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अध्याय पांच: हिरण्यकशिपु के पवित्र पुत्र प्रह्लाद महाराज
7.5रीनारद उबाचपौरोहित्याय भगवान्वृत: काव्य: किलासुरैः ।
षण्डामकाँ सुतौ तस्य दैत्यराजगृहान्तिके ॥
१॥
श्री-नारद: उबाच--महान् सन्त नारद ने कहा; पौरोहित्याय--पुरोहित कर्म के लिए; भगवान्--अत्यन्त शक्तिमान; वृत:ः--चुनागया; काव्य:--शुक्राचार्य; किल--निस्सन्देह; असुरैः--असुरों के द्वारा; षण्ड-अमकौं--घण्ड तथा अमर्क; सुतौ--दो पुत्र;तस्य--उसके; दैत्य-राज--दैत्यों का राजाहिरण्यकशिपु; गृह-अन्तिके--घर के पास
महामुनि नारद ने कहा : हिरण्यकशिपु आदि असुरों ने शुक्रचार्य को अनुष्ठान सम्पन्न करानेके लिए पुरोहित के रूप में चुना।
शुक्राचार्य के दो पुत्र षण्ड तथा अमर्क हिरण्यकशिपु के महलके ही पास रहते थे।
"
तौ राज्ञा प्रापितं बालं प्रह्मदं नयकोविदम् ।
पाठयामासतु: पाठ्यानन्यांश्वासुरबालकान् ॥
२॥
तौ--वे दोनों ( षण्ड और अर्मक ); राज्ञा--राजा द्वारा; प्रापितम्ू-- भेजे गये; बालम्ू--बालक को; प्रह्मदम्--प्रहाद नामक;नय-कोविदम्--नैतिक सिद्धान्तों से परिचित; पाठयाम् आसतु:--पढ़ाया करते; पाठ्यान्ू-- भौतिक ज्ञान की पुस्तकें; अन्यान्--अन्य; च--भी; असुर-बालकान्--असुरों के बालकों को |
प्रह्मद महाराज पहले से ही भक्ति में निपुण थे, किन्तु जब उनके पिता ने उन्हें पढ़ाने के लिएशुक्राचार्य के दोनों पुत्रों के पास भेजा तो उन दोनों ने उन्हें तथा अन्य असुरपुत्रों को अपनीपाठशाला में भर्ती कर लिया।
"
चत्तत्र गुरुणा प्रोक्ते शुश्रुवेडनुपपाठ च ।
न साधु मनसा मेने स्वपरासदग्रहा भ्रयम् ॥
३ ॥
यत्--जो; तत्र--वहाँ ( पाठशाला में ); गुरुणा--अध्यापकों द्वारा; प्रोक्तमू--बताया गया; शुश्रुवे--सुना; अनुपपाठ--सुनाया;च--तथा; न--नहीं; साधु-- अच्छे; मनसा--मन से; मेने--विचार किया; स्व--निजी; पर--दूसरों का; असत्-ग्रह--बुरे भावसे; आश्रयम्-- पुष्ट किया गयासमर्थित
प्रह्माद अध्यापकों द्वारा पढ़ाये गये राजनीति तथा अर्थशास्त्र के पाठों को सुनते और सुनातेअवश्य थे, किन्तु वे यह समझते थे कि राजनीति में किसी को मित्र माना जाता है और किसीको शत्रु।
अतएव यह विषय उन्हें पसन्द न था।
"
एकदासुरराट्पुत्रमड्डमारोप्य पाण्डव ।
पप्रच्छ कथ्यतां वत्स मन्यते साधु यद्धवान् ॥
४॥
एकदा--एक बार; असुर-राट्--असुरों के सम्राट ने; पुत्रमू--अपने पुत्र को; अड्डमू--गोद में; आरोप्य--लेकर; पाण्डब--हेमहाराज युधिष्ठिर; पप्रच्छ--पूछा; कथ्यताम्ू--बतलाओ; बत्स--मेरे प्यारे पुत्र; मन्यते--मानते हो; साधु-- श्रेष्ठठम; यत्--जिसे;भवान्--तुम |
हे राजा युधिष्ठटिर, एक बार असुरराज हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्दाद को अपनी गोद मेंलेकर बड़े ही दुलार से पूछा : हे पुत्र, मुझे यह बतलाओ कि तुमने अपने अध्यापकों से जितनेविषय पढ़े हैं उनमें से सर्वश्रेष्ठ कौन सा है।
"
श्रीप्रह्ाद उवाचतत्साधु मन्येउसुरवर्य देहिनांसदा समुद्विग्नधियामसदग्रहात् ।
हित्वात्मपातं गृहमन्धकृपंबन॑ गतो यद्धरिमाश्रयेत ॥
५॥
श्री-प्रह्माद: उवाच--प्रह्माद महाराज ने कहा; तत्--वह; साधु --अत्यन्त उत्तम अथवा जीवन का श्रेष्ठ अंश; मन्ये--मानता हूँ;असुर-वर्य--हे असुरों के राजा; देहिनामू--शरीरधारियों का; सदा--सदैव; समुद्विग्न--चिन्ताओं से पूर्ण; धियाम्--जिसकीबुद्धि; असत्-ग्रहात्-- क्षणिक शरीर या शारीरिक सम्बन्धों को असली मानने के कारण ( यह सोचते हुए कि मैं यह शरीर हूँऔर इस शरीर से सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु मेरी है ); हित्वा--त्याग कर; आत्म-पातम्--स्थान जहाँ जाकर आत्म-साक्षात्कार रूकजाता है; गृहम्--देहात्मबुद्धि या गृहस्थ जीवन; अन्ध-कूपम्--जो मात्र अंधा कुआँ है ( जहाँ जल नहीं होता किन्तु फिर भी लोगजल की तलाश करते हैं ); वनम्ू--जंगल में; गत:--जाकर; यत्-- जो; हरिम्-- भगवान् को; आश्रयेत--शरण लेता है।
प्रह्मद महाराज ने उत्तर दिया: हे असुरश्रेष्ठ दैत्वगाज, जहाँ तक मैंने अपने गुरु से सीखा है,ऐसा कोई व्यक्ति जिसने क्षणिक देह तथा क्षणिक गृहस्थ जीवन स्वीकार किया है, वह निश्चयही चिन्ताग्रस्त रहता है, क्योंकि वह ऐसे अंधे कुएँ में गिर जाता है जहाँ जल नहीं रहता, केवलकष्ट ही कष्ट मिलते हैं।
मनुष्य को चाहिए कि इस स्थिति को त्याग कर वन में चला जाये।
स्पष्टार्थ यह है कि मनुष्य को चाहिए कि वह वृन्दावन जाये जहाँ केवल कृष्णभावनामृत व्याप्त हैऔर इस तरह वह भगवान् की शरण ग्रहण करे।
"
श्रीनारद उबाचश्रुत्वा पुत्रगिरो दैत्य: परपक्षसमाहिता: ।
जहास बुद्धिर्बालानां भिद्यते परबुद्धिभि: ॥
६॥
श्री-नारदः उवाच--नारद मुनि ने कहा; श्रुत्वा--सुनकर; पुत्र-गिर:-- अपने पुत्र की उपदेशमयी वाणी; दैत्य:--हिरण्यकशिपु;पर-पक्ष--शत्रु की ओर; समाहिता:-- श्रद्धा युक्त; जहास--हँसा; बुद्द्धिः--बुद्धि; बालानाम्ू--छोटे बालकों की; भिद्यते--प्रदूषित होती है; पर-बुद्धिभि:--शत्रु पक्ष के सिखलाने से |
नारद मुनि ने आगे कहा : जब प्रह्नाद महाराज ने भक्तिमय आत्म-साक्षात्कार के विषय मेंबतलाया और इस तरह अपने पिता के शत्रु-पक्ष के प्रति अपनी स्वामि-भक्ति दिखलाई तोअसुरराज हिरण्यकशिपु ने प्रह्मद की बातें सुनकर हँसते हुए कहा--' शत्रु की वाणी द्वारा बाल-बुद्धि इसी तरह बिगाड़ी जाती है।
"
सम्यग्विधार्यतां बालो गुरुगेहे द्विजातिभि: ।
विष्णुपक्षै: प्रतिच्छन्नैर्न भिद्येतास्य धीर्यथा ॥
७॥
सम्यक्--पूर्णतया; विधार्यताम्--उसकी सुरक्षा की जाये; बाल:--यह कम आयु का; गुरु-गेहे--गुरुकुल में, जहाँ बच्चों कोगुरु द्वारा पढ़ाये जाने के लिए भेज दिया जाता है; द्वि-जातिभिः--ब्राह्मणों द्वारा; विष्णु-पक्षैः --विष्णु की ओर के;प्रतिच्छन्नै:--छद्म वेश में रहने वाले; न भिद्येत--प्रभावित न होने पाए; अस्य--उसकी; धी: --बुद्धि; यथा--जिससे
हिरण्यकशिपु ने अपने सहायकों को आदेश दिया: हे असुरो, इस बालक के गुरुकुल मेंजहाँ पर यह शिक्षा पाता है, इसकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखो जिससे इसकी बुद्धि छद्मावेश मेंघूमने वाले वैष्णवों द्वारा और अधिक न प्रभावित हो पाए।
"
गृहमानीतमाहूय प्रह्मादं दैत्ययाजकाः ।
प्रशस्य शलक्ष्णया वाचा समपृच्छन्त सामभिः: ॥
८॥
गृहम्--अध्यापकों ( षण्ड तथा अमर्क ) के घर तक; आनीतम्--लाया गया; आहूय--पुकार कर; प्रह्मदम्-प्रह्माद को; दैत्य-याजका:ः--हिरण्यकशिपु के पुरोहित; प्रशस्थ--शान्त करके; एशलक्ष्णया--अत्यन्त नप्रतापूर्वक; वाचा--वाणी; समपृच्छन्त--प्रश्न पूछा; सामभि:--अत्यन्त अनुकूल शब्दों से |
जब हिरण्यकशिपु के नौकर बालक प्रह्नाद को गुरुकुल वापस ले आये तो असुरों केपुरोहित षण्ड तथा अमर्क ने उसे शान्त किया।
उन्होंने अत्यन्त मृदु वाणी तथा स्नेह भरे शब्दों सेउससे इस प्रकार पूछा।
"
वत्स प्रह्मद भद्गं ते सत्यं कथय मा मृषा ।
बालानति कुतस्तुभ्यमेष बुद्धिविपर्यय: ॥
९॥
वत्स-हे पुत्र; प्रहाद--प्रह्मद; भद्रम् ते--तुम्हारा कल्याण हो; सत्यम्--सत्य; कथय--बतलाओ; मा--मत; मृषा--मिथ्या,झूठ; बालान् अति--अन्य असुर बालकों से बढ़कर; कुतः--कहाँ से; तुभ्यम्--तुमको; एष:--इस; बुद्धि--बुद्धि का;विपर्यय:--विकार, प्रदूषण |
हे पुत्र प्रह्मद, तुम्हारा क्षेम तथा कल्याण हो ।
तुम झूठ मत बोलना।
ये बालक जिन्हें तुम देख रहे हो, वे तुम जैसे नहीं हैं, क्योंकि ये सब पथभ्रष्ट जैसे नहीं बोलते।
तुमने ये उपदेश कहाँ सेसीखे ?
तुम्हारी बुद्धि इस तरह कैसे बिगड़ गई है?
" बुद्धिभेदः परकृत उताहो ते स्वतोभवत् ।
भण्यतां श्रोतुकामानां गुरूणां कुलनन्दन ॥
१०॥
बुद्धि- भेद: --बुद्धि भ्रष्ट होना; पर-कृतः--शत्रुओं द्वारा किया गया; उताहो--अथवा; ते--तुम्हारा; स्वतः -- अपने से;अभवत्ू--था; भण्यताम्--हमें बताओ; श्रोतु-कामानाम्--सुनने के इच्छुक; गुरूणाम्--अपने अध्यापकों का; कुल-नन्दन--है अपने वंश के सर्वश्रेष्ठ
हे कुलश्रेष्ठ, तुम्हारी बुद्धि का यह विकार अपने आप आया है या शत्रुओं द्वारा लाया गयाहै?
हम सब तुम्हारे अध्यापक हैं और इसके विषय में जानने के इच्छुक हैं।
हमसे सच-सचकहो।
"
श्रीप्रहाद उवाच'परः स्वश्वैत्यसदग्राहः पुंसां यन््मायया कृतः ।
विमोहितधियां दृष्टस्तस्मे भगवते नमः ॥
११॥
श्री-प्रह्ाद: उवाच--प्रह्माद महाराज ने उत्तर दिया; पर: --शत्रु; स्व: --स्वजन या मित्र; च-- भी; इति--इस प्रकार; असत्ू-ग्राहः--जीवन की भौतिक धारणा; पुंसाम्--मनुष्यों की; यत्ू--जिसकी; मायया--माया से; कृत:--उत्पन्न; विमोहित--मोहग्रस्त; धियाम्--बुद्धिवालों का; दृष्ट:--साक्षात् अनुभव किया गया; तस्मै--उस; भगवते-- भगवान् को; नम:--मेरानमस्कार है।
प्रह्मद महाराज ने उत्तर दिया: मैं उन भगवान् को सादर नमस्कार करता हूँ जिनकी माया नेमनुष्यों की बुद्धि को चकमा देकर 'मेरे मित्र' तथा 'मेरे शत्रु' में अन्तर उत्पन्न किया है।
निस्सन्देह, मुझको अब इसका वास्तविक अनुभव हो रहा है, यद्यपि मैंने पहले इसके विषय मेंप्रामाणिक स्त्रोतों से सुन रखा है।
"
स यदानुव्रतः पुंसां पशुबुद्धिर्विभिद्यते ।
अन्य एष तथान्योहमिति भेदगतासती ॥
१२॥
सः--वह भगवान्; यदा--जब; अनुब्रतः--अनुकूल या प्रसन्न; पुंसामू-बद्धजीवों का; पशु-बुर्द्ध:--जीवन के विषय में'पाशविक धारणा है ( कि मैं भगवान् हूँ और हर एक ईश्वर है ); विभिद्यते--नष्ट हो जाता है; अन्य:--दूसरा; एष:--यह; तथा--भी; अन्य:--दूसरा; अहम्-मैं; इति--इस प्रकार; भेद--अन्तर; गत--से युक्त; असती--संकटपूर्ण
जब भगवान् किसी जीव से उसकी भक्ति के कारण प्रसन्न हो जाते हैं, तो वह पण्डित बनजाता है और वह शत्रु, मित्र तथा अपने में कोई भेद नहीं मानता।
तब वह बुद्धिमानी से सोचता हैकि हम सभी ईश्वर के नित्य दास हैं, अतएव हम एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं।
"
एष आत्मा स्वपरेत्यबुद्धिभि-दुरत्ययानुक्रमणो निरूप्यते ।
मुहान्ति यद्वर्त्मनि वेदवादिनोब्रह्मादयो होष भिनत्ति मे मतिमू ॥
१३॥
सः--वह; एष:--यह; आत्मा-- प्रत्येक हृदय में स्थित परमात्मा; स्व-पर--यह मेरा कार्य है और वह दूसरे का है; इति--इसप्रकार; अबुद्धिभि:--ऐसी खराब बुद्धि वालों के द्वारा; दुरत्यय--पालन करना अत्यन्त दुष्कर; अनुक्रमण:--जिसकी भक्ति;निरूप्यते--निश्चित की जाती है ( शास्त्रों या गुरु के उपदेशों से ); मुह्ान्ति--मोहित हो जाते हैं; यत्--जिसके ; वर्त्मनि--रास्तेमें; वेद-वादिन:--वैदिक आदेशों के अनुयायी; ब्रह्मू-आदय:--ब्रह्मा से लेकर देवगण तक; हि--निस्सन्देह; एब:--यह;भिनत्ति--बदल देती है; मे--मेरी; मतिम्--बुद्धि को |
जो लोग सदैव 'शत्रु' तथा 'मित्र' के बारे में सोचते हैं, वे अपने भीतर परमात्मा को स्थिरकर पाने में असमर्थ रहते हैं।
इनकी जाने दें, ब्रह्मा जैसे बड़े-बड़े पुरुष जो वैदिक साहित्य से पूरी तरह अभिज्ञ हैं कभी-कभी भक्ति के सिद्धान्तों का पालन करते हुए मोहग्रस्त हो जाते हैं।
जिसभगवान् ने यह परिस्थिति उत्पन्न की है उसी ने ही मुझे आपके तथाकथित शत्रु का पक्षधर बननेकी बुद्धि दी है।
"
यथा क्षाम्यत्ययो ब्रह्मन्स्वयमाकर्षसन्निधौ ।
तथा मे भिद्यते चेतश्रक्रपाणेर्यटच्छया ॥
१४॥
यथा--जिस प्रकार; भ्राम्यति--घूमता है; अयः--लोह; ब्रह्मनू-हे ब्राह्मणो; स्ववम्ू--अपने आप; आकर्ष--चुम्बक के;सन्निधौ--निकट; तथा--उसी तरह; मे--मेरी; भिद्यते--बदलती है; चेत:--चेतना; चक्र-पाणे:--हाथ में चक्र धारण करनेवाले भगवान् विष्णु की; यहच्छया--केवल इच्छा मात्र से |
हे ब्राह्मणों ( आध्यापको ), जिस प्रकार चुम्बक से आकर्षित लोह स्वतः चुम्बक की ओरजाता है, उसी प्रकार भगवान् विष्णु की इच्छा से बदली हुई मेरी चेतना उन चक्रधारी की ओरआकृष्ट होती है।
इस प्रकार मुझे कोई स्वतंत्रता नहीं है।
"
श्रीनारद उवाचएतावद्राह्मणायोक्त्वा विरराम महामति: ।
त॑ सन्निभर्त्स्थ कुपितः सुदीनो राजअसेवक: ॥
१५॥
श्री-नारदः उबाच-- श्री नारद महामुनि ने कहा; एतावत्--इतना; ब्राह्मणाय--शुक्राचार्य के पुत्रों से, जो ब्राह्मण थे; उक्त्वा--कहकर; विरराम--मौन हो गये; महा-मति:--महा न् बुद्धि वाले प्रह्मद महाराज; तम्--उसको ( प्रह्द महाराज को );सन्निभर्त्स्थ--अत्यन्त भर्त्सना करते हुए; कुपित:--क्रुद्ध होकर; सु-दीन: --विचारों में दरिद्र या अत्यधिक शोकमग्न; राज-सेवक:--राजा हिरण्यकशिपु के सेवकगण।
श्री नारद महामुनि ने आगे कहा : शुक्राचार्य के पुत्रों अर्थात् अपने शिक्षकों षण्ड तथाअमर्क से यह कहने के बाद महात्मा प्रह्मद महाराज मौन हो गये।
तब ये तथाकथित ब्राह्मण उनपर कुद्ध हुए।
चूँकि वे हिरण्यकशिपु के दास थे अतएव वे अत्यन्त दुखी थे।
वे प्रहाद महाराजकी भर्त्सना करने के लिए इस प्रकार बोले।
"
आनीयतामेरे वेत्रमस्माकमयशस्करः ।
कुलाडूडरस्य दुर्बुद्धेश्चतुर्थों स्योदितो दम: ॥
१६॥
आनीयताम्--लायी जाये; ओर--ओह; वेत्रमू--बेंत, छड़ी; अस्माकम्--हमारी; अयशस्कर:--अपयश लाने वाला; कुल-अक्ञरस्थ--जो कुल में अंगार के सहश है उसका; दुर्बुद्धेः--दुर्बुद्धि वाले; चतुर्थ: --चौथा; अस्य--उसका; उदितः --घोषित;दमः--दण्ड ( हठ न्याय ) आरे! मेरी छड़ी तो लाओ! यह प्रह्माद हम लोगों के नाम और यश में बट्टा लगा रहा है।
अपनीदुर्बुद्धि के कारण यह असुरों के कुल में अंगार बन गया है।
अब राजनीतिक कूटनीति के चार प्रकारों में से चौथे के द्वारा इसका उपचार किये जाने की आवश्यकता है।
"
दैतेयचन्दनवने जातोयं कण्टकद्गुम: ।
यन्मूलोन्मूलपरशोर्विष्णोर्नालायितोर्भक: ॥
१७॥
दैतेय--दैत्य वंश के; चन्दन-वने--चन्दन वन में; जात:--उत्पन्न; अयमू--यह; कण्टक-द्रुम:--कँटीला वृक्ष; यत्ू--जिसकी;मूल--जड़ों के; उन्मूल--काटने में; परशो: --जो कुल्हाड़े की भाँति है; विष्णो: -- भगवान् विष्णु; नालायित:--हत्था या बेंट;अर्भक:--बालकयह धूर्त प्रहाद चन्दन के वन में कँटीले वृक्ष के समान प्रकट हुआ है।
चन्दन-वृक्ष काटने केलिए कुल्हाड़े की आवश्यकता होती है और कँटीले वृक्ष की लकड़ी ऐसे कुल्हाड़े का हत्थाबनाने के लिए अत्यन्त उपयुक्त होती है।
भगवान् विष्णु दैत्य वंश रूपी चन्दन बन को काटगिराने के लिए कुल्हाड़े के तुल्य हैं और यह प्रह्माद उस कुल्हाड़े का हत्था ( बेंट ) है।
"
इति तं विविधोपायैर्भीषयंस्तर्जनादिभि: ।
प्रह्मादं ग्राहयामास त्रिवर्गस्योपपादनम् ॥
१८ ॥
इति--इस तरह से; तम्--उसको ( प्रह्माद महाराज को ); विविध-उपायैः--अनेक प्रकार से; भीषयन्-- धमकाते हुए; तर्जन-आदिभि:--ताड़ना आदि के द्वारा; प्रह्ददम्--प्रह्मद महाराज को; ग्राहयाम् आस--पढ़ाया; त्रि-वर्गस्थ--जीवन के तीन लक्ष्य( धर्म, अर्थ तथा काम ); उपपादनम्--शास्त्र जो प्रस्तुत करता है।
प्रह्ाद महाराज के शिक्षक षण्ड तथा अमर्क ने अपने शिष्य को तरह-तरह से डराया-धमकाया और उसे धर्म, अर्थ तथा काम के मार्गों के विषय में पढ़ाना प्रारम्भ कर दिया।
यह थीउनकी शिक्षा देने की विधि।
"
तत एन गुरुज्ञात्वा ज्ञातज्ञेयचतुष्टयम् ।
दैत्येन्द्रं दर्शयामास मातृमृष्टमलड्डू तम् ॥
१९॥
ततः--तत्पश्चात्; एनम्--उसको ( प्रह्नमाद महाराज को ); गुरु:ः--उसके गुरु; ज्ञात्वा--जानकर; ज्ञात--जाना हुआ; ज्ञेय--जिन्हेंजानना है; चतुष्टयम्--चार कूटनीतिक सिद्धान्त-साम, दाम, दंड, भेद; दैत्य-इन्द्रम्--दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु को; दर्शयाम्आस--ले गये, प्रस्तुत किया; मातृ-मृष्टम्--अपनी माता के द्वारा नहलाया जाकर; अलड्डू तम्ू--आभूषणों से सजाया जाकर।
कुछ काल बाद षण्ड तथा अमर्क नामक शिक्षकों ने सोचा कि प्रह्नमाद महाराज जनता केनेताओं को शान्त करने, उन्हें लाभप्रद आकर्षक नौकरीयाँ देकर प्रसन्न करने, उनमें फूट डालकरउन पर शासन करने तथा अवज्ञा करने पर उन्हें दण्डित करने के कूटनीतिक मामलों में पर्याप्तशिक्षा प्राप्त कर चुका है।
तब एक दिन जब प्रह्नद की माता अपने पुत्र को स्वयं नहला-धुलाकर तथा पर्याप्त आभूषणों से अलंकृत कर चुकी थीं तो उन शिक्षकों ने उसे उसके पिता केसमक्ष लाकर प्रस्तुत कर दिया।
"
पादयो: पतितं बाल प्रतिनन्द्याशिषासुर: ।
परिष्वज्य चिरं दोर्भ्या परमामाप निर्व॒ृतिमू ॥
२०॥
पादयो:--पावों पर; पतितम्--गिरा हुआ; बालम्--बालक ( प्रह्माद महाराज ) को; प्रतिनन्द्य--प्रोत्साहित करते हुए;आशिषा--आशशीर्वादों से ( 'प्रिय पुत्र, तुम दीर्घायु हो और प्रसन्न रहो ' ); असुरः--असुर हिरण्यकशिपु ने; परिष्वज्य--चूमकर; चिरम्--प्यारवश दीर्घकाल तक ; दोर्भ्याम्--अपनी दोनों बाहों से; परमाम्--महान; आप--प्राप्त किया; निर्वुतिम्ू--हर्ष,आनन्द
जब हिरण्यकशिपु ने देखा कि उसका पुत्र उसके चरणों पर विनत है और प्रणाम कर रहा है,तो उसने तुरन्त ही वत्सल पिता की भाँति अपने पुत्र को आशीर्वाद देते हुए उसे अपनी दोनों बाँहोंमें भरकर उसका आलिंगन किया।
पिता स्वभावत: अपने पुत्र का आलिंगन करके प्रसन्न होता हैऔर इस तरह हिरण्यकशिपु अत्यन्त प्रसन्न हुआ।
"
आरोप्याड्डमवप्राय मूर्धन्यश्रुकलाम्बुभि: ।
आसिजश्जन्विकसद्ठक्त्रमिदमाह युधिष्ठटिर ॥
२१॥
आरोप्य--बैठाकर; अड्डमू--गोद में; अवध्राय मूर्थनि--उसका सिर सूँघ कर; अश्रु--आँसुओं की; कला-अम्बुभि: --बूँदों केजल से; आसिद्जन्-भिगोते हुए; विकसत्-वक्त्रमू- प्रसन्न मुख; इदम्--यह; आह--कहा; युधिष्टिर--हे महाराज युधिष्टिर |
नारद मुनि ने आगे बताया: हे राजा युथ्रिष्टिर, हिरण्यकशिपु ने प्रह्माद महाराज को अपनीगोद में बैठा लिया और उसका सिर सूँघने लगा।
फिर अपने नेत्रों से प्रेमाश्रु ढरकाते हुए औरबालक के हँसते मुख को भिगोते हुए वह अपने पुत्र से इस प्रकार बोला।
"
हिरण्यकशिपुरुवाचप्रह्मादानूच्यतां तात स्वधीतं किद्धिदुत्तमम् ।
कालेनैतावतायुष्मन्यदशिक्षद्गुरोर्भवान् ॥
२२॥
हिरण्यकशिपु: उबाच--राजा हिरण्यकशिपु ने कहा; प्रह्मद--हे प्रह्माद; अनूच्यतामू--बतलाओ; तात--मेरे पुत्र; स्वधीतम्--भलीभाँति सीखा हुआ; किश्ञित्--कुछ; उत्तमम्--अत्यन्त सुन्दर; कालेन एतावता--इतने काल में; आयुष्मन्--चिरंजीव;यत्--जो; अशिक्षत्--सीखा है; गुरो:--अपने गुरुओं से; भवान्--तुमने |
हिरण्यकशिपु ने कहा : हे प्रह्ाद, मेरे पुत्र, हे चिरज्जीव, इतने काल में तुमने अपने गुरुओं सेबहुत सारी बातें सुनी हैं।
अब तुम उन सब में जिसे सर्व श्रेष्ठ समझते हो उसे मुझसे कह सुनाओ।
"
श्रीप्रहाद उवाचश्रवण कीर्तन विष्णो: स्मरणं पादसेवनम् ।
अर्चनं बन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥
२३॥
इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्रैन्नवलक्षणा ।
क्रियेत भगवत्यद्धा तन्मन्येधीतमुत्तमम् ॥
२४॥
श्री-प्रह्दाद: उबाच--प्रह्माद महाराज ने कहा; श्रवणम्--सुनना; कीर्तनम्--कीर्तन करना; विष्णो: -- भगवान् विष्णु का ( अन्यकिसी का नहीं ); स्मरणम्--स्मरण करना; पाद-सेवनम्--चरणों की सेवा करना; अर्चनम्--पूजा करना ( षोडशोपचार अर्थात्१६ प्रकार की साजसामग्री द्वारा ); वन्दनं--स्तुति करना; दास्यम्ू--दास बनना; सख्यम्--सर्व श्रेष्ठ मित्र बनना; आत्म-निवेदनम्--अपने पास की प्रत्येक वस्तु को समर्पित करना; इति--इस प्रकार; पुंसा अर्पिता--भक्त द्वारा अर्पित; विष्णौ--भगवान् विष्णु पर ( अन्य किसी पर नहीं ); भक्ति:-- भक्ति; चेत्ू--यदि; नव-लक्षणा--नौ प्रकार वाली; क्रियेत--करनाचाहिए; भगवति-- भगवान् में; अद्धा--प्रत्यक्षतः या पूर्णत:; तत्--वह; मन्ये--मैं मानता हूँ; अधीतम्--विद्या अध्ययन;उत्तमम्--सर्वोच्च |
प्रह्ाद महाराज ने कहा : भगवान् विष्णु के दिव्य पवित्र नाम, रूप, साज-सामान तथालीलाओं के विषय में सुनना तथा कीर्तन करना, उनका स्मरण करना, भगवान् के चरणकमलोंकी सेवा करना, षोडशोपचार विधि द्वारा भगवान् की सादर पूजा करना, भगवान् से प्रार्थनाकरना, उनका दास बनना, भगवान् को सर्वश्रेष्ठ मित्र के रूप में मानना तथा उन्हें अपना सर्वस्वन्योछावर करना ( अर्थात् मनसा, वाचा, कर्मणा उनकी सेवा करना )--शुद्ध भक्ति की ये नौविधियाँ स्वीकार की गई हैं।
जिस किसी ने इन नौ विधियों द्वारा कृष्ण की सेवा में अपना जीवनअर्पित कर दिया है उसे ही सर्वाधिक विद्वान व्यक्ति मानना चाहिए, क्योंकि उसने पूर्ण ज्ञान प्राप्तकर लिया है।
"
निशम्यैतत्सुतवचो हिरण्यकशिपुस्तदा ।
गुरुपुत्रमुवाचेदं रुषा प्रस्फुरिताधर: ॥
२५॥
निशम्य--सुनकर; एतत्--यह; सुत-वच: --पुत्र की वाणी; हिरण्यकशिपु:--हिरण्यकशिपु ने; तदा--उस समय; गुरु-पुत्रमू--अपने गुरु शक्राचार्य के पुत्र से; उबाच--कहा; इृदम्--यह; रुषा--क्रोध से; प्रस्फुरित--हिलते हुए; अधर:ः --जिसके होठ ।
अपने पुत्र प्रह्द के मुख से इन वचनों को सुनकर हिरण्यकशिपु अत्यन्त क्रुद्ध हुआ।
उसनेकाँपते होठों से अपने गुरु शुक्राचार्य के पुत्र षण्ड से इस प्रकार कहा।
"
ब्रह्मबन्धो किमेतत्ते विपक्ष श्रयतासता ।
असारं ग्राहितो बालो मामनाहत्य दुर्मते ॥
२६॥
ब्रह्म-बन्धो--हे ब्राह्मण के अयोग्य पुत्र; किम् एतत्--यह क्या है; ते--तुम्हारे द्वारा; विपक्षम्--मेरे शत्रु दल का; श्रयता--आश्रय लेकर; असता--अ त्यन्त दुष्ट; असारम्ू--सारहीन, व्यर्थ; ग्राहित:--पढ़ाया गया; बाल:--बालक; माम्--मुझको;अनाहत्य--अनादर करके; दुर्मते--ेरे मूर्ख अध्यापक ।
ओरे ब्राह्मण के अत्यन्त नृशंस (घृणित ) अयोग्य पुत्र, तुमने मेरे आदेश की अवज्ञा की हैऔर मेरे श॒त्रु-पक्ष की शरण ले रखी है।
तुमने इस बेचारे बालक को भक्ति का पाठ पढ़ाया है।
यह क्या बकवास है?
" सन्ति ह्मसाधवो लोके दुर्मैत्राएछद्यवेषिण: ।
तेषामुदेत्यघं काले रोग: पातकिनामिव ॥
२७॥
सन्ति--हैं; हि--निस्सन्देह; असाधव:--असाधु मनुष्य; लोके--इस संसार में; दुर्मैत्रा:-- धोखा देने वाले मित्र; छद्य-वेषिण: --दिखावटी पहनावा पहने; तेषाम्--उन सबों का; उदेति--उदय होता है; अधम्ू--पापमय जीवन का फल; काले--काल क्रममें; रोग:--रोग; पातकिनाम्--पापी मनुष्यों के; इब--सहृश |
समय के साथ, उन लोगों में अनेक प्रकार के रोग प्रकट होते हैं, जो पापी हैं।
इसी प्रकार सेइस संसार में छद्यवेष धारण किये हुए जितने धोखेबाज मित्र हैं अन्ततोगत्वा उनके मिथ्याआचरण से उनकी वास्तविकता शत्रुता में प्रकट हो जाती है।
"
श्रीगुरुपुत्र उवाचन मत्प्रणीतं न परप्रणीतंसुतो वदत्येष तवेन्द्रशत्रो ।
नैसर्गिकीयं मतिरस्य राजन् नियच्छ मन्युं कददा: सम मा न: ॥
२८॥
श्री-गुरु-पुत्र: उबाच--हिरण्यकशिपु के गुरु शुक्राचार्य के पुत्र ने कहा; न--नहीं; मत्-प्रणीतम्--मेरे द्वारा पढ़ाने से; न--नतो; पर-प्रणीतम्--किसी अन्य द्वारा पढ़ाने से; सुत:--पुत्र ( प्रहलाद ); वदति--कहता है; एब:--यह; तव--तुम्हारा; इन्द्र-शत्रो--इन्द्र के शत्रु; नैसर्गिकी--प्राकृतिक; इयम्--यह; मतिः-- प्रवृत्ति; अस्य--उसकी; राजन्--हे राजा; नियच्छ--त्याग दें;मन्युम्--अपना क्रोध; कत्ू--दोष; अदा: --लगाइये; स्म--निस्सन्देह; मा--नहीं; न:ः--हम पर।
हिरण्यकशिपु के गुरु शुक्राचार्य के पुत्र ने कहा : हे इन्द्र के शत्रु, हे राजनू, आपके प्रह्मादपुत्र ने जो भी कहा है, वह न तो मेरे द्वारा पढ़ाया गया है, न किसी अन्य के द्वारा।
उसमें यहभक्ति स्वतः विकसित हुई है।
अतएवं आप अपना क्रोध त्याग दें और व्यर्थ ही हमें दोषी नठहराएँ।
एक ब्राह्मण को इस प्रकार अपमानित करना अच्छा नहीं है।
"
श्रीनारद उबाचगुरुणैवं प्रतिप्रोक्तो भूय आहासुर: सुतम् ।
न चेद्गुरुमुखीयं ते कुतोभद्रासती मतिः ॥
२९॥
श्री-नारद: उबाच--नारद मुनि ने कहा; गुरुणा--अध्यापक द्वारा; एवम्--इस प्रकार; प्रतिप्रोक्त:--उत्तर दिये जाने पर; भूय:--पुनः; आह--कहा; असुरः--महान् दैत्य, हिरण्यकशिपु ने; सुतम्--अपने पुत्र को; न--नहीं; चेत्ू--यदि; गुरु-मुखी--गुरु केमुख से निकली; इयम्--यह; ते--तुम्हारा; कुतः:--कहाँ से; अभद्र--हे अशुभ; असती --अत्यन्त बुरी; मति: --प्रवृत्ति,रुझान
श्री नारद मुनि ने आगे कहा : जब हिरण्यकशिपु को अध्यापक से यह उत्तर मिल गया तोउसने पुनः अपने पुत्र को सम्बेधित किया।
हिरण्यकशिपु ने कहा 'रे धूर्त! हमारे परिवार केसबसे पतित! यदि तुमने यह शिक्षा अपने अध्यापकों से नहीं प्राप्त की, तो बतला कि इसे कहाँसे प्राप्त की ?
'!श्रीप्रहाद उवाचमतिर्न कृष्णे परतः स्वतो वामिथोभिपद्येत गृहव्रतानाम् ।
"
अदान्तगोभिर्विशतां तमिस्त्रपुनः पुनश्चर्वितचर्वणानाम् ॥
३०॥
श्री-प्रहाद: उवाच-- श्री प्रहाद ने कहा; मतिः--झुकाव; न--कभी नहीं; कृष्णे-- भगवान् कृष्ण में; परत:--अन्यों के उपदेशोंसे; स्वतः--अपनी बुद्धि से; वा--अथवा; मिथ: --संयुक्त प्रयास से; अभिपद्येत--विकसित होती है; गृह-ब्रतानाम्--भौतिकवादी देहात्मबुद्धि के प्रति अनुरक्त लोगों का; अदान्त--अनियंत्रित; गोभि:--इन्द्रियों द्वारा; विशताम्--प्रवेश करते हुए;तमिस््रमू--नारकीय जीवन में; पुन:--फिर से; पुनः --फिर से; चर्वित--पहले से चबाई गई वस्तुएँ; चर्वणानाम्--जो चबा रहेहैं।
प्रह्माद महाराज ने उत्तर दिया: अपनी असंयमित इन्द्रियों के कारण जो लोग भौतिकतावादीजीवन के प्रति अत्यधिक लिप्त रहते हैं, वे नरकगामी होते हैं और बार-बार उसे चबाते हैं, जिसेपहले ही चबाया जा चुका है।
ऐसे लोगों का कृष्ण के प्रति झुकाव न तो अन्यों के उपदेशों से,न अपने निजी प्रयासों से, न ही दोनों को मिलाकर कभी होता है।
"
न ते विदुः स्वार्थगतिं हि विष्णुंदुराशया ये बहिरर्थमानिनः ।
अन्धा यथान्थैरुपनीयमाना-स्तेडपीशतन्त्यामुरुदाम्नि बद्धा: ॥
३१॥
न--नहीं; ते--वे; विदुः--जानते हैं; स्व-अर्थ-गतिम्--जीवन का चरम लक्ष्य या अपने असली हित को; हि--निस्सन्देह;विष्णुम्-- भगवान् विष्णु तथा उनके धाम को; दुराशया:--इस भौतिक जगत का भोग करने के इच्छुक; ये--जो; बहि:--बाह्यइन्द्रिय विषय; अर्थ-मानिन:--महत्त्वपूर्ण मानते हुए; अन्धा:-- अन्धे व्यक्ति; यथा--जिस प्रकार; अन्थै:--दूसरे अन्धे व्यक्तियोंद्वारा; उपनीयमाना: --ले जाए जाकर; ते--वे; अपि--यद्यपि; ईश-तन्त्रयामू-- भौतिक प्रकृति की रस्सियों ( नियमों ) को;उरू--अत्यन्त शक्तिशाली; दाम्नि--रस्सियाँ; बद्धा:--बँधी हुई
जो लोग भौतिक जीवन के भोग की भावना द्वारा हृढ़ता से बँधे हैं और जिन्होंने अपने हीसमान बाह्य इन्द्रिय विषयों से आसक्त अन्धे व्यक्ति को अपना नेता या गुरु स्वीकार कर रखा है,वे यह नहीं समझ सकते कि जीवन का लक्ष्य भगवद्धाम को वापस जाना तथा भगवान् विष्णुकी सेवा में लगे रहना है।
जिस प्रकार अन्धे व्यक्ति द्वारा ले जाया गया दूसरा अन्धा व्यक्ति सहीमार्ग भूल सकता है और गड्ढे में गिर सकता है उसी प्रकार भौतिकता से आसक्त व्यक्ति अपने हीजैसे किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा मार्ग दिखलाये जाने पर सकाम कर्म की रस्सियों द्वारा बंधे रहते हैं,जो अत्यन्त मजबूत धागों से बनी होती हैं और ऐसे लोग तीनों प्रकार के कष्ट सहते हुए पुनः-पुनःभौतिक जीवन प्राप्त करते रहते हैं।
"
नैषां मतिस्तावदुरुक्रमादिंम्रस्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थ: ।
महीयसां पादरजोभिषेकंनिष्किज्ञनानां न वृणीत यावत् ॥
३२॥
न--नहीं; एषाम्--इनकी; मति:-- चेतना; तावत्--तब तक; उरुक्रम-अड्प्रिमू-- भगवान् के चरणकमल, जो असामान्य कार्यकरने के लिए विख्यात हैं; स्पृशति--छूती है; अनर्थ--अंवाछित वस्तुओं का; अपगम:--विलोप, छिपना; यत्--जिसका;अर्थ:--प्रयोजन; महीयसाम्--महात्माओं ( या भक्तों ) का; पाद-रज:--चरणकमल की धूल द्वारा; अभिषेकम्--राजतिलक;निष्किज्नानामू--उन भक्तों का जिन्हें इस भौतिक जगत से कुछ भी लेना-देना नहीं है; न--नहीं; वृणीत--स्वीकार करे;यावत्--जब तक।
जब तक भौतिकतावादी जीवन के प्रति झुकाव रखने वाले लोग ऐसे वैष्णवों केचरणकमलों की धूलि अपने शरीर में नहीं लगाते जो भौतिक कल्मष से पूर्णतया मुक्त हैं, तबतक वे भगवान् के चरणकमलों के प्रति आसक्त नहीं हो सकते जिनका यशोगान उनके अपनेअसामान्य कार्यकलापों के लिए किया जाता है।
केवल कृष्णभावनाभावित बनकर एवं इसप्रकार से भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण करके ही मनुष्य भौतिक कल्मष से मुक्त होसकता है।
"
इत्युक्त्वोपरतं पुत्रं हिरण्यकशिपू रुषा ।
अन्धीकृतात्मा स्वोत्सड्रान्निरस्थत महीतले ॥
३३॥
इति--इस प्रकार; उक्त्वा--कहकर; उपरतम्--रुक गया; पुत्रमू-पुत्र को; हिरण्यकशिपु:--हिरण्यकशिपु ने; रुषा--अत्यधिक क्रोध से; अन्धीकृत-आत्मा--आत्म-साक्षात्कार से अन्धा बना हुआ; स्व-उत्सड्ञात्--अपनी गोद से; निरस्थत--फेंकदिया; मही-तले--भूमि पर।
जब प्रह्नाद महाराज इस प्रकार बोलकर शान्त हो गये तो क्रोध से अन्धे हिरण्यकशिपु ने उन्हेंअपनी गोद से उठाकर भूमि पर फेंक दिया।
"
आहामर्षरुषाविष्ट: कषायीभूतलोचन: ।
वध्यतामाश्चयं वध्यो निःसारयत नेरृता: ॥
३४॥
आह--उसने कहा; अमर्ष--रोष; रुषा--तथा क्रोध से; आविष्ट: --पराभूत, वशी भूत; कषायी-भूत--गरम लाल ताँबे की भाँतिहुए; लोचन:--जिसकी आँखें; वध्यताम्ू--मार डालो; आशु--तुरन््त; अयम्--इसको; वध्य:--मारने के योग्य है, जो;निःसारयत--बाहर निकाल दो; नैरृता:--हे असुरो।
अत्यन्त क्रुद्ध तथा पिघले ताम्र जैसी लाल-लाल आँखें किये हिरण्यकशिपु ने अपने नौकरोंसे कहा : अरे असुरो, इस बालक को मेरी आँखों से दूर करो।
यह वध करने योग्य है।
इसेजितनी जल्दी हो सके मार डालो।
"
अयं मे भ्रातृहा सोयं हित्वा स्वान्सुहदोधमः ।
पितृव्यहन्तु: पादौ यो विष्णोर्दासवर्दर्चति ॥
३५॥
अयम्--यह; मे--मेरे; भ्रातृ-हा-- भाई को मारने वाला; सः--वह; अयम्--यह; हित्वा--त्यागकर; स्वान्-- अपने; सुहृदः --शुभचिन्तक; अधमः--अत्यन्त नीच; पितृव्य-हन्तु:--चाचा हिरण्याक्ष के मारने वाले के; पादौ--चरणों पर; यः--जो;विष्णो:-- भगवान् विष्णु के; दास-बत्--नौकर की तरह; अर्चति--सेवा करता है।
यह बालक प्रह्लाद मेरे भाई को मारने वाला है, क्योंकि इसने एक तुच्छ नौकर की भाँति मेरेशत्रु भगवान् विष्णु की सेवा में संलग्न रहने के लिए अपने परिवार को छोड़ दिया है।
"
विष्णोर्वा साध्वसौ कि नु करिष्यत्यसमझ्जस: ।
सौहदं दुस्त्यजं पित्रोरहाद्यः पञ्ञह्यायन: ॥
३६॥
विष्णो;--विष्णु को; वा--अथवा; साधु-- अच्छा; असौ--यह; किम्--क्या; नु--निस्सन्देह; करिष्यति--करेगा;असमझ्जसः:--विश्वास न करने योग्य; सौहदम्--प्रिय सम्बन्ध; दुस्त्यजम्--छोड़ पाना कठिन; पित्रो:--अपने पिता-माता का;अहातू--छोड़ दिया; यः--जो; पश्च-हायन:--केवल पाँच वर्ष का।
यद्यपि प्रह्मद केवल पाँच वर्ष का है, किन्तु इसी अल्पावस्था में उसने अपने माता-पिता केस्नेह-सम्बन्ध को त्याग दिया है।
अतएव यह निश्चय ही विश्वास करने योग्य नहीं है।
निस्सन्देह,इस पर विश्वास नहीं किया जा सकता कि वह विष्णु के प्रति भी ठीक से आचरण करेगा।
"
परोउप्यपत्यं हितकृद्यथौषध॑स्वदेहजोप्यामयवत्सुतोहितः ।
छिन्द्यात्तदड़ं यदुतात्मनोहितंशेष सुखं जीवति यद्विवर्जनात्ू ॥
३७॥
'परः--उसी परिवार से सम्बन्धित न होना; अपि--यद्यपि; अपत्यमू--बालक; हित-कृत्--जो लाभप्रद है; यथा--जिस प्रकार;औषधम्---औषधि; स्व-देह-ज:--अपने ही शरीर से उत्पन्न; अपि--यद्यपि; आमय-वत्--रोग के समान; सुतः--पुत्र;अहितः--जो हितैषी नहीं है; छिन्द्यातू--काट देना चाहिए; तत्--उस; अड्भमू--शरीर के भाग को; यत्--जो; उत--निस्सन्देह;आत्मन:--शरीर का; अहितम्--अनुपयोगी; शेषम्--बचा हुआ, शेष; सुखम्--सुखपूर्वक; जीवति--जीवित रहता है; यत्--जिसके; विवर्जनात्ू--काट देने से
यद्यपि औषधि ( जड़ी-बूटी ) जंगल में उत्पन्न होने के कारण मनुष्य की श्रेणी में परिगणितनहीं होती किन्तु लाभप्रद होने पर अत्यन्त सावधानी से रखी जाती है।
इसी प्रकार यदि अपनेपरिवार से बाहर का कोई व्यक्ति अनुकूल हो तो उसे पुत्र के समान संरक्षण प्रदान किया जानाचाहिए।
दूसरी ओर, यदि किसी के शरीर का कोई अंग रोग से विषाक्त हो जाये तो उसे काटकर अलग कर देना चाहिए जिससे शेष शरीर सुखपूर्वक जीवित रहे।
इसी प्रकार भले ही अपनाआत्मज पुत्र ही क्यों न हो, यदि वह प्रतिकूल है, तो उसका परित्याग कर देना चाहिए।
"
सर्वैरुपायहन्तव्य: सम्भोजशयनासनै: ।
सुहल्लिड्रधरः शत्रुर्मुनेर्दुष्ठमिवेन्द्रियम् ॥
३८ ॥
सर्वै:--सभी; उपायै:--उपायों के द्वारा; हन्तव्यः--मार डाला जाये; सम्भोज--खाते; शयन--लेटे; आसनै:--बैठे हुए; सुहत्-लिड्ड-धरः--मित्र का बाना धारण किये हुए; शत्रु;--दुश्मन; मुनेः--मुनियों की; दुष्टम्--अनियंत्रित; इव-- जैसे; इन्द्रियम्ू--इन्द्रियाँ ॥
जिस प्रकार असंयमित इन्द्रियाँ आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ने के लिए व्यस्त योगियों कीशत्रु होती हैं उसी प्रकार यह प्रह्माद मित्र के समान प्रतीत होकर भी मेरा शत्रु है, क्योंकि इस परमेरा वश नहीं चलता।
अतएव खाते, बैठे या सोते हुए, सभी तरह से इस शत्रु को मार डालाजाये।
"
नैरतास्ते समादिष्टा भर्रा वै शूलपाणयः ।
तिम्मदंष्टकरालास्यास्ताम्रश्मश्रुशिरोरुहा: ॥
३९॥
नदन्तो भेरवं नादं छिन्धि भिन्धीति वादिन: ।
आसीनं चाहन््शूलैः प्रह्म॒दं सर्वमर्मसु ॥
४० ॥
नैर्ताः--असुर; ते--वे; समादिष्टाः:--आज्ञा पाकर; भर्त्रा--अपने स्वामी से; बै--निस्सन्देह; शूल-पाणय:-- अपने हाथों मेंत्रिशूल लेकर; तिग्म--अत्यन्त तीखे; दंघ्ट--दाँत; कराल--तथा भयानक; आस्या:--मुख; ताम्र-श्मश्रु--ताँबे जैसी मूछें;शिरोरुहाः--सिर के बाल; नदन्तः--ध्वनि करते; भैरवम्-- भयानक; नादम्-- ध्वनि; छिन्धि--काट दो; भिन्धि--छोट-छोटेटुकड़े कर डालो; इति--इस प्रकार; वादिन:--बोलते हुए; आसीनम्--चुपचाप बैठा हुआ; च--तथा; अहनन्--आक्रमणकिया; शूलैः--अपने त्रिशूलों से; प्रहादम्--प्रह्माद पर; सर्व-मर्मसु--शरीर के कोमल भागों ( मर्मस्थलों ) पर।
इस प्रकार हिरण्यकशिपु के सारे नौकर राक्षसगण प्रह्नाद महाराज के शरीर के नग्न भागों( मर्मस्थलों ) पर अपने त्रिशूल से वार करने लगे।
इन राक्षसों के मुख अत्यन्त भयानक थे, दाँततीखे तथा दाढ़ी एवं बाल ताँबे जैसे थे और वे सब अत्यन्त भयावने प्रतीत हो रहे थे।
वे उच्चस्वर से 'उसके टुकड़े-टुकड़े कर दो।
उसे छेद डालो ' इस तरह चिल्ला कर प्रह्नमाद महाराज परजो शान्त भाव से भगवान् का ध्यान करते हुए आसीन थे प्रहार करने लगे ।
"
परे ब्रह्मण्यनिर्देश्ये भगवत्यरिलात्मनि ।
युक्तात्मन्यफला आसन्नपुण्यस्येव सत्क्रिया: ॥
४१॥
परे--परम; ब्रह्मणि--ब्रहा; अनिर्देश्ये--इन्द्रियों से अहश्य; भगवति-- भगवान् में; अखिल-आत्मनि--सबों के परमात्मा; युक्त-आत्मनि--जिसका मन लगा था, उस ( प्रह्मद ) पर; अफला:--निष्फल, व्यर्थ; आसनू-- थे; अपुण्यस्य--ऐसे व्यक्ति काजिसके पास पुण्यकर्मो की पूँजी न हो; इब--सहृश; सत्-क्रिया:--सत्कर्म ( यथा यज्ञ तथा तपस्या )।
ऐसा व्यक्ति जिसके पास कोई पुण्यकर्म की कमाई नहीं होती यदि वह कोई अच्छा कार्यकरे भी तो उसका कोई परिणाम नहीं निकलता।
इसी प्रकार राक्षसों के हथियारों का प्रह्मादमहाराज पर कोई प्रकट प्रभाव नहीं पड़ रहा था, क्योंकि वे भौतिक दशाओं से अविचलित रहनेवाले भक्त थे और उन भगवान् का ध्यान करने तथा सेवा करने में व्यस्त थे, जो अनश्वर थे,जिन्हें भौतिक इन्द्रियों द्वारा अनुभव नहीं किया जा सकता और जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के आत्मा हैं।
"
प्रयासेपहते तस्सिन्दैत्येन्द्र: परिशद्धितः ।
चकार तद्वधोपायात्रिर्बन्धेन युधिष्ठटिर ॥
४२॥
प्रयासे--प्रयास में; अपहते--व्यर्थ; तस्मिन्--उस; दैत्य-इन्द्र:--दैत्यों का राजा हिरण्यकश्पु; परिशद्धितः--अत्यन्त भयभीत( यह सोचकर कि बालक की रक्षा हो रही है ); चकार--किया; तत्-वध-उपायान्--उसे मारने के विविध उपाय; निर्बन्धेन--संकल्प से; युथिष्ठटिर--हे राजा युधिष्टिर |
हे राजा युधिष्ठिर, जब प्रह्द महाराज को मार डालने के असुरों के सारे प्रयास निष्फल होगये तो दैत्यराज हिरण्यकशिपु अत्यन्त भयभीत होकर उसे मारने के अन्य उपायों की योजनाकरने लगा।
"
दिग्गजैर्दन्दशूकेन्द्रैभिचारावपातनै: ।
मायाभिः सन्निरोधेश्व गरदानैरभोजने: ।
हिमवाय्वग्निसलिलै: पर्वताक्रमणैरपि ॥
४३॥
न शशाक यदा हन्तुमपापमसुरः सुतम् ।
चिन्तां दीर्घ॑तमां प्राप्तस्तत्कर्तु नाभ्यपद्यत ॥
४४॥
दिक्-गजैः--बड़े-बड़े हाथियों द्वारा, जिन्हें अपने पैरों तले किसी भी वस्तु को कुचल डालने का प्रशिक्षण दिया गया था; दन्द-शूक-इन्द्रै:--राजा के जहरीले साँपों द्वारा कटा कर; अभिचार--विध्वंसक जादू द्वारा; अवपातनै:--पर्वत की चोटी से गिराकर; मायाभिः --युक्तियों द्वारा; सन्निरोधै:--बन्दी बना कर; च--तथा; गर-दानै:ः --विष पिला कर; अभोजनै: -- भूखों रखकर; हिम-वायु-अग्नि--ठिठुरती ठंड, हवा तथा अग्नि; सलिलैः--तथा जल से; पर्वत-आक्रमणै:--बड़े-बड़े पत्थरों तथापहाड़ियों से कुचला कर; अपि-- भी; न शशाक--समर्थ न हुआ; यदा--जब; हन्तुम्ू--मारने के लिए; अपापम्--जो तनिकभी पापी न था; असुरः--असुर ( हिरण्यकशिपु ); सुतम्--अपने पुत्र को; चिन्ताम्-चिन्ता; दीर्घ-तमाम्--अधिक काल सेचली आ रही; प्राप्त:--प्राप्त किया; ततू-कर्तुमू--उसे करने के लिए; न--नहीं; अभ्यपद्यत--प्राप्त किया।
हिरण्यकशिपु अपने पुत्र को विशाल हाथी के पाँवों के नीचे, बड़े-बड़े भयानक साँपों केबीच में, विध्वसंक जादू का प्रयोग करके, पर्वत की चोटी से नीचे गिरा कर, मायावी तरकीबेंकरके, विष देकर, भूखों रख कर, ठिठुरती ठंड, हवा, अग्नि तथा जल में रखकर या उस परभारी पत्थर फेंक कर भी नहीं मार पाया।
जब उसने देखा कि वह निर्दोष प्रहाद को किसी तरहहानि नहीं पहुँचा पाया, तो वह अत्यन्त चिन्ता में पड़ गया कि आगे क्या किया जाये।
"
एष मे बह्साधूक्तो वधोपायाश्च निर्मिता: ।
तैस्तैद्रेहिरसद्धमर्मुक्त: स्वेनेव तेजसा ॥
४५॥
एष:--यह; मे--मेरा; बहु-- अनेक; असाधु-उक्त:--गालियाँ; वध-उपाया:--उसे मारने के अनेक उपायों द्वारा; च--तथा;निर्मिता:--कल्पित, बनाया; तैः--उनके द्वारा; तैः--उनके द्वारा; द्रोहैः--विश्वासधात से; असत्ू-धर्मै:--घृषण्ित कर्म के द्वारा;मुक्त:--छूटा हुआ; स्वेन-- अपने; एव--निस्सन्देह; तेजसा--तेज से |
हिरण्यकशिपु ने विचार किया: मैंने इस बालक को दण्डित करने के लिए अनेक गालियाँदी हैं, अपशब्द कहे हैं और उसे मार डालने के लिए अनेक उपाय किये हैं, किन्तु मेरे समस्तप्रयत्तों के बावजूद यह मरा नहीं।
निस्सन्देह, इन विश्वासघातों तथा घृणित कर्मों के द्वारा वहतनिक भी प्रभावित नहीं हुआ और अपनी ही शक्ति से उसने अपने को बचाया है।
"
वर्तमानोविदूरे वै बालोप्यजडधीरयम् ।
न विस्मरति मेउनार्य शुनः शेप इव प्रभु; ॥
४६॥
वर्तमान:--स्थित होकर; अविदूरे--अधिक दूरी पर नहीं; बै--निस्सन्देह; बाल:--शिशु मात्र; अपि--यद्यपि; अजड-धी:--पूर्ण निर्भीक; अयमू--यह; न--नहीं; विस्मरति-- भूलता है; मे--मेरा; अनार्यम्--दुर्व्यवहार; शुनः शेप: --कुत्ते की टेढ़ी पूँछ;इब--सहश; प्रभु:--समर्थ होकर |
यद्यपि यह मेरे अत्यन्त निकट है और निरा बालक है फिर भी यह पूर्ण निर्भीक है।
यह उसकुत्ते की टेढ़ी पूँछ के समान है, जो कभी सीधी नहीं की जा सकती, क्योंकि यह मेरे दुर्व्यवहार तथा अपने स्वामी भगवान् विष्णु से अपने सम्बन्ध को कभी भी नहीं भूलता है।
"
अप्रमेयानुभावोयमकुतश्चिद्धयोउमरः ।
नूनमेतद्विरो धेन मृत्युर्मे भविता न वा ॥
४७॥
अप्रमेष--असीम; अनुभाव: --यश; अयम्--यह; अकुतश्चित्- भयः--किसी भी ओर से भय न होना; अमर:--अमर; नूनम्--निश्चय ही; एतत्-विरोधेन--इसका विरोध करने से; मृत्यु:--मृत्यु; मे--मेरी; भविता--हो जाये; न--नहीं; बवा--अथवा
मैं देखता हूँ कि इस बालक की शक्ति असीम है, क्योंकि यह मेरे किसी भी दण्ड सेभयभीत नहीं हुआ।
यह अमर प्रतीत होता है, अतएवं इसके प्रति शत्रुता के भाव से मैं मरूँगा।
या ऐसा नहीं भी हो सकता।
"
इति तच्चिन्तया किज्ञिन्म्लानअरयमधोमुखम् ।
शण्डामर्कावौशनसौ विविक्त इति होचतु: ॥
४८ ॥
इति--इस प्रकार; ततू्-चिन्तया--प्रहाद महाराज की स्थिति के कारण चिन्ता से पूर्ण; किल्जित्ू-- कुछ-कुछ; म्लान--मुरझाया;भ्रियम्ू--शारीरिक कान्ति; अध:-मुखम्--नीचे मुँह किये; शण्ड-अमरकौं--षण्ड तथा अमर्क; औशनसौ--शुक़राचार्य के पुत्रो;विविक्ते--गुप्त स्थान में; इति--इस प्रकार; ह--निस्सन्देह; ऊचतु:--बोले
इस प्रकार सोचते हुए चिन्तित तथा कान्तिहीन दैत्यराज अपना मुँह नीचा किये चुप रह गया।
शुक्राचार्य के दोनों पुत्र षण्ड तथा अमर्क एकान्त में उससे बोले।
"
जित॑ त्वयैकेन जगत्त्रयं भ्रुवोर्विजृम्भणत्रस्तसमस्तधिष्णयपम् ।
न तस्य चिन्त्यं तव नाथ चक्ष्वहेन वै शिशूनां गुणदोषयो: पदम् ॥
४९॥
" जितम्--जीता गया; त्वया--तुम्हारे द्वारा; एकेन--अकेले; जगत््-त्रयम्--तीनों जगत; भ्रुवो: --भौहों के ; विजृम्भण--फैलनेसे; त्रस्त-- भयभीत हो जाते हैं; समस्त--सारे; धिष्णयपम्-- प्रत्येक लोक के प्रमुख व्यक्ति; न--नहीं; तस्य--उसकी;चिन्त्यमू--चिन्ता; तब--तुम्हारा; नाथ--हे स्वामी; चक्ष्वहे--हम देख रहे हैं; न--न तो; बै--निस्सन्देह; शिशूनाम्--बच्चों के;गुण-दोषयो: --उत्तम गुण या दोष का; पदम्--विषय |
हे स्वामी, हम जानते हैं कि यदि आप अपनी भौहों को हिला भी दें तो विविध लोकों केनायक ( पालक ) अत्यन्त भयभीत हो उठते हैं।
आपने किसी की सहायता लिए बिना ही तीनोंलोकों को जीत लिया है।
इसलिए हमें आपके चिन्तित होने का कोई कारण नहीं दिख रहा।
जहाँ तक प्रह्माद का प्रश्न है, वह एक बालक मात्र है और वह चिन्ता का कारण नहीं बनसकता।
अन्ततः उसके गुणों या अवगुणों का कोई महत्व नहीं है।
"
इमं तु पाशैर्वरुणस्य बद्ध्वानिधेहि भीतो न पलायते यथा ।
बुद्धिश्च पुंसो वयसार्यसेवयायावद्गुरुर्भागव आगमिष्यति ॥
५०॥
इमम्--इसको; तु--लेकिन; पाशैः--रस्सियों से; वरुणस्य--वरुण देव की; बद्ध्वा--बाँध कर; निधेहि--रखो; भीत:ः--डराहुआ; न--नहीं; पलायते-- भागे; यथा-- जिससे; बुद्धि:--बुद्धि; च-- भी; पुंसः--मनुष्य की; वयसा--उप्र बढ़ने से; आर्य--अनुभवी व्यक्तियों की; सेवया--सेवा से; यावत्--जब तक; गुरु:--हमारा गुरु; भार्गव:ः--शुक्राचार्य; आगमिष्यति--आजाएगा।
हमारे गुरु शुक्राचार्य के लौट आने तक इस बालक को वरुण की रस्सियों से बाँध दोजिससे वह डर कर भाग न सके।
हर हालत में, जब वह कुछ-कुछ बड़ा हो जाएगा और हमारेउपदेशों को आत्मसात् कर चुकेगा या हमारे गुरु की सेवा कर लेगा तो इसकी बुद्धि बदलजाएगी।
इस प्रकार चिन्ता की कोई बात नहीं है।
"
तथेति गुरुपुत्रोक्तमनुज्ञायेदमब्रवीत् ।
धर्मो हास्योपदेष्टव्यो राज्ञां यो गृहमेधिनाम् ॥
५१॥
तथा--इस प्रकार से; इति--इस तरह; गुरु-पुत्र-उक्तम्--शुक्राचार्य के पुत्रों, षण्ड तथा अमर्क द्वारा सलाह दिये जाने पर;अनुज्ञाय--मानकर; इदम्--यह; अब्नवीत्--कहा; धर्म:--कर्तव्य; हि--निस्सन्देह; अस्य--प्रह्माद को; उपदेष्टव्य: --उपदेशदेना चाहिए; राज्ञामू--राजाओं के; यः--जो; गृह-मेधिनाम्--गृहस्थ जीवन में जिनकी रुचि है।
अपने गुरु पुत्र षण्ड तथा अमर्क के इन उपदेशों को सुनकर हिरण्यकशिपु राजी हो गयाऔर उनसे प्रह्माद को इस वृत्तिपरक धर्म का उपदेश देने की प्रार्थना की जिसका पालन राजसी गृहस्थ परिवार करते हैं।
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धर्ममर्थ च काम च नितरां चानुपूर्वशः ।
प्रह्दायोचतू राजन्प्रश्रितावनताय च॥
५२॥
धर्मम्--संसारी वृत्तिपरक कर्तव्य; अर्थभमू--आर्थिक विकास; च--तथा; काममू्--इन्द्रिय तृप्ति; च--तथा; नितराम्--सदैव;च--तथा; अनुपूर्वश: --क्रमानुसार, प्रारम्भ से लेकर अन्त तक; प्रह्मदाय--प्रह्मद महाराज के लिए; ऊचतु: --उन्होंने कहा;राजनू--हे राजा; प्रश्रित--नम्र; अवनताय--तथा विनीत; च-- भी |
तत्पश्चात् षण्ड तथा अमर्क ने अत्यन्त नम्न एवं विनीत प्रह्माद महाराज को क्रमशः तथानिरन्तर धर्म, अर्थ तथा काम के विषय में पढ़ाना शुरू किया।
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यथा त्रिवर्ग गुरुभिरात्मने उपशिक्षितम् ।
न साधु मेने तच्छिक्षां द्वन्द्दारामोपर्णिताम् ॥
५३॥
यथा--इस प्रकार; त्रि-वर्गम्--तीन विधियाँ ( धर्म, अर्थ तथा काम ); गुरुभि:--अध्यापकों द्वारा; आत्मने-- अपने ( प्रह्मद )को; उपशिक्षितम्--उपदेश दिया; न--नहीं; साधु--वास्तव में अच्छा; मेने--उसने माना; तत्-शिक्षाम्--उस शिक्षा को; द्वन्द्द-आराम--द्वैत ( शत्रुता तथा मित्रता ) में आनन्द लेने वाले व्यक्तियों द्वारा; उपवर्णिताम्--संस्तुत
घण्ड तथा अमर्क नामक शिक्षकों ने प्रहाद महाराज को धर्म, अर्थ तथा काम इन तीन प्रकारके भौतिक विकास के बारे में शिक्षा दी।
किन्तु प्रह्दाद महाराज इन उपदेशों से ऊपर थे, अतएवउन्होंने इन्हें पसन्द नहीं किया, क्योंकि ऐसे उपदेश संसारी मामलों के द्वैत पर आधारित होते हैं,जो मनुष्य को भौतिकतावादी जीवन-शैली में फंसा लेते हैं जिसमें जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधिप्रमुख हैं।
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यदाचार्य: परावृत्तो गृहमेधीयकर्मसु ।
वयस्यैर्बालकैस्तत्र सोपहूतः कृतक्षणै: ॥
५४॥
यदा--जब; आचार्य: --शिक्षकगण; परावृत्त:--काम में लग गये; गृह-मेधीय--गृहस्थ जीवन के; कर्मसु--कार्यों में;वयस्यै:--समान आयु वाले अपने मित्रों; बालकैः--बालकों के द्वारा; तत्र--वहाँ; सः--वह ( प्रह्द महाराज ); अपहूत: --बुलाया गया; कृत-क्षणैः:--उचित अवसर पाकर
जब शिक्षक अपने घरेलू काम करने अपने घर चले जाते थे, तो प्रह्मद महाराज केसमवयस्क छात्र उन्हें इस अवकाश ( छुट्टी ) को खेलने में लगाने के लिए बुला लेते।
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अथ ताउ्एलश््णया वाचा प्रत्याहूय महाबुध: ।
उवाच दिद्दांस्तन्निष्ठां कृपया प्रहसन्निव ॥
५५॥
अथ--तब; तान्--सहपाठियों को; एलक्ष्णया--अत्यन्त सुहावनी; वाचा--वाणी से; प्रत्याहूय--सम्बोधित करके; महा-बुध:--अत्यन्त बुद्धिमान तथा आध्यात्मिक चेतना में अग्रसर प्रह्माद महाराज ने ( महा-महान्, बुध:-पंडित ); उबाच--कहा;विद्वानू--अत्यन्त विद्वान; तत्-निष्ठाम्--ईश्वर साक्षात्कार का मार्ग; कृपया--दयालु होकर; प्रहसन्--हँसते हुए; इब--सहश |
तब प्रह्नमाद महाराज ने, जो सचमुच परम विद्वान पुरुष थे, अपने सहपाठियों से अत्यन्त मधुरवाणी में कहा।
उन्होंने हँसते हुए भौतिकतावादी जीवन-शैली की अनुपयोगिता के विषय मेंबताना शुरू किया।
उन पर अत्यन्त कृपालु होने के कारण उन्होंने उन्हें इस प्रकार उपदेश दिया।
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ते तु तद्गौरवात्सवें त्यक्तक्रीडापरिच्छदा: ।
बाला अदूषितधियो द्वन्द्वारामेरितेहिते: ॥
५६॥
पर्युपासत राजेन्द्र तन्न्यस्तहदयेक्षणा: ।
तानाह करुणो मैत्रो महाभागवतोउसुर: ॥
५७॥
ते--वे; तु--निस्सन्देह; तत्-गौरवात्-- प्रहाद महाराज के शब्दों के प्रति महान् आदर से ( उनके भक्त होने के कारण ); सर्वे--वे सभी; त्यक्त--त्याग; क्रीडा-परिच्छदा:-- खेलने के खिलौने; बाला:--लड़के; अदूषित-धिय:--जिनकी बुद्धि अपनेपिताओं के समान दूषित नहीं हुई; द्वन्द-द्वैत्य भाव में; आराम--आनन्द लेने वाले ( यथा षण्ड तथा अमर्क जैसे शिक्षक );ईरित--उपदेशों द्वारा; ईहितैः--तथा कार्यों से; पर्युपासत--चारों ओर बैठ गये; राज-इन्द्र--हे राजा युधिष्ठिर; तत्--उसको;न्यस्त--त्याग करके; हृदय-ईक्षणा:-- अपने हृदय तथा नेत्र; तानू--उनको; आह--बोला; करुण:--अत्यन्त दयालु; मैत्र: --असली मित्र; महा-भागवतः --अत्यन्त पूज्य भक्त; असुरः--यद्यपि असुर पिता से उत्पन्न प्रह्माद महाराज |
हे राजा युधिष्टिर, सारे बालक प्रह्नाद महाराज को अत्यधिक चाहते थे और उनका सम्मानकरते थे।
अपनी अल्पायु के कारण बे अपने शिक्षकों के उपदेशों एवं कार्यों से जितने दूषित नहींहुए थे जबकि उनके शिक्षक निन्दा, द्वैत तथा शारीरिक सुविधा के प्रति आसक्त थे।
इस तरहसारे बालक अपने-अपने खिलौने छोड़कर प्रह्माद महाराज की बात सुनने के लिए उनके चारोंओर बैठ गये।
उनके हृदय तथा नेत्र उन पर टिके थे और वे उन्हें उत्साहपूर्वक देख रहे थे।
प्रह्मादमहाराज यद्यपि असुर कुल में पैदा हुए थे, किन्तु महान् भक्त थे और वे असुरों की कल्याण-कामना करते थे।
इस प्रकार उन्होंने उन बालकों को भौतिकतावादी जीवन की व्यर्थता के विषयमें उपदेश देना प्ररम्भ किया।
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