← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 8 की सूची
अध्याय तेईसवाँ: देवताओं को स्वर्गीय ग्रह पुनः प्राप्त हुए
8.23श्रीशुक उबाचइत्युक्तवन्तं पुरुष पुरातनंमहानुभावोखिलसाधुसम्मतः |
बद्धाञलिबंष्पकलाकुलेक्षणोभकत्युत्कलो गद्गदया गिराब्रवीत् ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; उक्तवन्तम्-- भगवान् के आदेश पर; पुरुषम्-- भगवान्को; पुरातनम्--सबसे अधिक पुरातन; महा-अनुभाव: --बलि महाराज जो महात्मा थे; अखिल-साधु-सम्मत:--सभी सन्तपुरुषों द्वारा अनुमोदित; बद्ध-अज्जञलि:--हाथ जोड़कर; बाष्प-कल-आकुल-ईक्षण:-- अश्रुपूरित नेत्रों से; भक्ति-उत्कल:--प्रेमा-भक्ति से पूरित; गद्गदया--भक्ति-भाव में अवरुद्ध होती; गिरा--वाणी से; अब्नवीत्ू--कहा |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब परम पुरातन नित्य भगवान् ने सर्वत्रमान्य शुद्ध भक्त एवंमहात्मा बलि महाराज से यह कहा तो बलि महाराज ने आँखों में आँसू भरकर, हाथ जोड़करतथा भक्ति-भाव के कारण लड़खड़ाती वाणी से इस प्रकार कहा |
श्रीबलिरुवाचअहो प्रणामाय कृतः समुद्यमःप्रपन्नभक्तार्थविधौ समाहित: |
यल्लोकपालैस्त्वदनुग्रहो उमरै-रलब्धपूर्वोडपसदेउसुरेडर्पित: ॥
२॥
श्री-बलिः उवाच--बलि महाराज ने कहा; अहो--ओह; प्रणामाय-- अपना सादर नमस्कार अर्पित करने के लिए; कृत:--मैंनेकिया; समुद्यम:--केवल एक प्रयास; प्रपन्न-भक्त-अर्थ-विधौ--शुद्ध भक्तों द्वारा माने जाने वाले विधि-विधानों में;समाहितः--समर्थ है; यत्--जो; लोक-पालै: --विभिन्न लोकों के प्रधानों द्वारा; त्वत्-अनुग्रहः-- आपकी अहैतुकी कृपा;अमरैः--देवताओं द्वारा; अलब्ध-पूर्व:--इसके पूर्व अप्राप्त; अपसदे--मुझ जैसे पतित व्यक्ति पर; असुरे--असुर वंश वाले;अर्पित:--अर्पित |
बलि महाराज ने कहा : आपको सादर नमस्कार करने के प्रयास में भी कैसा अद्भुत प्रभावहै! मैंने तो आपको अपना नमस्कार अर्पित करने का प्रयास ही किया था, किन्तु वह प्रयास शुद्धभक्तों के प्रयासों के समान सफल सिद्ध हुआ |
आपने मुझ पतित असुर पर जो अहैतुकी कृपाप्रदर्शित की है, वह देवताओं या लोकपालों को भी कभी प्राप्त नहीं हुई |
ह कि तः कि ते जज कि तेश्रीशुक उवाचइत्युक्त्वा हरिमानत्य ब्रह्माणं सभवं ततः |
विवेश सुतलं प्रीतो बलिर्मुक्त: सहासुरै: ॥
३॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति उक्त्वा--यह कहकर; हरिम्--हरि को; आनत्य--नमस्कार करके;ब्रह्मणम्--ब्रह्माजी को; स-भवम्--शिवजी के साथ; ततः--तत्पश्चात्; विवेश--प्रवेश किया; सुतलम्ू--सुतललोक में;प्रीतः--पूरी तरह प्रसन्न; बलि:--बलि महाराज ने; मुक्त:--इस प्रकार बन्धन से मुक्त; सह असुरैः--अपने असुर संगियों केसाथ
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस प्रकार कहने के पश्चात् बलि महाराज ने सर्वप्रथमभगवान् हरि को और फिर ब्रह्माजी तथा शिवजी को नमस्कार किया |
इस तरह वे नागपाश ( वरुणपाश ) से मुक्त कर दिये गये और पूर्णतया सन्तुष्ट होकर सुतललोक में प्रविष्ट हुए |
एवमिन्द्राय भगवाद्प्रत्यानीय त्रिविष्टपम् |
पूरयित्वादिते: काममशासत्सकलं जगत् ॥
४॥
एवम्--इस तरह; इन्द्राय--इन्द्र को; भगवानू-- भगवान् ने; प्रत्यानीय--वापस देकर; त्रि-विष्टपम्--स्वर्ग लोकों में अपनीश्रेष्ठता; पूरयित्वा--पूरा करके; अदितेः--अदिति की; कामम्--इच्छा; अशासत्--शासन किया; सकलम्ू-ूर्ण; जगत्--ब्रह्माण्ड |
इस प्रकार इन्द्र को स्वर्गलोकों का स्वामित्व प्रदान करके तथा देवमाता अदिति की इच्छापूरी करके भगवान् ब्रह्माण्ड के कार्यकलापों पर शासन करने लगे |
लब्धप्रसादं निर्मुक्तं पौत्रं वंशधरं बलिम् |
निशाम्य भक्तिप्रवण: प्रह्मद इृदमब्रवीत् ॥
५॥
लब्ध-प्रसादम्ू--जिसे भगवान् का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था; निर्मुक्तम्--बन्धन से छोड़ा गया; पौत्रम्--अपने नाती को; बंश-धरम्--वंशज; बलिम्--बलि महाराज को; निशाम्य--सुनकर; भक्ति-प्रवण:--भक्ति-भाव से पूरित; प्रह्मद:--प्रह्माद महाराजने; इदम्--यह; अब्रवीत्ू--कहा
जब प्रह्नाद महाराज ने सुना कि उनका पौत्र तथा वंशज बलि महाराज किस तरह बन्धन सेमुक्त किया गया है और उसे भगवान् का आशीर्वाद प्राप्त हुआ है, तो वे अत्यधिक प्रेमा-भक्तिके स्वर में इस प्रकार बोले |
श्रीप्रहाद उवाचनेमं विरिश्ञो लभते प्रसादंन श्रीर्न शर्व: किमुतापरेउन्ये |
यन्नोउसुराणामसि दुर्गपालोविश्वाभिवन्दैरभिवन्दिताड्ध्रि: ॥
६॥
श्री-प्रह्मद: उवाच-- प्रह्नाद महाराज ने कहा; न--नहीं; इमम्--यह; विरिज्ञः--ब्रह्माजी भी; लभते--प्राप्त कर सकता है;प्रसादम्-- आशीर्वाद; न--न तो; श्री:--लक्ष्मीजी; न--न तो; शर्व:--शिवजी; किम् उत--क्या कहा जाये; अपरे अन्ये--अन्य; यत्--जो आशीर्वाद; नः--हम; असुराणाम्--असुरों का; असि--हो; दुर्ग-पाल:--पालक; विश्व-अभिवन्द्चै:--समस्तब्रह्माण्ड में पूजित ब्रह्माजी तथा शिवजी जैसे महापुरुषों के द्वारा; अभिवन्दित-अड्धघ्रि:--जिनके चरणकमल पूज्य हैं |
प्रह्ाद महाराज ने कहा : हे भगवान्! आप विश्वपूज्य हैं, यहाँ तक कि ब्रह्माजी तथा शिवजीभी आपके चरणकमलों की पूजा करते हैं |
इतने महान् होते हुए भी आपने कृपापूर्वक हम असुरों की रक्षा करने का वचन दिया है |
मेरा विचार है कि ब्रह्माजी, शिवजी या लक्ष्मीजी को भी कभीऐसी दया प्राप्त नहीं हुईं; तो अन्य देवताओं या सामान्य व्यक्तियों की बात ही क्या है! यत्पादपद्ममकरन्दनिषेवणेनब्रह्मादय: शरणदाश्नुवते विभूती: |
कस्माह्दयं कुसृतयः खलयोनयस्तेदाक्षिण्यदृष्टिपदवीं भवतः प्रणीता: ॥
७॥
यत्--जिसके ; पाद-पढ--चरणकमल के; मकरन्द--मधु का; निषेवणेन--सेवा करने की मिठास को चखकर; ब्रह्म-आदय: --ब्रह्माजी जैसे महापुरुष; शरण-द--हे सबके परम आश्रय भगवान्; अश्नुवते-- भोग करते हैं; विभूती:--आपके द्वारादिये गये आशीर्वाद; कस्मात्ू-कैसे; वयम्--हम सब; कु-सृतयः--सारे धूर्त तथा चोर; खल-योनय:--ईर्ष्या रखने वाले वंश( असुर वंश ) में उत्पन्न; ते--वे असुर; दाक्षिण्य-दृष्टि-पदवीम्--दयादृष्टि से प्राप्त पद; भवतः--आपका; प्रणीता:--प्राप्त कियाहै |
हे सबके परम आश्रय! ब्रह्माजी जैसे महापुरुष आपके चरणकमलों की सेवा रूपी मधु कास्वाद चखने मात्र से सिद्धि को भोग पाते हैं |
किन्तु हम लोगों पर, जो सारे के सारे धूर्त हैं औरअसुरों के ईर्ष्यालु वंश में जन्मे हैं आपकी कृपा किस प्रकार हो सकी ? यह तो केवल इसीलिएसम्भव हो सका है क्योंकि आपकी कृपा अहैतुकी है |
चित्र तवेहितमहो मितयोगमाया-लीलाविसूष्टभुवनस्य विशारदस्य |
सर्वात्मग: समहशोविषम: स्वभावोभक्तप्रियो यदसि कल्पतरुस्वभाव: ॥
८॥
चित्रम्--अत्यन्त अद्भुत; तव ईहितम्--तुम्हारे सारे कार्यकलाप; अहो --ओह; अमित-- असीम; योगमाया--आपकीआध्यात्मिक शक्ति की; लीला--लीला द्वारा; विसृष्ट-भुवनस्य--आपका, जिन्होंने समस्त ब्रह्माण्डों की सृष्टि की है;विशारदस्य--सभी प्रकार से पटु आपका; सर्व-आत्मन:--सर्वव्यापी भगवान् का; सम-हृश:--सबके प्रति समभाव रखने वाला; अविषम:ः--बिना भेदभाव के; स्वभाव:--यही आपका लक्षण है; भक्त-प्रिय:--ऐसी परिस्थिति में आप भक्तों केअत्यन्त अनुकूल बन जाते हो; यत्--क्योंकि; असि--हो; कल्पतरु-स्वभाव:--कल्पवृक्ष के गुण वाला |
हे प्रभ!ु आपकी लीलाएँ आपकी अचिन्त्य आध्यात्मिक शक्ति द्वारा विचित्र ढंग से सम्पन्नहोती हैं और अपने विकृत प्रतिबिम्ब अर्थात् भौतिक शक्ति ( माया ) द्वारा आपने सारे ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि की है |
आप सभी जीवों के परमात्मा के रूप में हर बात जानते हैं; अतएव निश्चय ही,आप सब पर समान दृष्टि रखते हैं |
तो भी आप अपने भक्तों का पक्ष लेते हैं |
यह पक्षपात नहीं हैक्योंकि आपका यह गुण उस कल्पवृक्ष की तरह है, जो इच्छानुसार कोई भी वस्तु प्रदान करताहै |
श्रीभगवानुवाचवत्स प्रह्माद भद्गं ते प्रयाहि सुतलालयम् |
मोदमानः स्वपौत्रेण ज्ञातीनां सुखभावह ॥
९॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; वत्स-हे प्रिय पुत्र; प्रह्दाद--हे प्रह्ाद महाराज; भद्रम् ते--तुम्हारा कल्याण हो;प्रयाहि--जाओ; सुतल-आलयमू--सुतल नामक स्थान को; मोदमान:--प्रसन्न मन से; स्व-पौत्रेण-- अपने पौत्र ( बलिमहाराज ) सहित; ज्ञातीनाम्ू-कुटुम्बियों तथा मित्रों का; सुखम्--सुख; आवह--भोग करो
भगवान् ने कहा : हे मेरे प्रिय पुत्र प्रह्मद! तुम्हारा मंगल हो |
अभी तुम सुतल नामक स्थानको जाओ और वहाँ अपने पौत्र एवं अन्य कुटुम्बियों तथा मित्रों सहित सुख भोगो |
नित्यं द्रष्टासि मां तत्र गदापाणिमवस्थितम् |
महर्शनमहाह्लादध्वस्तकर्मनिबन्धन: ॥
१०॥
नित्यमू--निरन्तर; द्रष्ठा--देखने वाला; असि--हो; माम्ू--मुझको; तत्र--वहाँ ( सुतललोक में ); गदा-पाणिम्ू--हाथ में गदालिए; अवस्थितम्--वहाँ स्थित; मत्-दर्शन--उस रूप में मेरा दर्शन करके; महा-आह्वाद--दिव्य आनन्द से; ध्वस्त--विनष्ट;कर्म-निबन्धन:--सकाम कर्मों का बन्धन |
भगवान् ने प्रहाद महाराज को आश्वासन दिया कि तुम वहाँ पर हाथों में शंख, चक्र, गदातथा कमल लिए मेरे नित्य रूप का दर्शन कर सकोगे |
वहाँ मेरे निरन्तर प्रत्यक्ष दर्शन से दिव्यआनन्द प्राप्त करके तुम और अधिक कर्म-बन्धन में नहीं पड़ोगे |
श्रीशुक उवाचआज्ञां भगवतो राजन्प्रहादो बलिना सह |
बाढमित्यमलप्रज्ञो मूर्ध्याधाय कृताझ्ललि: ॥
११॥
परिक्रम्यादिपुरुषं सर्वासुरचमूपति: |
प्रणतस्तदनुज्ञातः प्रविवेश महाबिलम् ॥
१२॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; आज्ञामू--आदेश; भगवतः -- भगवान् का; राजन्--हे राजा ( परीक्षितमहाराज ); प्रह्मदः--प्रह्माद महाराज; बलिना सह--बलि महाराज के साथ-साथ; बाढम्--महोदय, आप जो कहते हैं ठीक है;इति--इस प्रकार; अमल-प्रज्ञ:--विमल बुद्धि वाले प्रह्मद महाराज; मूर्धिन--अपने सिर पर; आधाय--रखकर; कृत-अज्जलि:--हाथ जोड़े; परिक्रम्य--प्रदक्षिणा करके; आदि-पुरुषम्--परम आदि पुरुष भगवान् को; सर्व-असुर-चमूपति: --असुरों के समस्त नायकों के स्वामी; प्रणतः--नमस्कार करके ; तत्-अनुज्ञात:--उनसे ( वामन से ) अनुमति पाकर; प्रविवेश--प्रवेश किया; महा-बिलम्ू--सुतल नामक लोक में
श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा परीक्षित! समस्त असुर-पतियों के स्वामी प्रह्लादमहाराज ने बलि महाराज समेत हाथ जोड़कर भगवान् के आदेश को सिर पर चढ़ाया |
भगवान्से हाँ कह कर, उनकी प्रदक्षिणा करके तथा उन्हें सादर प्रणाम करके उन्होंने सुतल नामकअधोलोक में प्रवेश किया |
अथाहोशनसं राजन्हरिनारायणोउन्तिके |
आसीनमृत्विजां मध्ये सदसि ब्रह्मवादिनाम् ॥
१३॥
अथ--त्पश्चात्; आह--कहा; उशनसम्--शुक्राचार्य से; राजन्--हे राजा; हरि: -- भगवान् ने; नारायण: -- स्वामी; अन्तिके --निकट ही; आसीनम्--बैठे हुए; ऋत्विजाम् मध्ये--सभी पुरोहितों की टोली में; सदसि--सभा में; ब्रह्म-वादिनाम्--वैदिकनियमों के पालनकर्ताओं की |
तत्पश्चात् भगवान् हरि या नारायण ने शुक्राचार्य को सम्बोधित किया जो पुरोहितों ( ब्रह्म,होता, उद्गाता तथा अध्वर्यु ) के निकट ही सभा में बैठे थे |
हे महाराज परीक्षित! ये सभी पुरोहितब्रह्मवादी थे अर्थात् यज्ञ सम्पन्न करने के लिए वैदिक सिद्धान्तों का पालन करने वाले थे |
ब्रह्मन्सन्तनु शिष्यस्य कर्मच्छिद्रं वितन्वतः |
यत्तत्कर्मसु वैषम्यं ब्रह्मदृष्ट सम॑ भवेत् ॥
१४॥
ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; सन्तनु--कृपया वर्णन करें; शिष्यस्थ--अपने शिष्य का; कर्म-छिद्रमू--सकाम कर्म के दोष; वितन्वतः--यज्ञकर्ता के; यत् तत्--जो; कर्मसु--कार्यों में; वैषम्यम्--त्रुटि; ब्रह्म-दृष्टमू-ब्राह्मणों की दृष्टि में; समम्--सम; भवेत्--होजाती है
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ शुक्राचार्य! आप यज्ञ में लगे अपने शिष्य बलि महाराज का अपराध या कमीबतलाइये |
इस अपराध का निराकरण योग्य ब्राह्मणों की उपस्थिति में निर्णय लेने पर होजाएगा |
श्रीशुक्र उवाचकुतस्तत्कर्मवैषम्यं यस्य कर्मे श्वरो भवान् |
यज्ञेशो यज्ञपुरुष: सर्वभावेन पूजित: ॥
१५॥
श्री-शुक्र: उबाच-- श्री शुक्राचार्य ने कहा; कुतः--कहाँ है; तत्ू--उसका ( बलि का ); कर्म-वैषम्यम्--सकाम कर्म करने मेंत्रुटि; यस्थ--जिसका ( बलि का ); कर्म-ईश्वरः-- सारे सकाम कर्मों के स्वामी; भवान्ू--आप; यज्ञ-ईशः--सारे यज्ञों केभोक्ता; यज्ञ-पुरुष:--आप ही वे पुरुष हैं जिनकी प्रसन्नता के लिए सारे यज्ञ किये जाते हैं; सर्व-भावेन--सभी प्रकार से;'पूजित:--पूजित होकर |
शुक्राचार्य ने कहा : हे प्रभु! आप यज्ञ के भोक्ता हैं और सभी यज्ञों को सम्पन्न कराने वालेहैं |
आप यज्ञपुरुष हैं अर्थात् आप ही वे पुरुष हैं जिनके लिए सारे यज्ञ किये जाते हैं |
यदि किसीने आपको पूरी तरह संतुष्ट कर लिया तो फिर उसके यज्ञ करने में त्रुटियों अथवा दोषों के होने का अवसर ही कहाँ रह जाता है? मन्त्रतस्तन्त्रतश्छद्रं देशकालाईवस्तुत: |
सर्व करोति निश्छद्रमनुसड्डीर्तन॑ तब ॥
१६॥
मन्त्रतः--वैदिक मंत्रों का गलत उच्चारण करने से; तन्त्रतः--कर्मकाण्ड पालन के लिए अधूरे ज्ञान से; छिद्रमू--दोष; देश--देश; काल--तथा समय; अई--तथा पात्र; वस्तुतः--तथा सामग्री; सर्वम्ू--ये सब; करोति--बनाता है; निश्छिद्रमू--त्रुटिहीन;अनुसड्डीर्तनम्-पवित्र नाम का निरन्तर कीर्तन; तब--आपका |
मंत्रों के उच्चारण तथा कर्मकाण्ड के पालन में त्रुटियाँ हो सकती हैं |
देश, काल, व्यक्तितथा सामग्री के विषय में भी कमियाँ रह सकती हैं |
किन्तु भगवन्! यदि आपके पवित्र नाम काकीर्तन किया जाए तो हर वस्तु दोषरहित बन जाती है |
तथापि बदतो भूमन्करिष्याम्यनुशासनम् |
एतच्छेय: परं पुंसां यत्तवाज्ञानुपालनम् ॥
१७॥
तथापि--यद्यपि बलि महाराज का कोई दोष न था, तो भी; वदतः--आपके आदेश के कारण; भूमन्--हे परम; करिष्यामि--मैं करुँगा; अनुशासनम्ू-- क्योंकि यह आपका आदेश है; एतत्--यह; श्रेयः--शुभ; परमू--परम; पुंसामू--सभी मनुष्यों का;यत्--क्योंकि; तव आज्ञा-अनुपालनमू--आपकी आज्ञा का पालन करने के लिए |
हे भगवान् विष्णु) तो भी मैं आपके आदेशानुसार आपकी आज्ञा का पालन करूँगा क्योंकिआपके आदेश का पालन करना परम शुभ है और हर एक का सर्वोपरि कर्तव्य है |
श्रीशुक उबाचप्रतिनन्द्य हरेराज्ञामुशना भगवानिति |
यज्ञच्छिद्रं समाध्षत्त बलेविंप्र्षिभि: सह ॥
१८॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; प्रतिनन्द्य--नमस्कार करके; हरेः-- भगवान् की; आज्ञामू--आज्ञा को;उशना:--शुक्राचार्य; भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली; इति--इस प्रकार; यज्ञ-छिद्रमू--यज्ञ करने में त्रुटियाँ; समाधत्त--पूराकरने का निश्चय किया; बलेः:--बलि महाराज का; विप्र-ऋषिभि:--योग्यब्राह्मणों के; सह--साथ |
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस प्रकार परम शक्तिशाली शुक्राचार्य ने आदरपूर्वकभगवान् की आज्ञा स्वीकार कर ली |
उन्होंने श्रेष्ठ ब्राह्मणों के साथ बलि महाराज द्वारा सम्पन्न यज्ञकी त्रुटियों को पूरा करना शुरू कर दिया |
एवं बलेम॑हीं राजन्भिक्षित्वा वामनो हरि: |
ददौ क्षात्रे महेन्द्राय त्रिदिवं यत्परईतम् ॥
१९॥
एवम्--इस प्रकार; बलेः--बलि महाराज से; महीम्-- भूमि को; राजनू--हे राजा परीक्षित; भिक्षित्वा--माँगकर; वामन:--भगवान् वामनदेव; हरि: -- भगवान् ने; ददौ--दे दिया; भ्रात्रे-- अपने भाई को; महा-इन्द्राय--स्वर्ग के राजा इन्द्र को;त्रिदिवमू--देवलोक; यत्--जो; परैः--अन्यों द्वारा; हतम्--छीन लिया गया था |
हे राजा परीक्षित! इस प्रकार भिक्षा के रूप में बलि महाराज की सारी भूमि लेकर भगवान्वामनदेव ने उसे अपने भाई इन्द्र को दे दिया जिसे इन्द्र के शत्रु ने ले लिया था |
प्रजापतिपतिर्ब्रह्मा देवर्षिपितृभूमिपैः |
दक्षभूग्वड्धिरोमुख्यै: कुमारेण भवेनच ॥
२०॥
कश्यपस्यादिते:ः प्रीत्ये सर्वभूतभवाय च |
लोकानां लोकपालानामकरोद्वामनं पतिम् ॥
२१॥
प्रजापति-पति:--सारे प्रजापतियों के स्वामी; ब्रह्मा --ब्रह्माजी ने; देब--देवताओं सहित; ऋषि--सन्त पुरुषों के साथ; पितृ--पितृलोक के निवासियों के साथ; भूमिपै:--मनुओं के साथ; दक्ष--दक्ष; भूगु--भूगु मुनि; अड्भिरः--अंगिरा मुनि के साथ;मुख्यैः--विभिन्न लोकों के प्रधानों के साथ; कुमारेण--कार्तिकेय के साथ; भवेन--शिवजी के साथ; च-- भी; कश्यपस्य--कश्यप मुनि की; अदिते:--अदिति की; प्रीत्यै--प्रसन्नता के लिए; सर्व-भूत-भवाय--समस्त जीवों के मंगल हेतु; च-- भी;लोकानाम्--सारे लोकों के; लोक-पालानाम्--समस्त लोकों के प्रधान पुरुषों का; अकरोत्--बना दिया; वामनमू--वामनको; पतिमू--परम नेता |
ब्रह्माजी ने (जो राजा दक्ष तथा अन्य सभी प्रजापतियों के स्वामी हैं ) सारे देवताओं, महान्सन््तों, पितृलोक के वासियों, मनुओं, मुनियों और दक्ष, भूगु तथा अंगिरा जैसे नायकों एवंकार्तिकेय तथा शिवजी सहित भगवान् वामनदेव को हर एक के संरक्षक के रूप में ग्रहणकिया |
यह सब उन्होंने कश्यप मुनि तथा उनकी पत्नी अदिति की प्रसन्नता के लिए एवं ब्रह्माण्डके समस्त वासियों तथा उनके विभिन्न नायकों के कल्याण के लिए किया |
वेदानां सर्वदेवानां धर्मस्य यशस: थियः |
मड़लानां ब्रतानां च कल्पं स्वर्गापवर्गयो: ॥
२२॥
उपेन्द्रं कल्पयां चक्रे पतिं सर्वविभूतये |
तदा सर्वाणि भूतानि भृशं मुमुदिरि नृूप ॥
२३॥
वेदानाम्--समस्त वेदों की ( रक्षा के लिए ); सर्व-देवानाम्--सारे देवताओं का; धर्मस्थ--सारे धर्मों का; यशसः--सारे यशका; श्रिय:--समस्त ऐश्वर्यों का; मड्लानाम्--सारे कल्याण का; ब्रतानाम् च--तथा सारे ब्रतों का; कल्पम्--अत्यन्त पटु;स्वर्ग-अपवर्गयो: --स्वर्ग जाने या भवबन्धन से मुक्ति के लिए; उपेन्द्रमू-- भगवान् वामनदेव को; कल्पयाम् चक्रे --यह योजनाबनाई; पतिम्--स्वामी को; सर्व-विभूतये--सभी कार्यो के लिए; तदा--उस समय; सर्वाणि--सभी; भूतानि--जीवों को;भृशम्--अत्यधिक; मुमुदिरि--प्रसन्न हो गये; नृप--हे राजा
हे राजा परीक्षित! इन्द्र को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का राजा माना जाता था, किन्तु ब्रह्माजी समेतअन्य देवता उपेन्द्र अर्थात् वामनदेव को वेदों, धर्म, यश, ऐश्वर्य, मंगल, व्रत, स्वर्गलोक तकउन्नति तथा मुक्ति के रक्षक के रूप मे चाहते थे |
इसलिए उन्होंने उपेन्द्र अर्थात् भगवान् वामनदेव,को सबका परम स्वामी स्वीकार कर लिया |
इस निर्णय से सारे जीव अत्यधिक प्रसन्न हो गए |
ततस्त्विन्द्र: पुरस्कृत्य देवयानेन वामनम् |
लोकपार्लैर्दिवं निन्ये ब्रह्मणा चानुमोदित: ॥
२४॥
ततः--तत्पश्चात्; तु--लेकिन; इन्द्र:--स्वर्ग का राजा; पुरस्कृत्य--आगे रखकर; देव-यानेन--देवताओं द्वारा प्रयुक्त वायुयानद्वारा; वामनम्--वामनदेव को; लोक-पालै:--अन्य सभी लोकों के प्रधानों द्वारा; दिवम्--स्वर्ग को; निन््ये--ले आया;ब्रह्मणा--ब्रह्माजी द्वारा; च-- भी; अनुमोदित: --अनुमति प्राप्त |
तत्पश्चात् स्वर्गलोकों के सारे प्रधानों सहित स्वर्ग के राजा, इन्द्र, वामनदेव को अपने समक्ष करके ब्रह्मा की अनुमति से, उन्हें दैवी वायुयान में बैठा कर स्वर्गलोक ले आये |
प्राप्य त्रिभुवन चेन्द्र उपेन्द्रभुजपालित: |
श्रिया परमया जुष्टो मुमुदे गतसाध्वस: ॥
२५॥
प्राप्प--प्राप्त करके; त्रि-भुवनम्--तीनों लोक; च-- भी ; इन्द्र: --स्वर्ग के राजा ने; उपेन्द्र-भुज-पालितः --उपेन्द्र अर्थात्वामनदेव के बाहुबल से रक्षित होकर; थ्रिया--ऐश्वर्य के द्वारा; परमया--परम; जुष्ट:--सेवा किया गया; मुमुदे-- भोग किया;गत-साध्वस:--असुरों के भय से रहित
इस प्रकार भगवान् वामनदेव की बाहुओं से रक्षित होकर स्वर्ग के राजा इन्द्र ने तीनों लोकोंका अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लिया और निर्भय होकर तथा पूर्णतया सन्तुष्ट होकर वे अपनेपरम ऐश्वर्यशाली पद पर पुनः प्रतिष्ठित कर दिए गए |
ब्रह्मा शर्व: कुमारश्च भृग्वाद्या मुनयो नृप |
पितरः सर्वभूतानि सिद्धा वैमानिकाश्व ये ॥
२६॥
सुमहत्कर्म तद्विष्णोर्गायन्तः परमद्भुतम् |
धिष्ण्यानि स्वानि ते जग्मुरदितिं च शशंसिरे ॥
२७॥
ब्रह्मा--ब्रह्माजी; शर्व:--शिवजी; कुमार: च--तथा कार्तिकेय; भृगु-आद्या:--सप्तर्षियों में से एक भृगुमुनि आदि; मुनयः--मुनिगण; नृप--हे राजा; पितर:--पितृलोक के निवासी; सर्व-भूतानि--अन्य जीव; सिद्धा:--सिद्धलोक के निवासी;वैमानिका: च--वायुयान द्वारा आकाश में कहीं भी विचरण कर सकने वाले मनुष्य; ये--जो लोग; सुमहत्--अत्यधिकप्रशंसनीय; कर्म--कार्यकलाप; तत्--वे सब ( कर्म ); विष्णो:--भगवान् विष्णु द्वारा किये गये; गायन्त:--महिमागायन करतेहुए; परम् अद्भुतम्--असामान्य तथा अद्भुत; धिष्ण्यानि--लोकों को; स्वानि--अपने-अपने; ते--वे सब; जम्मु:;--चले गये;अदितिम् च--अदिति को भी; शशंसिरे-- भगवान् के इन कार्यकलापों की प्रशंसा की |
ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, महर्षि भूगु, अन्य सन्त, पितृलोक के वासी तथा सिद्धलोक केनिवासी एवं वायुयान द्वारा बाह्रा आकाश की यात्रा करने वाले जीवों के समेत वहाँ पर उपस्थितसारे मनुष्यों ने भगवान् वामनदेव के असामान्य कार्यो की महिमा का गायन किया |
हे राजा!भगवान् का कीर्तन एवं उनकी महिमा का गायन करते हुए वे सभी अपने-अपने स्वर्ग लोकों कोलौट गये |
उन्होंने अदिति के पद की भी प्रशंसा की |
सर्वमेतन्मयाख्यातं भवतः कुलनन्दन |
उरुक्रमस्थ चरितं श्रोतृणामघमोचनम् ॥
२८॥
सर्वम्ू--सब; एतत्--ये घटनाएँ; मया--मेरे द्वारा; आख्यातम्ू--वर्णित की गईं हैं; भवतः--आपकी; कुल-नन्दन--अपने वंशके आनन्द, हे महाराज परीक्षित; उरुक़मस्थ-- भगवान् के ; चरितम्--कार्यकलापों को; श्रोतृणाम्-- श्रोताओं का; अघ-मोचनम्--पापों के फलों को नष्ट करने |
हे महाराज परीक्षित! हे अपने वंश के आनन्द! मैंने अब तुमसे भगवान् वामनदेव के अद्भुतकार्यों के विषय में सारा वर्णन कर दिया है |
जो लोग इसे सुनते हैं, वे निश्चित रूप से पापकर्मोके सभी फलों से मुक्त हो जाते हैं |
पारं महिम्न उरुविक्रमतो गृणानोयः पार्थिवानि विममे स रजांसि मर्त्य: |
कि जायमान उत जात उपैति मर्त्यइत्याह मन्त्रहगृषि: पुरुषस्थ यस्थय ॥
२९॥
पारमू--माप; महिम्न:--यश की; उरुविक्रमत:-- अद्भुत कर्म करने वाले भगवान् का; गृणान:--गिन सकता है; यः--जोव्यक्ति; पार्थिवानि--सम्पूर्ण पृथ्वी लोक का; विममे--गिन सकता है; सः--वह; रजांसि--कण; मर्त्य:--मरणशील मनुष्य;किम्--क्या; जायमान:--भविष्य में जन्म लेकर; उत--या तो; जात:--उत्पन्न; उपैति--कर सकता है; मर्त्य:--मरणशीलव्यक्ति; इति--इस प्रकार; आह--कहा; मन्त्र-हक्--जो वैदिक मंत्रों को पहले से ही देख सकते थे; ऋषि:--वसिष्ठ मुनि;पुरुषस्थ--परम पुरुष का; यस्य--जिसका |
मरणशील व्यक्ति भगवान् त्रिविक्रम अर्थात् विष्णु की महिमा की थाह नहीं पा सकता जिसप्रकार कि वह सम्पूर्ण पृथ्वी लोक के कणों की संख्या नहीं जान सकता |
कोई भी व्यक्ति जिसनेजन्म धारण किया है या जो जन्म लेने वाला है ऐसा नहीं कर सकता |
इसका गायन महर्षि वसिष्ठने किया है |
य इदं देवदेवस्य हरेरद्भधुतकर्मण: |
अवतारानुचरितं श्रुण्वन्याति परां गतिम् ॥
३०॥
यः--जो कोई; इृदम्--यह; देव-देवस्य-- भगवान् का, जो देवताओं द्वारा पूज्य हैं; हरेः-- भगवान् कृष्ण या हरि का; अद्भुत-कर्मण:--जिनके कार्यकलाप अद्भुत हैं; अवतार-अनुचरितम्--उनके विभिन्न अवतारों में सम्पन्न कार्यकलाप; श्रण्वनू--सुनतेहुए; याति--जाता है; पराम् गतिम्ू--परम सिद्धि को, भगवद्धाम को |
यदि कोई भगवान् के विभिन्न अवतारों के असामान्य कार्यकलापों का श्रवण करता है, तोवह निश्चित रूप से स्वर्गलोक को भेजा जाता है या भगवान् के धाम को वापस जाता है |
क्रियमाणे कर्मणीदं दैवे पित्येथ मानुषे |
यत्र यत्रानुकीरत्येत तत्तेषां सुकृतं विदु: ॥
३१॥
क्रियमाणे--सम्पन्न हो जाने पर; कर्मणि-- अनुष्ठान का; इृदम्--वामनदेव के गुणों का यह विवरण; दैवे--देवताओं को प्रसन्नकरने के लिए; पित्रये--या पूर्वजों को प्रसन्न करने यथा श्राद्ध उत्सव में; अथ--या तो; मानुषे--मानव समाज के आनन्द केलिए यथा विवाहों में; यत्र--जहाँ भी; यत्र--जब भी; अनुकीर्त्येत--वर्णन किया जाता है; तत्--वह; तेषाम्ू--उनके लिए;सुकृतम्--शुभ; विदु:--हर एक को समझना चाहिए
जब भी कर्मकाण्ड के दौरान, चाहे देवताओं को प्रसन्न करने के लिए या पितृलोक केपितरों को प्रसन्न करने के लिए कोई उत्सव किया जाए, या विवाह जैसा सामाजिक कृत्य मनानेके लिए वामनदेव के कार्यकलापों का वर्णन हो, तो उस उत्सव को परम मंगल-मय समझनाचाहिए |
