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अध्याय दस: देवताओं और राक्षसों के बीच लड़ाई
8.10श्रीशुक उबाचइति दानवदैतेया नाविन्दन्नमृतं नृप |
युक्ता: कर्मणि यत्ताश्च वासुदेवपराड्मुखा: ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; दानव-दैतेया:--असुरों तथा दैत्यों ने; न--नहीं;अविन्दनू--वांछित फल प्राप्त किया; अमृतम्--अमृत; नृप--हे राजा; युक्ता:--सभी मिलकर; कर्मणि--मन्थन में; यत्ता: --पूर्ण मनोयोग से लगे हुए; च--तथा; वासुदेव-- भगवान् कृष्ण के; पराड्मुखा:--अभक्त होने के कारण |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा! यद्यपि असुर तथा दैत्य पूरे मनोयोग तथा श्रम के साथसमुद्र-मन्थन में लगे थे, किन्तु भगवान् वासुदेव के भक्त न होने के कारण वे अमृत नहीं पीसके |
साधयित्वामृतं राजन्पाययित्वा स्वकान्सुरान् |
पश्यतां सर्वभूतानां ययौ गरूडवाहन: ॥
२॥
साधयित्वा--सम्पन्न करके; अमृतम्--अमृत की उत्पत्ति; राजन्ू--हे राजा; पाययित्वा--तथा पिलाकर; स्वकान्--अपने भक्तों;सुरानू--देवताओं को; पश्यताम्--उपस्थिति में; सर्व-भूतानाम्--सारे जीवों की; ययौ--चले गये; गरूड-वाहन:--गरुड़ द्वाराले जाये जाने वाले भगवान् |
हे राजा! समुद्र-मन्थन का कार्य पूरा कर लेने तथा अपने प्रिय भक्त देवताओं को अमृतपिला लेने के बाद भगवान् ने उन सबके देखते-देखते वहाँ से विदा ली और गरुड़ पर चढ़करअपने धाम चले गये |
सपलानां परामृद्धि दृष्ठा ते दितिनन्दना: |
अमृष्यमाणा उत्प्पेतुर्देवाग्प्रत्युद्यतायुधा: ॥
३॥
सपत्नानाम्--अपने प्रतिद्वन्द्रियों अर्थात् देवताओं का; पराम्--सर्व श्रेष्ठ; ऋद्धिम्--ऐश्वर्य; दृघ्ठा--देखकर; ते--वे सब; दिति-नन्दना:--दिति के पुत्र, दैत्यगण; अमृष्यमाणा:--न सह सकने के कारण; उत्पेतु:--दौड़े ( उपद्रव मचाने के लिए ); देवान्--देवताओं की ओर; प्रत्युद्यत-आयुधा:--अपने हथियार उठाकर |
देवताओं की विजय देखकर असुरगण उनके श्रेष्ठतर ऐश्वर्य को सहन न कर सके |
अतः वेअपने-अपने हथियार उठाकर देवताओं की ओर दौड़ पड़े |
ततः सुरगणा: सर्वे सुधया पीतयैधिता: |
प्रतिसंयुयुधु: शस्त्रेनारायणपदा श्रया: ॥
४॥
ततः--तत्पश्चात्; सुर-गणा:--देवता; सर्वे--सभी; सुधया-- अमृत से; पीतया--पिया हुआ; एधिता:--ऐसे पीने से उत्तेजितहोकर; प्रतिसंयुयुधु:--उन्होंने असुरों पर जवाबी हमला किया; शस्त्रैः--शस्त्रों के द्वारा; नारायण-पद-आश्रया:--उनका असलीहथियार नारायण के चरणकमलों की शरण था |
तत्पश्चात् अमृत पीने से उत्तेजित देवताओं ने जो सदैव नारायण के चरणकमलों की शरण मेंरहते हैं असुरों पर प्रत्याक्रमण करने के लिए युद्ध की मनोवृत्ति से अपने विविध हथियारों काप्रयोग किया |
तत्र दैवासुरो नाम रण: परमदारुणः |
रोधस्युदन्वतो राजं॑स्तुमुलो रोमहर्षण: ॥
५॥
तत्र--वहाँ ( क्षीरसागर के तट पर ); दैव--देवता; असुरः--असुर; नाम--नाम से; रण:--युद्ध; परम--अत्यन्त; दारुण:--भयानक; रोधसि--तट पर; उदन्वत:--क्षीरसागर के; राजनू--हे राजा; तुमुलः--कोलाहलपूर्ण; रोम-हर्षण: --शरीर के रोएँखड़े हुए
हे राजा! देवताओं तथा असुरों के मध्य क्षीरसागर के तट पर घमासान युद्ध शुरु हो गया |
यह युद्ध इतना भयंकर था कि इसके विषय में सुनने से ही शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं |
तत्रान्योन्यं सपत्नास्ते संरब्धमनसो रणे |
समासाद्यासिभिर्बाणर्निजछ्नुर्विविधायुधै: ॥
६॥
तत्र--तत्पश्चात्; अन्योन्यम्--एक दूसरे से; सपला:--सभी लड़ाकू बनकर; ते--वे; संरब्ध--अत्यन्त क्रुद्ध; मनस:--मन से;रणे--युद्ध में; समासाद्य--परस्पर लड़ने का अवसर पाकर; असिभि:--तलवार से; बाणै: --बाणों से; निजघ्नु: --एक दूसरेको मारने लगे; विविध-आयुधै: --विभिन्न प्रकार के हथियारों से |
उस युद्ध में दोनों ही दल मन ही मन अत्यन्त क्रुद्ध थे |
वे शत्रुतावश एक दूसरे पर तलवारों,बाणों तथा अन्य विविध हथियारों से प्रहार करने लगे |
शड्डुतूर्यमृदड़ानां भेरीडमरिणां महान् |
हस्त्यश्वरथपत्तीनां नद॒तां निस्वनोभवत् ॥
७॥
शब्डु--शंखों का; तूर्य--बड़ी तुरहियों का; मृदज्ञनाम्ू--तथा ढोलों का; भेरीडमरिणाम्--भेरियों तथा डमरियों का; महान्--अत्यन्त कोलाहलपूर्ण; हस्ति--हाथियों का; अश्व--घोड़ों का; रथ-पत्तीनामू--रथ पर या भूमि पर लड़ने वालो का; नदताम्--शब्द करते; निस्वन:ः--कोलाहल; अभवत्--हुआ
शंखों, तुरहियों, ढोलों, भेरियों तथा डमरियों की आवाजों के साथ ही हाथियों, घोड़ों तथारथ पर चढ़े और पैदल सिपाहियों से निकली ध्वनियों से कोलाहल मच गया |
रथिनो रथिभिस्तत्र पत्तिभि: सह पत्तय: |
हया हयैरिभाश्चेभे: समसज्जन्त संयुगे ॥
८॥
रथिनः--रथ पर आरूढ़; रथिभि:--शत्रुपक्ष के रथ पर आरूढ़ सैनिकों से; तत्र--युद्धस्थल में; पत्तिभि:--पैदल सेना के;सह--साथ; पत्तय:--शत्रुओं की पैदल सेना; हया:--धोड़े; हयैः--घुड़सवार शत्रु सैनिकों से; इभाः:--हाथी पर चढ़े सैनिक;च--तथा; इभेः--हाथी पर सवार शत्रु-सैनिकों से; समसज्जन्त--समान स्तर पर एक दूसरे से लड़ने लगे, भिड़ गये; संयुगे--युद्धस्थल में |
उस युद्धभूमि में रथी अपने विपक्षी रथियों से, पैदल सेना विपक्षी पैदल सेना से, अश्वारोहीविपक्षी अश्वारोहियों से तथा हाथी पर सवार सैनिक विपक्षी हाथी पर सवार सैनिकों से भिड़गये |
इस प्रकार समान पक्षों में युद्ध होने लगा |
जले: केचिदिभे: केचिदपरे युयुधु: खरे: |
केचिद्गौरमुखेर्क्षेद्वीपिभिहरिभिर्भटा: ॥
९॥
उट्लने:--ऊँट की पीठ पर; केचित्--कुछ व्यक्ति; इभैः--हाथी की पीठ पर; केचित्--कुछ व्यक्ति; अपरे-- अन्य; युयुधुः--युद्धमें लगे हुए; खरैः--गधों की पीठ पर; केचित्--कुछ व्यक्ति; गौर-मुखैः--सफेद मुँह वाले बन्दरों पर; ऋक्षैः--लाल मुँह वालेबन्दरों ( रीछों ) पर; द्वीपिभि: --बाघों की पीठ पर; हरिभि:--सिंहों की पीठ पर; भटा:--सारे सैनिक |
कुछ सैनिक ऊँटों पर, कुछ हाथियों पर, कुछ गधों पर, कुछ सफेद मुँह वाले और लाल मुँहवाले बन्दरों पर, कुछ बाघों पर और कुछ सिंहों पर सवार होकर लड़ने लगे |
इस प्रकार वे सबयुद्ध में लगे थे |
गृश्चे: कड्ढै बंकैरन्ये श्येनभासैस्तिमिड्रिलैः |
शरभेर्महिषै: खड्गैगगोवृषैर्गवयारुणै; ॥
१०॥
शिवाभिराखुभि: केचित्कूकलासै: शशैनरै: |
बस्तैरेके कृष्णसारैहसैरन्ये च सूकरै: ॥
११॥
अन्ये जलस्थलखगै: सत्त्वैर्विकृतविग्रहैः |
सेनयोरुभयो राजन्विविशुस्तेग्रतोग्रतः ॥
१२॥
गृश्चै:--गीधों की पीठ पर; कड्ढै :--चील्हों की पीठ पर; बकैः--बगुलों की पीठ पर; अन्ये--अन्य लोग; श्येन--बाजों कीपीठ पर; भासैः--भास की पीठ पर; तिमिड्डिलैः--तिमिड्रिल नामक बड़ी मछली की पीठ पर; शरभे:--शरभों की पीठ पर;महिषैः--भैंसे की पीठ पर; खड़्गैः--गैंडे की पीठ पर; गो--गायों की पीठ पर; वृषै:--बैलों की पीठ पर; गवय-अरुणै:--गवयों तथा अरुणों की पीठ पर; शिवाभि:--सियारों की पीठ पर; आखुभि: --बड़े चूहों की पीठ पर; केचित्ू--कुछ लोग;कृकलासै:--बड़ी छिपकलियों पर; शशैः--खरहों की पीठ पर; नरैः--मनुष्यों की पीठ पर; बस्तैः--बकरों की पीठ पर;एके--कुछ; कृष्ण-सारैः--काले हिरनों की पीठ पर; हंसैः--हंसों की पीठ पर; अन्ये--अन्य; च-- भी; सूकरैः--सुअरों कीपीठ पर; अन्ये-- अन्य; जल-स्थल-खगै:--जल, स्थल तथा आकाश में चलने वाले पशुओं से; सत्त्वै:--वाहन के रूप मेंप्रयुक्त प्राणियों से; विकृत--विरूपित हैं; विग्रहैः--ऐसे पशुओं द्वारा जिनके शरीर; सेनयो:--दोनों पक्षो के सैनिकों के;उभयो:--दोनों के; राजन्--हे राजा; विविशु: --प्रवेश किया; ते--वे सभी; अग्रतः अग्रतः--आमने-सामने जाते हुए
हे राजा! कुछ सैनिक गीधों, चील्हों, बगुलों, बाजों तथा भास पक्षियों की पीठ पर बैठकरलड़े |
कुछ ने विशाल मत्स्यों (तिमि ) को भी निगलने वाली तिमिंगलों की पीठ पर, कुछ नेसरभों की पीठ पर तो कुछ ने भेंसों, गैंडों, गायों, बैलों, बनगायों तथा अरुणों की पीठ परसवार होकर युद्ध किया |
अन्य लोगों ने सियारों, चूहों, छिषकलियों, खरहों, मनुष्यों, बकरों,काले हिरनों, हंसों तथा सुअरों की पीठ कर बैठकर युद्ध किया |
इस प्रकार जल, स्थल तथाआकाश के पशुओं की पीठ पर, जिनमें विकृत शरीर वाले पशु भी थे, बैठी दोनों सेनाएँआमने-सामने होकर आगे बढ़ रही थीं |
चित्रध्वजपटै राजन्नातपत्रे: सितामलै: |
महाधरनेर्वज़दण्डैव्यजनैर्बाहचामरै: ॥
१३॥
वातोद्धूतोत्तरोष्णीषैरचिं्िवर्मभूषणै: |
स्फुरद्धिर्विशदैः शस्त्रे: सुतरां सूर्यरश्मिभि: ॥
१४॥
देवदानववीराणां ध्वजिन्यौ पाण्डुनन्दन |
रेजतुर्वीरमालाभिय्यादसामिव सागरौ ॥
१५॥
चित्र-ध्वज-पटै: --सुन्दर सजे झंडों तथा तम्बुओं से; राजन्ू--हे राजा; आतपत्रैः -- धूप से बचने के लिए छातों से; सित-अमलै:--अत्यन्त स्वच्छ तथा श्वेत; महा-धनैः--अत्यन्त मूल्यवान; वज्-दण्डै:--रत्नों तथा मोतियों से बने दण्डों से; व्यजनै: --पंखों से; बाह-चामरैः--मोर पंखों से बने पंखों से; वात-उद्धृत--हवा से उड़ते; उत्तर-उष्णीषै:--ऊपरी तथा निचले वत्त्रों से;अर्चिर्भि: -- तेज से; वर्म-भूषणैः --गहनों तथा ढालों से; स्फुरद्धिः--चमकते; विशदैः--तेज तथा स्वच्छ; शस्त्रै:--हथियारों से;सुतराम्--अत्यधिक; सूर्य-रश्मिभि: --सूर्य की चमचमाती किरणों से; देब-दानव-वीराणाम्--देवताओं और दानवों के दलों केसारे वीरों का; ध्वजिन्यौ--अपना-अपना झंडा लिए दोनों दलों के सैनिक; पाण्डु-नन्दन--हे महाराज पाण्डु के वंशज;रेजतु:--चमके; वीर-मालाभि: --वीरों द्वारा पहनी गई मालाओं से; यादसाम्--जलचरों के; इब--सहृश; सागरौ--दोनोंसमुद्र |
हे राजा! हे महाराज पाण्डु के वंशज! देवता तथा असुर दोनों ही के सैनिक चँदोवा,रंगबिरंगी झंडियों तथा बहुमूल्य रत्नों एवं मोतियों से बनी मूठ वाले छातों से अलंकृत थे |
वेमोरपंख से बने तथा अन्य पंखों से सुशोभित थे |
ऊपरी तथा अधोवस्त्रों के वायु में लहराने केकारण सैनिक अत्यन्त सुन्दर लग रहे थे और चमचमाती धूप में उनकी ढालें, उनके गहने तथातीक्ष्ण स्वच्छ हथियार आँखों को चौंधिया रहे थे |
इस तरह सैनिकों की टोलियाँ जलचरों केदलों से युक्त दो सागरों के समान प्रतीत हो रही थीं |
वैरोचनो बलि: सड्ख्ये सोसुराणां चमूपतिः |
यान॑ वैहायसं नाम कामगं मयनिर्मितम् ॥
१६॥
सर्वसाडग्रामिकोपेतं सर्वाश्चर्यमयं प्रभो |
अप्रतर्क्यमनिर्देश्यं हश्यमानमरदर्शनम् ॥
१७॥
आस्थितस्तद्विमानाछयं सर्वानीकाधिपैर्वृत: |
बालव्यजनछत्राछय रेजे चन्द्र इबोदये ॥
१८॥
वैरोचन:--विरोचन का पुत्र; बलि:--महाराज बलि; सड्ख्ये--युद्ध में; सः--वह, इतना विख्यात; असुराणाम्--असुरों का;चमू-पति:--सेनापति; यानमू--वायुयान; वैहायसम्-- वैहायस; नाम--नामक; काम-गम्--इच्छानुसार कहीं भी उड़ने मेंसमर्थ; मय-निर्मितम्--मय दानव द्वारा बनाया हुआ; सर्व--सारा; साड्ग्रामिक-उपेतम्--सभी तरह के शत्रुओं से लड़ने के लिएसभी प्रकार के आवश्यक हथियारों से युक्त; सर्व-आश्चर्य-मयम्--सभी तरह से आश्चर्यपूर्ण; प्रभो--हे राजा; अप्रतर्क्यम्--वर्णन न किए जाने योग्य; अनिर्देश्यमू--अवर्णनीय; हश्यमानम्--कभी-कभी दृश्य; अदर्शनम्--कभी-कभी अदृश्य;आस्थित:--इस तरह से आसीन; तत्--वह; विमान-अछयम्--सवोत्कृष्ट वायुयान; सर्व--सारा; अनीक-अधिपै:--सैनिकों केनायकों द्वारा; वृत:--घिरा; बाल-व्यजन-छत्र-अछयै: --सुन्दर ढंग से सजाये छातों एवं श्रेष्ठ चामरों से सुरक्षित; रेजे--चमकतेहुए स्थित; चन्द्र:--चन्द्रमा; इब--सहृश; उदये--शाम को उदय होते समय |
उस युद्ध के लिए विख्यात सेनापति विरोचन-पुत्र महाराज बलि वैहायस नामक अद्भुतवायुयान पर आसीन थे |
हे राजा! यह सुन्दर ढंग से सजाया गया वायुयान मय दानव द्वारा निर्मितकिया गया था और युद्ध के सभी प्रकार के हथियारों से युक्त था |
यह अचिन्त्य तथा अवर्णनीयथा |
यह कभी दिखता तो कभी नहीं दिखता था |
इस वायुयान में एक सुन्दर छाते के नीचे बैठेतथा सर्वोत्तम चमरों से पंखा झले जाते हुए एवं अपने सेनानायकों से घिरि महाराज बलि इसप्रकार लग रहे थे मानों शाम को चन्द्रमा उदय हो रहा हो और सभी दिशाओं को प्रकाशित कररहा हो |
तस्यासन्सर्वतो यानैर्यूथानां पतयोसुरा: |
नमुचि: शम्बरो बाणो विप्रचित्तिरयोमुख: ॥
१९॥
द्विमूर्धा कालनाभोथ प्रहेतिहेतिरिल्वल: |
शकुनिर्भूतसन्तापो वज्रदंष्टो विरोचन: ॥
२०॥
हयग्रीवः शट्भु शिरा: कपिलो मेघदुन्दुभि: |
तारकश्चक्रदक्शुम्भो निशुम्भो जम्भ उत्कल: ॥
२१॥
अरिष्टोषरिष्टनेमिश्व मयश्च त्रिपुराधिप: |
अन्ये पौलोमकालेया निवातकवचादय: ॥
२२॥
अलब्धभागा: सोमस्य केवलं क्लेशभागिन: |
सर्व एते रणमुखे बहुशो निर्जितामरा: ॥
२३॥
सिंहनादान्विमुद्जन्तः शद्भान्दध्मुर्महारवान् |
इृष्टा सपत्नानुत्सिक्तान्बलभित्कुपितो भूशम् ॥
२४॥
तस्य--उसके ( बलि महाराज के ); आसनू--स्थित; सर्वतः--चारों ओर; यानै:--विभिन्न यानों से; यूथानाम्--सैनिकों के;'पतय:--सेनानायक; असुरा:--असुरगण; नमुचि: --नमुचि; शम्बर: --शम्बर; बाण: -- बाण; विप्रचित्ति: --विप्रचित्ति;अयोमुख: --अयोमुख; द्विमूर्धा--द्विमूर्धा; कालनाभ:--कालनाभ; अथ--भी; प्रहेति: --प्रहेति; हेति:--हेति:; इल्बल:--इल्वल; शकुनि:--शकुनि; भूतसन्ताप: -- भूतसन्ताप; वज्-दंष्ट: --वज़दंष्ट; विरोचन: --विरोचन; हयग्रीव: --हयग्रीव;शट्ढु शिरा:--शंकुशिरा; कपिल:--कपिल; मेघ-दुन्दुभि:ः--मेघदुन्दुभि; तारक:--तारक; चक्रहक्--चक्रहक्; शुम्भ: -- शुम्भ;निशुम्भ: --निशुम्भ; जम्भ: --जम्भ; उत्कल: --उत्कल; अरिष्ट:--अरिष्ट; अरिष्टनेमि: -- अरिष्टनेमि; च--तथा; मय: च--तथामय; त्रिपुराधिप: --त्रिपुराधिप; अन्ये-- अन्य; पौलोम-कालेया:--पुलोम तथा कालेय के पुत्र; निवातकवच-आदय: --निवातकवच तथा अन्य असुर; अलब्ध-भागा: -- भाग लेने में सभी असमर्थ; सोमस्थ--अमृत का; केवलम्--केवल; क्लेश-भागिन:--असुरों ने श्रम का हिस्सा ले लिया; सर्वे--सभी; एते--असुरगण; रण-मुखे--युद्ध के समक्ष; बहुश:--अत्यधिकबल से; निर्जित-अमरा: --देवताओं को अत्यधिक कष्ट पहुँचाने वाले; सिंह-नादान्ू--सिंह जैसी दहाड़े; विमुझ्जन्तः--निकालतेहुए; शझ्जनू--शंखों को; दध्मु:--बजाया; महा-रवान्--घोर ध्वनि करने वाले; हृष्ठटा--देखकर; सपत्नान्--अपने प्रतियोगियोंको; उत्सिक्तानू-- भयानक; बलभित्--शक्ति से भयभीत ( इन्द्र ); कुपित:--क्रुद्ध होकर; भूशम्--अत्यधिक |
महाराज बलि को चारों ओर से असुरों के सेनानायक तथा कप्तान घेरे थे |
वे अपने-अपनेरथों पर सवार थे |
उनमें निम्नलिखित असुर थे--नमुचि, शम्बर, बाण, विप्रचित्ति, अयोमुख,द्विमूर्धा, कालनाभ, प्रहेति, हेति, इल्बल, शकुनि, भूतसन्ताप, वज्जदंछ्र, विरोचन, हयग्रीव,शंकुशिरा, कपिल, मेघदुन्दुभि, तारक, चक्रहक्, शुम्भ, निशुम्भ, जम्भ, उत्कल, अरिष्ट,अरिष्टनेमि, त्रिपुराधिप, मय, पुलोम के पुत्र कालेय तथा निवातकवच |
ये सारे असुर अमृत केअपने-अपने भाग से वज्ञित रह गये थे; उन्होंने केवल समुद्र-मन्थन का श्रम उठाया था |
अब वेसुरों के विरुद्ध लड़ रहे थे और अपनी सेनाओं को प्रोत्साहित करने के लिए उन्होंने सिंह-गर्जनाके समान कोलाहल किया और जोर से अपने-अपने शंख बजाये |
बलभित अर्थात् इन्द्रदेव अपनेरक्तपिपास प्रतिद्वन्द्रियों की यह स्थिति देखकर अत्यन्त कुपित हुए |
ऐरावतं दिक्करिणमारूढः शुशुभे स्वराट् |
यथा स्त्रवप्प्रस्नवणमुदयाद्विमहर्पति: ॥
२५॥
ऐराबतम्--ऐरावत पर; दिक्ू-करिणम्--सर्वत्र जा सकने वाले विशाल हाथी; आरूढ:--सवार होकर; शुशुभे--देखने मेंअत्यन्त सुन्दर लगने लगा; स्व-राट्--इन्द्र; यथा--जिस तरह; स्त्रवत्--बहते हुए; प्रस्नवणम्--सुरा की लहरें; उदय-अद्विम्--उदयगिरि पर; अहः-पति:--सूर्य
ऐरावत हाथी पर जो कहीं भी जा सकता है और जो छिड़कने के लिए जल तथा सुरा कोसंचित रखता है, चढ़कर इन्द्र ऐसे लग रहे थे मानो उदयगिरि से जहाँ जल के आगार हैं सूर्यनिकल रहा हो |
तात्पर्य : उदयगिरि पर्वत की चोटी पर अनेक झीलें हैं जहाँ से झरनों के रूप में निरन्तर जल झरतारहता है |
इसी प्रकार इन्द्र का वाहन ऐरावत जल तथा सुरा संचित रखता है और इन्हें इन्द्र की ओर छिड़कता रहता है |
इस प्रकार ऐरावत की पीठ पर बैठे इन्द्र उदयगिरि से ऊपर उठते तेजस्वी सूर्य कीभाँति प्रतीत हो रहे थे |
तस्यासन्सर्वतो देवा नानावाहध्वजायुधा: |
लोकपाला: सहगणैर्वाय्वग्निवरुणादयः ॥
२६॥
तस्य--इन्द्र के; आसन्--स्थित; सर्वतः--चारों ओर; देवा: --सारे देवता; नाना-वाह--तरह-तरह के वाहनों से; ध्वज-आयुधा:--तथा झंडों एवं हथियारों सहित; लोक-पाला:--उच्च लोकों के सारे प्रमुख; सह--साथ; गणै:--अपने-अपने पार्षदोंके साथ; वायु--वायु के अधिष्ठाता देवता; अग्नि--अग्नि के अधिष्ठाता देवता; वरुण--जल के अधिष्ठाता देवता; आदय: --इन्द्र को घेरे हुए सभी |
देवतागण स्वर्ग के राजा इन्द्र को घेरे हुए थे |
वे नाना प्रकार के यानों पर सवार थे और झंडोंतथा आयुधों से सज्जित थे |
उपस्थित देवताओं में वायु, अग्नि, वरुण तथा विभिन्न लोकों केअन्य शासक तथा उनके पार्षद थे |
तेउन्योन्यमभिसंसृत्य क्षिपन्तो मर्मभिर्मिथ: |
आह्यन्तो विशन्तोग्रे युयुधु्द्वन्द्योधिन: ॥
२७॥
ते--वे ( देवता तथा दानव ); अन्योन्यम्--एक दूसरे को; अभिसंसृत्य--आमने-सामने आकर; क्षिपन्त:--एक दूसरे कोप्रताड़ित करते; मर्मभि: मिथ:--एक दूसरे के हृदयों को पीड़ा पहुँचाते; आह्ृयन्तः--एक दूसरे को सम्बोधित करते; विशन्त:ः--युद्धभूमि में प्रवेश करके; अग्रे--सामने; युयुधु:--लड़ाई की; द्वन्द्र-योधिन:--दो-दो प्रतिद्वन्द्दी योद्धा |
देवता तथा दानव एक दूसरे के सम्मुख आ गये और मर्मभेदी बचनों से एक दूसरे कोधिक्कारने लगे |
तब वे निकट आकर जोड़ियों के रूप में आमने-सामने लड़ने लगे |
युयोध बलिरिन्द्रेण तारकेण गुहोस्यत |
वरुणो हेतिनायुध्यन्मित्रो राजन्प्रहेतिना ॥
२८ ॥
युयोध--भिड़ गये; बलि:--महाराज बलि; इन्द्रेण--इन्द्र से; तारकेण--तारक से; गुहः--कार्तिकेय; अस्यत--युद्ध में व्यस्त;वरुण:--वरुण देव; हेतिना--हेति से; अयुध्यत्--एक दूसरे से लड़े; मित्र:--मित्र देवता; राजन्--हे राजा; प्रहेतिना--प्रहेतिसे
हे राजा! महाराज बलि इन्द्र से, कार्तिकेय तारक से, वरुण हेति से तथा मित्र प्रहेति से भिड़गये |
यमस्तु कालनाभेन विश्वकर्मा मयेन वै |
शम्बरो युयुधे त्वष्टा सवित्रा तु विरोचन: ॥
२९॥
यमः--यमराज; तु--निस्सन्देह; कालनाभेन--कालनाभ से; विश्वकर्मा--विश्वकर्मा; मयेन--मय से; बै--निस्सन्देह; शम्बर:--शम्बर ने; युयुधे--युद्ध किया; त्वष्टा--त्वष्टा से; सवित्रा--सूर्यदेव से; तु--निस्सन्देह; विरोचन:--विरोचन असुर ने |
यमराज कालनाभ से, विश्वकर्मा मय दानव से, त्वष्टा शम्बर से तथा सूर्यदेव विरोचन सेलड़ने लगे |
अपराजितेन नमुचिरश्चिनौ वृषपर्वणा |
सूर्यो बलिसुतैर्देवो बाणज्येप्ठै: शतेन च ॥
३०॥
राहुणा च तथा सोम: पुलोम्ना युयुधेडनिलः |
निशुम्भशुम्भयोदेवी भद्रकाली तरस्विनी ॥
३१॥
अपराजितेन--अपराजित देवता से; नमुचिः--नमुचि असुर ने; अश्विनौ--अश्विनी कुमारों ने; वृषपर्वणा--वृषपर्वा दैत्य के साथ;सूर्य:--सूर्य देव ने; बलि-सुतैः--बलि के पुत्रों के साथ; देव:--देवता; बाण--्येष्ठै:--जिनमें बाण प्रमुख है; शतेन--एक सौ;च--तथा; राहुणा--राहु से; च-- भी; तथा--और ; सोम: --चन्द्रदेव ने; पुलोम्ना--पुलोमा के साथ; युयुधे--युद्ध किया;अनिलः--वायु देव; निशुम्भ--निशुम्भ असुर; शुम्भयो: --शुम्भ के साथ; देवी --देवी दुर्गा ने; भद्रकाली-- भद्गरकाली ;तरस्विनी--अत्यन्त शक्तिशाली |
अपराजित देवता ने नमुचि असुर के साथ तथा दोनों अश्विनी कुमारों ने वृषपर्वा के साथयुद्ध किया |
सूर्यदेव महाराज बलि के सौ पुत्रों से भिड़ गये जिनमें बाण प्रमुख था |
चन्द्रदेव नेराहु से लड़ाई की |
वायुदेव ने पुलोमा से तथा शुम्भ और निशुम्भ ने अत्यन्त शक्तिशाली मायाभद्गरकाली नामक दुर्गादिवी से युद्ध किया |
वृषाकपिस्तु जम्भेन महिषेण विभावसु: |
इल्वलः सह वातापिर्त्रह्पुत्रैररिन्दम ॥
३२॥
कामदेवेन दुर्मर्ष उत्तलो मातृभि: सह |
बृहस्पतिश्रोशनसा नरकेण शनैश्चर:ः ॥
३३॥
मरुतो निवातकवचे: कालेयैर्वसवोमरा: |
विश्वेदेवास्तु पौलोमै रुद्रा: क्रोधवशै: सह ॥
३४॥
वृषाकपि:--शिवजी; तु--निस्सन्देह; जम्भेन--जम्भ के साथ; महिषेण--महिषासुर से; विभावसु: --अग्निदेव; इल्बल:--इल्वल असुर; सह वातापि:--उसके भाई वातापि से; ब्रह्म-पुत्रैः --ब्रह्मा के पुत्रों के साथ, यथा वशिष्ठ से; अरिमू-दम--हेशत्रुओं के दमनकर्ता, महाराज परीक्षित; कामदेवेन--कामदेव से; दुर्मर्ष:--दुर्मर्ष; उत्कलः--उत्कल ने; मातृभि: सह--मातृकानामक देवियों के साथ; बृहस्पति:--बृहस्पति देवता ने; च--तथा; उशनसा--शुक्राचार्य से; नरकेण--नरकासुर से;शनैश्वरः--शनि देवता ने; मरुत:--वायु के देवता; निवातकवचै:--निवातकवच असुर से; कालेयै:--कालकेयों से; वसवःअमराः--वसुओं ने युद्ध किया; विश्वेदेवा:--विश्वेदेवों ने; तु--निस्सन्देह; पौलोमैः--पौलोमों के साथ; रुद्रा:--ग्यारह रुद्रों ने;क्रोधवशै: सह--क्रो धवश दानवों के साथ |
हे अरिन्दम महाराज परीक्षित! शिवजी ने जम्भ से तथा विभावसु ने महिषासुर से युद्ध किया |
इल्वल ने, अपने भाई वातापि सहित, ब्रह्मा के पुत्रों से युद्ध किया |
दुर्मर्ष कामदेव से, उत्कलमातृका नामक देवियों से, बृहस्पति शुक्राचार्य से तथा शनैश्चर नरकासुर से युद्ध में भिड़ गए |
मरुत्गण निवातकबच से, वसुओं ने दैत्य कालकेयों से, विश्वेदेवों ने पौलोमों असुरों से तथारुद्रगणों ने क्रुद्ध क्रोधवश असुरों से युद्ध किया |
त एवमाजावसुरा: सुरेन्द्रादन्द्देन संहत्य च युध्यमाना: |
अन्योन्यमासाद्य निजध्नुरोजसाजिगीषवस्तीक्ष्णशरासितोमर: ॥
३५॥
ते--वे सभी; एवम्--इस प्रकार; आजौ--युद्धक्षेत्र में; असुरा:--असुरगण; सुर-इन्द्राः--तथा देवता; द्वन्द्देन--दो-दो करके;संहत्य--परस्पर मिलकर; च--तथा; युध्यमाना: --युद्ध करते हुए; अन्योन्यम्--एकदूसरे से; आसाद्य--पास आकर;निजघ्नु:--हथियारों से मार डाला; ओजसा--अ त्यन्त बलपूर्वक; जिगीषव:--विजय की कामना करते हुए; तीक्ष्ण--तेज;शर--बाणों से; असि--तलवारों से; तोमरैः--भालों से |
ये सारे देवता तथा असुर लड़ने के उत्साह से युद्धभूमि में एकत्र हुए और अत्यन्त बलपूर्वकएक दूसरे पर प्रहार करने लगे |
वे सब विजय की कामना करते हुए जोड़े बनाकर लड़ने लगेऔर तेज बाणों, तलवारों तथा भालों से बुरी तरह एक दूसरे को मारने लगे |
भुशुण्डिभिश्चक्रगदर्ष्रिपट्टिशै:शक्त्युल्मुकै: प्रासपरश्रथेरपि |
निम्त्रिशभल्लै: परिघै: समुदगरैःसभिन्दिपालैश्व शिरांसि चिच्छिदु; ॥
३६॥
भुशुण्डिभि:-- भुशुण्डि नामक हथियारों से; चक्र--चक्र से; गदा--गदा से; ऋष्टि--ऋष्टि अस्त्रों से; पद्टिशै:--पद्टिश शस्त्र से;शक्ति--शक्ति शस्त्रों से; उल्मुकै:ः--उल्मुक नामक श्त्रों से; प्रास--प्रास शस्त्र से; परश्रथैः--पर श्रध शस्त्रों से; अपि-- भी;निस्त्रिश--निस्त्रिश शस्त्रों से; भल्लै:ः-- भालों से; परिधैः--परिधों शस्त्र से; स-मुद्गरैः--मुद्गरों से; स-भिन्दिपालै:--भिन्दिपाल शस्त्रों से; च-- भी; शिरांसि--सिरों को; चिच्छिदु:--काट लिया |
उन्होंने भुशुण्डि, चक्र, गदा, ऋष्टि, पट्टिश, शक्ति, उल्मुक, प्रास, परश्चध, निः्त्रिश, भाला,'परिघ, मुद्गर तथा भिन्दिपाल नामक हथियारों से एक दूसरे के सिर काट डाले |
गजास्तुरड्राः सरथा: पदातय: सारोहवाहा विविधा विखण्डिता: |
निकृत्तबाहूर॒ुशिरोधराड्य्रय-शिछन्नध्वजेष्वासतनुत्रभूषणा: ॥
३७॥
गजा:--हाथी; तुरड्राः--घोड़े; स-रथा: --रथों सहित; पदातयः--पैदल सैनिक; सारोह-वाहा:--सवारों सहित वाहन;विविधा:--विविध प्रकार के; विखण्डिता:--खण्ड-खण्ड हुए; निकृत्त-बाहु--कटी हुई भुजाएँ; ऊरु--जाँघें; शिरोधर--गर्दन; अड्घ्रय:--टांगे; छिन्न--कटकर अलग; ध्वज--झंडा; इष्वास--धनुष; तनुत्र--कवच; भूषणा:--गहने, आभूषण |
हाथी, घोड़े, रथ, सारथी, पैदल सेना तथा सवारों सहित विविध प्रकार के वाहन ध्वस्त होगये |
सैनिकों की भुजाएँ, जांघें, गर्दन तथा टांगे कट गईं और उनके झंडे, धनुष, कवच तथाआभूषण छिन्न-भिन्न हो गये |
तेषां पदाघातरथाडुचूर्णिता-दायोधनादुल्बण उत्थितस्तदा |
रेणुर्दिश: खं द्युमणिं च छादयन्न्यवर्ततासृक्स्त्रुतिभि: परिप्लुतातू ॥
३८॥
तेषाम्--युद्धक्षेत्र में लगे सारे; पदाघात--असुरों तथा देवताओं के पैरों के प्रहार से; रथ-अड्भग--तथा रथों के पहिए;चूर्णितात्--चूर्णित हुए; आयोधनात्--युद्धभूमि से; उल्बण:--अत्यन्त शक्तिशाली; उत्थितः--उठते हुए; तदा--उस समय;रेणु:--धूल के कण; दिश:--सभी दिशाएँ; खम्--बाह्य आकाश; द्युमणिम्--सूर्य तक; च--भी; छादयन्--ढकते हुए;न्यवर्तत--हवा में तैरना बन्द कर दिया; असृक्ू--रक्त के; स्त्रुतिभिः--कणों के द्वारा; परिप्लुतात्ू--दूर दूर तक छिड़के जानेसे |
भूमि पर देवताओं तथा असुरों के पाँवों तथा रथों के पहियों के आघात से आकाश में तेजीसे धूल के कण उड़ने लगे और धूल का बादल छा गया जिससे सूर्य तक का सारा बाह्य आकाशचारों ओर से ढक गया |
किन्तु जब धूल कणों के पश्चात् रक्त की बूँदें सारे आकाश में फुहार कीतरह उठने लगीं तो धूल के बादलों का आकाश में मँडराना बन्द हो गया |
शिरोभिरुद्धृूतकिरीटकुण्डलै:संरम्भदग्भि: परिदृष्टदच्छदे: |
महाभुजै: साभरणैः सहायुधे:सा प्रास्तृता भू: करभोरुभिर्बभौ ॥
३९॥
शिरोभि:--सिरों से; उद्धूत--पृथक्, फैली हुईं; किरीट--मुकुट; कुण्डलैः--तथा कान के आभूषणों से; संरम्भ-हग्भि:--क्रोधसे घूरती आँखें ( यद्यपि सिर शरीर से छिन्न थे ); परिदष्ट--दाँतों से काटे गये; दच्छदैः--ओठ; महा-भुजैः--बड़ी-बड़ी बाँहों से;स-आभरणै:--आभूषणों से सजी; सह-आयुधै:--तथा हाथों में हथियार लिये, यद्यपि हाथ छिन्न हो चुके थे; सा--वहयुद्धक्षेत्र; प्रास्तृता--बिखरे; भू:--युद्धक्षेत्र; करभ-ऊरुभि:--पांव तथा जाँघें हाथी की सूँड़ों जैसी; बभौ--हो गई |
युद्ध के दौरान युद्धभूमि वीरों के कटे सिरों से पट गई |
उनकी आँखें अब भी घूर रही थींऔर क्रोध से उनके दाँत उनके होठों से लगे हुए थे |
इन छिन्न सिरों के मुकुट तथा कुण्डल बिखरगये थे |
इसी प्रकार आभूषणों से सज्जित तथा विविध हथियार पकड़े हुईं अनेक भुजाएँ इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं और हाथी की सूँडों जैसे अनेक टांगे तथा जाँघें भी इसी तरह बिखरी हुईथीं |
कबलच्धास्तत्र चोत्पेतु: पतितस्वशिरोउकश्षिभि: |
उद्यतायुधदोर्दण्डैराधावन्तो भटान्मृथे ॥
४०॥
कबन्धा:--धड़; तत्र--वहाँ ( युद्धभूमि में ); च-- भी; उत्पेतु:--उत्पन्न; पतित--गिरा हुआ; स्व-शिरः-अक्षिभि:--सिर कीआँखों से; उद्यत--उठाये; आयुध--हथियारों से युक्त; दोर्दण्डै:--जिसकी भुजाएँ; आधावन्त:ः--की ओर दौड़ती हुईं; भटानू--सैनिक; मृधे--युद्धभूमि में
उस युद्धभूमि में शीषरहित अनेक धड़ उत्पन्न हो गए थे |
बे प्रेततुल्य धड़ अपने हाथों मेंहथियार लिए, पड़े हुए सिरों की आँखों से देखकर शत्रु सैनिकों पर आक्रमण कर रहे थे |
बलिम॑हिन्द्रं दशभिस्त्रिभिरिरावतं शरैः |
चतुर्भिश्चतुरों बाहानेकेनारोहमार्च्छ॑यत् ॥
४१॥
बलि:--महाराज बलि; महा-इन्द्रमू--स्वर्ग का राजा; दशभि:--दस; त्रिभि:--तीन; ऐरावतम्--इन्द्र के वाहन ऐराबत को;शरैः--बाणों से; चतुर्भि: --चार बाणों से; चतुर:ः--चार; वाहानू--सवारों को; एकेन--एक से; आरोहम्ू--चालक को;आरच्छयत्--वार किया |
महाराज बलि ने तब दस बाणों से इन्द्र पर तथा तीन बाणों से इन्द्र के वाहन ऐरावत पर वारकिया |
उन्होंने चार बाणों से ऐरावत के पाँवों की रक्षा करने वाले चार घुड़सवारों पर आक्रमणकिया और एक बाण से उसके चालक पर |
स तानापतत: शक्रस्तावद्धिः शीघ्रविक्रम: |
चिच्छेद निशितैर्भल्लैरसम्प्राप्तान्हसन्निव ॥
४२॥
सः--वह ( इन्द्र )) तानू--उन बाणों को; आपतत:--उसकी ओर बढ़ते और गिरते हुए; शक्र:--इनद्र; तावद्द्धिः:--तुरन्त; शीघ्र-विक्रम: --तुरन्त सताये जाने के लिए अभ्यस्त; चिच्छेद--खण्ड-खण्ड कर डाला; निशितिः--अत्यन्त तेज; भल्लैः--अन्यप्रकार के बाण से; असम्प्राप्तान्ू--शत्रु के बाण पहुँचने से पहले; हसन् इब--मानो हँस रहा हो |
इसके पूर्व कि बलि महाराज के बाण स्वर्ग के राजा इन्द्र तक पहुँचे, बाणों के चलाने में पटुइन्द्र ने हँसते हुए एक अन्य प्रकार के अत्यन्त तीक्ष्ण भल्ल नामक बाण से उन्हें काट डाला |
तस्य कर्मोत्तिमं वीक्ष्य दुर्मर्ष: शक्तिमाददे |
तां ज्वलन्तीं महोल्काभां हस्तस्थामच्छिनद्धरि: ॥
४३॥
तस्य--इन्द्र के; कर्म-उत्तमम्--सैन्यकला में अत्यन्त दक्ष कार्य को; वीक्ष्य--देखकर; दुर्मर्ष:--अत्यन्त क्ुद्ध होकर; शक्तिम्--शक्ति नामक हथियार; आददे--ले लिया; ताम्--उस हथियार को; ज्वलन्तीमू--जलती आग; महा-उल्का-आभामू--महान्अग्नि पुंज की भाँति प्रकट होते हुए; हस्त-स्थाम्--जो अभी बलि के हाथ में ही था; अच्छिनत्--खण्ड-खण्ड कर डाला;हरिः-इन्द्र ने
जब बलि महाराज ने इन्द्र के दक्ष सैन्य कार्यकलापों को देखा तो वे अपना क्रोध रोक नसके |
उन्होंने शक्ति नामक एक दूसरा हथियार ग्रहण किया जो महान् अग्नि पुंज की भाँतिज्वलित हो रहा था |
किन्तु इन्द्र ने इसे बलि के हाथ से छूटने के पूर्व ही खण्ड-खण्ड कर दिया |
ततः शूलं ततः प्रासं ततस्तोमरमूष्टय: |
यद्यच्छरत्रं समादद्यात्सर्व तदच्छिनद्विभु: ॥
४४॥
ततः--तत्पश्चात्; शूलम्-- भाला; तत:--त त्पश्चात्; प्रासम्--प्रास; ततः--तत्पश्चात्; तोमरम्--तोमर; ऋष्टय: --ऋष्टि नामकहथियारों; यत् यत्ू--जो-जो; शस्त्रमू-हथियार; समादद्यात्ू--बलि ने प्रयोग करने चाहे; सर्वम्ू--उन सब को; तत्--वे हीहथियार; अच्छिनत्ू--खण्ड-खण्ड कर दिये; विभुः--महान् इन्द्र ने ॥
तत्पश्चात् बलि महाराज ने एक-एक करके भाला, प्रास, तोमर, ऋष्टि तथा अन्य हथियारचलाये, किन्तु वे जो भी हथियार लेते थे, उन्हें महान् इन्द्र तुरन्त ही खण्ड-खण्ड कर देते थे |
ससर्जाथासुरीं मायामन्तर्धानगतोसुरः |
ततः प्रादुरभूच्छैल: सुरानीकोपरि प्रभो ॥
४५॥
ससर्ज--छोड़ा; अथ--अब; आसुरीम्--दानवी; मायाम्--माया को; अन्तर्धान--दृष्टि से ओझल; गत:--जाकर; असुर:--बलि महाराज; ततः--तत्पश्चात्; प्रादुरभूत्ू--प्रकट हुआ; शैल:--एक विशाल पर्वत; सुर-अनीक-उपरि--देवताओं की सेना केसिरोंके ऊपर; प्रभो--हे स्वामी |
हे राजा! तब बलि महाराज अदृश्य हो गये और उन्होंने आसुरी माया का सहारा लिया |
तबदेवताओं की सेना के सिरों के ऊपर माया से उत्पन्न एक विशाल पर्वत प्रकट हुआ |
ततो निपेतुस्तरवो दह्ममाना दवाग्निना |
शिला: सटछ्डुशिखराश्रूर्णयन्त्यो द्विषद्बलम् ॥
४६॥
ततः--उस महान पर्वत से; निपेतु:--गिरने लगे; तरव:--बड़े-बड़े वृक्ष; दह्ममाना:--अग्नि से जलकर; दव-अग्निना--जंगलकी आग से; शिला:--तथा पत्थर; स-टड्ढू-शिखरा:--पत्थर की कुल्हाड़ी जैसी तीक्ष्ण धार वाले; चूर्णयन्त्य:--चूर-चूर करते;द्विषत्-बलम्-शत्रुओं की शक्ति को |
उस पर्वत से दावाग्नि से जलते हुए वृक्ष गिरने लगे |
उससे पत्थर की कुल्हाड़ी जैसी तीक्ष्णधार वाले पत्थर-खण्ड भी गिरने लगे जिससे देवताओं के सैनिकों के सिर चकनाचूर हो गये |
महोरगाः समुत्पेतुर्दन्दशूका: स्वृश्चिका: |
सिंहव्याप्रवराहाश्व मर्दयन्तो महागजा: ॥
४७॥
महा-उरगा:--बड़े-बड़े साँप; समुत्पेतु:--उन पर गिरने लगे; दन्दशूका:--अन्य विषैले पशु तथा कीड़े; स-वृश्चिका:--बिच्छुओंसहित; सिंह--शेर; व्याप्र--बाघ; वराहा: च--तथा जंगली सूअर; मर्दयन्त:--मर्दन करते हुए; महा-गजा:--बड़े-बड़े हाथी |
देवताओं के सैनिकों पर बिच्छू, बड़े-बड़े सर्प तथा अन्य अनेक विषैले पशुओं के साथ-साथ सिंह, बाघ, सूअर तथा बड़े-बड़े हाथी गिरने लगे और हर वस्तु को चकनाचूर करने लगे |
यातुधान्यश्व शतशः शूलहस्ता विवासस: |
छिन्धि भिन्धीति वादिन्यस्तथा रक्षोगणा: प्रभो ॥
४८ ॥
यातुधान्य:--मानव भक्षी असुरनियाँ; च--तथा; शतशः--सैकड़ों; शूल-हस्ता:--सभी हाथों में त्रिशूल लिए; विवासस:--पूर्णनग्न; छिन्धि--खण्ड-खण्ड कर डालो; भिन्धि--छेद डालो; इति--इस प्रकार; वादिन्य:--बातें करते; तथा--इस तरह; रक्ष:-गणा:--राक्षसगण; प्रभो--हे राजा |
हे राजा! तब कई सौ नरभक्षी नर और मादा असुर, जो पूर्णतया नग्न थे और अपने हाथों मेंत्रिशूल लिए थे ‘काट डालो! छेद डालो! ' के नारे लगाते हुए प्रकट हुए |
'ततो महाघना व्योम्नि गम्भीरपरुषस्वना: |
अड्जारान्मुमुचुर्वातिराहता: स्तनयित्तवः ॥
४९॥
ततः--तत्पश्चात्८ महा-घना:--बड़े-बड़े बादल; व्योम्नि--आकाश में; गम्भीर-परुष-स्वना: -- अत्यन्त गहरी गड़गड़ाहट उत्पन्नकरते; अड्जारान्--अंगारों को; मुमुचु:--गिराया; वातैः--प्रबल वायु से; आहता:--प्रताड़ित; स्तनयित्तवः--मेघ गर्जना से |
तब आकाश में प्रबल वायु से प्रताड़ित घनघोर घटाएँ प्रकट हो आईं |
वे गम्भीर गर्जनाकरती हुईं जलते कोयलों के अंगारे बरसाने लगीं |
सूष्टो दैत्येन सुमहान्वह्विः श्रसनसारथि: |
सांवर्तक इवात्युग्रो विबुधध्वजिनीमधाक्ू ॥
५०॥
सृष्ट:--उत्पन्न; दैत्येन--असुर ( बलि महाराज ) द्वारा; सु-महान्ू--अत्यन्त विशाल, विनाशकारी; वह्विः--अग्नि; श्वसन-सारथि:ः--तेज हवा के द्वारा ले जाई जाकर; सांवर्तकः--सांवर्तक नामक अग्नि जो प्रलय के समय प्रकट होती है; इब--सहश;अति--अत्यन्त; उग्र: --प्रचण्ड; विबुध--देवताओं के; ध्वजिनीम्--सैनिकों को; अधाक्ू--जलाकर राख कर दिया
महाराज बलि द्वारा उत्पन्न की गई अत्यन्त संहारक अग्नि देवताओं के सभी सैनिकों कोजलाने लगी |
यह अग्नि तेज बहती हवाओं के साथ उस सांवर्तक अग्नि जैसी प्रतीत हो रही थीजो प्रलय के समय प्रकट होती है |
ततः समुद्र उद्ेल: सर्वतः प्रत्यटश्यत |
प्रचण्डवातैरुद्धृततरज्ञावर्तभीषण: ॥
५१॥
ततः--तत्पश्चात्; समुद्र: --समुद्र; उद्देल: -- क्षुब्ध होकर; सर्वतः--चारों ओर; प्रत्यहश्यत--हर एक की दृष्टि के सामने दिखनेलगा; प्रचण्ड--भयानक; वातैः--हवा से; उद्धृत-- क्षुब्ध; तरड़--लहरों का; आवर्त--भौँवर; भीषण:-- भीषण
तत्पश्चात् हवाओं के प्रचण्ड झकोरों से क्षुब्ध समुद्री लहरें तथा भँवर सब की आँखों केसामने एक भीषण बाढ़ के रूप में चारों ओर प्रकट हो आए |
एवं दैत्यैर्महामायैरलक्ष्यगतिभी रणे |
सृज्यमानासु मायासु विषेदु; सुरसैनिका: ॥
५२॥
एवम्--इस प्रकार; दैत्यैः--असुरों के द्वारा; महा-मायैः--मायावी कार्यो में दक्ष; अलक्ष्य-गतिभि:--किन्तु अदृश्य; रणे--युद्धमें; सृज्यमानासु मायासु--ऐसे मायावी वातावरण की सृष्टि होने से; विषेदु:--खिन्न हो गये; सुर-सैनिका: --देवताओं केसैनिक
जब ऐसे मायावी कार्यों में दक्ष अहृश्य असुरों द्वारा युद्ध में इस तरह का जादुई वातावरणउत्पन्न किया जा रहा था, तो देवताओं के सैनिक खिन्न हो गये |
न तत्प्रतिविधि यत्र विदुरिन्द्रादयो नूप |
ध्यातः प्रादुरभूत्तत्र भगवान्विश्वभावन: ॥
५३॥
न--नहीं; तत्-प्रतिविधिम्--ऐसे मायावी वातावरण की प्रतिक्रिया; यत्र--जहाँ; विदु:--समझ सके; इन्द्र-आदय:--इन्द्रइत्यादि देवता; नृप--हे राजा; ध्यातः--ध्यान किये जाने पर; प्रादुरभूत्-प्रकट हुए; तत्र--उस स्थान पर; भगवान्-- भगवान्;विश्व-भावन:--ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा
हे राजा! जब देवताओं को असुरों के कार्यो का निराकरण कर पाने का कोई उपाय न सूझातो उन्होंने ब्रह्माण्ड के स्त्रष्ठा भगवान् का पूर्ण मनोयोग से ध्यान किया और वे तुरन्त ही प्रकट होगये |
ततः सुपर्णांसकृताड्प्रिपललव:पिशड्रवासा नवकझ्जलोचन: |
अदृश्यताष्टायुधबाहुरुल्लस-च्छीकौस्तुभानर्घष्यकिरीटकुण्डल: ॥
५४॥
ततः--तत्पश्चात्; सुपर्ण-अंस-कृत-अड्प्रि-पललव: -- भगवान्, जिनके चरणकमल गरुड़ के दोनों कंधों पर फैले रहते हैं;पिशड्र-वासा:--जिनके वस्त्र पीले हैं; नव-कञ्ज-लोचन:--तथा जिनके नेत्र नवीन खिले कमल की पंखुड़ियों के तुल्य हैं;अदृश्यत--दृष्टिगोचर हो गए ( देवताओं के समक्ष ); अष्ट-आयुध--आठ प्रकार के आयुधों से युक्त; बाहु:--बाहें; उललसत्--झलमलाते; श्री--लक्ष्मी; कौस्तुभ--कौस्तुभ मणि; अनर्घ्य--अगणनीय मूल्य का; किरीट--मुकुट; कुण्डल:--कुण्डलपहने |
नवविकसित कमल की पंखुड़ियों सहश आँखों वाले भगवान् गरुड़ की पीठ पर बैठे थेऔर गरुड़ के कंधों पर अपने चरणकमल फैलाये थे |
वे पीत वस्त्र धारण किये, कौस्तुभ मणितथा लक्ष्मीजी से सुसज्जित एवं अमूल्य मुकुट तथा कुण्डल पहने अपनी आठों भुजाओं मेंविविध आयुध धारण किये देवताओं को दृष्टिगोचर हुए |
तस्मिन्प्रविष्टेडसुरकूटकर्मजामाया विनेशुर्महिना महीयस: |
स्वप्नो यथा हि प्रतिबोध आगतेहरिस्मृतिः सर्वविपद्दिमोक्षणम् ॥
५५॥
तस्मिन् प्रविष्ट-- भगवान् के प्रवेश करने पर; असुर--असुरों का; कूट-कर्म-जा--जादू भरे कार्यों से; माया--छड्ा अभिव्यक्ति;विनेशु:--तुरन्त नष्ट हो गये; महिना-- श्रेष्ठ शक्ति द्वारा; महीयस:-- भगवान् का जो महानतम से भी महान् हैं; स्वप्न:--सपने;यथा--जिस तरह; हि--निस्सन्देह; प्रतिबोधे--जगने पर; आगते--आ गया है; हरि-स्मृतिः-- भगवान् की स्मृति; सर्व-विपत्--सभी प्रकार की विपदाओं से; विमोक्षणम्--तुरन्त मुक्त कर देती है |
जिस प्रकार स्वप्न देखने वाले के जगते ही स्वप्न के भय दूर हो जाते हैं उसी तरह युद्धभूमिमें भगवान् के प्रवेश करते ही उनकी दिव्य शक्ति से असुरों की जादूगरी से उत्पन्न माया विलीनहो गई |
निस्सन्देह, भगवान् के स्मरण मात्र से मनुष्य सारे संकटों से मुक्त हो जाता है |
इृष्ठा मृथे गरडवाहमिभारिवाहआविध्य शूलमहिनोदथ कालनेमि: |
तल्लीलया गरुडमूर्थ्नि पतद्गृहीत्वातेनाहनन्नूप सवाहमरिं त्यधीश: ॥
५६॥
इष्ठा--देखकर; मृधे--युद्धस्थल में; गरूड-वाहम्--गरुड़ द्वारा ले जाए गए भगवान्; इभारि-वाह:--महान् सिंह द्वारा ले गयाअसुर; आविध्य--घुमा कर; शूलम्-त्रिशूल को; अहिनोत्--उस पर छोड़ा; अथ--इस प्रकार; कालनेमि:--कालनेमि असुरने; तत्ू-- भगवान् पर असुर द्वारा ऐसा प्रहार; लीलया--आसानी से; गरुड-मूर्ध्नि--गरुड़ के सिर पर; पतत्--गिरते हुए;गृहीत्वा--तुरन्त सहज रूप से पकड़ कर; तेन--उसी हथियार से; अहनत्--मार डाला; नृप--हे राजा; स-वाहम्--अपने वाहनसमेत; अरिम्--शत्रु को; त्रि-अधीश: --तीनों लोकों के स्वामी भगवान् ने |
हे राजा! जब सिंह पर आरूढ़ कालनेमि दैत्य ने देखा कि गरुड़वाहन भगवान् युद्धक्षेत्र में हैं,तो उसने तुरन्त अपना त्रिशूल निकाल लिया और उसे गरुड़ के सिर पर चलाया |
किन्तु तीनों लोकों के स्वामी भगवान् हरि ने तुरन्त ही उस त्रिशूल को पकड़ लिया और उसी हथियार सेअपने शत्रु कालनेमि को उसके वाहन सिंह समेत मार डाला |
माली सुमाल्यतिबलौ युधि पेततुर्य-च्यक्रेण कृत्तशिरसावथ माल्यवांस्तम् |
आहत्य तिग्मगदयाहनदण्डजेन्द्रंतावच्छिरोच्छिनदरेनदतोरिणाह्य: ॥
५७॥
माली सुमाली--माली तथा सुमाली नामक दो असुर; अति-बलौ--अत्यन्त शक्तिशाली; युधि--युद्धस्थल में; पेततु:--गिर गये;यत्-चक्रेण--जिसके चक्र से; कृत्त-शिरसौ--छिन्न सिरों वाले; अथ--तत्पश्चात्; माल्यवान्--माल्यवान्; तम्-- भगवान् को;आहत्य--आक्रमण करके; तिग्म-गदया--अत्यन्त नुकीली गदा से; अहनत्--मार डालना चाहा; अण्ड-ज-इन्द्रमू--अण्डों सेउत्पन्न पक्षियों के राजा, गरुड़ ने; तावतू--उस समय; शिर:--सिर; अच्छिनत्--काट लिया; अरेः--शत्रु का; नदतः--शेर जैसेदहाड़ता; अरिणा--चक्र से; आद्यः--आदि
भगवान् नेतत्पश्चात् भगवान् ने माली तथा सुमाली नामक दो शक्तिमान असुरों को मारा |
उन्होंने अपनेचक्र से उनके सिर काट दिये |
तब एक अन्य असुर माल्यवान ने भगवान् पर आक्रमण किया |
उसने अपनी नुकीली गदा से, सिंह की भाँति गर्जना करते हुए, अण्डो से उत्पन्न पक्षिराज गरुड़पर आक्रमण किया |
किन्तु आदि पुरुष भगवान् ने अपने चक्र का प्रयोग करते हुए उस शत्रु केसिर को भी काट दिया |
