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अध्याय तेरह: महाराजा निमि का राजवंश

9.13श्रीशुक उबाचनिमिरिक्ष्वाकुतनयो वसिष्ठमवृतर्त्विजम्‌ ।

आश्भ्य सत्र॑ सोप्याह शक्रेण प्राग्वृतोउस्मि भोः ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; निमि:ः--राजा निमि ने; इक््वाकु-तनय: --महाराज इक्ष्वाकु के पुत्र; वसिष्ठम्‌--वसिष्ठ को; अवृत--नियुक्त किया; ऋत्विजम्‌-यज्ञ का प्रमुख पुरोहित; आरभ्य--प्रारम्भ करके; सत्रमू--यज्ञ; सः--उसने, वसिष्ठ ने;अपि--भी; आह--कहा; शक्रेण-- इन्द्र द्वारा; प्राकु--पहले से; वृतः अस्मि--नियुक्त हो चुका हूँ; भोः--हे राजा निमि।

श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा : यज्ञों का शुभारम्भ कराने के बाद इक्ष्वाकु पुत्र महाराज निमिने वसिष्ठ मुनि से प्रधान पुरोहित का पद ग्रहण करने के लिए अनुरोध किया।

उस समय वसिष्ठ ने उत्तरदिया, 'हे महाराज निमि, मैंने इन्द्र द्वारा प्रारम्भ किये गये एक यज्ञ में इसी पद को पहले से स्वीकारकर रखा है।

'त॑ निर्वर्तागमिष्यामि तावन्मां प्रतिपालय ।

तूष्णीमासीद्गृहपति: सोपीन्द्रस्याकरोन्मखम्‌ ॥

२॥

तमू--उस यज्ञ को; निर्वर्््--समाप्त करने के बाद; आगमिष्यामि--वापस आ जाऊँगा; तावत्‌--तब तक; माम्‌--मेरी; प्रतिपालय--प्रतीक्षा करो; तृष्णीम्‌--चुप; आसीत्‌--हो गया; गृह-पति:--महाराज निमि; सः--उसने, वसिष्ठ ने; अपि-- भी; इन्द्रस्य--इन्द्र के;अकरोत्‌--सम्पन्न किया; मखम्‌--यज्ञ को |

मैं इन्द्र का यज्ञ पूर कराकर यहाँ वापस आ जाऊँगा।

कृपया तब तक मेरी प्रतीक्षा करें।

'महाराज निमि चुप हो गए और वसिष्ठ इन्द्र का यज्ञ सम्पन्न करने में लग गये।

निमिश्चलमिदं दिद्वान्सत्रमारभतात्मवान्‌ ।

ऋत्विग्भिरपरैस्तावन्नागमद्यावता गुरु: ॥

३॥

निमिः--महाराज निमि ने; चलम्‌--किसी भी क्षण समाप्त होने वाले; इदम्‌--इस ( जीवन ) को; विद्वानू--इस तथ्य से भलीभाँतिअवगत होकर; सत्रम्‌ू--यज्ञ को; आरभत--शुरू किया; आत्मवानू--स्वरूपसिद्ध व्यक्ति; ऋत्विग्भि:--पुरोहितों द्वारा; अपरैः --वसिष्ठके अतिरिक्त अन्य; तावत्‌--उस समय तक; न--नहीं; आगमत्‌--लौट आया; यावता--जब तक; गुरु:--गुरु ( वसिष्ठ )

महाराज निमि स्वरूपसिद्ध जीव थे अतएव उन्होंने सोचा कि यह जीवन क्षणिक है; अतएवदीर्घकाल तक वसिष्ठ की प्रतीक्षा न करके उन्होंने अन्य पुरोहितों से यज्ञ सम्पन्न कराना शुरू करदिया।

शिष्यव्यतिक्रमं वीक्ष्य तं निर्वर्यागतो गुरु: ।

अश्पत्पतताहेहो निमे: पण्डितमानिन: ॥

४॥

शिष्य-व्यतिक्रमम्‌--शिष्य द्वारा गुरु के आदेश से विचलन को; वीक्ष्य--देखकर; तम्‌--इनद्र द्वारा किया जाने वाले यज्ञ को;निर्वर्य--समाप्त करके; आगत:--लौटने पर; गुरु:--वसिष्ठ मुनि; अशपत्‌--निमि महाराज को शाप दे दिया; पततात्‌ू--पतन होजाय, नष्ट हो जाय; देह:-- भौतिक शरीर; निमेः--निमि का; पण्डित-मानिन:--जो अपने को इतना पण्डित मानता है ( जिससे किवह अपने गुरु की अवज्ञा कर रहा है )

इन्द्र का यज्ञ सम्पन्न कर लेने के बाद गुरु वसिष्ठ वापस आये तो उन्होंने देखा कि उनके शिष्यमहाराज निमि ने उनके आदेशों का उल्लंघन कर दिया है।

अतएव उन्होंने निमि को शाप दिया,'अपने को पण्डित मानने वाले निमि का भौतिक शरीर तुरन्त ही नष्ट हो जाय।

'निमि: प्रतिददौ शापं गुरवेधर्मवर्तिने ।

तवापि पततादहेहो लोभाद्धर्ममजानतः ॥

५॥

निमिः--निमि महाराज ने; प्रतिददौ शापम्‌--उलट कर शाप दे डाला; गुरबे-- अपने गुरु वसिष्ठ को; अधर्म-वर्तिने--अधर्म कोप्रोत्साहन देने वाले ( क्योंकि उन्होंने अपने अपराधरहित शिष्य को शाप दे दिया था ); तब--तुम्हारा; अपि-- भी; पततात्‌--पतन होजाय; देह:--शरीर का; लोभात्‌--लोभवश; धर्मम्‌--धर्म को; अजानतः--न जानते हुए।

महाराज निमि द्वारा किसी प्रकार का अपराध न किये जाने पर व्यर्थ ही गुरु द्वारा शापित होने पर उन्होंने भी बदले में शाप दिया, 'स्वर्ग के राजा इन्द्र से भेंट पाने के निमित्त आपने अपनी धार्मिकबुद्धि खो दी है; अतएव मेरा शाप है कि आपका भी शरीरपात हो जाय।

इत्युत्ससर्ज स्वं देहं निमिरध्यात्मकोविद: ।

मित्रावरुणयोर्जनज्ञे उर्वश्यां प्रपितामह: ॥

६॥

इति--इस प्रकार; उत्ससर्ज--त्याग दिया; स्वमू--अपना; देहम्‌--शरीर; निमि: --महाराज निमि ने; अध्यात्म-कोविद:-- आध्यात्मिकज्ञान से पूर्णतया अवगत; मित्रा-वरुणयो:--मित्र तथा वरुण के वीर्य से ( उर्वशी को देखकर स्खलित ); जज्ञे--उत्पन्न हुए;उर्वश्याम्‌--स्वर्गलोक की अप्सरा उर्वशी से; प्रपितामह:--वसिष्ठ, जो प्रपितामह कहलाते थे।

यह कहकर अध्यात्म में पटु महाराज निमि ने अपना शरीर छोड़ दिया।

प्रपितामह वसिष्ठ ने भीअपना शरीर त्याग दिया, किन्तु मित्र तथा वरुण के वीर्य से उर्वशी के गर्भ से उन्होंने पुनः जन्मलिया।

गन्धवस्तुषु तद्देहे निधाय मुनिसत्तमा: ।

समाप्ते सत्रयागे च देवानूचु; समागतान्‌ ॥

७॥

गन्ध-वस्तुषु--सुगन्धित वस्तुओं में; तत्‌-देहम्‌--महाराज निमि के शरीर को; निधाय--सुरक्षित रखकर; मुनि-सत्तमा: --वहाँ एकत्रमहान्‌ ऋषियों ने; समाप्ते सत्र-यागे--सत्र नामक यज्ञ के समाप्त होने पर; च--भी; देवान्‌ू--देवताओं से; ऊचु:--बोले;समागतान्‌--वहाँ पर एकत्र हुए।

यज्ञ सम्पन्न करते समय महाराज निमि द्वारा त्यक्त शरीर को सुगन्धित वस्तुओं द्वारा सुरक्षित रखागया और सत्रयाग के अन्त में मुनियों तथा ब्राह्मणों ने वहाँ एकत्रित सारे देवताओं से निम्नलिखितप्रार्थना की।

राज्ञो जीवतु देहोयं प्रसन्ना: प्रभवो यदि ।

तथेत्युक्ते निमि: प्राह मा भून्मे देहबन्धनम्‌ ॥

८ ॥

राज्ञ:ः--राजा का; जीवतु--जीवित हो उठे; देह: अयम्‌--यह देह ( जो सुरक्षित है ); प्रसन्ना:--अत्यधिक प्रसन्न; प्रभव:--इसे करने मेंसमर्थ; यदि--यदि; तथा--ऐसा ही हो; इति--इस प्रकार; उक्ते--( देवताओं द्वारा ) कहा जाने पर; निमिः--निमि महाराज ने; प्राह--कहा; मा भूत्‌ू--मत करो; मे--मेरा; देह-बन्धनम्‌ू-- भौतिक शरीर में बन्दी बनाना।

'यदि आप इस यज्ञ से संतुष्ट हैं और यदि वास्तव में आप ऐसा करने में समर्थ हों तो कृपया इसशरीर में महाराज निमि को फिर से जीवित कर दें।

' देवताओं ने मुनियों की यह प्रार्थना स्वीकर करली, किन्तु महाराज निमि ने कहा, 'कृपया मुझे भौतिक शरीर में पुनः बन्दी न बनाएँ।

'यस्य योगं न वाज्छन्ति वियोगभयकातराः ।

भजन्ति चरणाम्भोज॑ मुनयो हरिमेधसः ॥

९॥

यस्य--जिस शरीर का; योगम्‌--स्पर्श; न--नहीं; वाउ्छन्ति--ज्ञानी चाहते; वियोग-भय-कातरा:--शरीर को पुनः त्यागने सेभयभीत; भजन्ति--दिव्य सेवा करते हैं; चरण-अम्भोजम्‌ू-- भगवान्‌ के चरणकमलों की; मुनय:--बड़े-बड़े मुनि; हरि-मेधस: --जिनकी चेतना सदैव हरि के विचारों मे मग्न रहती है।

महाराज निमि ने आगे कहा : सामान्य रूप से मायावादी लोग भौतिक शरीर धारण नहीं करना चाहते हैं क्योंकि उन्हें उसका त्याग करने में भय लगता है।

किन्तु जिन भक्तों की चेतना सदैवभगवान्‌ की सेवा से पूरित रहती है वे भयभीत नहीं रहते।

निस्सन्देह, वे इस शरीर का उपयोग भगवान्‌की दिव्य प्रेमाभक्ति में करते हैं।

देहं नावरुरुत्सेहं दुःखशोकभयावहम्‌ ।

सर्वत्रास्य यतो मृत्युर्मत्स्यानामुदके यथा ॥

१०॥

देहम्‌ू-- भौतिक शरीर; न--नहीं; अवरुरुत्से-- धारण करने की इच्छा करता हूँ; अहम्‌--मैं; दुःख-शोक-भय-आवहम्‌--जो सारेकष्ट, संताप तथा भय का कारण है; सर्वत्र--सभी जगह, विश्वभर में; अस्य--जीव का, जिसने शरीर धारण किया है; यतः--क्योंकि; मृत्यु:--मृत्यु; मत्स्यानामू--मछलियों को; उदके --जल के भीतर रहने वाली; यथा--सद्दश |

मैं भौतिक शरीर पाने का इच्छुक नहीं हूँ क्योंकि ऐसा शरीर विश्वभर में सर्वत्र दुख, शोक तथाभय का कारण होता है जिस तरह कि जल में रहने वाली मछली मृत्यु के भय से सदैव चिन्ताग्रस्तरहती है।

देवा ऊचु:विदेह उष्यतां कामं लोचनेषु शरीरिणाम्‌ ।

उन्मेषणनिमेषा भ्यां लक्षितोध्यात्मसंस्थित: ॥

११॥

देवा: ऊचु:--देवताओं ने कहा; विदेह:--बिना भौतिक शरीर के; उष्यताम्‌--तुम जीवित रहो; कामम्‌--जैसी तुम्हारी इच्छा है;लोचनेषु--दृष्टि में; शरीरिणाम्‌-- भौतिक शरीर वालों का; उन्मेषण-निमेषाभ्याम्‌--इच्छानुसार प्रकट तथा अप्रकट होओ; लक्षित:--देखे जाकर; अध्यात्म-संस्थित:--आध्यात्मिक शरीर में रहते हुए

देवताओं ने कहा : महाराज निमि भौतिक शरीर से विहीन होकर रहें।

वे आध्यात्मिक शरीर सेभगवान्‌ के निजी पार्षद बन कर रहें और वे अपनी इच्छानुसार जब चाहें सामान्य देहधारी लोगों कोदिखें या न दिखें।

अराजकभयं नृणां मन्यमाना महर्षयः ।

देह ममन्थु: सम निमे: कुमार: समजायत ॥

१२॥

अराजक-भयम्‌--अराजकता फैलने के भय से; नृणाम्‌--सामान्य लोगों के लिए; मन्यमाना:--इस स्थिति पर विचार करते हुए; महा-ऋषय:--महान्‌ ऋषियों ने; देहम्‌ू--शरीर को; ममन्थु;--मथा; स्म--भूतकाल में; निमेः--महाराज निमि के; कुमार: --एक पुत्र;समजायत--उत्पन्न हुआ |

तत्पश्चात्‌ लोगों को अराजकता के भय से बचाने के लिए ऋषियों ने निमि महाराज के भौतिकशरीर को मथा जिसके फलस्वरूप शरीर से एक पुत्र उत्पन्न हुआ।

जन्मना जनकः सो<भूद्वैदेहस्तु विदेहज: ।

मिथिलो मथनाज्जातो मिथिला येन निर्मिता ॥

१३॥

जन्मना--जन्म से; जनकः--सामान्य विधि से नहीं अपितु असामान्य रूप से जन्मा; सः--वह; अभूत्‌--बना; वैदेह:--वैदेह; तु--लेकिन; विदेह-ज:--महाराज निमि के शरीर से उत्पन्न, जिन्होंने भौतिक शरीर त्याग दिया था; मिधिल:--मिथिल नाम से भी विख्यात;मथनात्‌--अपने पिता के शरीर के मन्थन से; जात:--उत्पन्न; मिथिला--मिथिला नामक राज्य; येन--जिसके ( जनक ) द्वारा;निर्मिता--बनाया गया।

असामान्य विधि से उत्पन्न होने के कारण वह पुत्र जनक कहलाया और चूँकि वह अपने पिता केमृत शरीर से उत्पन्न हुआ था अतएव वह बैदेह कहलाया।

अपने पिता के भौतिक शरीर के मन्थन सेउत्पन्न होने से वह मिथिल कहलाया और उसने राजा मिथलि के रूप में जो नगर निर्मित किया वहमिथिला कहलाया।

तस्मादुदावसुस्तस्य पुत्रो भून्नन्दिवर्धन: ।

ततः सुकेतुस्तस्यापि देवरातो महीपते ॥

१४॥

तस्मात्‌--मिथिल से; उदावसु:--उदावसु नाम का पुत्र; तस्य--उसका; पुत्र: --पुत्र; अभूत्‌ू--हुआ; नन्दिवर्धन:--नन्दिवर्धन; तत:--उससे; सुकेतु:--सुकेतु; तस्थ--सुकेतु का; अपि-- भी; देवरात:--देवरात; महीपते--हे राजा परीक्षित |

हे राजा परीक्षित, मिथिल से जो पुत्र उत्पन्न हुआ वह उदावसु कहलाया; उदावसु से नन्दिवर्धन;नन्दिवर्धन से सुकेतु और सुकेतु से देवरात उत्पन्न हुआ।

तस्माह्ृहद्रथस्तस्य महावीर्य: सुधृत्पिता ।

सुधृतेर्धृष्टकेतुर्वे हर्यश्रोथ मरुस्ततः ॥

१५॥

तस्मात्‌-देवरात से; बृहद्रथ:--बृहद्रथ; तस्थ--उसका; महावीर्य:--महावीर्य ; सुधृत्‌-पिता--सुधूृति का पिता बना; सुधूृते:--सुधृतिसे; धृष्टकेतु:--धृष्टकेतु; बै--निस्सन्देह; हर्यश्व:--हर्य श्र; अथ--तत्पश्चात्‌: मरुः--मरु; तत:--उसके बाद |

देवरात से बृहद्रथ नामक पुत्र हुआ और बृहद्रथ का पुत्र महावीर्य हुआ जो सुधृति का पिता बना।

सुधृति का पुत्र धृष्टकेतु कहलाया और धूष्टकेतु से हर्यश्व हुआ।

हर्यश्व॒ का पुत्र मरु हुआ।

मरोः प्रतीपकस्तस्माज्जात: कृतरथो यतः ।

देवमीढस्तस्य पुत्रो विश्रुतोथ महाधृति: ॥

१६॥

मरोः--मरु का; प्रतीपक:--प्रतीपक; तस्मात्‌--प्रतीपक से; जात:--उत्पन्न हुआ; कृतरथ:--कृतरथ; यत:--जिससे; देवमीढ:--देवमीढ; तस्य--उसका; पुत्र:--पुत्र; विश्रुतः--विश्रुत; अथ--उससे; महाधृतिः --महाधृति नामक पुत्रमरु का पुत्र प्रतीषक हुआ और प्रतीपक का पुत्र कृतरथ हुआ।

कृतरथ से देवमीढ, देवमीढ सेविश्लुत एवं विश्रुत से महाधृति हुआ।

कृतिरातस्ततस्तस्मान्महारोमा च तत्सुतः ।

स्वर्णरोमा सुतस्तस्य हस्वरोमा व्यजायत ॥

१७॥

कृतिरात:ः--कृतिरात; ततः--महा धृति से; तस्मात्‌ू--कृतिरात से; महारोमा--महारोमा; च--भी; तत्‌-सुतः--उसका पुत्र;स्वर्णरोमा --्स्वणरोमा; सुत: तस्य--उसका पुत्र; हस्वरोमा --हस्वरोमा; व्यजायत--उत्पन्न हुए।

महाधूृति से कृतिरात नामक पुत्र हुआ, कृतिरात से महारोमा हुआ, महारोमा से स्वर्णरोमा औरस्वर्णरोमा से हस्वरोमा उत्पन्न हुआ।

ततः शीरध्वजो जज्ञे यज्ञार्थ कर्षतो महीम्‌ ।

सीता शीराग्रतो जाता तस्मात्शीरध्वज: स्मृत: ॥

१८॥

ततः--हस्वरोमा से; शीरध्वज:--शीरध्वज; जज्ञे--उत्पन्न हुआ; यज्ञ-अर्थम्‌--यज्ञ करने के लिए; कर्षतः--भूमि जोतते समय;महीम्‌--पृथ्वी को; सीता--सीतादेवी, रामचन्द्र की पली; शीर-अग्रतः--हल के अग्रभाग से; जाता--उत्पन्न हुई; तस्मातू--इसलिए;शीरध्वज:--शीरध्वज; स्मृत:--विख्यात हुआ

हस्वरोमा से शीरध्वज ( जिसका नाम जनक भी था ) नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

जब वह खेत जोतरहा था तो उसके हल ( शीर ) के अग्रभाग से सीतादेवी नामक कन्या प्रकट हुई जो बाद में भगवान्‌रामचन्द्र की पत्ती बनी।

इस तरह वह शीरध्वज कहलाया।

कुशध्वजस्तस्य पुत्रस्ततो धर्मध्वजो नृप: ।

धर्मध्वजस्य द्वौ पुत्रौ कृतध्वजमितध्वजा ॥

१९॥

कुशध्वज:--कुशध्वज; तस्थ--उसका; पुत्र:--पुत्र; ततः--उससे; धर्मध्वज: -- धर्मध्वज; नृप:--राजा; धर्मध्वजस्य-- धर्मध्वज के;द्वौ--दो; पुत्रौ--पुत्र; कृतध्वज-मितध्वजौ-- कृतध्वज तथा मितध्वज।

शीरध्वज का पुत्र कुशध्वज हुआ और कुशध्वज का पुत्र राजा धर्मध्वज हुआ जिसके कृतध्वजतथा मितध्वज नाम के दो पुत्र हुए।

कृतध्वजात्केशिध्वज: खाण्डिक्यस्तु मितध्वजातू ।

कृतध्वजसुतो राजन्नात्मविद्याविशारद: ॥

२०॥

खाण्डिक्य: कर्मतत्त्वज्ञो भीतः केशिध्वजादूदरूत: ।

भानुमांस्तस्य पुत्रो भूच्छतद्युम्नस्तु तत्सुतः ॥

२१॥

कृतध्वजात्‌--कृतध्वज से; केशिध्वज:--केशिध्वज; खाण्डिक्य: तु--तथा खाण्डिक्य नामक पुत्र भी; मितध्वजात्‌ू--मितध्वज से;कृतध्वज-सुत:--कृतध्वज का पुत्र; राजन्‌ू--हे राजा; आत्म-विद्या-विशारद:--आत्मविद्या में पटु; खाण्डिक्य:--राजा खाण्डिक्य;कर्म-तत्त्व-ज्ञ:--वैदिक कर्मकांड में पटु; भीतः--डरते हुए; केशिध्वजात्‌--केशिध्वज से; द्रुतः:--भाग गया; भानुमान्‌-- भानुमान;तस्य--केशिध्वज का; पुत्र:--पुत्र; अभूत्‌ू-- था; शतद्युम्न:--शतद्युम्न; तु--लेकिन; तत्‌-सुत:-- भानुमान का पुत्र |

हे महाराज परीक्षित, कृतध्वज का पुत्र केशिध्वज हुआ और मितध्वज का पुत्र खाण्डिक्य था।

कृतध्वज का पुत्र आध्यात्मिक ज्ञान में पटु था और मितध्वज का पुत्र वैदिक कर्मकाण्ड में।

खाण्डिक्य केशिध्वज के भय से भाग गया।

केशिध्वज का पुत्र भानुमान था और भानुमान का पुत्रशतद्युम्न हुआ।

शुचिस्तु तनयस्तस्मात्सनद्वाज: सुतोभवत्‌ ।

ऊर्जकेतु: सनद्वाजादजोथ पुरुजित्सुत: ॥

२२॥

शुचि:--शुचि; तु--लेकिन; तनय:--पुत्र; तस्मात्‌--उससे; सनद्वाज:--सनद्वाज; सुत:--पुत्र; अभवत्‌--पैदा हुआ; ऊर्जकेतु:--ऊर्जकेतु; सनद्वाजात्‌ू--सनद्वाज से; अजः--अज; अथ--तत्पश्चात्‌; पुरुजित्‌--पुरुजित; सुत:--पूत्रशतझुम्न के पुत्र का नाम शुचि था।

शुच्ि से सनद्वाज उत्पन्न हुआ और सनद्वाज का पुत्र ऊर्जकेतुथा।

ऊर्जकेतु का पुत्र अज था और अज का पुत्र पुरुजित हुआ।

अरिष्टनेमिस्तस्यापि श्रुतायुस्तत्सुपार्थक: ।

ततश्ित्ररथो यस्य क्षेमाधिर्मिधिलाधिप: ॥

२३॥

अरिष्टनेमि:--अरिष्टनेमि; तस्थ अपि--पुरुजित का भी; श्रुतायु:-- श्रुतायु; तत्‌--उससे; सुपार्थक:--सुपार्थक; ततः--उससे;चित्ररथ:--चित्ररथ; यस्य-- जिसका; क्षेमाधि:-- क्षेमाधि; मिथिला-अधिप: --मिथिला का राजा हुआ।

पुरुजित का पुत्र अरिष्टनेमि हुआ, जिसका पुत्र श्रुतायु हुआ, श्रुतायु का पुत्र सुपार्थक था औरउसका पुत्र चित्ररथ था।

चित्ररथ का पुत्र क्षेमाधि था जो मिथिला का राजा बना।

तस्मात्समरथस्तस्य सुतः सत्यरथस्ततः ।

आसीदुपगुरुस्तस्मादुपगुप्तोग्निसम्भव: ॥

२४॥

तस्मात्‌--क्षेमाधि से; समरथ: --समरथ; तस्य--उसका; सुतः --पुत्र; सत्यरथ: --सत्यरथ; ततः -- उससे; आसीतू--हुआ; उपगुरु:--उपगुरु; तस्मात्‌--उससे; उपगुप्त:--उपगुप्त; अग्नि-सम्भव: --अग्निदेव का अंशरूप |

क्षेमाधि का पुत्र समरथ हुआ और उसका पुत्र सत्यरथ था।

सत्यरथ का पुत्र उपगुरु हुआ औरउपगुरु का पुत्र उपगुप्त हुआ जो अग्निदेव का अंशरूप था।

वस्वनन्तोथ तत्पुत्रो युयुधो यत्सुभाषण: ।

श्रुतस्ततो जयस्तस्माद्विजयोउस्माहत: सुतः ॥

२५॥

वस्वनन्त:--वस्वनन्त; अथ--तत्पश्चात्‌; तत्‌-पुत्र:--उसका पुत्र; युयुध: --युयुध नामक; यत्‌--जिससे; सुभाषण: --सुभाषण; श्रुतःततः--तथा उससे श्रुत हुआ; जय: तस्मात्‌ू--उससे जय हुआ; विजय:--विजय; अस्मात्‌--जय से; ऋत:--ऋत; सुतः--पुत्र |

उपगुप्त का पुत्र वस्वनन्त था, जिसका पुत्र युयुध हुआ।

युयुध का पुत्र सुभाषण, सुभाषण कापुत्र श्रुत, श्रुत का पुत्र जय और जय का पुत्र विजय था।

विजय का पुत्र ऋत था।

शुनकस्तत्सुतो जज्ञे वीतहव्यो धृतिस्ततः ।

बहुलाश्रो धृतेस्तस्य कृतिरस्थ महावशी ॥

२६॥

शुनकः--शुनक; तत्‌-सुतः--ऋत का पुत्र; जज्ञे--उत्पन्न हुआ; बीतहव्य:--वीतहव्य; धृति:--धूृति; तत:ः--वीतहव्य का पुत्र;बहुलाश्व:--बहुला श्व; धृतेः-- धृति से; तस्थ--उसका पुत्र; कृतिः--कृति; अस्य--इसका; महावशी--महावशी नाम का पुत्र था।

ऋत का पुत्र शुनक था, शुनक का वीतहव्य, बीतहव्य का धृति, धृति का बहुलाश्च, बहुलाश्व काकृति तथा उसका पुत्र महावशी था।

एते वै मैथिला राजन्नात्मविद्याविशारदा: ।

योगेश्वरप्रसादेन द्नन्द्ैर्मुक्ता गृहेष्वपि ॥

२७॥

एते--ये सारे; बै--निस्सन्देह; मैथिला:--मिथिल के वंशज; राजन्‌--हे राजा; आत्म-विद्या-विशारदा:--आध्यात्मिक ज्ञानों में पटु;योगेश्वर-प्रसादेन-- भगवान्‌ कृष्ण जो योगेश्वर हैं उनकी कृपा से; इन्हैः मुक्ताः--वे सब के सबभौतिक जगत के द्वैतभाव से मुक्त होगये; गृहेषु अपि--घर पर रहते हुए भी |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा परीक्षित, मिथिल वंश के सारे राजा अध्यात्म ज्ञान में पटु थे।

अतएव वे घर पर रहते हुए भी संसार के द्वन्द्दों से मुक्त हो गये।

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