दिशाएँ; सर्वा:--सभी; लोकान्‌--लोकों को; च--भी; त्रीन्‌ू--तीन( उच्च, मध्य तथा निम्न ); महा-असुरः--महान्‌ दैत्य; देव--देवतागण; असुर--असुरगण; मनुष्य--मनुष्यों के; इन्द्र--राजा;गन्धर्व--गन्धर्वगण; गरुड--गरुड़; उरगान्‌--बड़े-बड़े सर्पो को; सिद्ध--सिद्ध; चारण--चारण; विद्याध्रान्‌ू--विद्याधरों को;ऋषीन्‌--ऋषियों तथा साधु पुरुषों को; पितृ-पतीन्‌--यमराज तथा पितरों के अन्य नायकों को; मनून्‌--सारे मनुओं को;यक्ष--यक्षगण; रक्ष:--राक्षसगण; पिशाच-ईशान्‌--पिशाच लोक के नायकों; प्रेत--प्रेतों; भूत--तथा भूतों के; पतीन्‌--स्वामियों को; अपि--भी; सर्व-सत्त्व-पतीन्‌--विभिन्न लोकों के स्वामियों को; जित्वा--जीतकर; वशम्‌ आनीय--वश मेंकरके; विश्व-जित्‌--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का विजेता; जहार--अधीन कर लिया; लोक-पालानाम्‌--उन देवताओं का जो विश्व काकार्य सँभालते हैं; स्थानानि--स्थान; सह--सहित; तेजसा--उनकी सारी शक्ति |

हिरण्यकशिपु समग्र ब्रह्माण्ड का विजेता बन गया।

इस महान्‌ असुर ने तीनों लोकों--उच्च,मध्य तथा निम्न लोकों को जीत लिया जिसमें मनुष्यों, गन्धर्वों, गरुड़ों, महासपों, चारणों,विद्याधरों, महामुनियों, यमराजों, मनुष्यों, यक्षों, पिशाचों तथा उनके स्वामियों एवं भूत-प्रेतों केस्वामियों के लोक सम्मिलित थे।

उसने उन सारे अन्य लोकों के शासकों को भी हरा दिया जहाँ-जहाँ जीव रहते थे और उन्हें अपने वश में कर लिया।

सबों के निवासों को जीतकर उसने उनकीशक्ति तथा उनके प्रभाव को छीन लिया।

"

देवोद्यानभ्रिया जुष्टमध्यास्ते स्म त्रिपिष्टपम्‌ ।

महेन्द्रभवन साक्षान्रिर्मितं विश्वकर्मणा ।

त्रैलोक्यलक्ष्म्यायतनमध्युवासाखिलर्द्धिमत्‌ ॥

८ ॥

देव-उद्यान--देवताओं के प्रसिद्ध बगीचों का; थ्रिया--ऐश्वर्य से; जुष्टम्‌--समृद्ध; अध्यास्ते स्म--रहता रहा; त्रि-पिष्टपम्‌--स्वर्गलोक जहाँ देवतागण निवास करते हैं; महेन्द्र-भवनम्‌--स्वर्ग के राजा इन्द्र का महल; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; निर्मितम्‌ू--बनायाहुआ; विश्वकर्मणा--देवताओं के प्रसिद्ध शिल्पी विश्वकर्मा द्वारा; त्रैलोक्य--तीनों लोकों का; लक्ष्मी-आयतनम्‌--सम्पत्ति कीदेवी का निवास; अध्युवास--निवास करती थीं; अखिल-ऋद्धि-मत्‌--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के ऐश्वर्य सहित |

समस्त ऐश्वर्य से युक्त हिरण्यकशिपु स्वर्ग के सुप्रसिद्ध नन्दन उद्यान में रहने लगा, जिसकाभोग देवता करते हैं।

वस्तुतः वह स्वर्ग के राजा इन्द्र के अत्यन्त ऐश्वर्यशाली महल में रहने लगा।

इस महल को देवताओं के शिल्पी साक्षात्‌ विश्वकर्मा ने निर्मित किया था और इसे इतने सुन्दरढंग से बनाया गया था मानो सम्पूर्ण विश्व की लक्ष्मी वहीं निवास कर रही हो।

"

यत्र विद्युममोपाना महामारकता भुवः ।

यत्र स्फाटिककुड्यानि बैदूर्यस्तम्भपड् यः ॥

९॥

यत्र चित्रवितानानि पद्यरागासनानिच ।

'पयःफेननिभा: शय्या मुक्तादामपरिच्छदा: ॥

१०॥

कूजद्धि्नूपुरिर्देव्य: शब्दयन्त्य इतस्ततः ।

रतलस्थलीषु पश्यन्ति सुदतीः सुन्दरं मुखम्‌ ॥

११॥

तस्मिन्महेन्द्रभवने महाबलो महामना निर्जितलोक एकराट्‌ ।

रेमेउभिवन्द्याड्घ्रियुग: सुरादिभिःप्रतापितैरूजितचण्डशासन: ॥

१२॥

यत्र--जहाँ ( इन्द्र के आवास में ); विद्युम-सोपाना: --मूँगे की सीढ़ियाँ; महा-मारकता:--मरकत; भुवः--फर्श ; यत्र--जहाँ;स्फाटिक--स्फटिक, क्रिस्टल की; कुड्यानि--दीवालें; बैदूर्य--वैदूर्य मणि के; स्तम्भ--ख भों की; पड यः--कतारें; यत्र--जहाँ; चित्र--अद्भुत; वितानानि--चँदोवे; पद्मरग--मणियों से जड़े; आसनानि--आसन, बैठने के स्थान; च-- भी; पय:--दूध का; फेन--झाग; निभा:--के सहृश; शय्या:--सेज, बिछौने; मुक्तादाम--मोतियों के ; परिच्छदा: --किनारे वाले;कूजद्धिः--खनकती हुईं; नूपुरै:ः--घुंघुरूओं से; देव्य:--दैवी स्त्रियाँ; शब्द-यन्त्य:--मधुर ध्वनि करती हुई; इतः ततः--इधरउधर; रल-स्थलीषु--रत्नों से जटित स्थानों में; पश्यन्ति--देखती हैं; सु-दती:--सुन्दर दाँतों वाली; सुन्दरम्‌--सुन्दर; मुखम्‌--मुँह; तस्मिन्‌--उसमें; महेन्द्र-भवने--स्वर्ग के राजा के रिहायशी मकान में; महा-बलः--अत्यन्त शक्तिशाली; महा-मना:--अत्यधिक विचारवान; निर्जित-लोक: --सबों को वश में रखने वाला; एक-राट्‌ू--शक्तिशाली तानाशाह; रेमे-- भोग किया;अभिवन्द्य--पूजित; अड्प्रि-युग:--जिसके दोनों पैर; सुर-आदिभि:--देवताओं द्वारा; प्रतापितै:--उद्विग्न होकर; ऊर्जित--आशा से अधिक; चण्ड--कठिन; शासन: --जिसका शासन ।

राजा इन्द्र के आवास की सीढ़ियाँ मूँगे की थीं, फर्श अमूल्य पन्ने से जटित था, दीवालेंस्फटिक की थीं और ख भे बैदूर्य मणि के थे।

उसके अद्भुत वितान सुन्दर ढंग से सजाये गयेथे, आसन मणियों से जटित थे और झाग के सहश श्वेत रेशमी बिछौने मोतियों से सजाये गये थे।

वे महल में इधर-उधर घूम रही थीं, उनके घुँघुरुओं से मधुर झनकार निकल रही थी और वे रत्नोंमें अपने सुन्दर प्रतिबिम्ब देख रही थीं।

किन्तु अत्यधिक सताये गये देवताओं को हिरण्यकशिपुके चरणों पर सिर झुकाना पड़ता था, क्‍योंकि उसने देवताओं को अकारण ही दण्डित कर रखाथा।

इस प्रकार हिरण्यकशिपु उस महल में रह रहा था और सबों पर कठोरता से शासन कर रहाथा।

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तमड़ मत्तं मधुनोरुगन्धिनाविवृत्तताप्राक्षमशेषधिष्ण्यपा: ।

उपासतोपायनपाणिभिर्विनात्रिभिस्तपोयोगबलौजसां पदम्‌ ॥

१३॥

तम्‌--उसको ( हिरण्यकशिपु को ); अड़--हे राजा; मत्तम्‌ू--मतवाला; मधुना--सुरा से; उरु-गन्धिना--तीक्ष्ण गन्‍्ध वाली;विवृत्त--चढ़ी हुईं; ताम्र-अक्षम्‌--ताँबे जैसी आँखों वाला; अशेष-धिष्ण्य-पा: --समस्त लोकों के प्रमुख व्यक्तियों ने;उपासत--पूजा की; उपायन--साज सामान से युक्त; पाणिभि: --अपने अपने हाथों से; विना--बिना, रहित; त्रिभि:--तीनप्रमुख देवता ( विष्णु, ब्रह्म तथा शिव ); तप:ः--तपस्या; योग--योग शक्ति; बल--शारीरिक शक्ति; ओजसाम्‌--इन्द्रियों कीशक्ति; पदम्‌-- धाम |

हे राजा, हिरण्यकशिपु सदा ही तीक्ष्ण गन्‍्ध वाली सुरा पिये रहता था, अतएवं उसकी ताग्रजैसी ( लाल ) आँखें सदैव चढ़ी रहती थीं।

फिर भी चूँकि उसने योग की महान्‌ तपस्या की थीऔर यद्यपि वह निन्दनीय था, किन्तु तीन देवताओं-ब्रह्मा, शिव तथा विष्णु--के अतिरिक्त सारेदेवता अपने-अपने हाथों में विविध भेंटें लेकर उसे प्रसन्न करने के लिए उसकी सेवा करते थे।

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जगुर्महेन्द्रासनमोजसा स्थितविश्वावसुस्तुम्बुरुरस्मदादय: ।

गन्धर्वसिद्धा ऋषयो स्तुवन्मुहु-विद्याधराश्चाप्सरसश्र पाण्डव ॥

१४॥

जगु:--यश गान किया; महेन्द्र-आसनम्‌--राजा इन्द्र का सिंहासन; ओजसा--निजी शक्ति से; स्थितम्‌ू--स्थित; विश्वावसु:--गन्धर्वों का मुख्य गायक; तुम्बुरु:--अन्य गन्धर्व गायक; अस्मत्‌-आदय: --हम सहित ( नारद तथा अन्यों ने भी हिरण्यकशिपु का यशोगान किया ); गन्धर्व--गन्धर्व लोक के वासी; सिद्धा:--सिद्ध लोक के वासी; ऋषय:--बड़े-बड़े ऋषि तथा साधुपुरुष; अस्तुवन्‌ू--स्तुतियाँ की; मुहुः--पुनःपुनः; विद्याधरा:--विद्याधर लोक के वासी; च--तथा; अप्सरस:--अप्सर लोक केवासी; च--तथा; पाण्डब--हे पाण्डु के वंशज

हे पाण्डु के वंशज महाराज युध्रिष्ठटिर, हिरण्यकशिपु ने राजा इन्द्र के सिंहासन पर आसीनहोकर अपने निजी बल से अन्य सारे लोकों के निवासियों को वश में किया।

विश्वावसु तथातुम्बुरु नामक दो गन्धर्व, मैं तथा विद्याधर, अप्सराएँ एवं साधुओं ने उसका यशोगन करने केलिए बारम्बार उसकी स्तुतियाँ की।

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स एव वर्णाश्रमिभि: क्रतुभिर्भूरिदक्षिणै: ।

इज्यमानो हविर्भागानग्रहीत्स्वेन तेजसा ॥

१५॥

सः--वह ( हिरण्यकशिपु ); एब--निस्सन्देह; वर्ण-आ श्रमिभि: --चारों वर्णो तथा चारों आश्रमों के विधि-विधानों को कड़ाईसे पालने वाले व्यक्तियों द्वारा; क्रतुभि:--अनुष्ठानों द्वारा; भूरि-- प्रचुर; दक्षिणैः --दक्षिणा से; इज्यमान:--पूजित होकर; हविः-भागान्‌ू--आहुति का अंश; अग्रहीत्‌--छीन लेता; स्वेन-- अपने; तेजसा--तेज से

वर्णा श्रम धर्म का पालन करने वाले पुरुष बड़ी-बड़ी दक्षिणा वाले यज्ञ करके उसकी पूजाकरते, तो वह यज्ञों की आहुतियाँ देवताओं को न देकर स्वयं ले लेता था।

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अकृष्ट पच्या तस्यासीत्सप्तद्वीपवती मही ।

तथा कामदुघा गावो नानाश्चर्यपदं नभः ॥

१६॥

अकृष्ट-पच्या--बिना जोते बोये अन्न देने वाली; तस्य--हिरण्यकशिपु के; आसीत्‌-- थी; सप्त-द्वीप-वती --सात द्वीपों वाली;मही--पृथ्वी; तथा--उसी तरह; काम-दुघा:--इच्छानुसार दूध देने वाली; गाव:ः--गायें; नाना--विविध; आश्वर्य-पदम्‌--अनोखी वस्तुएँ; नभः--आकाश

ऐसा प्रतीत होता है मानों सात द्वीपों वाली पृथ्वी हिरण्यकशिपु के भय से, बिना जोते बोयेही अन्न प्रदान करती थी।

इस प्रकार यह वैकुण्ठ लोक की सुरभि या स्वर्गलोक की कामदुधागायों के समान थी।

पृथ्वी पर्याप्त अन्न प्रदान करती, गाएँ प्रचुर दूध देतीं तथा आकाश अनोखीघटनाओं से सुसज्जित रहता था।

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रलाकराश्च रलौघांस्तत्पत्यश्वोहुरूमिंभि: ।

क्षारसीधुघृतक्षौद्रदधिक्षीरामृ्तोदका: ॥

१७॥

रलाकरा:--समुद्र; च--तथा; रत्त-ओघानू--विविध प्रकार के मूल्यवान मणि; तत्‌-पत्य: --समुद्रों की पत्नियाँ अर्थात्‌ नदियाँ;च--भी; ऊहुः--ले जाती थीं; ऊर्मिभि:--अपनी-अपनी लहरों से; क्षार--खारा समुद्र; सीधु--सुरा सागर; घृत--घी का सागर;क्षौद्र--ईंख रस का सागर, इक्षु सागर; दधि--दही का सागर; क्षीर--दूध का सागर; अमृत--तथा अत्यन्त मीठा सागर;उदकाः--जल।

ब्रह्माण्ड के विविध सागर अपनी पत्नियों स्वरूप नदियों तथा उनकी सहायक नदियों कीलहरों से हिरण्यकशिपु के उपयोग हेतु विविध प्रकार के रत्नों की पूर्ति करते थे।

ये सागरलवण, इक्षु, सुरा, घृत, दुग्ध, दही तथा मीठे जल के थे।

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शैला द्रोणीभिराक्रीडं सर्वर्तुषु गुणान्द्रुमा: ।

दधार लोकपालानामेक एवं पृथग्गुणान्‌ ॥

१८ ॥

शैला:--पर्वत तथा पहाड़ियाँ; द्रोणीभि:--बीच की घाटियों सहित; आक्रीडम्‌ू--हिरण्यकशिपु की क्रीड़ा स्थली; सर्व--सभी;ऋतुषु--सभी ऋतुओं में; गुणान्‌-- विभिन्न प्रकार के गुण ( फल तथा फूल ); द्रमा:--पौधे; दधार--सम्पन्न किया; लोक-पालानाम्‌--विभिन्न विभागों के लिए अध्यक्ष; एक:--अकेला; एब--निस्सन्देह; पृथक्‌--भिन्न; गुणान्‌ू--गुण |

पर्वतों के मध्य की घाटियाँ हिरण्यकशिपु की क्रीड़ास्थली बन गईं जिसके प्रभाव से सभी पौधे सभी ऋतुओं में प्रभूत फूल तथा फल देने लगे।

जल वृष्टि कराना, सुखाना तथा जलाना जोविश्व के तीन विभागाध्यक्षों इन्द्र, वायु तथा अग्नि के गुण हैं, वे अब देवताओं की सहायता केबिना अकेले हिरण्यकशिपु द्वारा निर्देशित होने लगे।

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स इत्थं निर्जितककुबेकराड्विषयान्प्रियान्‌ ।

यथोपजोष॑ं भुज्जानो नातृप्यदजितेन्द्रिय: ॥

१९॥

सः--उसने ( हिरण्यकशिपु ); इत्थम्‌--इस प्रकार; निर्जित--जीत लीं; ककुपू--सारी दिशाएँ; एक-राटू--एकछत्र सम्राट;विषयानू--इन्द्रियविषयों को; प्रियान्‌--अत्यन्त प्रिय; यथा-उपजोषम्‌--यथासम्भव; भुझ्ान: --भोग करते हुए; न--नहीं;अतृप्यत्‌--सन्तुष्ट था; अजित-इन्द्रियः--इन्द्रियों को वश में न कर सकने के कारण।

समस्त दिशाओं को वश में करने की शक्ति प्राप्त करके तथा यथासम्भव सभी प्रकार कीइन्द्रिय-तृप्ति का भोग करने के बावजूद हिरण्यकशिपु असमन्तुष्ट रहा, क्योंकि वह अपनी इन्द्रियोंको वश में करने के बजाय उनका दास बना रहा।

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एवमैश्वर्यमत्तस्य हृ्तस्योच्छास्त्रवर्तिन: ।

कालो महान्व्यतीयाय ब्रह्मशापमुपेयुष: ॥

२०॥

एवम्‌--इस प्रकार; ऐश्वर्य-मत्तस्य--ऐश्वर्य से मदान्ध रहने वाले का; हृप्तस्य--अत्यन्त गर्वित; उत्‌-शास्त्र-वर्तिन:-- शास्त्रों मेंवर्णित विधि-विधानों का उल्लंघन करते हुए; काल:--अवधि; महान्‌--महान; व्यतीयाय--बिता दिया; ब्रह्म-शापम्‌--प्रतिष्ठितब्राह्मणों का श्राप; उपेयुष:--प्राप्त करके |

इस प्रकार अपने ऐश्वर्य से अत्यधिक गर्वित एवं प्रामाणिक शास्त्रों के विधि-विधानों काउल्लंघन करते हुए हिरण्यकशिपु ने काफी समय बिताया।

अतएव उसे चार कुमारों ने, जो किप्रतिष्ठित ब्राह्मण थे, शाप दे दिया।

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तस्योग्रदण्डसंविग्ना: सर्वे लोका: सपालका: ।

अन्यत्रालब्धशरणा: शरणं ययुरच्युतम्‌ ॥

२१॥

तस्य--उसकी ( हिरण्यकशिपु की ); उग्र-दण्ड--अत्यन्त भयावह ताड़ना से; संविग्ना:--विचलित; सर्वे--सभी; लोका:--सारे लोक; स-पालका: --अपने प्रधान शासकों सहित; अन्यत्र-- अन्य कहीं; अलब्ध--न प्राप्त करके; शरणा:--शरण;शरणम्‌--शरण के लिए; ययु:--पास आये; अच्युतम्‌--भगवान्‌ के |

हिरण्यकशिपु द्वारा दिये गये कठोर दण्ड से सभी व्यक्ति, यहाँ तक कि विभिन्न लोकों केशासक भी, अत्यधिक पीड़ित थे।

वे अत्यन्त भयभीत तथा उद्दिग्न होकर और अन्य किसी कीशरण न पा सकने के कारण अन्ततः भगवान्‌ विष्णु की शरण में आये।

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तस्यै नमोस्तु काष्ठायै यत्रात्मा हरिरीश्वर: ।

यद्गत्वा न निवर्तन्ते शान्ता: सन््यासिनोइमला: ॥

२२॥

इति ते संयतात्मान: समाहितधियोमला: ।

उपतस्थुईषीकेशं विनिद्रा वायुभोजना: ॥

२३॥

तस्यै--उस; नमः--हमारा सादर नमस्कार; अस्तु--हो; काष्ठायै--दिशा को; यत्र--जहाँ; आत्मा--परमात्मा; हरिः:-- भगवान्‌;ईश्वरः--परम नियन्ता; यत्‌--जो; गत्वा--जाकर; न--कभी नहीं; निवर्तन्ते--लौटते हैं; शान्ता:--शान्त; सन््यासिन: --संन्यासीगण; अमला:--शुद्ध; इति--इस प्रकार; ते--वे; संयत-आत्मान:--मनों को वश में करके; समाहित--सुस्थिर;धियः--बुद्द्धि; अमला:--शुद्ध की गई; उपतस्थु:--पूजा की; हषीकेशम्‌--इन्द्रियों के स्वामी की; विनिद्रा:--बिना सोये;वायु-भोजना:--केवल वायु ले कर।

'हम उस दिशा को सादर नमस्कार करते हैं जहाँ भगवान्‌ स्थित हैं, जहाँ संन्यास आश्रम मेंरहने वाले विशुद्ध आत्मा महान्‌ साधु पुरुष जाते हैं और जहाँ जाकर वे फिर कभी नहीं लौटते।

'बिना सोये, अपने मनों को पूर्णतया वश में करके तथा केवल अपनी श्वास पर जीवित रहकरविभिन्न लोकपालों ने इस ध्यान से हषीकेश की पूजा करनी प्रारम्भ की।

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तेषामाविरभूद्वाणी अरूपा मेघनि:स्वना ।

सन्नादयन्ती ककुभः साधूनामभयड्डूरी ॥

२४॥

तेषाम्‌ू-सबों के समक्ष; आविरभूत्‌--प्रकट हुईं; बाणी--आवाज; अरूपा--रूपविहीन; मेघ-निःस्वना--बादल की सी ध्वनिकरती; सन्नादयन्ती--कम्पन उत्पन्न करती; ककुभ:--सभी दिशाएँ; साधूनाम्‌ू--साधु पुरुषों की; अभयड्डरी--अभय करनेबाली ।

तब उन सबों के समक्ष दिव्य वाणी प्रकट हुई जो भौतिक नेत्रों से अहृश्य पुरुष से निकलीथी।

यह वाणी मेघ की ध्वनि के समान गम्भीर थी और यह अत्यन्त प्रोत्साहन देने वाली तथासभी प्रकार का भय भगाने वाली थी।

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मा भेष्ट विब्रुधश्रेष्ठा: सर्वेषां भद्रमस्तु व: ।

महर्शनं हि भूतानां सर्व श्रेयोपपत्तये ॥

२५॥

ज्ञातमेतस्य दौरात्म्यं दैतेयापसदस्य यत्‌ ।

'तस्य शान्ति करिष्यामि काल॑ तावत्प्रतीक्षत ॥

२६॥

मा--मत; भैष्ट--डरो; विबुध- श्रेष्ठाः-हे श्रेष्ठ विद्वान पुरुषों; सर्वेषामू--सबों का; भद्रमू--कल्याण करना, जो पूर्ण सत्य है;अस्तु--हो; वः--तुम्हारा; मत्‌-दर्शनम्‌--मेरा दर्शन ( मेरी प्रार्थना या मेरा श्रवण करना, जो पूर्ण सत्य है ); हि--निस्सन्देह;भूतानामू--समस्त जीवों का; सर्व-श्रेय--समस्त कल्याण की; उपपत्तये--प्राप्ति के लिए; ज्ञातम्‌ू--ज्ञात; एतस्य--इसका;दौरात्म्यम्‌-दुष्कर्म; दैतेय-अपसदस्य--महान्‌ असुर हिरण्यकशिपु का; यत्‌--जो; तस्य--उसकी; शान्तिम्‌ू--समाप्ति;'करिष्यामि-- करूँगा; कालमू--काल, समय की; तावत्‌ू--तब तक; प्रतीक्षत--प्रतीक्षा करो |

भगवान्‌ की वाणी इस प्रकार गुंजायमान हुई--' हे परम श्रेष्ठ विद्वानो, डरो मत।

तुम सबका कल्याण हो।

तुम सभी मेरे श्रवण तथा कीर्तन द्वारा एवं मेरी स्तुति से मेरे भक्त बनो, क्योंकिइन सब का उद्देश्य सभी जीवों को आशीष देना है।

मैं हिरण्यकशिपु के कार्यकलापों से परिचितहूँ और मैं उन्हें शीघ्र ही रोक दूँगा।

तब तक तुम मेरी थैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करो।

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यदा देवेषु वेदेषु गोषु विप्रेषु साधुषु ।

धर्मे मयि च विद्वेष: स वा आशु विनश्यति ॥

२७॥

यदा--जब; देवेषु--देवताओं में; वेदेषु--वेदों में; गोषु--गायों में; विप्रेषु--ब्राह्मणों में; साधुषु--साधु पुरुषों में; धर्मे--धार्मिक नियमों में; मयि--मुझ भगवान्‌ में; च--तथा; विद्वेष:--ईर्ष्यालु; सः--ऐसा व्यक्ति; वै--निस्सन्देह; आशु--शीघ्र ही;विनश्यति--विनष्ट हो जाता है

जब कोई व्यक्ति भगवान्‌ के प्रतिनिधि देवताओं, समस्त ज्ञान के दाता वेदों, गायों, ब्राह्मणों,वैष्णवों, धार्मिक सिद्धान्तों तथा अन्ततः मुझ भगवान्‌ से ईर्ष्या करता है, तो वह तथा उसकीसभ्यता दोनों अविलम्ब नष्ट हो जाएंगी।

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निर्वैराय प्रशान्ताय स्वसुताय महात्मने ।

प्रह्दाय यदा द्रुह्मेद्धनिष्येडपि वरोजिंतम्‌ ॥

२८ ॥

निर्वराय--शत्रुहीन; प्रशान्ताय--अत्यन्त गम्भीर तथा शान्त; स्व-सुताय--अपने ही पुत्र को; महा-आत्मने--महान्‌ भक्त;प्रह्दादाय--प्रह्दाद महाराज को; यदा--जब; ब्रुद्लेत्‌--सतायेगा; हनिष्ये--मैं मारूँगा; अपि--यद्यपि; वर-ऊर्जितम्‌--ब्रह्मा द्वारावर प्राप्त

जब हिरण्यकशिपु अपने ही पुत्र परम भक्त प्रह्मद को सतायेगा, जो अत्यन्त शान्त, गम्भीरतथा शत्रुरहित है, तो मैं ब्रह्मा के समस्त वरों के होते हुए भी उसका तुरन्त ही वध कर दूँगा।

"

श्रीनारद उवाचइत्युक्ता लोकगुरुणा तं प्रणम्य दिवौकस: ।

न्यवर्तन्त गतोद्वेगा मेनिरे चासुरं हतम्‌ ॥

२९॥

श्री-नारद: उबाच--परम साधु नारद मुनि ने कहा; इति--इस प्रकार; उक्ता:--सम्बोधित; लोक-गुरुणा--सबों के परम गुरुद्वारा; तम्‌ू--उसको; प्रणम्य--प्रणाम करके; दिवौकसः--सारे देवता; न्यवर्तन्‍्त--लौट गये; गत-उद्देगा:--सारी चिन्ताओं सेमुक्त; मेनिरे--उन्होंने विचार किया; च-- भी; असुरम्‌--असुर ( हिरण्यकशिपु ) को; हतम्‌--मारा हुआ।

परम साधु नारद मुनि ने आगे कहा : जब सबों के गुरु भगवान्‌ ने स्वर्ग में रहने वाले सभीदेवताओं को इस तरह आश्वस्त कर दिया तो उन सबों ने उन्हें प्रणाम किया और विश्वस्त होकरलौट आये कि अब तो हिरण्यकशिपु एक तरह से मर चुका है।

"

तस्य दैत्यपते: पुत्राश्चत्वार: परमाद्भुता: ।

प्रह्मदो भून्महांस्तेषां गुणैरमहदुपासक: ॥

३०॥

तस्य--उस ( हिरण्यकशिपु ); दैत्य-पतेः--दैत्यों के राजा के; पुत्रा:--पुत्रगण; चत्वार:--चार; परम-अद्भुता:--अत्यन्त योग्यतथा अद्भुत; प्रहाद:ः--प्रह्माद नामक; अभूत्‌-- था; महान्‌ू--सबसे बड़ा; तेषाम्‌--उनमें से; गुणैः--दिव्य गुणों के कारण;महत्‌-उपासकः-- भगवान्‌ का अनन्य भक्त होने के कारण ।

हिरण्यकशिपु के चार अद्भुत सुयोग्य पुत्र थे जिसमें से प्रहाद नामक पुत्र सर्वश्रेष्ठ था।

निस्सन्देह प्रह्मद समस्त दिव्य गुणों की खान थे, क्योंकि वे भगवान्‌ के अनन्य भक्त थे।

"

ब्रह्मण्य: शीलसम्पन्न: सत्यसन्धो जितेन्द्रिय: ।

आत्मवत्सर्वभूतानामेकप्रियसुहृत्तम: ।

दासवत्सन्नतार्याड्धप्रि: पितृवद्दीनवत्सल: ॥

३१॥

भ्रातृवत्सहशे स्निग्धो गुरुष्वी श्वरभावन: ।

विद्यार्थरूपजन्माद्यो मानस्तम्भविवर्जित: ॥

३२॥

ब्रह्मण्य:--अच्छे ब्राह्मण के समान सुसंस्कृत; शील-सम्पन्न:--समस्त सदगुणों से युक्त; सत्य-सन्ध: --परम सत्य को जानने केलिए कृतसंकल्प; जित-इन्द्रियः--इन्द्रियों तथा मन को पूरी तरह वश में करते हुए; आत्म-बत्‌--परमात्मा के समान; सर्व-भूतानाम्‌ू--समस्त जीवों का; एक-प्रिय-- एकमात्र प्यारा; सुहत्‌-तम:--सर्व श्रेष्ठ मित्र; दास-बत्‌--नीच सेवक की तरह;सन्नत--सदैव आज्ञाकारी; आर्य-अड्डप्नि:--महान्‌ पुरुषों के चरणकमलों पर; पितृ-वत्‌--पिता के ही समान; दीन-वत्सल:--गरीबों पर दयालु; भ्रातृ-वत्‌-- भाई के ही समान; सहशे-- अपने समान वालों को; स्निग्ध: --अत्यन्त प्यारा; गुरुषु--गुरुओं में;ईश्वर-भावन:-- भगवान्‌ के समान मानने वाला; विद्या--शिक्षा; अर्थ-- धन; रूप--सौन्दर्य; जन्म--कुलीनता; आढ्य्:--सेसम्पन्न; मान--गर्व; स्तम्भ--अविवेक से; विवर्जित:--पूर्णतया मुक्त ।

[ यहाँ पर हिरण्यकशिपु के पुत्र महाराज प्रह्नद के गुणों का उल्लेख हुआ है वे योग्यब्राह्मण के रूप में पूर्णतया संस्कृत, सच्चरित्र तथा परम सत्य को समझने के लिए हृढ़संकल्प थे।

उन्हें अपनी इन्द्रियों तथा मन पर पूर्ण संयम था।

परमात्मा की भाँति वे प्रत्येक जीव के प्रतिदयालु थे और हर एक के श्रेष्ठ मित्र थे।

वे सम्मानित व्यक्ति के साथ दास की भाँति व्यवहारकरते थे, गरीबों के वे पिता तुल्य थे और समानधर्माओं के प्रति वे दयालु भ्राता की तरह अनुरक्तरहने वाले तथा अपने गुरुओं तथा पुराने गुरुभाइयों को भगवान्‌ की तरह मानने वाले थे।

वे उसबनावटी गर्व ( मान ) से पूरी तरह मुक्त थे, जो उनकी अच्छी शिक्षा, धन, सौन्दर्य व उच्च जन्म केकारण संभव था।

"

नेद्विग्नचित्तो व्यसनेषु निःस्पृहःश्रुतेषु दृष्टेषु गुणेष्ववस्तुटक्‌ ।

दान्तेन्द्रियप्राणशरीरधी: सदाप्रशान्तकामो रहितासुरोसुर: ॥

३३॥

न--नहीं; उद्विग्न--विचलित; चित्त:--जिसकी चेतना; व्यसनेषु--कठिन परिस्थितियों में; निःस्पृहः --इच्छारहित; श्रुतेषु--सुनीहुई बातों में ( विशेषतया पुण्यकर्मों के कारण स्वर्ग लोक को उत्थान ); दृष्टेषु--साथ ही क्षणिक दृश्य वस्तुओं में; गुणेषु--भौतिक प्रकृति के गुणों के अन्तर्गत इन्द्रियतृप्ति वाले विषयों में; अवस्तु-हक्‌--देखते हुए मानो असार हों; दान्त--नियमितकरते हुए; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; प्राण--सजीव शक्ति; शरीर--शरीर; धी:--तथा बुद्द्धि; सदा--सदैव; प्रशान्त--शान्त कियागया; काम:--जिसकी भौतिक इच्छाओं से; रहित--पूर्णतया विहीन; असुरः--आसुरी प्रकृति; असुरः --यद्यपि असुर वंश मेंउत्पन्न

यद्यपि प्रह्मद महाराज का जन्म असुर वंश में हुआ था, किन्तु वे स्वयं असुर न होकरभगवान्‌ विष्णु के परम भक्त थे।

अन्य असुरों की तरह वे कभी भी वैष्णवों से ईर्ष्या नहीं करतेथे।

कठिन परिस्थिति आने पर वे कभी क्षुब्ध नहीं होते थे और वेदों में वर्णित सकाम कर्मों मेंप्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भी रुचि नहीं लेते थे।

निस्सन्देह, वे हर भौतिक वस्तु को व्यर्थ मानतेथे; इसलिए वे भौतिक इच्छाओं से पूर्णतया रहित थे।

वे सदैव अपनी इन्द्रियों तथा प्राणवायु परसंयम रखते थे।

स्थिरबुद्धि तथा संकल्पमय होने के कारण उन्होंने सारी विषय-वासनाओं कादमन कर लिया था।

"

यस्मिन्महद्गुणा राजन्गृहान्ते कविभिरमुहुः ।

न तेधुना पिधीयन्ते यथा भगवती श्वेर ॥

३४॥

यस्मिनू--जिसमें; महत्‌-गुणाः --उच्चा दिव्य गुण; राजनू--हे राजा; गृह्मन्ते--यशोगान किया जाता है; कविभि:--विचारवान्‌तथा ज्ञानी पुरुषों द्वारा; मुहु:--सदैव; न--नहीं; ते--वे; अधुना--आजकल; पिधीयन्ते--अदृश्य हो जाते हैं; यथा--जिस तरह;भगवति-- भगवान्‌ में; ईश्वर--परम नियन्ता में |

हे राजा, आज भी प्रह्नाद महाराज के सद्‌गुणों का यशोगान विद्वान सन्‍्तों तथा वैष्णवों द्वाराकिया जाता है।

जिस तरह सारे सदगुण सदैव भगवान्‌ में विद्यमान रहते हैं उसी प्रकार वे उनकेभक्त प्रह्मद महाराज में भी सदैव पाये जाते हैं।

"

यं साधुगाथासदसि रिपवोपि सुरा नूप ।

प्रतिमानं प्रकुर्वन्ति किमुतान्ये भवाह॒शा: ॥

३५॥

यम्‌--जिसको; साधु-गाथा-सदसि--ऐसे सभा में जहाँ साधु पुरुष एकत्र होते हैं या उच्च लक्षणों ( गुणों ) की व्याख्या होती है;रिपव:--ऐसे व्यक्ति जो प्रह्मद महाराज के शत्रु माने गये ( प्रहाद जैसे भक्त के भी शत्रु थे जिसमें उनका पिता तक सम्मिलितथा ); अपि-- भी; सुरा:--देवतागण ( जो असुरों के शत्रु हैं और चूँकि प्रह्ाद महाराज असुर वंश में जन्मे थे अतएव देवताओं कोउनका शत्रु होना चाहिए ); नृप--हे राजा युधिष्ठिर; प्रतिमानम्‌--भक्तों में सर्वश्रेष्ठ के उदाहरणरूप; प्रकुर्वन्ति--वे करते हैं; किम्‌उत--उनके विषय में क्या कहा जाये; अन्ये--दूसरे; भवाह॒शा:-- आपके समान महापुरुष |

" गुणैरलमसड्ख्येयैर्माहात्म्यं तस्य सूच्यते ।

वासुदेवे भगवति यस्य नैसर्गिकी रति: ॥

३६॥

गुणैः--आध्यात्मिक गुणों से युक्त; अलम्‌ू--क्या आवश्यकता है; असड्ख्येयै:--जो असंख्य हैं; माहात्म्यम्‌ू--महानता; तस्य--उसकी ( प्रहाद महाराज की ); सूच्यते--सूचित किया जाता है; वासुदेवे-- भगवान्‌ कृष्ण में जो बसुदेव के पुत्र हैं; भगवति--भगवान्‌; यस्यथ--जिसकी; नैसर्गिकी-- प्राकृतिक; रतिः--आसक्ति ।

भला ऐसा कौन है, जो प्रह्मद महाराज के असंख्य दिव्य गुणों के नाम गिना सके ?

उनकोवासुदेव भगवान्‌ श्री कृष्ण ( बसुदेव के पुत्र ) में अविचल श्रद्धा एवं अनन्य भक्ति थी।

भगवान्‌कृष्ण के प्रति उनकी अनुरक्ति अपनी पूर्व भक्ति के कारण स्वाभाविक थी।

यद्यपि उनकेसदगुणों की गणना नहीं की जा सकती, किन्तु उनसे सिद्ध होता है कि वे महात्मा थे।

"

न्यस्तक्रीडनको बालो जडवत्तन्मनस्तया ।

कृष्णग्रहगृहीतात्मा न वेद जगदीहशम्‌ ॥

३७॥

न्यस्त--त्याग करके; क्रीडनक:ः --सभी प्रकार के खेल-कूद या बचपन में खेल की प्रवृत्ति; बाल:--बालक; जड-वत्‌--आलसी की तरह बिना किसी गतिविधि के; तत्‌-मनस्तया--कृष्ण में पूर्णतया लीन होने से; कृष्ण-ग्रह--कृष्ण के द्वारा जो किप्रबल प्रभाव के तुल्य ( ग्रह के समान ) हैं; गृहीत-आत्मा--जिसका मन पूर्णतया आकृष्ट है; न--नहीं; वेद--समझ पाया;जगत्‌--सम्पूर्ण भौतिक जगत; ईंहशम्‌--इस तरह का

अपने बाल्यकाल के प्रारम्भ से ही प्रहाद महाराज को बालकों के खेल-कूद में अरुचि थी।

निस्सन्देह, उन्होंने उन सबका परित्याग कर दिया था और कृष्णभावनामृत में पूर्णतया लीन होकरशान्त तथा जड़ बने रहते थे।

चूँकि उनका मन सदैव कृष्णभावनामृत से प्रभावित रहता था,अतएव वे यह नहीं समझ सके कि यह संसार किस प्रकार से इन्द्रियतृष्ति के कार्यों में निमग्नरहकर चलता रहता है।

"

आसीन: पर्यटन्नएनन्शयान: प्रपिबन्ब्रुवन्‌ ।

नानुसन्धत्त एतानि गोविन्दपरिरम्भित: ॥

३८ ॥

आसीन:--बैठते; पर्यटन्‌ू--घूमते; अश्नन्‌--खाते; शयान:--सोते; प्रपिबन्‌--पीते; ब्रुवन्‌--बोलते; न--नहीं; अनुसन्धत्ते --जान पाया; एतानि--ये सारे कार्यकलाप; गोविन्द-- भगवान्‌ द्वारा, जो इन्द्रियों को जगाने वाले हैं; परिरम्भित:--आलिंगितहोकर।

प्रह्मद महाराज सदैव कृष्ण के विचारों में लीन रहते थे।

इस प्रकार भगवान्‌ द्वारा आलिंगितउन्हें यह पता भी नहीं चल पाता था कि उनकी शारीरिक आवश्यकताएँ यथा बैठना, चलना,खाना, सोना, पीना तथा बोलना किस तरह स्वतः सम्पन्न होती थीं।

"

क्वचिद्गुदति वैकुण्ठचिन्ताशबलचेतन: ।

क्वचिद्धसति तच्चिन्ताह्नाद उद्गायति क्वचित्‌ ॥

३९॥

क्वचित्‌--कभी; रुदति--रोता है; वैकुण्ठ-चिन्ता--कृष्ण के विचारों से; शबल-चेतन:--जिसका मन मोहग्रस्त; क्वचित्‌--कभी; हसति--हँसता है; तत्‌-चिन्ता--उसके विचारों से; आह्वाद:--प्रमुदित होकर; उद्गायति--उच्च स्वर में कीर्तन करता है;क्वचित्‌--कभी

कृष्णभावनामृत में प्रगति होने से वह कभी रोता था, कभी हँसता था, कभी हर्षित होता थाऔर कभी उच्च स्वर में गाता था।

"

नदति क्वचिदुत्कण्ठो विलज्जो नृत्यति क्वचित्‌ ।

क्वचित्तद्धावनायुक्तस्तन्‍्मयोनुचकार ह ॥

४०॥

नद॒ति--जोर से चीखता ( हे कृष्ण कहकर ); क्वचित्‌--क भी; उत्कण्ठ:--उत्सुक होकर; विलज्ज:--लाजरहित; नृत्यति--नाचता है; क्वचित्‌ू--कभी; क्वचित्‌--कभी; तत्‌-भावना--कृष्ण के भावों से युक्त; युक्त:--लीन होकर; तत्‌-मय: --ऐसासोचते हुए कि वह कृष्ण बन गया है; अनुचकार--अनुकरण किया; ह--निस्सन्देह |

कभी भगवान्‌ का दर्शन करके प्रह्नाद महाराज पूर्ण उत्सुकतावश जोर से पुकारने लगते।

कभी-कभी वे प्रसन्नतावश अपनी लज्जा खो बैठते और हर्ष के भावावेश में नाचने लगते।

कभी-कभी कृष्ण के भावों में विभोर होकर वे भगवान्‌ से एकाकार होने का अनुभव करतेऔर उनकी लीलाओं का अनुकरण करते।

"

क्वचिदुत्पुलकस्तृूष्णीमास्ते संस्पर्शनिर्वृतः ।

अस्पन्दप्रणयानन्दसलिलामीलितेक्षण: ॥

४१॥

क्वचित्‌--कभी; उत्पुलक:--रोमांचित होकर; तूष्णीम्‌--पूर्णतया मौन; आस्ते--रहता है; संस्पर्श-निर्वृतः-- भगवान्‌ के सम्पर्कमें अत्यधिक प्रसन्नता का अनुभव करते हुए; अस्पन्द--स्थिर; प्रणय-आनन्द--प्रेम सम्बन्ध के कारण दिव्य आनन्द से;सलिल--अश्रु भर कर; आमीलित--अधखुली; ईक्षण:--जिसकी आँखें |

कभी-कभी भगवान्‌ के करकमलों का स्पर्श अनुभव करके वे आध्यात्मिक रूप से प्रसन्नहोते और मौन बने रहते, उनके शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते ( रोमांच हो आता ) और भगवान्‌ केप्रेम के कारण उनके अर्धनिमीलित नेत्रों से अश्रु ढुलकने लगते।

"

स उत्तमएलोकपदारविन्दयो-निषेवयाकिदज्नसड्नलब्धया ।

तन्वन्परां निर्वतिमात्मनो मुहु-दुःसड्रदीनस्य मन: शमं व्यधात्‌ ॥

४२॥

सः--वह ( प्रह्माद महाराज ); उत्तम-श्लोक-पद-अरविन्दयो: -- भगवान्‌ के चरणकमलों पर, जिसकी पूजा दिव्य स्तुतियों से कीजाती है; निषेवया--निरन्तर सेवा द्वारा; अकिज्ञन--उन भक्तों का जिन्हें इस जगत से कुछ भी लेना देना नहीं रहता; सड्र--संगति; लब्धया--प्राप्त हुआ; तन्वनू--विस्तार करने वाली; पराम्‌--सर्वोच्च; निर्वृतिमू-- आनन्द; आत्मन:--आत्मा का;मुहुः--निरन्तर; दुःसड़र-दीनस्थ--बुरी संगति के कारण आध्यात्मिक ज्ञान से विहिन; मन:--मन को; शमम्‌--शान्त; व्यधात्‌--बना दिया।

पूर्ण, अनन्य भक्तों की संगति के कारण जिन्हें भौतिकता से कुछ भी लेना देना नहीं था।

प्रह्माद महाराज निरन्तर भगवान्‌ के चरणकमलों की सेवा में लगे रहते थे।

जब बे पूर्ण आनन्द मेंहोते तो उनके शारीरिक लक्षणों को देखकर आध्यात्मिक ज्ञान से विहीन व्यक्ति भी शुद्ध हो जातेथे।

दूसरे शब्दों में, प्रह्ाद महाराज उन्हें दिव्य आनन्द प्रदान करते थे।

"

'तस्मिन्महाभागवते महाभागे महात्मनि ।

हिरण्यकशिपू राजन्नकरोदघमात्मजे ॥

४३॥

तस्मिन्‌ू--उस; महा-भागवते-- भगवान्‌ के परम भक्त में; महा-भागे--अत्यन्त भाग्यशाली; महा-आत्मनि--जिनका मन अत्यन्तउदार है; हिरण्यकशिपु:--हिरण्यकशिपु ने; राजनू--हे राजा; अकरोत्‌--किया; अघम्‌--अत्यन्त महापाप; आत्म-जे--अपने हीपुत्र के प्रति।

हे राजा युथ्चिष्ठिर, उस असुर हिरण्यकशिपु ने इस महान्‌ भाग्यशाली भक्त प्रह्मद को सतायाथा, यद्यपि वह उसका निजी पुत्र था।

"

श्रीयुधिष्ठटिर उवाचदेवर्ष एतदिच्छामो वेदितुं तव सुब्रत ।

यदात्मजाय शुद्धाय पितादात्साधवे ह्घम्‌ ॥

४४॥

श्री-युधिष्ठटिरः उबाच--महाराज युधथिष्टिर ने प्रश्न किया; देव-ऋषे--हे देवताओं में श्रेष्ठ साधु पुरुष; एतत्‌--यह; इच्छाम:--हमारी इच्छा है; वेदितुमू--जानने के लिए; तब--तुमसे; सु-ब्रत--आध्यात्मिक उन्नति के लिए दृढ़संकल्प; यत्‌--क्योंकि;आत्म-जाय--अपने ही पुत्र को; शुद्धाय--जो अत्यन्त शुद्ध तथा सम्मानित था; पिता--पिता हिरण्यकशिपु ने; अदात्‌-दिया;साधवे--महान्‌ साधु को; हि--निस्सन्देह; अधम्‌-कष्ट

महाराज युधिष्ठिर ने कहा : हे देवर्षि, हे श्रेष्ठ आध्यात्मिक नेता, हिरण्यकशिपु ने शुद्ध तथाश्रेष्ठ सन्त प्रह्माद महाराज को अपना पुत्र होने पर भी किस प्रकार इतना अधिक कष्ट दिया?

मैंइसे आपसे जानना चाहता हूँ।

"

पुत्रान्विप्रतिकूलान्स्वान्पितर: पुत्रवत्सला: ।

उपालभन्ते शिक्षार्थ नैवाघमपरो यथा ॥

४५॥

पुत्रान्‌--पुत्रों को; विप्रतिकूलानू--पिता की इच्छा के प्रतिकूल कर्म करने वाले; स्वान्‌--अपने ही; पितरः --पिता; पुत्र-वत्सलाः--पुत्रों के प्रति अत्यन्त स्नेह जताने के कारण; उपालभन्ते--प्रताड़ित करते हैं; शिक्ष-अर्थम्‌--उन्हें पाठ पढ़ाने के लिए;न--नहीं; एव--निस्सन्देह; अधम्‌--दण्ड; अपर: --शत्रु; यथा--सहृश |

माता तथा पिता सदा ही अपने बच्चों के प्रति वत्सल होते हैं।

जब बच्चे आज्ञापालक नहींहोते तो माता-पिता उन्हें किसी शत्रुतावश नहीं, अपितु उन्हें शिक्षा देने तथा उनके भले के लिएदण्ड देते हैं।

तो हिरण्यकशिपु ने क्योंकर अपने इतने नेक पुत्र प्रहाद महाराज को प्रताड़ितकिया?

मैं यह जानने के लिए अत्यन्त उत्सुक हूँ।

"

किमुतानुवशान्साधूंस्ताइशान्गुरुदेवतान्‌ ।

एतत्कौतूहलं ब्रह्मन्नस्माकं विधम प्रभो ।

पितु: पुत्राय यद्द्वेषो मरणाय प्रयोजित: ॥

४६॥

किम्‌ उत--काफी कम; अनुवशान्‌--आज्ञाकारी तथा पूर्ण पुत्रों को; साधून्‌ू--परम भक्त; ताहशान्‌--उस तरह के; गुरु-देवतान्‌ू--पिता को भगवान्‌ तुल्य सम्मान देने वाले; एतत्‌--यह; कौतूहलम्‌--संशय; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; अस्माकम्‌--हमारा;विधम--दूर कीजिये; प्रभो--हे स्वामी; पितु:--पिता का; पुत्राय--पुत्र के लिए; यत्‌--जो; द्वेष: --द्वेष ईर्ष्या; मरणाय--मारनेके लिए; प्रयोजित:--प्रयुक्त ।

महाराज युथिष्टिर ने आगे पूछा : भला एक पिता के लिए यह कैसे सम्भव हुआ कि वहअपने आज्ञाकारी, सदाचारी तथा पिता का सम्मान करने वाले पुत्र के प्रति इतना उग्र बना ?

हेब्राह्मण, हे स्वामी, मैंने कभी ऐसा विरोधाभास नहीं सुना कि कोई वत्सल पिता अपने नेक पुत्रको मार डालने के उद्देश्य से उसे दण्डित करे।

कृपा करके इस सम्बन्ध में मेरे संशयों को दूर कीजिए।

"

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