← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 9 की सूची
अध्याय चौदह: राजा पुरुरवा उर्वशी पर मोहित हो गये
9.14श्रीशुक उबाचअथात: श्रूयतां राजन्वंश: सोमस्य पावन: ।
यस्मिन्नैलादयो भूषाः कीरत्यन्ते पुण्यकीर्तयः ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ--अब ( सूर्यवंश का इतिहास सुनने के बाद ); अत:--अतएव; श्रूयताम्--मुझसे सुनो; राजन्--हे राजा परीक्षित; वंश: --वंश; सोमस्य--सोमदेव का; पावन: --पवित्र करने वाला; यस्मिन्ू--जिस ( वंश ) में;ऐल-आदयः:--ऐल ( पुरुरवा ) इत्यादि; भूपाः--अनेक राजा; कीर््यन्ते--वर्णित किये जाते हैं; पुण्य-कीर्तयः--ऐसे व्यक्ति जिनकेविषय में सुनना कीर्तिप्रद है।
श्रील शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित से कहा : हे राजनू, अभी तक आपने सूर्यवंश काविवरण सुना है।
अब सोमवंश का अत्यन्त कीर्तिप्रद एवं पावन वर्णन सुनिए।
इसमें ऐल ( पुरुरवा )जैसे राजाओं का उल्लेख है जिनके विषय में सुनना कीर्तिप्रद होता है।
सहस्त्रशिरसः पुंसो नाभिहृदसरोरुहात् ।
जातस्यासीत्सुतो धातुरत्रि:ः पितूसमो गुणै: ॥
२॥
सहस्त्र-शिरस:ः--एक हजार सिरों वाले; पुंसः-- भगवान् विष्णु ( गर्भोदकशायी विष्णु ) की; नाभि-हृद-सरोरुहात्--नाभि रूपीसरोवर से उत्पन्न कमल से; जातस्य--प्रकट हुआ; आसीतू-- था; सुत:--पुत्र; धातु: --ब्रह्माजी का; अत्रि: --अत्रि नामक; पितृ-समः--अपने पिता के ही समान; गुणैः--योग्य |
भगवान् विष्णु ( गर्भोदकशायी विष्णु ) सहस््रशीर्ष पुरुष भी कहलाते हैं।
उनकी नाभि रूपीसरोवर से एक कमल निकला जिससे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए।
ब्रह्मा का पुत्र अत्रि अपने पिता के हीसमान योग्य था।
तस्य हृग्भ्योभवत्पुत्र: सोमोउमृतमय: किल ।
विप्रौषध्युडुगणानां ब्रह्मणा कल्पितः पति: ॥
३॥
तस्य--अत्रि के; दृग्भ्य:--हर्षा श्रुओं से; अभवत्--उत्पन्न हुआ; पुत्र:--पुत्र; सोम: --चन्द्रमा; अमृत-मय: --स्निग्ध किरणों से युक्त;किल--निस्सन्देह; विप्र--ब्राह्मणों का; ओषधि--दवाओं का; उडु-गणानाम्--तारों का; ब्रह्मणा--ब्रह्मा द्वारा; कल्पित:--नियुक्तकिया गया; पति:--परम निदेशक, संचालक |
अत्रि के हर्षाश्रुओं से सोम नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ जो स्निग्ध किरणों से युक्त था।
ब्रह्माजी नेउसे ब्राह्मणों, ओषधियों तथा नक्षत्रों ( तारों ) का निदेशक नियुक्त किया।
सोयजद्राजसूयेन विजित्य भुवनत्रयम् ।
पत्नीं बृहस्पतेर्दर्पात्तारां नामाहरद्वलात् ॥
४॥
सः--उस सोम ने; अयजत्--सम्पन्न किया; राजसूयेन--राजसूय यज्ञ द्वारा; विजित्य--जीतकर; भुवन-त्रयम्ू--तीनों लोक ( स्वर्ग,मर्त्य तथा पाताल ); पत्लीम्ू--पत्नी को; बृहस्पतेः:--बृहस्पति की, जो देवताओं के गुरु हैं; दर्पातू-गर्व से; तारामू-- तारा को;नाम--नामक; अहरत्--चुरा ले गया; बलात्ू--बलपूर्वक, जबरन।
तीनों लोकों को जीत लेने के बाद सोम ने राजसूय नामक महान् यज्ञ सम्पन्न किया।
अत्यधिकगर्वित होने के कारण उसने बृहस्पति की पत्नी तारा का बलपूर्वक हरण कर लिया।
यदा स देवगुरुणा याचितो भी क्ष्णशो मदात् ।
नात्यजत्तत्कृते जज्ञे सुरदानवविग्रह: ॥
५॥
यदा--जब; सः--वह ( सोम ); देव-गुरुणा--देवताओं के गुरु बृहस्पति द्वारा; याचित:--माँगे जाने पर; अभीक्षणश:--बार म्बार;मदातू--मिथ्या गर्व के कारण; न--नहीं; अत्यजतू--छोड़ा; तत्-कृते--इसके कारण; जज्ञे--हुआ; सुर-दानब--देवताओं तथाअसुरों के बीच; विग्रह:--युद्ध |
यद्यपि देवताओं के गुरु बृहस्पति ने सोम से बारम्बार अनुरोध किया कि वह तारा को लौटा दे,किन्तु उसने नहीं लौटाया।
यह उसके मिथ्या गर्व के कारण हुआ।
फलस्वरूप देवताओं तथा असुरोंके बीच युद्ध छिड़ गया।
शुक्रो बृहस्पतेद्वेंषादग्रहीत्सासुरोडुपम् ।
हरो गुरुसुतं स्नेहात्सर्वभूतगणावृतः ॥
६॥
शुक्र:--शुक्र नामक देवता; बृहस्पते: --बृहस्पति की; द्वेषातू--शत्रुतावश; अग्रहीत्ू--ले लिया; स-असुर--असुरों सहित; उडुपम्--चन्द्रमा का पक्ष; हरः--शिवजी ने; गुरु-सुतम्--अपने गुरुपुत्र का पक्ष; स्नेहात्-स्नेहवश; सर्व-भूत-गण-आवृतः--सारे भूतप्रेतोंको साथ लेकर।
बृहस्पति तथा शुक्र के मध्य शत्रुता होने से शुक्र ने सोम ( चन्द्रमा ) का पक्ष लिया और सारेअसुर उनके साथ हो लिये।
किन्तु अपने गुरु का पुत्र होने के कारण शिवजी स्नेहवश बृहस्पति केपक्ष में हो लिये और उनके साथ सारे भूत-प्रेत भी हो लिये।
सर्वदेवगणोपेतो महेन्द्रो गुरुमन््वयात् ।
सुरासुरविनाशो भूत्समरस्तारकामय: ॥
७॥
सर्व-देव-गण--विभिन्न देवताओं द्वारा; उपेत:--साथ हो लेने पर; महेन्द्र: --इन्द्र; गुरुम्--गुरु का; अन्वयात्--साथ दिया; सुर--देवताओं का; असुर--तथा असुरों का; विनाश:--विनाशकारी; अभूत्-- था; समर: --यद्ध; तारका-मय: --बृहस्पति की पत्नी ताराके कारण
इन्द्र सभी देवताओं को साथ लेकर बृहस्पति के पक्ष में हो लिया।
इस तरह महान् युद्ध हुआ जिसमें बृहस्पति की पत्नी तारा के कारण ही असुरों तथा देवताओं का विनाश हो गया।
निवेदितोथाड्रिरसा सोम॑ निर्भव्स्य विश्वकृत् ।
तारां स्वभत्रें प्रायच्छदन्तर्वत्तीमवैत्पति: ॥
८ ॥
निवेदित:--पूरी तरह सूचित किया जाकर; अथ--इस प्रकार; अड्रिर्सा--अंगिरा मुनि द्वारा; सोमम्--सोम को; निर्भ॑त्स्थ--बुरी तरहभर्ससना करके; विश्व-कृत्--ब्रह्मा जी ने; तारामू--तारा को; स्व-भर्त्रे--उसके पति को; प्रायच्छत्--दे दिया; अन्तर्वलीम्--गर्भिणी;अवैत्--समझ सका; पति: --पति ( बृहस्पति )॥
जब अंगिरा ने ब्रह्मजी को सारी घटना की जानकारी दी तो उन्होंने सोम को बुरी तरह फटकारा।
इस तरह ब्रह्माजी ने तारा को उसके पति को वापस दिलवा दिया जिसे यह ज्ञात हो गया कि उसकीपत्नी गर्भवती है।
त्यज त्यजाशू दुष्प्रज्ञे मत््षेत्रादाहितं परे: ।
नाहं त्वां भस्मसात्कुर्या स्त्रियं सान्तानिकेउसति ॥
९॥
त्यज--बाहर करो; त्यज--बाहर करो; आशु--तुरन््त; दुष्प्रज्ञे -- मूर्ख स्त्री; मत्-क्षेत्रात्-मेरे द्वारा गर्भित होने वाले क्षेत्र से;आहितम्--उत्पन्न हुआ; परैः--अन्यों के द्वारा; न--नहीं; अहम्--मैं; त्वामू--तुमको; भस्मसात्--जलाकर राख; कुर्याम्--कर दूँगा;स्त्रियम्ू--तुम स्त्री को; सान्तानिके --सन्तान की इच्छुक; असति--दुराचारिणी ।
बृहस्पति ने कहा : ओरे मूर्ख स्त्री! जिस गर्भ को मेरे वीर्य से निषेचित होना था वह किसी अन्यके द्वारा निषेचिित हो चुका है।
तुम तुरन्त ही बच्चा जनो।
तुरन्त जनो।
आश्वस्त रहो कि इस बच्चे केजनने के बाद मैं तुम्हें भस्म नहीं करूँगा।
मुझे पता है कि यद्यपि तुम दुराचारिणी हो, किन्तु तुम पुत्रकी इच्छुक थी।
अतएव मैं तुम्हें दण्ड नहीं दूँगा।
तत्याज ब्रीडिता तारा कुमारं कनकप्रभम् ।
स्पृहामाड्रिरसश्नक्रे कुमारे सोम एबच ॥
१०॥
तत्याज--जन्म दिया; ब्रीडिता--अत्यन्त लज्जित; तारा--तारा ने; कुमारमू--बालक को; कनक-प्रभम्--सोने के समान शारीरिककान्ति वाला; स्पृहामू--अभिलाषा; आ्विरस:--बृहस्पति ने; चक्रे--बनाया; कुमारे--कुमार को; सोम: --सोम; एबव--निस्सन्देह;च--भी
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : बृहस्पति का आदेश पाकर अत्यन्त लज्जित हुई तारा ने तुरन्त हीबच्चे को जन्म दिया जो अत्यन्त सुन्दर था और जिसकी शारीरिक कान्ति सोने जैसी थी।
बृहस्पतितथा सोम दोनों ने ही उस सुन्दर पुत्र को सराहा।
ममायं न तवेत्युच्चैस्तस्मिन्विवदमानयो: ।
पप्रच्छुरषयो देवा नेवोचे ब्रीडिता तु सा ॥
११॥
मम--मेरा; अयम्--यह ( पुत्र ); न--नहीं; तव--तुम्हारा; इति--इस प्रकार; उच्चै:--उच्चस्वर से; तस्मिनू--बालक के लिए;विवदमानयो:--दो दलों के झगड़ने पर; पप्रच्छु:--पूछा ( तारा से ); ऋषय:--ऋषियों ने; देवा:--सारे देवताओं ने; न--नहीं; एब--निस्सन्देह; उचे--कुछ कहा; ब्रीडिता--लाजवश; तु--निस्सन्देह; सा--तारा ने।
फिर से बृहस्पति और सोम के बीच झगड़ा होने लगा क्योंकि दोनों दावा कर रहे थे, 'यह मेरापुत्र है, तुम्हारा नहीं है।
' वहाँ पर उपस्थित सारे ऋषियों तथा देवताओं ने तारा से पूछा कि यहनवजात शिशु वास्तव में किसका है, किन्तु वह लज्जित होने के कारण तुरन्त कुछ भी उत्तर न दे पाई।
कुमारो मातरं प्राह कुपितोइलीकलज्जया ।
कि न वच्स्यसद्वत्ते आत्मावद्यं बदाशु मे ॥
१२॥
कुमार:--बालक ने; मातरम्--अपनी माता से; प्राह--कहा; कुपितः --अत्यधिक क्ुद्ध; अलीक--वृथा; लजजया--लाज से;किम्--क्यों; न--नहीं; वचसि--बोलती हो; असत्-वृत्ते--अरे दुराचारिणी स्त्री; आत्म-अवद्यम्--अपने दोष को; वद--कहो;आशु-ुरन्त; मे--मुझसे ।
तब बालक अत्वन्त क्रुद्ध हुआ और उसने अपनी माता से तुरन्त सच-सच बतलाने के लिए कहा,'है दुराचारिणी! तुम्हारे द्वारा यह लज्जा व्यर्थ है।
तुम अपने दोष को स्वीकार क्यों नहीं कर लेती ?
तुम मुझसे अपने दोषी चरित्र के विषय में बतलाओ।
ब्रह्मा तां रह आहूय समप्राक्षीच्च सान्त्वयन् ।
सोमस्येत्याह शनकै: सोमस्तं तावदग्रहीत् ॥
१३॥
ब्रह्मा--ब्रह्माजी ने; तामू--उस ( तारा ) से; रह:--एकान्त में; आहूय--बुलाकर; समप्राक्षीत्--विस्तार से पूछा; च--तथा;सान्त्वयन्--शान्त करते हुए; सोमस्थ--सोम का है; इति--इस प्रकार; आह--वह बोली; शनकै:--अत्यन्त धीमे; सोमः--सोम ने;तम्ू--बालक को; तावत्--तुरन््त; अग्रहीत्--स्वीकार कर लिया।
तत्पश्चात् ब्रह्मजी तारा को एकान्त में ले गये और सान््त्वना देने के बाद उससे पूछा कि वास्तव मेंयह पुत्र किसका है।
उसने धीमे से उत्तर दिया 'यह सोम का है।
' तब सोम ने तुरन्त ही उस बालकको स्वीकार कर लिया।
तस्यात्मयोनिरकृत बुध इत्यभिधां नृप ।
बुद्धया गम्भीरया येन पुत्रेणापोडुराण्मुदम् ॥
१४॥
तस्य--उस बालक का; आत्म-योनि:--ब्रह्माजी ने; अकृत--बनाया; बुध:--बुध; इति--इस प्रकार; अभिधाम्--नाम; नृप--हेराजा, परीक्षित; बुद्धया--बुद्धि से; गम्भीरया--अत्यन्त गहराई पर स्थित; येन--जिस; पुत्रेण--पुत्र से; आप--उसने पाया; उड़ुराट्--सोम से; मुदम्--हर्ष
हे महाराज परीक्षित, जब ब्रह्माजी ने देखा कि वह बालक अत्यधिक बुद्धिमान है तो उन्होंनेउसका नाम बुध रख दिया।
इस पुत्र के कारण नक्षत्रों के राजा सोम ने अत्यधिक हर्ष का अनुभवकिया।
ततः पुरूरवा जज्ञे इलायां य उदाहतः ।
तस्य रूपगुणौदार्यशीलद्रविणविक्रमान् ॥
१५॥
श्र॒त्वोर्वशीन्द्रभवने गीयमानान्सुर्षिणा ।
तदन्तिकमुपेयाय देवी स्मरशरार्दिता ॥
१६॥
ततः--उस ( बुध ) से; पुरूरवा:--पुरुरवा; जज्ञे--उत्पन्न हुआ; इलायाम्--इला के गर्भ से; यः--जो; उदाहत: --पूर्ववर्णित ( नवमस्कन्ध के प्रारम्भ में ); तस्थ--उसका ( पुरुरवा का ); रूप--सौन्दर्य; गुण--गुण; औदार्य--उदारता; शील--आचरण; द्रविण--सम्पत्ति; विक्रमान्ू--शक्ति को; श्रुत्वा--सुनकर; उर्वशी--देवलोक की स्त्री ( देवांगना ), उर्वशी; इन्द्र-भवने--राजा इन्द्र के दरबारमें; गीयमानान्ू--वर्णन किये जाते समय; सुर-ऋषिणा--नारद द्वारा; तत्ू-अन्तिकम्-- उसके निकट; उपेयाय--पहुँचकर; देवी --उर्वशी; स्मर-शर--कामदेव के बाण से; अर्दिता--मारी गयी |
तत्पश्चात् इला के गर्भ से बुध को पुरुरवा नामक पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका वर्णन नवम स्कन्धके प्रारम्भ में किया जा चुका है।
जब नारद ने इन्द्र के दरबार में पुरुरवा के सौन्दर्य, गुण, उदारता,आचरण, ऐश्वर्य तथा शक्ति का वर्णन किया तो देवांगना उर्वशी उसके प्रति आकृष्ट हो गई।
वह कामदेव के बाणों से बिंधकर उसके पास पहुँची।
मित्रावरुणयो: शापादापन्ना नरलोकताम् ।
निशम्य पुरुषश्रेष्ठ कन्दर्पमिव रूपिणम् ।
धृतिं विष्टभ्य ललना उपतस्थे तदन्तिके ॥
१७॥
सतां विलोक्य नृपतिईर्षेणोत्फुल्ललोचन: ।
उवाच एलक्ष्णया वाचा देवीं हष्टतनूरूह: ॥
१८ ॥
मित्रा-वरुणयो: --मित्र तथा वरुण के; शापात्--शाप से; आपन्ना--प्राप्त हुई; नर-लोकताम्--मनुष्यों का स्वभाव; निशम्य--देखकर; पुरुष-श्रेष्ठम्--मनुष्यों में सर्वोत्तम; कन्दर्पम् इब--कामदेव की तरह; रूपिणम्--रूपवान; धृतिम्-- धैर्य, सहनशीलता;विष्टभ्य--स्वीकार करके; ललना--वह स्त्री; उपतस्थे--निकट गई; ततू-अन्तिके --उसके पास; सः--वह पुरुरवा; ताम्--उसको;विलोक्य--देखकर; नृपतिः--राजा; हर्षेण--हर्ष से; उत्फुल्ल-लोचन:--चमकीली आँखों वाला; उवाच--बोला; एलक्ष्णया--विनीत होकर; वाचा--शब्द; देवीम्ू--उस देवी से; हष्ट-तनूरूह:--हर्ष से रोमांचित |
मित्र तथा वरुण से शापित उस देवांगना उर्वशी ने मानवीय गुण अर्जित कर लिए।
अतएवपुरुषश्रेष्ठ कामदेव के समान सुन्दर पुरुरवा को देखते ही उसने अपने को सँभाला।
और वह उसकेनिकट पहुँची।
जब राजा पुरुरवा ने उर्वशी को देखा तो उसकी आँखें हर्ष से चमक उठीं और उसकोरोमांच हो आया।
वह उससे विनीत एवं मधुर बचनों में इस प्रकार बोला।
श्रीराजोबाचस्वागतं ते वरारोहे आस्यतां करवाम किम् ।
संरमस्व मया साकं रतिरनों शाश्वती: समा: ॥
१९॥
श्री-राजा उबाच--राजा ( पुरुरवा ) ने कहा; स्वागतम्--स्वागत; ते--तुम्हारा; वरारोहे --हे सर्व-सुन्दर स्त्री; आस्यताम्--कृपयाआसन ग्रहण करें; करवाम किम्--आपके लिए क्या करूँ; संरमस्व--मेरी संगिनी बनो; मया साकम्--मेरे साथ; रतिः--कामकेलि,रतिक्रीडा; नौ--हमारे बीच; शाश्रवती: समाः-- अनेक वर्षो तक |
राजा पुरुरवा ने कहा : हे श्रेष्ठ सुन्दरी, तुम्हारा स्वागत है।
कृपा करके यहाँ बैठो और कहो कि मैंतुम्हिरे लिए क्या कर सकता हूँ?
तुम जब तक चाहो मेरे साथ भोग कर सकती हो।
हम दोनोंसुखपूर्वक दम्पति-जीवन व्यतीत करें।
उर्वश्युवाचकस्यास्त्वयि न सज्जेत मनो दृष्टिश्च सुन्दर ।
यदड्जान्तरमासाद्य च्यवते ह रिरंसया ॥
२०॥
उर्वशी उबाच--उर्वशी ने उत्तर दिया; कस्या:--किस स्त्री का; त्वयि--तुम पर; न--नहीं; सज्जेत-- आकृष्ट होगा; मन:--मन; दृष्टि:च--तथा दृष्टि; सुन्दर--हे रूपवान; यत्-अज्जन्तरम्--जिसका वक्ष; आसाद्य--भोगकर; च्यवते--त्यागता है; ह--निस्सन्देह;रिरंसया--कामसुख के लिए।
उर्वशी ने उत्तर दिया: हे रूपवान, ऐसी कौन सी स्त्री होगी जिसका मन तथा दृष्टि आपके प्रतिआकृष्ट न हो जाए?
यदि कोई स्त्री आपके वक्षस्थल की शरण ले तो वह आपसे रमण किये बिनानहीं रह सकती।
एतावुरणकौ राजन्न्यासौ रक्षस्व मानद ।
संरंस्ये भवता साक॑ एलाध्यः स्त्रीणां वर: स्मृत: ॥
२१॥
एतौ--इन दोनों को; उरणकौ--मेमने; राजनू्--हे राजा पुरुरवा; न्यासौ--नीचे गिरे हुए; रक्षस्व--रक्षा करो; मान-द--अतिथि कोसम्मान देने वाले; संरंस्थे--मैं रमण करूँगी; भवता साकम्--तुम्हारे संग रहकर; एलाध्य:-- श्रेष्ठ; सत्रीणाम्--स्त्री का; वर:--पति;स्मृत:--कहा गया है।
हे राजा पुरुरवा, आप इन दोनों मेमनों को शरण दें क्योंकि ये भी मेरे साथ गिर गए हैं।
यद्यपि मैंस्वर्गलोक की हूँ और आप पृथ्वी लोक के हैं, किन्तु मैं निश्चय ही आपके साथ संभोग करूँगी।
आपको पति रूप में स्वीकार करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि आप हर प्रकार से श्रेष्ठ हैं।
घृतं मे वीर भक्ष्यं स्पान्नेक्षे त्वान्यत्र मैथुनात् ।
विवाससं तत्तथेति प्रतिपेदे महामना: ॥
२२॥
घृतम्--घी या अमृत; मे--मेरी; वीर--हे वीर पुरुष; भक्ष्यम्--खाद्य वस्तु; स्थातू--होगी; न--नहीं; ईक्षे--देखूँगी; त्वा-- तुमको;अन्यत्र--किसी और समय; मैथुनात्ू--मैथुन काल के अतिरिक्त; विवाससम्--विवस्त्र, नग्न; तत्ू--वह; तथा इति--ऐसा ही हो;प्रतिपेदे--वचन दे दिया; महामना:--राजा पुरुरवा ने |
उर्वशी ने कहा, 'हे वीर, मैं केवल घी की बनी वस्तुएँ खाऊँगी और आपको मैथुन-समय केअतिरिक्त अन्य किसी समय नग्न नहीं देखना चाहूँगी।
' विशालहृदय पुरुरवा ने इन प्रस्तावों कोस्वीकार कर लिया।
अहो रूपमहो भावो नरलोकविमोहनम् ।
को न सेवेत मनुजो देवीं त्वां स््वयमागताम् ॥
२३॥
अहो--आश्चर्यजनक है; रूपम्--सौन्दर्य; अहो-- अद्भुत है; भाव:-- भावभंगिमा, मुद्रा; नर-लोक--मानव समाज में या पृथ्वीलोकमें; विमोहनम्ू--इतना आकर्षक; कः--कौन; न--नहीं; सेवेत--स्वीकार कर सकता है; मनुज:--मनुष्य; देवीम्--देवी को;त्वामू-तुम जैसी; स्वयम् आगताम्--स्वयं चलकर आई हुई।
पुरुरवा ने कहा : हे सुन्दरी, तुम्हारा सौन्दर्य अद्भुत है और तुम्हारी भावभंगिमाएँ भी अद्भुत हैं।
निस्सन्देह, तुम सारे मानव समाज के लिए आकर्षक हो।
अतएव क्योंकि तुम स्वेच्छा से स्वर्ग लोकसे यहाँ आई हो तो भला इस पृथ्वीलोक पर ऐसा कौन होगा जो तुम जैसी देवी की सेवा करने केलिए तैयार नहीं होगा ?
तया स पुरुषश्रेष्ठो रमयन्त्या यथाईतः ।
रेमे सुरविहारेषु काम॑ चेत्ररथादिषु ॥
२४॥
तया--उसके साथ; सः--वह; पुरुष- श्रेष्ठ: --मनुष्यों में श्रेष्ठ, पुरुरवा; रमयन्त्या--रमण करते हुए; यथा-अ्हईतः --यथाशक्ति; रेमे--भोग किया; सुर-विहारेषु--स्वर्गिक विहारस्थलों में; कामम्--इच्छानुसार; चैत्ररथ-आदिषु--चैत्ररथ इत्यादि जैसे श्रेष्ठ उद्यानों में |
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : पुरुषश्रेष्ठ पुरुरवा उर्वशी के साथ मुक्त भाव से भोग करनेलगा।
वे दोनों चैत्ररथ, नन्दन कानन जैसे अनेक दैवी स्थलों में रतिक्रीड़ा में व्यस्त रहने लगे, जहाँ परदेवतागण भोग-विहार करते हैं।
रममाणस्तया देव्या पद्मकिड्जल्कगन्धया ।
तन्मुखामोदमुषितो मुमुदेहर्गणान्बहून्ू ॥
२५॥
रममाण: --रमण करते हुए; तया--उसके साथ; देव्या--देवी के साथ; पढ्य--कमल; किड्लल्क--केसर के समान; गन्धया--गन्धसे; तत्-मुख--उसका सुन्दर मुखमंडल; आमोद--सुगन्धि से; मुषित:--अधिकाधिक उत्तेजित होकर; मुमुदे--जीवन का आनन्दलिया; अहः-गणानू--दिन प्रतिदिन; बहूनू--अनेक ।
उर्वशी का शरीर कमल के केसर की भाँति सुगन्धित था।
उसके मुख तथा शरीर की सुगन्ध सेअनुप्राणित होकर पुरुरवा ने अत्यन्त उल्लासपूर्वक अनेक दिनों तक उसके साथ रमण किया।
अपशयच्रुर्वशीमिन्द्रो गन्धर्वान्समचोदयत् ।
उर्वशीरहितं मह्ाममास्थानं नातिशोभते ॥
२६॥
अपश्यन्--न देखने से; उर्वशीम्--उर्वशी को; इन्द्र:--स्वर्ग के राजा इन्द्र ने; गन्धर्वान्--गन्धर्वों को; समचोदयत्--आदेश दिया;उर्वशी-रहितम्--बिना उर्वशी के; महाम्--मेरा; आस्थानम्--स्थान; न--नहीं; अतिशोभते-- अच्छा लगता है।
उर्वशी को अपनी सभा में न देखकर स्वर्ग के राजा इन्द्र ने कहा, 'उर्वशी के बिना मेरी सभासुन्दर नहीं लगती।
' यह सोचकर उसने गन्धर्वों से अनुरोध किया कि वे उसे पुनः स्वर्गलोक में लेआएँ।
ते उपेत्य महारात्रे तमसि प्रत्युपस्थिते ।
उर्वश्या उरणौ जहर्न्यस्तौ राजनि जायया ॥
२७॥
ते--वे गन्धर्वगण; उपेत्य--वहाँ जाकर; महा-रात्रे--आधीरात में; तमसि-- अँधेरे में; प्रत्युपस्थिते--प्रकट हुए; उर्वश्या--उर्वशी द्वारा;उरणौ--दोनों मेमने; जहुः--चुरा लिया; न्यस्तौ-- धरोहर रखे गये; राजनि--राजा के पास; जायया--पली उर्वशी द्वारा।
इस तरह गन्धर्वगण पृथ्वी पर आये और अर्धरात्रि के अंधकार में पुरुरवा के घर में प्रकट हुएतथा उर्वशी द्वारा प्रदत्त दोनों मेमने चुरा लिए।
निशम्याक्रन्दितं देवी पुत्रयोनीयमानयो: ।
हतास्म्यहं कुनाथेन नपुंसा वीरमानिना ॥
२८॥
निशम्य--सुनकर; आक्रन्दितम्-क्रन्दन, चीत्कार ( चुराने के कारण ); देवी--उर्वशी; पुत्रयो: --पुत्रस्वरूप दोनों मेमनों का;नीयमानयो:--ले जाये जाते हुए; हता--मारी गयी; अस्मि--हूँ; अहम्--मैं; कु-नाथेन--कुपति के संरक्षण में होने से; न-पुंसा--नपुंसक द्वारा; वीर-मानिना--अपने को वीर मानने वाला।
उर्वशी इन दोनों मेमनों को पुत्रस्वरूप मानती थी।
अतएव जब उन्हें गन्धर्वगण लिए जा रहे थेऔर जब उन्होंने मिमियाना शुरू किया तो उर्वशी ने इसे सुना।
उसने अपने पति को फटकारते हुएकहा, 'हाय! अब मैं ऐसे अयोग्य पति के संरक्षण में रहती हुई मारी जा रही हूँ जो कायर एवं नपुंसकहै किन्तु अपने को परम वीर समझता है।
यद्विश्रम्भादहं नष्टा हतापत्या च दस्युभि: ।
यः शेते निशि सन्त्रस्तो यथा नारी दिवा पुमान् ॥
२९॥
यतू-विश्रम्भात्ू--जिस पर आश्रित रहने के कारण; अहम्--मैं; नष्टा--विनष्ट हो गई; हत-अपत्या--अपने पुत्रों ( मेमनों ) से विहीन;च--भी; दस्युभि:--लुटेरों के द्वारा; यः--जो ( मेरा तथाकथित पति ); शेते--सोता है; निशि--रात में; सन्त्रस्त:-- भयभीत; यथा--जिस तरह; नारी--स्त्री; दिवा--दिन में; पुमान्ू--पुरुष |
चूँकि मैं उस ( अपने पति ) पर आश्रित थी, अतएव लुटेरों ने मुझसे मेरे दोनों पुत्रवत् मेमनों कोछीन लिया है और अब मैं विनष्ट हो गई हूँ।
मेरा पति रात्रि में डर के मारे उसी तरह सो रहा है जैसे कोई स्त्री हो, यद्यपि दिन में वह पुरुष प्रतीत होता है।
'इति वाक्सायकैर्बिद्ध: प्रतोक्तैरिव कुझ्रः ।
निशि निर्त्रिशमादाय विवस्त्रोभ्यद्रवद्रघा ॥
३० ॥
इति--इस प्रकार; वाक्ू-सायकै:--कठोर शब्दों के बाणों से; बिद्ध:--बींधकर; प्रतोत्तैः-- अंकुश से; इब--सहश; कुझर:--हा थी;निशि--रात में; निस्त्रिशम्ू--तलवार; आदाय--हाथ में लेकर; विवस्त्र:--नंगा; अभ्यद्रवत्--बाहर चला गया; रुषा--क्रोध से |
पुरुरवा उर्वशी के कर्कश शब्दों से आहत होने के कारण उसी तरह से अत्यधिक क्रुद्ध हुआजिस तरह हाथी महावत के अंकुश से होता है।
वह बिना उचित वस्त्र पहने, हाथ में तलवार लेकरमेमना चुराने वाले गन्धर्वों का पीछा करने के लिए नंगा बाहर चला गया।
ते विसृज्योरणौ तत्र व्यद्योतन्त सम विद्युत: ।
आदाय मेषावायान्तं नग्नमैक्षत सा पतिम् ॥
३१॥
ते--वे, गन्धर्व; विसृज्य--छोड़कर; उरणौ--दोनो मेमनों को; तत्र--उसी स्थान पर; व्यद्योतन्त स्म--प्रकाशमान हो उठे; विद्युत:--बिजली के समान; आदाय--हाथ में लेकर; मेषौ--दोनों मेमने; आयान्तमू--लौटकर; नग्नमू--नंगा; ऐक्षत--देखा; सा--उर्वशी ने;पतिमू--अपने पति को |
उन दोनों मेमनों को छोड़कर गन्धर्वगण बिजली के समान प्रकाशमान हो उठे जिससे पुरुरवा काघर प्रकाशित हो उठा।
तब उर्वशी ने देखा कि उसका पति दोनों मेमनों को हाथ में लिए लौट आयाहै, किन्तु वह नग्न है; अतएव उसने उसका परित्याग कर दिया।
ऐलोपि शयने जायामपश्यन्विमना इव ।
तच्चित्तो विहलः शोचन्बश्चामोन्मत्तवन्महीम् ॥
३२॥
ऐल:--पुरुरवा; अपि-- भी; शयने--बिस्तर में; जायाम्-- अपनी पत्नी को; अपश्यन्ू--न देखकर; विमना: --खिन्न; इब--सहृश;तत्-चित्त:--उसके प्रति अत्यधिक आसक्त होने से; विहलः--मन में क्षुब्ध।
शोचन्ू--विलाप करते; बश्चाम--घूमने लगे; उन्मत्त-बत्--पागल व्यक्ति की तरह; महीम्--पृथ्वी परउर्वशी को अपने बिस्तर पर न देखकर पुरुरवा अत्यधिक दुखित हो उठा।
उसके प्रति अत्यधिकआसक्ति के कारण वह मन में क्षुब्ध था।
तत्पश्चात् विलाप करते हुए वह पागल की तरह सारी पृथ्वीमें भ्रमण करने लगा।
सतां वीक्ष्य कुरुक्षेत्रे सरस्वत्यां च तत्सखी: ।
पश्च प्रहष्टवदनः प्राह सूक्त पुरूरवा: ॥
३३॥
सः--पुरुरवा ने; ताम्--उर्वशी को; वीक्ष्य--देखकर; कुरुक्षेत्रे--कुरुक्षेत्र नामक स्थान पर; सरस्वत्याम्--सरस्वती नदी के तट पर;च--भी; तत्-सखी:--उसकी सखियाँ; पञ्ञ--पाँच; प्रहष्ट-वदन:--अत्यन्त प्रसन्न एवं हँसमुख; प्राह--कहा; सूक्तम्--मीठे वचन;पुरूरवा:--राजा पुरुरवा ने।
एक बार विश्व का भ्रमण करते हुए पुरुरवा ने उर्वशी को उसकी पाँच सखियों सहित सरस्वतीनदी के तट पर कुरुक्षेत्र में देखा।
प्रसन्न-मुख होकर वह उस से मधुर शब्दों में इस प्रकार बोला।
अहो जाये तिष्ठ तिष्ठ घोरे न त्यक्तुमहसि ।
मां त्वमद्याप्यनिर्वृत्य वचांसि कृणवावहै ॥
३४॥
अहो--ओह; जाये--मेरी प्रिय पत्नी; तिष्ठ तिष्ठ--जरा ठहरो, जरा ठहरो; घोरे--अत्यन्त क्रूर; न--नहीं; त्यक्तुमू--छोड़ना; अरहसि--तुम्हें चाहिए; मामू--मुझको; त्वमू--तुम; अद्य अपि--अभी तक; अनिर्व॒त्य--मेरे साथ का सुख न पाने से; वचांसि--कुछ शब्द;'कृणवावहै--कुछ क्षण बातें करें।
हे प्रिय पत्नी! हे क्रूर! जरा ठहरो तो।
मैं जानता हूँ कि अभी तक मैं तुम्हें कभी भी सुखी नहीं बनापाया, किन्तु तुम्हें इस कारण से मेरा परित्याग नहीं करना चाहिए।
यह तुम्हारे लिए उचित नहीं है।
मान लो कि तुम मेरा साथ छोड़ने का निश्चय कर चुकी हो, किन्तु तो भी आओ कुछ क्षण बैठकरबातें करें।
सुदेहोयं पतत्यत्र देवि दूरं हृतस्त्वया ।
खाद-न्त्येनं वृका गृश्नास्त्वत्प्रसादस्य नास्पदम् ॥
३५॥
सु-देह:--अत्यन्त सुन्दर शरीर; अयम्--यह; पतति--गिर जायेगा; अत्र--यहीं पर; देवि--हे उर्वशी; दूरम्--दूर, घर से दूर; हत:--लेजाया गया; त्वया--तुम्हारे द्वारा; खादन्ति--खा जायें; एनम्--इस ( शरीर ) को; वृकाः--लोमड़ियाँ; गृक्षा:--गी ध; त्वत्-- तुम्हारी;प्रसादस्य--कृपा का; न--नहीं; आस्पदम्--उपयुक्त |
हे देवी, चूँकि तुमने मुझे अस्वीकार कर दिया है अतएव मेरा यह सुन्दर शरीर यहीं धराशायी होजायगा और चाँकि मैं तुम्हारे सुख के अनुकूल नहीं हूँ इसलिए इसे लोमड़ियाँ तथा गीध खा जायेंगे।
उर्वश्युवाच मा मृथा: पुरुषोउसि त्वं मा सम त्वाद्युर्वृका इमे ।
क्वापि सख्यं न वे स्त्रीणां वृकाणां हृदयं यथा ॥
३६॥
उर्वशी उबाच--उर्वशी ने कहा; मा--मत; मृथा:--शरीर त्याग करो; पुरुष: --पुरुष; असि--हो; त्वमू--तुम; मा स्म--ऐसा न होनेदो; त्वा--तुमको; अद्यु:--खा सके; वृकाः--लोमड़ियाँ; इमे--इन इन्द्रियों को ( अपनी इन्द्रियों के वश में न रहो ); क्व अपि--कहींभी; सख्यम्--मैत्री; न--नहीं; वै--निस्सन्देह; स्त्रीणाम्--स्त्रियों के; वृकाणाम्--लोमड़ियों की; हदयम्--हदय को; यथा--जिसतरह।
उर्वशी ने कहा : हे राजन, तुम पुरुष हो, वीर हो।
अधीर मत होओ और अपने प्राणों को मतत्यागो।
गम्भीर बनो और लोमड़ियों की भाँति अपनी इन्द्रियों के वश में मत होओ।
तुम लोमड़ियों काभोजन मत बनो।
दूसरे शब्दों में, तुम्हें अपनी इन्द्रियों के वशीभूत नहीं होना चाहिए।
प्रत्युत तुम्हें स्त्रीके हृदय को लोमड़ी जैसा जानना चाहिए।
स्त्रियों से मित्रता करने से कोई लाभ नहीं।
स्त्रियो हाकरुणा: क्रूरा दुर्मर्षा: प्रियसाहसा: ।
घ्नन्त्यल्पार्थेषपि विश्रब्ध॑ पतिं भ्रातरमप्युत ॥
३७॥
स्त्रियः:--स्त्रियाँ; हि--निस्सन्देह; अकरुणा:--करुणारहित; क्रूराः--चालाक, मक्कार; दुर्मर्षा:--असहिष्णु; प्रिय-साहसा:--अपनेआनन्द के लिए कुछ भी करने वाली, दुस्साहसी; घ्नन्ति--मार डालती हैं; अल्प-अर्थ--छोटे से कारण के लिए; अपि--निस्सन्देह;विश्रब्धम्--आज्ञाकारी; पतिम्--पति को; भ्रातरम्-- भाई को; अपि-- भी; उत--कहा गया है।
स्त्रियों की जाति करुणाविहीन तथा चतुर होती है।
वे थोड़ा सा भी अपमान सहन नहीं करसकतीं।
वे अपने आनन्द के लिए कुछ भी अधर्म कर सकती हैं; अतएव वे अपने आज्ञाकारी पति याभाई तक का वध करते हुए नहीं डरतीं।
विधायालीकविश्रम्भमज़ेषु त्यक्तसौहदा: ।
नव॑ नवमभीप्सन्त्य: पुंश्चल्य: स्वैरवृत्तय: ॥
३८ ॥
विधाय--स्थापित करके; अलीक--झूठा; विश्रम्भम्-विश्वास; अज्ञेषु-मूर्ख पुरुषों से; त्यक्त-सौहदा:--जिन््होंने शुभचिन्तकों कासाथ छोड़ दिया है; नवमू--नवीन; नवम्--नवीन; अभीष्सन्त्यः:--चाहते हुए; पुंश्वल्य:--अन्य पुरुषों के द्वारा आसानी से आकृष्ट होनेवाली स्त्रियाँ; स्वैर--स्वतंत्र रूप से; वृत्तय:ः--पेशेवर
स्त्रियाँ पुरुषों द्वारा आसानी से ठग ली जाती हैं, अतएव दूषित स्त्रियाँ अपने शुभेच्छु पुरुष कीमित्रता छोड़कर मूर्खों से झूठी दोस्ती स्थापित कर लेती हैं।
निस्सन्देह, वे एक के बाद एक नित नयेमित्रों की खोज में रहती हैं।
संवत्सरान्ते हि भवानेकरात्र मयेश्वर: ।
रंस्यत्यपत्यानि च ते भविष्यन्त्यपराणि भो: ॥
३९॥
संवत्सर-अन्ते--हर एक साल के बाद; हि--निस्सन्देह; भवान्--आप; एक-रात्रमू--एक रात के लिए; मया--मेरे साथ; ईश्वर: --मेरेपति; रंस्थति--रमण करोगे; अपत्यानि--सन्तान; च-- भी; ते--तुम्हारी; भविष्यन्ति--उत्पन्न होगी; अपराणि--अन्य, एक के बादएक; भोः--हे राजा।
हे राजा, तुम हर एक साल के बाद केवल एक रात के लिए मेरे साथ पति रूप में रमण करसकोगे।
इस तरह तुम्हें एक-एक करके अन्य सनन््तानें भी मिलती रहेंगी।
अन्तर्वत्ीमुपालक्ष्य देवीं स प्रययौ पुरीम् ।
'पुनस्तत्र गतोब्दान्ते उर्वशीं वीरमातरम् ॥
४०॥
अन्तर्वलीम्ू--गर्भिणी; उपालक्ष्य--देखकर; देवीम्--उर्वशी को; सः--वह; प्रययौ--लौट आया; पुरीम्--अपने महल में; पुन:--फिर; तत्र--उसी स्थान पर; गत:ः--गया; अब्द-अन्ते--एक साल के बाद; उर्वशीम्--उर्वशी को; वीर-मातरम्--एक क्षत्रिय पुत्र कीमातायह जानकर कि उर्वशी गर्भवती है, पुरुवा अपने महल में वापस आ गया।
एक वर्ष बादकुरुक्षेत्र में ही उर्वशी से पुनः उसकी भेंट हुई; तब वह एक वीर पुत्र की माता थी।
उपलभ्य मुदा युक्त: समुवास तया निशाम् ।
अथेनमुर्वशी प्राह कृपणं विरहातुरम् ॥
४१॥
उपलभ्य--साथ पाकर; मुदा--अत्यधिक खुशी में; युक्त:--मिलकर; समुवास--संभोग किया; तया--उसके साथ; निशाम्--उसरात्रि; अथ-त्पश्चात्; एनम्-राजा को; उर्वशी --उर्वशी ने; प्राह--कहा; कृपणम्--दुर्बल हृदय वाले; विरह-आतुरम्-विरह के
विचारभाव से पीड़ित वर्ष के अन्त में उर्वशी को फिर से पाकर राजा पुरुरवा अत्यधिक हर्षित था और उसने एक रातउसके साथ संभोग में बिताई।
किन्तु उससे विलग होने के विचार से वह अत्यधिक दुखी था; इसलिएउर्वशी ने उससे इस प्रकार कहा।
गन्धर्वानुपधावेमांस्तुभ्यं दास्यन्ति मामिति ।
तस्य संस्तुवतस्तुष्टा अग्निस्थालीं ददुर्नुप ।
उर्वशीं मन्यमानस्तां सोबुध्यत चरन्वने ॥
४२॥
गन्धर्वानू--गन्धर्वों की; उपधाव--जाकर शरण लो; इमानू--इन; तुभ्यम्--तुमको; दास्यन्ति--देंगे; माम् इति--मेरे ही जैसी;तस्य--उसके द्वारा; संस्तुवत:--स्तुति करने पर; तुष्टा:--प्रसन्न होकर; अग्नि-स्थालीम्-- अग्नि से उत्पन्न कन्या; ददुः--दिया; नृप--हेराजा; उर्वशीम्--उर्वशी को; मनन््य-मान:--सोचते हुए; तामू--उसको; सः--वह ( पुरुरवा ); अबुध्यत--समझ गया; चरन्--विचरणकरते हुए; बने--वन में |
उर्वशी ने कहा : हे राजन, तुम गन्धर्वों की शरण में जाओ क्योंकि वे मुझे पुनः तुम्हें दे सकेंगे।
इन बचनों के अनुसार राजा ने स्तुतियों द्वारा गन्धर्वों को प्रसन्न किया और जब गर्धर्व प्रसन्न हुए तोउन्होंने उसे उर्वशी जैसी ही एक अग्निस्थाली कन्या प्रदान की।
यह सोचकर कि यह कन्या उर्वशी हीहै, वह राजा उसके साथ जंगल में विचरण करने लगा, किन्तु बाद में उसकी समझ में आ गया किवह उर्वशी नहीं अपितु अग्निस्थाली है।
स्थालीं न्यस्य बने गत्वा गृहानाध्यायतो निशि ।
त्रेतायां सम्प्रवृत्तायां मनसि त्रय्यवर्तत ॥
४३॥
स्थालीम्--अग्निस्थली को; न्यस्य--तुरन्त त्यागकर; वने--वन में; गत्वा--लौटने पर; गृहान्ू--घर पर; आध्यायत: --ध्यान करनेलगा; निशि--सारी रात; त्रेतायाम्-त्रेतायुग में; सम्प्रवृत्तायाम्--प्रारम्भ होने को था; मनसि--मन में; त्रयी--तीन वेदों के सिद्धान्त;अवर्तत--प्रकट हुए।
तब राजा पुरुरवा ने अग्निस्थाली को जंगल में छोड़ दिया और स्वयं घर वापस चला आया जहाँउसने रात भर उर्वशी का ध्यान किया।
उसके ध्यान के ही समय त्रेतायुग का शुभारम्भ हो गया;अतएव वेदत्रयी के सारे सिद्धान्त, जिनमें कर्म की पूर्ति के लिए यज्ञ करने की विधियाँ भी सम्मिलित थीं,उसके हृदय के भीतर प्रकट हुए।
स्थालीस्थानं गतोश्वत्थं शमीगर्भ विलक्ष्य सः ।
तेन द्वे अरणी कृत्वा उर्वशीलोककाम्यया ॥
४४॥
उर्वशीं मन्त्रतो ध्यायन्नधरारणिमुत्तराम् ।
आत्मानमुभयोर्मध्ये यत्तत्प्रजननं प्रभु; ॥
४५॥
स्थाली-स्थानम्--जहाँ अग्निस्थाली को छोड़ा था; गत:ः--वहाँ जाकर; अश्वत्थम्--अ श्वत्थ वृक्ष; शमी-गर्भमू--शमी वृक्ष के भीतरसे; विलक्ष्य--देखकर; सः--वह पुरुरवा; तेन--उससे; द्वे--दो; अरणी--यज्ञ की अग्नि जलाने के काम आने वाली लकड़ी केटुकड़े; कृत्वा--बनाकर; उर्वशी-लोक-काम्यया--उस लोक को जाने की इच्छा से जहाँ उर्वशी थी; उर्वशीम्--उर्वशी को; मन्त्रत:--मंत्रोच्चार द्वारा; ध्यायन्-- ध्यान करते हुए; अधर--नीचे के; अरणिम्--अरणिम् काष्ठ को; उत्तरामू--तथा ऊपर वाले को;आत्मानम्--अपने को; उभयो: मध्ये--दोनों के बीच में; यत् तत्ू--उसे ( जिसका वह ध्यान कर रहा था ); प्रजननम्--पुत्ररूप में;प्रभु:--राजा ने।
जब पुरुरवा के हृदय के कर्मकाण्डीय यज्ञ की विधि प्रकट हुई तो वह उसी स्थान पर गया जहाँउसने अग्निस्थाली को छोड़ा था।
वहाँ उसने देखा कि शमी वृक्ष के भीतर से एक अश्रत्थ वृक्ष उगआया है।
उसने उस वृक्ष से लकड़ी का एक टुकड़ा लिया और उससे दो अरणियाँ बना लीं।
उसनेउर्वशी के रहने वाले लोक में जाने की इच्छा से, निचली अरणी में उर्वशी का और ऊपरी अरणी मेंअपना ध्यान तथा बीच के क्राष्ट में अपने पुत्र का ध्यान करते हुए मंत्रोच्चयार किया।
इस तरह वहअग्नि प्रज्वलित करने लगा।
तस्य निर्मन््थनाज्जातो जातवेदा विभावसु: ।
त्रय्या स विद्यया राज्ञा पुत्रत्वे कल्पितस्त्रिवृत् ॥
४६॥
तस्य--पुरुरवा के; निर्मन््थनात्ू--मन्थन या घर्षण से; जात:--उत्पन्न हुआ; जात-वेदा: --वैदिक सिद्धान्तों के अनुसार भौतिक भोगके निमित्त; विभावसु:--अग्नि; त्रय्या--वैदिक सिद्धान्तों का पालन करते हुए; सः--अग्नि; विद्यया--ऐसी विधि से; राज्ञा--राजाद्वारा; पुत्रत्वे--पुत्र उत्पन्न होना; कल्पित:--ऐसा हुआ कि; त्रि-वृत्--तीन अक्षर
पुरुरवा द्वारा अरणियों के रगड़ने से अग्नि उत्पन्न हुई।
ऐसी अग्नि से मनुष्य को भौतिक भोग मेंपूर्ण सफलता मिल सकती है और वह सनन््तान उत्पत्ति, दीक्षा तथा यज्ञ करते समय शुद्ध हो सकता हैजिन्हें अ, उ, म् ( ओम् ) शब्दों के द्वारा आवाहन किया जा सकता है।
इस प्रकार वह अग्नि राजापुरुरवा का पुत्र मान ली गई।
तेनायजत यज्ञेशं भगवन्तमधोक्षजम् ।
उर्वशीलोकमन्विच्छन्सर्वदेवमयं हरिमू ॥
४७॥
तेन--ऐसी अग्नि उत्पन्न करने से; अयजत--पूजा की; यज्ञ-ईशम्--यज्ञ के स्वामी की; भगवन्तम्-भगवान्; अधोक्षजम्--इन्द्रियोंकी अनुभूति से परे; उर्वशी-लोकम्--वह लोक जहाँ उर्वशी रहती थी; अन्विच्छन्--जाना चाहते हुए; सर्व-देव-मयम्--सभी देवताओंका आगार; हरिम्-- भगवान् कोउर्वशी-लोक जाने के इच्छुक
पुरुरवा ने उस अग्नि के द्वारा एक यज्ञ किया जिससे उसने यज्ञफलके भोक्ता भगवान् हरि को तुष्ट किया।
इस प्रकार उसने इन्द्रियानुभूति से परे एवं समस्त देवताओं केआगार भगवान् की पूजा की।
एक एव पुरा वेद: प्रणव: सर्ववाड्मय: ।
देवो नारायणो नानन््य एकोडगिनिर्वर्ण एव च ॥
४८॥
एक:--एकमात्र; एब--निस्सन्देह; पुरा--प्राचीन काल में; वेद:--दिव्य ज्ञान का ग्रंथ; प्रणव: --ओंकार; सर्व-बाक्-मय: --सारेवैदिक मंत्रों से युक्त; देव: --ईश्वर; नारायण:--एकमात्र नारायण ( सत्ययुग में पूज्य थे ); न अन्य:--अन्य कोई नहीं; एक: अग्नि:--अग्नि का केवल एक विभाग; वर्ण:--जीवन व्यवस्था, जाति; एव च--तथा निश्चय ही।
प्रथम युग, सत्ययुग में, सारे वैदिक मंत्र एक ही मंत्र प्रणव में सम्मिलित थे जो सारे वैदिक मंत्रोंका मूल है।
दूसरे शब्दों में अथर्ववेद ही समस्त वैदिक ज्ञान का स्त्रोत था।
भगवान् नारायण हीएकमात्र आराध्य थे और देवताओं की पूजा की संस्तुति नहीं की जाती थी।
अग्नि केवल एक थीऔर मानव समाज में केवल एक वर्ण था जो हंस कहलाता था।
पुरूरवस एवासीत्यी त्रेतामुखे नूप ।
अग्निना प्रजया राजा लोकं गान्धर्वमेयिवान् ॥
४९॥
पुरूरवस:--राजा पुरुरवा से; एब--इस प्रकार; आसीतू-- था; त्रयी--कर्म, ज्ञान तथा उपासना के वैदिक सिद्धान्त; त्रेता-मुखे--त्रेतायुग के प्रारम्भ में; नृप--हे राजा परीक्षित; अग्निना--यज्ञ की अग्नि उत्पन्न करने से ही; प्रजया--अपने पुत्र द्वारा; राजा--पुरुरवाने; लोकम्--लोक को; गान्धर्वम्-गन्धर्वों के; एयिवानू--प्राप्त किया।
हे महाराज परीक्षित, त्रेतायुग के प्रारम्भ में राजा पुरुरवा ने एक कर्मकाण्ड यज्ञ का सूत्रपातकिया।
इस प्रकार यज्ञिक अग्नि को पुत्र मानने वाला पुरुरवा इच्छानुसार गन्धर्वलोक जाने में समर्थहुआ।
