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अध्याय छह: प्रह्लाद अपने राक्षसी सहपाठियों को निर्देश देता है
7.6श्रीप्रह्दाद उबाचकौमार आच्रेत्प्राज्ञो धर्मान्भागवतानिह ।
दुर्लभं मानुषं जन्म तदप्यश्लुवमर्थदम् ॥
१॥
श्री-प्रह्माद: उवाच--प्रह्माद महाराज ने कहा; कौमार:--बाल्य काल में; आचरेत्--अभ्यास करे; प्राज्:--बुद्धिमान व्यक्ति;धर्मान्--वृत्तिपरक कर्तव्य; भागवतान्ू--जो भगवान् की भक्ति हैं; हह--इस जीवन में; दुर्लभम्--अत्यन्त दुर्लभ; मानुषम्--मनुष्य का; जन्म--जन्म; तत्ू--वह; अपि-- भी; अध्रुवम्--नश्वर; अर्थ-दम्--अर्थ से पूर्ण
प्रह्माद महाराज ने कहा : पर्याप्त बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह जीवन के प्रारम्भ से हीअर्थात् बाल्यकाल से ही अन्य सारे कार्यों को छोड़कर भक्ति कार्यो के अभ्यास में इस मानवशरीर का उपयोग करे।
यह मनुष्य-शरीर अत्यन्त दुर्लभ है और अन्य शरीरों की भाँति नाशवान्होते हुए भी अर्थपूर्ण है, क्योंकि मनुष्य जीवन में भक्ति सम्पन्न की जा सकती है।
यदि निष्ठापूर्वक किंचित भी भक्ति की जाये तो पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो सकती है।
"
यथा हि पुरुषस्थेह विष्णो: पादोपसर्पणम् ।
यदेष सर्वभूतानां प्रिय आत्मे श्वरः सुहत् ॥
२॥
यथा--जिससे कि; हि--निस्सन्देह; पुरुषस्थ--जीव का; इह--यहाँ; विष्णो:-- भगवान् विष्णु का; पाद-उपसर्पणम्--चरणकमलों के निकट आना; यत्--क्योंकि; एष:--यह; सर्व-भूतानाम्--समस्त जीवों का; प्रिय: --प्रिय; आत्म-ई श्वर: --आत्मा का स्वामी, परमात्मा; सुहत्ू--शुभचिन्तक तथा मित्र
यह मनुष्य-जीवन भगवद्धाम जाने का अवसर प्रदान करता है अतएव प्रत्येक जीव को,विशेष रूप से उसे जिसे मनुष्य जीवन मिला है, भगवान् विष्णु के चरणकमलों की भक्ति मेंप्रवृत्त होना चाहिए।
यह भक्ति स्वाभाविक है क्योंकि भगवान् विष्णु सर्वाधिक प्रिय, आत्मा केस्वामी तथा अन्य सब जीवों के शुभचिन्तक हैं।
"
सुखमैन्द्रियकं दैत्या देहयोगेन देहिनाम् ।
सर्वत्र लभ्यते देवाद्यथा दुःखमयत्नतः ॥
३॥
सुखम्--सुख; ऐन्द्रियकम्-- भौतिक इन्द्रियों के प्रसंग में; दैत्या:--दैत्य कुल में उत्पन्न मेरे मित्रो; देह-योगेन--विशेष प्रकार काशरीर होने के कारण; देहिनाम्ू--समस्त देहधारी जीवों का; सर्वत्र--सभी जगह ( किसी योनि में ); लभ्यते--उपलब्ध हैं;दैवात्-- भाग्य से; यथा--जिस प्रकार; दुःखम्--दुख; अयलतः--बिना प्रयास के |
प्रहाद महाराज ने आगे कहा: हे दैत्य कुल में उत्पन्न मेरे मित्रों, शरीर के सम्पर्क सेइन्द्रियविषयों से जो सुख अनुभव किया जाता है, वह तो किसी भी योनि में अपने विगत सकामकर्मों के अनुसार प्राप्त किया जा सकता है।
ऐसा सुख बिना प्रयास के उसी तरह स्वतः प्राप्तहोता है, जिस प्रकार हमें दुख प्राप्त होता है।
"
तत्प्रयासो न कर्तव्यो यत आयुर्व्यय: परम् ।
न तथा विन्दते क्षेम॑ मुकुन्दचरणाम्बुजम् ॥
४॥
ततू--उस ( काम तथा अर्थ ) के लिए; प्रयास:--प्रयतत; न--नहीं; कर्तव्य:--करणीय; यत:--जिससे; आयु:-व्यय:ः--आयुकी हानि; परमू--एकमात्र या अन्ततः; न--न तो; तथा--उस तरह से; विन्दते-- भोगता है; क्षेममू--जीवन का अन्तिम लक्ष्य;मुकुन्द-- भव-बन्धन से उद्धार करने वाले भगवान् के; चरण-अम्बुजम्--चरणकमलों को |
केवल इन्द्रिय-तृप्ति या भौतिक सुख के लिए आर्थिक विकास द्वारा प्रयत नहीं करनाचाहिए, क्योंकि इससे समय तथा शक्ति की हानि होती है और वास्तविक लाभ नहीं मिल पाता।
यदि कोई कृष्णभावनामृत को लक्ष्य बनाकर प्रयत्न करे तो वह निश्चित रूप से आत्म-साक्षात्कारके आध्यात्मिक पद को प्राप्त कर सकता है।
आर्थिक विकास में अपने आपको संलग्न रखने सेकोई ऐसा लाभ प्राप्त नहीं होता।
"
ततो यतेत कुशल: क्षेमाय भवमाश्रित: ।
शरीरं पौरुषं यावन्न विपद्येत पुष्कलम् ॥
५॥
ततः--अतएव; यतेत--प्रयल करना चाहिए; कुशल: --बुद्धिमान मनुष्य जो जीवन के अन्तिम लक्ष्य में रुचि रखता हो;क्षेमाय--जीवन के असली लाभ के लिए या भव-बन्धन से मुक्ति के लिए; भवम् आश्लित:--जो भौतिक संसार में है;शरीरम्--शरीर; पौरुषम्--पुरुष का; यावत्--जब तक; न--नहीं; विपद्येत--असफल होता है; पुष्कलम्ू-हृष्ट-पुष्ट |
अतएबव इस संसार में रहते हुए ( भवम् आश्रितः ) भले तथा बुरे में भेद करने में सक्षम व्यक्तिको चाहिए कि जब तक शरीर हृष्ट-पुष्ट रहे और विनष्ट होने से चिन्ताग्रस्त न हो तब तक वहजीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करे।
"
पुंसो वर्षशतत ह्यायुस्तदर्ध चाजितात्मन: ।
निष्फलं यदसौ रात्र्यां शेतेउन्धं प्रापितस्तम: ॥
६॥
पुंस:--प्रत्येक मनुष्य के लिए; वर्ष-शतम्--एक सौ वर्ष; हि--निस्सन्देह; आयु:--आयु, उप्र; तत्-- उसका; अर्धम्--आधा;च--तथा; अजित-आत्मन:--ऐसे व्यक्ति का जो अपनी इन्द्रियों का दास है; निष्फलम्--बिना लाभ के, निरर्थक; यत्--क्योंकि; असौ--वह व्यक्ति; रात््यामू--रात में; शेते--सोता है; अन्धम्--अज्ञान ( अपने शरीर तथा आत्मा को भूल कर );प्रापित: --पूर्णतया प्राप्त करके; तम:--अंधकार |
प्रत्येक व्यक्ति की अधिकतम आयु एक सौ वर्ष है, किन्तु जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को वशमें नहीं कर पाता, उसकी आयु के आधे वर्ष तो रात्रि में बारह घण्टे अज्ञानवश सोने में ही बीतजाते हैं।
अतएव ऐसे व्यक्ति की आयु केवल पचास वर्ष होती है।
"
मुग्धस्य बालये कैशोरे क्रीडतो याति विंशतिः ।
जरया ग्रस्तदेहस्य यात्यकल्पस्य विंशति: ॥
७॥
मुग्धस्य--मोहग्रस्त या पूर्ण ज्ञान में न होने वाले व्यक्ति का; बाल्ये--बचपन में; कैशोरे--किशोरावस्था में; क्रीडत:--खेलतेहुए; याति--बीतता है; विंशति:--बीस वर्ष; जरया--वृद्धावस्था से; ग्रस्त-देहस्य--ग्रस्त मनुष्य का; याति--बीत जाता है;अकल्पस्थ--बिना संकल्प के क्योंकि भौतिक कार्यो के करने में असमर्थ रहता है; विंशति:-- और बीस वर्ष |
मनुष्य अपने बाल्यकाल की कोमल अवस्था में, जब सभी मोहग्रस्त होते हैं, दस वर्ष बितादेता है।
इसी प्रकार किशोर अवस्था में, खेल-कूद में लगकर वह अगले दस वर्ष बिता देता है।
इस प्रकार बीस वर्ष व्यर्थ चले जाते हैं।
इसी तरह से वृद्धावस्था में जब मनुष्य अक्षम हो जाता हैऔर वह भौतिक कार्यकलाप भी सम्पन्न नहीं कर पाता, उसमें उसके बीस वर्ष और निकल जातेहैं।
"
दुरापूरेण कामेन मोहेन च बलीयसा ।
शेषं गृहेषु सक्तस्य प्रमत्तस्यापयाति हि ॥
८॥
दुराप्रेण--जो कभी पूरा नहीं होता; कामेन-- भौतिक जगत को भोगने की प्रबल इच्छा से; मोहेन--मोह से; च--भी;बलीयसा--जो बलिष्ठ तथा दुर्जेय है; शेषम्--जीवन के बचे हुए वर्ष; गृहेषु--गृहस्थ जीवन में; सक्तस्थ-- अत्यधिक आसक्तका; प्रमत्तस्य--पागल का; अपयाति--व्यर्थ बिता देता है; हि--निस्सन्देह |
जिसके मन तथा इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं वह अतृप्त कामेच्छाओं तथा प्रबल मोह के कारणपारिवारिक जीवन में अधिकाधिक आसक्त होता जाता है।
ऐसे पागल मनुष्य के जीवन के शेषवर्ष भी व्यर्थ जाते हैं, क्योंकि वह इन वर्षों में भी अपने को भक्ति में नहीं लगा सकता।
"
को गृहेषु पुमान्सक्तमात्मानमजितेन्द्रिय: ।
स्नेहपाशैईढेर्बद्धमुत्सहेत विमोचितुम् ॥
९॥
कः--कौन सा; गृहेषु--गृहस्थ जीवन में; पुमान्ू--मनुष्य; सक्तम्--अत्यधिक आसक्त; आत्मानम्--स्वयं, आत्मा; अजित-इन्द्रियः:--जिसने कभी इन्द्रियों को वश में नहीं किया; स्नेह-पाशैः--स्नेह की रस्सियों से; हृढे:ः--अत्यन्त शक्तिशाली; बद्धम्--हाथ तथा पैर बाँधा हुआ; उत्सहेत--समर्थ है; विमोचितुम्-- भव-बन्धन से छुड़ाने के लिए
ऐसा कौन मनुष्य होगा जो अपनी इन्द्रियों को वश में करने में असमर्थ होने के कारण गृहस्थजीवन से अत्यधिक आसक्त होकर अपने आपको मुक्त कर सके ?
आसक्त गृहस्थ अपनों ( पत्नी,बच्चे तथा अन्य सम्बन्धी ) के स्नेह-बन्धन से अत्यन्त हढ़तापूर्वक बँधा रहता है।
"
को न्वर्थतृष्णां विसूजेत्प्राणे भ्योडपि य ईप्सित: ।
यं क्रीणात्यसुभि: प्रेष्ठस्तस्कर: सेवको वणिक् ॥
१०॥
कः--कौन; नु--निस्सन्देह; अर्थ-तृष्णामू--धन अर्जित करने की प्रबल इच्छा को; विसूजेत्--त्याग सकता है; प्राणेभ्य:--जीवन की अपेक्षा; अपि--निस्सन्देह; यः--जो; ईप्सित:--अधिक वांछित; यम्--जिसको; क्रीणाति--प्राप्त करने का प्रयासकरता है; असुभिः--अपने ही प्राण से; प्रेष्टे: --अत्यन्त प्रिय; तस्कर:--चोर; सेवक:--नौकर; वणिक्--व्यापारी ।
धन इतना प्रिय होता है कि लोग इसे मधु से भी मीठा मानने लगते हैं, अतएव ऐसा कौनहोगा जो धन संग्रह करने की तृष्णा का परित्याग कर सकता है और वह भी गृहस्थ जीवन में ?
चोर, व्यावसायिक नौकर ( सैनिक ) तथा व्यापारी अपने प्रिय प्राणों की बाजी लगाकर भी धनप्राप्त करना चाहते हैं।
"
कथ॑ प्रियाया अनुकम्पिताया:सड़ूं रहस्यं रुचिरां श्व॒ मन्त्रान् ।
सुहत्सु तत्स्नेहसित: शिशूनां कलाक्षराणामनुरक्तचित्त: ॥
११॥
पुत्रान्स्मरंस्ता दुहितृहदय्या भ्रातृन्स्वसूर्वा पितरौ च दीनौ ।
गृहान्मनोज्ञोरुपरिच्छदां श्रवृत्तीश्च कुल्या: पशुभृत्यवर्गान् ॥
१२॥
त्यजेत कोशस्कृदिवेहमान:कर्माणि लोभादवितृप्तकाम: ।
औपस्थ्यजैह्वंं बहुमन्यमान:कथं विरज्येत दुरन््तमोहः ॥
१३॥
कथम्--कैसे; प्रियाया:--परमप्रिय पत्नी की; अनुकम्पिताया:--सदैव स्नेहिल एवं दयालु; सड्रमू-- साथ; रहस्यम्--एकान्त;रुचिरान्ू--अत्यन्त सुखद तथा भाने वाला; च--तथा; मन्त्रान्--उपदेश; सुहत्सु--पत्नी तथा बच्चों को; तत्-स्नेह-सितः --उनके स्नेह से बँधा हुआ; शिशूनाम्--छोटे-छोटे बच्चों का; कल-अक्षराणाम्--तोतली बोली बोलते हुए; अनुरक्त-चित्त:--व्यक्ति जिसका मन मोहित है; पुत्रान्ू--बच्चों को; स्मरन्--सोचने में; ता:--उनको; दुहितृः--पुत्रियाँ ( विवाहित तथा अपनीससुराल में रहती हुई ); हृदय्या:--हृदय में वास करने वाली; भ्रातृन्ू-- भाइयों को; स्वसृ: वा--अथवा बहिनों को; पितरौ--माता-पिता; च--तथा; दीनौ--वृद्धावस्था के कारण अत्यधिक अशक्त; गृहान्ू--घरेलू मामले; मनोज्ञ--अत्यन्त आकर्षक;उरू--अत्यधिक; परिच्छदानू--साज-सामान; च--तथा; वृत्ती:--आय के महान् साधन ( उद्योग व्यापार ); च--तथा;कुल्या:--परिवार से सम्बद्ध; पशु--पशुओं( गायों, हाथियों तथा और घरेलू पशुओं ); भृत्य--नौकर-नौकरानियों के; वर्गानू--समूहों को; त्यजेत--छोड़ सकता है; कोशः-कृत्--रेशम का कीड़ा; इब--सहृश; ईहमान: --सम्पन्न करते हुए; कर्माणि--विभिन्न कार्यकलाप; लोभात्-- अतृप्त इच्छाओं के कारण; अवितृप्त-काम:ः--जिनकी बढ़ती हुई इच्छाएँ पूरी नहीं होती;औपस्थ्य-कर्मेन्द्रियाँ; जैहमू--तथा जीभ से प्राप्त आनन्द; बहु-मन्यमान:-- अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानते हुए; कथम्--कैसे;विरज्येत--त्यागने में समर्थ है; दुरन््त-मोह:ः--अत्यधिक मोह में होने से |
भला ऐसा मनुष्य, जो अपने परिवार के प्रति अत्यधिक स्नेहिल हो और जिसके हृदय मेंसदैव उनकी आकृतियां रहती हों, वह किस तरह उनका संग छोड़ सकता है?
विशेषकर पत्नीसदैव अत्यन्त दयालु तथा सहानुभूति पूर्ण होती है और अपने पति को सदैव एकान्त में प्रसन्नकरती है।
भला ऐसा कौन होगा जो ऐसी प्रिय तथा स्नेहिल पत्नी की संगति का त्याग करता हो ?
छोटे-छोटे बालक तोतली बोली बोलते हैं, जो सुनने में अत्यन्त मधुर लगती है और उनके पितासदैव उनके मधुर शब्दों के विषय में सोचते रहते हैं।
वह भला उनका संग किस तरह छोड़सकता है?
किसी भी मनुष्य को अपने वृद्ध माता-पिता, अपने पुत्र तथा पुत्रियाँ भी अत्यन्त प्रियहोते हैं।
पुत्री अपने पिता की अत्यन्त लाड़ली होती है और अपनी ससुराल में रहती हुई भी वहउसके मन में बसी रहती है।
भला कौन है, जो इस संग को छोड़ेगा?
इसके अतिरिक्त भी घर मेंअनेक अलंकृत साज-सामान होते हैं और अनेक पशु तथा नौकर भी रहते हैं।
भला ऐसे आरामको कौन छोड़ना चाहता है?
आसक्त गृहस्थ उस रेशम-कीट की तरह है, जो अपने चारों ओरधागा बुनकर अपने को बन्दी बना लेता है और फिर उससे निकल पाने में असमर्थ रहता है।
केवल दो इन्द्रियों--शिश्न तथा जिह्ला--की तुष्टि के लिए मनुष्य भौतिक दशाओं से बँध जाता है।
कोई इनसे कैसे बच सकता है?
" कुटुम्बपोषाय वियन्निजायुर्न बुध्यतेर्थ विहतं प्रमत्त: ।
सर्वत्र तापत्रयदुःखितात्मानिर्विद्यते न स्वकुटुम्बराम: ॥
१४॥
कुटुम्ब--पारिवारिक सदस्यों के; पोषाय--पालन-पोषण के लिए; वियत्--इनकार करते हुए; निज-आयु: --अपनी उप्र; न--नहीं; बुध्यते--समझता है; अर्थम्--जीवन का हित या प्रयोजन; विहतम्--विनष्ट; प्रमत्त:-- भौतिक परिस्थिति में पागल होकर;सर्वत्र--सभी जगह; ताप-त्रय--तीनों दुखमय स्थितियों से ( अध्यात्मिक, अधिदैविक तथा अधिभौतिक ); दुःखित--सतायाजाकर; आत्मा--आत्मा; निर्विद्यते--पछताता है; न--नहीं; स्व-कुटुम्ब-राम:--परिवार का भरण-पोषण करके ही भोगभोगता है
अत्यधिक आसक्त मनुष्य यह नहीं समझ सकता कि वह अपना बहुमूल्य जीवन अपने परिवार के ही पालन-पोषण में व्यर्थ बिता रहा है।
वह यह भी नहीं समझ पाता कि इस मनुष्य-जीवन का जो परम सत्य के साक्षात्कार के लिए उपयुक्त है, उद्देय अहृश्य रूप से विनष्ट हो रहाहै।
फिर भी वह इतनी चतुरता एवं सावधानी से देखता रहता है कि दुर्व्यवस्था के कारण एक भीपाई न खोई जाए।
इस प्रकार यद्यपि संसार में आसक्त व्यक्ति सदैव तीनों प्रकार के कष्ट सहतारहता है, किन्तु वह इस संसार के प्रति अरूचि उत्पन्न नहीं कर पाता।
"
वित्तेषु नित्याभिनिविष्टचेताविद्ठां श्व दोषं परवित्तहर्तु: ।
प्रेत्पेह वाथाप्यजितेन्द्रियस्त-दशान्तकामो हरते कुटुम्बी ॥
१५॥
वित्तेषु-- भौतिक सम्पत्ति में; नित्य-अभिनिविष्ट-चेता:--जिसका मन सदैव रमा रहता है; विद्वानू--जानते हुए; च-- भी;दोषम्--बुराई; पर-वित्त-हर्तु:--ठगकर या काला बाजारी से अन्यों का धन चुराने वाले का; प्रेत्य--मरने के बाद; इह--इससंसार में; वा--अथवा; अथापि--फिर भी; अजित-इन्द्रिय:--इन्द्रियों को वश में न कर सकने के कारण; तत्--वह; अशान्त-'काम:ः--जिसकी इच्छाएँ कभी पूरी नहीं होती, अतृप्त; हरते--चुराता है; कुटुम्बी--अपने परिवार को अत्यधिक चाहने वाला।
यदि कोई मनुष्य पारिवारिक भरण-पोषण के कर्तव्यों के प्रति अत्यधिक आसक्त होने केकारण अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं कर पाता और उसका मन सदैव इसी में डूबा रहता है किधन का संग्रह कैसे करे।
यद्यपि वह जानता रहता है कि जो अन्यों का धन लेता है उसे सरकारी नियमों और मृत्यु के बाद यमराज के नियमों द्वारा दण्डित होना पड़ेगा।
तो भी वह धन अर्जितकरने के लिए दूसरों को धोखा देता रहता है।
"
विद्वानपीत्थं दनुजाः कुटुम्बंपुष्णनस्वलोकाय न कल्पते वे ।
यः स्वीयपारक्यविभिन्नभाव-स्तमः प्रपद्येत यथा विमूढ: ॥
१६॥
विद्वानू--जानते हुए ( विशेष रूप से गृहस्थ जीवन में असुविधाओं को ); अपि--यद्यपि; इत्थम्--इस प्रकार; दनु-जा:-हेअसुर पुत्रो; कुटुम्बम्ू--परिवार के सदस्य या दूर के लोग ( यथा जाति, समाज, राष्ट्र या राष्ट्रकुलों के लोग ); पुष्णनू--जीवन कीसारी सुविधाएँ प्रदान करते हुए; स्व-लोकाय--अपने को समझने में; न कल्पते--समर्थ नहीं होता; वै--निस्सन्देह; यः--जो;स्वीय--अपना; पारक्य--अन्यों का; विभिन्न--पृथक्; भाव:--जीवन की धारणा वाला; तम:ः--केवल अंधकार; प्रपद्येत--प्रवेश करता है; यथा--जिस प्रकार; विमूढ: --शिक्षारहित व्यक्ति या पशु जैसा
हे मित्रों, हे असुरपुत्रो, इस भौतिक जगत में शिक्षा में अग्रणी लगने वाले व्यक्ति भी यहविचार करने की प्रवृत्ति रखते हैं 'यह मेरा है और यह पराया है।
इस प्रकार वे सीमितपारिवारिक जीवन की धारणा में अपने परिवारों को जीवन की आवश्यकताएँ प्रदान करने मेंलगे रहते हैं मानो अशिक्षित कुत्ते-बिल्ली हों।
वे आध्यात्मिक ज्ञान ग्रहण नहीं कर सकते प्रत्युतवे मोहग्रस्त तथा अज्ञान से पराभूत हैं।
"
यतो न कश्रित्क्व च कुत्रचिद्ठादीनः स्वमात्मानमलं समर्थ: ।
विमोचितुं कामहशां विहार-क्रीडामृगो यन्निगडो विसर्ग: ॥
१७॥
ततो विदृरात्परिहृत्य दैत्यादैत्येषु सड़ं विषयात्मकेषु ।
उपेत नारायणमादिदेवंस मुक्तसड्रैरिषितोपवर्ग: ॥
१८॥
यतः--क्योंकि; न--कभी नहीं; कश्चित्--कोई; क्व--किसी भी स्थान में; च--भी; कुत्रचित्ू--किसी समय; वा--अथवा;दीन:ः--अल्प ज्ञान वाला; स्वम्--अपना; आत्मानम्--स्वयं; अलम्--अत्यधिक; समर्थ: --सशक्त; विमोचितुम्-मुक्त करने केलिए; काम-हृशाम्--कामलोलुप स्त्रियों का; विहार--विषय सुख में; क्रीडा-मृग:--खिलौना, मनोरंजन का साधन; यत्--जिसमें; निगडः--जो भव-बन्धन की जंजीर है; विसर्ग:--पारिवारिक सम्बन्धों का विस्तार; ततः--ऐसी परिस्थिति में;विदूरात्-दूर से ही; परिहत्य--त्याग करके; दैत्या:-हे दैत्यों के पुत्र मेरे मित्रो; दैत्येषु--दैत्यों के मध्य; सड्रमू--साथ; विषय-आत्म-केषु-- जिन्हें इन्द्रियभोग की लत है, व्यसनी; उपेत--पास जाना चाहिए; नारायणम्-- भगवान् नारायण के; आदि-देवमू--समस्त देवताओं के उद्गम; सः--वह; मुक्त-सड्डैः--मुक्त पुरुषों की संगति द्वारा; इषित:--इच्छित; अपवर्ग: --मुक्तिका मार्ग
हे मित्रों, हे दैत्य पुत्रो, यह निश्चित है कि भगवान् के ज्ञान से विहीन कोई भी अपने कोकिसी काल या किसी देश में मुक्त करने में समर्थ नहीं रहा है।
उल्टे, ऐसे ज्ञान-विहीन लोगभौतिक नियमों से बाँधे जाते हैं।
वे वास्तव में इन्द्रियविषय में लिप्त रहते हैं और उनका लक्ष्यस्त्रियाँ होती है।
निस्सन्देह, ऐसे लोग आकर्षक स्त्रियों के हाथ के खिलौने बने रहते हैं।
ऐसीजीवन-धारणोओं के शिकार बनकर वे बच्चों, नातियों तथा पनातियों से घिरे रहते हैं और इसतरह वे भव-बन्धन की जंजीरों से जकड़े जाते हैं।
जो लोग ऐसी जीवन-धारणा में बुरी तरहलिप्त रहते हैं, वे दैत्य कहलाते हैं।
इसलिए यद्यपि तुम सभी दैत्यों के पुत्र हो, किन्तु ऐसेव्यक्तियों से दूर रहो! और भगवान् नारायण की शरण ग्रहण करो जो समस्त देवताओं के उद्गमहैं, क्योंकि नारायण-भक्तों का चरम लक्ष्य भव-बन्धन से मुक्ति पाना है।
"
न हाच्युतं प्रीणयतो बह्लायासोसुरात्मजा: ।
आत्मत्वात्सर्वभूतानां सिद्धत्वादिह सर्वतः ॥
१९॥
न--नहीं; हि--निस्सन्देह; अच्युतम्--कभी न गिरने वाले भगवान्; प्रीणयत:--तुष्ट करते हुए; बहु--अत्यधिक; आयास:--प्रयास; असुर-आत्म-जा: --हे असुरपुत्रों; आत्मत्वात्ू-सिद्ध होने के कारण; सर्व-भूतानाम्ू--सारेजीवों का; सिद्धत्वात्--स्थापित होने से; इह-- इस संसार में; सर्वतः--सभी दिशाओं में, सभी कालों में तथा सभी दृष्टिकोणों से |
हे दैत्यपुत्रो, भगवान् नारायण ही समस्त जीवों के पिता और मूल परमात्मा हैं।
फलस्वरूपउन्हें प्रसन्न करने में या किसी भी दशा में उनकी पूजा करने में बच्चे या वृद्ध को कोई अवरोधनहीं होता।
जीव तथा भगवान् का अन्तःसम्बन्ध एक तथ्य है अतएवं भगवान् को प्रसन्न करने मेंकोई कठिनाई नहीं है।
"
परावरेषु भूतेषु ब्रह्मान्तस्थावरादिषु ।
भौतिकेषु विकारेषु भूतेष्वथ महत्सु च ॥
२०॥
गुणेषु गुणसाम्ये च गुणव्यतिकरे तथा ।
एक एव परो ह्वात्मा भगवानीश्वरोव्यय: ॥
२१॥
प्रत्यगात्मस्वरूपेण हृश्यरूपेण च स्वयम् ।
व्याप्यव्यापकनिर्देश्यो हानिर्देश्योडईविकल्पित: ॥
२२॥
केवलानुभवानन्दस्वरूप: परमेश्वर: ।
माययान्तर्तितै श्वर्य ईयते गुणसर्गया ॥
२३॥
पर-अवरेषु--जीवन की श्रेष्ठ या नारकीय स्थिति में; भूतेषु--जीवों में; ब्रह्म-अन्त--ब्रह्मा में समाप्त होने वाले; स्थावर-आदिषु--पेड़-पौधों जैसे अचल प्राणियों से लेकर; भौतिकेषु-- भौतिक तत्त्वों में; विकारेषु --रूपान्तरों में; भूतेषु--प्रकृति केपाँच स्थूल तत्त्वों में; अथ--साथ ही; महत्सु--महत् तत्त्व में पूर्ण शक्ति; च-- भी; गुणेषु-- प्रकृति के गुणों से; गुण-साम्ये--भौतिक गुणों के संतुलन में; च--तथा; गुण-व्यतिकरे-- प्रकृति के नियमों के असमान प्राकट्य में; तथा--और; एक:--एक;एव--एकमात्र; पर:--दिव्य; हि--निस्सन्देह; आत्मा--मूल स्त्रोत; भगवान्-- भगवान्; ईश्वर:ः--नियन्ता; अव्यय:--विकाररहित; प्रत्यक् --आन्तरिक ; आत्म-स्वरूपेण--परमात्मा के रूप में, अपने मूल स्वाभाविक पद के द्वारा; दृश्य-रूपेण--अपने दृश्य रूपों द्वारा; च-- भी; स्वयमू--स्वयं; व्याप्य--व्याप्त; व्यापक --सर्वव्यापी; निर्देश्य:--वर्णन किया जाने वाला;हि--निश्चय; अनिर्देश्य:--जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता ( सूक्ष्म उपस्थिति के कारण ); अविकल्पित:--बिना भेदभावके; केवल--एकमात्र; अनुभव-आनन्द-स्वरूप: -- जिसका स्वरूप आनन्द पूर्ण तथा ज्ञान से युक्त है; परम-ई श्वर:--पर मे श्वर,परम शासक; मायया--माया द्वारा; अन्तर्हित--आवृत, ढका हुआ; ऐश्वर्य:--जिसका असीम ऐश्वर्य; ईयते-- भूल से मान लियाजाता है; गुण-सर्गया--प्रकृति के गुणों की अन्योन्य क्रिया से |
परम नियन्ता भगवान् जो अच्युत तथा अजेय हैं जीवन के विभिन्न रूपों में यथा पौधे जैसेस्थावर जीवों से लेकर प्रथम जन्मे प्राणी ब्रह्मा तक में उपस्थित हैं।
वे अनेक प्रकार की भौतिकसृष्टियों में भी उपस्थित हैं तथा सारे भौतिक तत्त्वों, सम्पूर्ण भौतिक शक्ति एवं प्रकृति के तीनोंगुणों ( सतो, रजो तथा तमो गुण ) के साथ-साथ अव्यक्त प्रकृति एवं मिथ्या अंहकार में भीउपस्थित हैं।
एक होकर भी वे सर्वत्र उपस्थित रहते हैं।
वे समस्त कारणों के कारण दिव्यपरमात्मा भी हैं, जो सारे जीवों के अन्तस्तल में प्रेक्षक के रूप में उपस्थित हैं।
उन्हें व्याप्य तथासर्वव्यापक परमात्मा के रूप में इंगित किया गया है, लेकिन वास्तव में उनको इंगित नहीं कियाजा सकता।
वे अपरिवर्तित तथा अविभाज्य हैं।
वे परम सच्चिदानन्द के रूप में अनुभव कियेजाते हैं।
माया के आवरण से ढके होने के कारण नास्तिक को वे अविद्यमान प्रतीत होते हैं।
"
तस्मात्सवेंषु भूतेषु दयां कुरुत सौहदम् ।
भावमासुरमुन्मुच्य यया तुष्यत्यधोक्षज: ॥
२४॥
तस्मात्ू--अतएव; सर्वेषु--समस्त; भूतेषु--जीवों पर; दयाम्--दया; कुरुत--दिखालाओ; सौहदम्--मैत्री; भावम्-- भाव,प्रवृत्ति; आसुरम्--असुरों का ( जो मित्रों तथा शत्रुओं को पृथक् करते हैं ); उन्मुच्य--त्याग कर; यया--जिससे; तुष्यति--प्रसन्नहोता है; अधोक्षज:-- भगवान् जो इन्द्रियों की अनभूति के परे है।
अतएव हे असुरों से उत्पन्न मेरे प्यारे तरुण मित्रो, तुम सब ऐसा करो कि ऐसे भगवान्, जोभौतिक ज्ञान की धारणा से परे हैं, वे तुम पर प्रसन्न हों।
तुम अपनी आसुरी प्रकृति छोड़ दो औरशत्रुता या द्वैत रहित होकर कर्म करो।
सभी जीवों में भक्ति जगाकर उन पर दया प्रदर्शित करोऔर इस प्रकार उनके हितैषी बनो।
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तुष्टे च तत्र किमलभ्यमनन्त आद्येकि तैर्गुणव्यतिकरादिह ये स्वसिद्धा: ।
धर्मादय: किमगुणेन च काड्क्षितेनसारं जुषां चरणयोरूपगायतां नः ॥
२५॥
तुष्टे--तुष्ट होने पर; च-- भी; तत्र--वहाँ; किमू--क्या; अलभ्यम्--अप्राप्य; अनन्ते-- भगवान् में; आद्ये--समस्त वस्तुओं केअनादि स्रोत, समस्त कारणों के कारण; किमू--और क्या चाहिए; तैः --उनसे; गुण-व्यतिकरात्-- प्रकृति के गुणों की क्रिया;इह--इस संसार में; ये--जो; स्व-सिद्धा:--स्वयमेव प्राप्त; धर्म-आदय: -- भौतिक उन्नति के तीन सिद्धान्त ( अर्थात् धर्म, अर्थतथा काम ); किम्ू--क्या आवश्यकता; अगुणेन--परमेश्वर में मुक्ति के साथ; च--तथा; काड्क्षितेन-- वांछित; सारम्--सारेनिचोड़; जुषाम्--स्वाद लेते हुए; चरणयो:--भगवान् के दो चरणकमल; उपगायताम्-- भगवान् के गुणों का गान करने वाले;नः--हमारा
जिन भक्तों ने समस्त कारणों के कारण, समस्त वस्तुओं के आदि स्त्रोत भगवान् को प्रसन्नकर लिया है उनके लिए कुछ भी दुष्प्राप्प नहीं है।
भगवान् असीम आध्यात्मिक गुणों के आगारहैं।
अतएव उन भक्तों के लिए जो प्रकृति के गुणों से परे हैं उन्हें धर्म, अर्थ काम, मोक्ष केसिद्धान्तों का पालन करने से क्या लाभ, क्योंकि ये तो प्रकृत्ति के गुणों के प्रभावों के अन्तर्गतस्वतः प्राप्त हैं! हम भक्तगण सदैव भगवान् के चरणकमलों का यशोगान करते हैं अतएव हमेंधर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष की याचना नहीं करनी चाहिए।
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धर्मार्थकाम इति योउभिहितस्त्रिवर्गईक्षा त्रयी नयदमौ विविधा च वार्ता ।
मन्ये तदेतद्खिलं निगमस्य सत्यस्वात्मार्पणं स्वसुहृदः परमस्य पुंसः ॥
२६॥
धर्म--धर्म; अर्थ-- आर्थिक उन्नति; काम:--संयमित इन्द्रियतृप्ति; इति--इस प्रकार; यः--जो; अभिहित:--बताये गये; त्रि-वर्ग:--तीन का समूह; ईक्षा--आत्म-साक्षात्कार; त्रयी-- वैदिक अनुष्ठान; नय--तर्क; दमौ--तथा विधि एवं व्यवस्था कीविद्या; विविधा--अनेक प्रकार; च--भी; वार्ता--वृत्तिपरक कर्तव्य या जीविका; मन्ये--मैं मानता हूँ; तत्ू--उनको; एतत्--वे; अखिलम्--सारा; निगमस्य--वेदों का; सत्यम्--सत्य; स्व-आत्म-अर्पणम्--अपने को पूरी तरह अर्पित कर देना; स्व-सुहृदः--अपने परम मित्र को; परमस्य--परम; पुंस:--पुरुष |
धर्म, अर्थ तथा काम--इन तीनों को वेदों में त्रिवर्ग अर्थात् मोक्ष के तीन साधन कहा गयाहै।
इन तीन वर्गों के अन्तर्गत ही शिक्षा तथा आत्म-साक्षात्कार, वैदिक आदेशानुसार सम्पन्नकर्मकाण्ड, विधि तथा व्यवस्था विज्ञान एवं जीविका अर्जित करने के विविध साधन आते हैं।
येतो वेदों के अध्ययन के बाह्य विषय हैं अतएव मैं उन्हें भौतिक मानता हूँ।
किन्तु मैं भगवान् विष्णुके चरणकमलों में समर्पण को दिव्य मानता हूँ।
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ज्ञानं तदेतदमलं दुरवापमाहनारायणो नरसख: किल नारदाय ।
एकान्तिनां भगवतस्तदकिझ्जनानांपादारविन्दरजसाप्लुतदेहिनां स्थातू ॥
२७॥
ज्ञानमू--ज्ञान; ततू--वह; एतत्--यह; अमलम्--कल्मषरहित; दुरबापम्--समझ पाना कठिन ( भक्ति की कृपा के बिना );आह--बतलाया; नारायण: -- भगवान् नारायण ने; नर-सख: --सारे जीवों ( विशेषतया मनुष्यों ) के मित्र; किल--निश्चय ही;नारदाय--महर्षि नारद को; एकान्तिनाम्--उनका, जिन्होंने एकमात्र भगवान् की शरण ले रखी है; भगवत:-- भगवान् का;तत्--वह ( ज्ञान ); अकिद्जनानाम्--जिन्हें कोई भौतिक सम्पत्ति नहीं चाहिए; पाद-अरविन्द-- भगवान् के चरणकमलों की;रजसा--धूल से; आप्लुत--स्नात, नहाये हुए; देहिनामू--जिनके शरीर; स्यात्ू--सम्भव है।
समस्त जीवों के शुभचिन्तक एवं मित्र भगवान् नारायण ने यह दिव्य ज्ञान पहले परम सन्तनारद को दिया।
ऐसा ज्ञान नारद जैसे सन्त पुरुष की कृपा के बिना समझ पाना कठिन है, किन्तुजिसने भी नारद की परम्परा की शरण ले रखी है, वह इस गुह्य ज्ञान को समझ सकता है।
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श्रुतमेतन्मया पूर्व ज्ञानं विज्ञानसंयुतम् ।
धर्म भागवतं शुद्ध नारदाद्देवदर्शनात् ॥
२८ ॥
श्रुतम्--सुना गया; एतत्--यह; मया--मेरे द्वारा; पूर्वम्ू--इसके पहले; ज्ञानम्-गुद्य ज्ञान; विज्ञान-संयुतम्--अपने व्यावहारिकसम्प्रयोग से संयुक्त; धर्मम्--दिव्य धर्म; भागवतम्-- भगवान् से सम्बद्ध; शुद्धम्-शुद्ध, जिसे भौतिक कार्यो से कुछ लेना-देनानहीं है; नारदातू--महान् सन्त नारद से; देव--भगवान् का; दर्शनातू--जो सदैव दर्शन करने वाले |
प्रह्ाद महाराज ने आगे कहा : मैंने यह ज्ञान भक्ति में सदैव तलल्लीन रहने वाले परम सन्तनारद से प्राप्त किया है।
यह ज्ञान भागवत धर्म कहलाता है, जो अत्यन्त वैज्ञानिक है।
यह तर्कतथा दर्शन पर आधारित है और समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त है।
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श्रीदैत्यपुत्रा ऊचुःप्रह्माद त्वं वयं चापि नर्तेउन्यं विद्यहे गुरुम् ।
एताभ्यां गुरुपुत्रा भ्यां बालानामपि ही श्वरो ॥
२९॥
बालस्यथान्तःपुरस्थस्य महत्सड़ो दुरन््वयः ।
छिन्धि नः संशयं सौम्य स्याच्चेद्विस्रम्भकारणम् ॥
३०॥
श्री-दैत्य-पुत्रा: ऊचु:--दैत्य पुत्रों ने कहा; प्रह्माद--हे मित्र प्रह्माद; त्वम्--तुम; वयम्--हम सब; च--तथा; अपि-- भी; न--नहीं; ऋते--सिवाय; अन्यमू--अन्य; विद्यह--जानते हैं; गुरुम्--गुरु को; एताभ्यामू--इन दोनों; गुरु-पुत्राभ्यामू--शुक्राचार्यके पुत्रों से; बालानामू--बच्चों के; अपि--यद्यपि; हि--निस्सन्देह; ईश्वरौ--दो नियन्ता; बालस्थ--बच्चों का; अन्तःपुर-स्थस्य--घर या महल के भीतर रहते हुए; महत्-सड्भगः--नारद-जैसे महापुरुष की संगति; दुरन््वय:--अत्यन्त कठिन; छिन्धि--कृपया दूर करो; न:--हमारा; संशयम्--संशय, शंका; सौम्य--हे भद्ग; स्थात्--हो सके; चेत्--यदि; विस्त्रम्भ-कारणम्--तुम्हारे बचनों में श्रद्धा का कारण।
दैत्य पुत्रों ने उत्तर दिया: प्रहाद, न तुम और न ही हम शुक्राचार्य के पुत्र षण्ड तथा अमर्क केअतिरिक्त अन्य किसी अध्यापक या गुरु को जानते हैं।
अन्ततः हम बच्चे हैं और वे हमारेनियंत्रक हैं।
तुम जैसे सदैव महल के भीतर रहने वाले के लिए ऐसे महापुरुष की संगति करपाना अत्यन्त कठिन है।
हे परम भद्र मित्र, क्या तुम यह बतलाओगे कि तुम्हारे लिए नारद से सुनपाना कैसे सम्भव हो सका ?
इस सम्बन्ध में हमारी शंका को दूर करो।
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