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अध्याय बाईसवाँ: बलि महाराज ने अपना जीवन समर्पण कर दिया

8.22श्रीशुक उबाचएवं विप्रकृतो राजन्बलिभर्भगवतासुर: |

भिद्यमानोप्यभिन्नात्मा प्रत्याहाविक्लवं वचः ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार, जैसाकि पहले कहा जा चुका है; विप्रकृत:--संकट में'पड़कर; राजन्‌--हे राजा; बलि:--बलि महाराज ने; भगवता--भगवान्‌ वामनदेव द्वारा; असुर:--असुरराज; भिद्यमान: अपि--इस कष्टदायक स्थिति में रहकर भी; अभिन्न-आत्मा--शरीर या मन से विचलित हुए बिना; प्रत्याह--उत्तर दिया; अविक्लवम्‌--अविचल भाव से; वच:--निम्नलिखित शब्द |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा! यद्यपि ऊपर से ऐसा लग रहा था कि भगवान्‌ ने बलिमहाराज के साथ दुर्व्यवहार किया है, किन्तु बलि महाराज अपने संकल्प पर अडिग थे |

यहसोचते हुए कि मैंने अपना वचन पूरा नहीं किया है, वे इस प्रकार बोले |

श्रीबलिरुवाचयद्युत्तमश्लोक भवान्ममेरितंवबचो व्यलीकं सुरवर्य मन्यते |

करोम्यूतं तन्न भवेत्प्रलम्भनंपदं तृतीयं कुरु शीर्णिणि मे निजम्‌ ॥

२॥

श्री-बलि: उबाच--बलि महाराज ने कहा; यदि--यदि; उत्तमएलोक --हे परमेश्वर; भवान्‌ू--आप; मम--मेरा; ईरितम्‌--वादाकिया गया; वच:--वचन, शब्द; व्यलीकम्‌--झूठे; सुर-वर्य --हे सुरों ( देवताओं ) में महानतम; मन्यते--ऐसा सोचते हों;करोमि--करूँगा; ऋतम्‌--सत्य; तत्‌--वह ( वादा ); न--नहीं; भवेत्‌--होगा; प्रलम्भनम्‌ू-- धोखा; पदम्‌--पग; तृतीयम्‌--तीसरा; कुरुू--करें; शीर्ष्णि--सिर पर; मे--मेरे; निजम्‌--अपने चरणकमलों को

बलि महराज ने कहा : हे परमेश्वर, हे सभी देवताओं के परम पूज्य! यदि आप सोचते हैं किमेरा वचन झूठा हो गया है, तो मैं उसे सत्य बनाने के लिए अवश्य ही भूल सुधार दूँगा |

मैं अपनेवचन को झूठा नहीं होने दे सकता |

अतएवं आप कृपा करके अपना तीसरा कमलरूपी पग मेरेसिर पर रखें |

बिभेमि नाहं निरयात्पदच्युतोन पाशबन्धादव्यसनाहुरत्ययात्‌ |

नैवार्थकृच्छाद्धवतो विनिग्रहा-दसाधुवादाद्धृशमुद्दिजे यथा ॥

३॥

बिभेमि--डरता हूँ; न--नहीं; अहम्‌--मैं; निरयात्‌ू--नरक जाने से; पद-च्युत:--न ही अपने स्थान से नीचे गिरने से डरता हूँ;न--न तो; पाश-बन्धात्‌ू--वरुण के पाश द्वारा बाँधे जाने से; व्यसनात्‌ू--कष्ट से; दुरत्ययात्‌--असहा; न--न तो; एव--निश्चयही; अर्थ-कृच्छात्‌--गरीबी से, धनाभाव से; भवत:ः--आप; विनिग्रहात्‌--उस दंड से जिसे अब मैं भोग रहा हूँ; असाधु-वादात्‌--अपयश से; भृशम्‌-- अत्यधिक; उद्विजे--चिन्तित हूँ; यथा--जिस तरह |

मैं अपनी सारी सम्पत्ति से वंचित होने, नारकीय जीवन बिताने, गरीबी के लिए वरुणपाशद्वारा बाँधे जाने या आपके द्वारा दण्डित होने से उतना भयभीत नहीं होता हूँ जितना कि मैं अपनीअपकाीर्ति से डरता हूँ |

पुंसां एलाघ्यतमं मन्ये दण्डमर्हत्तमार्पितम्‌ |

यं न माता पिता भ्राता सुहृदश्चादिशन्ति हि ॥

४॥

पुंसामू--मनुष्यों का; शलाघध्य-तमम्‌ू--अत्यन्त प्रशंसनीय; मन्ये--मानता हूँ; दण्डम्‌--दण्ड को; अहैत्तम-अर्पितम्‌ू--परमआराध्य आपके द्वारा दिये गये; यम्‌ू--जो; न--न तो; माता--माता; पिता--पिता; भ्राता-- भाई; सुहृदः --मित्रगण; च-- भी;आदिशन्ति--अर्पित करते हैं; हि--निस्सन्देह |

यद्यपि कभी-कभी किसी व्यक्ति के पिता, माता, भाई या मित्र उसके हितैषी होने के कारणउसे दण्डित कर सकते हैं, किन्तु वे कभी भी अपने आश्रित को इस प्रकार दण्डित नहीं करते |

किन्तु आप परम पूज्य भगवान्‌ हैं अतएव आपने मुझे जो दण्ण्ड दिया है उसे मैं अत्यन्त प्रशंसनीयसमझता हूँ |

त्वं नूनमसुराणां नः परोक्ष: परमो गुरु: |

यो नोउनेकमदान्धानां विभ्रृशं चश्षुरादिशत्‌ ॥

५॥

त्वमू--तुम; नूनम्‌--निस्सन्देह; असुराणाम्‌-- असुरों का; नः--हम जिस तरह हैं; परोक्ष:--अप्रत्यक्ष; परम:--परम; गुरु:--गुरु; यः--जो ( आप ); न:ः--हमारा; अनेक--कई ; मद-अन्धानाम्‌-- भौतिक ऐश्वर्य से अन्धा बना; विश्रेंशम्‌ू--हमारी मिथ्याप्रतिष्ठा को विनष्ट करके; चश्षु:--ज्ञान का नेत्र; आदिशत्‌--दिया |

चूँकि आप हम असुरों के अप्रत्यक्ष रूप से महानतम शुभचिन्तक हैं, आप हमारे शत्रु कावेश धारण करके भी हमारे सर्वोच्च कल्याण के लिए कर्म करते हैं |

चूँकि हम-जैसे असुर सदैवमिथ्या प्रतिष्ठा का पद पाने की महत्त्वाकांक्षा करते हैं, अतएब आप हमें दण्डित करके हमारेज्ञान-नेत्र खोलते हैं जिनसे हम सन्मार्ग देख सकें |

अस्मिन्वैरानुबन्धेन व्यूढेन विबुधेतरा: |

बहवो लेभिरे सिद्धि यामु हैकान्तयोगिन: ॥

६॥

तेनाहं निगृहीतोस्मि भवता भूरिकर्मणा |

बद्धश्च वारुणै: पाशैर्नातिब्रीडे न च व्यथे ॥

७॥

यस्मिनू--जिसको; वैर-अनुबन्धेन--लगातार शत्रु-जैसा व्यवहार करके; व्यूढेन--ऐसी बुद्धि द्वारा स्थिर; विबुध-इतरा:--असुर(देवताओं से भिन्न ); बहव:ः--उनमें से अनेक ने; लेभिरे--प्राप्त की; सिद्धिम्‌--सिद्धि; यामू--जिसको; उ ह--यह भलीभाँतिज्ञात है; एकान्त-योगिन:--अत्यन्त सफल योगियों की उपलब्धियों के तुल्य; तेन--अतएव; अहम्‌--मैं; निगृहीतः अस्मि--यद्यपि मैं दण्डित हो रहा हूँ; भवता-- आपके द्वारा; भूरि-कर्मणा-- अदभुत कर्म करने वाला; बद्धः च--मैं बन्दी हूँ; वारुणैःपाशैः--वरुण के पाश द्वारा; न अति-ब्रीडे--मैं इससे तनिक भी लज्जित नहीं हूँ; न च व्यथे--न ही मुझे अधिक कष्ट है |

आपसे लगातार शत्रुता रखने वाले अनेक असुरों ने अन्ततः महान्‌ योगियों की सिद्धि्रि प्राप्तकी |

आप एक ही कार्य से अनेक उद्देश्यों की पूर्ति कर सकते हैं; फलस्वरूप यद्यपि आपने मुझेअनेक प्रकार से दण्डित किया है फिर भी मुझे वरुणपाश से बंदी बनाये जाने की न तो लज्जा हैन ही मैं कोई कष्ट अनुभव कर रहा हूँ |

पितामहो मे भवदीयसम्पतःप्रह्माद आविष्कृतसाधुवाद: |

भवद्विपक्षेण विचित्रवैशसंसम्प्रापितस्त्वं परम: स्वपित्रा ॥

८॥

पितामह:--बाबा; मे--मेरे; भवदीय-सम्मतः-- आपके भक्तों द्वारा मान्य; प्रहाद:--प्रहाद महाराज; आविष्कृत-साधु-वाद: --सर्वत्र भक्त के रूप में प्रसिद्ध; भवत्‌-विपक्षेण--आपके विरुद्ध होने मात्र से ही; विचित्र-वैशसम्‌--विभिन्न प्रकार से उत्पीड़नकरते हुए; सम्प्रापित:--कष्ट उठाया; त्वम्‌--तुमने; परम: --परम आश्रय; स्व-पित्रा--अपने ही पिता द्वारा |

मेरे बाबा प्रहाद महाराज आपके सारे भक्तों द्वारा मान्य होकर प्रसिद्ध हैं |

यद्यपि उनके पिताहिरण्यकशिपु ने उन्हें अनेक प्रकार से कष्ट दिए थे, फिर भी वे आपके चरणकमलों का आश्रयलेकर आज्ञाकारी बने रहे |

किमात्मनानेन जहाति योउन्ततःकि रिक्थहारैः स्वजनाख्यदस्युभि: |

कि जायया संसूृतिहेतु भूतयामर्त्यस्य गेहै: किमिहायुषो व्यय: ॥

९॥

किम्‌--क्या लाभ; आत्मना अनेन--इस शरीर से; जहाति--त्याग देता है; यः--जो ( शरीर ); अन्ततः--जीवन के अन्त में;किमू्‌--क्या लाभ; रिक्थ-हारैः--धन के लुटेरों से; स्वजन-आख्य-दस्युभि:--जो स्वजनों के नाम से वास्तव में लुटेरे हैं;किमू--क्या लाभ; जायया--पत्नी से; संसृति-हेतु-भूतया--जो भौतिक दशाओं की वृद्द्धि की स्त्रोत है; मर्त्वस्थ--मरणशीलव्यक्ति का; गेहैः--घर, परिवार तथा जाति से; किम्‌--क्या लाभ; इह--जिस घर में; आयुष: --जीवन का; व्यय: --मात्रविनाश |

उस भौतिक शरीर से क्‍या लाभ जो जीवन के अन्त में अपने स्वामी को स्वतः छोड़ देता है?और परिवार के उन सभी सदस्यों से क्या लाभ जो वास्तव में उस धन का अपहरण कर लेते हैं,जो दिव्य ऐश्वर्य के लिए भगवान्‌ की सेवा में उपयोगी हो सकता है? उस पत्नी से भी क्या लाभजो भौतिक दशाओं को बढ़ाने की स्त्रोत मात्र है |

उस परिवार, घर, देश तथा जाति से भी क्‍यालाभ जिसमें आसक्त होने से सारे जीवन की मूल्यवान शक्ति का मात्र अपव्यय होता है |

इत्थं स निश्चित्य पितामहो महा-नगाधबोधो भवतः पादपद्मम्‌ |

ध्रुवं प्रपेदे ह्कृतोभयं जनादूभीतः स्वपक्षक्षपणस्य सत्तम ॥

१०॥

इत्थम्‌--इसके कारण; सः--वे प्रह्मद महाराज; निश्चित्य--इस बात को निश्चित करके; पितामह:--मेरे बाबा; महान्‌--महान्‌भक्त; अगाध-बोध: --मेरे पितामह जिन्होंने अपनी भक्ति के द्वारा असीम ज्ञान प्राप्त किया; भवत:-- आपके; पाद-पदाम्‌--चरणकमल की; ध्रुवम्‌--अच्युत नित्य आश्रय; प्रपेदे--शरण ग्रहण की; हि--निस्सन्देह; अकुतः-भयम्‌--पूर्णतया निर्भय;जनातू--सामान्यजनों से; भीतः--डरकर; स्वपक्ष- क्षपणस्थय-- आपका, जो हमारे पक्ष के असुरों का वध करते हैं; सत्‌-तम--हेश्रेष्ठों में श्रेष्ठ |

मेरे पितामह जो सभी मनुष्यों में श्रेष्ठ थे और जिन्होंने असीम ज्ञान प्राप्त किया था और जोहर एक द्वारा पूज्य थे, इस जगत के सामान्य लोगों से भयभीत रहते थे |

आपके चरणकमलों मेंप्राप्त होने वाले आश्रय को पूर्णतया समझकर ही उन्होंने आपके द्वारा मारे गये अपने पिता तथाअपने असुर मित्रों की इच्छा के विरुद्ध आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण की थी |

अथाहमप्यात्मरिपोस्तवान्तिकंदैवेन नीतः प्रसभं त्याजितश्री: |

इदं कृतान्तान्तिकवर्ति जीवितंययाश्चुव॑ स्तब्धमतिर्न ब॒ुध्यते ॥

११॥

अथ--इसलिए; अहम्‌--मैं; अपि-- भी; आत्म-रिपो:--परिवार के परम्परागत शत्रु का; तब--तुम्हारे; अन्तिकम्‌ू-- आश्रय;दैवेन--विधिवश; नीतः--लाया गया; प्रसभम्‌--बलपूर्वक; त्याजित--विहीन; श्री:--सारे ऐश्वर्य से; इदम्‌ू--जीवन का यहदर्शन; कृत-अन्त-अन्तिक-वर्ति-- मृत्यु की सुविधा प्राप्त; जीवितम्‌ू--आयु; यया--ऐसे ऐश्वर्य से; अध्रुवम्‌-- क्षणिक; स्तब्ध-मतिः--ऐसा मूर्ख व्यक्ति; न ब॒ुध्यते--समझ नहीं सकता

मैं तो दैववश ही मजबूर होकर आपके चरणों में लाया गया हूँ और अपने समस्त ऐश्वर्य सेविहीन हो गया हूँ |

सामान्य संसारी लोग भौतिक स्थितियों में रहते हुए नश्वर ऐश्वर्य द्वारा उत्पन्नमोह के कारण पग पग पर आकस्मिक मृत्यु का सामना करते हुए भी नहीं समझ पाते कि यहजीवन नश्वर है |

मैं तो दैववश ही उस स्थिति से बच गया हूँ |

श्रीशुक उबाचतस्येत्थं भाषमाणस्य प्रह्मदो भगवत्प्रिय: |

आजगाम कुरुश्रेष्ठ राकापतिरिवोत्थित: ॥

१२॥

श्री-शुक: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; तस्थ--बलि महाराज का; इत्थम्‌--इस प्रकार; भाषमाणस्य--अपनीभाग्यशाली स्थिति का वर्णन करते हुए; प्रह्मद: --महाराज प्रह्माद; भगवत्‌ू-प्रियः-- भगवान्‌ के सर्वाधिक प्रिय भक्त;आजगाम--वहाँ प्रकट हुए; कुरु-श्रेष्ट--हे कुरुओं में श्रेष्ठ महाराज परीक्षित; राका-पति:--चन्द्रमा; इब--सहृश; उत्थित:--उदित हुए |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे कुरुश्रेष्ठी जब बलि महाराज इस प्रकार अपने भाग्य कीप्रशंसा कर रहे थे तो भगवान्‌ के परम प्रिय भक्त प्रह्मद महाराज वहाँ प्रकट हुए मानो रात्रि मेंअन्द्रमा उदय हो गया हो |

तमिन्द्रसेन: स्वपितामहं अ्रियाविराजमान नलिनायतेक्षणम्‌ |

प्रांशूं पिशड्राम्बरमझ्जनत्विषंप्रलम्बबाहुं शुभगर्षभमैक्षत ॥

१३॥

तम्‌--उन प्रह्मद महाराज को; इन्द्र-सेन:--बलि महाराज जिनके पास इन्द्र की सारी सेना थी; स्व-पितामहम्‌-- अपने पितामहको; थ्रिया--सारे सुन्दर अंगों से युक्त उपस्थित; विराजमानम्‌--वहाँ पर खड़े; नलिन-आयत-ईक्षणम्‌--कमल की पंखड़ियोंजितनी चौड़ी आँखों से; प्रांशुम्‌-- अत्यन्त सुन्दर शरीर को; पिशड्भ-अम्बरम्‌--पीत वस्त्र धारण किये; अद्जन-त्विषम्‌--आँखोंके अंजन सहृश शरीर से; प्रलम्ब-बाहुमू--अत्यन्त लम्बी भुजाएँ; शुभग-ऋषभम्‌--सर्व श्रेष्ठ शुभ पुरुष; ऐक्षत--देखा तब

बलि महाराज ने परम भाग्यशाली व्यक्ति अपने पितामह प्रह्माद महाराज को देखाजिनका श्यामल शरीर आँखों के अंजन जैसा लग रहा था |

उनका लम्बा, भव्य शरीर पीताम्बरधारण किये था, उनकी भुजाएँ लम्बी थीं और उनकी सुन्दर आँखें कमल की पंखड़ियों केसमान थीं |

वे सबके अत्यन्त प्रिय तथा मोहक थे |

तस्मै बलिवारुणपाशयन्त्रितःसमर्हणं नोपजहार पूर्ववत्‌ |

ननाम मूर्ध्ना भ्रुविलोललोचन:सब्रीडनीचीनमुखो बभूव ह ॥

१४॥

तस्मै--प्रह्दद महाराज को; बलि: --बलि महाराज ने; वारुण-पाश-यन्त्रित:--वरुणपाश द्वारा बाँधा गया; समर्हणम्‌--उपयुक्तसम्मान; न--नहीं; उपजहार-- प्रदान किया; पूर्ब-बत्‌--पहले की तरह; ननाम--प्रणाम किया; मूर्धना--सिर के बल; अश्रु-बिलोल-लोचन:--अश्रुपूरित नेत्र; स-ब्रीड--लज्जा सहित; नीचीन--नीचा; मुख: --मुख; बभूब ह--हो गया |

वरुणपाश से बँधे होने के कारण बलि महाराज पहले की तरह प्रह्माद महाराज कोभलीभाँति सम्मान नहीं दे पाये |

उन्होंने केवल सिर के द्वारा प्रणाम किया, उनके नेत्र अश्रुपूरित थेऔर लज्जा से उनका सिर नीचा था |

स तत्र हासीनमुदीक्ष्य सत्पतिंहरिं सुनन्दाद्यनुगैरुपासितम्‌ |

उपेत्य भूमौ शिरसा महामनाननाम मूर्ध्ना पुलकाश्रुविक्लव: ॥

१५॥

सः--प्रह्माद महाराज ने; तत्र--वहाँ; ह आसीनम्‌--बैठे हुए को; उदीक्ष्य--देखकर; सत्‌-पतिम्‌--मुक्तात्माओं के स्वामीभगवान; हरिम्‌ू--हरि को; सुनन्द-आदि-अनुगैः--सुनन्द आदि अपने अनुयायियों द्वारा; उपासितम्‌--पूजित; उपेत्य--पासजाकर; भूमौ-- भूमि पर; शिरसा--सिर के बल ( झुककर ); महा-मना:--महान्‌ भक्त; ननाम--प्रणाम किया; मूर्ध्ना--सिर केबल; पुलक-अश्रु-विक्लव:--हर्ष के आँसुओं से विचलित |

जब प्रह्नाद महाराज ने देखा कि वहाँ पर सुनन्द जैसे अपने घनिष्ठ संगियों से घिर कर एवंपूजित होकर भगवान्‌ बैठे हैं, तो उनकी आँखें प्रेमाश्रुओं से छलछला उठीं |

उनके पास जाकरऔर भूमि पर गिरकर उन्होंने सिर के बल भगवान्‌ को प्रणाम किया |

श्रीप्रह्दाद उवाचत्वयैव दत्तं पदमैन्द्रमूर्जितंहतं तदेवाद्य तथेव शोभनम्‌ |

मन्ये महानस्य कृतो हानुग्रहोविभ्रेशितो यच्छिय आत्ममोहनात्‌ ॥

१६॥

श्री-प्रह्माद: उबाच--प्रह्मद महाराज ने कहा; त्वया--आपके द्वारा; एब--निस्सन्देह; दत्तम्‌ू--दिया गया; पदम्‌--यह स्थान;ऐन्द्रमू--इन्द्र का; ऊर्जितम्‌--अत्यन्त महान्‌; हतम्‌ू--छीन लिया गया; तत्‌--वह; एब--निस्सन्देह; अद्य--आज; तथा--जिसप्रकार; एब--निस्सन्देह; शोभनम्‌--सुन्दर; मन्ये--मानता हूँ; महानू--महान्‌; अस्य--इसका ( बलि महाराज का ); कृत:--आपके द्वारा की गई; हि--निस्सन्देह; अनुग्रह:--कृपा; विभ्रशित:--से विहीन; यत्‌-- क्योंकि; अ्िय:--उस ऐश्वर्य से; आत्म-मोहनात्‌ू--जो आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया को आच्छादित करने वाला था |

प्रह्माद महाराज ने कहा : हे प्रभु! इस बलि को इन्द्र पद का महान्‌ ऐश्वर्य आपकी ही देन हैऔर अब उस को आपने ही छीन लिया है |

मेरे विचार से आपका देना-लेना एक सा सुन्दर है |

चूँकि स्वर्ग के राजा का उच्च पद उसे अज्ञान के अंधकार में डाले हुए था अतएवं आपने उसकासारा ऐश्वर्य छीनकर उसके ऊपर महान्‌ अनुग्रह किया है |

यया हि विद्वानपि मुहाते यत-स्तत्को विचष्टे गतिमात्मनो यथा |

तस्मै नमस्ते जगदी श्वराय वेनारायणायाखिललोकसाक्षिणे ॥

१७॥

यया--जिस ऐश्वर्य से; हि--निस्सन्देह; विद्वान अपि--विद्वान भी; मुह्यते--मोहित हो जाता है; यत:--आत्म-नियंत्रित; तत्‌--वह; कः--कौन; विचष्टे--ढूँढ सकता है; गतिम्‌--उन्नति; आत्मन:--अपनी; यथा-- भलीभाँति; तस्मै-- उसको; नमः --सादरनमस्कार करता हूँ; ते--तुमको; जगत्‌-ईश्वराय--ब्रह्माण्ड के स्वामी को; बै--निस्सन्देह; नारायणाय--नारायण को; अखिल-लोक-साक्षिणे--समस्त सृष्टि के साक्षी

भौतिक ऐश्वर्य इतना मोहक है कि विद्वान तथा आत्मसंयमी व्यक्ति भी आत्म-साक्षात्कार केलक्ष्य को खोजना भूल जाता है |

लेकिन भगवान्‌ नारायण, जो ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं, अपनीइच्छानुसार प्रत्येक वस्तु को देख सकते हैं |

अतएव मैं उन्हें सादर प्रणाम करता हूँ |

श्रीशुक उबाचतस्यानुश्रुण्वतो राजन्प्रह्नदस्य कृताझले: |

हिरण्यगर्भो भगवानुवाच मधुसूदनम्‌ ॥

१८ ॥

श्री-शुक: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; तस्य--उस; अनुश्रृण्बतः--जिससे वह सुन सके; राजनू--हे राजा परीक्षित;प्रह्मदस्थ--प्रह्ाद महाराज का; कृत-अज्जले:--हाथ जोड़े खड़ा; हिरण्यगर्भ: --ब्रह्माजी ने; भगवान्‌--सर्वशक्तिमान; उबाच--कहा; मधुसूदनम्‌--मधुसूदन भगवान्‌ से |

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजा परीक्षित! तब ब्रह्माजी अपने पास हाथ जोड़करखड़े प्रह्दाद महाराज को सुनाकर भगवान्‌ से कहने लगे |

बद्धं वीक्ष्य पतिं साध्वी तत्पत्ती भयविहला |

प्राज्नलिः प्रणतोपेन्द्रं बभाषेडबाड्मुखी नूप ॥

१९॥

बद्धम्‌--बन्दी किया गया; वीक्ष्य--देखकर; पतिम्‌-- अपने पति को; साध्वी--सती स्त्री; तत्‌ू-पत्ती--बलि महाराज की पत्नीने; भय-विहला--डर के मारे अत्यन्त उद्विग्न; प्राज्ललि:--हाथ जोड़े; प्रणता--नमस्कार करके; उपेन्द्रमू--वामनदेव को;बभाषे--सम्बोधित किया; अवाक्‌-मुखी --सिर नीचा किये; नृप--हे महाराज परीक्षित |

लेकिन बलि महाराज की सती पत्नी अपने पति को बन्दी देखकर भयभीत तथा दुःखी थी |

उसने तुरन्त भगवान्‌ वामनदेव ( उपेन्द्र ) को नमस्कार किया और हाथ जोड़कर इस प्रकार बोली |

क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत्कृतं तेस्वाम्यं तु तत्र कुधियोपर ईश कुर्यु: |

कर्तुः प्रभोस्तव किमस्थत आवहन्तित्यक्तहियस्त्वदवरोपषितकर्तृवादा: ॥

२०॥

श्री-विन्ध्यावलि: उबाच--बलि महाराज की पली विन्ध्यावलि ने कहा; क्रीडा-अर्थम्‌--लीला के लिए; आत्मन:--अपनी;इदम्‌--यह; त्रि-जगत्‌--तीनों लोक ( ब्रह्माण्ड ); कृतम्‌--उत्पन्न किया गया; ते--आपके द्वारा; स्वाम्यम्‌--स्वामित्व; तु--लेकिन; तत्र--तत्पश्चात्‌; कुधिय: --मूर्खजन; अपरे-- अन्य; ईश--हे परम पालक, हे प्रभु; कुर्यु:--स्थापित किया है; कर्तु:--परमस्त्रष्टा के लिए; प्रभो:--परम पालक के लिए; तवब--तुम्हारे लिए; किम्‌--क्या; अस्यत:--परम संहारक को; आवहन्ति--अर्पित कर सकते हैं; त्यक्त-हियः--निर्लज्न, बुद्धिहीन; त्वत्‌--आपके द्वारा; अवरोपित--अल्पज्ञान के कारण आरोपित; कर्तृ-वादाः--ऐसे मूर्खो का स्वामित्व |

श्रीमती विन्ध्यावलि ने कहा : हे प्रभु! आपने निजी लीलाओं का आनन्द उठाने के लिएसम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की है, किन्तु मूर्ख तथा बुद्धिहीन व्यक्तियों ने भौतिक भोग के लिएउस पर अपना स्वामित्व जताया है |

निस्सन्देह, वे निर्लज्ज संशयवादी हैं |

वे झूठे ही स्वामित्वजताकर यह सोचते हैं कि वे उसको दान दे सकते हैं और भोग सकते हैं |

ऐसी दशा में भला वेआपकी कौन सी भलाई कर सकते हैं, जो इस ब्रह्माण्ड के स्वतंत्र स्त्रष्टा, पालक तथा संहारकहैं? श्रीब्रह्मोवाचभूतभावन भूतेश देवदेव जगन्मय |

मुझेनं हतसर्वस्वं नायमर्हति निग्रहम्‌ ॥

२१॥

श्री-ब्रह्मा उबाच--ब्रह्माजी ने कहा; भूत-भावन--हे सबके शुभेच्छु; भूत-ईश--हे सबके स्वामी; देव-देव--हे देवताओं के भीपूज्य देव; जगत्‌-मय-हे सर्वव्यापक; मुझ्न--कृपया छोड़ दें; एनम्‌--इस बेचारे बलि महाराज को; हत-सर्वस्वम्‌--जिसकासर्वस्व छिन गया है; न--नहीं; अयम्‌--यह बेचारा; अ्हति--पात्र है; निग्रहम्‌ू--दण्ड का

ब्रह्माजी ने कहा : हे समस्त जीवों के हितैषी एवं स्वामी, हे सभी देवताओं के पूज्य देव, हेसर्वव्यापी भगवान्‌! अब यह व्यक्ति पर्याप्त दण्ड पा चुका है क्योंकि आपने इसका सर्वस्व लेलिया है |

अब आप इसे छोड़ दें |

अब यह अधिक दण्डित होने का पात्र नहीं है |

कृत्सना तेउनेन दत्ता भूलोंकाः कर्मार्जिताश्व ये |

निवेदितं च सर्वस्वमात्माविक्लवया धिया ॥

२२॥

कृत्स्नाः:--सभी; ते--तुमको; अनेन--बलि महाराज द्वारा; दत्ता:--दिया जा चुका; भू: लोकाः--सारी भूमि तथा सारे लोक;कर्म-अर्जिता: च--जो कुछ उसने अपने पुण्यकर्मों से प्राप्त किया था; ये--जो; निवेदितम्‌ च--आपको अर्पित हो चुके;सर्वस्वम्‌--उसके पास जो कुछ था वह सब; आत्मा--यहाँ तक कि शरीर भी; अविक्लवया--बिना हिचक के; धिया--ऐसीबुद्धि से बलि महाराज ने आपको पहले ही अपना सर्वस्व दे दिया था |

उन्होंने बिना हिचक के अपनीभूमि, अपने सारे लोक तथा अपने पुण्यकर्मों से जो कुछ अन्य भी अर्जित किया था, यहाँ तककि अपने शरीर को भी अर्पित कर दिया है |

यत्पादयोरशठधी: सलिलं प्रदायदूर्वाड्डुरैरपि विधाय सतीं सपर्याम्‌ |

अप्युत्तमां गतिमसौ भजते त्रिलोकींदाश्वानविक्लवमना: कथमार्तिमृच्छेत्‌ू ॥

२३॥

यत्‌ू-पादयो:--आपके चरणकमलों पर; अशठ-धी:--द्वैतरहित विशाल हृदय वाला व्यक्ति; सलिलमू--जल; प्रदाय--देकर;दूर्वा--घास; अह्'ुरैः --तथा फूल की कलियों से; अपि--यद्यपि; विधाय--अर्पित करके; सतीम्‌--परम पूज्य; सपर्याम्‌ू-पूजासहित; अपि--यद्यपि; उत्तमाम्‌--अत्यन्त उच्च; गतिमू--लक्ष्य; असौ--ऐसा पूजक; भजते--पात्र होता है; त्रि-लोकीम्‌--तीनों लोकों को; दाश्वानू--आपको देते हुए; अविक्लव-मना:--बिना किसी मानसिक द्वैत के; कथम्‌--कैसे; आर्तिम्‌--बन्दी बनायेजाने के क्लेश का; ऋच्छेत्‌-- भागी है |

जिनके मन में द्वैत नहीं होता वे आपके चरणों में केवल जल, दूर्वादल या अंकुर अर्पितकरके बैकुण्ठ में उच्चतम स्थान प्राप्त कर सकते हैं |

इन बलि महाराज ने अब बिना द्वैत के तीनोंलोकों की प्रत्येक वस्तु आपको अर्पित कर दी है |

तो फिर वे बन्दी होने के कष्ट के भागी कैसेहो सकते हैं ? श्रीभगवानुवाचब्रह्मन्यमनुगृह्लामि तद्विशो विधुनोम्यहम्‌ |

यन्मद: पुरुष: स्तब्धो लोक मां चावमन्यते ॥

२४॥

श्री-भगवान्‌ उबाच-- भगवान्‌ ने कहा; ब्रह्मनू--हे ब्रह्माजी; यमू--जिस पर; अनुगृह्ञामि--मैं दया करता हूँ; तत्‌--उसका;विशः--ऐश्वर्य; विधुनोमि--छीन लेता हूँ; अहम्‌ू--मैं; यत्‌-मदः --इस धन के कारण झूठी प्रतिष्ठा होने से; पुरुष:--ऐसाव्यक्ति; स्तब्ध:--कुंद बुद्धि होकर; लोकम्‌--तीनों लोक; माम्‌ च--मेरी भी; अवमन्यते--अवहेलना करता |

भगवान्‌ ने कहा : हे ब्रह्माजी! भौतिक ऐश्वर्य के कारण मूर्ख व्यक्ति मन्दबुद्धि एवं पागल होजाता है |

इस तरह तीनों लोकों में वह किसी का सम्मान नहीं करता और मेरी सत्ता की भीअवहेलना करता है |

सर्वप्रथम ऐसे व्यक्ति की सारी सम्पत्ति छीनकर मैं उस पर विशेष अनुग्रहप्रदर्शित करता हूँ |

यदा कदाचिज्ीवात्मा संसरन्निजकर्मभि: |

नानायोनिष्वनीशोयं पौरूषीं गतिमाव्रजेतू ॥

२५॥

यदा--जब; कदाचित्‌--कभी -क भी; जीव-आत्मा--जीव; संसरन्‌--जन्म तथा मृत्यु के चक्र में घूमते हुए; निज-कर्मभि: --अपने कर्मो के कारण; नाना-योनिषु--अनेक योनियों में; अनीश:--पराभ्रित ( माया के वश में ); अयम्‌--यह जीव; पौरुषीम्‌गतिमू--मनुष्य का पद; आब्रजेत्‌-- प्राप्त करना चाहता है|

अपने ही सकाम कर्मों के कारण विभिन्न योनियों में जन्म-मरण के चक्र में बारम्बार घूमतेहुए परतंत्र जीव भाग्यवश मनुष्य का शरीर प्राप्त कर सकता है |

यह मनुष्य-जन्म विरले ही प्राप्तहो पाता है |

जन्मकर्मवयोरूपविद्यैश्वर्थथनादिभि: |

यद्यस्य न भवेत्स्तम्भस्तत्रायं मदनुग्रह: ॥

२६॥

जन्म--कुलीन परिवार में जन्म लेकर; कर्म--अद्भुत कर्मो या पुण्य कर्मों के द्वारा; वयः--आयु से, विशेषतया युवावस्था मेंजब मनुष्य अनेक कार्य कर सकता है; रूप--निजी सौन्दर्य से, जिससे सभी आकृष्ट होते हैं; विद्या--विद्या से; ऐश्वर्य--ऐश्वर्यसे; धन--धन; आदिभि:--इत्यादि से; यदि--यदि; अस्य--स्वामी का; न--नहीं; भवेत्‌--है; स्तम्भ:--घमंड; तत्र--ऐसीअवस्था में; अयम्‌-्यक्ति; मत्‌-अनुग्रह:--समझो कि उसे मेरी विशेष कृपा प्राप्त हो गई है |

यदि कोई मनुष्य उच्चकुल में जन्मा हो, यदि वह अद्भुत कर्म करे, यदि वह तरुण हो, यदिउसके पास सौन्दर्य, उत्तम शिक्षा तथा प्रचुर सम्पत्ति हो और यदि वह इतने पर भी अपने ऐश्वर्यपर न इतराये तो यह समझना चाहिए कि उस पर भगवान्‌ की विशेष कृपा है |

मानस्तम्भनिमित्तानां जन्मादीनां समन्ततः |

सर्वश्रेय:प्रतीपानां हन्त मुहोन्न मत्पर: ॥

२७॥

मान--झूठी प्रतिष्ठा का; स्तम्भ--इस थधृष्टता के कारण; निमित्तानामू--कारणों का; जन्म-आदीनाम्‌--उच्चकुल में जन्मइत्यादि; समन्ततः--सब मिलाकर; सर्व-श्रेय:--जीवन के परम लाभ के लिए; प्रतीपानामू--बाधाओं का; हन्त--भी; मुह्ेत्‌--मोहग्रस्त हो जाता है; न--नहीं; मत्‌-पर:--मेरा अनन्य भक्त

यद्यपि उच्चकुल में जन्म एवं ऐसे अन्य ऐश्वर्य भक्ति की उन्नति में बाधक होते हैं क्योंकि येझूठी प्रतिष्ठा तथा घमंड के कारण हैं, किन्तु ये ऐश्वर्य भगवान्‌ के अनन्य भक्त को कभीविचलित नहीं करते |

एष दानददैत्यानामग्रनी: कीर्तिवर्धन: |

अजैषीदजयां मायां सीदन्नपि न मुहाति ॥

२८॥

एष:--यह बलि महाराज; दानव-दैत्यानाम्‌--असुरों तथा नास्तिकों में; अग्रनी:--अग्रगण्य भक्त; कीर्ति-वर्धन:--अत्यन्तविख्यात; अजैषीत्‌--पहले ही बाजी मार चुका है; अजयाम्‌--अजेय; मायाम्‌--माया को; सीदन्‌--( सारे ऐश्वर्य से ) विहीनहोकर; अपि--यद्यपि; न--नहीं; मुह्मति--मोहग्रस्त होता है |

बलि महाराज असुरों एवं नास्तिकों में सर्वाधिक विख्यात हो गये हैं क्योंकि अपने सारे ऐश्वर्यसे वंचित होकर भी वे अपनी भक्ति में अचल हैं |

क्षीणरिक्थए्च्युतः स्थानात्क्षिप्तो बद्धश्च शत्रुभि: |

ज्ञातिभिश्च परित्यक्तो यातनामनुयापित: ॥

२९॥

गुरुणा भर्त्सितः शप्तो जहौ सत्य॑ं न सुब्रतः |

छलैरुक्तो मया धर्मो नायं त्यजति सत्यवाकू ॥

३०॥

क्षीण-रिक्थ:--समस्त प्रकार के धनधान्य से विहीन; च्युत:--गिरा हुआ; स्थानात्‌--अपने श्रेष्ठ स्थान से; क्षिप्त:--बलपूर्वकफेंका गया; बद्ध: च--तथा जबरदस्ती बाँधा गया; शत्रुभिः--अपने शत्रुओं द्वारा; ज्ञातिभि: च--तथा अपने कुटुम्बियों द्वारा;परित्यक्त:--त्यागा गया; यातनाम्‌--सभी प्रकार के कष्ट; अनुयापित:--असामान्य रूप से गहन दुख भोगा हुआ; गुरुणा--अपने गुरु द्वारा; भर्त्सित:--भर्त्सना किया गया; शप्त:--तथा शापित; जहौ--छोड़ दिया; सत्यम्‌--सत्य को; न--नहीं; सु-ब्रतः--अपने ब्रत में अटल; छलै:--छल द्वारा; उक्त:--कहा गया; मया--मेरे द्वारा; धर्म:--धर्म; न--नहीं; अयम्‌--यह बलिमहाराज; त्यजति--त्याग देता है; सत्य-वाक्‌--अपने वचन का पक्का

बलि महाराज यद्यपि धनविहीन, अपने मौलिक पद से च्युत, अपने शत्रुओं द्वारा पराजिततथा बन्दी बनाये गये, अपने कुटुम्बियों तथा मित्रों द्वारा भर्तिसित हुए और परित्यक्त, बाँधे जानेकी पीड़ा से पीड़ित तथा अपने गुरु द्वारा भर्त्सित तथा शापित थे, किन्तु वे अपने व्रत में अटलरहे |

उन्होंने अपना सत्य नहीं छोड़ा |

मैंने तो निश्चित रूप से छल से धर्म के विषय में बातें कहीं,किन्तु उन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा क्योंकि वे अपने बचन के पक्षे हैं |

एष मे प्रापितः स्थान दुष्प्रापममररपि |

सावर्णेरन्तरस्यायं भवितेन्द्रो मदाअ्रयः ॥

३१॥

एष:--बलि महाराज; मे--मेरे द्वारा; प्रापित:--प्राप्त किया है; स्थानम्‌ू--स्थान; दुष्प्रापम्‌--प्राप्त करने में अत्यन्त कठिन;अमर: अपि--यहाँ तक कि देवताओं के द्वारा भी; सावर्णे: अन्तरस्थ--सावर्णि मनु के काल में; अयम्‌--यह बलि महाराज;भविता--होगा; इन्द्र: --स्वर्ग का स्वामी; मत्‌-आश्रय: --पूर्णतः मेरे संरक्षण में ॥

भगवान्‌ ने आगे कहा : उसकी महान्‌ सहनशक्ति के कारण मैंने उसे वह स्थान प्रदान कियाहै, जो देवताओं को भी सुलभ नहीं हो पाता |

वह सावर्णि मनु के काल में स्वर्ग का राजा बनेगा |

तावत्सुतलमध्यास्तां विश्वकर्मविनिर्मितम्‌ |

यदाधयो व्याधयश्व क्लमस्तन्द्रा पराभव: |

नोपसर्गा निवसतां सम्भवन्ति ममेक्षया ॥

३२॥

तावत्‌--जब तक तुम इन्द्र के पद पर नहीं हो; सुतलम्‌--सुतल नामक लोक; अध्यास्ताम्‌--वहाँ जाकर उस स्थान पर अधिकारजमाओ; विश्वकर्म-विनिर्मितम्‌--विश्वकर्मा द्वारा विशेष रूप से निर्मित; यत्‌--जिसमें; आधय:--मानसिक क्लेश; व्याधय: --शरीर सम्बन्धी कष्ट; च-- भी; कलम:-- थकान; तन्द्रा-- आलस्य; पराभव:--पराजित होकर; न--नहीं; उपसर्गा:-- अन्यउपद्रवों के लक्षण; निवसताम्‌--वहाँ रहने वालों का; सम्भवन्ति--सम्भव होते हैं; मम--मेरी; ईक्षया--विशेष निगरानी से

जब तक बलि महाराज स्वर्ग के राजा ( इन्द्र ) का पद प्राप्त नहीं कर लेते तब तक वेसुतललोक में रहेंगे जिसे विश्वकर्मा ने मेरे आदेश से निर्मित किया था |

चूँकि इसकी रक्षा मेरेद्वारा विशेष रूप से होती है अतएवं यह मानसिक तथा शारीरिक व्याधियों, थकान, आलस्य,'पराजय तथा अन्य सभी उपद्रवों से मुक्त है |

हे बलि महाराज! अब तुम वहाँ जाकर शान्तिपूर्वकरह सकते हो |

इन्द्रसेन महाराज याहि भो भद्गमस्तु ते |

सुतलं स्वर्गिशि: प्रार्थ्य ज्ञातिभि: परिवारित: ॥

३३॥

इन्द्रसेन--हे महाराज बलि; महाराज--हे राजा; याहि--जाओ; भो:--हे राजा; भद्रमू--कल्याण; अस्तु--हो; ते--तुम्हारा;सुतलम्‌--सुतललोक में; स्वर्गिभि: --देवताओं द्वारा; प्रार्थ्यम्‌--वांछित; ज्ञातिभिः--आपके कुटुम्बियों द्वारा; परिवारित:--घिरेहुए

हे बलि महाराज ( इन्द्रसेन )) तुम उस सुतललोक में जाओ जिसकी कामना देवता भी करतेहैं |

वहाँ अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों की संगति में शान्तिपूर्वक रहो |

तुम्हारा कल्याण हो |

न त्वामभिभविष्यन्ति लोकेशा: किमुतापरे |

त्वच्छासनातिगान्दैत्यां श्रक्रं मे सूदयिष्यति ॥

३४॥

न--नहीं; त्वामू--तुमको; अभिभविष्यन्ति--जीत सकेंगे; लोक-ईशा:--विभिन्न लोकों के प्रधान देवता; किम्‌ उत अपरे--सामान्य लोगों के विषय में क्या कहा जाये; त्वत्‌-शासन-अतिगान्‌--जो तुम्हारे आदेशों का उल्लंघन करते हैं; दैत्यानू--ऐसेदैत्यों को; चक्रमू--चक्र; मे--मेरा; सूदयिष्यति--मार डालेगा सुतललोक में

सामान्य लोग तो क्‍या, अन्य लोकों के प्रधान देवता भी तुम्हें नहीं जीतपायेंगे |

रही असुरों की बात, यदि वे तुम्हारे शासन का उल्लंघन करेंगे तो मेरा चक्र उनका वधकर देगा |

रक्षिष्ये सर्वतोहं त्वां सानुगं सपरिच्छदम्‌ |

सदा सन्निहितं बीर तत्र मां द्रक्ष्य्ते भवान्‌ ॥

३५॥

रक्षिष्ये--रक्षा करूँगा; सर्वतः--सभी प्रकार से; अहम्‌--मैं; त्वाम्‌--तुम्हारी; स-अनुगम्‌--तुम्हारे संगियों सहित; स-परिच्छदम्‌--साज-सामान सहित; सदा--सदैव; सन्निहितम्‌--पास ही रहकर; वीर--हे शूरवीर; तत्र--वहाँ, अपने स्थान में;माम्‌--मुझको; द्रक्ष्यते--देख सकोगे; भवान्‌ू--तुम |

हे शूरवीर! मैं सदैव तुम्हारे साथ रहूँगा और तुम्हारे संगियों तथा साज-सामग्री समेत तुम्हेंसभी प्रकार से संरक्षण प्रदान करूँगा |

साथ ही, तुम वहाँ मुझे सदैव देख सकोगे |

तत्र दानददैत्यानां सद्जात्ते भाव आसुरः |

इृष्टा मदनुभावं वै सद्य: कुण्ठो विनड्झ््यति ॥

३६॥

तत्र--उस स्थान में; दानव-दैत्यानाम्‌--असुरों तथा दानवों की; सड्भात्‌ू--संगति से; ते--तुम्हारी; भाव: --मनोवृत्ति; आसुर: --आसुरी; दृष्टा--देखकर; मत्‌-अनुभावम्‌--मेरी सर्वश्रेष्ठ शक्ति; बै--निस्सन्देह; सद्यः --तुरन्त; कुण्ठ:--चिन्ता; विनड्छ््यति--नष्ट हो जायेगी |

चूँकि तुम्हें वहाँ मेरे परम पराक्रम का दर्शन होगा अतएवं असुरों तथा दानवों की संगति सेतुममें जो भौतिकतावादी विचार एवं चिन्ताएँ उदित हुई हैं, वे तुरन्त ही विनष्ट हो जायेंगी |

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