← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 8 की सूची

अध्याय आठ: क्षीर सागर का मंथन

8.8श्रीशुक उबाचपीते गरे वृषाड्लेण प्रीतास्तेडमरदानवा: |

ममन्थुस्तरसासिन्धुं हविर्धानी ततोभवत्‌ ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; पीते--पी लिये जाने पर; गरे--विष; वृष-अज्जेण--बैल पर बैठने वालेशिवजी द्वारा; प्रीता:--प्रसन्न होकर; ते--वे सब; अमर--देवतागण; दानवा:--तथा असुरगण; ममन्थु:--पुनः मथने लगे;तरसा--बड़े वेग से; सिन्धुम्‌-- क्षीरसागर को; हविर्धानी--सुरभि गाय जो घी देने वाली है; तत:ः--उस मन्थन से; अभवत्‌--उत्पन्न हुई ॥

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : शिवजी द्वारा विषपान कर लिये जाने पर देवता तथा दानवदोनों ही अत्यधिक प्रसन्न हुए और नवीन उत्साह के साथ समुद्र का मन्थन करने लगे |

इसकेफलस्वरूप सुरभि नामक गाय उत्पन्न हुई |

तामग्निहोत्रीमृषयो जगृहुर्ब्रह्यगादिन: |

यज्ञस्य देवयानस्य मेध्याय हविषे नृप ॥

२॥

तामू--उस गाय को; अग्नि-होत्रीम्‌-- अग्नि में आहुति के लिए मट्ठा, दूध तथा घी प्राप्त करने के लिए आवश्यक; ऋषय:--यज्ञकरने वाले ऋषियों ने; जगृहुः-- भार सँभाला; ब्रह्म -वादिन:--वैदिक अनुष्ठानों को जानने वाले; यज्ञस्य--यज्ञ का; देव-यानस्य--स्वर्ग तथा ब्रहलोक जाने की इच्छा को पूरी करने वाला; मेध्याय--आहुति डालने के योग्य; हविषे--घी के लिए;नृप--हे राजा |

हे राजा परीक्षित! वैदिक अनुष्ठानों से सुपरिचित ऋषियों ने उस सुरभि गाय को ले लिया जोअग्नि में आहुति डालने के लिए नितान्त आवश्यक मट्ठा, दूध तथा घी उत्पन्न करने वाली थी |

उन्होंने शुद्ध घी के लिए ही ऐसा किया क्योंकि उन्हें उच्चलोकों में ब्रह्मलोक तक जाने के लिएयज्ञ सम्पन्न करने के लिए घी की आवश्यकता थी |

तत उच्च: श्रवा नाम हयोभूच्चन्द्रपाण्डुर: |

तस्मिन्बलि:ः स्पूहां चक्रे नेन्द्र ईश्वरशिक्षया ॥

३॥

ततः-तत्पश्चात्‌; उच्चै: श्रवा: नाम--उच्चै श्रवा नाम का; हयः--घोड़ा; अभूत्‌--उत्पन्न हुआ; चन्द्र-पाण्डुरः:--चन्द्रमा की भाँतिश्वेत; तस्मिनू--उसको; बलि: --बलि महाराज ने; स्पृहाम्‌ चक्रे--पाने की इच्छा प्रकट की; न--नहीं; इन्द्र:--देवताओं काराजा; ईश्वर-शिक्षया-- भगवान्‌ की पहले की सलाह के कारण |

तत्पश्चात्‌ चन्द्रमा के समान श्वेत रंग का उच्चैः श्रवा नामक घोड़ा उत्पन्न हुआ |

बलि महाराजने इसे लेना चाहा |

स्वर्ग के राजा इन्द्र ने इसका विरोध नहीं किया क्योंकि भगवान्‌ ने पहले से हीउन्हें ऐसी सलाह दे रखी थी |

तत ऐरावतो नाम वारणेन्द्रो विनिर्गतः |

दन्तैश्वतुर्भि: श्वेताद्रेहरन्भगवतो महिम्‌ ॥

४॥

ततः--तत्पश्चात्‌; ऐराबतः नाम--ऐरावत नामक; वारण-इन्द्र:--हाथियों का राजा; विनिर्गत:ः--निकला; दन्तैः--अपने दाँतोंसहित; चतुर्भि:--चार; श्रेत--सफेद; अद्रेः--पर्वत के ; हरन्‌ू--मात करते हुए; भगवत:--शिवजी का; महिम्‌--यश, महिमा |

मन्थन के फलस्वरूप अगली बार हाथियों का राजा ऐरावत उत्पन्न हुआ |

यह हाथी श्वेत रंगका था और अपने चारों दाँतों के कारण यह शिवजी के यशस्वी धाम कैलाश पर्वत की महिमाको भी मात दे रहा था |

ऐरावणादयस्त्वष्टी दिग्गजा अभवंस्ततः |

अभ्रमुप्रभूतयोष्टी च करिण्यस्त्वभवन्नूप ॥

५॥

ऐरावण-आदय: --ऐरावण इत्यादि; तु--लेकिन; अष्टौ--आठ; दिक्‌ू-गजा:--ऐसे हाथी जो किसी भी दिशा में जा सकते थे;अभवनू--उत्पन्न हुए; ततः--तत्पश्चात्‌; अभ्रमु-प्रभूतयः--अभ्रमु नामक हथिनी तथा अन्य; अष्टौ--आठ; च-- भी; करिण्य: --हथिनियाँ; तु--निस्सन्देह; अभवन्‌--उत्पन्न हुईं; नृप--हे राजा

हे राजा! इसके बाद आठ बड़े-बड़े हाथी उत्पन्न हुए जो किसी भी दिशा में जा सकते थे |

उनमें ऐरावण प्रमुख था |

अभ्रमु आदि आठ हथिनियाँ भी उत्पन्न हुईं |

कौस्तुभाख्यमभूद्र॒त्तं पदारागो महोदथे:ःतस्मिन्मणौ स्पूहां चक्रे वक्षोलड्डूरणे हरिः |

ततोभवत्पारिजातः सुरलोकविभूषणम्‌पूरयत्यर्थिनो यो<र्थ: शश्वद्भुवि यथा भवान्‌ ॥

६॥

कौस्तुभ-आख्यम्‌--कौस्तुभ के रूप में विख्यात; अभूत्‌--उत्पन्न हुआ; रत्मम्‌--बहुमूल्य मणि; पद्ाराग: --पद्ाराग नामक रत्न;महा-उदधे: --महान्‌ क्षीरसागर से; तस्मिन्‌--उस; मणौ--मणि में; स्पृहाम्‌ चक्रे --पाने की अभिलाषा की; वक्ष:-अलहड्डूरणे--अपने वक्षस्थल को अलंकृत करने के लिए; हरिः-- भगवान्‌ ने; ततः--तत्पश्चात्‌; अभवत्‌--उत्पन्न हुआ; पारिजात:--पारिजातनामक स्वर्गिक पुष्प; सुर-लोक-विभूषणम्‌--स्वर्गलोक को विभूषित करने वाला; पूरयति--पूरा करता है; अर्थिन:--धन कीइच्छा रखने वाले; यः--जो; अर्थ: --अर्थ ( इच्छित ) के द्वारा; शश्वत्‌--सदैव; भुवि--इस लोक पर; यथा--जिस तरह;भवान्‌ू--आप ( महाराज परीक्षित ) |

तत्पश्चात्‌ महान्‌ समुद्र से विख्यात रल कौस्तुभ मणि तथा पदाराग मणि उत्पन्न हुए |

भगवान्‌विष्णु ने अपने वक्षस्थल को अलंकृत करने के लिए इसे पाने की इच्छा व्यक्त की |

तब पारिजात पुष्प उत्पन्न हुआ जो स्वर्ग लोकों को विभूषित करता है |

हे राजा! जिस प्रकार तुम इस लोक केप्रत्येक व्यक्ति की इच्छाएँ पूरी करते हो उसी तरह पारिजात हरएक की इच्छाओं को पूरा करताहै |

ततश्चाप्सरसो जाता निष्ककण्ठ्यः सुवासस: |

रमण्य: स्वर्गिणां वल्गुगतिलीलावलोकनै: ॥

७॥

ततः--तत्पश्चात्‌; च--भी; अप्सरस:--अप्सरालोक के वासी; जाता: --उत्पन्न हुए; निष्क-कण्ठ्य:--सुनहरे हारों से अलंकृत;सु-वाससः: --सुन्दर वस्त्र पहने; रमण्य:--अत्यन्त सुन्दर तथा आकर्षक; स्वर्गिणाम्‌-स्वर्गलोक के निवासियों का; वल्गु-गति-लीला-अवलोकनै: --मन्द गति से चलती हुई सबके हृदयों को आकृष्ट करतीं |

अप्सराएँ ( जो स्वर्ग में वेश्याओं की तरह रहती हैं ) प्रकट हुईं |

वे सोने के आभूषणों तथागले की मालाओं से पूरी तरह सजी हुई थीं और महीन तथा आकर्षक वस्त्र धारण किये थीं |

अप्सराएँ अत्यन्त मन्दगति से आकर्षक शैली में चलती हैं जिससे स्वर्गलोक के निवासी मोहितहो जाते हैं |

ततश्चाविरभूत्साक्षाच्छी रमा भगवत्परा |

रख्जयन्ती दिशः कान्त्या विद्युत्सौदामनी यथा ॥

८॥

ततः--तत्पश्चात्‌; च--तथा; आविरभूत्‌--प्रकट हुई; साक्षात्‌--प्रत्यक्ष; श्री--धन की देवी; रमा--रमा नामक; भगवत्‌ू-परा--भगवान्‌ के प्रति पूर्णतया अनुरक्त; रञ्ञयन्ती--प्रकाशित करती; दिश: --सभी दिशाओं को; कान्त्या--कान्ति से; विद्युत्‌--बिजली; सौदामनी--सौदामनी; यथा--जिस तरह |

तब धन की देवी रमा प्रकट हुईं जो भगवान्‌ द्वारा भोग्या हैं और उन्हीं को समर्पित रहती हैं |

वे बिजली की भाँति प्रकट हुई और उनकी कांति संगमरमर के पर्वत को प्रकाशित करने वालीबिजली को मात कर रही थीं |

तस्यां चक्रुः स्पूहां सर्वे ससुरासुरमानवा: |

रूपौदार्यवयोवर्णमहिमाक्षिप्तचेतस: ॥

९॥

तस्यामू--उसके लिए; चक्कु:--की; स्पृहाम्‌--इच्छा; सर्वे --हर कोई; स-सुर-असुर-मानवा:--देवता, असुर तथा मनुष्य समेत;रूप-औदार्य--अपूर्व सौन्दर्य तथा शारीरिक स्वरूप के द्वारा; वयः--तारुण्य; वर्ण--रंग; महिमा--यश; आशक्षिप्त--शक्षुब्ध;चेतस:--मन वाले |

उनके अपने अपूर्ब सौन्दर्य, शारीरिक स्वरूप ( गठन ), तारुण्य, रंग तथा यश के कारण हरव्यक्ति, यहाँ तक कि देवता, असुर तथा मनुष्य उनको पाने की कामना करने लगे |

वे इसीलिएआकृष्ट थे क्योंकि रमादेवी समस्त ऐश्वर्यों की उद्गम हैं |

तस्या आसनमानिन्ये महेन्द्रो महदद्भुतम्‌ |

मूर्तिमत्य: सरिच्छेष्ठा हेमकुम्भेर्जलं शुच्चि ॥

१०॥

तस्या:--उसके लिए; आसनमू्‌-- आसन; आनिन्ये--ले आया; महा-इन्द्र:--स्वर्ग का राजा इन्द्र; महत्‌--यशस्वी; अद्भुतम्‌--विचित्र; मूर्ति-मत्य:--रूपों को स्वीकार करते हुए; सरित्‌- श्रेष्ठाः:--विविध पवित्र नदियों में श्रेष्ठ; हेम--सुनहरे; कुम्भैः--जलवपात्रों द्वारा; जलमू--जल; शुचि--शुद्ध |

स्वर्ग का राजा इन्द्र लक्ष्मीजी के बैठने के लिए उपयुक्त आसन ले आया |

पवित्र जल वालीसारी नदियाँ--यथा गंगा तथा यमुना-साकार हो उठीं और उनमें से हर एक माता लक्ष्मी के लिएसुनहरे जलपात्र में शुद्ध जल ले आईं |

आभिषेचनिका भूमिराहरत्सकलौषधी: |

गाव: पञ्ञ पवित्राणि वसन्‍्तो मधुमाधवीौ ॥

११॥

आभिषेचनिका: --अर्चा विग्रह की स्थापना के लिए आवश्यक साज-सामग्री; भूमि:-- भूमि ने; आहरत्‌--एकत्र की; सकल--सभी तरह की; औषधी:--औषधियाँ तथा जड़ीबूटियाँ; गाव:--गाएँ; पञ्ञ--गाय से प्राप्त होने वाले पाँच प्रकार के पदार्थ यथादूध, मट्ठा, घी, गोबर तथा गोमूत्र; पवित्राणि-- अकलुषित; वसनन्‍्तः--साक्षात्‌ वसन्‍्त ऋतु; मधु-माधवौ--वसन्त ऋतु अथवा चैत्र

और वैशाख मास में उत्पन्न होने वाले फल तथा फूल |

भूमि ने साकार होकर अर्चाविग्रह की स्थापना के लिए जड़ीबूटियाँ एकत्र कीं |

गायों नेपाँच प्रकार के उत्पाद दिए--दूध, मट्ठा, घी, गोमूत्र तथा गोबर और साक्षात्‌ वसन्‍्त ऋतु ने चैत्र-वैशाख ( अप्रैल तथा मई ) मास में उत्पन्न होने वाली हर वस्तु को एकत्र किया |

ऋषय: कल्पयां चक्कुराभिषेकं यथाविधि |

जगुर्भद्राणि गन्धर्वा नट्यश्व ननृतुर्जगु: ॥

१२॥

ऋषय: --ऋषिगण ने; कल्पयाम्‌ चक्रु:--सम्पन्न किया; आभिषेकम्‌-- अभिषेक समारोह, जिसे अर्चाविग्रह की स्थापना केसमय किया जाता है; यथा-विधि--जैसाकि प्रामाणिक शास्त्रों में निर्देश हुआ है; जगु:--वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया;भद्राणि--सारा सौभाग्य; गन्धर्वा:--तथा गन्धर्व लोक के निवासी; नट्य:--व्यावसायिक नर्तकियाँ; च-- भी; ननृतु:ः--उसअवसर पर बहुत सुन्दर नृत्य किया; जगुः--वेदों द्वारा बताये प्रामाणिक गीतों को गाया |

ऋषियों ने प्रामाणिक शाम्त्रों में निर्दिष्ट विधि से सौभाग्य की देवी ( लक्ष्मी) का अभिषेकउत्सव सम्पन्न किया; गन्धर्वों ने सर्वमंगलकारी वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया और व्यावसायिकनर्तकियों ने सुन्दर नृत्य किया तथा वेदों द्वारा बताये गये प्रामाणिक गीतों को गाया |

मेघा मृदड़्पणवमुरजानकगोमुखान्‌ |

व्यनादयन्शड्डुवेणुवीणास्तुमुलनि:स्वनान्‌ ॥

१३॥

मेघाः--साक्षात्‌ बादलों ने; मृदड़-- ढोल; पणव--नगाड़े; मुरज--एक अन्य प्रकार का ढोल; आनक--एक अन्य प्रकार काढोल; गोमुखान्‌--एक प्रकार की तुरही; व्यनादयन्‌--बजाया, झंकृत किया; शद्भु--शंख; वेणु--बाँसुरी; वीणा: --वीणाएँ;तुमुल--कानों को फाड़ने वाली; नि:स्वनान्‌ू--ध्वनि |

साक्षात्‌ बादलों ने तरह-तरह के ढोल--यथा मृदंग, पणव, मुरज तथा आनक--बजाये |

उन्होंने शंख तथा गोमुख नामक तुरहियाँ भी बजाईं और बाँसुरी तथा वीणा का वादन किया |

इनसब वाद्ययंत्रों की सम्मिलित ध्वनि अत्यन्त तुमुलपूर्ण थी |

ततोभिषिषिचुर्देवीं अियं पद्मयकरां सतीम्‌ |

दिगिभा:ः पूर्णकलशै:ः सूक्तवाक्यैद्विजेरिते: ॥

१४॥

ततः--तत्पश्चात्‌; अभिषिषिचु:--शरीर पर पवित्र जल डाला; देवीम्‌--लक्ष्मी देवी को; अ्रियम्‌ू--अत्यन्त सुन्दर; पढ्य-कराम्‌ू--हाथ में कमल का फूल लिए; सतीम्‌ू-- भगवान्‌ के अतिरिक्त अन्य किसी को न जानने वाली परम साध्वी सती को; दिगिभा: --बड़े-बड़े हाथी दिग्गज; पूर्ण-कलशैः--जल से पूर्ण पात्रों द्वारा; सूक्त-वाक्यै:ः --वैदिक मंत्रों से; द्वि-ज--ब्राह्मणों से; ईरिति: --उच्चारित |

तत्पश्चात्‌ सभी दिशाओं के दिग्गज गंगाजल से भरे कलश ले आये और भाग्य की देवी कोदिद्वान ब्राह्मणों द्वारा उच्चारित वैदिक मंत्रों के साथ स्नान कराया |

स्नान कराये जाते समयलक्ष्मीजी अपनी मौलिक शैली को बनाए रख कर अपने हाथ में कमल धारण किये रहीं औरअत्यन्त सुन्दर लग रही थीं |

वे परम सती साध्वी हैं क्योंकि वे भगवान्‌ के अतिरिक्त किसी कोनहीं जानतीं |

समुद्र: पीतकौशेयवाससी समुपाहरत्‌ |

वरुण: स्त्रजं वैजयन्तीं मधुना मत्तघट्पदाम्‌ ॥

१५॥

समुद्र:--समुद्र ने; पीत-कौशेय--पीला रेशम; वाससी--पोशाक के ऊपर तथा नीचे के भाग; समुपाहरत्‌-- भेंट किया;वरुण:--जल के अधिष्ठाता देवता ने; स्रजम्‌ू--माला; वैजयन्तीम्‌--अत्यन्त अलंकृत तथा बड़ी; मधुना--शहद से; मत्त--मतवाले; षट्‌-पदाम्‌--छः पैरों वाले भौंरों को

समस्त बहुमूल्य रत्नों के स्त्रोत समुद्र ने उन्हें पीले रेशमी वस्त्र के ऊपर तथा नीचे के भागप्रदान किये |

जल के प्रधान देवता वरुण ने फूलों की मालाएँ प्रदान कीं जिनके चारों ओर मधुपीकर मस्त हुए भौरे मँडरा रहे थे |

भूषणानि विचित्राणि विश्वकर्मा प्रजापति: |

हारं सरस्वती पद्ममजो नागाश्च कुण्डले ॥

१६॥

भूषणानि--तरह-तरह के गहने; विचित्राणि--सुन्दर ढंग से सजाये हुए; विश्वकर्मा प्रजापति:--ब्रह्माजी के पुत्रों प्रजापतियों में सेएक जिसका नाम विश्वकर्मा था; हारम्‌--हार; सरस्वती--विद्या की देवी ने; पद्ममू--कमल का फूल; अज: --ब्रह्मा ने; नागा:च--तथा नागलोक के वासियों ने; कुण्डले--कान के दो कुण्डल |

प्रजापति विश्वकर्मा ने तरह-तरह के अलंकृत आभूषण दिये |

विद्या की देवी सरस्वती ने गलेका हार, ब्रह्माजी ने कमल का फूल तथा नागलोक के वासियों ने कान के कुण्डल प्रदान किये |

ततः कृतस्वस्त्ययनोत्पलस्त्रजंनददिदवरेफां परिगृह्य पाणिना |

चचाल वक्त्रं सुकपोलकुण्डलंसब्रीडहासं दधती सुशोभनम्‌ ॥

१७॥

ततः--तत्पश्चात्‌; कृत-स्वस्त्ययना--शुभ अनुष्ठानों द्वारा नियमित रूप से पूजी जाकर; उत्पल-स्त्रजमू--कमलों की माला;नदतू--गुंजार करते; द्विरिफाम्‌--भौंरों से घिरी; परिगृह्--पकड़ कर; पाणिना--हाथ से; चचाल--आगे बढ़ी; वक्त्रम्‌--चेहरा;सु-कपोल-कुण्डलम्‌-कान के कुण्डलों से अलंकृत गाल; स-ब्रीड-हासम्‌--लज्जा से मुस्काती; दधती--विस्तीर्ण करती; सु-शोभनम्‌--अपनी प्राकृतिक सुन्दरता को |

तत्पश्चात्‌ शुभ अनुष्ठान द्वारा पूजित माता लक्ष्मी कमलपुष्पों की माला हाथ में लेकर इधर-उधर विचरण करने लगीं जिसके चारों ओर भौरे मँडरा रहे थे |

लज्जा से मुस्काती हुई, कुण्डलोंसे गाल अलंकृत होने के कारण बे अत्यन्त सुन्दर लग रही थीं |

स्तनद्वयं चातिकुशोदरी सम॑निरन्तरं चन्दनकुड्डू मोक्षितम्‌ |

ततस्ततो नूपुरवल्गु शिक्षितै-विसर्पती हेमलतेव सा बभौ ॥

१८॥

स्तन-द्वयम्‌--उनके दो स्तन; च-- भी; अति-कृश-उदरी --शरीर का मध्य भाग अत्यन्त पतला है, जिसका; समम्‌--समान रूपसे; निरन्तरम्‌--लगातार; चन्दन-कुद्डभु म--चन्दन तथा लाल रंग के कुंकुम चूर्ण से; उक्षितम्‌--लेप किया; ततः ततः--यत्र तत्र;नूपुर--पायल का; वल्गु--अत्यन्त सुन्दर; शिक्षितैः --मन्द झंकार करती; विसर्पती--चलती हुई; हेम-लता--सुनहरी लता;इब--सहश; सा--वह देवी; बभौ--प्रकट हुई

उनके संतुलित तथा सुस्थित दोनों स्तन चन्दन तथा कुंकुम चूर्ण से लेपित थे और उनकीकमर अत्यन्त पतली थी |

जब वे इधर-उधर चलती तो उनके पायल मन्द झंकार करते थे और वेकोई सोने की लता के समान लगती थी |

विलोकयन्ती निरवद्यमात्मन:पद ध्रुवं चाव्यभिचारिसद्गुणम्‌ |

गन्धर्वसिद्धासुरयक्षचारण-त्रैपिप्टपेयादिषु नान्वविन्दत ॥

१९॥

विलोकयन्ती--निरीक्षण करती, देखती; निरवद्यमू--किसी दोष से रहित; आत्मन: --अपने आपको; पदम्‌--पद; ध्रुवम्‌--नित्य; च--भी; अव्यभिचारि-सत्‌-गुणम्‌--गुणों में बिना किसी परिवर्तन के; गन्धर्व--गन्धर्वलोक के वासियों; सिद्ध--सिद्धलोक के वासियों; असुर--दानवों; यक्ष--यक्षों; चारण--चारण लोक के वासियों; त्रैपिप्टेय-आदिषु--तथा देवताओं में;न--नहीं; अन्वविन्दत--किसी को स्वीकार कर सकी |

गन्धर्वों, यक्षों, असुरों, सिद्धों, चारणों तथा स्वर्गलोक के वासियों के बीच विचरण करतीहुई भाग्य की देवी लक्ष्मीदेवी उन सबका निरीक्षण कर रही थीं, किन्तु उनमें से कोई भी उन्हेंसमस्त स्वाभाविक उत्तम गुणों से युक्त नहीं मिला |

उनमें से कोई भी दोषों से रहित न था अतएववे किसी की भी शरण ग्रहण नहीं कर सकीं |

नून तपा यस्थ न मन्यानजयाज्ञानं क्वचित्तच्य न सड़रवर्जितम्‌ |

कश्रिन्महांस्तस्थ न कामनिर्जय:सईश्वरः कि परतो व्यपाश्रय: ॥

२०॥

नूनम्‌--निश्चय ही; तपः--तपस्या; यस्य--जिस किसी की; न--नहीं; मन्यु--क्रो ध; निर्जय:--जीता हुआ; ज्ञानम्‌-ज्ञान;क्वचित्‌--किसी साधु पुरुष में; तत्‌ू--वह; च--भी; न--नहीं; सड़-वर्जितम्‌--संगति के कलुष से रहित; कश्चित्‌--कोई;महान्‌--अत्यन्त प्रतिष्ठित व्यक्ति; तस्य--उसका; न--नहीं; काम-- भौतिक इच्छाएँ; निर्जय:--विजित; सः--ऐसा व्यक्ति;ईश्वरः--नियन्ता; किमू--वह कैसे हो सकता है; परत:--अन्यों का; व्यपा श्रय:--अधीन |

सभा का निरीक्षण करते हुए लक्ष्मीजी ने इस प्रकार सोचा: जिसने महान्‌ तपस्या की है उसनेअभी तक क्रोध पर विजय नहीं पाईं |

किसी के पास ज्ञान है, तो वह भौतिक इच्छाएँ नहीं जीतपाया |

कोई महान्‌ पुरुष है, तो उसने कामेच्छाएँ नहीं जीतीं |

यहाँ तक कि महापुरुष भी किसीअन्य बात पर आश्रित रहता है |

फिर वह परम नियन्ता ( ईश्वर ) कैसे हो सकता है ? धर्म: क्वचित्तत्र न भूतसौहदंत्याग: क्वचित्तत्र न मुक्तिकारणम्‌ |

वीर्य न पुंसोउस्त्यजवेगनिष्कृतंन हि द्वितीयो गुणसड्रवर्जित: ॥

२१॥

धर्म:--धर्म; क्वचित्‌-- भले ही पूरा ज्ञान क्यों न हो; तत्र--वहाँ; न--नहीं; भूत-सौहदम्‌-- अन्य जीवों के साथ मित्रता;त्याग:--त्याग; क्वचित्‌--किसी के पास भले ही हो; तत्र--वहाँ; न--नहीं; मुक्ति-कारणम्‌--मुक्ति का कारण; वीर्यम्‌ू--बल;न--नहीं; पुंस:--किसी पुरुष का; अस्ति--हो सकता है; अज-वेग-निष्कृतम्‌--काल की शक्ति से छुटकारा नहीं है; न--नतो; हि--निस्सन्देह; द्वितीय:--दूसरा; गुण-सड़-वर्जित:-- प्रकृति के गुणों के कल्मष से पूरी तरह मुक्त |

भले ही किसी के पास धर्म का पूरा ज्ञान क्यों न हो फिर भी वह समस्त जीवों पर दयालुनहीं हो सकता |

किसी में, चाहे वह देवता हो या मनुष्य, त्याग हो सकता है, किन्तु वह मुक्ति काकारण नहीं होता |

भले ही किसी में महान्‌ बल क्‍यों न हो फिर भी वह नित्य काल की शक्ति कोरोकने में अक्षम रहता है |

भले ही कोई भौतिक जगत की आसक्ति से विरक्त हो चुका हो फिरभी वह भगवान्‌ की बराबरी नहीं कर सकता |

अतएव कोई भी व्यक्ति प्रकृति के भौतिक गुणों के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं है |

क्वचिच्चिरायुर्न हि शीलमड्लंक्वचित्तदप्यस्ति न वेद्यमायुष: |

यत्रोभयं कुत्र च सोउप्यमड्रल:सुमड्रलः कश्च न काइक्षते हि माम्‌ ॥

२२॥

क्वचित्‌--कोई; चिर-आयु:--दीर्घभआयु वाला; न--नहीं; हि--निस्सन्देह; शील-मड़लम्‌--अच्छा आचरण या कल्याण;क्वचित्‌--कोई; तत्‌ अपि--अच्छा आचरण होते भी; अस्ति-- है; न--नहीं; वेद्यम्‌ आयुष: --उप्र की अवधि से परिचित; यत्रउभयम्‌--यदि दोनों हुए ( आचरण तथा मंगल ); कुत्र--कहाँ; च-- भी; सः --वह व्यक्ति; अपि--यद्यपि; अमड्रल:--किसीऔर बात में अशुभ; सु-मड़ल: --प्रत्येक प्रकार से शुभ; कश्च--कोई; न--नहीं; काइक्षते--इच्छा करता है; हि--निस्सन्देह;माम्‌--मुझको |

हो सकता है कि कोई दीर्घायु हो, किन्तु वह अच्छे आचरण वाला या मंगलमय न हो |

किसी में मंगलमय तथा अच्छा आचरण दोनों ही पाये जा सकते हैं, किन्तु उसकी आयु कीअवधि निश्चित नहीं होती |

यद्यपि शिवजी जैसे देवताओं का जीवन शाश्वत होता है, किन्तु उनकीआदतें अमंगल सूचक होती हैं--यथा एमशान में वास |

अन्य लोग सभी प्रकार से योग्य होते हुएभी भगवान्‌ के भक्त नहीं होते |

एवं विमृश्याव्यभिचारिसद्गुणै-वर निजैका श्रयतयागुणा श्रयम्‌ |

वद्रे वरं सर्वगुणैरपेक्षितंरमा मुकुन्दं निरपेक्षमीप्सितम्‌ ॥

२३॥

एवम्‌--इस तरह; विमृश्य--विचार-विमर्श के बाद; अव्यभिचारि-सत्‌ू-गुणै:--अद्वितीय दिव्य गुणों से; वरम्‌-- श्रेष्ठ; निज-एक-आश्रयतया-- अन्यों पर आश्रित न रहकर समस्त गुणों से युक्त होने के कारण; अगुण-आश्रयम्‌--समस्त दिव्य गुणों काआगार; वद्रे--स्वीकार किया; वरम्‌--दूल्हे के रूप में; सर्व-गुणैः--समस्त दिव्य गुणों के साथ; अपेक्षितम्‌--योग्य; रमा--भाग्य की देवी ने; मुकुन्दम्‌-मुकुन्द को; निरपेक्षम्‌--यद्यपि उन्होंने उसकी प्रतीक्षा नहीं की; ईप्सितम्‌ू--सर्वाधिक वांछनीय |

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस प्रकार पूरी तरह विचार-विमर्श करने के बाद भाग्यकी देवी ( लक्ष्मी ) ने मुकुन्द को पति रूप में वरण कर लिया क्योंकि यद्यपि बे स्वतंत्र हैं औरउन्हें उनकी कमी भी नहीं खलती थी वे समस्त दिव्य गुणों और योग शक्तियों से युक्त हैं, अतएवसर्वाधिक वांछनीय हैं |

तस्यांसदेश उशतीं नवकञझ्जमालांमाद्यन्मधुव्रतवरू थगिरोपधुष्टाम्‌ |

तस्थौ निधाय निकटे तदुरः स्वधाम सब्रीडहासविकसन्नयनेन याता ॥

२४॥

तस्य--उसके ( भगवान्‌ के ); अंस-देशे--कंधों पर; उशतीम्‌--अत्यन्त सुन्दर; नब--नई; कज्ज-मालामू--कमल के फूलों कीमाला को; माद्यत्‌ू--मदान्ध; मधुब्रत-वरूथ--भौंरों की; गिरा--ध्वनि से; उपधुष्टामू--गुंजार से घिरा; तस्थौ--कर रहा;निधाय--माला रखकर; निकटे--पास ही; ततू-उर:ः -- भगवान्‌ का वक्षस्थल; स्व-धाम--अपना असली निवास; स-ब्रीड-हास--लज्जा से हँसते हुए; विकसत्‌--चमकते; नयनेन--आँखों से; याता--इस प्रकार स्थित |

भगवान्‌ के पास जाकर लक्ष्मीजी ने नवीन कमल पुष्पों की माला उनके गले में पहना दीजिसके चारों ओर मधु की खोज में भौरें गुंजार कर रहे थे |

तब भगवान्‌ के वक्षस्थल पर स्थानपाने की आशा से वे उनकी बगल में खड़ी रहीं और उनका मुख लज्जा से मुस्का रहा था |

तस्याः थ्रियस्त्रिजगतो जनको जनन्यावक्षो निवासमकरोत्परमं विभूते: |

श्री: सवा: प्रजा: सकरुणेन निरीक्षणेनयत्र स्थितैधयत साधिपतींस्त्रिलोकान्‌ ॥

२५॥

तस्या:--उसका; थ्रिय:--लक्ष्मी; त्रि-जगत:--तीनों लोक के; जनकः--पिता; जनन्या: --माता का; वक्ष: --वक्षस्थल;निवासम्‌ू--निवास; अकरोत्‌--बनाया; परमम्‌--परम; विभूते: --ऐश्वर्यवान का; श्री:--लक्ष्मी; स्वा:--अपने; प्रजा:--वंशज;स-करुणेन--करुणा से युक्त; निरीक्षणेन-- दृष्टि फेरते हुए; यत्र--जहाँ; स्थिता--रहते हुए; ऐधयत--वृद्द्धि की; स-अधिपतीन्‌-महान्‌ निदेशकों तथा नेताओं सहित; त्रि-लोकान्‌--तीनों लोकों को |

भगवान्‌ तीनों लोकों के पिता हैं और उनका वशक्षस्थल समस्त ऐश्वर्यों की स्वामिनी भाग्य कीदेवी माता लक्ष्मी का निवास है |

लक्ष्मीजी अपनी अनुकूल तथा कृपापूर्ण चितवन से तीनों लोकोंतथा उनके निवासियों और अधिपतियों--देवताओं--के ऐश्वर्य को बढ़ा सकती हैं |

शद्डुतूर्यमृदड़ानां वादित्राणां पृथु: स्वनः |

देवानुगानां सस्त्रीणां नृत्यतां गायतामभूत्‌ ॥

२६॥

शद्भु--शंख; तूर्य--तुरही; मृदड्भानाम्‌ू--तथा विभिन्न प्रकार के ढोलों का; वादित्राणाम्‌ू--वाद्य-यंत्रों की; पृथु:--अत्यधिक;स्वन:ः--ध्वनि; देव-अनुगानाम्‌--उच्चलोकों ( गंधर्व तथा चारण लोक ) के निवासी जो देवताओं के अनुयायी होते हैं; स-स्त्रीणामू--अपनी-अपनी पतियों के साथ; नृत्यताम्‌--नाचने में व्यस्त; गायताम्‌-गाते हुए; अभूत्‌--हो गये |

तब गन्धर्व तथा चारण लोकों के निवासियों ने अपने-अपने वाद्य यंत्र--यथा शंख, तुरहीतथा ढोल--बजाये |

वे अपनी-अपनी पत्नियों के साथ नाचने गाने लगे |

ब्रह्मरुद्राड्िरोमुख्या: सर्वे विश्वस॒जो विभुम्‌ |

ईडिरेवितथेर्मन्त्रैस्तल्लिड्रैः पुष्पर्षिण: ॥

२७॥

ब्रह्म--ब्रह्माजी; रुद्र--शिवजी; अड्डिर: --अंगिरा मुनि; मुख्या:--आदि; सर्वे--सभी ने; विश्व-सृज:--विश्व की व्यवस्था केनिदेशक; विभुम्‌--महान्‌ पुरुष को; ईडिरे--पूजा की; अवितथे: --असली; मन्त्रै:--उच्चारण द्वारा; तत्‌-लिड्डैः--उन भगवान्‌को पूजकर; पुष्प-वर्षिण: --पुष्पों की वर्षा करके |

ब्रह्म जी, शिव जी, अंगिरा मुनि तथा विश्व व्यवस्था के ऐसे ही निदेशकों ने फूल बरसायेऔर भगवान्‌ की दिव्य महिमा के सूचक मंत्रों का उच्चारण किया |

भ्रियावलोकिता देवा: सप्रजापतय: प्रजा: |

शीलादिगुणसम्पन्ना लेभिरे निर्वृतिं परामू ॥

२८॥

भ्रिया--लक्ष्मी द्वारा; अवलोकिता:--कृपापूर्वक देखे जाने पर; देवा:--सारे देवता; स-प्रजापतय:--प्रजापतियों सहित;प्रजा:--तथा उनकी सनन्‍्तानें; शील-आदि-गुण-सम्पन्ना:--सबके सब अच्छे आचरण तथा अच्छे लक्षणों से सम्पन्न; लेभिरि--प्राप्त किया; निर्वृतिमू--संतोष; परामू--चरम

सभी प्रजापतियों तथा उनकी प्रजा सहित सारे देवता लक्ष्मीजी की चितवन से धन्य होकरतुरन्त ही अच्छे आचरण तथा दिव्य गुणों से सम्पन्न हो गये |

इस तरह वे अत्यधिक सन्तुष्ट हो गये |

निःसत्त्वा लोलुपा राजन्निरुगओगा गतत्रपा: |

यदा चोपेक्षिता लक्ष्म्या बभूवुर्देत्यदानवा: ॥

२९॥

निःसत्त्वा:--बलहीन; लोलुपा:--अत्यन्त लालची; राजन्‌--हे राजा; निरुद्योगा:--हताश; गत-बत्रपा: --लज्जाहीन; यदा--जब;च--भी; उपेक्षिता:--उपेक्षित; लक्ष्म्या--लक्ष्मीजी द्वारा; बभूवु:--हो गये; दैत्य-दानवा:--असुर तथा राक्षसगण |

हे राजा! लक्ष्मी द्वारा उपेक्षित हो जाने पर असुर तथा राक्षस अत्यन्त निराश, मोहग्रस्त तथा हतप्रभ हो गये और इस तरह वे निर्लज्ज बन गये |

अथासीद्वारुणी देवी कन्या कमललोचना |

असुरा जगहुस्तां वै हरेरनुमतेन ते ॥

३०॥

अथ--तत्पश्चात्‌ ( लक्ष्मीजी के प्रकट होने के बाद ); आसीतू-- था; वारुणी --वारुणी; देवी --देवपत्नी जो मद्यपों को वश मेंरखती है; कन्या--तरुणी; कमल-लोचना--कमल जैसे नेत्र वाली; असुरा: --असुरों ने; जगृह:--स्वीकार कर लिया; तामू--उसको; वै--निस्सन्देह; हरेः-- भगवान्‌ के; अनुमतेन--आदेश से; ते--वे ( राक्षस ) |

तब कमलनयनी देवी वारुणी प्रकट हुई जो मद्यपों को वश में रखती है |

भगवान्‌ कृष्ण कीअनुमति से बलि महाराज इत्यादि असुरों ने उस तरुणी को अपने अधिकार में ले लिया |

अथोदधेर्मथ्यमानात्काश्यपैरमृतार्थिभि: |

उदतिष्ठन्महाराज पुरुष: परमाद्धुतः ॥

३१॥

अथ--तत्पश्चात्‌; उदधे:--क्षीरसागर से; मथ्यमानात्‌--मथने से; काश्यपैः --कश्यप के पुत्रों अर्थात्‌ देवताओं तथा असुरों द्वारा;अमृत-अर्थिभि:--मन्थन से अमृत पाने के लिए उत्सुक; उदतिष्ठत्‌-वहाँ प्रकट हुआ; महाराज--हे राजा; पुरुष:--एक पुरुष;'परम--अत्यन्त; अद्भुत:--अद्भुत |

हे राजा! तत्पश्चात्‌ जब कश्यप के पुत्र--असुर तथा देवता--दोनों ही क्षीरसागर के मन्थन मेंलगे हुए थे तो एक अत्यन्त अद्भुत पुरुष प्रकट हुआ |

दीर्घपीवरदोर्दण्ड: कम्बुग्रीवोरुणेक्षण: |

शयामलस्तरूणः स््रग्वी सर्वाभरणभूषित: ॥

३२॥

दीर्घ--लम्बा; पीवर--बलिष्ठ; दोः-दण्ड:-- भुजाएँ; कम्बु--शंख के समान; ग्रीव:ः--गर्दन; अरुण-ईक्षण: --लाल-लालआँखें; श्यामल:ः--काले रंग का; तरुण:--नौजवान; स्त्रग्वी--फूलों की माला पहने; सर्व--समस्त; आभरण--गहनों से;भूषित:--अलंकृत |

उसका शरीर सुहृढ़ था; उसकी भुजाएँ लम्बी तथा बलिष्ठ थीं; उसकी शंख जैसी गर्दन मेंतीन रेखाएँ थीं; उसकी आँखें लाल-लाल थीं और उसका रंग साँवला था |

वह अत्यन्त तरुणथा, उसके गले में फूलों की माला थी तथा उसका सारा शरीर नाना प्रकार के आभूषणों सेसुसज्जित था |

'पीतवासा महोरस्कः सुमृष्टमणिकुण्डल: |

स्निग्धकुद्धितकेशान्तसुभग: सिंहविक्रमः |

अमृतापूर्णकलसं बिभ्रद्बलयभूषित: ॥

३३॥

'पीत-वासा: --पीले वस्त्र पहने; महा-उरस्क:--चौ वक्षस्थल वाला; सु-मृष्ट-मणि-कुण्डल:--मोतियों के बने पालिश किए हुएकुण्डल पहने; स्निग्ध--चिकना; कुश्चित-केश--घुंघराले बाल; अन्त--सिरे पर; सु-भग:--पृथक्‌ तथा सुन्दर; सिंह-विक्रमः--सिंह की भाँति बलवान; अमृत--अमृत से; आपूर्ण--लबालब; कलसम्‌--कलश ; बिश्रतू--चलायमान; वलय--बाजूबंद; भूषित:ः--सुशोभित

वह पीले वस्त्र पहने था और उसके कानों में मोतियों के बने पालिश किए हुए कुण्डल थे |

उसके बालों के सिरे तेल से चुपड़े थे और उसका वक्षस्थल अत्यन्त चौड़ा था |

उसका शरीरअत्यन्त सुगठित तथा सिंह के समान बलवान था |

उसने बाजूबंद पहन रखे थे |

उसके हाथ मेंअमृत से पूर्ण कलश था |

स वे भगवतः साक्षाद्विष्णोरंशांशसम्भवः |

धन्वन्तरिरिति ख्यात आयुर्वेददगिज्यभाक्‌ ॥

३४॥

सः--वह; बै--निस्सन्देह; भगवत:--भगवान्‌ का; साक्षात्‌-- प्रत्यक्ष; विष्णो: -- भगवान्‌ विष्णु का; अंश-अंश-सम्भव:--स्वांश के स्वांश का अवतार; धन्वन्तरि:-- धन्वन्तरि; इति--इस प्रकार; ख्यात:--प्रसिद्ध; आयु:-वेद-हक्‌-- औषधि विज्ञान मेंपटु; इज्य-भाक्‌--यज्ञ में भाग पाने का अधिकारी देवता |

यह व्यक्ति धन्वन्तरि था, जो भगवान्‌ विष्णु के स्वांश का स्वांश था |

वह औषधि विज्ञान( आयुर्वेद ) में अत्यन्त पटु था और देवता के रूप में यज्ञों में भाग पाने का अधिकारी था |

तमालोक्यासुरा: सर्वे कलसं चामृताभूतम्‌ |

लिप्सन्तः सर्ववस्तूनि कलसं तरसाहरन्‌ ॥

३५॥

तम्‌--उसको; आलोक्य--देखकर; असुरा: --असुरों ने; सर्वे--सभी; कलसम्‌--अमृत पात्र को; च-- भी; अमृत-आभूृतम्‌--अमृत से पूर्ण; लिप्सन्तः--प्रबल इच्छा करते; सर्व-वस्तूनि--सारी वस्तुएँ; कलसम्‌--पात्र; तरसा--तुरन्‍्त; अहरनू--छीनलिया |

धन्वन्तरि को अमृत पात्र लिये हुए देखकर असुरों ने पात्र तथा उसके भीतर जो कुछ था उसेचाहने के कारण तुरन्त ही उसे बलपूर्वक छीन लिया |

नीयमानेसुरैस्तस्मिन्कलसेमृतभाजने |

विषण्णमनसो देवा हरिं शरणमाययु: ॥

३६॥

नीयमाने--ले जाया जाकर; असुरैः--असुरों द्वारा; तस्मिन्‌ू--उस; कलसे--पात्र में; अमृत-भाजने-- अमृत से भरे; विषणण-मनसः--खिन्न मन से; देवा: --सारे देवता; हरिम्‌ू-- भगवान्‌ की; शरणम्‌--शरण में; आययु:--गये

जब अमृत का पात्र असुरों द्वारा छीन लिया गया तो देवतागण अत्यन्त खिन्न हो गए |

उन्होंनेजाकर भगवान्‌ हरि के चरणकमलों की शरण ली |

इति तद्दैन्यमालोक्य भगवान्भृत्यकामकृत्‌ |

मा खिद्यत मिथो<र्थ व: साधयिष्ये स्वमायया ॥

३७॥

इति--इस तरह; तत्‌--देवताओं की; दैन्यम्‌--खिन्नता, विषाद; आलोक्य--देखकर; भगवानू्‌-- भगवान्‌; भृत्य-काम-कृत्‌--जो अपने सेवकों की इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं; मा खिद्यत--मत दुखी होओ; मिथ:--झगड़े से;अर्थम्‌--अमृत प्राप्त करने के लिए; व:ः--तुम सबके लिए; साधयिष्ये--सम्पन्न करूँगा; स्व-मायया--अपनी शक्ति से |

अपने भक्तों की मनोकामनाओं को सदा पूरा करने की इच्छा रखने वाले भगवान्‌ ने जबयह देखा कि देवतागण खिन्न हैं, तो उन्होंने उनसे कहा ‘'दुःखी मत होओ |

मैं अपनी शक्ति सेअसुरों में झगड़ा करा कर उन्हें मोहग्रस्त कर लूँगा |

इस प्रकार तुम लोगों की अमृत प्राप्त करनेकी इच्छा मैं पूरी कर दूँगा |

'मिथ: कलिरभूत्तेषां तदर्थे तर्षचेतसाम्‌ |

अहं पूर्वमहं पूर्व न त्वं न त्वमिति प्रभो ॥

३८ ॥

मिथः--परस्पर; कलि:ः--असहमति तथा कलह; अभूत्‌--हुआ; तेषाम्‌--उन सबका; तत्‌-अर्थे-- अमृत के लिए; तर्ष-चेतसाम्‌--विष्णु की माया से मोहग्रस्त चित्त; अहम्‌--मैं; पूर्वमू--पहले; अहम्‌--मैं; पूर्वम्‌ू--पहले; न--नहीं; त्वम्‌--तुम;न--नहीं; त्वमू--तुम; इति--इस प्रकार; प्रभो--हे राजा

हे राजा! तब असुरों के बीच झगड़ा छिड़ गया कि सबसे पहले कौन अमृत ले |

उनमें से हरएक यही कहने लगा ‘तुम पहले नहीं पी सकते |

मुझे सबसे पहले पीना चाहिए |

तुम नहीं, पहलेमैं |

देवा: स्वं भागमर्हन्ति ये तुल्यायासहेतव: |

सत्रयाग इवैतस्मिन्नेष धर्म: सनातन: ॥

३९॥

इति स्वाय्प्रत्यषेधन्वै दैतेया जातमत्सरा: |

दुर्बला: प्रबलान्राजन्गूहीतकलसान्मुहु: ॥

४० ॥

देवा:--देवता; स्वम्‌ भागम्‌--अपना-अपना हिस्सा; अर्हन्ति--लेने के अधिकारी हैं; ये--जो-जो; तुल्य-आयास-हेतव:--जिन्होंने समान प्रयास किया है; सत्र-यागे--यज्ञ सम्पन्न करने में; इब--उसी प्रकार; एतस्मिनू--इस मामले में; एब: --यह;धर्म:--धर्म; सनातनः--शा श्वत; इति--इस प्रकार; स्वान्‌ू--अपनों में; प्रत्यषे धन्‌--एक दूसरे को मना किया; बै--निस्सन्देह;दैतेया:--दिति के पुत्र; जात-मत्सरा:--ईष्यालु; दुर्बला:--निर्बल; प्रबलान्‌--बलपूर्वक; राजन्‌--हे राजा; गृहीत--ग्रहणकिये; कलसान्‌--अमृत पात्र को; मुहुः--निरन्तर |

कुछ असुरों ने कहा ‘सभी देवताओं ने क्षीरसागर के मन्थन में हाथ बँटाया है |

चूँकि हरएक को समान अधिकार है कि वह किसी भी सार्वजनिक यज्ञ में भाग लें अतः सनातन धर्म केअनुसार यह उचित होगा कि अमृत में देवताओं को भी भाग मिले |

' हे राजा! इस प्रकार निर्बलअसुरों ने प्रबल असुरों को अमृत लेने से मना किया |

एतस्मिन्नन्तरे विष्णु: सर्वोपायविदी श्वरः |

योषिद्रूपमनिर्देश्यं दधारपरमाद्भुतम्‌ ॥

४१॥

प्रेक्षणीयोत्पलश्यामं सर्वावयवसुन्दरम्‌ |

समानकर्णाभरणं सुकपोलोन्नसाननम्‌ ॥

४२॥

नवयौवननिर्वृत्तस्तनभारकृशोदरम्‌ |

मुखामोदानुरक्तालिझड्जारोद्धिग्नलोचनम्‌ ॥

४३॥

बिशभ्रत्सुकेशभारेण मालामुत्फुल्लमल्लिकाम्‌ |

सुग्रीवकण्ठाभरणं सुभुजाड्रदभूषितम्‌ ॥

४४॥

विरजाम्बरसंवीतनितम्बद्दीपशोभया |

काज्च्या प्रविलसद्वल्गुचलच्चरणनूपुरम्‌ ॥

४५॥

सत्रीडस्मितविश्षिप्तभूविलासावलोकनै: |

दैत्ययूथपचेत:सु काममुद्दीपयन्मुहु: ॥

४६॥

एतस्मिन्‌ अन्तरे--इस घटना के बाद; विष्णु: -- भगवान्‌ विष्णु ने; सर्व-उपाय-वित्‌--विभिन्न परिस्थितियों से निपटने में पटु;ईश्वरः--परम नियन्ता; योषित्‌-रूपम्‌--सुन्दर स्त्री का रूप; अनिर्देश्यमू--कोई यह निश्चित नहीं कर सका कि वह कौन थी;दधार-- धारण कर लिया; परम--परम; अद्भुतम्‌--अद्भुत; प्रेक्षणीय--देखने में सुहावना; उत्पल-श्यामम्‌--नवीन विकसितकमल के समान शयाम रंग का; सर्व--सारे; अवयव--शरीर के अंग; सुन्दरम्‌--अत्यन्त सुन्दर; समान--एकसमान; कर्ण-आभरणमू--कान के आभूषण; सु-कपोल--सुन्दर गाल; उन्नस-आननम्‌--मुखमण्डल में उभरी नाक; नव-यौवन--नवीनयुवावस्था; निर्वृत्त-स्तन--स्थिर उरोज; भार-- भार; कृश--अत्यन्त दुबली तथा पतली; उदरम्‌--कमर; मुख--मुखमण्डल;आमोद--आननन्‍्द उत्पादक; अनुरक्त--आकृष्ट; अलि-- भौरे; झट्टार--गुन-गुन की आवाज करते; उद्विग्न--चिन्ता से;लोचनमू्‌--उसकी आँख; बिभ्रत्‌ू--चलायमान; सु-केश-भारेण--सुन्दर बालों के भार से; मालाम्‌--फूल की माला से;उत्फुल्ल-मल्लिकाम्‌--पूर्ण विकसित मल्लिका के फूलों से बनी; सु-ग्रीव--सुन्दर गर्दन; कण्ठ-आभरणम्‌--सुन्दर रत्नों सेजटित; सु-भुज--सुन्दर भुजाएँ; अड्भद-भूषितम्‌--बाजूबंदों से सज्जित; विरज-अम्बर--अत्यन्त स्वच्छ वस्त्र; संवीत--फैला;नितम्ब--नितम्ब; द्वीप--द्वीप की तरह लगने वाला; शोभया--ऐसी सुन्दरता से; काञउच्या--करधनी; प्रविलसत्‌--फैली हुई;बल्गु--अत्यन्त सुन्दर; चलतू-चरण-नूपुरम्‌ू--हिलते-डुलते पायल; स-ब्रीड-स्मित-- सलज्ज हास; विक्षिप्त--दृष्टि फेरते; भ्रू-विलास--भौंहों का क्रियाकलाप; अवलोकनै: --देखने से; दैत्य-यूथ-प-- असुरों के नायक; चेतःसु--हृदय में; कामम्‌--कामेच्छा; उद्दीपयत्‌--जगाते हुए; मुहुः--निरन्तर |

तब, किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति का सामना करने में दक्ष भगवान्‌ विष्णु ने एक अत्यन्तसुन्दर स्त्री का रूप धारण कर लिया |

स्त्री के रूप में यह अवतार--मोहिनी मूर्ति--मन को भानेवाला था |

उसका रंग नव-विकसित श्यामल कमल के रंग का था और उसके शरीर का हर अंगसुन्दर ढंग से बना था |

उसके कानों में कुण्डल सजे थे, उसके गाल अतीव सुन्दर थे, उसकीनाक उठी हुई थी और उसका मुखमण्डल युवावस्था की कान्ति से युक्त था |

उसके बड़े-बड़े स्तनों के कारण उसकी कमर अत्यन्त पतली लगती थी |

उसके मुख तथा शरीर की सुगंधि सेआकर्षित भौरें उसके चारों ओर गुनगुना रहे थे और उसकी आँखें चंचल थीं |

उसके बाल अत्यन्तसुन्दर थे और उन पर मल्लिका के फूलों की माला पड़ी थी |

उसकी आकर्षक गर्दन हार तथाअन्य आभूषणों से सुशोभित थी; उसकी बाँहों में बाजूबंद शोभित हो रहे थे; उसका शरीर स्वच्छसाड़ी से ढका था और उसके स्तन सुन्दरता के सागर में द्वीपों की तरह प्रतीत हो रहे थे |

उसकेपाँवों में पायल शोभा दे रहे थे |

जब वह लज्जा से हँसती और असुरों पर बाँकी चितवन फेरती तोउसकी भौंहों के हिलने से सारे असुर कामेच्छा से पूरित हो उठते और उनमें से हर एक उसे अपनाबनाने की इच्छा करने लगा |

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