← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 8 की सूची
अध्याय एक: मनु, ब्रह्मांड के प्रशासक
8.1श्रीराजोबाचस्वायम्भुवस्येह गुरो वंशोयं विस्तराच्छुत: ।यत्र विश्वसूजां सर्गो मनूनन्यान्वदस्व न: ॥ १॥
श्री-राजा उबाच--राजा ( महाराज परीक्षित ) ने कहा; स्वायम्भुवस्य--महापुरुष स्वायंभुव मनु का; इह--इस सम्बन्ध में;गुरो--हे गुरु; वंशः--वंश; अयम्--यह; विस्तरात्--विस्तार से; श्रुतः--मैंने ( आपसे ) सुना; यत्र--जिसमें; विश्व-सूजाम्--प्रजापति नामक महापुरुषों का, यथा मरीचि इत्यादि का; सर्ग:--सृष्टि, जिसमें मनु की पुत्रियों से अनेक पुत्र तथा पौत्र उत्पन्न हुए;मनूनू--मनुओं को; अन्यान्-- अन्य; वदस्व--कृपया वर्णन करें; नः--हम से |
राजा परीक्षित ने कहा : हे स्वामी! हे गुरु! अभी मैंने आपके मुख से स्वायंभुव मनु के वंशके विषय में भलीभाँति सुना |
किन्तु अन्य मनु भी तो हैं; अतएव मैं उनके वंशों के विषय मेंसुनना चाहता हूँ |
कृपा करके उनका वर्णन करें |
मन्वन्तरे हरेर्जन्म कर्माणि च महीयसः |
गृणन्ति कवयो ब्रह्मंस्तानि नो वद श्रृण्वताम् ॥
२॥
मन्वन्तरे--मन्वन्तरों के परिवर्तन के समय ( एक मनु से दूसरा मनु बनने का अन्तराल ); हरे: -- भगवान् का; जन्म--प्राकट्य;कर्माणि--तथा कर्म; च-- भी; महीयसः--अत्यन्त यशस्वी का; गृणन्ति--वर्णन करते हैं; कवयः--विद्वान पुरुष जिन्हें पूर्णबुद्धि है; ब्रह्मनू--हे विद्वान ब्राह्मण ( शुकदेव गोस्वामी ); तानि--उन सबों को; नः--हमसे; वद--कहिये; श्रृण्वताम्--सुननेके इच्छुक
हे विद्वान ब्राह्मण शुकदेव गोस्वामी! बड़े-बड़े विद्वान पुरुष, जो नितान्त बुद्धिमान् हैं,विभिन्न मन्वन्तरों में भगवान् के कार्यकलापों का तथा उनके प्राकट्य का वर्णन करते हैं |
हम इनवर्णनों को सुनने के लिए अत्यन्त उत्सुक हैं |
कृपया उनका वर्णन करें |
यद्यस्मिन्नन्तरे ब्रह्मन्भगवान्विश्वभावन: |
कृतवान्कुरुते कर्ता ह्मतीतेडनागतेडद्य वा ॥
३॥
यत्--जो भी कार्यकलाप; यस्मिन्ू--किसी विशेष युग में; अन्तरे--मन्वन्तर में; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; भगवान्-- भगवान्; विश्व-भावन:--इस दृश्य जगत को उत्पन्न करने वाला; कृतवान्--किया गया; कुरुते--कर रहा है; कर्ता--तथा करेगा; हि--निस्सन्देह; अतीते-- भूतकाल में; अनागते-- भविष्य में; अद्य--वर्तमान में; बा--अथवा
हे विद्वान ब्राह्मण! कृपा करके इस दृश्य जगत को उत्पन्न करने वाले भगवान् के उन सारेकार्यकलापों का वर्णन हमसे करें जिन्हें उन्होंने विगत मन्वन्तरों में सम्पन्न किया, जो वे वर्तमानमें सम्पन्न कर रहे हैं तथा जो वे भावी मन्वन्तरों में सम्पन्न करेंगे |
मनवोउस्मिन्व्यतीता: षघट्कल्पे स्वायम्भुवादयः |
आहास्ते कथितो यत्र देवादीनां च सम्भव: ॥
४॥
श्री-ऋषि: उबाच--महान् ऋषि शुकदेव गोस्वामी ने कहा; मनवः--मनु; अस्मिन्--इस अवधि ( ब्रह्मा के एक दिन ) में;व्यतीता:--बीता हुआ; षघट्ू--छः:; कल्पे--ब्रह्मा के एक दिन में; स्वायम्भुव--स्वायंभुव मनु; आदय: --इत्यादि; आद्य:--प्रथम( स्वायंभुव ); ते--तुमसे; कथित: --पहले कहा जा चुका; यत्र--जिसमें; देव-आदीनाम्--समस्त देवताओं का; च--भी;सम्भव:ः--प्राकट्यू, जन्म |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : वर्तमान कल्प में छह मनु हो चुके हैं |
मैं तुमसे स्वायंभुव मनुतथा अनेक देवताओं के प्राकट्य के विषय में वर्णन कर चुका हूँ |
ब्रह्म के इस कल्प मेंस्वायंभुव प्रथम मनु हैं |
आकूृत्ां देवहूत्यां च दुह्ित्रोस्तस्य वै मनोः |
धर्मज्ञानोपदेशार्थ भगवान्पुत्रतां गत: ॥
५॥
आकृत्यामू--आकृति के गर्भ से; देवहूत्याम् च--तथा देवहूति के गर्भ से; दुहित्रो:--दोनों पुत्रियों के; तस्थ--उसकी; बै--निस्सन्देह; मनो:--स्वायंभुव मनु की; धर्म--धर्म; ज्ञान--तथा ज्ञान; उपदेश-अर्थम्--उपदेश देने के लिए; भगवान्--भगवान्ने; पुत्रतामू--आकूति तथा देवहूति का पुत्रत्व; गतः--स्वीकार किया |
स्वायंभुव मनु के दो पुत्रियाँ थीं--आकूति तथा देवहूति |
उनके गर्भ से भगवान् दो पुत्रों केरूप में प्रकट हुए जिनके नाम क्रमश: यज्ञमूर्ति तथा कपिल थे |
इन पुत्रों को धर्म तथा ज्ञान काउपदेश देने का कार्यभार सौंपा गया |
कृतं पुरा भगवतः कपिलस्यथानुवर्णितम् |
आख्यास्ये भगवान्यज्ञो यच्चकार कुरूद्रह ॥
६॥
कृतम्ू--पहले ही किया गया; पुरा--पहले; भगवत:-- भगवान्; कपिलस्य--देवहूति के पुत्र कपिल का; अनुवर्णितम्--पूर्णतया वर्णन हो चुका है; आख्यास्ये--अब मैं वर्णन करूँगा; भगवान्ू-- भगवान्; यज्ञ:--यज्ञपति या यज्ञमूर्ति का; यत्--जो;चकार--सम्पन्न किया; कुरु-उद्दद-हे कुरु श्रेष्ठ |
हे कुरुश्रेष्ठ! मैं पहले ही ( तृतीय स्कन्ध में ) देवहूति के पुत्र कपिल के कार्यकलापों कावर्णन कर चुका हूँ |
अब मैं आकृति के पुत्र यज्ञपति के कार्यकलापों का वर्णन करूँगा |
विरक्त: कामभोगेषु शतरूपापतिः प्रभु: |
विसृज्य राज्यं तपसे सभारयों वनमाविशत् ॥
७॥
विरक्त:--अनासक्त; काम-भोगेषु--इन्द्रियतृप्ति में ( गृहस्थ जीवन में ); शतरूपा-पतिः--शतरूपा के पति, स्वायंभुव मनु;प्रभु:--जो विश्व के स्वामी या राजा थे; विसृज्य--पूर्णतः त्यागकर; राज्यम्ू-- अपने राज्य को; तपसे--तपस्या करने के लिए;स-भार्य:--अपनी पतली सहित; वनम्--जंगल में; आविशत्ू--प्रवेश किया
शतरूपा के पति स्वायंभुव मनु स्वभाव से इन्द्रियभोग के प्रति तनिक भी आसक्त नहीं थे |
अतएबव उन्होंने अपने विलासमय राज्य को त्याग दिया और अपनी पत्नी सहित तपस्या करने केलिए जंगल में चले गये |
सुनन्दायां वर्षशतं पदैकेन भुव॑ं स्पृशन् |
तप्यमानस्तपो घोरमिदमन्वाह भारत ॥
८॥
सुनन्दायाम्--सुनन्दा नदी के तट पर; वर्ष-शतम्--एक सौ वर्षो तक; पद-एकेन--एक पाँव पर; भुवम्--पृथ्वी को; स्पृशन्--छुऐ हुए; तप्यमान: --तपस्या की; तप:ः--तपस्या; घोरम्--अत्यन्त कठिन; इदम्--निम्नलिखित, यह; अन्वाह--कहा; भारत--हे भरतवंशी हे भरतवंशी ! स्वायंभुव मनु अपनी पत्नी समेत जंगल में प्रविष्ट होने के बाद सुनन्दा नदी केतट पर एक पाँव पर खड़े रहे |
इस प्रकार केवल एक पाँव से पृथ्वी का स्पर्श करते हुए उन्होंनेएक सौ वर्षो तक महान् तपस्या की |
तपस्या करते समय वे इस प्रकार बोले |
श्रीमनुरुवाचयेन चेतयते विश्व॑ं विश्व चेतयते न यम् |
यो जागर्ति शयानेउस्मिन्नायं तं वेद वेद सः ॥
९॥
श्री-मनु; उवाच--स्वायंभुव मनु ने उच्चारण किया; येन--जिससे ( भगवान् से ); चेतयते--चेतन हो जाता है; विश्वम्--साराब्रह्माण्ड; विश्वम्--सारा ब्रह्माण्ड ( भौतिक जगत ); चेतयते--चेतन होता है; न--नहीं; यम्--जिसको; य:ः--वह जो;जागर्ति--सदैव जागता रहता है ( सारे कार्यकलापों का साक्षी बना हुआ ); शयाने--सोते समय; अस्मिनू--इस शरीर में; न--नहीं; अयम्--यह जीव; तम्ू--उसको; वेद--जानता है; वेद--जानता है; सः--वह |
श्री-मनु ने कहा : परम पुरुष ने इस चेतन भौतिक जगत की सृष्टि की है; ऐसा नहीं है किइस भौतिक जगत से उसकी उत्पत्ति हुई हो |
जब सब कुछ मौन रहता है, तो परम पुरुष साक्षीरूप में जगा रहता है |
जीव उसे नहीं जानता, किन्तु वह सब कुछ जानता है |
आत्मावास्यमिदं विश्व यत्किल्विज्जगत्यां जगत् |
तेन त्यक्तेन भुझ्जलीथा मा गृध: कस्य स्विद्धनम् ॥
१०॥
आत्म--परमात्मा; आवास्यम्--सर्वत्र रहते हुए; इदम्--यह ब्रह्माण्ड; विश्वम्--सारे ब्रह्माण्ड, सारे स्थान; यत्--जो भी;किझ्जित्- प्रत्येक विद्यमान वस्तु; जगत्यामू--संसार में, सर्वत्र; जगत्--हर वस्तु, चर तथा अचर; तेन--उसके द्वारा; त्यक्तेन--नियत; भुझ्लीथा:-- भोग कर सकते हो; मा--मत; गृध:--स्वीकार करो; कस्य स्वित्ू--किसी अन्य का; धनम्-- धन
इस ब्रह्माण्ड में भगवान् परमात्मा रूप में सर्वत्र, जहाँ कहीं भी चर तथा अच्र प्राणी हैं,विद्यमान हैं |
अतएव मनुष्य उतना ही स्वीकार करे जितना उसके लिए नियत है; उसे पराये धन मेंहस्तक्षेप करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए |
यं पश्यति न पश्यन्तं चक्षुर्यस्य न रिष्यति |
त॑ भूतनिलयं देवं सुपर्णमुपधावत ॥
११॥
यम्--जिसको; पश्यति--जीव देखता है; न--नहीं; पश्यन्तम्--सदैव देखते हुए; चक्षुः--आँख; यस्य--जिसकी; न--कभीनहीं; रिष्यति--कम होती है; तम्--उसको; भूत-निलयम्--सारे जीवों का मूल स्त्रोत; देवम्--भगवान् को; सुपर्णम्--जो मित्रके रूप में जीव के साथ-साथ रहता है; उपधावत--हर एक को पूजना चाहिए
यद्यपि भगवान् विश्व के कार्यकलापों को निरन्तर देखते रहते हैं, किन्तु उन्हें कोई नहीं देखपाता |
फिर भी किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि चूँकि उन्हें कोई नहीं देखता अतएवं वे भीउसे नहीं देखते |
स्मरण रहे कि उनकी देखने की शक्ति में कभी हास नहीं आता अतएव प्रत्येकव्यक्ति को चाहिए कि उन परमात्मा की पूजा करे जो प्रत्येक जीव के साथ मित्र रूप में सदैवरहते हैं |
न यस्याद्यन्तौ मध्यं च स्व: परो नान्तरं बहिः |
विश्वस्थामूनि यद्यस्माद्विश्व॑ं च तहतं महत् ॥
१२॥
न--न तो; यस्य--जिसका ( भगवान् का ); आदि--प्रारम्भ; अन्तौ-- अन्त; मध्यमू--मध्य; च-- भी; स्व:--अपना; पर: --पराया; न--न तो; अन्तरम्-- भीतर; बहि:--बाहर; विश्वस्थ--सम्पूर्ण विश्व का; अमूनि--ऐसा विचार; यत्--जिसका रूप;यस्मात्--उससे, जो हर वस्तु का कारण है; विश्वम्--समग्र ब्रह्माण्ड; च--तथा; तत्--वे सब; ऋतम्--सत्य; महत्--अत्यन्तमहान् |
भगवान् का न तो आदि है, न अन्त और न मध्य |
न ही वे किसी व्यक्ति विशेष या राष्ट्र केहैं |
उनका न भीतर है न बाहर |
इस जगत में दिखने वाले सारे द्वन्द्द--यथा आदि तथा अन्त, मेराऔर उनका--उस परम पुरुष के व्यक्तित्व में अनुपस्थित हैं |
यह ब्रह्माण्ड जो उनसे उदभूत होताहै उनका एक दूसरा स्वरूप है |
अतएवं भगवान् परम सत्य हैं और उनकी महानता पूर्ण है |
स विश्वकाय: पुरुहूतईशःसत्य: स्वयंज्योतिरज: पुराण: |
धत्तेडस्य जन्माद्यजयात्मशक्त्या तां विद्ययोदस्य निरीह आस्ते ॥
१३॥
सः--भगवान्; विश्व-काय:--ब्रह्माण्ड का समग्र रूप ( समग्र ब्रह्माण्ड भगवान् का बाह्म शरीर है ); पुरु-हृतः-- अनेक नामों सेज्ञेय; ईश:ः--परम नियन्ता; सत्य:--परम सत्य; स्वयम्--साक्षात्; ज्योति:--स्वतः तेजवान्; अज:--अजन्मा, अनादि;पुराण:--सबसे प्राचीन; धत्ते--सम्पन्न करता है; अस्य--इस ब्रह्माण्ड का; जन्म-आदि--सृष्टि, पालन तथा संहार; अजया--अपनी बहिरंगा शक्ति से; आत्म-शकत्या--अपनी निजी शक्ति से; ताम्ू--उस बहिरंगा शक्ति को; विद्यया--अपनी आध्यात्मिकशक्ति से; उदस्य--त्यागकर; निरीह:--निष्काम या निष्क्रिय; आस्ते--रह रहा है ( भौतिक शक्ति का स्पर्श किये बिना) |
यह समग्र विश्व परम सत्य भगवान् का शरीर है जिनके लाखों नाम हैं और अनन्त शक्तियाँहैं |
वे आत्मतेजस्वी, अजन्मा तथा परिवर्तनहीन हैं |
वे प्रत्येक वस्तु के आदि हैं, किन्तु स्वयंउनका कोई आदि नहीं है |
चूँकि उन्होंने अपनी बहिरंगा शक्ति से इस विराट रूप की सृष्टि की हैअतएव यह उनके द्वारा उत्पन्न, पालित तथा ध्वंसित प्रतीत होता है |
फिर भी वे अपनीआध्यात्मिक शक्ति में निष्क्रिय रहते हैं और भौतिक शक्ति के कार्यकलाप उनका स्पर्श तक नहींकर पाते |
अथाग्रे ऋषय: कर्माणीहन्तेडकर्महेतवे |
ईहमानो हि पुरुष: प्रायोउनीहां प्रपद्यते ॥
१४॥
अथ--अतएव; अग्रे-- प्रारम्भ में; ऋषय:--सारे विद्वान ऋषियों या सन्त पुरुषों ने; कर्माणि--सकाम कर्म; ईहन्ते--करते हैं;अकर्म--कर्मफल से मुक्ति; हेतबे--के लिए; ईहमान:--ऐसे कार्यो में लगे रहकर; हि--निस्सन्देह; पुरुष:--पुरुष; प्रायः --सदा ही; अनीहाम्--कर्म से मुक्ति; प्रपद्यते--प्राप्त करता है
अतएव लोगों को कर्मों की ऐसी अवस्था तक पहुँचने में समर्थ बनाने के लिए जो सकामफलों से दूषित नहीं होते, बड़े-बड़े साधु पुरुष सर्वप्रथम लोगों को सकाम कर्म में लगाते हैंक्योंकि जब तक कोई शास्त्रानुमोदित कर्मों को सम्पन्न करना आरम्भ नहीं करता तब तक वहमुक्ति की अवस्था को या कर्मफल न उत्पन्न करने वाले कार्यो की अवस्था को प्राप्त नहीं होता |
ईहते भगवानीशो न हि तत्र विसज्ते |
आत्मलाभेन पूर्णार्थो नावसीदन्ति येडनु तम् ॥
१५॥
ईहते--सृजन, पालन तथा संहार के कार्यों में लगता है; भगवानू-- भगवान् कृष्ण; ईश: --परम नियन्ता; न--नहीं; हि--निस्सन्देह; तत्र--ऐसे कार्यों में; विसजजते--फँस जाता है; आत्म-लाभेन-- अपने लाभ के कारण; पूर्ण-अर्थ:--आत्मतुष्ट; न--नहीं; अवसीदन्ति--निराश होते हैं; ये--जो लोग; अनु--अनुसरण करते हैं; तम्-- भगवान् को |
भगवान् अपने ही लाभ से एऐश्वर्यपूर्ण हैं, फिर भी वे संसार के स्त्रष्टा, पालक तथा संहर्ता केरूप में कार्य करते हैं |
इस प्रकार से कर्म करने पर भी वे कभी बन्धन में नहीं पड़ते |
अतएव जो भक्तगण उनके चरण-चिलह्नों का अनुगमन करते हैं, वे भी कभी बन्धन में नहीं पड़ते |
तमीहमानं निरहड्ड तं बुधनिराशिषं पूर्णमनन्यचोदितम् |
नृज्शिक्षयन्तं निजवर्त्मसंस्थितंप्रभुं प्रपेउखिलधर्मभावनम् ॥
१६॥
तम्--उसी भगवान् को; ईहमानम्ू--हमारे लाभ के लिए कर्म करने वाले; निरहड्डू तम्ू--जो बन्धन अथवा लाभ की इच्छा सेरहित है; बुधम्--ज्ञानवान् को; निराशिषम्--अपने कर्मफल को भोगने की इच्छा न रखने वाले को; पूर्णम्--जो पूर्ण है अतएबजिसे इच्छा पूर्ति की आवश्यकता नहीं है; अनन्य--अन्यों के द्वारा; चोदितम्-- प्रेरित, प्रोत्साहित; नून्ू--सारा मानव समाज;शिक्षयन्तम्--शिक्षा देने के लिए ( जीव के असली पथ की ); निज-वर्त्म--अपनी निजी जीवन शैली; संस्थितम्-- प्रतिष्ठितकरने के लिए ( विचलित हुए बिना ); प्रभुम्-- भगवान् से; प्रपद्ये --प्रार्थना करता हूँ; अखिल-धर्म-भावनम्--जो मनुष्यों केसमस्त धार्मिक सिद्धान्तों अथवा वृत्तिपरक कर्मों के स्वामी हैं |
भगवान् कृष्ण एक सामान्य व्यक्ति की भाँति कर्म करते हैं, फिर भी वे कर्मफल भोगने कीइच्छा नहीं रखते |
वे ज्ञान से पूर्ण, भौतिक इच्छाओं तथा विक्षेपों से मुक्त एवं पूर्णतः स्वतंत्र हैं |
वे मानव समाज के परम शिक्षक के रूप में अपनी ही कर्मशैली का उपदेश देते हैं और इसप्रकार धर्म के असली मार्ग का उद्धाटन करते हैं |
मैं हर व्यक्ति से प्रार्थना करता हूँ कि वह उनकाअनुसरण करे |
श्रीशुक उवाचइति मन्त्रोपनिषदं व्याहरन्तं समाहितम् |
इृष्ठासुरा यातुधाना जग्धुमभ्यद्रवन्क्षुधा ॥
१७॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; मन्त्र-उपनिषदम्--वैदिक मंत्र ( स्वायंभुव मनु द्वाराउच्चारित ); व्याहरन्तम्-सिखाये गये या उच्चारित; समाहितम्--मन को केन्द्रित किया ( भौतिक अवस्थाओं से विश्लुब्ध हुएबिना ); दृष्टा--देखकर; असुरा:-- असुरगण; यातुधाना:--राक्षसगण ; जग्धुमू--निगल जाना चाहा; अभ्यद्रवन्--तेजी से दौतेहुए; क्षुधा--अपनी भूख को शान्त करने के लिए
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस प्रकार स्वायंभुव मनु उपनिषदों के मंत्रों की जयध्वनिकरते हुए समाधिस्थ हो गये |
उन्हें देखकर राक्षसों तथा असुरगण ने अत्यन्त भूखे होने के कारणउन्हें निगल जाना चाहा |
अतएव वे उनके पीछे द्रुतगति से दौने लगे |
तांस्तथावसितान्वीक्ष्य यज्ञ: सर्वगतो हरि: |
यामै: परिवृतो देवैईत्वाशासत्त्रिविष्टपम् ॥
१८ ॥
तान्ू--असुरों तथा राक्षसों को; तथा--इस प्रकार; अवसितान्--जो स्वायंभुव मनु को निगलने के लिए कृतसंकल्प थे;वीक्ष्य--देखकर; यज्ञ:-- भगवान् विष्णु, जो यज्ञ कहलाते हैं; सर्व-गत:--हर एक के हृदय में स्थित; हरिः-- भगवान्; यामै:--याम नामक अपने पुत्रों के साथ; परिवृत:--घिरा हुआ; देवैः--देवताओं से; हत्वा--( असुरों को ) मारकर; अशासतू--( इन्द्रपदग्रहण करके ) शासन चलाया; त्रि-विष्टपम्--स्वर्ग-लोकों का |
प्रत्येक हृदय में वास करने वाले भगवान् विष्णु यज्ञपति के रूप में प्रकट हुए और उन्होंनेदेखा कि राक्षस तथा असुर स्वायंभुव मनु को निगल जाने वाले हैं |
इस प्रकार याम नामक अपनेपुत्रों तथा अन्य सभी देवताओं को साथ लेकर भगवान् ने उन असुरों तथा राक्षसों को मार डाला |
तब उन्होंने इन्द्र का पद ग्रहण किया और स्वर्ग लोक पर शासन करने लगे |
स्वारोचिषो द्वितीयस्तु मनुरग्ने: सुतोभवत् |
झुमत्सुषेणरोक्रिष्मत्प्रमुखास्तस्य चात्मजा: ॥
१९॥
स्वारोचिष:--स्वारोचिष; द्वितीय:--दूसरा; तु--निस्सन्देह; मनु;--मनु; अग्ने:--अग्नि का; सुत:ः--पुत्र; अभवत्--बना;झुमत्--छुमत; सुषेण--सुषेण; रोचिष्मत्--रोचिष्मत्; प्रमुखाः --इत्यादि; तस्थ--उसके ( स्वारोचिष के ); च--भी; आत्म-जा:-पुत्रअग्नि का पुत्र स्वारोचिष दूसरा मनु बना |
उसके अनेक पुत्रों में द्युमत्, सुषेण तथा रोचिष्मत्प्रमुख थे |
तत्रेन्द्रो रोचनस्त्वासीद्देवाश्व तुषितादय: |
ऊर्जस्तम्भादयः सप्त ऋषयो ब्रह्मगादिन: ॥
२०॥
तत्र--इस मन्वन्तर में; इन्द्र: --इन्द्र; रोचन:--रोचन, यज्ञ का पुत्र; तु--लेकिन; आसीत्--हुआ; देवा:--देवता; च-- भी;तुषित-आदय: --तुषित तथा अन्य; ऊर्ज--ऊर्ज; स्तम्भ--स्तम्भ; आदय: --तथा अन्य; सप्त--सात; ऋषय: --ऋषिगण; ब्रह्म-वादिन:--सभी निष्ठावान् भक्तस्वारोचिष के शासनकाल में इन्द्र का पद यज्ञपुत्र रोचन ने ग्रहण किया |
तुषित तथा अन्य लोग प्रधान देवता बने और ऊर्ज, स्तम्भ इत्यादि सप्तर्षि हुए |
ये सभी भगवान् के निष्ठावान् भक्तथे |
ऋषेस्तु वेदशिरसस्तुषिता नाम पत्यभूत् |
तस्यां जज्ञे ततो देवो विभुरित्यभिविश्रुतः ॥
२१॥
ऋषे:--ऋषि का; तु--निस्सन्देह; वेदशिरसः --वेदशिरा; तुषिता--तुषिता; नाम--नामक; पत्ली-- पतली ने; अभूत्--उत्पन्नकिया; तस्याम्--अपने ( गर्भ ) से; जज्ञे--जन्म लिया; ततः--तत्पश्चात्; देव:--भगवान्; विभुः--विभु; इति--इस प्रकार;अभिविश्रुत:--विख्यात |
वेदशिरा अत्यन्त विख्यात ऋषि थे |
उनकी पत्नी तुषिता के गर्भ से विभु नामक अवतार नेजन्म लिया |
अष्टाशीतिसहस्त्राणि मुनयो ये धृतब्रता: |
अन्वशिक्षन्त्रतं तस्थ कौमारब्रह्मचारिण: ॥
२२॥
अष्टाशीति--अट्टासी; सहस्त्राणि -- हजार; मुनय:--साधु पुरुष; ये--वे जो; धृत-ब्रता:--ब्रतधारी; अन्वशिक्षन्--शिक्षाएँ ग्रहणकी; ब्रतम्-ब्रत; तस्य--उसका ( विभु का ); कौमार--अविवाहित; ब्रह्मचारिण:--तथा ब्रह्मचारी अवस्था में रहने वाला |
विभु ब्रह्मचारी बने रहे और जीवन पर्यन्त अविवाहित रहे |
उनसे अट्टासी हजार अन्य मुनियोंने आत्मनिग्रह, तपस्या तथा अन्य आचार सम्बन्धी शिक्षाएँ ग्रहण कीं |
तृतीय उत्तमो नाम प्रियब्रतसुतो मनु: |
'पवनः सृज्जयो यज्ञहोत्राद्यास्तत्सुता नृप ॥
२३॥
तृतीयः--तीसरा; उत्तम: --उत्तम; नाम--नामक; प्रियत्रत--राजा प्रियत्रत का; सुत:--पुत्र; मनु;:--मनु बना; पवन:--पवन;सृज्ञय:--सूझ्ञय; यज्ञहोत्र-आद्या: --यज्ञहोत्र इत्यादि; ततू-सुता:ः--उत्तम के पुत्र; नृप--हे राजाहे राजा! तीसरा मनु राजा प्रियव्रत का पुत्र उत्तम था |
इस मनु के पुत्रों में पवन, सृझय तथायज्ञहोत्र मुख्य थे |
वसिष्ठतनया: सप्त ऋषय: प्रमदादय: |
सत्या वेदश्रुता भद्गा देवा इन्द्रस्तु सत्यजित् ॥
२४॥
वसिष्ठ-तनया:--वशिष्ठ के पुत्र; सप्त--सात; ऋषय:--ऋषिगण; प्रमद-आदय: --प्रमद इत्यादि; सत्या: --सत्यगण;वेदश्रुता:--वेदश्रुतगण; भद्रा:-- भद्गगण; देवा: --देवतागण; इन्द्र:--स्वर्ग का राजा; तु--लेकिन; सत्यजित्--सत्यजित् |
तीसरे मनु के शासनकाल में वसिष्ठ के प्रमद तथा अन्य पुत्र सप्तर्षि बने |
सत्यगण,वेदश्रुततण तथा भद्गगण देवता बने और सत्यजित् को स्वर्ग का राजा इन्द्र चुना गया |
धर्मस्य सूनृतायां तु भगवान्पुरुषोत्तम: |
सत्यसेन इति ख्यातो जातः सत्यव्रति: सह ॥
२५॥
धर्मस्य--धर्म के देवता की; सूनृतायाम्--सूनृता नामक पतली के गर्भ में; तु--निस्सन्देह; भगवान्-- भगवान्; पुरुष-उत्तम: --परमेश्वर; सत्यसेन:--सत्यसेन; इति--इस प्रकार; ख्यात:--विख्यात; जात:--जन्म लिया; सत्यक्रतैः --सत्यव्रतों के; सह--साथइस मन्वन्तर में भगवान् धर्म की पत्नी सूनृता के गर्भ से प्रकट हुए और सत्यसेन नाम सेविख्यात हुए |
वे सत्यव्रत नामक अन्य देवताओं के साथ प्रकट हुए |
सो<नृतब्रतदुःशीलानसतो यक्षराक्षसान् |
भूतद्रहो भूतगणांश्रावधीत्सत्यजित्सख: ॥
२६॥
सः--वह ( सत्यसेन ); अनृत-ब्रत--झूठ बोलने का ब्रत लेने वाला; दुःशीलान्--दुराचारी; असतः--दुष्ट; यक्ष-राक्षसान्ू--यक्षोंतथा राक्षसों को; भूत-द्रुहः--अन्य जीवों की उन्नति का सदैव विरोध करने वाले; भूत-गणान्-- भूत प्रेतों का; च-- भी;अवधीत्--वध कर दिया; सत्यजित् -सख: --अपने मित्र सत्यजित सहित
सत्यसेन ने अपने मित्र सत्यजित् सहित जो उस काल के स्वर्ग के राजा इन्द्र थे समस्त झूठे,अपवित्र तथा दुराचारी यक्षों, राक्षसों तथा भूतप्रेतों का वध कर दिया क्योंकि वे सारे जीवों कोकष्ट पहुँचाते थे |
चतुर्थ उत्तमभ्राता मनुर्नाम्ना च तामस: |
पृथु: ख्यातिर्नरः केतुरित्याद्या दशा तत्सुता: ॥
२७॥
चतुर्थ--चौथा मनु; उत्तम-भ्राता--उत्तम का भाई; मनु:--मनु बना; नाम्ना--नाम से विख्यात; च--भी; तामस:--तामस;पृथु;--पृथु; ख्यातिः:--ख्याति; नर: --नर; केतु:--केतु; इति--इस प्रकार; आद्या: --इत्यादि; दश--दस; तत्-सुता: --तामसमनु के पुत्र |
तीसरे मनु उत्तम का भाई जो तामस नाम से विख्यात था चौथा मनु बना |
तामस के दस पुत्रथे जिनमें पृथु, ख्याति, नर तथा केतु प्रमुख थे |
सत्यका हरयो वीरा देवास्त्रेशिख ईश्वर: |
ज्योतिर्धामादय: सप्त ऋषयस्तामसेउन्तरे ॥
२८॥
सत्यका:--सत्यकगण; हरय:--हरिगण; वीरा:--वीरगण; देवा:--देवगण; त्रिशिख:--त्रिशिख; ईश्वर: --स्वर्ग का राजा;ज्योतिर्धाम-आदय: --ज्योतिर्धाम इत्यादि; सप्त--सात; ऋषय:--ऋषिगण; तामसे--तामस मनु के राज्यकाल; अन्तरे-में |
तामस मनु के शासन में सत्यकगण, हरिगण तथा वीरगण देवताओं में से थे |
स्वर्ग का राजाइन्द्र त्रशिख था |
सप्तर्षि-धाम के ऋषियों में ज्योतिर्धाम प्रमुख था |
देवा वैधृतयो नाम विधृतेस्तनया नूप |
नष्टा: कालेन यैर्वेंदा विधृता: स्वेन तेजसा ॥
२९॥
देवा:--देवतागण; वैधृतय: --वैधृतिगण; नाम--नामक; विधृतेः--विधृति के; तनया:--पुत्र; नृप--हे राजा; नष्टा:--नष्ट होगये थे; कालेन--समय के प्रभाव से; यैः--जिससे; बेदा:--वेद; विधृता:--सुरक्षित थे; स्वेन--अपने; तेजसा--बल से |
हे राजा! तामस मन्वन्तर में विधृति के पुत्र भी जो वैधृति कहलाते थे, देवता बने |
चूँकिकालक्रम से वैदिक स्वत्व विनष्ट हो गया था, अतएव इन देवताओं ने अपने बल से वैदिक स्वत्वकी रक्षा की |
तत्रापि जज्ञे भगवान्हरिण्यां हरिमेधसः |
हरिरित्याहतो येन गजेन्द्रो मोचितो ग्रहात् ॥
३०॥
तत्रापि--उस काल में; जज्ञे--प्रकट हुआ; भगवान्-- भगवान्; हरिण्याम्--हरिणी के गर्भ में; हरिमेधस:--हरिमेधा से उत्पन्न;हरिः--हरि; इति--इस प्रकार; आहत:--कहलाया; येन--जिसके द्वारा; गज-इन्द्र:--हाथियों का राजा; मोचित: --छुड़ायागया था; ग्रहातू-घड़ियाल के मुख से |
इस मन्वन्तर में भगवान् विष्णु ने भी हरिमेधा की पत्नी हरिणी के गर्भ से जन्म लिया और वेहरि कहलाये |
हरि ने हाथियों के राजा एवं अपने भक्त गजेन्द्र को घड़ियाल के मुख से छुड़ाया |
श्रीराजोबाचबादरायण एतत्ते श्रोतुमिच्छामहे वयम् |
हरिर्यथा गजपतिं ग्राहग्रस्तममूमुचत् ॥
३१॥
श्री-राजा उबाच--राजा परीक्षित ने कहा; बादरायणे--हे बादरायण ( व्यासदेव ) के पुत्र; एतत्--यह; ते--तुमसे; श्रोतुम्इच्छामहे--सुनने की इच्छा करते हैं; वयम्--हम; हरिः--भगवान् हरि:; यथा--जिस तरह से; गज-पतिम्--हाथियों के राजाको; ग्राह-ग्रस्तम्-घड़ियाल द्वारा आक्रमण किये जाने पर; अमूमुचत्--छुड़ाया, उद्धार किया |
राजा परीक्षित ने कहा : हे बादरायणि प्रभु! हम आपसे विस्तार से यह सुनना चाहते हैं किघड़ियाल द्वारा आक्रमण किये जाने पर हाथियों के राजा ( गजेन्द्र ) को हरि ने किस प्रकारछुड़ाया ? तत्कथासु महत्पुण्यं धन्य॑ स्वस्त्ययनं शुभम् |
यत्र यत्रोत्तमशलोको भगवान्गीयते हरि: ॥
३२॥
ततू-कथासु--उन कथाओं में; महत्--महान्; पुण्यम्--पवित्र; धन्यम्-- धन्य; स्वस्त्ययनम्--कल्याण प्रद; शुभम्--शुभ;यत्र--जब भी; यत्र--जहाँ भी; उत्तमश्लोक:--उत्तमश्लोक नाम से प्रसिद्ध; भगवान्-- भगवान्; गीयते--गायन किया जाताहै; हरिः-- भगवान्
कोई भी साहित्य या कथा जिसमें भगवान् उत्तमएलोक का वर्णन और उनकी महिमा कागायन किया जाता है, वह निश्चय ही महान, शुद्ध, धन्य, कल्याणप्रद तथा उत्तम है |
श्रीसूत उवाचपरीक्षितैवं स तु बादरायणिःश़ प्रायोपविष्टेन कथासु चोदित: |
उबाच विप्रा: प्रतिनन्द्य पार्थिवंमुदा मुनीनां सदसि सम श्रुण्वताम् ॥
३३॥
श्री-सूतः उवाच-- श्री सूत गोस्वामी ने कहा; परीक्षिता--महाराज परीक्षित के द्वारा; एवम्--इस प्रकार; सः--वह; तु--निस्सन्देह; बादरायणि:--शुकदेव गोस्वामी; प्राय-उपविष्टेन-- आसन्न मृत्यु की प्रतीक्षा करने वाले परीक्षितमहाराज ने;कथासु--शब्दों से; चोदितः--प्रोत्साहित होकर; उबाच--कहा; विप्रा:--हे बाह्मणो; प्रतिनन्द्य--बधाई देकर; पार्थिवम्--महाराज परीक्षित को; मुदा--अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक; मुनीनाम्ू--मुनियों की; सदसि--सभा में; स्म--निस्सन्देह; श्रृण्वताम्--सुनने के इच्छुक |
श्री सूत गोस्वामी ने कहा : हे बाह्मणो! जब आसतन्न मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे परीक्षितमहाराज ने शुकदेव गोस्वामी से ऐसा बोलने के लिए प्रार्थना की तो मुनि ने राजा के शब्दों सेप्रोत्साहित होकर, राजा का अभिनन्दन किया और वे सुनने के इच्छुक मुनियों की सभा मेंअत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक बोले |
