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अध्याय दो: हाथी गजेंद्र का संकट

8.2श्रीशुक उबाचआसीदिगरिवरो राजंस्त्रिकूट इति विश्रुतः |

क्षीरोदेनावृतः श्रीमान्योजनायुतमुच्छित: ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; आसीत्‌-- था; गिरिवर: --विशाल पर्वत; राजनू--हे राजा; त्रि-कूट: --त्रिकूट; इति--इस प्रकार; विश्रुत:--विख्यात; क्षीर-उदेन-- क्षीरसागर द्वारा; आवृत:--घिरा हुआ; श्रीमान्‌--अत्यन्त सुन्दर;योजन--आठ मील की नाप; अयुतम्‌--दस हजार; उच्छित:--अत्यन्त उच्च |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन्‌! त्रिकूट नाम का एक विशाल पर्वत है |

यह दस हजारयोजन ( ८० हजार मील ) ऊँचा है |

चारों ओर से क्षीरसागर द्वारा घिरि होने के कारण इसकीस्थिति अत्यन्त रमणीक है |

तावता विस्तृतः पर्यक्त्रिभि: श्रृद़ैः पयोनिधिम्‌ |

दिशः खं रोचयतन्नास्ते रौष्पयायसहिरण्मयै: ॥

२॥

अन्यैश्व ककुभ: सर्वा रलधातुविचित्रितै: |

नानाद्ुमलतागुल्मैर्निधंषिर्निझराम्भसाम्‌ ॥

३॥

तावता--उस प्रकार से; विस्तृत:--लम्बाई तथा चौड़ाई ( ८० हजार मील ); पर्यक्‌ू--चारों ओर; त्रिभि:ः--तीन; श्रृद्ठे:--चोटियोंसे; पयः-निधिम्‌-- क्षीरसागर में एक द्वीप में स्थित; दिश:--सारी दिशाएँ; खमू--आकाश; रोचयन्‌--सुहावना; आस्ते--खड़ाहुआ; रौप्य--चाँदी; अयस--लोह; हिरण्मयैः --तथा सोने से बना; अन्यै:ः--अन्य चोटियों समेत; च-- भी; ककुभः--दिशाएँ;सर्वा:--सभी; रत्त--रल; धातु--तथा खनिज से; विचित्रितै:ः--सुन्दर ढंग से अलंकृत; नाना--अनेक; द्रुम-लता--पौधे तथालताओं; गुल्मै:--तथा झाड़ियों से; निर्घोषि:-- ध्वनि से; निर्शर--झरने के; अम्भसामू--जल की,पर्वत की लम्बाई तथा चौड़ाई समान ( ८० हजार मील ) है |

इसकी तीन प्रमुख चोटियाँ, जोलोहे, चाँदी तथा सोने की बनी हैं, सारी दिशाओं एवं आकाश को सुन्दर बनाती हैं |

पर्वत मेंअन्य चोटियाँ भी हैं, जो रत्नों तथा खनिजों से पूर्ण हैं और सुन्दर वृक्षों, लताओं एवं झाड़ियों सेअलंकृत हैं |

पर्वत के झरनों से जो ध्वनि उत्पन्न होती है, वह सुहावनी है |

इस प्रकार यह पर्वत सभी दिशाओं में सुन्दरता को बढ़ाते हुए खड़ा है |

स चावनिज्यमानाडूप्रि: समन्तात्पयऊर्मिभि: |

करोति श्यामलां भूमिं हरिन्मरकताश्मभि: ॥

४॥

सः--वह पर्वत; च-- भी; अवनिज्यमान-अडूप्रि:--जिसका चरण सदा प्रक्षालित होता है; समन्तात्‌--चारों ओर से; पयः-ऊर्मिभि:--दूध की लहरों से; करोति--बनाता है; श्यामलाम्‌--गहरा हरा; भूमिम्‌ू-- भूमि को; हरित्‌ू--हरी; मरकत--मरकतमणि; अश्मभि: -- पत्थरों से |

पर्वत के पाद की भूमि सदैव दूध की लहरों से प्रश्नालित होती रहती है, जो आठों दिशाओंमें ( उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम तथा इनके बीच की दिशाओं में ) मरकत मणियाँ उत्पन्न करतीरहती है |

सिद्धचारणगन्धर्वैर्विद्याधरमहोरगैः |

किन्नरैरप्सरोभिश्च क्रीडद्धिर्जुष्टकन्दरः ॥

५॥

सिद्ध--सिद्ध लोक के वासी; चारण--चारणलोक के वासी; गन्धर्वै:--तथा गन्धर्वलोक के वासियों द्वारा; विद्याधर--विद्या धरलोक के वासी; महा-उरगै:--सर्पलोक के वासियों द्वारा; किन्नरैः--किन्नरों के द्वारा; अप्सरोभि:--अप्सराओं से; च--तथा;क्रीडद्धिः--खेलकूद में लगी; जुष्ट--विलास में लगे; कन्दरः --गुफाएँ |

उच्चलोकों के वासी--सिद्ध, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, उरग, किन्नर तथा अप्सराएँ--इसपर्वत में क्रीड़ा करने के लिए जाते हैं |

इस तरह पर्वत की सारी गुफाएँ स्वर्गलोकों के निवासियोंसे भरी रहती हैं |

यत्र सड्जीतसन्नादैर्नदद्गुहममर्षया |

अभिगर्जन्ति हरयः एलाघिन: परशड्डया ॥

६॥

यत्र--उस ( त्रिकूट ) पर्वत में; सड़ीत--गायन की; सन्नादैः--ध्वनि से; नदत्‌--प्रतिध्वनित; गुहम्‌--गुफाएँ; अमर्षया--असहाक्रोध या ईर्ष्या के कारण; अभिगर्जन्ति--दहाड़ते हैं; हरयः--सिंह; श्लाघिन:--अपने बलपर अत्यन्त गर्वित; पर-शड्डया --दूसरेसिंह की आशंका से |

गुफाओं में स्वर्ग के निवासियों के गायन की गूँजती हुई ध्वनियों के कारण वहाँ के सिंह,जिन्हें अपनी शक्ति पर गर्व है, असह्य ईर्ष्या के कारण यह सोचकर गर्जना करते हैं कि वहाँ परकोई अन्य सिंह वैसे ही दहाड़ रहा है |

नानारण्यपशुत्रातसड्डू लद्गोण्यलड्डू तः ॥

चित्रद्रुमसुरोद्यानकलकण्ठविहड्रम: ॥

७॥

नाना--अनेक प्रकार के; अरण्य-पशु--जंगली जानवर; ब्रात--झुंड; सह्ढु 'ल--पूर्ण; द्रोणि--घाटियाँ; अलड्डू त:--सुन्दर ढंगसे सजायी गई; चित्र--किस्में; द्रुम--वृक्ष; सुर-उद्यान--देवताओं का बगीचा; कलकण्ठ--चहकती हुए; विहड्रम:--पक्षी |

त्रिकूट पर्वत के नीचे की घाटियाँ अनेक प्रकार के जंगली जानवरों से सुशोभित हैं औरदेवताओं के उद्यानों में जो वृक्ष हैं उन पर नाना प्रकार के पक्षी सुरीली तान से चहकते रहते हैं |

सरित्सरोभिरच्छोदै: पुलिनेर्मणिवालुकै: |

देवस्त्रीमज्जनामोदसौरभाम्ब्बनिलैर्युत: ॥

८ ॥

सरित्‌--नदियों; सरोभि:--तथा झीलों से; अच्छोदै:--निर्मल जल से पूर्ण; पुलिनैः--किनारे; मणि--छोट-छोटे रत्नों से;वालुकैः--बालू के कणों से मिलते-जुलते; देव-स्त्री--देवताओं की स्त्रियाँ; मजन--( जल में ) स्नान द्वारा; आमोद--शारीरिक सुगंध; सौरभ--अत्यन्त सुगंधित; अम्बु--जल; अनिलै:ः--तथा वायु से; युतः--( त्रिकूट पर्वत के वातावरण से )

समृद्धत्रिकूट पर्वत में अनेक नदियाँ तथा झीलें हैं जिनके किनारे बालू के कणों के सहृश छोटे-छोटे रत्नों से ढके हैं |

उनका जल मणियों की भाँति निर्मल है |

जब देवताओं की स्त्रियाँ उनमेंस्नान करती हैं, तो उनके शरीरों से जल तथा पवन सुर्गन्धि ग्रहण कर लेते हैं जिससे वायुमण्डलऔर भी सुगन्धित हो जाता है |

तस्य द्रोण्यां भगवतो वरुणस्य महात्मन: |

उद्यानमृतुमन्नाम आक्री्ड सुरयोषिताम्‌ ॥

९॥

सर्वतोउलड्डू तं दिव्यर्नित्यपुष्पफलद्रुमै: |

मन्दारैः पारिजातैश्व पाटलाशोकचम्पकै: ॥

१०॥

चूतेः पियालै: पनसैराम्रैराप्रातकैरपि |

क्रमुकैर्नारिकेलैश्व खर्जूरैबीजपूरकै: ॥

११॥

मधुकै: शालतालैश्व तमालैरसनार्जुनै: |

अष्ष्टोडुम्बरप्लक्षेवटे: किंशुकचन्दने: ॥

१२॥

पिचुमर्दे: कोविदारैः सरलै: सुरदारुभि: |

द्राक्षेक्षुरम्भाजम्बुभिदर्यक्षाभयामलै: ॥

१३॥

तस्य--उस पर्वत ( त्रिकूट ) की; द्रोण्यामू--घाटी में; भगवत:--महापुरुष; वरुणस्य--वरुण देव का; महा-आत्मन:-- भगवान्‌का महान्‌ भक्त; उद्यानमू--बगीचा; ऋतुमत्‌--ऋतुमत; नाम--नामक; आक्रीडम्‌--आमोद-प्रमोद का स्थान; सुर-योषिताम्‌--देवताओं की स्त्रियों के; सर्वतः--सर्वत्र; अलड्डू तम्‌--सुन्दर ढंग से सजाया हुआ; दिव्यै:--देवताओं से सम्बन्धित; नित्य--सदैव; पुष्प--फूलों; फल--तथा फलों के; ह्वमैः--वृक्षों से; मन्दारैः--मन्दार से; पारिजातैः--पारिजात से; च-- भी; पाटल--पाटल; अशोक--अशोक; चम्पकै:--चम्पा से; चूतेः--आम के विशेष फलों से; पियालैः--पियाल फलों से; पनसै:--पनस'फल से; आम्रै:--आमों से; आम्रातकैः--आम्रातक नामक खट्टे फलों से; अपि-- भी; क्रमुकैः--क्रमुक फलों से; नारिकेलै: --नारियल वृक्षों से; च--तथा; खर्जूरेः--खजूर के वृक्षों से; बीजपूरकै :--अनारों से; मधुकै:--मधुक फलों से; शाल-तालै:--ताड़ फलों से; च--तथा; तमालै:--तमाल वृक्षों से; असन--असन वृक्ष; अर्जुनै: --अर्जुन वृक्षों से; अरिष्ट--अरिष्ट फलों से;उड़म्बर--उडुम्बर का बड़ा वृशक्ष; प्लक्षेः--प्लक्ष वृक्ष से; वटैः--बरगद के पेड़ से; किंशुक--गंधविहीन लाल फूलों से;चन्दनैः--चंदन के वृश्षों से; पिचुमर्दे:--पिचुमर्द फूलों से; कोविदारैः--कोविदार फलों से; सरलै:--सरल वृक्षों से; सुर-दारुभि:--सुर-दारु वृक्षों से; द्राक्षा--अंगूर; इश्लु:ः--गन्ना; रम्भा--केला; जम्बुभि: --जम्बु फलों से; बदरी--बदरी फल;अक्ष--अक्ष फल; अभय---अभय फल; आमलै:--आमलकी या आँवलों के फलों से |

त्रिकूट पर्वत की घाटी में ऋतुमत्‌ नामक उद्यान था |

यह उद्यान महान्‌ भक्त वरुण का थाऔर यह देवांगनाओं का क्रीड़ास्थल था |

यहाँ सभी ऋतुओं में फूल-फल उगते रहते थे |

इनमें सेमन्दार, पारिजात, पाटल, अशोक, चम्पक, आम्रविशेष (चूत), पियाल, पनस, आम,आप्रातक, क्रमुक, नारियल, खजूर तथा अनार मुख्य थे |

वहाँ पर मधुक, ताड़, तमाल, असन,अर्जुन, अरिष्ट, उडम्बर, प्लक्ष, बरगद, किंशुक तथा चन्दन के वृक्ष थे |

वहाँ पर पिचुमर्द,कोविदार, सरल, सुरदारु, अंगूर, गन्ना, केला, जम्बु, बदरी, अक्ष, अभय तथा आमलकी भी थे |

बिल्‍वै: कपित्थेर्जम्बीरैवती भललातकादिभिः |

तस्मिन्सरः सुविपुलं लसत्काञ्जनपड्डजम्‌ ॥

१४॥

कुमुदोत्पलकह्लहारशतपत्रश्रियोर्जितम्‌ |

मत्तषट्पदनिर्धुष्ट शकुन्तैश्न कलस्वनै: ॥

१५॥

हंसकारण्डवाकीर्ण चक्राह्नः सारसैरपि |

जलकुक्कुटकोयष्टिदात्यूहकुलकूजितम्‌ ॥

१६॥

मत्स्यकच्छपसञ्ञारचलत्पडारज:पय: |

कदम्बवेतसनलनीपवज्ुलकै्वृतम्‌ ॥

१७॥

कुन्दैः कुरुबकाशोकै: शिरीषै: कूटजेड्डुदै: |

कुब्जकै: स्वर्णयूथीभिर्नागपुन्नागजातिभि: ॥

१८॥

मल्लिकाशततपत्रैश्न माधवीजालकादिभि: |

शोभितं तीरजैश्नान्यर्नित्यर्तुभिरलं द्रुमै: ॥

१९॥

बिल्वै: --बिल्व वृक्ष; कपित्थैः:--कपित्थ वृक्ष; जम्बीरैः --जम्बीर वृक्षों से; वृतः--घिरा हुआ; भललातक-आदिभि:--भल्लातक आदि वृक्षों से; तस्मिन्‌ू--उस उद्यान में; सर:--झील; सु-विपुलम्‌--अत्यन्त विशाल; लसत्‌--चमकीली; काझ्लनन--सुनहरी; पड्ढू-जम्‌--कमलों से पूर्ण; कुमुद--कुमुद पुष्पों का; उत्पल--उत्पल फूल; कह्लार--कह्ार फूल; शतपत्र--तथाशत्रपत्र के फूल; अिया--सौन्दर्य सहित; ऊर्जितम्‌-- श्रेष्ठ; मत्त--नशेमें; घटू-पद--भौरे; निर्धुष्टम्‌ू--गुनगुनाते; शकुन्तैः --पक्षियों की चहचहाहट से; च--तथा; कल-स्वनैः --मीठे गानों से; हंस--हंस; कारण्डब--कारण्डव; आकीर्णम्‌--झुंड में;अक्राह्मैः--चक्रावकों के साथ; सारसैः--सारसों से; अपि-- भी; जलकुक्कुट--जल मुर्गाबी; कोयट्टि--को यष्टि; दात्यूह--दात्यूह; कुल--झुंड; कूजितम्‌--कूजन करते; मत्स्य--मछली; कच्छप--तथा कछुवों का; सज्ञार--गति करने से; चलतू--विक्षुब्ध; पदा--कमलों के; रज:--परागकण से; पयः--जल ( अलंकृत था ); कदम्ब--कदम्ब; वेतस--बेंत; नल--नल,नरकट; नीप--नीप; वज्ुलकै:--वंजुलक से; वृतम्‌--घिरा हुआ; कुन्दै:--कुंदों से; कुकबक--कुरुबक; अशोकै: --अशोकसे; शिरीषै:--शिरीष से; कूटज---कुटज; इड्डुदैः --5ंगुद से; कुब्जकै:--कुब्जक से; स्वर्ण-यूथीभि:--स्वर्णयूथी से; नाग--नाग; पुन्नाग--पुन्नाग; जातिभि:ः--जाति से; मल्लिका--मल्लिका; शतपत्रै: --शतपत्रों से; च-- भी; माधवी--माधवी;जालकादिभि:--जालका आदि से; शोभितम्‌--अलंकृत; तीरजैः --किनारे पर उगे हुए; च--तथा; अन्यैः--अन्य; नित्य-ऋतुभि:--सभी ऋतुओं में; अलम्‌--प्रचुर मात्रा में; द्रमैः--वृक्षों से ( फल-फूल से लदे ) |

उस उद्यान में एक विशाल सरोवर था, जो चमकीले सुनहरे कमल के फूलों से तथा कुमुद,कहार, उत्पल एवं शतपत्र फूलों से भरा था जिनसे पर्वत की सुन्दरता में वृद्धि हो रही थी |

उसउद्यान में बिल्व, कपित्थ, जम्बीर तथा भल्लातक वृक्ष भी थे |

मदमत्त भौरें मधुपान कर रहे थेऔर अत्यन्त मधुर ध्वनि में गान करने वाले पक्षियों की चहचहाहट के साथ वे भी गुनगुना रहेथे |

सरोवर में हंसों, कारण्डवों, चक्रावकों, सारसों, जलमुर्गियों, दात्यूहों, कोयष्टियों तथा अन्यचहचहाते पक्षियों के झुंड के झुंड थे |

मछलियों तथा कछुवों के इधर-उधर तेजी से गति करने सेकमल के फूलों से जो परागकण गिरे थे उनसे जल सुशोभित था |

सरोवर के चारों ओर कदम्ब,वेतस, नल, नीप, वज्चुलक, कुन्द, कुरुबक, अशोक, शिरीष, कूटज, इंगुद, कुब्जक,स्वर्णयूथी, नाग, पुन्नाग, जाति, मल्लिका, शतपत्र, जालका तथा माधवी लताएँ थीं |

सरोवर केतट ऐसे वृक्षों से भलीभान्ति अलंकृत थे, जो सभी ऋतुओं में फूल तथा फल देने वाले थे |

इसतरह पूरा पर्वत भव्य रूप से सजा हुआ था |

तत्रैकदा तद्गिरिकानना श्रयःकरेणुभिर्वारणयूथपश्चरन्‌ |

सकण्टकं कीचकवेणुवेत्रवद्‌विशालगुल्मं प्ररुजन्वनस्पतीन्‌ ॥

२०॥

तत्र--वहाँ पर; एकदा--एक बार; ततू-गिरि--उस पर्वत ( त्रिकूट ) के; कानन-आश्रय: --जंगल में रहने वाला; करेणुभि:--हथिनियों के साथ; वारण-यूथ-पः--हाथियों का अगुवा; चरन्‌ू--विचरण करते ( सरोवर की ओर ); स-कण्टकम्‌--काँटों सेभरा स्थान; कीचक-वेणु-वेत्र-वत्‌--विभिन्न नामों वाले पौधों तथा लताओं से युक्त; विशाल-गुल्मम्‌-- अनेक जंगल;प्रसुजन्‌ू--तोड़ते हुए; बनः-पतीन्‌--वृक्षों और पौधों को |

एक बार हाथियों का अगुवा ( प्रमुख ), जो त्रिकूट पर्वत के जंगल में रह रहा था, अपनीहथिनियों के साथ सरोवर की ओर घूमने निकला |

उसने अनेक पौधों, लताओं तथा गुल्मों कोउनके चुभने वाले काँटों की परवाह न करते हुए नष्ट- भ्रष्ट कर डाला |

यदगन्धमात्राद्धरयो गजेन्द्राव्याप्रादयो व्यालमृगा: सखडूगा: |

महोरगाश्चापि भयाददरवन्तिसगौरकृष्णा: सरभाश्चमर्य: ॥

२१॥

यतू-गन्ध-मात्रात्‌ू--उस हाथी की गन्ध से ही; हरबः--सिंह; गज-इन्द्रा:--अन्य हाथी; व्याप्र-आदय:--बाघ जैसे हिंस्त्र पशु;व्याल-मृगा:--अन्य हिंस्त्र पशु; सखड्गा:--गैंडे; महा-उरगा:--बड़े-बड़े सर्प; च-- भी; अपि--निस्सन्देह; भयात्‌--डर से;द्रवन्ति-- भाग रहे थे; स--सहित; गौर-कृष्णा: --उनमें से कुछ श्वेत और कुछ काले; सरभा:--सरभ; चमर्य:--तथा चमरीभीउस हाथी की सुगंध पाकर ही सारे अन्य हाथी, बाघ तथा अन्य हिंसत्र पशु--यथा सिंह, गैंडे,सर्प एवं सफेद-काले सरभ--भय से भाग गये |

यहाँ तक कि चमरी हिरन भी भाग निकले |

वृका वराहा महिषर्क्षशल्यागोपुच्छशालाबृकमर्कटाश्व |

अन्यत्र क्षुद्रा हरिणाः शशादय-अ्वरन्त्यभीता यदनुग्रहेण ॥

२२॥

वृकाः--लोमड़ियाँ; वराहा:-- भालू; महिष-- भैंसा; ऋक्ष -- रीछ; शल्या: --सेही; गोपुच्छ--एक प्रकार का हिरन;शालाबवृक- भेड़िए; मर्कटा: --बन्दर; च--और; अन्यत्र--और कहें; क्षुद्रा:--छोटे पशु; हरिणा:--हिरन; शश-आदय: --खरगोश इत्यादि; चरन्ति--( जंगल में ) इधर-उधर घूमते हैं; अभीता:--निर्भय; यत्‌-अनुग्रहेण--उस हाथी की कृपा से |

इस हाथी की कृपा से लोमड़ी, भेड़िया, भेंसें, भालू, सुअर, गोपुच्छ, सेही, बन्दर, खरहे,हिरन तथा अन्य छोटे पशु जंगल में सर्वत्र विचरण करते रहते थे |

वे उससे भयभीत नहीं थे |

स घ॒र्मतप्त: करिभि: करेणुभि-वृतो मदच्युत्करभेरनुद्गरुतः |

गिरिं गरिग्णा परितः प्रकम्पयन्‌निषेव्यमाणोलिकुलैर्मदाशनै: ॥

२३॥

सरोउनिलं पड्डूजरेणुरूषितंजिप्रन्विदूरान्मदविह्ललेक्षण: |

वबृतः स्वयूथेन तृषार्दितेन तत्‌सरोवराभ्यासमथागमद्द्रूतम्‌ ॥

२४॥

सः--वह ( हाथियों का सरदार ); घर्म-तप्त:--पसीने से तर; करिभि:--अन्य हाथियों से; करेणुभि:--तथा हथिनियों से;बृत:ः--घिरा हुआ; मद-च्युत्‌ू--मुँह से लार चुवाता; करभेः--हाथी के बच्चों द्वारा; अनुद्गुतः:--पीछे -पीछे चलते हुए; गिरिम्‌--उस पर्वत को; गरिग्णा--शरीर के भार से; परित:--चारों ओर; प्रकम्पयन्‌--हिलाते हुए; निषेव्यमाण: --सेवित होकर;अलिकुलैः--भौरों के झुंड द्वारा; मद-अशनै: --शहद पिये हुए; सर:--सरोवर या झील से; अनिलम्‌--मन्द वायु; पड्डूज-रेणु-रूषितम्‌--कमल फूलों से रज ले जाता हुआ; जिप्रन्‌--सूँघते हुए; विदूरात्‌--दूर से; मद-विह्ल--मदग्रस्त होकर; ईक्षण:--चितवन; वृतः--घिरा हुआ; स्व-यूथेन--अपने ही संगियों से; तृषार्दितिन--प्यास से पीड़ित; तत्‌ू--उस; सरोवर-अभ्यासम्‌ --सरोवर के किनारे तक; अथ--इस प्रकार; अगमत्‌--गया; द्ुतम्‌-तुरन्त |

वह हाथियों का राजा गजपति झुंड के अन्य हाथियों तथा हथिनियों से घिरा था और उसकेपीछे-पीछे हाथी के बच्चे चल रहे थे |

वह अपने शरीर के भार से त्रिकूट पर्वत को चारों ओर सेहिला रहा था |

उसके पसीना छूट रहा था, उसके मुँह से मद की लार टपक रही थी और उसकीइृष्टिमद से भरी थी |

मधु पी-पीकर भौरें उसकी सेवा कर रहे थे और वह दूर से ही उन कमलफूलों के रजकणों की सुगंध का अनुभव कर रहा था, जो मन्द पवन द्वारा उस सरोवर से ले जाई जा रही थी |

इस प्रकार प्यास से पीड़ित अपने साथियों से घिरा वह गजपति तुरन्त सरोवर के तटपर आया |

विगाह्य तस्मिन्नमृताम्बु निर्मलंहेमारविन्दोत्पलरेणुरूषितम्‌ |

पपौ निकाम॑ निजपुष्करोद्धृत-मात्मानमद्धिः स्नपयन्गतक्लम: ॥

२५॥

विगाह्म--घुस कर; तस्मिनू--उस सरोवर में; अमृत-अम्बु-- अमृत के समान स्वच्छ जल; निर्मलम्‌ू--अत्यन्त विमल; हेम--अत्यन्त शीतल; अरविन्द-उत्पल--कुमुदिनियों तथा कमलों से; रेणु-- धूल से; रूषितम्‌--मिश्रित; पपौ--पिया; निकामम्‌--पूर्णतया सन्तुष्ट होने तक; निज--अपनी; पुष्कर-उद्धृतम्‌-सूँड़ से खींच कर; आत्मानम्‌--अपने आप; अद्धि:ः--जल से;स्नपयन्‌--पूरी तरह स्नान करते हुए; गत-क्लम:--थकान से मुक्त हुआ |

वह हाथियों का राजा ( गजपति गजेन्द्र ) सरोवर में घुस गया, पूरी तरह नहाया और अपनीथकान से मुक्त हो गया |

तब उसने अपनी सूँड़ से जी भरकर शीतल, स्वच्छ अमृततुल्य जल पियाजो कमलपुष्पों तथा जल कुमुदिनियों की रज से मिश्रित था |

स पुष्करेणोद्धृतशीकराम्बुभि-निपाययन्संस्नपयन्यथा गृही |

घृणी करेणु: करभांश्व दुर्मदोनाचष्ट कृच्छुं कृपणोजमायया ॥

२६॥

सः--वह ( गजराज ); पुष्करेण--अपनी सूँड़ से; उद्धूत--खींचकर; शीकर-अम्बुभि:--तथा जल छिड़क कर; निपाययन्‌--उन्हें पिलाकर; संस्नपयन्‌ू--तथा उन्हें नहला कर; यथा--जिस प्रकार; गृही--गृहस्थ; घृणी--सदैव ( अपने परिवार वालों पर )दयालु; करेणु:--हथिनियों को; करभान्‌--बच्चों को; च--तथा; दुर्मद:--अपने परिवार वालों से अत्यधिक आसक्त; न--नहीं; आचष्ट--विचार किया; कृच्छुमू--कठिनाई से; कृपण: --आध्यात्मिक ज्ञान से रहित; अज-मायया-- भगवान्‌ की मायाके प्रभाव से |

आध्यात्मिक ज्ञान से विहीन एवं अपने परिवार वालों के प्रति अत्यधिक आसक्त मनुष्य कीभाँति उस हाथी ने कृष्ण की बहिरंगा शक्ति ( माया ) द्वारा मोहित होकर अपनी पत्नी तथा बच्चोंको स्नान कराया और पानी पिलाया |

उसने अपनी सूंड़ में सरोवर का पानी भरकर उन सबकेऊपर छिड़का |

उसने इस प्रयास में लगने वाले कठिन श्रम की परवाह नहीं की |

तं तत्र कश्चित्रुप दैवचोदितो ग्राहो बलीयां श्वरणे रुषाग्रहीत्‌ |

यहच्छयैवं व्यसनं गतो गजोयथाबलं सोतिबलो विचक्रमे ॥

२७॥

तमू--उसको ( गजेन्द्र को ); तत्र--वहाँ ( जल में ); कश्चित्‌ू--कोई; नृप--हे राजा; दैव-चोदितः-- भाग्य द्वारा प्रेरित; ग्राह: --घड़ियाल; बलीयान्‌--अत्यन्त शक्तिशाली; चरणे--उसका पाँव; रुषा--क्रुद्ध होकर; अग्रहीतू--पकड़ लिया; यदृच्छया--भाग्य से होने वाली; एवम्‌--ऐसी; व्यसनम्‌--खतरनाक परिस्थिति; गतः--प्राप्त करके; गज:--हाथी ने; यथा-बलम्‌--अपनीशक्ति के अनुसार; सः--वह; अति-बलः --अत्यधिक प्रयास से; विचक्रमे--बाहर निकलने का प्रयत्त किया |

हे राजा! भाग्यवश एक बलिष्ठ घड़ियाल ने, जो हाथी पर क्रुद्ध था, जल के भीतर से हीहाथी के पैर पर आक्रमण कर दिया |

हाथी निश्चय ही बलवान्‌ था और उसने भाग्य द्वारा प्रेषितइस संकट से अपनी शक्ति भर अपने को छुड़ाने का प्रयत्न किया |

तथातुरं यूथपतिं करेणवोविकृष्यमाणं तरसा बलीयसा |

विचुक्रुशुर्दीनधियो परे गजा:पार्णिग्रहास्तारयितुं न चाशकन्‌ ॥

२८॥

तथा--तब; आतुरम्‌--उस विकट स्थिति में; यूथ-पतिम्‌--हाथियों के सरदार को; करेणव:--उसकी पतियाँ;विकृष्यमाणम्‌--आक्रमण किया जाकर; तरसा--बल से; बलीयसा--बल से ( घड़ियाल के ); विचुक्रुशु:--चिंग्घाड़ने लगीं;दीन-धिय:--अल्पज्ञ; अपरे--दूसरे; गजा:--हाथी; पार्णिण-ग्रहा:--पीछे से पकड़ कर; तारयितुम्‌--मुक्त कराने के लिए; न--नहीं; च-- भी; अशकन्‌--असमर्थ थे |

तत्पश्चात्‌ गजेन्द्र को उस विकट स्थिति में देखकर उसकी पत्लियाँ अत्यधिक दुखी हुई औरचिंग्घाड़ने लगीं |

दूसरे हाथियों ने गजेन्द्र की सहायता करनी चाही, किन्तु घड़ियाल की विपुलशक्ति के कारण वे उसे पीछे से पकड़कर उसको नहीं बचा सके |

नियुध्यतोरेवमिभेन्द्रनक्रयोर्‌विकर्षतोरन्तरतो बहिर्मिथ:ः |

समा: सहस्त्रं व्यगमन्महीपतेसप्राणयोश्रित्रममंसतामरा: ॥

२९॥

नियुध्यतो: --लड़ते हुए; एवम्‌ू--इस प्रकार; इभ-इन्द्र--हाथी; नक्रयो:--तथा घड़ियाल का; विकर्षतो: --खींचना;अन्तरत:--जल के भीतर; बहि:--जल के बाहर; मिथ:--एक दूसरे; समा:--वर्ष; सहस्त्रमू--एक हजार; व्यगमन्‌--बीत गये;मही-पते--हे राजा; स-प्राणयो:--दोनों जीवित; चित्रम्‌ू--आ श्चर्यजनक; अमंसत--विचार किया; अमरा:--देवताओं ने

है राजा! इस तरह हाथी तथा घड़ियाल जल के बाहर तथा जल के भीतर एक दूसरे कोघसीट कर एक हजार वर्षो तक लड़ते रहे |

इस लड़ाई को देखकर देवतागण अत्यन्त चकित थे |

ततो गजेन्द्रस्य मनोबलौजसांकालेन दीर्घेण महानभूदूव्यय: |

विकृष्यमाणस्य जलेवसीदतोविपर्ययोभूत्सकलं जलौकस: ॥

३०॥

ततः--तत्पश्चात्‌८ गज-इन्द्रस्य--हाथियों के राजा का; मन:--उत्साहबल का; बल--शारीरिक शक्ति; ओजसाम्‌--तथा इन्द्रियोंका बल; कालेन--वर्षो से लड़ते रहने से; दीर्घेण--दीर्घकालीन; महान्‌--महान्‌; अभूत्‌--गई; व्यय:--चुक;विकृष्यमाणस्य--( घड़ियाल द्वारा ) खींचा जाने वाला; जले--जल में; अवसीदत:--घट गई ( मानसिक, शारीरिक तथा ऐन्द्रियशक्ति ); विपर्यय:--विपरीत; अभूत्‌--हो गया; सकलम्‌ू--सभी; जल-ओकस:--घड़ियाल, जिसका घर जल है |

तत्पश्चात्‌ जल के भीतर खींचे जाने तथा दीर्घकाल तक लड़ते रहने के कारण हाथी कीमानसिक, शारीरिक तथा ऐन्द्रिय शक्ति घटने लगी |

इसके विपरीत जल का पशु होने के कारणघड़ियाल का उत्साह, उसकी शारीरिक शक्ति तथा ऐन्द्रिय शक्ति बढ़ती रही |

इत्थं गजेन्द्र: स यदाप सड्डूटंप्राणस्य देही विवशो यहच्छया |

अपारयच्नात्मविमोक्षणे चिरंदध्याविमां बुद्धिमथा भ्यपद्यत ॥

३१॥

इत्थम्‌--इस प्रकार से; गज-इन्द्र:--हाथियों के राजा ने; सः--उस; यदा--जब; आप--प्राप्त की; सड्डूटम्‌--ऐसी भयानकस्थिति; प्राणस्थ--जीवन की; देही--देहधारी; विवशः--परिस्थितिवश असहाय; यहृच्छया--दैव की इच्छा से; अपारयन्‌--असमर्थ होकर; आत्म-विमोक्षणे -- अपनी रक्षा करने में; चिरम्‌--दीर्घकाल तक; दध्यौ--गम्भीरतापूर्वक सोचने लगा; इमाम्‌--यह; बुद्धिम्‌ू--निर्णय; अथ--तत्पश्चात्‌; अभ्यपद्यत-प्राप्त हुआ, पहुँचा |

जब गजेन्द्र ने देखा कि वह दैवी इच्छा से घड़ियाल के चंगुल में है और बंधन में फंसकर'परिस्थितिवश असहाय है एवं अपने को संकट से नहीं उबार सकता तो वह मारे जाने से अत्यन्तभयभीत हो उठा |

फलस्वरूप उसने दीर्घकाल तक सोचा और अन्ततोगत्वा वह इस निर्णय परपहुँचा |

न मामिमे ज्ञातय आतुरं गजाःकुतः करिण्य: प्रभवन्ति मोचितुम्‌ |

ग्राहेण पाशेन विधातुरावृतो-प्यहं च तं यामि परं परायणम्‌ ॥

३२॥

न--नहीं; मामू--मुझको; इमे--ये सब; ज्ञातय:--मित्र तथा सम्बन्धी ( अन्य हाथी ); आतुरम्‌--मेरे दुख में; गजा:--हाथी;कुतः--कैसे; करिण्य: --मेरी पत्लियाँ; प्रभवन्ति--समर्थ हैं; मोचितुम्‌--( इस संकटमय स्थिति से ) उद्धार करने में; ग्राहेण --घड़ियाल से; पाशेन--फन्दे से; विधातु:-- भाग्य के; आवृत:--बन्दी; अपि--यद्यपि ( मैं ऐसी स्थिति में हूँ ); अहम्‌ू--मैं; च--भी; तम्--उस ( भगवान्‌ ) की; यामि--शरण में जाता हूँ; परम्--जो दिव्य हैं; परायणम्‌--जो ब्रह्मा तथा शिव जैसे सम्मानितदेवताओं की भी शरण हैं |

जब मेरे मित्र तथा अन्य सम्बन्धी हाथी मुझे इस संकट से नहीं उबार सके तो मेरी पत्नियों का तो कहना ही कया? वे कुछ नहीं कर सकतीं |

यह दैवी इच्छा थी कि इस घड़ियाल ने मुझ परआक्रमण किया है, अतएव मैं उन भगवान्‌ की शरण में जाता हूँ जो हर एक को, यहाँ तक किमहापुरुषों को भी, सदैव शरण प्रदान करते हैं |

यः कश्चनेशो बलिनोउन्तकोरगात्‌प्रचण्डवेगादभिधावतो भृशम्‌ |

भीतं प्रपन्नं परिपाति यद्भधयान्मृत्युः प्रधावत्यरणं तमीमहि ॥

३३॥

यः--जो ( भगवान्‌ ); कश्चन--कोई; ईशः--परमनियन्ता; बलिन:--अत्यन्त शक्तिशाली; अन्तक-उरगात्‌-- मृत्यु लाने वालेकाल रूपी विशाल सर्प से; प्रचण्ड-वेगात्‌-- अत्यन्त भयानक बल से; अभिधावत:ः--पीछा करता हुआ; भृशम्‌--निरन्तर ( हरघड़ी ); भीतम्‌-- मृत्यु से डरा हुआ; प्रपन्नमू--शरणागत ( भगवान्‌ के ); परिपाति--रक्षा करता है; यत्‌-भयात्‌--जिस भगवान्‌के डर से; मृत्यु:--साक्षात्‌ मृत्यु; प्रधावति-- भाग जाती है; अरणम्‌ू--हर एक के वास्तविक आश्रय; तम्‌ू--उसकी; ईमहि--मैंशरण लेता हूँ |

भगवान्‌ निश्चय ही हर एक को ज्ञात नहीं हैं, किन्तु वे हैं अत्यन्त शक्तिशाली तथाप्रभावशाली |

अतएव यद्यपि काल रूपी सर्प प्रचण्ड वेग से निरन्तर मनुष्य का पीछा कर रहा हैऔर उसे निगलने को उद्यत है, तथापि, यदि वह इस सर्प से डरकर भगवान्‌ की शरण में जाताहै, तो भगवान्‌ उसे संरक्षण प्रदान करते हैं क्योंकि भगवान्‌ के भय से मृत्यु भी भाग जाती है |

अतएव मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूँ जो महान्‌ एवं शक्तिशाली परम सत्ता हैं और हर एक केवास्तविक आश्रय हैं |

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