← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 8 की सूची

अध्याय नौ: भगवान मोहिनी-मूर्ति के रूप में अवतार लेते हैं

8.9श्रीशुक उबाचतेउन्योन्यतोसुराः पात्र हरन्तस्त्यक्तसौहदा: |

क्षिपन्तोदस्युधर्माण आयान्तीं दहशु: स्त्रियम्‌ ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; ते--वे असुर; अन्योन्यतः--परस्पर; असुरा:--असुरगण; पात्रम्‌ू--अमृत काबर्तन; हरन्त:--एक दूसरे से छीनते हुए; त्यक्त-सौहदा: --एक दूसरे के शत्रु बन गये; क्षिपन्त:--कभी-कभी फेंकते हुए; दस्यु-धर्माण:--कभी-कभी लुटेरों की तरह छीनते हुए; आयान्तीम्‌--आगे आते हुए; दहशु:--देखा; स्त्रियम्‌ू-- अत्यन्त सुन्दर तथाआकर्षक स्त्री को |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : तत्पश्चात्‌ असुर एक दूसरे के शत्रु बन गये |

उन्होंने अमृत पात्रको फेंकते और छीनते हुए अपना मैत्री-सम्बन्ध तोड़ लिया |

इसी बीच उन्होंने देखा कि एकअत्यन्त सुन्दर तरुणी उनकी ओर आ रही है |

अहो रूपमहो धाम अहो अस्या नवं वय: |

इति ते तामभिद्वुत्य पप्रच्छुर्जातहच्छया: ॥

२॥

अहो--कितना आश्चर्यजनक है; रूपमू--इसकी सुन्दरता; अहो--कितना अद्भुत है; धाम--इसकी शारीरिक कान्ति; अहो--कितना आर्श्रयजनक; अस्या:--इसका; नवम्‌--नयी; वय:--युवावस्था; इति--इस तरह; ते--वे असुर; ताम्‌--उस सुन्दर स्त्रीको; अभिद्वुत्य--तेजी से उसके समक्ष जाकर; पप्रच्छुः:--उससे पूछा; जात-हत्‌-शया:--उसका भोग करने की कामवासना सेभरे हुए हृदय

उस सुन्दरी को देखकर असुरों ने कहा : ओह! इसका सौन्दर्य कितना आश्चर्यजनक है,इसके शरीर की कान्ति कितनी अद्भुत है और इसकी तरुणावस्था का सौन्दर्य कितना उत्कृष्टहै! इस तरह कहते हुए वे उसका भोग करने की कामवासना से पूरित होकर तेजी से उसके पासपहुँच गये और उससे तरह-तरह के प्रश्न पूछने लगे |

का त्वं कझ्मपलाशाक्षि कुतो वा कि चिकीर्षसि |

'कस्यासि वद वामोरू मथ्नतीव मनांसि नः ॥

३॥

का--कौन; त्वम्‌-तुम हो; कञ्न-पलाश-अक्षि--कमल की पंखड़ियों जैसी आँखों वाली; कुतः--कहाँ से; वा--अथवा;किम्‌ चिकीर्षसि--तुम किस प्रयोजन से यहाँ आईं हो; कस्य--किसकी; असि--हो; वद--कृपया हमसे कहो; वाम-ऊरु--हेअद्वितीय सुन्दर जाँघों वाली; मथ्नती--विचलित करती हुई; इब--इस प्रकार; मनांसि--मनों को; नः--हमारे |

हे अद्भुत सुन्दरी बाला! तुम्हारी आँखें इतनी सुन्दर हैं कि वे कमल पुष्प की पंखड़ियों जैसीलगती हैं |

तुम आखिर हो कौन ? तुम कहाँ से आई हो ? यहाँ आने का तुम्हारा प्रयोजन क्या हैऔर तुम किसकी हो? हे अद्वितीय सुन्दर जाँघों वाली! हमारे मन तुम्हारे दर्शनमात्र से हीविचलित हो रहे हैं |

न वयं त्वामरदत्ये: सिद्धगन्धर्वचारणै: |

नास्पृष्टपूर्वां जानीमो लोकेशैश्व कुतो नृभि: ॥

४॥

न--नहीं; वयम्‌--हम; त्वा-- तुमको; अमरैः --देवताओं द्वारा; दैत्यैः --असुरों द्वारा; सिद्ध-सिद्धों द्वारा; गन्धर्व--गन्धर्वोंद्वारा; चारणैः--तथा चारणों द्वारा; न--नहीं; अस्पृष्ट-पूर्वाम--किसी के द्वारा कभी भी न तो भोगी गई न स्पर्श की गई;जानीम:--ठीक से जान लो; लोक-ईशै:--ब्रह्माण्ड के विभिन्न निर्देशकों द्वारा; च-- भी; कुत:ः-- क्या कहा जाये; नृभि:--मानव समाज द्वारा

मनुष्यों की कौन कहे, देवता, असुर, सिद्ध, गन्धर्व, चारण तथा ब्रह्माण्ड के विभिन्ननिर्देशक अर्थात्‌ प्रजापति तक इसके पूर्व तुम्हारा स्पर्श नहीं कर पाये |

ऐसा नहीं है कि हम तुम्हेंठीक से पहचान नहीं पा रहे हों |

नूनं त्वं विधिना सुभ्रू: प्रेषितासि शरीरिणाम्‌ |

सर्वेन्द्रियमन:प्रीतिं विधातुं सघुणेन किम्‌ ॥

५॥

नूनम्‌--निस्सन्देह; त्वमू--तुम; विधिना--विधाता द्वारा; सु-भ्ूू: --हे सुन्दर भौंहों वाली; प्रेषिता-- भेजी गई; असि--तुम हो;शरीरिणाम्‌ू--समस्त देहधारी जीवों का; सर्व--सभी; इन्द्रिय--इन्द्रियों; मनः--तथा मन को; प्रीतिम्‌ू-- अच्छी लगने वाली;विधातुम्‌--तृप्त करने के लिए; स-घृणेन--अपनी अहैतुकी कृपा से; किमू--क्या |

हे सुन्दर भौहों वाली सुन्दरी! निश्चय ही, विधाता ने अपनी अहैतुकी कृपा से तुम्हें हम लोगोंकी इन्द्रियों और मनों को प्रसन्न करने के लिए भेजा है |

क्या यह तथ्य नहीं है ? सा त्वं नः स्पर्धमानानामेकवस्तुनि मानिनि |

ज्ञातीनां बद्धवैराणां शं विधत्स्व सुमध्यमे ॥

६॥

सा--जैसी तुम हो; त्वम्‌--तुम; नः--हम सभी असुरों के; स्पर्धभानानामू--जो अधिकाधिक शत्रु बनते जा रहे हैं, उनके; एक-वस्तुनि--एक वस्तु में ( अमृत-पात्र में ); मानिनि--हे प्रतिष्ठित सुन्दरी; ज्ञातीनामू--अपने परिवार वालों में; बद्ध-वैराणाम्‌--अधिकाधिक शत्रु बनकर; शम्‌--कल्याण; विधत्स्व--सम्पन्न करो; सु-मध्यमे--हे पतली कमर वाली सुन्दरी |

इस समय हम लोग एक ही बात को--अमृत घट को--लेकर परस्पर शत्रुता में मग्न हैं |

यद्यपि हम एक ही कुल में उत्पन्न हुए हैं फिर भी हममें शत्रुता बढ़ती ही जा रही है |

अतएव हेक्षीण कटि वाली सुप्रतिष्ठित सुन्दरी! हमारी आपसे प्रार्थना है कि आप हमारे इस झगड़े कोनिपटाने की कृपा करें |

बय॑ कश्यपदायादा भ्रातरः कृतपौरुषा: ॥

विभजस्व यथान्यायं नेव भेदो यथा भवेत्‌ ॥

७॥

वयम्‌--हम सभी; कश्यप-दायादा:--कश्यप मुनि के वंशज; भ्रातरः--हम सभी भाई हैं; कृत-पौरुषा:--हम सभी समर्थ एवंदक्ष हैं; विभजस्व--जरा बाँट दें; यथा-न्यायम्‌--न्यायपूर्वक; न--नहीं; एव--निश्चय ही; भेदः--पक्षपात; यथा--जिस तरह;भवेत्‌--हो सके

हम सभी देवता तथा असुर दोनों ही एक ही पिता कश्यप की सन्तानें हैं और इस तरह सेभाई-भाई हैं |

किन्तु मतभेद के कारण हम अपना-अपना पराक्रम दिखला रहे हैं |

अतएव आपसेहमारी विनती है कि हमारे झगड़े का निपटारा कर दें और इस अमृत को हममें बराबर-बराबरबाँट दें |

इत्युपामन्त्रितो दैत्यैर्मायायोषिद्वपुहरि: |

प्रहस्य रुचिरापाड्रैनिरीक्षन्रिदमत्रवीत्‌ ॥

८॥

इति--इस प्रकार; उपामन्त्रितः--अनुरोध किये जाने पर; दैत्यै:--असुरों के द्वारा; माया-योषित्‌--मायावी स्त्री ने; वपुः हरिः --भगवान्‌ की अवतार; प्रहस्य--हँसते हुए; रुचिर--सुन्दर; अपाडरैः--स्त्री-सुलभ हाव भाव दिखा कर; निरीक्षन्‌--उनको देखतेहुए; इृदम्‌ू--ये शब्द; अब्रवीत्‌--कहे

असुरों द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किये जाने पर सुन्दरी का रूप धारण किये हुए भगवान्‌ हँसनेलगे |

फिर स्त्री-सुलभ मोहक हावभाव से उनकी ओर देखते हुए उस सुन्दरी ने इस प्रकार कहा |

श्रीभगवानुवाचकथं कश्यपदायादा: पुंश्चल्यां मयि सड्भता: |

विश्वासं पण्डितो जातु कामिनीषु न याति हि ॥

९॥

श्री-भगवान्‌ उबाच--मोहिनी-मूर्ति के रूप में भगवान्‌ ने कहा; कथम्‌--ऐसा कैसे है; कश्यप-दायादा: --तुम सभी कश्यपमुनि के वंशज हो; पुंश्चल्याम्‌--मनुष्यों के मनों को विचलित करने वाली वेश्या को; मयि--मेरी; सड्रता:--संगति में आये हो;विश्वासम्‌-विश्वास; पण्डित:--विद्वान; जातु--किसी भी समय; कामिनीषु--स्त्री में; न--नहीं; याति--होता है; हि--निस्सन्देह

मोहिनी-रूप भगवान्‌ ने असुरों से कहा : हे कश्यपमुनि के पुत्रो! मैं तो एक वेश्या हूँ |

तुमलोग किस तरह मुझ पर इतना विश्वास कर रहे हो ? विद्वान पुरुष कभी स्त्री पर विश्वास नहींकरते |

सालावृकाणां स्त्रीणां च स्वैरिणीनां सुरद्विष: |

सख्यान्याहुरनित्यानि नूत्ल॑ नूत्त॑ विचिन्वताम्‌ ॥

१०॥

सालावृकाणाम्‌--बन्दरों, सियारों तथा कुत्तों की; स्त्रीणाम्‌ च--तथा स्त्रियों की; स्वैरिणीनामू--विशेष रूप से स्वच्छन्द स्त्रियोंकी; सुर-द्विष:--हे असुरो; सख्यानि--मित्रता; आहुः--कही जाती है; अनित्यानि-- क्षणिक; नूलतम्‌ू--नये मित्र; नूल्तमू--नयेमित्र; विचिन्बताम्‌--चिन्तन करने वालों की |

हे असुरो! जिस प्रकार बन्दर, सियार तथा कुत्ते अपने यौन सम्बन्धों में अस्थिर होते हैं औरनित्य ही नया मित्र चाहते हैं उसी प्रकार जो स्त्रियाँ स्वच्छन्द होती हैं ( स्वैरिणी ) वे नित्य नयामित्र ढूँढती हैं |

ऐसी स्त्री की मित्रता कभी स्थायी नहीं होती |

यह विद्वानों का अभिमत है |

श्रीशुक उबाचइति ते #्ष्वेलितैस्तस्था आश्वस्तमनसोसुरा: |

जहसुर्भावगभ्भीरं ददुश्चामृतभाजनम्‌ ॥

११॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; ते--वे असुर; क्ष्वेलितैः--परिहास करने से; तस्या: --मोहिनी-मूर्ति के; आश्वस्त--कृतज्ञ, विश्वास युक्त; मनसः --मनों से; असुरा:--सारे असुर; जहसु:--हँस पड़े; भाव-गम्भीरम्‌--यद्यपि मोहिनी-मूर्ति गम्भीर थी; ददुः--दे दिया; च-- भी; अमृत-भाजनम्‌--अमृत का पात्र

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : मोहिनी-मूर्ति के परिहासपूर्ण शब्द सुनकर सारे असुरअत्यधिक आश्वस्त हुए |

वे गम्भीर रूप से हँस पड़े और अन्ततः उन्होंने वह अमृत घट उसके हाथोंमें थमा दिया |

ततो गृहीत्वामृतभाजनं हरि-बैभाष ईषत्स्मितशोभया गिरा |

यद्यभ्युपेत॑ कब च साध्वसाधु वाकृतं मया वो विभजे सुधामिमाम्‌ ॥

१२॥

ततः--तत्पश्चात्‌; गृहीत्वा--लेकर; अमृत-भाजनम्‌--अमृत-पात्र को; हरिः--मोहिनी के रूप में हरि ने; बभाष--कहा;ईषत्‌--कुछ-कुछ; स्मित-शोभया गिरा--हँसती अदा से तथा शब्दों से; यदि--यदि; अभ्युपेतम्‌--स्वीकार करने का वचन;क्‍्व च--जो भी हो; साधु असाधु वा--अच्छा या बुरा; कृतम्‌ मया--मेरे द्वारा किया गया; व: --तुम्हारे लिए; विभजे--तुम्हेंसमुचित भाग प्रदान करूँगी; सुधाम्‌--अमृत को; इमामू--इस |

तत्पश्चात्‌ अमृत घट को अपने हाथ में लेकर भगवान्‌ थोड़ा मुस्काये और फिर आकर्षकशब्दों में बोले |

उस मोहिनी-मूर्ति ने कहा : मेरे प्रिय असुरो! मैं जो कुछ भी करूँ, चाहे वह खराहो या खोटा, यदि तुम उसे स्वीकार करो तब मैं इस अमृत को तुम लोगों में बाँटने का उत्तरदायित्व ले सकती हूँ |

इत्यभिव्याहतं तस्या आकर्ण्यासुरपुड्रवा: |

अप्रमाणविदस्तस्यास्तत्तथेत्यन्वमंसत ॥

१३॥

इति--इस प्रकार; अभिव्याहतम्‌--कहे गये शब्द; तस्या:--उसके ; आकर्ण्य--सुनकर; असुर-पुड्रवा: --असुरों में प्रधान;अप्रमाण-विदः--चूँकि वे सभी मूर्ख थे; तस्या:--उसका; तत्‌--वे वचन; तथा--ऐसा ही हो; इति--इस प्रकार; अन्वमंसत--स्वीकार करने के लिए राजी हो गये |

असुरों के प्रधान निर्णय लेने में अधिक पटु नहीं थे |

अतएव मोहिनी मूर्ति के मधुर शब्दों कोसुनकर उन्होंने तुरन्त हामी भर दी और कहा ‘हाँ, आपने जो कहा है, वह बिल्कुल ठीक है |

'इस तरह असुर उसका निर्णय स्वीकार करने के लिए राजी हो गए |

अथोपोष्य कृतस्नाना हुत्वा च हविषानलम्‌ |

दत्त्वा गोविप्रभूते भ्य: कृतस्वस्त्ययना द्विजै: ॥

१४॥

यथोपजोषं वासांसि परिधायाहतानि ते |

कुशेषु प्राविशन्सर प्रागग्रेष्वभिभूषिता: ॥

१५॥

अथ--तत्पश्चात्‌; उपोष्य--उपवास रखकर; कृत-स्नाना:--स्नान करके; हुत्वा--आहुति डालकर; च--भी; हविषा--घी से;अनलमू--अगिन में; दत्त्ता--दान देकर; गो-विप्र-भूते भ्य: --गायों, ब्राह्मणों तथा समस्त जीवों को; कृत-स्वस्त्ययना:--विधि-विधान सम्पन्न करके; द्विजै:ः--ब्राह्मणों के द्वारा निश्चित; यथा-उपजोषम्‌-- अपनी रुचि के अनुसार; वासांसि--वस्त्र;'परिधाय--पहन कर; आहतानि--उत्तम तथा नवीन; ते--वे सब; कुशेषु--कुश से बने आसनों पर; प्राविशन्‌--बैठकर; सर्वे--सभी; प्राक््‌-अग्रेषु--पूर्व की ओर मुख करके; अभिभूषिता:--ठीक से आभूषणों से अलंकृत होकर

तब असुरों तथा देवताओं ने उपवास किया |

स्नान करने के बाद उन्होंने अग्नि में घी कीआहुतियाँ डाली और गायों, ब्राह्मणों तथा समाज के अन्य वर्णो--श्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों--को उनकी पात्रता के अनुसार दान दिया |

तत्पश्चात्‌ असुरों तथा देवों ने ब्राह्मणों के निर्देशानुसारअनुष्ठान सम्पन्न किये |

तब अपनी रुचि के अनुसार नये वस्त्र धारण किये, आभूषणों से अपने-अपने शरीरों को अलंकृत किया और वे पूर्व-दिशा की ओर मुख करके कुशासनों पर बैठ गये |

प्राड्मुखेषूपविष्टेषु सुरेषु दितिजेषु च |

धूपामोदितशालायां जुष्टायां माल्यदीपकै: ॥

१६॥

तस्यां नरेन्द्र करभोरुरुशहुकूल-श्रोणीतटालसगतिर्मदविह्ललाक्षी |

सा कूजती कनकनूपुरशिज्ितेनकुम्भस्तनी कलसपाणिरथाविवेश ॥

१७॥

प्राकू-मुखेषु--पूर्व की ओर मुँह किये; उपविष्टेषु--अपने-अपने आसनों पर बैठे; सुरेषु--सारे देवताओं में; दिति-जेषु--असुरोंमें; च-- भी; धूप-आमोदित-शालायाम्‌--रंगभूमि ( सभा-मंडप ) जो धूप के धुएँ से पूर्ण थी; जुष्टायाम्‌--पूर्णतया सजी हुई;माल्य-दीपकै:--फूलों की मालाओं तथा दीपकों से; तस्याम्‌--उस रंगभूमि ( सभा-मंडप ) में; नर-इन्द्र--हे राजा; करभ-ऊरुः--हाथी के सूँडों सहश जाँघों वाली; उशत्‌-दुकूल--अत्यन्त सुन्दर साड़ी पहने; श्रोणी-तट--गुरु नितम्बों के कारण;अलस-गतिः--धीरे-धीरे पग रखती; मद-विह्॒ल-अक्षी--जिसकी आँखें युवावस्था के गर्व से बेचैन थीं; सा--वह; कूजती--झंकार करती; कनक-नूपुर--सोने के पायल; शिक्लितेन-- ध्वनि करती; कुम्भ-स्तनी--जल के घट सहृश स्तनों वाली; कलस-पाणि:--हाथ में जल का पात्र लिए; अथ--इस प्रकार; आविवेश--रंगभूमि में प्रविष्ट हुई

हे राजा! ज्यों ही देवता तथा असुर पूर्व दिशा में मुख करके उस सभा-मण्डप में बैठ गये जो'फूल मालाओं तथा बत्तियों से पूर्णतया सजाया गया था और धूप के धुएँ से सुगन्धित हो गयाथा, उसी समय अत्यन्त सुन्दर साड़ी पहने, पायलों की झनकार करती उस स्त्री ने अत्यन्त गुरुनितम्बों के कारण मन्द गति से चलते हुए उस सभा-मण्डप में प्रवेश किया |

उसकी आँखेंयुवावस्था के मद से विहल थीं; उसके स्तन जल से पूर्ण घटों के समान थे; उसकी जाँघें हाथीकी सूँड़ जैसी दिखती थीं और वह अपने हाथ में अमृत-पात्र लिए हुए थी |

तां श्रीसखीं कनककुण्डलचारुकर्ण-नासाकपोलवदनां परदेवताख्याम्‌ |

संवीक्ष्य सम्मुमुहुरुत्स्मितवी क्षणेनदेवासुरा विगलितस्तनपट्टिकान्ताम्‌ ॥

१८॥

तामू--उस; श्री-सखीम्‌--लक्ष्मी की सखी के समान लगने वाली; कनक-कुण्डल--सुनहले कुण्डलों से युक्त; चारु--अत्यधिक सुन्दर; कर्ण--कान; नासा--नाक; कपोल--गाल; वदनाम्‌--मुख; पर-देवता-आख्याम्‌--उस रूप में प्रकटभगवान्‌ को; संवीक्ष्य--उसकी ओर देखकर; सम्मुमुहुः --सारे मोहित हो गये; उत्स्मित--कुछ-कुछ मुस्काते; वीक्षणेन--दृष्टि डालते हुए; देव-असुरा:--सारे देवता तथा असुर; विगलित-स्तन-पट्टिक-अन्ताम्‌--साड़ी का किनारा स्तनों से खिसक रहाथा |

उसकी आकर्षक नाक तथा गालों और सुनहले कुण्डलों से विभूषित कानों ने उसकेमुखमण्डल को अतीव सुन्दर बना दिया था |

जब वह चलती थी उसकी साड़ी का किनारा उसकेस्तनों से खिसक रहा था |

जब देवताओं तथा असुरों ने मोहिनी-मूर्ति के इन सुन्दर अंगों को देखातो वे सब पूरी तरह मोहित हो गये क्योंकि वह उनको तिरछी नजर से देख-देख कर कुछ कुछमुस्काती जा रही थी |

असुराणां सुधादानं सर्पाणामिव दुर्नयम्‌ |

मत्वा जातिनृशंसानां न तां व्यभजदच्युत: ॥

१९॥

असुराणाम्‌--असुरों का; सुधा-दानम्‌--अमृत देना; सर्पाणाम्‌--साँपों का; इब--सहश; दुर्नयम्‌--गलत अनुमान; मत्वा--इसप्रकार सोचकर; जाति-नृशंसानाम्‌--प्रकृति से अत्यधिक ईष्यालुओं का; न--नहीं; ताम्‌ू--अमृत को; व्यभजत्‌--भाग दे दिया;अच्युत:--अच्युत भगवान्‌ ने |

असुर स्वभाव से सर्पों के समान कुटिल होते हैं |

अतएव उन्हें अमृत में से हिस्सा देना तनिकभी सम्भव नहीं था क्योंकि यह सर्प को दूध पिलाने के समान घातक होता |

यह सोचकर अच्युतभगवान्‌ ने असुरों को अमृत में हिस्सा नहीं दिया |

कल्पयित्वा पृथक्पड्भीरु भयेषां जगत्पति: |

तांश्रोपवेशयामास स्वेषु स्वेषु च पड्िषु ॥

२०॥

'कल्पयित्वा--व्यवस्था करके; पृथक्‌ पड्ढडी:--अलग-अलग पंक्तियाँ; उभयेषाम्‌--देवता तथा असुर दोनों की; जगत्‌ू-पति:--ब्रह्माण्ड के स्वामी ने; तान्‌ू--उन सबों को; च--तथा; उपवेशयाम्‌ आस--बैठा दिया; स्वेषु स्वेषु-- अपने-अपने स्थानों पर;च-भी; पड़ि षु--पंक्तियों में |

मोहिनी-मूर्ति रूपी ब्रह्माण्ड के स्वामी भगवान्‌ ने देवताओं तथा असुरों को बैठने के लिएअलग-अलग पंक्तियों की व्यवस्था कर दी और उन्हें अपने-अपने पद के अनुसार बैठा दिया |

दैत्यान्यूहीतकलसो वज्जयन्नुपसञ्ञरैः |

दूरस्थान्पाययामास जरामृत्युहरां सुधाम्‌ू ॥

२१॥

दैत्यान्‌ू-- असुरों को; गृहीत-कलसः--अमृत का घट पकड़े भगवान्‌ ने; वज्ञयन्‌--ठगते हुए; उपसजञ्ञरैः--मीठे बचनों से; दूर-स्थान्‌--देवता, जो दूर बैठे थे; पाययाम्‌ आस--पिलाया; जरा-पमृत्यु-हराम्‌--अशक्तता, बुढ़ापा तथा मृत्यु को हरने वाले;सुधाम्‌--ऐसे अमृत को

अपने हाथों में अमृत का कलश लिये वह सर्वप्रथम असुरों के निकट आई और उसने अपनीमधुर वाणी से उन्हें सन्तुष्ट किया और इस तरह उनके अमृत के भाग से उन्हें वंचित कर दिया |

तब उसने दूरी पर बैठे देवताओं को अमृत पिला दिया जिससे वे अशक्तता, बुढ़ापा तथा मृत्यु सेमुक्त हो सकें |

ते पालयन्त: समयमसुरा: स्वकृतं नूप |

तृष्णीमासन्कृतस्नेहा: स्त्रीविवादजुगुप्सया ॥

२२॥

ते--वे; पालयन्तः--बनाये हुए; समयम्‌--सन्तुलन; असुरा:--असुरगण; स्व-कृतम्‌--स्वनिर्मित; नूप--हे राजा; तृष्णीम्‌आसनू--मौन रहे; कृत-स्नेहा:--मोहिनी-मूर्ति के प्रति आसक्ति उत्पन्न होने से; स्त्री-विवाद--स्त्री से मतभेद रखते हुए;जुगुप्सया--ऐसे कृत्य को गर्हित समझते हुए |

हे राजा! चूँकि असुरों ने वचन दिया था कि वह स्त्री जो कुछ भी करेगी, चाहे न्यायपूर्ण होया अन्याय-पूर्ण, उसे वे स्वीकार करेंगे, अतएवं अब अपना वचन रखने, अपना सन्तुलन दिखानेतथा स्त्री से झगड़ा करने से बचने के लिए वे मौन रहे |

तस्यां कृतातिप्रणया: प्रणयापायकातरा: |

बहुमानेन चाबद्धा नोचु: किझ्जन विप्रियम्‌ ॥

२३॥

तस्यामू--मोहिनी-मूर्ति की; कृत-अति-प्रणया: --घनिष्ठ मैत्री होने से; प्रणय-अपाय-कातरा:--इस भय से भयभीत कि उसकेसाथ उनकी मैत्री कहीं टूट न जाये; बहु-मानेन--अत्यधिक सम्मान तथा आदर के साथ; च--भी; आबद्धा:--उससे अत्यधिकआसक्त होकर; न--नहीं; ऊचु:--उन्होंने कहा; किज्लन--कुछ भी नहीं; विप्रियम्‌ू--जिससे मोहिनी-मूर्ति उनसे अप्रसन्न होजाये

असुरों को मोहिनी-मूर्ति से प्रेम तथा एक प्रकार का विश्वास हो गया था और उन्हें भय थाकि उनके सम्बन्ध कहीं डगमगा न जाएँ |

अतएव उन्होंने उसके वचनों का आदर-सम्मान कियाऔर ऐसा कुछ भी नहीं कहा जिससे उसके साथ उनकी मित्रता में बाधा पड़े |

तदेवलिडुप्रतिच्छन्न: स्वर्भानुर्देवसंसदि |

प्रविष्ट: सोममपिबच्चन्द्रार्का भ्यां च सूचित: ॥

२४॥

देव-लिड्ड-प्रतिच्छन्न:--देवता के वस्त्र से अपने को आच्छादित करके; स्वर्भानु:--राहु ने ( जो सूर्य तथा चन्द्रमा पर आक्रमणकरके उन्हें ग्रस लेता है ); देव-संसदि--देवताओं के समूह में; प्रविष्ट:--घुस करके; सोमम्‌--अमृत; अपिबत्‌--पी लिया;अन्द्र-अर्का भ्याम्‌--चन्द्रमा तथा सूर्य दोनों के द्वारा; च--तथा; सूचित:--बतलाये जाने पर |

सूर्य तथा चन्द्रमा को ग्रसने वाला असुर राहु अपने आपको देवता के बस्त्र से आच्छादित करके देवताओं के समूह में प्रविष्ट हो गया और किसी के द्वारा, यहाँ तक कि भगवान्‌ के द्वाराभी, जाने बिना अमृत पीने लगा |

किन्तु चन्द्रमा तथा सूर्य, राहु से स्थायी शत्रुता के कारण,स्थिति को भांप गये |

इस तरह राहु पहचान लिया गया |

चक्रेण क्षुरधारेण जहार पिबत: शिरः |

हरिस्तस्य कबन्धस्तु सुधयाप्लावितोपतत्‌ ॥

२५॥

चक्रेण--चक्र से; क्षुर-धारेण--छुरे जैसा तेज; जहार--काट दिया; पिबत:ः--अमृत पीते हुए; शिर:ः--सिर; हरिः-- भगवान्‌ ने;तस्य--राहु का; कबन्ध: तु--किन्तु शिरविहीन शरीर; सुधया--अमृत के द्वारा; अप्लावित:--स्पर्श न होने से; अपतत्‌--मृतहोकर गिर पड़ा |

भगवान्‌ हरि ने छुरे के समान तेज धार वाले अपने चक्र को चला कर तुरन्त ही राहु का सिरछिन्न कर दिया |

जब राहु का सिर उसके शरीर से कट गया तो वह शरीर अमृत का स्पर्श न करनेके कारण जीवित नहीं रह पाया |

शिरस्त्वमरतां नीतमजो ग्रहमचीक़रिपत्‌ |

यस्तु पर्वणि चन्द्रार्कावभिधावति वैरधी: ॥

२६॥

शिरः--सिर; तु--निस्सन्देह; अमरताम्‌--अमरता; नीतम्‌--प्राप्त करके; अज:ः--ब्रह्माजी; ग्रहम्‌--एक ग्रह के रूप में;अचीक़िपत्‌--पहचान लिया; य: --वही राहु; तु--निस्सन्देह; पर्वणि--पूर्णिमा तथा अमावस्या में; चन्द्र-अकौं--चन्द्रमा तथासूर्य दोनों का; अभिधावति-- पीछा करता है; वैर-धी:--शत्रुता के कारण

किन्तु अमृत का स्पर्श करने के कारण राहु का सिर अमर हो गया |

इस प्रकार ब्रह्माजी नेराहु के सिर को एक ग्रह ( लोक ) के रूप में मान लिया |

चूँकि राहु सूर्य तथा चन्द्रमा का शाश्वतवबैरी है, अतः वह पूर्णिमा तथा अमावस्या की रात्रियों में उन पर सदैव आक्रमण करने का प्रयत्तकरता है |

पीतप्रायेमृते देवैर्भगवान्लोकभावन: |

पश्यतामसुरेन्द्राणां स्व॑ं रूपं जगृहे हरि: ॥

२७॥

पीत-प्राये--जब पीना लगभग समाप्त हो गया; अमृते--अमृत का; देवैः--देवताओं द्वारा; भगवान्‌--मोहिनी-मूर्ति के रूप मेंभगवान्‌; लोक-भावन:--तीनों लोकों के पालक तथा शुभचिन्तक; पश्यताम्‌ू--देखते-देखते; असुर-इन्द्राणाम्‌-- अपनेसेनापतियों सहित सारे असुरों के; स्वम्‌--अपने; रूपम्‌ू--रूप को; जगृहे--प्रकट किया; हरि:-- भगवान्‌ ने |

भगवान्‌ तीनों लोकों के सर्वश्रेष्ठ मित्र तथा शुभचिन्तक हैं |

इस तरह जब देवताओं ने अमृतपीना प्रायः समाप्त किया तब भगवान्‌ ने समस्त असुरों के समक्ष अपना वास्तविक रूप प्रकटकर दिया |

एवं सुरासुरगणा: समदेशकाल-हेत्वर्थकर्ममतयोपि फले विकल्पा: |

तत्रामृतं सुरगणा: फलमञ्जसापु-्॑त्पादपड्डजूजरज: श्रयणान्र दैत्या: ॥

२८॥

एवम्‌--इस प्रकार; सुर--देवता; असुर-गणा: --तथा असुर; सम--समान; देश--स्थान; काल--समय; हेतु--कारण;अर्थ--उद्देश्य; कर्म--कर्म; मतय:--अभिलाषा; अपि--यद्यपि एक; फले--फल में; विकल्पा:--समान नहीं; तत्र--वहाँ पर;अमृतम्‌-- अमृत; सुर-गणा:--देवता; फलम्‌--फल; अद्धसा--आसानी से, पूरी तरह, प्रत्यक्षतः; आपु:--प्राप्त; यत्‌--जिससे;पाद-पड्लूज-- भगवान्‌ के चरणकमलों की; रज:--केसर की धूलि; श्रयणात्‌--आश्रय ग्रहण करने या वर प्राप्त करने से; न--नहीं; दैत्या:--असुरगण |

यद्यपि देवताओं तथा असुरों के देश, काल, कारण, उद्देश्य, कर्म तथा अभिलाषा एक-जैसेथे, किन्तु देवताओं को एक प्रकार का फल मिला और असुरों को दूसरे प्रकार का |

चूँकि देवतासदैव भगवान्‌ के चरणकमलों की धूलि की शरण में रहते हैं अतएव वे बड़ी आसानी से अमृतपी सके और उसका फल भी पा सके |

किन्तु भगवान्‌ के चरणकमलों का आश्रय न ग्रहण करनेके कारण असुर मनवांछित फल प्राप्त करने में असमर्थ रहे |

यद्युज्यते उसुवसुकर्ममनोवचोभि-देंहात्मजादिषु नृभिस्तदसत्पृथक्त्वात्‌ |

तैरेव सद्धवति यत्क्रियतेपृथक्त्वात्‌सर्वस्य तद्धभवति मूलनिषेचनं यत्‌ ॥

२९॥

यतू--जो भी; युज्यते--सम्पन्न किया जाता है; असु--जीवन की रक्षा के लिए; वसु--सम्पत्ति की रक्षा; कर्म--कर्म; मन:--मन के कार्यो से; वचोभि:--शाब्दिक कार्यों से; देह-आत्म-ज-आदिषु-- अपने शरीर या परिवार के लिए; नृभि: --मनुष्यों केद्वारा; तत्‌-वह; असतू--क्षणभंगुर; पृथक्त्वातू-- भगवान्‌ से वियोग के कारण; तैः--उन्हीं कार्यो के द्वारा; एब--निस्सन्देह;सत्‌ भवति--वास्तविक तथा स्थायी बनता है; यत्‌--जो; क्रियते--सम्पन्न किया जाता है; अपृथक्त्वात्‌-वियोग न होने से;सर्वस्य--हर एक के लिए; तत्‌ भवति--लाभप्रद बन जाता है; मूल-निषेचनम्‌--वृक्ष की जड़ को सींचने की तरह; यत्‌ू--जो |

मानव समाज में मनुष्य की सम्पत्ति तथा उसके जीवन की सुरक्षा के लिएमनसावाचाकर्मणा विविध कार्य किये जाते हैं, किन्तु ये सब कार्य शरीर के लिए या इन्द्रियतृप्तिके लिए ही किये जाते हैं |

ये सारे कार्यकलाप भक्ति से पृथक्‌ होने के कारण निराशाजनक होतेहैं |

किन्तु जब ये ही कार्य भगवान्‌ को प्रसन्न करने के लिए किये जाते हैं, तो उनके लाभकारी'फल सब में बाँट दिए जाते हैं जिस तरह वृक्ष की जड़ में पानी डालने से वह समूचे वृजक्ष मेंवितरित हो जाता है |

TO

← पिछला अध्याय · अगला अध्याय →

← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 8 की सूची